हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – जड़ें और शाखाएँ… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जड़ें और शाखाएँ।)

☆ कथा-कहानी – लघुकथा – जड़ें और शाखाएँ… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

रामप्रसाद स्वयं को सौभाग्यशाली मानते थे क्योंकि तीन पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती थीं।

उस दिन अख़बार में नई शिक्षा नीति पर चर्चा छपी थी। रामप्रसाद ने उत्साह से कहा— “अब बच्चों को शुल्ब सूत्र भी पढ़ाए जाएँगे। आखिर दुनिया जिसे आज खोज रही है, उसकी जड़ें हमारे यहाँ सदियों पहले थीं। इतिहास भी अब ठीक होगा। हमारी सभ्यता का जितना मज़ाक बनाकर हमें नीचा दिखाया गया, अब उसे सही करने का समय आ गया है।”

रमेश ने सहमति में सिर हिलाया। इतने में बहू शीला रोटियाँ लेकर आई। रामप्रसाद मुस्कराए— “अगर तुम्हारे समय में संस्कृत पढ़ाई गई होती, तो आज तुम भी श्लोक पढ़कर भोजन परोसती।” शीला मुस्करा भर दी।

अब तक चुप बैठा अंकुर बोला— “दादाजी, क्या दुनिया हमें इसलिए याद रखेगी कि चार हजार साल पहले हम क्या थे… या इसलिए कि अगले पचास साल में हम क्या बनेंगे?”

रामप्रसाद ने उसकी ओर देखा ही था कि अंकुर फिर बोला— “मुझे संस्कृत से शिकायत नहीं है, न वैदिक गणित से। लेकिन मेरी कक्षा के दोस्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोबोटिक्स सीखना चाहते हैं। दुनिया भविष्य की तैयारी कर रही है। मुझे डर है कि कहीं हम अतीत की बहसों में उलझकर अपने विद्यार्थियों को भविष्य की तैयारी से ही वंचित न कर दें।”

रमेश ने कहा— “अपनी जड़ों पर गर्व करना भी ज़रूरी है।”

अंकुर ने धीरे से उत्तर दिया— “पेड़ की जड़ें मिट्टी में होती हैं, पापा… लेकिन शाखाएँ हमेशा आकाश की ओर बढ़ती हैं।”

मेज़ पर कुछ पल सन्नाटा पसरा रहा। शीला ने तीनों पीढ़ियों को देखा और चुपचाप अंकुर के बगल में जा खड़ी हुई।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३३ – मुखौटा ! ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मुखौटा !)

☆ लघुकथा # १३३ – मुखौटा ! ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“हर साल रावण जलता है, फिर भी उसका कारोबार फल-फूल रहा है!” मोहन ने मैदान की ओर देखते हुए कहा।

सोहन हँसा, “माँग है, तभी तो आपूर्ति है!”

“बिल्कुल! कोई रिश्वत से जेब भर रहा है, कोई पद की आड़ में तिजोरी। पुतला बेचारे की बदनामी मुफ्त में हो रही है।”

सोहन ने चुटकी ली, “तो क्या दशहरा मनाना छोड़ दें?”

“क्यों? फोटो खिंचवाने, तालियाँ बटोरने और भाषण देने का इतना बढ़िया अवसर जो है!”

“तुम्हें तो हर आयोजन में खोट नजर आता है!”

“खोट नहीं, खाता नजर आता है। अच्छाई का हिसाब भाषणों में चुकता, लोभ का बहीखाता व्यवहार में चालू!”

सोहन ठहाका मारकर बोला, “फिर तो रावण अमर है!”

मोहन ने मुस्कराकर कहा, “जब तक दूसरों की बुराई गिनकर अपनी करतूतों पर पर्दा डालते रहेंगे, उसे मरने की जरूरत ही क्या है?”

तभी रावण के पुतले में आग लगी। भीड़ तालियाँ बजाने लगी।

सोहन ने प्रसन्न होकर कहा, “देखो, बुराई का अंत हो गया!”

मोहन ने उसकी ओर देखा, “हाँ, अब कल से फिर वही ईमानदारी की बातें और बेईमानी के काम।”

इस बार सोहन के होंठ खुले, मगर हँसी बाहर नहीं आई।

उसने कहा चलो दोस्त हम दोनों एक-एक मुखौटा खरीद के लगा लेते हैं सबने राम का लगाया हम रावण का खरीदे।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा ☆ माँ, सर्वगुण संपन्न सिर्फ बेटियाँ ही क्यों? ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ माँ, सर्वगुण संपन्न सिर्फ बेटियाँ ही क्यों? ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

शाम को ऑफिस से लौटी प्रिशा ने देखा, माँ रसोई में खाना बना रही थीं और भाई आरव सोफ़े पर मोबाइल चला रहा था।

“माँ, आप थक गई होंगी। आरव से मदद क्यों नहीं लेतीं?”

“अरे बेटा, उसे कहाँ ये सब काम आते हैं! तू ज़रा रोटियाँ बना दे।”

“माँ, मुझे भी तो ऑफिस से लौटकर थकान होती है।”

“बेटा, लड़कियों को घर के काम आने चाहिए। कल ससुराल जाएगी तो कैसे सँभालेगी?”

प्रिशा मुस्कुराई, “माँ, आरव भी तो कल शादी करेगा। क्या उसकी पत्नी ऑफिस से थककर नहीं लौटेगी?”

माँ चुप हो गईं।

प्रिशा ने पूछा, “माँ, आपने मुझे पढ़ाया, आत्मनिर्भर बनाया, खाना बनाना सिखाया। लेकिन आरव को केवल कमाना ही क्यों सिखाया?”

माँ बोलीं, “हमारे समय में तो यही होता था।”

“माँ, आपके समय में बेटियाँ इतनी नौकरी भी कहाँ करती थीं? जब उनकी ज़िम्मेदारियाँ बदल गई हैं, तो बेटों की क्यों नहीं?”

माँ की आँखें नम हो गईं। बोलीं, “शायद हमने बेटी को हर परिस्थिति के लिए तैयार किया, पर बेटे को दूसरों पर निर्भर रहना सिखा दिया।”

तभी आरव मोबाइल रखकर रसोई में आया।

“माँ, आज रोटियाँ मैं बनाऊँगा। गोल न भी बनीं तो क्या हुआ, सीख जाऊँगा।”

माँ मुस्कुराईं, “काश, यह बात मैंने तुम्हें बचपन में सिखाई होती!”

प्रिशा बोली, “माँ, सर्वगुण संपन्न बहू ढूँढ़ने से पहले सर्वगुण संपन्न बेटा बनाना भी तो ज़रूरी है।”

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १२२ – जीना पड़ता है… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– जीना पड़ता है…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १२२ — जीना पड़ता है — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मेरे रिश्तेदार जगरूप के तीन लोगों की एक साथ मोटर दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। घर के शेष लोग पागल हो गये थे। पुलिस आ कर उनकी खोज खबर लेती रहती थी। आज वही परिवार सफलता की पराकाष्ठा छू रहा है। जगरूप से मुलाकात होने पर हम प्यार से मिले। हमने खूब बातें कीं। जाते – जाते उसने हाथ मिला कर कहा, “लिखते रहना भयवा।” वह मिठास अपने में लिये मैं बड़े प्यार से अपने घर लौटा था।

 © श्री रामदेव धुरंधर
1 – 10 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज के संजय” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है। महाभारत के युद्ध की दोनों सेनायें अपने अपने शिविरों में लौट रही हैं। रथों के घोड़े हिनहिना रहे है। कौन आज युद्ध में वीरगति पा गये और कौन कल तक बचे हुए हैं। संजय यह आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। महाराज व्यथित होकर दिन भर का हाल सुन रहे हैं। गांधारी भी पास ही बैठी हैं।

वह एक युग था। तब संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल बताने के लिए मिली दिव्य शक्ति से सब वर्णन करते थे। कहा जा सकता है कि उस युग के पत्रकार थे संजय।

अब युग बदल गया। इन दिनों चुनाव की महाभारत है। महाभारत अठारह दिन चली थी लेकिन यह चुनाव प्रचार की महाभारत पूरे इक्कीस दिन चलती है। यहां किसी एक संजय को दिव्य शक्ति नहीं दी जाती। यहां तो सैंकड़ों संजय हैं जो ‘वीडियो’ नाम की दिव्य शक्ति लेकर आये हैं और कुछ भी वायरल कर देने की शक्ति रखते हैं! मनचाहा वीडियो बना कर सारा आंखों देखा हाल सुनाने में जुटे हैं। संजय तो एक राष्ट्रीय पत्रकार था और राष्ट्र की सेवा में जुटा था। निष्पक्ष! निरपेक्ष! ये आज के युग के संजय तो निष्पक्ष और निरपेक्ष नहीं। इन्हें तो रोटी रोटी कमानी है, अपनी गृहस्थी चलानी है। मनभावन शौक पूरे करने हैं। खाना पीना है और वह दिखाना है जो सामने वाला चाहता है लेकिन इसकी एक निश्चित कीमत है! जो चुकाये वह पा मनचाहा पा ले! नहीं चुकाये तो हश्र भुगते!

ये कैसे संजय हैं?

ये कलियुग के महाभारत के संजय हैं! जो अंधे लोगों को युद्ध का हाल नहीं सुनाते बल्कि ऐसा हाल सुनाते हैं कि आंखों वालों को ही अंधा बना रहे हैं! आप इन्हें पहचानते हैं?

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शब्दार्थ… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शब्दार्थ… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

मित्रता का मुखौटा लगाकर शत्रु, लेखक से मिलने आया। दोनों खूब घुले-मिले, चर्चाएँ हुईं। ईमानदारी से जीवन जीने के सूत्र कहे-सुने, हँसी-मज़ाक चला। लेखक ने उन सारे आयामों का मान रखा जो मित्रता की परिधि में आते हैं।

एक बार शत्रु रंगे हाथ पकड़ा गया। उसने दर्पोक्ति की कि मित्र के वेष में भी वही आया था। लेखक ने सहजता से कहा, ‘मैं जानता हूँ।’

चौंकने की बारी शत्रु की थी। ‘शब्दों को जीने का ढोंग करते हो। पता था तो जानबूझकर मेरे सच के प्रति अनजान क्यों रहे?’

‘सच्चा लेखक शब्द और उसके अर्थ को जीता है। तुम मित्रता के वेष में थे। मुझे वेष और मित्रता दोनों शब्दों के अर्थ की रक्षा करनी थी’, लेखक ने उत्तर दिया।

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 4:57 बजे, 16.10.2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६७ ☆ लघुकथा – इंसानियत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘इंसानियत‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६७ ☆

☆ लघुकथा – इंसानियत ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

“प्लीज अंकल, दो महीने से मुझे सैलेरी नहीं मिल रही है, जैसे ही मिलेगी मैं आपको किराया दे दूंगी.”

“मुझे कुछ नहीं पता, रहना हो तो किराया दो, नहीं तो मकान खाली कर दो.”

“इस समय मुझे यहीं रहने दीजिए. आप ही बताइए ना मैं कहाँ जाऊँ इस समय?”

“मुझे कुछ नहीं पता” – बडे रूखेपन से मकान मालिक ने जबाब दिया.

“अंकल! आपको पता है ना कोरोना के कारण देश का क्या हाल है. मुझे मकान कहाँ मिलेगा किराए पर इस समय” – उसने बडी मायूसी से कहा.

“मुझे इससे कोई मतलब नहीं, मैंने पहले ही कहा था कि किराया समय पर देना होगा”.

रिया ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन मकान मालिक ने एक ना सुनी, साफ कह दिया कि- “किराया दो या मकान खाली करो.” रिया ने परेशान होकर अपने लिए मकान देखना शुरू किया . दोस्तों के परिचय से मकान मिल तो गया अब समस्या यह थी कि नए घर में सामान कैसे पहुँचाया जाए? लॉकडाउन के कारण कोई आ नहीं सकता था, बालकनी में खडी सोच रही थी कि सडक पर कुछ लडकों को जाते देखा, सबके कंधो पर बैग लदे थे, हाथों में भी सामान था. सबके चेहरों पर बडी थकान दिख रही थी. रिया ने बडे सकुचाते हुए उन्हें अपनी परेशानी बताई और पूछा – मुझे नए घर में सामान शिफ्ट करना है आप लोग मेरी मदद कर देंगे क्या? मेरे पास पैसे भी थोडे ही हैं.

उन्होंने एक दूसरे की तरफ देखा. “अरे दीदी काहे नहीं करेंगे मदद” – मुस्कुराता हुआ एक लडका बोला, “हमें आदत है मेहनत – मजूरी करने की.” सबने अपना सामान एक किनारे रखा और लग गये रिया की मदद करने. सामान पहुँचाने के बाद रिया ने उन्हें पैसे देने चाहे तो एक मजदूर हाथ जोडकर बोला –  “दीदी पैसे की बात ना करना, हम समझते हैं सबके हालात, देखो ना हम भी तो मारे – मारे घूम रहे हैं. बस इतनी दुआ करना कि हम अपने घर पहुँच जाएं अपनों के पास” —  उसकी आँखें भर आईं.  

रिया को इंसान में भगवान के दर्शन हो गये थे.

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ हिस्से का श्राद्ध ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ हिस्से का श्राद्ध ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“भैया, पंडित जी आ गए हैं। पिताजी का श्राद्ध शुरू करवा दें?” छोटे भाई ने फोन पर पूछा।

 “हाँ, तुम सब संभाल लो। मैं पैसे भेज देता हूँ।”

 “भैया, पैसे तो हर साल भेज देते हो। इस बार सोचा था, दोनों भाई साथ बैठकर पिताजी को याद करेंगे।”

 “अरे, तुम तो वहीं रहते थे उनके पास। मैंने भी अपनी जिम्मेदारियाँ निभाई हैं।”

 “बिल्कुल भैया। लेकिन आखिरी दिनों में पिताजी तुम्हारा इंतज़ार करते रहे। कहते थे, बड़ा बेटा आएगा तो साथ खाना खाएँगे।”

 उधर कुछ पल खामोशी रही।

 “तुम्हें शिकायत है कि मैं नहीं आया?”

 “नहीं भैया, शिकायत नहीं। बस एक बात समझ नहीं आती-आज पिताजी के नाम पर हम ब्राह्मण भोज करा रहे हैं, दान कर रहे हैं, लेकिन उनके जीते-जी उनके मन की इच्छा क्यों नहीं समझ पाए?”

 “अब पुरानी बातें करने से क्या फायदा?”

 “सही कह रहे हो। पिताजी भी यही कहते थे – बच्चों के बीच मनमुटाव न रहे। शायद इसीलिए अपनी बीमारी भी छिपाते रहे।”

 फोन कट गया।

 कुछ देर बाद बड़े भाई का संदेश आया-

 “कल घर आ रहा हूँ। इस बार श्राद्ध की बची हुई रस्में नहीं, तुम्हारे साथ बैठकर पिताजी की बातें भी करेंगे।”

 छोटे भाई ने संदेश पढ़ा और पिता की तस्वीर के सामने बैठ गया।

 श्राद्ध की तिथि हर साल लौटती है, लेकिन क्या रिश्तों को जोड़ने का अवसर भी हम हर साल टालते रहेंगे?

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३५० ☆ कथा-कहानी – प्रेम-प्यार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा – ‘प्रेम-प्यार‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३५० ☆

☆ कथा-कहानी ☆  लघुकथा – प्रेम-प्यार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

उस कार्यक्रम में शायद वह कहीं पीछे बैठा था। वहां से उठकर ठीक मेरे पीछे वाली कुर्सी पर आ गया, फिर गर्दन लंबी करके बोला, ‘नमस्ते चाचाजी।’

मैं चौंका। यहां ‘चाचा जी’ संबोधन करने वाला कौन आ गया? उसे सात-आठ साल बाद देख रहा था। मैंने पूछा, ‘कैसे हो? यहां कैसे?’

वह बोला, ‘मैं तो डेढ़ साल से इसी शहर में हूं। किसी दिन आपसे मिलने आने वाला ही हूं। अभी तक नहीं आ पाया।’

फिर बोला, ‘चाची जी की डेथ के बारे में पता चला था। बहुत भली थीं। अ ग्रेट लेडी। मुझे तो बेटे जैसा मानती थीं। उनकी बहुत याद आती है। आई कैन नेवर फ़ॉरगेट हर। वाइफ़ भी आप लोगों को बहुत याद करती है।’

वह थोड़ी देर तक अफ़सोस में सिर हिलाता रहा, फिर बोला, ‘बेटे दोनों कैसे हैं? अब तो बड़े हो गये होंगे।’

मैंने कहा, ‘हां, अभी दोनों कॉलेज में हैं।’

वह सिर हिलाता बैठा रहा। पंद्रह सोलह साल पहले वह किसी रिश्तेदार का पत्र लेकर नौकरी के लिए मेरे शहर आया था और मेरे घर पर दस-पंद्रह दिन रहा था। मेरी पत्नी ने उसे खूब लाड़ से रखा था। फिर उसने किराये पर मकान ले लिया था। कुछ दिन बाद उसकी शादी हो गयी थी और वह गृहस्थ हो गया था। उसके बाद उसका मेरे घर आना कम होता गया था। वह कब शहर छोड़ कर चला गया मुझे पता ही नहीं चला। पता चला उसने पुरानी नौकरी छोड़ दी थी। शहर छोड़ने के बाद उसने मुझसे संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की थी।

उसके दोस्तों से मालूम हुआ कि वह कई बार उनकी शादियों में शरीक होने के लिए शहर आया था, लेकिन वह कभी मुझसे नहीं मिला। लेकिन अभी वह मेरे पास बैठा पुरानी बातों को खोद खोद कर निकाल रहा था।

बात करते-करते वह हंसने लगा, बोला, ‘आपके आर्टिकिल पढ़ता रहता हूं। बहुत मज़ा आता है। साथियों को बताता हूं कि आप मेरे पिता जैसे हैं। मुझे बहुत स्नेह करते हैं।’

कार्यक्रम ख़त्म हुआ तो वह मेरे साथ मेरे स्कूटर तक आया। पांव छूकर बोला, ‘इतने दिनों बाद आपको देखकर बहुत अच्छा लगा। आशीर्वाद देते रहें। मैं जल्दी ही घर आकर आपसे इत्मीनान से बात करूंगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १२१ – उद्घोष… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– उद्घोष…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १२१ — उद्घोष — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

अज्ञानी तो क्या, वह तो विद्वानों के मुँह पर भी कह देता था वह भगवान को नहीं मानता। लोग तो यही सोचते होंगे भगवान सुन रहा है। पर भगवान सुनता भी हो तो आदमी को किसी प्रकार का अंतर नहीं पड़ता। बल्कि वह तो आजीवन सुखी संपन्न रहा। उसके अंत में इतना ही हुआ वह भी भगवान को मानने वालों की तरह अरथी में सजा और उसके लिए श्मशान तक उद्घोष एक ही हुआ, “राम नाम सत्य है।”

 © श्री रामदेव धुरंधर

10 – 10 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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