हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, मेरा इंटरव्यू कैंसल हो गया!” निखिल ने फोन पर लगभग चीखते हुए कहा।

“अच्छा… क्यों?”

“कंपनी ने आखिरी समय पर मेल भेज दिया। तीन महीने से तैयारी कर रहा था। आज सुबह से मन ही मन पूरा इंटरव्यू दे चुका था। अब कह रहे हैं—‘नई तारीख बाद में बताएँगे।’”

माँ ने धीरे से पूछा, “तो क्या हुआ?”

“क्या हुआ?” निखिल हँसा, “आपको पता भी है यह नौकरी मेरे लिए कितनी जरूरी थी?”

“हाँ बेटा, पता है।”

“नहीं माँ, आपको नहीं पता। घर का किराया, लोन की किस्त… सब कुछ इसी नौकरी पर टिका था। मुझे लगा था आज सब बदल जाएगा।”

माँ कुछ क्षण चुप रहीं।

फिर बोलीं, “तुमने अपना काम तो पूरा किया था न?”

“हाँ।”

“फिर?”

“फिर क्या? अब इंतज़ार करूँ।”

“कर लो।”

“बस? इतनी आसानी से?”

माँ हल्के से हँसीं, “बेटा, कुछ चीज़ें हमारे हाथ में होती हैं और कुछ नहीं। जो हमारे हाथ में नहीं, उसे पकड़े रहने से हाथ ही दुखता है।”

निखिल कुछ नहीं बोला।

“माँ…”

“हाँ?”

“अगर यह नौकरी नहीं मिली तो?”

“तो तुम क्या करोगे?”

“पता नहीं।”

“और अगर मिल गई तो?”

“तब… सब ठीक हो जाएगा।”

माँ फिर चुप हो गईं।

“क्या हुआ माँ?”

“कुछ नहीं। बस सोच रही थी… इंसान अक्सर जिस दरवाज़े के सामने खड़ा होता है, उसे ही अपनी मंज़िल मान लेता है।”

“आप फिर पहेलियाँ बुझाने लगीं।”

“नहीं बेटा,” माँ ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस पूछ रही हूँ—अगर दरवाज़ा देर से खुले तो क्या हम मान लें कि घर में कोई और रास्ता है ही नहीं?”

निखिल ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उसी समय उसके मोबाइल पर एक नया मेल आया।

उसने स्क्रीन देखी।

कुछ सेकंड तक चुप रहा।

“माँ…”

“हाँ बेटा?”

“कल एक जगह और इंटरव्यू है। मैंने वहाँ आवेदन तो किया था, लेकिन पहली नौकरी की उम्मीद में उसे लगभग भूल ही गया था।”

माँ मुस्कुराईं, “तो अब?”

निखिल ने खिड़की से बाहर देखा। चेहरे पर सुबह वाली बेचैनी नहीं थी।

“अब लगता है… कल जल्दी उठना पड़ेगा।”

माँ हँस पड़ीं।

“हाँ बेटा, कभी-कभी जिंदगी हमारी योजना बदल देती है… ताकि हम वह रास्ता देख सकें, जिस पर हमने ध्यान ही नहीं दिया था।”

निखिल ने फोन रखा और अगली सुबह की तैयारी में लग गया।

बाहर रात गहरी हो रही थी।

और उसके भीतर… जैसे कोई नया सवेरा धीरे-धीरे उतर रहा था।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ कथा कहानी ☆

☆ लघुकथा – राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

भैया तुम  कितनी देर में आओगे?”

“आता हूँ जरा बिजी हूं।”

भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।”

ट्रिन ट्रिन——“

“——–“

ट्रिन ट्रिन——–“

“———-“

अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?” पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी।

दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया।—और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे पास पहुँच ही जाएँगे। इसीलिए मैं उनका इंतजार कर रही हूँ।”

हाँ तुम्हारा कहना ठीक है पर आज तुम्हारे मिनिस्टर भाई के नगर में अनेक कार्यक्रम हैं,पता नहीं उन्हें किन-किन से राखी बँधवानी है, तो ऐसे में उन्हें यह याद होगा ही नहीं कि उन्हें अपनी सगी छोटी बहन से भी राखी बँधवानी है। पति ने कहा।

नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मेरा भाई जरुर आएगा।” बहन ने पूरे भरोसे के साथ कहा।

अच्छा,तुम राखी की थाली सजाकर तैयार कर लो। मैं पता करके और मंत्री जी को लेकर आता हूँ,आखिर शाम हो गई तुम कब तक भूखी रहकर भाई को राखी बाँधने का रास्ता देखोगी?”

तभी टीवी पर न्यूज आती है-हमारे नगर में पधारे समाज कल्याण मंत्री दिन भर विधवा आश्रम,अनाथ आश्रम व लाडली बहनों से राखी बँधवाने के बाद स्थानीय कार्यक्रमों से निवृत्त होने के बाद वापस राजधानी लौट गए हैं।”

 यह न्यूज सुनकर सजी हुई राखी की थाली विलाप करती नजर आई,और जलाया गया दीप एक बार फिर बुझ गया था।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ प्यार से आगे भी एक जिंदगी है ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ प्यार से आगे भी एक जिंदगी है ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, आपने मेरी शादी के लिए हाँ क्यों नहीं की?”

“क्योंकि मुझे तुम्हारी खुशी चाहिए, सिर्फ तुम्हारी जिद नहीं।”

“लेकिन मैं निखिल से प्यार करती हूँ।”

“जानती हूँ। पर क्या तुमने कभी यह सोचा है कि प्यार के बाद की जिंदगी कैसी होगी?”

“माँ, आप भी न! आजकल कौन इतनी बातें सोचता है? हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं।”

“मैं भी तुम्हारी उम्र में यही सोचती थी, अनन्या।”

“फिर?”

“तुम्हारे पिता और मैंने भी बहुत प्यार किया था। घंटों बातें होती थीं, एक-दूसरे के बिना रहने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। लेकिन शादी के बाद बातें कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हो गईं।”

“तो क्या प्यार झूठा था?”

“नहीं। प्यार सच्चा था… शायद हमारी समझ अधूरी थी।”

“आप कहना क्या चाहती हैं?”

“बस इतना कि शादी से पहले यह मत देखना कि वह तुम्हें कितना चाहता है। यह भी देखना कि तुम्हारे ‘न’ कहने पर उसका व्यवहार कैसा होता है, तुम्हारी असहमति का वह कितना सम्मान करता है, तुम्हारे सपनों के लिए कितनी जगह रखता है।”

अनन्या कुछ देर चुप रही।

“माँ, अगर निखिल इन सब बातों में अच्छा निकला तो?”

माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा-

“तब क्या तुम उससे सिर्फ इसलिए शादी करोगी कि वह तुम्हें प्यार करता है… या इसलिए भी कि उसके साथ तुम अपने आपको सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र महसूस करती हो?”

अनन्या ने कोई उत्तर नहीं दिया।

माँ भी चुप रहीं।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆ लघुकथा – राहत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “राहत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆

✍ लघुकथा ☆ राहत☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आजकल हाउसिंग सोसायटी हर जगह बनी हुई हैं। एक कालोनी या एक दो बड़ी बिल्डिंग में रहने वाले लोग सोसायटी बना लेते हैं ताकि बिजली पानी सफाई जैसे काम होते रहें और लोग अपना काम निश्चिंत होकर करते रहें। चिंता अगर रहती है तो अपने निजी काम की। सहकारिता की इस भावना की  लोकप्रियता व उपयोगिता को देखते हुए प्रशासन ने भी सोसायटी को मान्यता दी है उसके लिए वियम पर नियम बनाए हैं। उसका रजिस्ट्रेशन वगैरह सब कुछ होता है। सोसायटी अपने सदस्यों और स्थानीय प्रशासन के बीच की कड़ी बन गई है।

गली में कचरा है तो सोसायटी साफ कराएगी। नल में पानी नहीं आ रहा है तो सोसायटी व्यवस्था करेगी। कोई अपने मकान या फ्लैट में कुछ निर्माण करवा रहा है तो उसे सोसायटी देखेगी। पार्किंग व्यवस्था भी यानी जो भी सार्वजनिक काम हो सोसायटी देखेगी। किसी के फ्लैट का पानी दूसरे के फ्लैट में आ रहा है तो सोसायटी देखेगी। वे लोग आपस में बात करके हल नहीं निकाल सकते।

पता नहीं कैसे एक डंफर से एक बड़ा पत्थर सोसायटी के गेट के अंदर गिर गया। पत्थर भारी था। वॉचमैन अकेला उठा नहीं पा रहा था। जो भी आता सोसायटी को कोसता कि सोसायटी कर क्या रही है। कब से पत्थर पड़ा है और सोसायटी सोई हुई है। आते जाते चेयरमैन सेक्रेटरी को बोलते, भाई पत्थर हटवाओ सबको बहुत दिक्कत हो रही है।  सेक्रेटरी बोलता क्रेन नहीं मिल रही है, मिलते ही उठवा देंगे। सभी लोग पत्थर के इधर उधर से भुनभुनाते निकल जाते पर किसी ने उसे हटाने का प्रयास नहीं किया।

सोसायटी में चार पांच युवक थे । ड्यूटी से आने के बाद एक जगह बैठकर गप्पें मारा करते थे। एक ने कहा कि भाई यह पत्थर की दिन से एक ही जगह पड़ा हुआ है। चलो मिल कर उसे रास्ते के किनारे कर देते हैं। उनमें सहमति बनी और चारों पांचों उठे और मिल कर पत्थर को एक ओर खिसका दिया। अब किसी को परेशानी नहीं होगी।

दूसरे दिन लोगों ने पत्थर रास्ते में नहीं देखा तो सोसायटी के चेयरमैन सेक्रेटरी की तारीफ़ करने लगे कि ऐसे काम करना चाहिए और चेयरमैन सेक्रेटरी एक दूसरे का मुंह देखने लगे पर चुप रहे। तीन चार दिन बाद म्युनिसिपेलिटी की गाड़ी आई और पत्थर को उठा ले गई। सभी ने राहत की सांस ली।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति (मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२६ – दोष किसका? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दोष किसका?)

☆ लघुकथा # १२६ – दोष किसका? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से शहर की सड़कें तालाब में बदल गई थीं। नालियाँ कूड़े से अटी पड़ी थीं और गंदा पानी घरों में घुसने लगा था। शर्मा जी छतरी लेकर दरवाजे पर खड़े बड़बड़ा रहे थे।

“बस करो बारिश! आखिर कितना सताओगी? पूरा शहर डुबोकर ही मानोगी क्या?”

सामने से गुजर रहे वर्मा जी ठिठक गए।

“शर्मा जी, बारिश को क्यों कोस रहे हैं?”

“क्यों न कोसूँ? देख नहीं रहे, सड़क पर कमर तक पानी है। घर में रखा सामान खराब हो रहा है। बच्चे बाहर नहीं निकल पा रहे। यह बारिश नहीं, आफत है आफत!”

वर्मा जी मुस्कराए, “बारिश आफत नहीं, प्रकृति का वरदान है।”

“वाह! आपके घर में पानी नहीं घुसा, इसलिए वरदान लग रही है।”

“मेरे घर में भी पानी घुसा है, लेकिन दोष बारिश का नहीं है।”

“तो किसका है? बादलों का?”

“नहीं, हमारी व्यवस्था का और हमारी लापरवाही का।”

शर्मा जी तुनककर बोले, “अब इसमें हमारी क्या गलती?”

वर्मा जी ने सड़क की ओर इशारा किया। नाली के मुहाने पर प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और कूड़े का ढेर जमा था।

“यह देखिए। नाली किसने बंद की?”

शर्मा जी चुप रहे।

“बारिश ने?”

शर्मा जी ने मुँह फेर लिया।

वर्मा जी फिर बोले, “नालियाँ समय पर साफ नहीं होंगी, कचरा नालियों में फेंका जाएगा, प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर अतिक्रमण होगा और फिर हम बारिश को दोष देंगे—यह कहाँ का न्याय है?”

शर्मा जी कुछ नरम पड़े।

“लेकिन नगर निगम की भी तो जिम्मेदारी है।”

“बिल्कुल है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था करना, नालियों की नियमित सफाई करना और जलभराव वाले क्षेत्रों का स्थायी समाधान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन शहर को साफ रखना नागरिकों का भी कर्तव्य है।”

अचानक नाली से निकला गंदा पानी सड़क पर फैलता हुआ शर्मा जी के दरवाजे तक आ पहुँचा।

वे घबराकर बोले, “अरे! मेरा सामान अंदर रखा है।”

वर्मा जी ने उनकी मदद करते हुए कहा, “यही पानी अगर सही रास्ते से निकल जाए तो मुसीबत नहीं, उपयोगी संसाधन है।”

शर्मा जी ने आश्चर्य से पूछा, “तो बारिश को दोष देना बंद कर दें?”

“बारिश को नहीं, अपनी सोच और व्यवस्था को सुधारिए।”

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

शर्मा जी ने सामने जमा कूड़े को देखा। फिर बोले, “कल मोहल्ले की बैठक बुलाएँगे। नालियों की सफाई के लिए नगर निगम में शिकायत करेंगे और लोगों को भी समझाएँगे कि कचरा नालियों में न डालें।”

वर्मा जी मुस्कराए, “अब बात बनी।”

आसमान से बारिश अब भी बरस रही थी। शर्मा जी ने पहली बार उसे शिकायत भरी नजरों से नहीं, बल्कि समझदारी भरी नजरों से देखा।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ – नई दिशा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा नई दिशा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ ☆

🌻लघु कथा🌻 नई दिशा 👩‍🍼

मम्मी आपने बताया आप पापा के साथ शादी के पहले सोलह सोमवार का व्रत कई बार किया है। अंजली ने बड़े भोलेपन से मम्मी को प्रश्न किया मेरी सभी सहेलियों के यहाँ शिव अभिषेक बड़ी श्रद्धा से करते है। न आप करती है न मुझे व्रत करने देती। कहा जाता है – – – इसको करने से मनचाहे पति की प्राप्ति होती है।

मम्मी ने तुरंत बात काटते हुए कहा–बस इसलिये ही नही करने देती। मनचाहा नही वो चाहे ऐसे पति की कामना रखनी चाहिए।

हम नारियों को भगवान ने ममता से भरपूर बनाया है। हमें तो पत्थर से भी प्रेम हो जाता है। पर समय बदल गया है अंजली!!! अब पति की चाहत होना बहुत आवश्यक है।

सारी जिंदगी घूटन से अच्छा है वो चाहे ये मायने रखता है। मम्मी के इस निर्णय पर अंजली हैरान थी। परन्तु नई दिशा, नई सोच मिलने से उसका व्याकुल मन शांत हो चला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – कसक ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – कसक ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

वह घर आया और रूठ कर दादी के पास पहुच गया। उसकी बाजू पकड कर बोला- दादी , फोन पर मेरी पापा से बात करवा दे।

– क्यों ?

– दादी , कहां रहता है , मेरा पापा ?

– वो तो काम के लिए दूर रहता है ।

– बुला उसे अभी ।

– क्यों ?

– मैं अभी जाॅय के साथ खेल रहा था । उसका पापा आया और हम दोनों को कार में घुमाने ले गया ।

– फिर क्या हुआ ?

– जब मेरे पापा के पास गाड़ी है, तो मैं जाॅय के पापा की गाडी में सैर क्यों करूं ?

– बेटे , तेरे पापा नहीं आ सकते ।

– कह दे फिर मैं उनसे बात नहीं करूंगा ।

-नहीं बेटे, ऐसे नहीं कहते ।

– बस फिर, करवा दे मेरी बात। वह अपनी जिद्द पूरी करके ही माना । उसके बाद सपनों में खो गया और पापा की गाड़ी में सैर करने निकल गया ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क : 1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६३ ☆ बोधकथा – लकीर ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय बोधकथा ‘लकीर। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६३ ☆

☆ बोधकथा – लकीर ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

स्वाभिमान और अहंकार की गाड़ी ट्रैफिक में अटक गई। अहंकार ड्राइविंग सीट पर बैठा था। एफ.एम. पर गाने चल रहे थे – ‘दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई- –‘ गाने को सुनकर बातों ने नया मोड़ ले लिया। स्वाभिमान बोला– “तरह-तरह के लोग होते हैं दुनिया में। तू अपने को ही देख, कितना बढ़-चढ़कर बोलता है।” 

अहंकार बोला – “अरे! दुनिया गाल बजानेवालों की है, मुँह सिले बैठे रहो, कौन पूछेगा तुम्हें?” 

“मैं तेरी तरह डींगे नहीं हाँकता। तेरी बातों से दूसरों का दिल दुखता है। मैं जो करता हूँ, अपने मान- सम्मान की रक्षा के लिए” — स्वाभिमान जरा तनकर बोला।

“मैं भी यही करता हूँ। किसी का दिल दुखे, बुरा लगे तो इसमें मेरा क्या दोष? मैं कुएँ के मेंढ़क की तरह नहीं रह सकता।” 

पास खड़ा स्कूटर सवार अभिमान इनकी बातचीत सुन बोला-  “ड्राइविंग सीट पर बैठा अहंकार तो सबको दिखता है पर पिछली सीट पर बैठा स्वाभिमान कब अहंकार में बदल जाता है, इसका भान उसे भी नहीं होता—-!!” 

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – श्री गणेश ☆ श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ ☆

श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत। शिक्षा – स्नातकोत्तर (समाज शास्त्र ए हिंदी साहित्य), सम्मान – अनेक साहित्यिक सम्मान से अलंकृत। प्रकाशन – साझा संकलन एवं पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित,आकाशवाणी में काव्यपाठ। सम्प्रति – गृहणी, श्रोता एवं रचनाकार।  अभिरुचि साहित्य, संगीत, प्रकृति, देशाटन। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – श्री गणेश।)

☆ लघुकथा ☆ श्री गणेश ✍ श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ 

शाम ढलते ही गणेश पंडाल गेंदे के फूलों और झिलमिलाती लाइटों से सज गया था। ढोल-मंजीरों की गूँज के साथ संध्या आरती हुई। सभी ने श्रद्धा से आरती की और प्रसाद लेकर अपने घरों की ओर मुड़े ही थे कि बाहर गाड़ियों का शोर गूँजा।

“अरे हटो, नेता जी आ रहे हैं!”

कार्यकर्ताओं के लावलश्कर के साथ स्थानीय नेता जी समर्थकों समेत पंडाल में दाखिल हुए। मुख्य कार्यकर्ताओं ने उन्हें तुरंत गणेश प्रतिमा के सामने ला खड़ा किया।

एक कार्यकर्ता ने पुजारी के हाथ से थाली लेकर नेता जी को थमा दी और जोर से बोला, “मुख्य अतिथि आ गए हैं, आरती दोबारा होगी!”

पुजारी ने असमंजस में भगवान की मूर्ति और फिर नेता जी की ओर देखा। इसके बाद भारी मन से घंटी उठाई और बोले, “ॐ जय गणेश देवा…”

नेता जी ने कैमरों की तरफ देखकर आरती शुरू की। जो लोग घर जा चुके थे, वे भी रुककर इस तमाशे को देखने लगे। बप्पा के दरबार में भक्ति पीछे छूट गई थी और प्रोटोकॉल का बोलबाला हो चुका था।

© श्रीमती अर्चना द्विवेदी ‘गुदालू’ ‘✍️

निवास – जबलपुर मध्यप्रदेश मो – 9329931303

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा

कार में धीमी आवाज़ में गीत बज रहा था – “घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं…”

“मम्मी, आप रो रही हो?” बेटी ने पूछा।

उसने जल्दी से शीशे की तरफ़ देखा – “नहीं बेटा, आँख में कुछ चला गया।”

“आप हमेशा यही कहती हो।”

वह चुप हो गई।

गीत की पंक्तियाँ जैसे वर्षों पुराना हिसाब खोल रही थीं।

कभी पति की पसंद, कभी परिवार की उम्मीदें, कभी बच्चों की जरूरतें – वह सबकी ताल पर चलती रही।

कभी टूट गई, कभी तोड़ी गई। कभी बिखरी, फिर रात के अँधेरे में खुद ही अपने टुकड़े समेटती रही।

किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि उन टुकड़ों को जोड़ते-जोड़ते उसके हाथ कितनी बार लहूलुहान हुए थे। शायद इसलिए कि खून दिखाई नहीं देता था।

बेटी ने धीरे से पूछा – “मम्मी, आपको क्या पसंद है?”

वह जवाब नहीं दे पाई।

इतने वर्षों में शायद वह अपनी पसंद ही भूल चुकी थी।

गीत खत्म हो गया।

लेकिन कार में खामोशी बनी रही।

बेटी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसने शीशे में खुद को देखा, फिर बेटी को।

होंठ कुछ कहने के लिए खुले… मगर आवाज़ नहीं निकली।

रेडियो पर अगला गाना शुरू हो चुका था।

और वह फिर चुपचाप सुनने लगी।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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