☆ गद्य क्षणिका ☆ ~ एक मुठ्ठी चावल ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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लाल लाल आँखों से तेरेरती समदेईया ने आखिरकार शांति पर अपना सारा गुस्सा उडेल दियाl शांति के हाथ भय के मारे काँप उठेl परिणाम यह हुआ कि खौलते हुए चावल का सारा मांड़ शांति के पैर पर ही पलट गयाl वह दर्द से चीख पड़ीl शांति की ग़लती बस इतनी ही हुई, कि उसने बिना सासु माँ से पूछे, एक मुठ्ठी चावल, भूखे भिखारी को दे दिया थाl
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘दुख में सुख‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६५ ☆
☆ लघुकथा – दुख में सुख ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
गर्मी की छुट्टियों में मायके गयी तो देखा कि माँ थोड़ी ही देर पहले कही बात भूल रही है। अलमारी की चाभी और रुपए पैसे रखकर भूलना तो आम बात हो गयी। कई बार वह खुद ही झुंझलाकर कह उठती— ‘पता नहीं क्या हो गया है ? कुछ याद ही नहीं रहता- कहाँ- क्या रख दिया ?’ झुकी पीठ के साथ वह दिन भर काम में लगी रहती। सुबह की एक चाय ही बस आराम से पीना चाहती। उसके बाद घर के कामों का जो सिलसिला शुरू होता वह रात ग्यारह बजे तक चलता रहता। रात में सोती तो बिस्तर पर लेटते ही झुकी पीठ में टीस उठती।
माँ की पीठ अब पहले से भी अधिक झुक गयी थी पर बेटियों के मायके आने पर वह सब कुछ भूलकर और तेजी से काम में जुट जाती। उसे चिंता रहती कि मायके से अच्छी यादें लेकर ही जाएं बेटियां। माहौल खुशनुमा बनाने के लिए वह हँसती-गुनगुनाती, नाती-नातिन के साथ खेलती, खिलखिलाती…?
गर्मी की रात, थकी-हारी माँ नाती – पोतों से घिरी छत पर लेटी है। इलाहाबाद की गर्मी, हवा का नाम नहीं। वह बच्चों से जोर-जोर से बुलवा रही है- ‘चिडिया, कौआ, तोता सब उड़ो, उड़ो, उड़ो, हवा चलो, चलो, चलो,’ बच्चे चिल्ला- चिल्लाकर बोलने लगे, उनके लिए यह अच्छा खेल था।
माँ उनींदे स्वर में बोली – ‘बेटी, जब से थोड़ा भूलने लगी हूँ, मन बड़ा शांत है। किसी की तीखी बात थोड़ी देर असर करती है फिर किसने क्या ताना मारा… कुछ याद नहीं। हम औरतों के लिए बहुत जरूरी है यह।’ ठंडी हवा चलने लगी थी। माँ कब सो गयी पता ही नहीं चला। चाँदनी उसके चेहरे पर पसर गयी।
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ एक फोन की रोशनी ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“मम्मी, आज दिवाली पर चाचा लोग नहीं आएँगे?” आठ साल के अंश ने पूछा।
माँ ने दीये सजाते हुए कहा, “नहीं बेटा, इस बार नहीं।”
“क्यों?”
“बस… कुछ बात हो गई थी पापा और चाचा के बीच।”
शाम होते ही पूरा घर रोशनी से जगमगा उठा। मिठाइयाँ सजी थीं, नए कपड़े पहने जा चुके थे और पूजा की तैयारी हो रही थी। फिर भी घर कुछ अधूरा-सा लग रहा था।
अंश ने पूछा, “पिछली दिवाली चाचा यहीं बैठे थे न? और चिंटू के साथ मैं बाहर पटाखे चला रहा था… इस बार वह भी नहीं आएगा?”
पापा ने उसकी ओर देखा, फिर चुपचाप पूजा की थाली ठीक करने लगे।
अंश कुछ सोचकर बोला, “पापा, झगड़ा दिवाली से भी बड़ा होता है क्या?”
पापा के हाथ वहीं रुक गए।
कुछ देर बाद वे बालकनी में गए और फोन मिलाया।
“हैलो…” उधर से आवाज़ आई।
पापा कुछ पल चुप रहे, फिर धीरे से बोले, “पूजा अभी शुरू नहीं हुई है… आ जाओ।”
उधर भी कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर आवाज़ आई –
“भैया… बस दस मिनट में पहुँचता हूँ।”
अंश मुस्कुराते हुए दरवाज़े की ओर दौड़ गया।
उस रात घर के सारे दीये जल चुके थे… बस एक दीया फोन की घंटी के साथ जला था।
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “समझ से परे… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७९ ☆
लघुकथा ☆ समझ से परे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
“पापा पापा गणपति बप्पा आने वाले हैं। मैं गणपति बप्पा के आने पर फटाके छुड़ाऊंगा”, चिंटू बोला। पापा ने कहा, “बप्पा घर आएंगे तो तुम फटाके छुडाओगे, पर क्यों?” “बप्पा के आने की खुशी में! जब बड़े लोग बप्पा को लेकर जुलूस निकालते हैं तो खूब जोर जोर से डीजे बजाते हैं तो बप्पा को खुश करने के लिए ही न।”
“तुम्हें कैसे मालूम कि ऊंची आवाज और शोर से बप्पा खुश होते हैं”, पापा ने पूछा।
“खुश होते होंगे तभी तो लोग ऊंची ऊंची आवाज करते हैं और गाते हैं। जैसे शादी ब्याह में बैंड बाजे और डीजे पर ऊंची आवाज में गाने गाकर खुशी मनाते हैं वैसे ही।” चिंटू मासूमियत से बोला।
“पर इससे यह पता कहां चलता है कि शोर शराबे से गणपति बप्पा खुश होते होंगे। बप्पा के कान तो बड़े होते हैं और उन्हें छोटी सी आवाज भी सुनाई दे जाती होगी तो ज्यादा आवाज से उन्हें तकलीफ़ ही होती होगी। आदमी भी सोचता है कि शोर शराबे से उसे खुशी मिलती है। पर ऐसा है नहीं।” ऊंची आवाज किसी के कानों को अच्छी नहीं लगती।” इतना बोल कर पापा ने चिंटू की ओर देखा।
चिंटू कुछ सोच रहा था। थोड़ी देर बाद बोला, “पापा आप ठीक कहते हैं। ज्यादा शोर मेरे कानों को अच्छा नहीं लगता तो बप्पा को तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। बप्पा के सामने गाने नाचने से वे खुश हो सकते हैं पर ऊंची आवाज से नहीं।”
“नहीं पापा, मैं फटाके नहीं छुड़ाऊंगा और न ही जोर से संगीत बजाऊंगा। जो मेरे कानों को अच्छा लगेगा वही बप्पा के कानों को अच्छा लगेगा। “
“थैंक्यू पापा।”
और पापा के ओठों पर एक मुस्कान आई। उन्होंने गणपति बप्पा की ओर देखा तो उन्हें लगा कि वे भी हल्के से मुस्कुरा रहे हैं। उन्होंने मन ही मन कहा कि बप्पा सब कुछ समझ से परे है।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – हिंदी दिवस।)
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत। शिक्षा – स्नातकोत्तर (समाज शास्त्र ए हिंदी साहित्य), सम्मान – अनेक साहित्यिक सम्मान से अलंकृत। प्रकाशन – साझा संकलन एवं पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,आकाशवाणी में काव्यपाठ। सम्प्रति – गृहणी, श्रोता एवं रचनाकार। अभिरुचि– साहित्य, संगीत, प्रकृति, देशाटन। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आस्था।)
☆ लघुकथा ☆ आस्था श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’☆
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मोहल्ले के बच्चों ने चंदा जोड़कर पंडाल में गणेश जी को स्थापित किया। दिन भर पूजा-आरती और भजन गूँजते।
लेकिन रात के बारह बजते ही बच्चों की असली महफिल सजती। ताश खेलने के लिए जगह कम पड़ी, तो सबने हाथ जोड़कर बप्पा से क्षमा मांगी और उनकी मूर्ति को धीरे से कोने में सरका दिया।
सुबह होते ही बच्चों ने फुर्ती दिखाई, बप्पा को वापस यथास्थान सजाया और अगरबत्ती सुलगा दी।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – सृजन…
जल शांत था। उसके बहाव में आनंदित ठहराव था। स्वच्छ, निरभ्र जल और दृश्यमान तल। यह निरभ्रता उसकी पूँजी थी, यह पारदर्शिता उसकी उपलब्धि थी।
एकाएक कुछ कंकड़ पानी में आ गिरे। अपेक्षाकृत बड़े आकार के कुछ पत्थरों ने भी उनका साथ दिया। हलचल मची। असीम पीड़ा हुई। लहरें उठीं। लहरों से मंथन हुआ। मंथन से सृजन हुआ।
कहते हैं, उसकी रचनाओं में लहरों पर खेलता प्रवाह है। पाठक उसकी रचनाओं के प्रशंसक हैं और वह कंकड़-पत्थर फेंकनेवाले हाथों के प्रति नतमस्तक है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गोविंद साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
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≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ लघुकथा ☆ ~ सपनों का राजकुमार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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सपनों में आया राजकुमार बहुत ही सुन्दर लग रहा थाl उसके आंगन में प्रवेश करते ही ऐसा लगा,मानों हजारों बल्बों की रोशनी जल गई होl बूढ़े बाप को अपनी सुकुमारी सी बेटी के लिए, इससे सुंदर वर क्या हो सकता था, लेकिन आंगन की चमचमाती रोशनी अचानक अंधेर कूप में इसलिए बदल गई क्यों कि बरामदे में खड़ी, मोटरसाइकिल को वह राजकुमार इस बार ही अपने साथ ले जाना चाहता था, जबकि बुजुर्ग ने बेटे को स्कूल जाने के लिये इस मोटरसाइकिल को महंगे ब्याज पर कर्ज लेकर खरीदा था l
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा सन्नाटा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(शिक्षक दिवस पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मुक्ता का भव्य सम्मान! ‘संभवम्’ संस्था ने किया सम्मान समारोह – हार्दिक बधाई अभिनंदन 💐🙏)
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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३७ ☆
☆ लघुकथा – सन्नाटा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
अब हमें यहां से चले जाना चाहिए। अपना घर अपना ही होता है। किस चीज़ की कमी है हमें? कम से कम हम उनके जीवन में बाधक तो नहीं बनेंगे? कहीं कल विषम परिस्थितियां उत्पन्न होने के कारण एक-दूसरे से संवाद की स्थिति भी न बनी रहे और ताल्लुक़ बोझ बन जाएं; उस स्थान को छोड़ना ही बेहतर व श्रेयस्कर होता है।
– परंतु हम अकेले कैसे गुज़र-बसर करेंगे?
– जिनका कोई नहीं होता, वे भी जीवन जीते हैं।
– ऐसा मत कहो– बच्चे हैं, संभल जाएंगे। आज गुस्से में ग़ुबार निकाल लिया, अब शांत हो जाएंगे। तूफ़ान आने के पश्चात् व्याप जाती है…शांंति, अंतहीन मौन व सन्नाटा। चलो! भुला देते हैं यह सब… बचपन में ही तो बच्चे ग़लतियां करते थे और हम उनकी भूलों को सहज भाव से स्वीकारते थे। फिर आज ऐसा कठोर निर्णय क्यों?
इतना सुनते ही वे अलौकिक-असीम शांति में प्रवेश कर गए और घर में मातम-सा पसर गया।
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा – “संस्कार प्रबल हैं…“।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆
लघुकथा ☆ संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
राम नरेश जी एक लेखक हैं। उम्र के लिहाज से यात्रा ज्यादा तो नहीं करते पर करनी तो पड़ती है । वे अपने बेटे के पास पुणे आए। उनका बेटा आईटी सेक्टर में काम करता है। पुणे बड़ा महानगर है। उसका क्षेत्रफल संभवतः अस्सी किलोमीटर है। देखने के लिए कई स्थान हैं और आसपास भी कई तीर्थ स्थल और पर्वतीय स्थल हैं।
राम नरेश जी के एक प्रकाशक मित्र भी पुणे आए हुए थे। उन्हें पता चल गया था कि राम नरेश जी भी पुणे पहुंच रहे हैं तो उनके काव्य संग्रह की पचास प्रतियाँ लेते आए थे और राम नरेश जी को सूचना भी दे दी। दोनों शहर के उत्तरी दक्षिणी ध्रुव पर ठहरे थे और आसानी से एक दूसरे के पास आ जा नहीं सकते थे। किसी बीच के स्थान पर मिलने पर मंथन हुआ। प्रकाशक महोदय की एसएनडीटी विश्व विद्यालय में मीटिंग थी और राम नरेश जी भी वहां आ सकते थे। इसलिए तय हुआ कि एसएनडीटी कॉलेज के गेट पर मिल लेंगे। वहाँ तक आने जाने के लिए बस मैट्रो की सुविधा भी है। टैक्सी ऑटो रिक्शा तो मिल ही जाते हैं।
दोनों के बीच तय हुआ कि बारह बजे के आसपास मिलेंगे। राम नरेश जी जब चलने को हुए तो उनकी पत्नी ने कहा कि मैं भी साथ चलती हूँ, यहां अकेले क्या करूंगी। बहू बेटे अपने अपने काम पर गए और बच्चे स्कूल में तो वे घर में अकेली ही हैं। वे टैक्सी से कॉलेज के गेट पर पहुंच गए और दस मिनट के अंदर प्रकाशक महोदय भी पहुंच गए और उन्होंने पुस्तकें दे दीं।
महानगरों में ऐसे काम के लिए एक दूसरे के आवास पर जाना मुश्किल होता है क्योंकि समय, दूरी व सुविधा सब देखनी पड़ती है। प्रकाशक महोदय ने कहा कि यहाँ मैट्रो रेल का स्टेशन है और यहाँ से बहुत जल्दी स्वारगेट पहुंच जाएंगे और मैट्रो का आनंद भी उठा लेंगे। वहाँ से तो वाघोली के लिए काफी सुविधाएँ हैं। राम नरेश जी फिजूलखर्ची पसंद नहीं करते थे। कम पैसे खर्च होने के कारण उन्होंने मैट्रो से जाने का निर्णय ले लिया।
राम नरेश जी अपनी पत्नी के साथ मैट्रो रेल के स्टेशन पर लिफ्ट से चले गए । थैली में पचास पुस्तकें थीं। उनका वजन देख कर राम नरेश जी को अपनी आयु का आभास हुआ। थैली उठा कर चलने में दिक्कत तो हो रही थी। खैर टिकट लेकर प्लैटफॉर्म पर आए। गाड़ी आने में पांच मिनट थे। वे दोनों प्लैटफॉर्म पर पहुंचे तो एक बैंच पर दो लड़कियाँ बैठी थीं। एक लड़की उठ खड़ी हुई और राम नरेश जी की धर्पमत्नी से बोली, “बैठिए आंटी जी”। थोड़ा ना नुकुर के बाद वे बैठ गईं। फिर उस लड़की ने राम नरेश जी से भी बैठने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें बैठने में कष्ट होता है इसलिए खड़े रहना ही अच्छा है और उस लड़की को धन्यवाद दिया। जब मैट्रो आ गई तो उस लड़की ने राम नरेश जी के हाथ से पुस्तकों का थैला ले लिया और उन्हें मैट्रो में चढ़ने दिया। ट्रेन में प्रवेश के बाद भी वह लड़की पुस्तकों के थैले को अपने पास ही रखे रही। राम नरेश जी ने मांगा तो बोली कि गाड़ी में झटके लगते हैं और संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है, आप गिर सकते हैं और मुझे तो मैट्रो रेल में चलने का अभ्यास है। फिर उसने पूछा कि पुस्तकें कैसी हैं तो राम नरेश जी ने बताया कि उन्हींकी लिखी हुई पुस्तकें हैं पर वे बंधी हुई है इसलिए तुम्हें दे नहीं सकता। वे लेखक हैं यह जानकर वह बहुत खुश हुई। फिर उसने अपना नाम बताया वंशिका,, और बताया कि वह पुणे में ही रहती है। उसके पिता होटल चलाते हैं। एसएनडीटी में बारहवीं में पढती है, रोज स्वारगेट से मैट्रो से ही आती है। राम नरेश जी जीवन में पहली बार मिली उस अपरिचित बच्ची की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। बात करते करते गंतव्य आ गया और उसने पुस्तकों का थैला राम नरेश जी को दे दिया और खुद उतर गई। उसकी मीठी वाणी, अनुशासन और शिष्टाचार देखकर राम नरेश जी को अपनी पोती की याद आ गई। वह भी उन्हें वजन नहीं उठाने देती। राम नरेश मन ही मन बुदबुदाए, समाज में अभी संस्कार प्रबल हैं।