हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३७ ☆ लघुकथा – सन्नाटा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा सन्नाटा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(शिक्षक दिवस पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मुक्ता का भव्य सम्मान! ‘संभवम्’ संस्था ने किया सम्मान समारोह – हार्दिक बधाई अभिनंदन 💐🙏)

 

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३७ ☆

☆ लघुकथा – सन्नाटा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

अब हमें यहां से चले जाना चाहिए। अपना घर अपना ही होता है। किस चीज़ की कमी है हमें? कम से कम हम उनके जीवन में बाधक तो नहीं बनेंगे? कहीं कल विषम परिस्थितियां उत्पन्न होने के कारण एक-दूसरे से संवाद की स्थिति भी न बनी रहे और ताल्लुक़ बोझ बन जाएं; उस स्थान को छोड़ना ही बेहतर व श्रेयस्कर होता है।

– परंतु हम अकेले कैसे गुज़र-बसर करेंगे?

– जिनका कोई नहीं होता, वे भी जीवन जीते हैं।

– ऐसा मत कहो– बच्चे हैं, संभल जाएंगे। आज गुस्से में ग़ुबार निकाल लिया, अब शांत हो जाएंगे। तूफ़ान आने के पश्चात् व्याप जाती है…शांंति, अंतहीन मौन व सन्नाटा। चलो! भुला देते हैं यह सब… बचपन में ही तो बच्चे ग़लतियां करते थे और हम उनकी भूलों को सहज भाव से स्वीकारते थे। फिर आज ऐसा कठोर निर्णय क्यों?

इतना सुनते ही वे अलौकिक-असीम शांति में प्रवेश कर गए और घर में मातम-सा पसर गया।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆ लघुकथा – संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा – “संस्कार प्रबल हैं…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆

✍ लघुकथा ☆ संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम नरेश जी एक लेखक हैं। उम्र के लिहाज से यात्रा ज्यादा तो नहीं करते पर करनी तो पड़ती है । वे अपने बेटे के पास  पुणे आए। उनका बेटा आईटी सेक्टर में काम करता है।  पुणे बड़ा महानगर है। उसका क्षेत्रफल संभवतः अस्सी किलोमीटर है। देखने के लिए कई स्थान हैं और आसपास भी कई तीर्थ स्थल और पर्वतीय स्थल हैं।

राम नरेश जी के एक प्रकाशक मित्र भी पुणे आए हुए थे। उन्हें पता चल गया था कि राम नरेश जी भी पुणे पहुंच रहे हैं तो उनके काव्य संग्रह की पचास प्रतियाँ लेते आए थे और राम नरेश जी को सूचना भी दे दी।  दोनों शहर के उत्तरी दक्षिणी ध्रुव पर ठहरे थे और आसानी से एक दूसरे के पास आ जा नहीं सकते थे।  किसी बीच के स्थान पर मिलने पर मंथन हुआ। प्रकाशक महोदय की एसएनडीटी विश्व विद्यालय में मीटिंग थी और राम नरेश जी भी वहां आ सकते थे। इसलिए तय हुआ कि एसएनडीटी कॉलेज के गेट पर मिल लेंगे। वहाँ तक आने जाने के लिए बस मैट्रो की सुविधा भी है। टैक्सी ऑटो रिक्शा तो मिल ही जाते हैं।

दोनों के बीच तय हुआ कि बारह बजे के आसपास मिलेंगे। राम नरेश जी जब चलने को हुए तो उनकी पत्नी ने कहा कि मैं भी साथ चलती हूँ, यहां अकेले क्या करूंगी। बहू बेटे अपने अपने काम पर गए और बच्चे स्कूल में तो वे घर में अकेली ही हैं। वे टैक्सी से कॉलेज के गेट पर पहुंच गए और दस मिनट के अंदर प्रकाशक महोदय भी पहुंच गए और उन्होंने पुस्तकें दे दीं।    

महानगरों में ऐसे काम के लिए एक दूसरे के आवास पर जाना मुश्किल होता है क्योंकि समय, दूरी व  सुविधा सब देखनी पड़ती है। प्रकाशक महोदय ने कहा कि यहाँ मैट्रो रेल का स्टेशन है और यहाँ से बहुत जल्दी स्वारगेट पहुंच जाएंगे और मैट्रो का आनंद भी उठा लेंगे। वहाँ से तो वाघोली के लिए काफी सुविधाएँ हैं। राम नरेश जी फिजूलखर्ची पसंद नहीं करते थे। कम पैसे खर्च होने के कारण उन्होंने मैट्रो से जाने का निर्णय ले लिया।

राम नरेश जी अपनी पत्नी के साथ मैट्रो रेल के स्टेशन पर लिफ्ट से चले गए । थैली में पचास पुस्तकें थीं। उनका वजन देख कर राम नरेश जी को अपनी आयु का आभास हुआ। थैली उठा कर चलने में दिक्कत तो हो रही थी। खैर टिकट लेकर प्लैटफॉर्म पर आए। गाड़ी आने में पांच मिनट थे। वे दोनों प्लैटफॉर्म पर पहुंचे तो एक बैंच पर दो लड़कियाँ बैठी थीं। एक लड़की उठ खड़ी हुई और राम नरेश जी की धर्पमत्नी से बोली, “बैठिए आंटी जी”। थोड़ा ना नुकुर के बाद वे बैठ गईं। फिर उस लड़की ने राम नरेश जी से भी बैठने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें बैठने में कष्ट होता है इसलिए खड़े रहना ही अच्छा है और उस लड़की को धन्यवाद दिया। जब मैट्रो आ गई तो उस लड़की ने राम नरेश जी के हाथ से पुस्तकों का थैला ले लिया और उन्हें मैट्रो में चढ़ने दिया। ट्रेन में प्रवेश के बाद भी वह लड़की पुस्तकों के थैले को अपने पास ही रखे रही। राम नरेश जी ने मांगा तो बोली कि गाड़ी में झटके लगते हैं और संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है, आप गिर सकते हैं और मुझे तो मैट्रो रेल में चलने का अभ्यास है। फिर उसने पूछा कि पुस्तकें कैसी हैं तो राम नरेश जी ने बताया कि उन्हींकी लिखी हुई पुस्तकें हैं पर वे बंधी हुई है इसलिए तुम्हें दे नहीं सकता। वे लेखक हैं यह जानकर वह बहुत खुश हुई। फिर उसने अपना नाम बताया वंशिका,, और बताया कि वह पुणे में ही रहती है। उसके पिता होटल चलाते हैं। एसएनडीटी में बारहवीं में पढती है, रोज स्वारगेट से मैट्रो से ही आती है। राम नरेश जी जीवन में पहली बार मिली उस अपरिचित बच्ची की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। बात करते करते गंतव्य आ गया और उसने पुस्तकों का थैला राम नरेश जी को दे दिया और खुद उतर गई। उसकी मीठी वाणी, अनुशासन और शि‍ष्टाचार देखकर राम नरेश जी को अपनी पोती की याद आ गई। वह भी उन्हें वजन नहीं उठाने देती। राम नरेश मन ही मन बुदबुदाए, समाज में अभी संस्कार प्रबल हैं।

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© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६४ ☆ लघुकथा – गणेश चौथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘गणेश चौथ‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६४ ☆

☆ लघुकथा – गणेश चौथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

‘आज गणेश चौथ है आप भी व्रत होंगी?’ सासूजी खुद तो व्रत रखती ही थीं आस-पड़ोसवालों से भी पूछती रहतीं –‘ नहीं’ या ‘हाँ’ के उत्तर में सामने से एक प्रश्न दग जाता – ‘और आपकी बहू?’ ‘उसके लड़का नहीं है ना? हमारे यहाँ लड़के की माँ ही गणेशचौथ का व्रत रखती है। ‘

ना चाहते हुए भी मेरे कानों में आवाज पड़ ही जाती थी। तभी मैंने सुना आस्था दादी से उलझ रही है – ‘दादी। लड़के के लिए व्रत रखती हैं आप! लड़की के लिए कौन-सा व्रत होता है?’

‘ऐं — लड़कियों के लिए कोई व्रत रखता है क्या?’- दादी बोलीं

‘पर क्यों नहीं रखता’ – रुआँसी होती आस्था ने पूछा।

‘अरे, हमें का पता। जाकर अपनी मम्मी से पूछो, बहुत पढ़ी-लिखी हैं वही बताएंगी। ’

आस्था रोनी सूरत बनाकर मेरे सामने खड़ी थी। आस्था के गाल पर स्नेह भरी हल्की चपत मैं लगाकर बोली – ‘ये पूजा- पाठ संतान के लिए होती है। ’

‘संतान मतलब?’

‘हमारे बच्चे और क्या। ‘

आस्था के चेहरे पर भाव आँख – मिचौली खेल रहे थे। सासूजी पूजा करने बैठीं, तिल के लड्डूओं का भोग बना था। उन्होंने अपने बेटे रजत को टीका करने के लिए आरती का थाल उठाया ही था कि रजत ने अपनी बेटियों को आगे कर दिया – ‘पहले इन्हें माँ’। तिल की सौंधी महक घर भर में पसर गयी थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२७ – लौट आना, मेरे पंखों के साथी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – लौट आना, मेरे पंखों के साथी।)

☆ लघुकथा # १२७ – लौट आना, मेरे पंखों के साथी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

साँझ नदी के जल पर धीरे-धीरे उतर रही थी। आकाश की आखिरी सुनहरी किरणें लहरों पर काँप रही थीं। पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे, मगर नीर अब भी उसी किनारे पर अकेला बैठा था।

कभी इसी जगह पिहू उसके पास आकर कहती थी— “शाम चाहे कितनी भी लंबी हो, तुम मेरा इंतज़ार करना।”

नीर ने उस वाक्य को जीवन बना लिया था।

अचानक पीछे से धीमी-सी आवाज़ आई—“नीर…”

उसका हृदय जैसे एक पल को रुक गया।

वह पलटा।

सामने पिहू थी—कमज़ोर, थकी हुई और एक घायल पंख को समेटे हुए।

नीर कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसकी आँखें छलक उठीं।

“पिहू… तुम?”

पिहू ने काँपते स्वर में कहा—

“लौटना तो हर दिन चाहती थी… मगर पंखों ने साथ नहीं दिया।”

नीर उसके पास गया और अपना पंख उसके घायल पंख पर रख दिया।

“मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया।”

पिहू की आँखों से आँसू बह निकले—

“मुझे विश्वास था।”

नीर ने पूछा—

“कैसे?”

पिहू ने नदी की ओर देखते हुए कहा—

“क्योंकि हर शाम डूबते सूरज में मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा दिखाई देती थी।”

कुछ पल दोनों मौन रहे।

फिर पिहू ने धीरे से पूछा—

“नीर, अगर मैं अब कभी उड़ न सकी तो?”

नीर ने उसके पंख को सहलाते हुए कहा—

“तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”

“और अगर मैं चल भी न सकी?”

“तो यहीं बैठकर तुम्हारे साथ साँझ देखूँगा।”

पिहू ने अपना सिर उसके पंख पर रख दिया।

उस क्षण नीर को लगा—वर्षों से जिस लौटने की प्रतीक्षा थी, वह केवल पिहू का लौटना नहीं था; वह उसके विश्वास का लौटना था।

सूरज डूब चुका था।

नदी अँधेरी हो रही थी, मगर दोनों के बीच वर्षों बाद एक उजाला जन्म ले चुका था।

कुछ प्रेम कहे नहीं जाते, बस प्रतीक्षा में जीवित रहते हैं।

और जब कोई लौट आता है, तो पता चलता है—सच्चा अपनापन दूरी से नहीं, विश्वास से बँधा होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७५ – अनाथ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अनाथ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७५ ☆

☔ लघुकथा  ☔ अनाथ ☔

पारंपरिक रूप से त्योहार मनाना, उसे उत्साह उमंग उल्लास के साथ मिलबाँट कर सहेजना प्रेम, प्यार, सौहार्द की भावना को बढ़ते देखना सभी को अच्छा लगता है।

आज मानसी के ह्दय में उथल- पुथल मची थी कि रक्षाबंधन तो आया पर क्या? राखी का प्यार विश्वास भैया निभा पाया या वह स्वयं निभा सकी।

आसपास की बातें सुनने और घर में सिर्फ औपचारिकता से राखी बंधवाने का मतलब, अब उसे लगने लगा कि रक्षाबंधन अब एक मानसिक बंधन होने लगा है। भौहें-चढ़ाना, आँखे ततेरना, हर बात पर छींटाकशी और सिर्फ मै मेरा!! तू तेरा।

वह उठी पूजा की थाल लिए घर के मंदिर में दीपक जला, भारी मन से प्रार्थना करने लगी – – – प्रभु मुझे अगले जनम अनाथ बना देना। कम से कम सामाजिक दानदाताओं और चेरिटी वाले कृतज्ञता कातर दृष्टि से ही सही एक दिन का तो परिवार मिल जाता है।

पीछे से भाई की आवाज आई रहने दो—मै अभी जा रहा हूँ!! बाद में आऊंगा तो देखते है।

मानसी राखी की डोरी लिए माँ की तरफ देखने लगी। बंधन ही तो है – – – – तू कान्हा जी को बाँध ले! बिटिया माँ ने रुंधे गले से आवाज लगाई।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

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“माँ, मेरा इंटरव्यू कैंसल हो गया!” निखिल ने फोन पर लगभग चीखते हुए कहा।

“अच्छा… क्यों?”

“कंपनी ने आखिरी समय पर मेल भेज दिया। तीन महीने से तैयारी कर रहा था। आज सुबह से मन ही मन पूरा इंटरव्यू दे चुका था। अब कह रहे हैं—‘नई तारीख बाद में बताएँगे।’”

माँ ने धीरे से पूछा, “तो क्या हुआ?”

“क्या हुआ?” निखिल हँसा, “आपको पता भी है यह नौकरी मेरे लिए कितनी जरूरी थी?”

“हाँ बेटा, पता है।”

“नहीं माँ, आपको नहीं पता। घर का किराया, लोन की किस्त… सब कुछ इसी नौकरी पर टिका था। मुझे लगा था आज सब बदल जाएगा।”

माँ कुछ क्षण चुप रहीं।

फिर बोलीं, “तुमने अपना काम तो पूरा किया था न?”

“हाँ।”

“फिर?”

“फिर क्या? अब इंतज़ार करूँ।”

“कर लो।”

“बस? इतनी आसानी से?”

माँ हल्के से हँसीं, “बेटा, कुछ चीज़ें हमारे हाथ में होती हैं और कुछ नहीं। जो हमारे हाथ में नहीं, उसे पकड़े रहने से हाथ ही दुखता है।”

निखिल कुछ नहीं बोला।

“माँ…”

“हाँ?”

“अगर यह नौकरी नहीं मिली तो?”

“तो तुम क्या करोगे?”

“पता नहीं।”

“और अगर मिल गई तो?”

“तब… सब ठीक हो जाएगा।”

माँ फिर चुप हो गईं।

“क्या हुआ माँ?”

“कुछ नहीं। बस सोच रही थी… इंसान अक्सर जिस दरवाज़े के सामने खड़ा होता है, उसे ही अपनी मंज़िल मान लेता है।”

“आप फिर पहेलियाँ बुझाने लगीं।”

“नहीं बेटा,” माँ ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस पूछ रही हूँ—अगर दरवाज़ा देर से खुले तो क्या हम मान लें कि घर में कोई और रास्ता है ही नहीं?”

निखिल ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उसी समय उसके मोबाइल पर एक नया मेल आया।

उसने स्क्रीन देखी।

कुछ सेकंड तक चुप रहा।

“माँ…”

“हाँ बेटा?”

“कल एक जगह और इंटरव्यू है। मैंने वहाँ आवेदन तो किया था, लेकिन पहली नौकरी की उम्मीद में उसे लगभग भूल ही गया था।”

माँ मुस्कुराईं, “तो अब?”

निखिल ने खिड़की से बाहर देखा। चेहरे पर सुबह वाली बेचैनी नहीं थी।

“अब लगता है… कल जल्दी उठना पड़ेगा।”

माँ हँस पड़ीं।

“हाँ बेटा, कभी-कभी जिंदगी हमारी योजना बदल देती है… ताकि हम वह रास्ता देख सकें, जिस पर हमने ध्यान ही नहीं दिया था।”

निखिल ने फोन रखा और अगली सुबह की तैयारी में लग गया।

बाहर रात गहरी हो रही थी।

और उसके भीतर… जैसे कोई नया सवेरा धीरे-धीरे उतर रहा था।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ कथा कहानी ☆

☆ लघुकथा – राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

“भैया तुम  कितनी देर में आओगे?”

“आता हूँ जरा बिजी हूं।”

“भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।”

“ट्रिन ट्रिन——“

“——–“

“ट्रिन ट्रिन——–“

“———-“

“अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?” पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी।

“दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया।—और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे पास पहुँच ही जाएँगे। इसीलिए मैं उनका इंतजार कर रही हूँ।”

“हाँ तुम्हारा कहना ठीक है पर आज तुम्हारे मिनिस्टर भाई के नगर में अनेक कार्यक्रम हैं,पता नहीं उन्हें किन-किन से राखी बँधवानी है, तो ऐसे में उन्हें यह याद होगा ही नहीं कि उन्हें अपनी सगी छोटी बहन से भी राखी बँधवानी है। पति ने कहा।

“नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मेरा भाई जरुर आएगा।” बहन ने पूरे भरोसे के साथ कहा।

“अच्छा,तुम राखी की थाली सजाकर तैयार कर लो। मैं पता करके और मंत्री जी को लेकर आता हूँ,आखिर शाम हो गई तुम कब तक भूखी रहकर भाई को राखी बाँधने का रास्ता देखोगी?”

“तभी टीवी पर न्यूज आती है-हमारे नगर में पधारे समाज कल्याण मंत्री दिन भर विधवा आश्रम,अनाथ आश्रम व लाडली बहनों से राखी बँधवाने के बाद स्थानीय कार्यक्रमों से निवृत्त होने के बाद वापस राजधानी लौट गए हैं।”

 यह न्यूज सुनकर सजी हुई राखी की थाली विलाप करती नजर आई,और जलाया गया दीप एक बार फिर बुझ गया था।

 ☆

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ प्यार से आगे भी एक जिंदगी है ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ प्यार से आगे भी एक जिंदगी है ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“माँ, आपने मेरी शादी के लिए हाँ क्यों नहीं की?”

“क्योंकि मुझे तुम्हारी खुशी चाहिए, सिर्फ तुम्हारी जिद नहीं।”

“लेकिन मैं निखिल से प्यार करती हूँ।”

“जानती हूँ। पर क्या तुमने कभी यह सोचा है कि प्यार के बाद की जिंदगी कैसी होगी?”

“माँ, आप भी न! आजकल कौन इतनी बातें सोचता है? हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं।”

“मैं भी तुम्हारी उम्र में यही सोचती थी, अनन्या।”

“फिर?”

“तुम्हारे पिता और मैंने भी बहुत प्यार किया था। घंटों बातें होती थीं, एक-दूसरे के बिना रहने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। लेकिन शादी के बाद बातें कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हो गईं।”

“तो क्या प्यार झूठा था?”

“नहीं। प्यार सच्चा था… शायद हमारी समझ अधूरी थी।”

“आप कहना क्या चाहती हैं?”

“बस इतना कि शादी से पहले यह मत देखना कि वह तुम्हें कितना चाहता है। यह भी देखना कि तुम्हारे ‘न’ कहने पर उसका व्यवहार कैसा होता है, तुम्हारी असहमति का वह कितना सम्मान करता है, तुम्हारे सपनों के लिए कितनी जगह रखता है।”

अनन्या कुछ देर चुप रही।

“माँ, अगर निखिल इन सब बातों में अच्छा निकला तो?”

माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा-

“तब क्या तुम उससे सिर्फ इसलिए शादी करोगी कि वह तुम्हें प्यार करता है… या इसलिए भी कि उसके साथ तुम अपने आपको सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र महसूस करती हो?”

अनन्या ने कोई उत्तर नहीं दिया।

माँ भी चुप रहीं।

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© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆ लघुकथा – राहत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “राहत…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆

✍ लघुकथा ☆ राहत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आजकल हाउसिंग सोसायटी हर जगह बनी हुई हैं। एक कालोनी या एक दो बड़ी बिल्डिंग में रहने वाले लोग सोसायटी बना लेते हैं ताकि बिजली पानी सफाई जैसे काम होते रहें और लोग अपना काम निश्चिंत होकर करते रहें। चिंता अगर रहती है तो अपने निजी काम की। सहकारिता की इस भावना की  लोकप्रियता व उपयोगिता को देखते हुए प्रशासन ने भी सोसायटी को मान्यता दी है उसके लिए वियम पर नियम बनाए हैं। उसका रजिस्ट्रेशन वगैरह सब कुछ होता है। सोसायटी अपने सदस्यों और स्थानीय प्रशासन के बीच की कड़ी बन गई है।

गली में कचरा है तो सोसायटी साफ कराएगी। नल में पानी नहीं आ रहा है तो सोसायटी व्यवस्था करेगी। कोई अपने मकान या फ्लैट में कुछ निर्माण करवा रहा है तो उसे सोसायटी देखेगी। पार्किंग व्यवस्था भी यानी जो भी सार्वजनिक काम हो सोसायटी देखेगी। किसी के फ्लैट का पानी दूसरे के फ्लैट में आ रहा है तो सोसायटी देखेगी। वे लोग आपस में बात करके हल नहीं निकाल सकते।

पता नहीं कैसे एक डंफर से एक बड़ा पत्थर सोसायटी के गेट के अंदर गिर गया। पत्थर भारी था। वॉचमैन अकेला उठा नहीं पा रहा था। जो भी आता सोसायटी को कोसता कि सोसायटी कर क्या रही है। कब से पत्थर पड़ा है और सोसायटी सोई हुई है। आते जाते चेयरमैन सेक्रेटरी को बोलते, भाई पत्थर हटवाओ सबको बहुत दिक्कत हो रही है।  सेक्रेटरी बोलता क्रेन नहीं मिल रही है, मिलते ही उठवा देंगे। सभी लोग पत्थर के इधर उधर से भुनभुनाते निकल जाते पर किसी ने उसे हटाने का प्रयास नहीं किया।

सोसायटी में चार पांच युवक थे । ड्यूटी से आने के बाद एक जगह बैठकर गप्पें मारा करते थे। एक ने कहा कि भाई यह पत्थर की दिन से एक ही जगह पड़ा हुआ है। चलो मिल कर उसे रास्ते के किनारे कर देते हैं। उनमें सहमति बनी और चारों पांचों उठे और मिल कर पत्थर को एक ओर खिसका दिया। अब किसी को परेशानी नहीं होगी।

दूसरे दिन लोगों ने पत्थर रास्ते में नहीं देखा तो सोसायटी के चेयरमैन सेक्रेटरी की तारीफ़ करने लगे कि ऐसे काम करना चाहिए और चेयरमैन सेक्रेटरी एक दूसरे का मुंह देखने लगे पर चुप रहे। तीन चार दिन बाद म्युनिसिपेलिटी की गाड़ी आई और पत्थर को उठा ले गई। सभी ने राहत की सांस ली।

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© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति (मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२६ – दोष किसका? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दोष किसका?)

☆ लघुकथा # १२६ – दोष किसका? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से शहर की सड़कें तालाब में बदल गई थीं। नालियाँ कूड़े से अटी पड़ी थीं और गंदा पानी घरों में घुसने लगा था। शर्मा जी छतरी लेकर दरवाजे पर खड़े बड़बड़ा रहे थे।

“बस करो बारिश! आखिर कितना सताओगी? पूरा शहर डुबोकर ही मानोगी क्या?”

सामने से गुजर रहे वर्मा जी ठिठक गए।

“शर्मा जी, बारिश को क्यों कोस रहे हैं?”

“क्यों न कोसूँ? देख नहीं रहे, सड़क पर कमर तक पानी है। घर में रखा सामान खराब हो रहा है। बच्चे बाहर नहीं निकल पा रहे। यह बारिश नहीं, आफत है आफत!”

वर्मा जी मुस्कराए, “बारिश आफत नहीं, प्रकृति का वरदान है।”

“वाह! आपके घर में पानी नहीं घुसा, इसलिए वरदान लग रही है।”

“मेरे घर में भी पानी घुसा है, लेकिन दोष बारिश का नहीं है।”

“तो किसका है? बादलों का?”

“नहीं, हमारी व्यवस्था का और हमारी लापरवाही का।”

शर्मा जी तुनककर बोले, “अब इसमें हमारी क्या गलती?”

वर्मा जी ने सड़क की ओर इशारा किया। नाली के मुहाने पर प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और कूड़े का ढेर जमा था।

“यह देखिए। नाली किसने बंद की?”

शर्मा जी चुप रहे।

“बारिश ने?”

शर्मा जी ने मुँह फेर लिया।

वर्मा जी फिर बोले, “नालियाँ समय पर साफ नहीं होंगी, कचरा नालियों में फेंका जाएगा, प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर अतिक्रमण होगा और फिर हम बारिश को दोष देंगे—यह कहाँ का न्याय है?”

शर्मा जी कुछ नरम पड़े।

“लेकिन नगर निगम की भी तो जिम्मेदारी है।”

“बिल्कुल है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था करना, नालियों की नियमित सफाई करना और जलभराव वाले क्षेत्रों का स्थायी समाधान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन शहर को साफ रखना नागरिकों का भी कर्तव्य है।”

अचानक नाली से निकला गंदा पानी सड़क पर फैलता हुआ शर्मा जी के दरवाजे तक आ पहुँचा।

वे घबराकर बोले, “अरे! मेरा सामान अंदर रखा है।”

वर्मा जी ने उनकी मदद करते हुए कहा, “यही पानी अगर सही रास्ते से निकल जाए तो मुसीबत नहीं, उपयोगी संसाधन है।”

शर्मा जी ने आश्चर्य से पूछा, “तो बारिश को दोष देना बंद कर दें?”

“बारिश को नहीं, अपनी सोच और व्यवस्था को सुधारिए।”

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

शर्मा जी ने सामने जमा कूड़े को देखा। फिर बोले, “कल मोहल्ले की बैठक बुलाएँगे। नालियों की सफाई के लिए नगर निगम में शिकायत करेंगे और लोगों को भी समझाएँगे कि कचरा नालियों में न डालें।”

वर्मा जी मुस्कराए, “अब बात बनी।”

आसमान से बारिश अब भी बरस रही थी। शर्मा जी ने पहली बार उसे शिकायत भरी नजरों से नहीं, बल्कि समझदारी भरी नजरों से देखा।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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