हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ उजाले हर तरफ़ होंगे – श्री मनजीत भोला ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है  श्री मनजीत भोला जी की पुस्तक उजाले हर तरफ़ होंगे पर श्री मनजीत सिंह की चर्चा।

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ उजाले हर तरफ़ होंगे – श्री मनजीत भोला ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆

किताब – उजाले हर तरफ़ होंगे

कवि/शायर – मनजीत भोला

समीक्षाकर्ता- मनजीत सिंह

प्रकाशक – सत्यशोधक फाउंडेशन, कुरुक्षेत्र

कीमत –80 रूपये भारतीय

पृष्ठ संख्या –64

☆ समाज को आइना दिखाता ग़ज़ल संग्रह उजाले हर तरफ़ होंगे – श्री मनजीत सिंह

मनजीत भोला की ग़ज़ल-कृति “उजाले हर तरफ़ होंगे” समकालीन समाज की उन दरारों को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर रोशनी, आस्था और नैतिकता के नाम पर ढक दिया जाता है। किताब की पहली ग़ज़ल के अशआर यह स्पष्ट कर देते हैं कि कवि समाज की बुराइयों की जड़ आम लोगों या साधारण वस्तुओं में नहीं, बल्कि सत्ता, धर्म और नैतिक मूल्यों के उस दुरुपयोग में देखता है, जिसे ताक़तवर वर्ग अपने स्वार्थ के लिए करता है। रोशनी स्वयं किसी से नहीं लड़ती, लेकिन जब उसे राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है, तो अँधेरा बना रहता है और सच ओझल हो जाता है।कवि उस आस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जो संवेदना और विवेक से कटकर मात्र पत्थर बन जाती है। ऐसी इबादत, जो इंसान को बेहतर नहीं बनाती, बल्कि अपराध को पवित्र शब्दों में ढकने का माध्यम बन जाती है, समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मासूमों की हत्या को “शहादत” कहकर प्रस्तुत करना इसी नैतिक पतन का उदाहरण है, जहाँ भाषा का इस्तेमाल सच को छुपाने के लिए किया जाता है।किताब की अगली ग़ज़लों में कवि गरीब बस्तियों के यथार्थ को सामने लाता है। वहाँ दिन तो किसी तरह धूप के सहारे गुजर जाता है, लेकिन शामें बिना दीये के होती हैं। मज़दूर स्त्री का शरीर थकान से झुलसा हुआ है, फिर भी उसे काम पर जाना पड़ता है—आराम उसकी पहुँच से बाहर है। सरकार की घोषणाएँ रोटियों का विकल्प नहीं बन पातीं, बल्कि अक्सर वे गरीबों को ही बदनाम करने का कारण बन जाती हैं। लेबर चौक पर चाय पीता मज़दूर दूध के दाम नहीं जानता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में बुनियादी ज़रूरतें भी विलास बन चुकी हैं।शिक्षा को लेकर कवि का स्वर और तीखा हो जाता है। जिन बच्चों के लिए स्कूल के दरवाज़े ही बंद हैं, उनके लिए योजनाएँ बेमानी हैं। अगर समाज एक कलम और कुछ किताबें तक नहीं दे सकता, तो झोपड़ी पर अम्बेडकर का नाम लिख देना केवल दिखावा है—विचारों के साथ एक क्रूर मज़ाक।पिछले समय की याद दिलाती ग़ज़ल में कवि बताता है कि यह सब कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। कभी सामाजिक जीवन में संयम था, धार्मिक सहिष्णुता थी और शिक्षा घर से शुरू होती थी। मंटो जैसी सच्ची आवाज़ें असहज करती थीं, लेकिन औरत की इज़्ज़त सुरक्षित थी। मक़तब और स्कूल सबके लिए खुले थे, ताकि कोई बच्चा पढ़ाई से वंचित न रहे।कवि तथाकथित रहबरों पर भी सवाल उठाता है—वे जो रास्ता दिखाने का दावा करते हैं, लेकिन डर पैदा करते हैं। तपती रेत पर बने कदमों के निशान की तरह उनकी साख भी मिट जाती है। हर गली में पैदा हुए “गिरधर” उस धार्मिक अराजकता का प्रतीक हैं, जहाँ हर व्यक्ति स्वयं को सत्य का ठेकेदार समझने लगता है।

अंतिम ग़ज़ल में कवि लोकतंत्र और राजनीति की विडंबना पर सीधा प्रहार करता है। खौफ़ की दुकानें चलाने वाले लोग फूलों की बात होते ही गायब हो जाते हैं। शिक्षा, रोज़गार और इलाज जैसे असली मुद्दों के बजाय लहू से लिखे नारों की माँग की जाती है, क्योंकि आज वोट विकास से नहीं, डर और हिंसा से हासिल किए जाते हैं।

इस प्रकार “उजाले हर तरफ़ होंगे” केवल गजल-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय का नैतिक दस्तावेज़ है—जो यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या हम सचमुच उजालों की ओर बढ़ रहे हैं, या अँधेरे की राजनीति को ही रोशनी मान बैठे हैं।मनजीत भोला की किताब उजाले हर तरफ़ होंगे के पहली ग़ज़ल के कुछ अशआर जो इस प्रकार से हैं

चरागों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है

अँधेरा मिट नहीं पाया उजालों की सियासत है‌।

 *

जहाँ तू सर पटकता है वहाँ बस एक पत्थर है

इबादत से बड़ी गाफ़िल यहाँ पर शय नदामत है।

बहाना मत ज़रा आँसू समझ लेना मेरे बाबा

क़त्ल मेरा करेंगे वो बताएंगे शहादत है।

समाज की बुराइयों की जड़ आम लोगों या साधारण चीज़ों में नहीं है, बल्कि सत्ता, धर्म और नैतिकता को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों में है। रोशनी अपने आप में किसी से नहीं लड़ती, लेकिन जब उसे राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है तो अँधेरा बना रहता है।

कवि कहता है कि लोग जिस आस्था को पूज रहे हैं, वह कई बार सिर्फ़ एक निर्जीव पत्थर बनकर रह जाती है, क्योंकि सच्ची इबादत—जो इंसान को बेहतर बनाए—उसकी जगह दिखावा और खोखली नदामत ले लेती है। यहाँ भावना है, समझ नहीं।मासूमों की हत्या को बड़े शब्दों और पवित्र नामों से ढक दिया जाता है। क़त्ल को “शहादत” कहकर पेश किया जाता है ताकि अपराधी अपने अपराध से बरी दिखें और समाज भ्रम में रहे।

इसके बाद कवि सत्ता की ओर उँगली उठाता है—वह कहता है कि हुकूमत का नशा इंसान को अंधा कर देता है। शासक जिस कुर्सी पर बैठा है, वह उसकी निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि जनता की अमानत है, जिसे वह भूल जाता है।अंत में कवि इस नैतिक विडंबना पर चीख़ उठता है कि जिनके हाथ खून से रंगे हैं, वही अगर दान और भलाई का ढोंग करें तो यह पूरे समाज के लिए क़यामत जैसी स्थिति है—जहाँ सही और ग़लत की पहचान ही मिट जाती ‌।

किताब से पंक्तियां निम्नलिखित हैं –

मुफ़लिसों की बस्तियों में ये नज़ारा आम है

धूप को दिन रखा गया है बेचरागां शाम है

तप रहा था गात फिर भी जा चुकी है काम पर

 कह रही थी चाँदनी कुछ आज तो आराम है

 *

ये दिया है वो दिया है रोटियां पर हैं कहाँ

 घोषणा सरकार की हमको करे बदनाम है

 *

चाय जाकर वो पिए है रोज़ लेबर चौक पर

क्या पता मज़दूर को किस दूध का क्या दाम है

गरीब बस्तियों में अभाव और अँधेरा होना कोई नई बात नहीं है। वहाँ दिन को तो किसी तरह धूप के सहारे गुज़ार लिया जाता है, लेकिन शामें बिना दीये के होती हैं, यानी जीवन में रोशनी और सहारा नहीं है। एक मज़दूर स्त्री का शरीर थकान और धूप से झुलस चुका है, फिर भी वह काम पर जाने को मजबूर है। मन और तन दोनों आराम चाहते हैं, पर गरीबी में विश्राम एक सपना ही रहता है।

सरकार की तरफ़ से योजनाओं और सुविधाओं की घोषणाएँ तो बहुत होती हैं, पर ज़मीन पर लोगों के पास रोटियाँ तक नहीं हैं। ये खोखली घोषणाएँ उल्टा गरीबों को ही बदनाम करती हैं।मज़दूर रोज़ लेबर चौक पर चाय पीता है, पर उसे दूध के दाम तक का सही अंदाज़ा नहीं, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में मूलभूत चीज़ें भी उसकी पहुँच से बाहर हैं।जो बच्चे स्कूल के गेट के भीतर तक नहीं जा सकते, उनके लिए आपकी सारी योजनाएँ बेकार हैं, क्योंकि शिक्षा तक पहुँच ही नहीं है।अगर समाज और सरकार बच्चों को एक कलम और कुछ किताबें तक नहीं दे सकते, तो फिर झोपड़ी पर अम्बेडकर का नाम लिखना केवल दिखावा है, विचारों का सम्मान नहीं।अब यह शहर मज़हब के नाम पर इतना हिंसक और पाखंडी हो गया है कि यहाँ रहना मुश्किल लगता है—जिसके मुँह में राम का नाम है, उसी के हाथ में दूसरों को चोट पहुँचाने की छुरी है।

किताब से पंक्तियां निम्नलिखित हैं –

 पीते न थे वो हाफ़ अभी कल की बात है

 आता नज़र था साफ अभी कल की बात है

 *

शामिल सबा में थी यहाँ खुशबू अजान की

 कोई न था खिलाफ अभी कल की बात है

 *

बारह खड़ी के साथ में वालिद ज़नाब के

 पढ़ते थे काफ गाफ अभी कल की बात है

 *

मंटो की बू के साथ अदालत में जो गया

 आपा तेरा लिहाफ़ अभी कल की बात है

यह सब बहुत पुराने ज़माने की बात नहीं है, बस कल तक ही ऐसा था। लोग खुलेआम शराब नहीं पीते थे और समाज में एक तरह की साफ़गोई और संकोच मौजूद था।

हवा में अज़ान की खुशबू घुली रहती थी और किसी को उससे कोई आपत्ति नहीं होती थी। धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान सामान्य बात थी।पिता अपने बच्चों के साथ बैठकर बारहखड़ी पढ़ाते थे, अक्षरों की पहचान कराते थे। शिक्षा घर और परिवार का हिस्सा हुआ करती थी।मंटो जैसे लेखक की सच्ची और कड़वी रचनाओं को लेकर अदालत तक जाया जाता था, लेकिन औरत की इज़्ज़त और मर्यादा सुरक्षित मानी जाती थी।रात में अगर किसी का कंधा तकिये की तरह इस्तेमाल हो भी जाए, तो उसमें कोई अश्लीलता या संदेह नहीं खोजा जाता था—नियत पर शक नहीं होता था।मक़तब और स्कूलों के दरवाज़े सबके लिए खुले थे और पढ़ाई की फीस भी माफ़ रहती थी, ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।

राह में हमको मिले रहबर कई

दिल से डर कई हो गए हैं दूर

हैं निशाँ कदमों के तपती रेत पर

 गुम गए लेकिन यहाँ पे सर कई

 *

आज मीरा बावली को क्या पता

 हर गली पैदा हुए गिरधर कई

ज़िंदगी की राह में हमें कई ऐसे लोग मिले जो खुद को रहबर कहते थे, लेकिन उनसे दिल में डर पैदा होता था। ऐसे लोग अब दूर हो चुके हैं, पर उनका असर रह गया है।

तपती हुई रेत पर पैरों के निशान तो दिखाई देते हैं, लेकिन आगे चलकर वे मिट जाते हैं। यहाँ बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके सिर तो हैं, पर दिशा और सोच खो चुकी है।

आज अगर मीरा को बावली कहा जाता है, तो उसे यह भी नहीं पता कि अब हर गली में अपने-अपने गिरधर पैदा हो गए हैं—हर कोई खुद को ईश्वर या सत्य का प्रतिनिधि मानने लगा है।राजधानी में एक ही महल को रोशनी चाहिए थी, लेकिन उसकी इस चाह में कई घर जलकर खाक हो गए—सत्ता की चमक आम लोगों की बर्बादी बन गई।अब स्वाभिमान और आत्मसम्मान सिर्फ़ शहरों में ही नहीं बिकता, बल्कि गाँवों में भी उसके दफ़्तर खुल गए हैं—यानी समझौते और सौदेबाज़ी हर जगह फैल चुकी है।

अंतिम ग़ज़ल के कुछ अशआर  

दुकानें खौफ की बेशक यहाँ पर वो चलाते हैं

चले जो बात फूलों की कहीं पे खो से जाते हैं

 *

हवा आ ही गई है तो भला मायूस क्यों करना

 धरो तुम चाक पर माटी कोई दीपक बनाते हैं

 *

यहाँ पर लोग रावण से बुरे भी हैं जलाने को

 मगर हर साल पुतला हम बनाते हैं जलाते हैं

 *

पढ़ाई की, कमाई की, दवाई की न बातें हों

 लिखो नारे लहू से तुम, लहू से वोट आते हैं

यहाँ कुछ लोग डर और भय का कारोबार खुलेआम करते हैं। वे समाज को खौफ़ में रखकर अपना स्वार्थ साधते हैं, लेकिन जैसे ही प्रेम, करुणा और फूलों जैसी कोमल बातों की चर्चा होती है, वे लोग चुपचाप गायब हो जाते हैं।

कवि कहता है कि जब बदलाव की हवा चल ही पड़ी है, तो निराश होने का कोई कारण नहीं। अगर इरादा और उम्मीद मौजूद हो, तो साधारण मिट्टी को भी चाक पर रखकर एक दीपक बनाया जा सकता है—यानी छोटे साधनों से भी रोशनी पैदा की जा सकती है।समाज में ऐसे लोग भी हैं जो रावण से भी अधिक क्रूर हैं और सच में जलाए जाने योग्य हैं, लेकिन विडंबना यह है कि हम हर साल केवल रावण का पुतला बनाकर जला देते हैं, जबकि असली बुराइयों को हाथ तक नहीं लगाते।

अंत में कवि राजनीति की क्रूर सच्चाई उजागर करता है—यहाँ शिक्षा, रोज़गार और इलाज जैसे ज़रूरी मुद्दों पर बात नहीं की जाती। इसके बजाय खून से लिखे नारे गढ़े जाते हैं, क्योंकि आज वोट समझ और विकास से नहीं, बल्कि हिंसा, डर और लहू के सहारे जुटाए जाते हैं। अंत में मैं यही कहता हूं –

 उजालों की नुमाइश में अँधेरा पल रहा है

हर इक चिराग़ बिकता है, अँधों का शहर रहा है

 *

जो सच कहे वही अक्सर सलीबों पर चढ़े है

यहाँ झूठ के दरबार में इनाम ही बड़ा है

 *

किताबों से जो डरते हैं वही तख़्तों पे बैठे

कलम का इक इशारा भी उन्हें खटका हुआ है

 *

वो भूखे पेट से पूछे हैं क्या होता है वादा

क़लम से लिख दिया जिसने कभी देखा न खाया

 *

मज़हब की ओट में नफ़रत की खेती हो रही है

भगवान के ही नाम पर इंसान कट रहा है

**

समीक्षक : श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९७ ☆ “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)” –संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन  ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन जी द्वारा लिखित  “व्यंग्य के रंग (साझा संकलनपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९७ ☆

☆ “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)” – संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन  ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति: व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)

संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन

प्रकाशक: अद्विक पब्लिकेशन, नई दिल्ली

मूल्य: ₹550/-

पृष्ठ संख्या: 212

ISBN: 978-93-49362-25-3

चर्चा: विवेक रंजन श्रीवास्तव

साहित्य जब समाज का जीवंत दस्तावेज बनता है, तो वह केवल शब्दों का संचयन नहीं रह जाता, बल्कि कालखंड की पदचाप बन जाता है। ‘व्यंग्य के रंग ‘ के पन्नों से गुजरते हुए ऐसा ही महसूस होता है। यह संकलन उन बिखरे हुए वैचारिक व्यंग्य के मोतियों की माला है, जो आज के संक्रमणकालीन भारत की तस्वीर को पूरी नग्नता और आत्मीयता के साथ उकेरते हैं।

संपादन की मेज पर परवेश जी ने जिस धैर्य और दृष्टि का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। उनके ‘संपादकीय कथन’ में स्पष्ट झलकता है कि यह संकलन केवल रचनाओं का जमावड़ा नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से  इस संग्रह की प्रकाशन यात्रा साझा की है।

इस संग्रह की शक्ति इसकी विविधता है। राजनीति के गलियारों से लेकर सामाजिक सरोकारों की गलियों तक, यहाँ हर मोड़ पर एक नई दृष्टि मिलती है। राजनीति केंद्रित व्यंग्य लेखों  में ‘लोकतंत्र ‘ पर किए गए कटाक्ष पठनीय हैं। विभिन्न लेखकों की अपनी शैली में केंद्रीय चिंता एक विसंगति है। शुचिता की कामना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सत्ता के खेल में खोते जा रहे नैतिक मूल्यों पर कड़ा प्रहार करती रचनाएं हैं। लेखों के माध्यम से व्यवस्था के दोहरेपन को बेनकाब कर व्यंग्यकारों  ने उनके हिस्से के लेखकीय दायित्व निभाने का यत्न किया है।

इस संकलन में मेरी (विवेक रंजन श्रीवास्तव) की भी कुछ वैचारिक भागीदारी रही है। मेरा व्यंग्य लेख ‘ लाइक, शेयर, सब्सक्राइब प्लीज! शामिल किया गया है।

विकास की बलि चढ़ते सरोकार से खिन्न लेख, व्यंग्यकारों की छटपटाहट की अभिव्यक्ति है। आखिर हम कंक्रीट के जंगल उगाकर किस हरियाली की तलाश कर रहे हैं? तकनीकी विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच का जो असंतुलन है, उसे लेखकों ने अपनी  तार्किकता और साहित्य की तरलता के साथ पिरोने का प्रयास किया है।

संग्रह में शामिल कुल 88 रचनाओं में हरएक के अपने अनुभव, अलग अलग रचना समय, स्मृति, जड़ों की ओर वापसी  जैसे मूल सिद्धांत पाठक के मानस पटल पर गहरी छाप छोड़ती हैं।

सामूहिक संकलनों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ‘डेमोक्रेसी’ होती है, जहाँ भिन्न विषय पर अलग-अलग लेखकों के भिन्न दृष्टिकोण पाठक को सोचने के लिए एक व्यापक धरातल प्रदान करते हैं। वरिष्ठ कलमकारों का अनुभव और नए लेखकों का उत्साह, इस पुस्तक को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।

पुस्तक की साज-सज्जा और इसके आवरण (Cover) पर चर्चा किए बिना यह समीक्षा अधूरी होगी। आवरण का डिजाइन प्रतीकात्मकता से भरा है।

गांधी जी की मेज पर उपस्थित तीन बंदरों का प्रतीकात्मक संदेश न्यू आर्ट फॉर्म में, ब्लैक एंड व्हाइट चित्र से प्रदर्शित किया गया है। जो द्वंद्व कवर पर चित्रित किया गया है, वह पुस्तक के शीर्षक  के साथ पूरा न्याय करता है।

पुस्तक क्या ग्रंथ कहा जाना चाहिए में, अकारादी क्रम में लेखक शामिल हैं। राजू श्रीवास्तव, डॉ. अजय अनुरागी, डॉ. अजय जोशी, अखतर अली, अलंकार रस्तोगी, अलका अग्रवाल सिगतया, आलोक पुरानीक, अनीता यादव, अनूप शुक्ल, डॉ. कुमारी अर्पणा, अर्चना चतुवदी, अरुण अर्नव खरे, अरिवंद तिवारी, आशीष दशोतर, आत्माराम भाटी, डॉ. अतुल चतुर्वदी, बी.एल. आचछा, बिंदु जैन, ब्रजेश कानूनगो, बुलाकी शमा, धर्मपाल महेंद्र जैन, दिलीप कुमार, दिलीप तेतरवे, डॉ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’, फ़ारूक़ आफ़रीदी, गिरीश पंकज, ज्ञान चतुर्वेदी, हनुमान मुण्ड, हरशंकर राढ़ी, डॉ. हरीश कुमार सिंह, डा हरीश नवल, इंद्रजीत कौर

, इंद्रजीत कौशिक, इन्दु सिन्हा ‘इन्दु’, जय प्रकाश पाण्डेय, जीतेंद्र जितांशु, डॉ. के.के. अस्थाना, कैलाश मण्डलेकर, डॉ. किशोर अग्रवाल, डॉ. कुलवंत सिंह शेहरी, डॉ. लालित्य ललित, मलय जैन, मीरा जैन, मुकेश राठौर, मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ा

नीरज दइया, पंकज सून, डॉ. पंकज साहा, परवेश जैन, पवन कुमार जैन, डॉ. पिलक अरोरा, शारदेन्दु शुक्ला ‘शरद’, शिशिर सिंह, श्रीकांत आप्टे, डॉ. स्नेहलता पाठक, सुभाष चंदर, सुभाष काबरा, सुधीर कवलिया, सुनील जैन ‘राही’, सुनील सक्सेना, डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतुप्त’, सूर्यबाला, विजय आनंद दुबे, विजय शंकर मिश्र, विशाल चर्चित, विवेक रंजन श्रीवास्तव, यशवंत कोठारी, पूरन सरमा, प्रभाशंकर उपाध्याय, प्रभात गोस्वामी एवं पृथ्वीराज चौहान, डॉ प्रेम जनमेजय, डॉ. राजेश कुमार, राज नागर ‘निरंतर’, राजेश वर्मा, आचार्य राजेश कुमार, राकेश सोहम, राम भोले शर्मा, रामस्वरूप दीक्षित, रामविलास जांगिड़, डॉ. रामवृक्ष सिंह, रमाकांत ताम्रकार, रमेश सैनी, रणविजय राव, रश्मि चौधरी, डॉ. संगीता शर्मा अधिकारी, सीमा राय ‘मधुरिमा’ एवं सेवाराम त्रिपाठी जैसे सभी स्वनाम धन्य सुप्रसिद्ध व्यंग्य कारों को एक जिल्द में पढ़ सकते हैं।

लगभग 350 पृष्ठ की किताब का गेटअप, रंगों का चयन और शीर्षक का संयोजन पहली नजर में ही पाठक को अपनी ओर आकर्षित करता है और विषय-वस्तु की गंभीरता का संकेत दे देता है। अद्विक पब्लिकेशन ने मुद्रण और कागज की गुणवत्ता में भी उच्च मानक स्थापित किए हैं।

अंततः, यह संकलन केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सहेजने के लिए है। यह हमें याद दिलाता है कि हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं, हमारी आत्मा की धड़कनें आज भी शाश्वत सत्य के मूल्यों के बीच कहीं अटकी हुई हैं।

किताब खरीदिए, पढ़िए और अपनी सम्मति से व्यंग्य जगत के इस ” जोर लगा कर हैय्या” वाले समवेत स्वर को बधाई दीजिए।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ पानी राखिए – श्री अभिमन्यु जैन ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ पानी राखिए – श्री अभिमन्यु जैन ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्री अभिमन्यु जैन जी को जन्मदिवस पर अशेष शुभकामनाएं)

☆ जन्म दिवस पर मंगल भाव सहित प्रतिष्ठित व्यंग्यकार श्री अभिमन्यु जैन और उनकी कृति “पानी राखिए” – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

व्यंग्य कर्मियों की लम्बी होती जा रही कतार में शामिल होने के लिए अब यह आवश्यक होता जा रहा है कि नयी कलम में विसंगतियों के नव्य संप्रेषण का साहस हो। यह भी जरुरी है कि व्यंग्यकार में अपनी विशिष्ट पहचान को रेखांकित करने योग्य कुछ नया और अलग हो। अभिमन्यु जैन ने व्यंग्य के इलाके में जानबूझकर चहलकदमी की है और अपने व्यंग्यों के लिए कथ्य और शिल्प की नव्यता तलाशी है। नये आलम्बनों से जूझते हुए उनके व्यंग्य अपने छोटे आकार में भी अनुभव के विस्तार का संकेत देते हैं। परिवेश की विद्रूपताओं को बेधने में व्यस्त अभिमन्यु जैन ने नये सिरे से चक्रव्यूह को तोड़ने का यत्न किया है, यही कम नहीं।

ये विश्लेषण है सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व. डा. बालेन्दु शेखर तिवारी का जिसने प्रतिष्ठित व्यंग्यकार श्री अभिमन्यु जैन की व्यंग्य कृति पानी राखिए की व्यंग्य रचनाओं की सटीकता और पठनीयता को प्रमाणित किया है।

श्री अभिमन्यु जैन

श्री अभिमन्यु जैन के व्यंग्य संग्रह पानी राखिए में प्रकाशित श्री बालेन्दु शेखर तिवारी के इस सटीक विश्लेषण पर जब हम गंभीरता से विचार करते हैं तो तो हमें अभिमन्यु जी की व्यंग्य रचनाओं पर उनकी ये सोच वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में सामयिक और आवश्यक लगती है। आज की अव्यवस्थाओं और विषमताओं पर उनका व्यंग्य ऐसी चोट करता नजर आता है कि पाठक भी ऐसी व्यंग्य रचनाओं पर नये सिरे से सोचने के लिए बाध्य हो जाता है। व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में अभिमन्यु जी के इस व्यंग्य संग्रह की पठनीयता को विभिन्न प्रबुद्ध जनों ने भी सहर्ष स्वीकार किया है। इस संबंध में जानकीरमण कालेज के प्राचार्य डा. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी का मानना है कि हिन्दी साहित्यिक संसार में उनकी यह पुस्तक पानी राखिए अपना विशिष्ट स्थान बनाकर रहेगी, ऐसा ध्रुव विश्वास है। पुस्तक में त्रिपाठी जी ने भी व्यंग्य रचनाओं की रोचकता और उसके प्रभावी पन से सहमति जताते हुए लिखा है कि, इस संग्रह में जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई, फूफाजी जैसे यथार्थवादी चित्रण उनकी रोचक लेखन शैली के उदाहरण हैं जो पाठकों को आद्योपांत बांधे रखते हैं और बार बार‌ पढ़ने को प्रेरित करते हैं यही नहीं यत्र तत्र चर्चा का विषय बनाने के लिए उत्साहित भी करते हैं। एक सफल लेखन की यह सबसे प्रबल विशेषता कहीं जायेगी। देखा जाए तो एक व्यंग्यकार अपने आसपास जो देखता है और महसूस करता है वह कलम के माध्यम से कागज पर उतार देता है और चूंकि व्यंग्यकार की नजर अत्यंत पैनी होती है इसलिए उसके तीखे कटाक्ष के साथ उसका सृजन पाठकों को पठनीय भी लगता है। चूंकि अभिमन्यु जी एक प्रशासनिक अधिकारी भी रहे हैं इसलिए कार्यालयीन अव्यवस्थाओं को उन्होंने काफी नजदीक से देखा समझा है इसलिए उन्होंने सफलता पूर्वक इस कड़वे सच को भी अपनी व्यंग्य रचनाओं में व्यक्त किया है। इस व्यंग्य संग्रह की रचनाओं में हमें अभिमन्यु जी की गहरी और व्यापक सोच के दर्शन होते हैं। अभिमन्यु जी की इस पुस्तक में राजनीतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों से संबंधित विभिन्न व्यंग्य रचनाएं संग्रहीत हैं इसलिए पाठक वर्ग को इन सभी रचनाओं से गहरे अपनेपन का अहसास होता है। इस कृति में कुछ ऐसी रचनाएं हैं जो कि अपनी रोचकता के कारण पाठकों को बेहद प्रभावित करती हैं जैसे चुनाव और मुफ्तखोरी, फिसलन, फुटपाथ, हड़ताल, अभिनंदन, बेईमान भर्ती केन्द्र, निधन से नेतागिरी, दीपावली: राष्ट्रीयकरण हो, दादाजी की याद में, महिला राजनीति, मुफ्त का चंदन, पानी राखिए, अच्छे पड़ोसी, फागुनी प्रेम, सरकारी जीप, पुतला तंत्र इत्यादि ऐसी ही व्यंग्य रचनाओं हैं जो प्रत्येक वर्ग को अपने अपने आसपास की रचऩायें प्रतीत होती हैं। संदर्भ प्रकाशन से प्रकाशित पानी राखिए व्यंग्य संग्रह में अभिमन्यु जी की 46 पठनीय और संग्रहणीय रचनायें शामिल हैं। आज़ जन्म दिवस के शुभ अवसर पर मंगल भाव सहित हम तो बस इतना ही कहेंगे कि आदरणीय श्री अभिमन्यु जैन जी की व्यंग्य रचनाएं जितनी प्रेरक और प्रभावी हैं उतना ही प्रभावी और प्रणम्य उनका व्यक्तित्व भी है।

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “गुल्लर के फूल” – शायर –  कर्म चंद केसर ☆  श्री जयपाल☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है शायर कर्म चंद केसर जी के ग़ज़ल संग्रह गुल्लर के फूल पर श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

पुस्तक चर्चा ☆ “गुल्लर के फूल” – शायर –  कर्म चंद केसर ☆  श्री जयपाल

पुस्तक ‘गुल्लर के फूल’ गज़ल संग्रह

शायर कर्म चंद केसर मो  93543-16065

कीमत–Rs.299/- पेपर बैक

प्रकाशक यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र ।

मोबाइल—9000968400

श्री कर्म चन्द केसर

☆ “हरियाणवी लोक जीवन के पारखी शायर कर्म चन्द केसर” ☆  श्री जयपाल ☆

“गुल्लर के फूल” हरियाणवी बोली के नामी शायर कर्म चन्द केसर का हरियाणवी गज़ल संग्रह है जो इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है l इस संग्रह में उनकी बहुत ही चर्चित और  उम्दा गज़लें हैं।

ग़ज़ल मूल रूप से उर्दू की विधा है लेकिन इसकी लोकप्रियता के कारण यह भारत की क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में भी लिखी जाने लगी है और इसे खूब स्वीकार्यता मिलने लगी है।  हालांकि किसी भी भाषा और बोली की ग़ज़ल अभी उर्दू ग़ज़ल  की बराबरी करने  की स्थिति में नहीं है। गज़ल में भले ही मतला, मक्ता, रदीफ़, काफिया, बहर आदि के साथ-साथ शब्दों के  चयन में नजाकत और नफ़ासत  भी बहुत महत्वपूर्ण है। इन सामान्य नियमों के साथ-साथ भावों-अनुभावों की गहराई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है l गजल का हर शेर अपने आप में स्वतंत्र होता है जबकि कविता में ऐसा नहीं होता।

कर्म चन्द केसर लोक जीवन के पारखी शायर हैं उनकी शायरी में जीवन के सभी पक्षों के दर्शन होते हैं।  हरियाणवी लोक जीवन के प्रति उनके मन में आदर का भाव जरूर है लेकिन वे उसके नकारात्मक पक्ष को महिमामंडित भी नहीं करते । उनके पास एक रचनात्मक आलोचना दृष्टि है जो उनकी गज़लों में स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है।  लोक जीवन में चली आ रही विकृत परंपराओं का वे समर्थन नहीं करते बल्कि उन पर कटाक्ष करते हैं और उनमें समय के अनुकूल सुधार करने का आह्वान करते हैं । वे कहीं न कहीं जड़ता को तोड़ना चाहते हैं। मज़दूर-किसान और जीवन की सामान्य सुख-सुविधाओं से वंचित लोगों के प्रति उनकी पक्षधरता इन गज़लों में  स्पष्ट दिखाई देती है । वे बेरोजगारी, महंगाई, अनपढ़ता ,गरीबी, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, भ्रुणहत्या, लैंगिक असमानता, आनर-किलिंग, शिक्षा, कुपोषण, आदि सम-सामयिक/सामाजिक विषयों पर भी बिना लागलपेट के गज़लें कहते हैं । ‘गुल्लर के फूल’ पुस्तक में उनकी गज़लों को पढ़कर पता चलता है कि उन्हें आम जीवन के व्यवहार में आने वाले आंचलिक शब्दों का न केवल अच्छी तरह ज्ञान है बल्कि वे स्वयं भी उनमें रचे बसे हैं। हरियाणवी शब्दों का शायरी में इस्तेमाल करते समय वे इस बात के लिए चौकन्ने रहते हैं कि गज़ल की नफ़ासत-नजाकत को कोई चोट न पहुंचे अर्थात ग़ज़ल की नक्काशी करते समय वे अतिरिक्त सतर्कता बरतते हैं।

कर्म चन्द केसर की दृष्टि लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है । वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं लेकिन किसी भी धर्म की सांप्रदायिकता के खिलाफ़ हैं। वे आम आदमी के पक्षधर शायर है–

 घणिये  जादा  बरकत सै  इमान  की  गठड़ी  मैं,

इस गठड़ी नैं सिर पर ठाणा कितना मुसकल सै।

 *

गरमी – सरदी, आंधी – मींह्  नैं  ओट् रह़्या तन पै ,

किरसक जितना कष्ट उठाणा कितना मुसकल सै।

नफ़रत  की  काँद्धां  नै  केसर  इक  दिन  गिरणा  सै,

उस दिन तक यूह् मन समझाणा कितना मुसकल सै।

ग़ज़ल के उपरोक्त तीनों शेरों में ईमानदार व्यक्ति और किसान के जीवन की दुश्वारियों को लेकर वर्तमान व्यवस्था पर तीखा प्रहार है। अंतिम शेर में आज के दौर की साम्प्रदायिकता पर निशाना साधते हुए नफरत की दीवारों को शायर गिराना चाहता है l

छोटी बहर के तीन शेर देखिए—

 अन्न दाता की जून बुरी सै,

हमनै धक्के खांदा देख्या ।

बच्चयांँ के सुख खात्तर बाब्बू,

बड़े – बड़े दुक्ख ठान्दा देख्या।

 उपरोक्त शेरों में किसान-मज़दूर के त्रासद पूर्ण  जीवन को उसी की बोली-भाषा में सशक्त अभिव्यक्ति मिली है।

ना  बोले  इसे  बोल  बाब्बा।

जो दें जिगर नै छोल बाब्बा।

 *

किसकी लाग्गी नजर देश कै,

बिगड़  गया  सै म्हौल बाब्बा।

 इस ग़ज़ल संग्रह में कर्म चन्द केसर हरियाणा के साथ-साथ देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का भी सामना करते हैं। वे हरियाणवी लोक जीवन की समस्याओं को पूरे देश के माहौल से जोड़ कर देखते हैं।

शायर अपनी गज़लों में सादा-जीवन,उच्च-विचार

जैसे लोक मूल्यों को मानवीय जीवन में जरूरी समझता है। इसलिए वह अपने निश्छल बचपन को याद करता है। गाँव-देहात की खातिरदारी और ईमानदारी को घटते देखकर उसे दुःख होता है। इसी तरह वह निश्छल-सच्चे प्रेम को सम्मान की दृष्टि से देखता है लेकिन भ्रूण हत्या और आनर-किलिंग पर अपने शेरों में तंज कसता है।

कर्म चन्द केसर जनवादी-प्रगतिशील मूल्यों में विश्वास करने वाले शायर हैं। जिस प्रकार हास्य-विनोद हरियाणवी जीवन की पहचान है, उसी प्रकार हास्य-विनोद पूर्ण शैली  में ही गहरी बात कहना कर्म चन्द केसर की ग़ज़लों की पहचान है। गज़ल के सभी नियमों-उपनियमों  का पालन करते हुए शायर कर्म चन्द केसर बेहतरीन गज़लों को कहने में कामयाब रहे हैं।

वरिष्ठ शायर कर्मचंद केसर को इस गज़ल संग्रह के प्रकाशित होने पर बहुत-बहुत मुबारकबाद !!

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ कतरा-कतरा एहसास – डा सुभाष चंद्र गर्ग ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है  डा सुभाष चंद्र गर्ग जी की पुस्तक कतरा-कतरा एहसास पर श्री मनजीत सिंह की चर्चा।

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ कतरा-कतरा एहसास – डा सुभाष चंद्र गर्ग ☆ समीक्षक – श्री मनजीत सिंह ☆

पुस्तक – कतरा कतरा एहसास

प्रकाशक – किताब घर

कवि- डा सुभाष चंद्र गर्ग

कीमत -225 रूपये भारतीय

पृष्ठ -104

कतरा-कतरा एहसास एक ऐसी पुस्तक है जो पाठक को शोरगुल से भरी दुनिया से निकालकर मन के भीतर की शांत, गहरी और संवेदनशील परतों तक ले जाती है। यह पुस्तक बड़े-बड़े दावों या घटनाओं की कहानी नहीं कहती, बल्कि जीवन के उन सूक्ष्म क्षणों को सामने रखती है, जिन्हें हम रोज़ जीते तो हैं, पर अक्सर महसूस नहीं कर पाते। लेखक ने अत्यंत सरल भाषा में यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य का व्यक्तित्व और उसका जीवन छोटे-छोटे एहसासों से बनता है, जो समय के साथ गहराई पकड़ते हैं।

किताब से पंक्तियां –

तनिक सफलता जरा-सी प्रसिद्धि चढ़ा देती है। 

मनुष्य की आँखों पर चर्बी और दूसरे उसे लघु कीट सम इन्सान लगते हैं। दिखाई देता है उसे अपना प्रतिबिंब बहुत महान् बहुत ऊँचा और उसके पाँव धरती से कई फुट ऊँचे चलते हैं। और वह भूल जाता है प्रकृति का संदेश कि डाल झुकती है जब उस पर फल-फूल लदते हैं। 

विषय वस्तु का परिचय

पुस्तक का केंद्रीय विचार यह है कि जीवन किसी एक बड़े मोड़ या सफलता का नाम नहीं, बल्कि उन असंख्य छोटे भावनात्मक कतरों का परिणाम है, जो बचपन से लेकर जीवन के अंतिम पड़ाव तक हमारे साथ रहते हैं। लेखक ने भावनाओं को वर्षा की बूँदों से तुलना करते हुए बताया है कि जैसे बूँद-बूँद से नदी बनती है, वैसे ही एहसास-एहसास से जीवन का अर्थ बनता है।

पुस्तक में प्रेम, करुणा, संवेदना, रिश्ते, अकेलापन, संघर्ष, आशा, शिक्षा, समाज और आत्मचिंतन जैसे विषयों को आपस में जोड़ते हुए प्रस्तुत किया गया है। यह रचना पाठक को सोचने पर विवश करती है कि वह अपने रोज़मर्रा के व्यवहार में इन एहसासों को कितना महत्व देता है।

कथ्य और विचार-प्रवाह

पुस्तक का कथ्य प्रवाह सहज और क्रमबद्ध है। लेखक किसी उपदेशक की तरह नहीं, बल्कि एक संवेदनशील साथी की तरह पाठक से संवाद करता है। हर अध्याय एक विचार को केंद्र में रखता है और उसे जीवन के सामान्य अनुभवों से जोड़कर प्रस्तुत करता है।

बचपन के अनुभवों से शुरुआत करते हुए लेखक बताता है कि माँ की ममता, पिता का संघर्ष और परिवार का वातावरण कैसे बच्चे के मन में सुरक्षा और विश्वास का भाव भरता है। इसके बाद शिक्षा, मित्रता और सामाजिक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि एक छोटा सा प्रोत्साहन या उपेक्षा भी जीवन की दिशा बदल सकती है।

किताब से पंक्तियां –

अपनी बात मनवाना और फिर विजय भाव से होठों में ही मुस्काना

कभी हारे तो दिल को समझाना कि शहसवार ही मैदाने-जंग में गिरा करते हैं हार ही जीत का मार्ग प्रशस्त करती है, कड़ी मुसीबतों में भी इन पंक्तियों का गुनगुनाना ‘न मुझसे बेजूदा टकरा ए गर्दिश-ए-रवाँ मैंने तो हर हाल में जीने की कसम खाई है’

यह सब इतिहास बन गया है तुम भी इतिहास बन गए हो तुम्हें दूधो-दही से नहला नए कपड़े पहना अंतिम विदाई की तैयारी है सब कुछ याद आ रहा है

बहुत कुछ कहना चाहता हूँ

होंठ हिल रहे हैं उनकी मौन भाषा शायद तुम पढ़ सको यह भी न पढ़ सको

भाषा और शैली

कतरा-कतरा एहसास की सबसे बड़ी शक्ति इसकी भाषा है। भाषा सरल, प्रवाहमयी और भावनात्मक है। कहीं भी जटिल शब्दावली या बोझिल वाक्य नहीं मिलते। लेखक ने आम जीवन की भाषा का प्रयोग किया है, जिससे हर वर्ग का पाठक स्वयं को इससे जोड़ पाता है।

शैली चिंतनात्मक होने के बावजूद कहीं भी नीरस नहीं होती। उदाहरणों और रूपकों का प्रयोग प्रभावशाली है। लेखक भावनाओं को शब्दों में इस तरह पिरोता है कि पाठक उन्हें पढ़ता नहीं, बल्कि महसूस करता है। यही इस पुस्तक को विशेष बनाता है।

पात्र और अनुभव

यद्यपि यह पुस्तक किसी पारंपरिक कथा की तरह पात्रों पर आधारित नहीं है, फिर भी इसमें जीवन से लिए गए अनेक चरित्र दिखाई देते हैं—माँ-बाप, शिक्षक, मित्र, समाज का आम व्यक्ति। ये सभी पात्र वास्तविक जीवन से इतने जुड़े हुए हैं कि पाठक उनमें स्वयं को या अपने आसपास के लोगों को देख पाता है।

लेखक ने किसी एक व्यक्ति की कहानी न कहकर सामूहिक मानवीय अनुभव को सामने रखा है। इससे पुस्तक की व्यापकता बढ़ जाती है और यह किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहती।

सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण

पुस्तक का सामाजिक पक्ष अत्यंत सशक्त है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि एक संवेदनशील समाज वही होता है जहाँ लोग एक-दूसरे के दुख-सुख को समझें। छोटे-छोटे मानवीय प्रयास—जैसे किसी की मदद करना, सहानुभूति दिखाना, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना—समाज में बड़े परिवर्तन ला सकते हैं।लेखक आज के समय में बढ़ती असंवेदनशीलता, अकेलेपन और मानसिक तनाव पर भी चिंता व्यक्त करता है। वह मानता है कि इसका समाधान किसी बड़े आंदोलन में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहार में संवेदना को अपनाने में है।

दार्शनिक और आत्मचिंतनात्मक पक्ष

पुस्तक का दार्शनिक पक्ष अत्यंत संतुलित है। लेखक जीवन की जटिलताओं को सरल ढंग से समझाने का प्रयास करता है। वह पाठक को आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करता है—अपने भीतर झाँकने, अपने भावों को पहचानने और उन्हें स्वीकार करने के लिए।

क्रोध, भय, निराशा और ईर्ष्या जैसे नकारात्मक भावों को भी लेखक ने नकारा नहीं है, बल्कि उन्हें समझने और नियंत्रित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। यह दृष्टिकोण पुस्तक को व्यवहारिक बनाता है।

पुस्तक की विशेषताएँ

इस पुस्तक की प्रमुख विशेषता इसकी सार्वकालिकता है। यह किसी विशेष समय या परिस्थिति तक सीमित नहीं है। हर उम्र, हर वर्ग और हर दौर का पाठक इसमें अपने जीवन की झलक पा सकता है।

इसके अतिरिक्त, पुस्तक प्रेरणादायक होते हुए भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं लगती। लेखक यथार्थ से जुड़ा रहता है और पाठक को असंभव सपने नहीं दिखाता, बल्कि छोटे-छोटे सकारात्मक बदलावों की ओर प्रेरित करता है।

सीमाएँ

यदि आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए, तो कुछ पाठकों को इसमें घटनात्मक विविधता की कमी महसूस हो सकती है, क्योंकि यह पुस्तक कथा-प्रधान नहीं है। जो पाठक तेज़ घटनाक्रम या रोचक कथानक की अपेक्षा करते हैं, उन्हें यह पुस्तक धीमी लग सकती है। परंतु विचारात्मक और संवेदनात्मक साहित्य के प्रेमियों के लिए यही इसकी खूबसूरती है।

निष्कर्ष

कतरा-कतरा एहसास एक ऐसी पुस्तक है जो पाठक के मन पर धीरे-धीरे, लेकिन गहरा प्रभाव छोड़ती है। यह हमें सिखाती है कि जीवन की सार्थकता बड़े सपनों में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के छोटे-छोटे एहसासों में छिपी है। पुस्तक न केवल पढ़ी जाती है, बल्कि महसूस की जाती है।

यह कृति उन सभी पाठकों के लिए उपयोगी है जो जीवन को गहराई से समझना चाहते हैं, रिश्तों को बेहतर बनाना चाहते हैं और एक अधिक संवेदनशील इंसान बनना चाहते हैं। साहित्य के क्षेत्र में यह पुस्तक मानवीय मूल्यों और भावनात्मक चेतना को सशक्त रूप में प्रस्तुत करती है।

अंत में दो पंक्ति –

कतरा-कतरा एहसास बनकर जो दिल में उतरता है,

ख़ामोशी की चादर ओढ़े, बहुत कुछ कह जाता है।

*

न लफ़्ज़ों की उसे ज़रूरत, न शोर का कोई पास,

धीरे-धीरे साँसों में घुलकर, मुकम्मल हो जाता है।

*

समीक्षक : श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९६ ☆ “इत्र में भीगी हथेलियाँ…” – लेखिका… सुश्री विनीता राहुरीकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है सुश्री विनीता राहुरीकर जी द्वारा लिखित  “इत्र में भीगी हथेलियाँ’…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९६ ☆

☆ “इत्र में भीगी हथेलियाँ…” – लेखिका… सुश्री विनीता राहुरीकर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’

लेखिका – विनीता राहुरीकर

चर्चा – विवेक रंजन श्रीवास्तव

संवेदना की सुगंध और यथार्थ का अन्वेषण – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कहानी-संग्रह ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी विशिष्ट ‘तथ्य-केंद्रित’ दृष्टि और मानवीय ऊष्मा के कारण एक अनिवार्य हस्तक्षेप है। जहाँ एक ओर स्थापित कहानीकार जैसे प्रेमचंद सामाजिक यथार्थ के चितेरे थे और जैनेंद्र मनोवैज्ञानिक परतों के पारखी, वहीं विनीता जी इन दोनों धाराओं को आधुनिक जीवन की जटिलताओं के साथ जोड़ती अनुभव जन्य कहानी रचती हैं। उनकी कहानियाँ केवल कल्पना का विस्तार नहीं, बल्कि सूक्ष्म पर्यवेक्षण और जीवन के ठोस तथ्यों पर आधारित जीवंत दस्तावेज हैं।

रिश्तों में संवेदना और उत्तरदायित्व उनके कथानकों की विशेषता है।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ पुरुष के जीवन में स्त्री (माँ, पत्नी, बेटी) की अपरिहार्यता को रेखांकित करती है। प्रभास का अकेलापन और अंततः अपनी बेटी की हथेलियों में अपनी माँ की उसी ‘नमी’ और ‘सुगंध’ को पाना, कहानी को  दार्शनिक ऊंचाई देता है। यहाँ मूल्य यह उभरता है कि परिवार में कोई भी रिश्ता ‘स्वतः’ नहीं चलता, वह निरंतर संवेदना और उत्तरदायित्व की मांग करता है।

इसी मूल्य को ‘लव यू विभू’ एक अलग धरातल पर ले जाती है। एक जांबाज कमांडो की शहादत और उसकी मंगेतर का देशप्रेम के प्रति समर्पण यह दिखाता है कि प्रेम केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक-दूसरे के कर्तव्यों का साझा बोझ उठाना है।

स्त्री की आंतरिक शक्ति और रचनात्मक पहचान करती कहानियों में

विनीता जी के नारी पात्र पितृसत्तात्मक ढाँचों के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान तलाशते हैं।

‘नीम की निबौरी’ की निमकी इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। माँ की उपेक्षा और अभावों के बावजूद उसके भीतर का ‘सृजन’ और लोकगीतों के प्रति अनुराग उसे  आत्मिक शक्ति प्रदान करता है। ये शब्द यहाँ सटीक बैठते हैं कि “इस लड़की के भीतर जो सृजन है, उसका शब्दों में पूरा नक्शा संभव नहीं।”

वहीं, ‘माधुरी’ और अन्य कहानियों में वे सास-बहू के पारंपरिक रिश्तों को एक नई दृष्टि से देखती हैं। जहाँ बहू महसूस करती है कि उसकी सास को केवल एक ‘घरेलू संसाधन’ माना जाता है।  लेखिका यह मूल्य स्थापित करती हैं कि बदलती बहू के साथ-साथ एक ‘बदलती सास’ की भी जरूरत है जो अपनी जरूरतों और आत्म-सम्मान को पहचान सके।

बुजुर्ग, स्मृति और बदलता समाज

संग्रह की एक बड़ी विशेषता के रूप में मुखरित हुआ है। ‘साउथ टीटी नगर का सरकारी क्वार्टर’ और ‘चबूतरा’ जैसी कहानियाँ केवल ईंट-पत्थर के मकानों की कहानी नहीं हैं। जब ७० वर्षीय सरकारी क्वार्टर को तोड़ने का आदेश आता है, तो लेखिका मार्मिक टिप्पणी करती हैं “आज सिर्फ ईंटों की दीवारें नहीं गिरेंगी, बल्कि उन दीवारों पर टिके रिश्तों और संघर्षों की पूरी सभ्यता का अंत होगा।” कहानियों में इस तरह  परिदृश्य वर्णन, में लेखिका के अपने मंतव्य  मूल्यवान  हैं।

 भौतिक स्थान सिर्फ जगह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति-कोष भी हो सकते हैं। ग्रामीण गरिमा और अर्थ-व्यवस्था के अंतर्विरोध भी कहानियों में कहे गए हैं।

‘शहर के भीतर गाँव, गाँव के भीतर शहर’ कहानी ग्रामीण जीवन की गरिमा और आत्मनिर्भरता का प्रभावी चित्रण है। सुमित्रा जैसा पात्र, जो शहर में घरेलू कर्मचारी बनकर भी अपनी जड़ों और मिट्टी से जुड़ी रहती है, यह सिद्ध करता है कि शहर और गाँव एक-दूसरे के भीतर प्रवाहित होते हैं।

वहीं, किसान आत्महत्या की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानियों में लेखिका मीडिया की ‘कैमरा संस्कृति’ पर कड़ा प्रहार करती हैं। वे दिखाती हैं कि जहाँ दुनिया के लिए यह एक ‘न्यूज़ फ्रेम’ है, वहीं घर की औरतें बिना किसी शोर के रोजमर्रा की अर्थ-व्यवस्था और जीवन की जद्दोजहद सँभालती हैं।इन कहानियों में प्रेम, करुणा और क्षमा-बोध दृष्टव्य है।

लगभग हर कहानी का अंत  एक सकारात्मक उजाले की ओर ले जाता है। ‘कच्ची अमिया-सी लड़की और मीठे गुड़-सा प्रेम’ जैसी कहानियों में प्रेम रूमानी आदर्श के बजाय एक मेहनत-भरा और जिम्मेदार अनुभव बनकर आता है। क्षमा-बोध और अपनी सीमाओं को स्वीकार करना ही वास्तविक परिपक्वता है, जो इस संग्रह की कहानियों के माध्यम से पाठकों के मन में उतरती है।

कुल मिलाकर, ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ मूल्य-बोध का एक ऐसा संग्रह है जो यह स्थापित करता है कि संवेदनशील और साझेदार रिश्ते ही आधुनिक समाज की असली शक्ति हैं।

स्त्री का रचनात्मक व्यक्तित्व कठिन परिस्थितियों में और अधिक निखरता है।

बुजुर्गों और स्मृतियों की रक्षा, दरअसल मनुष्य की आत्मा की रक्षा है।

विनीता राहुरीकर की यह कृति अपनी भाषा की सहजता और तथ्यों की प्रामाणिकता के कारण लंबे समय तक याद रखी जाएगी। यह संग्रह सिद्ध करता है कि संवेदना की महक कभी फीकी नहीं पड़ती।

किताब पढ़ने, गुनने, योग्य भावना प्रधान कहानियों का गुलदस्ता है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “नश्तूर” (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी) – कवि – श्री अनिल खयाल अत्री ☆  श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री अनिल खयाल अत्री जी के काव्य संग्रह नश्तूर पर श्री जयपाल जी का सार्थक विमर्श ।

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “नश्तूर” (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी) – कवि – श्री अनिल खयाल अत्री ☆  श्री जयपाल ☆

श्री अनिल खयाल अत्री

☆ “जीवन संघर्षों से उपजी हैं अनिल ख्याल अत्री की कविताएं” ☆  श्री जयपाल ☆

पुस्तक का नाम – नश्तूर (कविता-संग्रह/ हिन्दी-पंजाबी)

कवि – अनिल खयाल अत्री

प्रकाशक  – जौहरा प्रकाशन पटियाला

0175-2210686

‘नश्तूर’ अनिल ख्याल अत्री का दो भाषाओं- हिंदी और पंजाबी  में 2025 में प्रकाशित कविता संग्रह है। ये अपने आप में एक अलग प्रयोग है। पहले भाग में पंजाबी की 45 कवितायें है और दूसरे भाग में हिंदी की 28 कविताएँ है । कविता संग्रह को हिंदी के विद्वान लेखक डॉ. स्वर्गीय डॉक्टर रवींद्र गासो को समर्पित किया गया है। इससे कवि की वैचारिक प्राथमिकता का पता चलता  है। अनिल ख्याल अत्री एक सूफियाना अंदाज़ के कवि हैं । वे जीवन के रंग में गहरे डूबते हैं और वहां जो हीरे मोती मिलते हैं उन्हें अपने पाठकों में बांट देते हैं। उनकी कविता मनुष्य जीवन-संदर्भों को मार्मिकता के साथ स्पर्श करती है । इन कविताओं में जीवन के दर्द अधिक है और सुख के पल बहुत कम । आज के मनुष्य का जीवन भी तो कुछ ऐसी ही सामाजिक स्थितियों से घिरा हुआ है।  जीवन की आपा-धापी और भाग दौड़ में ही सारी उम्र निकल जाती है। कुछ भी हाथ नहीं लगता। क्या खोया क्या पाया..कुछ पता नहीं..कभी ढंग से बैठ कर कभी सोचा ही नहीं।  कवि ,जीवन की इस अस्थिरता पर चिंतन करता है । शायद कवि ने जीवन में  संघर्षों से अधिक सामना किया  है और प्राप्ति बहुत कम । कवि अपनी जीवन-यात्रा को याद करते हुए अपने सहयोगियों को भी याद करते हैं । कुछ ने उनका साथ दिया और कुछ मूकदर्शक बने रहे।

हिन्दी और पंजाबी में रचित इन कविताओं का स्वर और तेवर एक जैसे हैं। इनकी रचना प्रक्रिया भी लगभग एक जैसी है। जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर लिखी गई इन कविताओं के अर्थ व्यापक और गंभीर हैं । पंजाबी की कविता ‘मासूम- सवाल’ और हिंदी की कविता  ‘नया साल’ में एक प्रश्न के माध्यम से उत्तर खोजने का प्रयास है। इसी प्रकार–कलम की कसम  में लेखक को कलम के साथ ईमानदारी बरतने का सुझाव है और सत्ता की चाटुकारिता से आगाह किया गया है। वचन- प्रवचन और अभिषेक कविता में नेता और देवता की तुलना करते हुए पत्थर के देवता से नेता के पत्थर-पन को अधिक खतरनाक बताया  है ।

“डुब्बदा तारा” पंजाबी कविता में रोशनी बांटते तारे को श्रेष्ठ बताने के पीछे समाज की भलाई में लगे व्यक्तियों को प्रेरित करना है l “की भरोसा” पंजाबी कविता में जीवन में  होने वाली घटनाओं के बारे मे बात करते हुए कवि जीवन को अनिश्चित मानता है।

कुछ हिन्दी- पंजाबी कविताओं के अंश तो जीवन के गहरे सूत्र वाक्यों की तरह याद रखने योग्य हैं जैसे—

*नजाकत और हलीमी में ही

होती है जीतने की जिद्द

 

*दर्द है तो जीवन है

 

*निष्प्राण है तुम्हारी कविता

रौशनी के नाम पर  सिर्फ

 रौशनी की एक तस्वीर

 

*एक ऐसी आवाज जो

 दबाए न दबे

 और एक ऐसी छाप

जो मिटाये न मिटे

 

*जैसे रोज़-रोज़ एक ही

दर्जे का तापमान लिए

उदय हो रहा हो सूरज

 

*जणा खणा जदौं देंदाए सानूं

धरती ते भार दा खिताब

 

*पर देण वालेआं  ने तूहानू फुॅल

अते सानू क॔डेआं दा नां दित्ता है

 

प्रूफ की त्रुटियां खलती हैं। कहीं कहीं कविता की पंक्तियों के असंगत संयोजन के कारण वाक्य प्रवाह तो टूटता ही है , गद्यात्मकता भी आ जाती है। कुछ कविताओं में उपदेशात्मकता भी है । द्विभाषी होने के कारण यह हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं के पाठकों के लिये रुचिकर और पठनीय है। जीवन को गंभीरता, निश्छलता, धैर्य के साथ जीने का सलीका देता है। कवि अनिल ख्याल अत्री को बहुत बहुत बधाई !!

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अचानक डूबता सूरज उग आया – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ समीक्षा – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’ ☆

श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’

पुस्तक चर्चा ☆ अचानक डूबता सूरज उग आया – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ समीक्षा – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’

उपन्यास का नाम- “अचानक डूबता सूरज उग आया”

लेखक – श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

समीक्षक – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’

प्रकाशक  – कोहबर प्रकाशन

मूल्य: ₹ २९९/-

☆ जटिल सामाजिक समस्याओं के प्रति सजक करता सामाजिक उपन्यास – श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’ ☆

हिन्दी साहित्य में जब कोई लेखक समाज की जटिल और पीड़ादायक सच्चाइयों को कथा का रूप देता है, तब वह केवल कहानी नहीं लिखता, बल्कि एक जिम्मेदारी निभाता है। श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ का उपन्यास “अचानक डूबता सूरज उग आया” इसी प्रकार की एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मानवीय कृति है।

यह उपन्यास नशे (ड्रग्स) एवं संचरित व्याधियों जैसे सामाजिक समस्याओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया है, पर यह केवल नशे की समस्या तक सीमित नहीं रहता। यह उन परिवारों की पीड़ा, युवाओं के भटकाव, समाज की निराशा और फिर उसी समाज के भीतर से उठती आशा की किरण को भी उजागर करता है।

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

उपन्यास का मुख्य पात्र राजीव पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ता है। पढ़ाई के लिए विदेश जाना, वहाँ के रहन-सहन से परिचित होना, विश्वास का टूटना और फिर भी हार न मानना राजीव का संघर्ष आज के अनेक युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है। उसके पिता द्वारा अपने अति निकट संबंधी जगदीश पर किया गया विश्वास और उस विश्वास का टूट जाना कथा को और अधिक मानवीय बना देता है। राजीव एक सजग, संवेदनशील और संकल्प को सिद्धि तक ले जाने वाला युवा है। भारत से विदेश गए हुये परिवारों में बदलती हुई जीवन शैली, संबंधों और विडंबनाओं को अत्यंत ही करीब से देखता है और वह भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों पर गर्व की अनुभूति करता है। लेखक ने विलायत के जीवन-परिवेश, वहाँ बसे भारतीयों और बहुसांस्कृतिक समाज का चित्रण अत्यंत ही सहज भाव से किया है।

राजीव का रूबी से आत्मिक प्रेम उपन्यास को एक भावनात्मक ऊँचाई देता है। रूबी एक प्रतिभाशाली, संवेदनशील और सशक्त युवती है, जो जीवन को समझती है और भविष्य के प्रति सजग है। यह प्रेम कथा उपन्यास में केवल रोमांस नहीं रचती, बल्कि संघर्ष और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है।

उपन्यास का दूसरा पक्ष राजीव का पुनः भारत वापस आना और भारत में अपने उन पुराने मित्रों से मिलना है जहां से उसने अपने जीवन की शुरुआत की थी। एक बड़े समृद्धिशाली व्यापारी परिवार में जन्म लेने के बावजूद मध्यय निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के साथ मैत्री एवं भावपूर्ण संबंध उसके पारिवारिक संस्कारों को दर्शाता है। सोनू एक ऐसे मध्यमवर्गीय के परिवार का बेटा है। जिसकी सुबह से शाम कमाने और खाने के बीच ही सिमट कर रह जाती है एक समय जब सोनू की दादी बीमार पड़ती है और उसके निकट सगे संबंधी तक उसका साथ देने से मना कर देते हैं उस समय एक मित्र की भूमिका में राजीव सोनू के साथ जैसी संवेदनशीलता का परिचय देता है  और आर्थिक मदद करता है यह राजीव के सहृद व्यक्तित्व को और भी अधिक परिष्कृत करता है। राजीव का मुंबई जैसे बड़े शहर में जाना और एक नए परिवेश में नवीन दायित्यों का निर्वहन उसकी परिपक्वता की एक नए कथानक की शुरुवात करता है।

रेल की पटरियों के किनारे नशा करते युवाओं का चित्रण उपन्यास के सबसे दर्दनाक दृश्यों में से एक है। वहाँ यह प्रश्न गूँजता है  “क्या इनके माँ-बाप को खबर की गई?” यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक विफलता का आईना है।

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से मुंबई पहुंचा एक दूसरा पात्र नृपेन्द्र है जो एक मध्यम परिवार का युवा है , बड़े शहर की बदरंग दुनिया में इस तरह से फंस जाता है कि वह अपनी अत्यंत प्रिय नई नवेली पत्नी आरती से भी दूर हो जाता है ।

नशे की लत  और बुरी संगत पारिवारिक रिश्तों के ऊपर भारी पड़ने लगती हैं ।

लेकिन लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से उसे भी एक ऐसे मोड़ पर ले जाकर उसकी आंखों को खोलने की कोशिश करता है जहां चारों तरफ अंधेरा ही अधेरा है। अंततः राजीव का प्रयास रंग लाता है और दीपेंद्र  को आरती के पास पुनः पहुंचने में सफल हो जाता है।

उपन्यास का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष संध्या का चरित्र है। परिस्थितियों की मार और सामाजिक शोषण जैसे घिनौने कृत्य के कारण वह जिस्म के सौदागरों के जाल में फँस जाती है। जहां से निकलना मुश्किल सा लगता है। उसके संवाद और आत्मसंघर्ष पाठक के मन को झकझोर देते हैं।

एक दृश्य में वृद्ध ग्राहक से उसका प्रश्न  “आपके पास बचाव का इंतज़ाम है न?” और अंत में उसी वृद्ध व्यक्ति के भीतर अचानक पिता-भाव जाग उठता है और उपन्यास के कथानक को नया मोड दे देता है। यह लेखक की गहरी मानवीय संवेदना का प्रमाण है।

राजीव केवल दुख देखकर रुक नहीं जाता, बल्कि वह सामाजिक परिवर्तन की पहल करता है। नशा, एचआईवी, एड्स और यौन रोगों के प्रति जागरूकता फैलाने का उसका प्रयास, और युवाओं से सीधा संवाद उपन्यास को एक सामाजिक अभियान का स्वरूप दे देता है। गैर सरकारी संगठनों के मंच, सम्मेलन और जनजागरण के दृश्य यह दिखाते हैं कि बदलाव संभव है, यदि नीयत और प्रयास ईमानदार हों।

उपन्यास का अंत अत्यंत सकारात्मक और आशावादी है। विवाह, सांस्कृतिक समन्वय, संगीत और उत्सव के दृश्य यह संकेत देते हैं कि संघर्ष चाहे जितना गहरा क्यों न हो, जीवन अंततः प्रकाश की ओर लौट सकता है। यही इस उपन्यास का सार है  कि डूबता हुआ सूरज फिर उग सकता है।

—– 

© श्री अनिल कुमार मौर्य ‘सचित्र’

कवि, लेखक एवं समीक्षक

बहराइच, उत्तर प्रदेश, भारत।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ छाँव जैसी औरतें… – कृतिकार – श्री पवन शर्मा ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ छाँव जैसी औरतें…  –  कृतिकार – श्री पवन शर्मा ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कृति–छाँव जैसी औरतें

कृतिकार–पवन शर्मा

समीक्षक–इन्दिरा किसलय

प्रकाशक–बोधि प्रकाशन जयपुर 

मूल्य–249/-

पृष्ठ संख्या-141

छाँव जैसी औरतें–संघर्ष साहस और संवेदना का दस्तावेज – सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुख्यात लघुकथाकार “पवन शर्मा” द्वारा रचित कृति “छाँव जैसी औरतें “प्रथमतः शीर्षक के माध्यम से ही स्त्री विमर्श की प्रकाम्य दिशा का परिचय देती है। जिसमें स्त्री-जीवन के अकथ कथानक व्यंजित हैं। मुश्किल उतनी ही जरूरी, समकाल के यथार्थ का नैसर्गिक चित्रण करती हुई। वृक्ष की तरह सारी उष्मा एवं मौसम के आघात झेलकर छाँव देने वाली ललनाएं। कथाकार के शब्दों में” कभी रोटियों सी गोल कभी दरवाजों सी बंद। “

अभिव्यक्ति का अंदाज़ कहीं फैंटसी तो कहीं सामाजिक सरोकारों की सूक्ष्म पड़ताल बनकर उभरा है। समूचे संग्रह का प्राणस्वर है शीर्षकवाही लघुकथा जिसे शब्द चित्र कहना होगा। स्त्री मुक्ति का मानवीय परिप्रेक्ष्य—

“तुम्हारी पीढ़ी हमें सिर्फ छांव न मानकर इंसान माने। “””

” संवाद शैली” में रची गयी कथाएं, लीक से हटकर अपना स्थान बनाती हैं। कुछ लघुकथाएं बौद्धिक व्यायाम माँगती हैं। ऐसे प्रसंग जो हमारी दृष्टि से अक्सर ओझल रहे आते हैं, संग्रह में संवेदनशील प्रश्नों की झड़ी लगा देते हैं। सांघातिक सच के रूबरू खड़ा करते हैं।

दैनंदिन जीवन के घटनाक्रम तथा परिस्थितिजन्य संवेगों का कच्चा चिट्ठा कितनी ही लघुकथाओं में द्रष्टव्य है। परंपरा और रचनात्मक तर्कों का द्वन्द्व पाठकीय चेतना को उद्वेलित करता है।

“रात की महफिल”, ” जिनसे सुकून मिलता है” जैसी रचनाएं काव्यात्मक लालित्य उपलब्ध कराती हैं। परछाइयों के पार एवं कुर्सियों के पीछे फैंटसी है, जो संकल्पित उद्देश्य को उजागर करती है।

डूब की जमीन का दुःख में विस्थापन का दर्द है। “ऐसा नहीं देखना “-के केन्द्र में ज़ेन जी का उजड्ड पन है।

शहरी जीवन का खोखलापन और संत्रास भी कथाकार की दृष्टि में है। स्त्री विमर्श को बेहद ईमानदारी से वाणी दी गयी है। मनोवैज्ञानिक पेंच, अन्तर्द्वन्द्व और संलग्न सामाजिक पार्श्व की खोज। “सिर्फ औरतें नहीं हैं वे” में बदलाव की दस्तक दर्ज है।

“तलाश” अपने ढंग की अनूठी रचना है। पछतावे की कीलें ध्यान खींचती है।

” आँगन की चौखट में”नारी जीवन की यांत्रिकता है तो बीजी की भूल में एक सूत्र हस्तगत होता है “रिश्ते नाम से नहीं स्पर्श से चलते हैं। “मंच के पीछे में सियासत का घिनौना चेहरा है। “हँसते चेहरे” चार्ली चैप्लिन की याद दिलाती है।

अकेलेपन की टीस पर भी केन्द्रित हैं कुछ कथाएं।

सारी लघुकथाएं अंत में मन का कोई दर्दीला कोना खोलती हैं जो सामाजिक तानेबाने का अंदरूनी सच बयां करता है। रूहानी रिश्तों की खूबसूरती रूह की रोशनी में द्रष्टव्य है तो अपने हिस्से का सच पितृसत्तात्मक समाज का आईना है। शंख की आवाज़ और धुंध में बची औरत, भावुकता का सौंदर्य अनावृत्त करती हैं।

संग्रह की कथाओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि वे निर्णायक मोड़ पर लाकर, पाठक को छोड़ देती हैं, उनका चैतन्य जाग्रत करती हैं।

भाषायी लालित्य एवं प्रवाह पाठकीय संवेदना से आत्मीयतापूर्ण रिश्ता बनाता है। शाब्दिक संयम, मितव्ययिता, एवं अभिजात्य ने भावों को सलीका प्रदान किया है। बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित यह कृति निश्चय ही लघुकथेतिहास में अपने पदांक स्थिर कर क्रान्तिकामी वैचारिकी का सैलाब लाएगी।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ टंट्या भील -भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र” ☆ समीक्षा – डा. विजय चौरसिया ☆

डा. विजय चौरसिया

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ टंट्या भील -भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र” ☆ समीक्षा – डा. विजय चौरसिया

पुस्तक –  टंट्या भील -भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड 

लेखक – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

प्रकाशक – ज्ञानमुद्रा, भोपाल

☆ भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा ☆ डा. विजय चौरसिया

भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा पुस्तक एक एतिहासिक कथा साहित्य है। यह उपन्यासिक कृति 19वीं सदी के महान आदिवासी जननायक के संघर्ष, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनके विद्रोह और गरीबों के प्रति उनकी दरियादिली को रेखांकित करती है। यह भारत के आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा, देश भक्त स्वतंत्रता सेनानी की खोई पहचान को सामने लाती है। विवेक रंजन श्रीवास्तव ने राबिनहुड टंट्या मामा को एक योद्धा, आध्यात्मिक मार्गदर्शक और दूरदर्शी नेता के रुप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में दमनकारी जमींदारी प्रथा और अंग्रेजी शासन के खिलाफ आदिवासी समुदाय के एकजुट संघर्ष को दर्शाया गया है। वह राबिनहुड की तरह जंगलों में रहता है। उसके साथी भो वैसे ही गरीब, वंचित जुल्म के शिकार पर अदम्य साहसी लोग हैं। वह अमीरों और अंग्रेज अधिकारियों पर धावा बोलता है और उनकी दौलत लूटकर आदिवासी बस्तियों में बांट देता है।

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र”

टंट्या मामा को लोक मानस में एक ईश्वर तुल्य जननायक, मसीहा और आदिवासी नायक के रुप में  जो पहचान मिली थी उसे उसी स्वरूप में सफलता पूर्वक प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी है बल्कि यह अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाले प्रतीक को सजीव करती है। टंट्या ने जल-जंगल-जमीन की लडाई के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था, किन्तु उन पर अब तक कोई भी कथा साहित्य नहीं था, परिचयात्मक जीवनीयों को पढ़कर उसे कथा रूप में लेखक ने रोचक प्रवाहमान प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया है।

पुस्तक की भाषा सरल है, जिससे यह बच्चों और किशोरों के लिए भी पढ़ने योग्य है। पुस्तक आज के समय भी आदिवासी अधिकारों और अस्मिता के संघर्ष को उजागर करती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए आवश्यक है, जो भारतीय स्वतंत्रता सग्राम के अनसुने नायकों और आदिवासी संघर्षों के बारे में जानना चाहते हैं।

भारत के बहुसंख्यक बहुजनों के न केवल इतिहास बल्कि उनके बेहतर भविष्य की चाहत रखने वाले हर व्यक्ति को यह किताब जरुर पढ़ना चाहिए, पुस्तक भारतीय इतिहास को देखने के लिए नई दृष्टि प्रदान करती है।

भारत का आदिवासी राबिनहुड टंट्या मामा के लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव ने कठिन परिश्रम कर टटया मामा का इतिहास खोजकर उसका पुस्तक रुप दिया है, मैं उन्हें इस कार्य की बधाई देता हूं।

—– 

© डा. विजय चौरसिया

लोकसंस्कृतिकार

चौरसिया सदन, गाडासरई जिला – डिन्डौरी (मध्यप्रदेश)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/ सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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