हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८३ ☆ बाल गीत – खट्टी – मीठी स्वाद निराला… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८३ ☆ 

☆ बाल गीत – खट्टी – मीठी स्वाद निराला…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।

झटपट खाएँ मटकू लाला।।

* 

नाम अनेकों इसके भइया।

इमली, अम्बा जीभ चटइया।

चटनी से खुल जाता ताला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

दही – भल्ले का स्वाद बढ़ाती।

आलू टिक्की भी गुण गाती।

चाट में चटनी गरममसाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

कच्ची – पक्की खूब सुहाती।

सुमन, सुनीता चट कर जाती।

लटक डाल ललचाए माला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

बील, आमिला, कल्ली, खट्टा।

चटनी पीसे सिल का बट्टा।

दिल को करती है मतवाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

कई विटामिन की है थाती।

दर्द, शुगर, पाचन में साथी।

सबका पड़ता इससे पाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३७ – बाल कहानी – जबान फिसली – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय बाल कहानी — “जबान फिसली ” की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३७ ☆

☆ बाल कहानी — जबान फिसली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

बेक्टो नींद में था. तभी जबान ने पूछा, ” आप  मुझे जानते हो? मैं कौन हूं?”

यह सुन कर बेक्टो हंसा, ”  आप को कौन नहीं जानता है. आप हमारी जबान हो. आप को  जिह्वा भी कहते हैं.”

” बिलकुल ठीक कहा बेक्टो , ” जबान बोली, ” मगर, आप यह नहीं जानते हो कि  मैं एक मांसपेशी हूं. भले ही आप ने मुझे एक नाम दे दिया हो. मगर, मैं  कहलाती हूं एक मांसपेशी.”

बेक्टो को यह पता नहीं था. जबान एक मांशपेशी है. वह खुश हो कर बोला, ” मुझे आज मालुम हुआ कि आप एक मांसपेशी हो.”

तब जबान ने कहा, ” मैं शरीर की सब से मजबूत मांसपेशी हूं. केवल एक जगह जुड़ी रहती हूं. मगर, काम बहुत करती हूं. जब चलती हूं तो अच्छेअच्छे की छूटी कर देती हूं. मेरी वजह से कई लोग मार खा जाते हैं. मेरे मुंह के आसपास जो दांत देख रहे हो. ये बहुत मजबूत होते है.

” जब मैं चलती हूं तो लोग इन्हें भी तोड़ डालते हैं. मैं इन मजबूत दांतों के बीच आराम से रह लेती हूं. यह बात दूसरी है कि ये मजबूत दांत कभीकभी मुझे भी खा जाते हैं. इस कारण मेरे अंदर घाव हो जाता है. मगर, मैं इस घाव को जल्दी भर देती हूं.”

जबान बोले जा रही थी. बेक्टो ने कहा, ” अपने मुंह मियां मिटठु मत बनो. यह अच्छी बात नहीं है.”

जबान को इस मुहावरे का अर्थ मालुम था. उस ने कहा, ” अरे हां. मैं तो भूल ही गई कि मैं मांसपेशियों के बारे में बता रही थी. मैं अपने मुंह अपनी ही प्रशंसा करने लगी. इसे ही अपने मुंह मिया मिटठू बनना कहते हैं.”

” खैर जाने दो.” जबान ने कहना शुरू किया, ”आप के पूरे  शरीर में 600 तरह की मांसपेशियां होती हैं. इन्हीं की वजह से शरीर को गति और ऊर्जा मिलती है. मुंह से बोलना हो या खाना चबाना सब में मेरा उपयोग होता है. यदि शरीर में मांसपेशियां न हो तो आप लोग जिंदा नहीं रह सकते हो. यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे.”

” क्या  ! ” बेक्टो को यह मालुम नहीं था. वह चौंक उठा, ” बिना मांसपेशी के हम जिंदा नहीं रह सकते हैं ! ” उस की आंखे फेल गई.

” हां, ”  जबान ने कहा, ”  आप के हृदय और फेफड़े भी मांसपेशियों के बने होते हैं. जिन की वजह से आप पूरे शरीर में खून पंप कर पाते हो. सांस लेना इन्हीं की वजह से संभव है. यदि ये मांसपेशियों के न बने होते तो आप जीवित न होते.

” शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं मांसपेशियों से बना होता है. जब आप मुस्कराते हो तो चेहरे पर प्रसन्नता के भाव इन्हीं मांसपेशियो की वजह से आता है. यदि ये काम न करें तो तुम मुस्करा नहीं पाओ. रोने में इन्हीं का हाथ होता है. लिखने में इन्हीं के कारण आप लिख पाते हो. यानी हरेक काम जो आप करते हो सभी में इन का हाथ होता है ?”

” तब तो हम सब काम अपनी मरजी से इन्हीं मांसपेशियों की वजह से करते हैं ?”

” नहीं नहीं, ” जबान झट से कैंची की तरह चलती हुई बोली, ” कुछ मांसपेशियां ऐसी होती है जो स्वयं संचालित होती रहती है. उन्हें किसी के द्वारा चलाने की आवश्यकता नहीं होती है. इन्हें अस्वैचिछक मांसपेशिया या स्वचलित मांसपेशियां कहते हैं. जैसे हृदय का धड़कना और फेफड़े का खून पंप करना. ये काम स्वत: होते रहते हैं. इन्हें हम स्वयं नहीं करते हैं. इसलिए इन्हें स्वसंचालित या अस्वैच्छिक मांसपेशियां कहते हैं.

” कुछ मांसपेशियां हमारी मरजी से चलती है. जैसे अभी तुम कुछ सोच रहे हो. इस के पहले मुझसे कुछ पूछ रहे थे. ये कार्य तुम्हारी द्वारा नियंत्रित हो रहा था. इसलिए इस तरह के कार्य करने वाली पेशियों को स्वैच्छिक पेशी कहते हैं. इस पर आप का नियंत्रण होता है.”

जबान अभी कुछ कहना चाह रही थी. दांत को उस का बोलना अच्छा नहीं लगा. उस ने उसे रोकना चाहा,  ” ज्यादा बोलना अच्छा नहीं रहता है ,” मगर, जबान कब मानने वाली थी. वह जब एक बार चलना शुरू हो जाती है तो बंद नहीं होती है. इसलिए कहते हैं कि जबान बहुत ज्यादा चलती है.

” अब चुप हो जा ! ” दांत ने उसे ललकारा. मगर, जबान बंद नहीं हुई. इस पर दांत ने जबान को काट लिया . उस पर घाव हो गया. वह चुप हो गई.

इस वक्त बेक्टो सोया हुआ था. उसे जोर का दर्द हुआ. वह उठ बैठा. उस ने देखा कि उस की जबान दर्द कर रही थी. उस ने जबान मुंह से बाहर निकाल कर देखी. उस पर घाव था. सोते समय वह अपनी जबान स्वयं काट चुका था.

बेक्टो तुरंत बैठ गया. वह एक अच्छे सपना देख चुका था. इसलिए वह बहुत खुश था.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

27/03/2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ८९ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ८९ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- जी. एम्. मॅडमनी त्या लंच मिटिंगमधे बोलण्याच्या ओघात बॅंकिंग इंडस्ट्रीत येऊ घातलेल्या, आणि आमच्यासारख्या प्रत्येक स्टाफचं आयुष्य सावरू किंवा विस्कळीतही करू शकणाऱ्या अनपेक्षित अशा प्रचंड वादळाचं सूतोवाचही केलं. प्रथमदर्शनी त्यातलं गांभीर्य आणि त्याचं महत्त्व मला लगेचच जाणवलं नव्हतं, पण…)

मिटिंग संपवून जी. एम्. मॅडमनी सर्वांचा निरोप घेऊन कोल्हापूरला प्रयाण केलं. त्या गेल्या तेव्हा एरवी सर्वांनीच सुटकेचा निःश्वास सोडला असता, पण आज तसं झालं नाही. या सहामाही मधील आमच्या झोनमधल्या दोन रिजन्सच्या राहिलेल्या त्यांच्या मीटिंगसाठी त्या नियोजित टूर प्रोग्रॅमनुसार कोल्हापूर व गोवा रिजनल आॅफिस व्हिजीटसाठी जाणार होत्या. पुणे आॅन द वे असल्यामुळे त्यांनी थेट प्रवास न करता पुण्यात थोडावेळ हाॅल्ट घेऊन झोनल ऑफिसला मिटिंग घेऊन सर्वांना भेटून जायचं ठरवलेलं होतं! याची अर्थात आम्हा कुणालाच पूर्वकल्पना नसल्यामुळे मॅडम व्हिजिटला येणार याचं नाही म्हटलं तरी थोडं दडपण होतंच! ऐरणीवर असलेल्या सर्व विषयांबाबत थेट डी. जी. एम्. वखरे साहेबांशी तासभर सविस्तर चर्चा करून, त्यांना स्पेसिफिक असाईन्मेंटस् देऊन मॅडमनी त्यांची महत्त्वाची कामं हातावेगळी केली होती. त्यामुळे अनपेक्षितपणे मॅडमची ही व्हिजिट आणि नंतरची आम्हा सर्वांबरोबर ची लंच मीटिंगसुद्धा खूपच खेळीमेळीत झाली. एरवी त्यांच्या यापूर्वीच्या मिटिंग्जमधे प्रत्येकाच्या कु़ंडल्यांचा व्यवस्थित अभ्यास करून येणाऱ्या त्या सगळी हत्यारं परजून आक्रमक आविर्भावातच प्रवेश करायच्या. पण आज मात्र नेहमीचा त्यांचा दरारा अतिशय हळवा होऊन गेल्यासारखं त्यांचं हे वेगळं रूप आम्हाला दिलासा देणारं ठरलं होतं! या मिटिंगमधे सर्वांना कैचीत पकडायला टपलेले कोणतेही अनपेक्षित अवघड प्रश्न न विचारता त्यांच्या गप्पांच्या ओघात सेंट्रल-आॅफिस पातळीवर होऊ घातलेल्या बँकिंग इंडस्ट्रीमधील अनेक मूलभूत बदलांचा विषय निघाला आणि त्याविषयी बोलताना त्या ‘ती’ बातमी सांगून त्याबाबतच सविस्तर बोलत राहिल्या. ती बातमी होतीच तशी. किंबहुना

लंच मिटिंग आयोजित करण्यामागेही हेच कम्युनिकेशन करायचा त्यांचा उद्देश असणार होता नक्कीच. त्यांनी सांगितलेली ती बातमी आम्हा कुणालाच खरी वाटू नये अशीच होती! त्या बातमीनुसार सर्वच राष्ट्रीयकृत बॅंकांमधील स्टाफ जवळजवळ २० ते २५ टक्के कमी करण्याची सरकारची योजना होती म्हणे. आधीच प्रत्येक ब्रॅंचमधे स्टाफ शाॅर्टेज असताना आहे त्यातला स्टाफ इतक्या प्रमाणात कमी केला तर राहिलेल्या स्टाफने घाण्याला जुंपून घ्यायचं कां? हा प्रश्न सगळं ऐकताना प्रत्येकाच्याच मनात निर्माण झाला होता, पण तो थेट मॅडमना विचारण्याचं धाडस मात्र कुणालाच झालं नव्हतं..!

अर्थात यासंबंधीचं सर्क्युलर सर्वच राष्ट्रीयकृत बँकांच्या केंद्रीय कार्यालयाकडून लवकरच बाहेर पडणार असलं तरी ते कधी येईल? किंवा खरंच येईल कां? ही अनिश्चितता होतीच. तरीही असं कांहीतरी होऊ शकतं हा विचारच आम्हा सर्वांसाठी अतिशय धक्कादायक होता! माझ्या उद्या सकाळी होऊ घातलेल्या कथासंग्रहाच्या प्रकाशन समारंभाच्या पार्श्वभूमीवर या विषयात अडकून पडण्याइतकी स्वस्थता मला जाणवली नव्हती हे खरं, पण त्याचा विचार मात्र नकळत मनात पेरला गेला होताच. कारण स्टाफ मॅटर म्हणून हा विषय माझ्याच अखत्यारीतला असल्याने होणारे सर्व बदल व्यवस्थापनाचा एक भाग म्हणून मलाही मॅनेज करायला लागणार होतेच. तरीही जे होईल ते तेव्हाचं तेव्हा पाहू असं म्हणत मी त्या विचाराकडे दुर्लक्षच केलं! मात्र ऑफिसमधे पोचेपर्यंतच्या परतीच्या वाटेत कधीही येऊ शकणारं ते सर्क्युलर हाच इतरांच्या गप्पांचा विषय असल्याने नाही म्हटलं तरी माझ्या मनात चलबिचल सुरू झालीच होती. खरंतर ते सर्क्युलर आल्याशिवाय विविध नियम, अटी याबाबतचं नेमकं चित्र स्पष्ट होणार नव्हतं. त्यामुळे कांही न बोलता आपण अलिप्त रहायचं असंच मी ठरवलं. मात्र आपण ठरवतो ते कितीही महत्त्वाचं आणि टाळता न येणारं असलं तरी ते तसंच घडतं असं नाही याचा प्रत्यय मी केबिनमधे जाताच मला आला!

असं काही घडेल हे माझ्या ध्यानीमनीही नव्हतं. केबिनमधे पाऊल टाकताच माझ्या लक्षात आलं की माझ्या टेबलवर आज आलेल्या इनवर्ड मेलचा गठ्ठा माझीच वाट पहातोय. तो तसाच ड्राॅवरमधे ठेवून जाणं शक्यच नव्हतं. कारण ती सगळी कागदपत्रं नजरेखालून घालून निदान त्यातल्या महत्त्वाच्या मॅटर्स साॅर्ट करून ठेवणं तरी अत्यावश्यकच होतंच. त्यातली पत्रं आणि सर्कुलर्स असे दोन गठ्ठे शिपायाने नेहमीप्रमाणे करून ठेवलेले होतेच. पत्रे फारशी महत्त्वाची नव्हती. सर्क्युलर नंबर्स आणि त्यांचे विषय डायरीत नोट करून ठेवायचे. पाच दहा मिनिटात हे काम आवरून ड्राॅवर लाॅक करायचा न् घरी जायचं असं ठरवून मी सर्क्युलरचा गठ्ठा पुढे ओढला. पहिल्या दोन-तीन सर्क्युलर्सच्या नोंदी करून पुढचं सर्क्युलर हातात घेतलं आणि ते पहाताच नजरेला चटका बसावा तसंच झालं! ते ‘तेच’ सर्क्युलर होतं ज्याचा नुकत्याच झालेल्या लंच मीटिंगमधे मॅडमनी आमच्याशी बोलण्याच्या ओघात आवर्जून उल्लेख केलेला होता! ते सात-आठ पानी सर्क्युलर लगेच पूर्णपणे वाचणं मला शक्यच नव्हतं. शिवाय त्यात मला कांही वैयक्तिक इंटरेस्ट नसल्याने ते आत्ताच वाचत बसायची इच्छाही नव्हती. माझं सगळं लक्ष लागलेलं होतं ते ताबडतोब घरी जाण्याकडे! तरीही ते तसंच ड्राॅवरमधे ठेवून जाणं मला योग्य वाटेना. मी इंटरकॉमवरून वखरे साहेबांना आजच्या मेलमधेच ते सर्क्युलर आलेलं असल्याची कल्पना दिली. साहेबांनी ते सर्क्युलर घेऊन मला ताबडतोब केबिनमधे यायला सांगितलं. आता मात्र माझी सुटका नव्हतीच. मी घाईघाईने त्यांच्या केबिनमधे पोचणार त्यापूर्वीच आमच्या झोनल ऑफिस मधले सगळे फोन्स खणखणू लागले होते! आमच्यासारखंच सगळ्या ब्रॅंचेस आणि अॅडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसेसमधेही हे सर्क्युलर पोचलेलं असल्याने या बातमीची झळ आगीच्या लोळासारखी सर्वदूर सर्वांनाच चटके देत राहिलेली होती! विषय माझ्या डिपार्टमेंटशी संबंधित असल्याने आज नाही तरी सोमवारी ऑफिसमधे आल्यानंतर माझा फोनही दिवसभर असाच खणखणणार होता. मनातले उद्याच्या प्रकाशन समारंभाच्या संदर्भातले सगळे विचार त्या क्षणीच गोठून गेले! तरीही जणू त्यातूनच सावरण्यासाठी वखरेसाहेबच अचानक माझ्या मदतीला आले…

“हे सगळे व्याप सुरू होण्यापूर्वी आजच मी नागपूरला घरी जाऊन येतो. परवा दिवशी सोमवारी आपण यावर सविस्तर बोलू. तुमच्या उद्याच्या कार्यक्रमाला मात्र यामुळे मी नसणाराय. तुम्हालाही लगेच निघायला हवंय ना? या सर्क्युलरची एक कॉपी तुम्ही सोबत घरी घेऊन जा. सोमवारी येताना ते वाचून त्याचा व्यवस्थित अभ्यास करून या. एक काॅपी मी बरोबर नेतो. ” वखरे साहेब शांतपणे म्हणाले. त्यांच्या या स्थितप्रज्ञतेची गरज खरंतर त्याक्षणी मलाही होतीच! त्यांनी जे सांगितलं त्यात नाकारण्यासारखं कांही नव्हतंच. किंबहुना तेच माझ्यासाठीही सोयीचंच होतं!

पण तरीही घरी जाताना सोबत घेतलेल्या त्या सर्क्युलरच्या एवढ्याशा एनव्हलपचं ओझंही मला मणामणाचं वाटू लागलं! कारण उद्याच्या माझ्या कथासंग्रहाच्या प्रकाशन समारंभाचा आनंद या सर्क्युलरच्या विचाराची लागण झाल्यासारखा आधीच मलूल होऊन गेला होता..!!

पण घडणार होतं वेगळंच! एखादी नको असणारी गोष्टसुद्धा अकल्पितपणे वरदान ठरावी ना तसंच कांहीसं…!!

माझ्या आयुष्यांत असं सगळं उलटसुलट घडवत होता ते ‘तो’च! ते तसंच घडणं माझ्या हिताचंच असणार होतं पण ते त्या मन:स्थितीत मला मात्र जाणवलं नव्हतं एवढंच!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३४ – मुक्तक ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया“) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३४ – प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया  ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

दर्द, अड़ियल सा मुसाफिर आया

पूछ बस्ती से मेरा घर आया

*

उसकी आँखों में हादसे पढ़कर

याद फिर खौफ़ का सफर आया

*

इम्तिहां छोड़, पुस्तिका में वह

प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया

*

ले के शुभकामना गया था मैं

चोट खाकर मिरा जिग़र आया

*

दोस्त के जिस्म की महक लेकर

तीर तरकस में लौटकर अया

*

शांति का जो कपोत भेजा था

खून से हो के तर-बतर आया

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९७ ☆ न्यूयॉर्क से ~ आलेख – “दादा कैलाश चंद्र पंत, भोपाल को पद्मश्री की घोषणा पर” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९७ ☆

? न्यूयॉर्क से ~ आलेख – “दादा कैलाश चंद्र पंत, भोपाल को पद्मश्री की घोषणा पर” ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री कैलाशचंद्र पंत हिंदी पत्रकारिता, भाषा सेवा और सांस्कृतिक चेतना के ऐसे वरिष्ठ पुरोधा हैं, जिन्होंने भोपाल को न सिर्फ राजनीतिक राजधानी, बल्कि साहित्यिक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पहचान दिलाने में निरंतर महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। महू (जिला इंदौर) में 26 अप्रैल 1936 को जन्मे पंत जी ने एमए, साहित्याचार्य तथा साहित्य रत्न जैसे उच्च साहित्यिक उपाधियों के माध्यम से अपने अध्ययन को सुदृढ़ आधार दिया और आगे चलकर उसी विवेकपूर्ण दृष्टि को उन्होंने लेखन, संपादन तथा संस्थागत विकास से जोड़ा।वे मूलतः ऐसे रचनाशील पत्रकार और साहित्यसेवी हैं, जिन्होंने हिंदी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज, शिक्षा, संस्कृति और जनजागरण की धारदार शक्ति में रूपांतरित किया है।

भोपाल में रहते हुए कैलाशचंद्र पंत ने यहाँ की साहित्यिक गतिविधियों, गोष्ठियों और वैचारिक विमर्श को नई दिशा दी।वे भोपाल से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका “अक्षरा” के संपादक के रूप में लंबे समय तक सक्रिय रहे, जहाँ उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों को मंच दिया और समकालीन मुद्दों पर सार्थक बहसों को प्रोत्साहित किया।

उनकी संवाद शैली सरल, स्पष्ट और लोकाभिमुख रही, जिसके कारण वे आम पाठक, रचनाकार और श्रोता सभी के बीच प्रिय बने।

कैलाशचंद्र पंत का एक बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भाषा सेवा को संस्थागत स्वरूप दिया। वे मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में मंत्री संचालक की भूमिका निभाते हुए हिंदी के प्रचार प्रसार के अनेक कार्यक्रमों से जुड़े रहे और नए लेखकों, विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए सतत प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।भोपाल स्थित हिंदी भवन न्यास और कृषि भवन जैसे सांस्कृतिक–बौद्धिक केंद्रों के विकास में उनकी भागीदारी उल्लेखनीय रही, जिससे साहित्यिक कार्यक्रमों, विमर्शों और सांस्कृतिक आयोजनों को स्थायी मंच प्राप्त हुआ। महू में स्थापित स्वध्याय विद्यापीठ के माध्यम से उन्होंने शिक्षा, भारतीय संस्कृति और जीवन–मूल्यों के प्रसार की जो पहल की, उससे असंख्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने लाभ उठाया और एक वैचारिक अनुशासन की परंपरा विकसित हुई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कैलाशचंद्र पंत ने हिंदी और भारतीय संस्कृति की गरिमा को सुदृढ़ किया। भारत सरकार और मध्यप्रदेश शासन के प्रतिनिधि के रूप में वे विभिन्न देशों की साहित्यिक यात्राओं पर गए और विश्व हिंदी सम्मेलनों सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी भाषा की सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। इससे उन्हें वैश्विक साहित्यिक पहचान तो मिली ही, साथ ही प्रवासी भारतीय समुदाय में हिंदी के प्रति आत्मविश्वास भी जागृत हुआ।उनकी इस बहुआयामी साधना को देखते हुए उन्हें पूर्व में अनेकों  सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है, जबकि हाल में भारत सरकार द्वारा वर्ष 2026 के लिए पद्मश्री अलंकरण हेतु उनके चयन ने मध्यप्रदेश और हिंदी जगत – दोनों का मान बढ़ाया है।

आज कैलाशचंद्र पंत केवल एक वरिष्ठ पत्रकार या हिंदी सेवी नहीं, बल्कि एक लोकसंग्रही, अध्ययनशील और विनम्र व्यक्तित्व के रूप में हमारे सामने हैं, जिनके जीवन–कर्म पर “संघर्ष से विजयपथ की ओर” जैसी पुस्तकों के माध्यम से विस्तार से प्रकाश डाला गया है।उनकी साधना यह संदेश देती है कि यदि भाषा को समाज, शिक्षा और संस्कृति से जोड़ा जाए तो वह मात्र विषय न रहकर जनचेतना की धारा बन जाती है। भोपाल के साहित्यिक परिदृश्य में पंत जी की उपस्थिति एक ऐसा स्थायी स्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों को हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता, ईमानदारी और सामाजिक सरोकार का पाठ पढ़ाती रहेगी।

उन्हें पद्मश्री सम्मान भोपाल के हिंदी जगत का सम्मान है। उनसे जुड़े हम साहित्य प्रेमियों के लिए गर्व का पल है।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०७ – धर्म वही होता बड़ा ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “धर्म वही होता बड़ा”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०७ – धर्म वही होता बड़ा ☆

☆

धर्म वही होता बड़ा, जिसमें हो सद्भाव।

प्रेम दया ममता क्षमा, उपकारी हों भाव।।

 *

मानवता से कब बड़ा, जग ने समझा मर्म।

आदम युग के बाद ही, उपजे हैं सब धर्म।।

 *

बैर बुराई तामसी, नहीं धर्म के अंग।

मारकाट हिंसा सभी, हैं अधर्म के रंग।।

 *

कट्टरता जब धर्म में, घुस जाती है घोर।

मूल भाव खोते सभी, कभी न होती भोर।।

 *

शून्य भाव जबसे हुये, चुभे दिलों में शूल।

प्रेम और सद्भाव ही, सब धर्मों का मूल।।

 *

धर्म सभी हैं खो गये, अब कट्टरता साथ।

राम रहीम ईसा-मसि, पीट रहे हैं माथ।।

*

मानवता ही धर्म है, मुख्य धुरी है एक।

भारत की संस्कृति में, यही बात है नेक।।

 *

हम उदारवादी रहे, लेकर सबको साथ।

सदियों से हैं चल रहे, पकड़े सबका हाथ।।

 *

स्वागत करना जानते, और झुकाना माथ।

पर यह कभी न सोचिए, बंधे हुये हैं हाथ।।

* 

शिक्षा मिली सनातनी, वेदों से यह ज्ञान।

सारा जग है जानता, भारत देश महान।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६३ – देश-परदेश – किस्सा टूटी कुर्सी का ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६३ ☆ देश-परदेश – किस्सा टूटी कुर्सी का ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अभी तक तो लोग कुर्सी ना मिलने पर परेशान रहते थे, अब तो किसी को टूटी कुर्सी मिल जाने से ही बेहद परेशानियां होने लगी हैं। मीडिया कुछ दिन से लेकर चर्चा कर रहा है। हमने भी घर की सब कुर्सियां बढ़ई से चेक करवा ली हैं। यदि गलती से कोई मेहमान आ गए और कुर्सी कुछ गड़बड़ हो तो नाहक बेज़्ज़ती हो जाएगी।

अब तो घर के बाहर कहीं भी किसी कार्यालय आदि में जाते है, तो कुर्सियों पर ही नज़र रहती हैं। कल एक राज्य सरकार के कार्यालय में जाना हुआ, तो वहां आगंतुकों के लिए रखी हुई उपरोक्त कुर्सियों का चित्र खींच लिया।

हमारी सरकारी पाठशाला में भी कुर्सियों की कील निकल जाती थी। अनेकों बार पेंट में अल ( L) आकर का चीरा लग जाता था। उस जमाने में रफ़ूगर से उसे दुरस्त कर उपयोग लिया जाता था। आजकल तो तुरंत नई पेंट ऑनलाइन दस मिनिट में उपलब्ध हो जाती हैं।

आज के युग में तो अधिकतर प्लास्टिक की कुर्सियों का चलन हो गया हैं। उसमें कील लगने का खतरा भी नहीं रहता हैं। हमने भी बैंक की नौकरी में आरंभ लकड़ी की कुर्सियों से ही किया था। कैशियर की कुर्सी सामान्य से अधिक ऊंची होती थी। समय के साथ गोदरेज की केन वाली कुर्सियां चलन में आ गई। बिना हैंडल वाली बैठने की “यू” आकर की कुर्सी बड़ी आरामदायक होती थी। पीठ और बैठने के स्थान पर केन  होने से शरीर को हवा भी मिलती रहती थी।

कंप्यूटर युग में पहिए लगी हुई कुर्सियां आ गई हैं। एक सीट से दूसरी सीट तक जाने के लिए उठने की आवश्यकता भी नहीं हैं। शरीर को और आलसी बनाने में सहायक भी हैं। अधिकारियों की श्रेणी के अनुसार कुर्सी का बजट भी होता हैं। जितना बड़ा अधिकारी होगा, उतनी ही महंगी कुर्सी पर बैठेगा।

अब लेखनी को विराम देता हूं, कुर्सी पर बैठ कर मोबाइल में लिखते लिखते थक जो गया हूं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३१५ ☆ कार्यशाळा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३१५ ?

☆ कार्यशाळा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

वेदनेने कार्यशाळा घेतली

अन् तरीही खूप होती गाजली

खोल जखमांचीच जागा ही तरी

दुर्बलांनी चाळ तेथे बांधली

जाहलेले तेजही नाही कमी

कुंदनाने खूप ज्वाळा सोसली

खंजिराचा दोष नव्हता फारसा

रक्तरंजित योजना तू आखली

वस्त्र नव्हते अंगभर त्यांच्याकडे

जीर्ण कपडा लाज त्याने झाकली

पेटला शेजार आहे अन् तरी

झोप आम्हाला कशी ही लागली

केस साधा कापतो आहे गळा

क्रूरतेने आज सीमा गाठली

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझी जडणघडण… – थरारक पर्यटन – भाग – ७५ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

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☆ माझी जडणघडण… – थरारक पर्यटन – भाग – ७४  ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)

थरारक पर्यटन

मला नेहमी असं वाटतं की एखादा प्रवासी किंवा एखादा खेळाडू यांच्या मानसिकतेत साम्य आहे. दोघेही खिलाडू वृत्तीचे असतात, परिस्थितीशी जुळवून घेणारे असतात, कठीण परिस्थितीचं दोघांनाही भान असतं, अडचणींवर मात करण्याची क्षमता त्यांच्यात आपोआपच बळावते, माघार घेण्याची वृत्ती त्यांच्यात अभावाने जाणवते.

ग्रुप बरोबर केलेल्या अनेक टूर्समधून मी हा अनुभव घेतला आहे. सत्तरी उलटून गेलेली, ऐंशीच्या उंबरठ्यावर असलेली माणसे अगदी हौसेने उंच चढणी चढतात, कितीतरी किलोमीटर चालण्याची त्यांची तयारी असते. नव्या प्रदेशातील अनोळखी खाद्य संस्कृतीही अगदी आनंदी वृत्तीने, खिलाडू वृत्तीने स्वीकारतात, उगीच”खाण्याचे हाल होत आहेत” वगैरे कुरकुर करत बसत नाहीत. या संदर्भात मला एका हास्यास्पद प्रसंगाची आठवण येते.

तेव्हा आम्ही इटलीत फिरत होतो. इटालियन पिझ्झा हा जगप्रसिद्ध. मूळात “पिझ्झा” हे इटालियन लोकांचेच खाणं. तेव्हा इटलीत आलोय तर इटालियन क्यूझीनची चव का घेऊ नये? आमच्या ग्रुप कंडक्टरने आम्हाला इटालियन रेस्टॉरंट मध्ये नेलं आणि सगळ्यांसाठी “पिझ्झा” ची ऑर्डर दिली. आमच्याबरोबर एक वृद्ध गुजराती महिला होती. मुख्य म्हणजे ती एकटीच या टूर बरोबर आली होती. तिच्याबरोबर घरचे, अथवा स्नेही कुणीच नव्हते आणि तिच्याशी गप्पा करतानाच समजले की, ” ती नेहमीच एकटीच प्रवास करते. ” सिंगल ट्रॅव्हलर. तिचं म्हणणं, “टूर मध्ये सोबत मिळतेच आता नाही का तू भेटलीस मला. ” त्या संवादानंतर मी हळूच स्वतःलाही जरा तपासून पाहिलं, “आपल्याला जमेल का असे एकटीनेच फिरायला. मूळात आवडेल का? ” उत्तर अर्थातच “कोण जाणे! ” असंच आलं.

तर सांगत होते सगळ्यांच्या टेबलवर छान रंगीबेरंगी टोमॅटो, बेल पेपर्स, आॉलीव्ह्ज, भरपूर चीज वगैरेंनी सजवलेले पिझ्झा आले. “वा! वा! साक्षात इटालियन पिझ्झा! ”

त्या वृद्ध महिलेनेही तो खाण्यासाठी कापायला सुरुवात केली. तो इतका चिवट होता की तिने थोडासा सुरीवर जोर लावल्याबरोबर एखाद्या विटी सारखा टणकन् उडून दुसऱ्या टेबलवर जाऊन पडला. मला हे आठववून लिहिताना आताही खूपच हसू येत आहे.

“जो मारो पिझ्झा क्याथी गयो! ”

ती मजेत बोलत होती. थोड्याफार प्रकाराने सगळ्यांच्याच बाबतीत हा चिवट पिझ्झा खायचा कसा हा प्रश्नच होता. काहीजण ग्रुप कंडक्टरकडे तक्रारही करू लागले पण ही वृद्ध गुजराती महिला मात्र अगदी शांत होती.

“एटलो सु थयो. बद्धानी सामळो. मारे पास खाकरो छेना! ” आणि खरोखरच तिने तिच्या हॅन्डबॅगमधून खाकरे काढले आणि सर्वांना वाटले. इटलीत इटालियन पिझ्झा रेस्टॉरंट मध्ये आम्ही सर्वांनी ते भारतीय गुजराती कुरकुरीत खाकरे मस्त एन्जॉय केले.

प्रवासात असे अनेक अनुभव येतात. मजेचे, अडचणीचे, त्रासाचे अनेक प्रकारचे.

ओहायो स्टेटमध्ये कोलंबस या गावात राहत असताना तिथून दोनतीन तासावर असलेल्या एरी लेकवरच्या बेटावर जायचा ज्योतिका- साकेतने बेत केला. त्या दिवसाचं हवामान, वादळ वाऱ्यांविषयीचे सावध इशारे वगैरे दोघांनी काटेकोरपणे चेक केल्यानंतरच आम्ही चौघं ‘पुटीन बे’ला जायला निघालो. तिथे एक दिवस आम्ही मुक्कामही करणार होतो. तसं बुकिंगही साकेतने केलेलं होतं. समुद्रच वाटावा इतका विस्तीर्ण आणि अथांग असा तो तलाव होता. दूरवर अनेक उंच इमारती होत्या. तलावात प्रवासी, व्यापारी जहाजंही होती. प्रत्यक्ष बेटावर जाण्यासाठी आम्हाला एक क्रूज करावी लागली. गाडी किनार्‍यावरच्या कारपार्कमध्ये ठेवली आणि रात्री बेटावरच मुक्काम करणार असल्यामुळे लागणारे सामान तेवढं बरोबर घेतलं.

बेटावर पोहोचलो. चारी बाजूला असलेलं निळंशार पाणी बघून तर आमचा जीव अपार सुखावला. बेटावर फिरण्यासाठी आम्ही एक गोल्फ कार्टही घेतली. त्या उघड्या कार्ट मधून बेटावर फिरण्याची मजा वर्णनातीत होती. आम्ही मस्त गप्पा करत, गाणी गात, आजूबाजूची झाडं, घरं पाहत होतो आणि काय आश्चर्य! निसर्ग किती लहरी असतो! मानवी अंदाजावर छुपेपणाने तो कधी हल्ला करेल हे कोणी सांगायचं? एकाएकी जोरदार वादळ वारे सुरू झाले. आकाश काळोखलं आणि अक्षरश: चेंडू एवढ्या गारा आम्हाला झोडपू लागल्या. आमच्या अंगावर ‘हुडी’ होत्या तरीही गारांचा मारा आणि पावसामुळे निर्माण झालेली थंडी असह्यच होती. त्यातच आमची कार्टही बंद पडली. साकेतची अत्यंत लाडकी स्पोर्ट कॅप वाऱ्याबरोबर उडून गेली म्हणून तो अधिकच वैतागला होता. त्यातून आम्हा ज्येष्ठांची जबाबदारी! प्रसंग बाका होता. पुटीन बेवर सगळ्याच प्रवाशांची प्रचंड धावपळ चाललेली होती पण आम्हा चौघांचे हाल दारुण होते. आम्ही या वादळी पावसात भिजत रस्त्यावर होतो. तिथे जवळच एक टुमदार बंगला होता पण बंगल्याची दारं खिडक्या बंद होत्या. मनुष्यवावर तिथे जाणवतच नव्हता. क्षणभर माझ्या मनात आलं या क्षणी आपण भारतात असतो तर अशाच बंगल्याचे दार नक्की आपल्यासाठी उघडलं गेलं असतं. भिजणाऱ्या आम्हाला आत घेतलं असतं. पुसायला त्यांनी पंचे दिले असते. गरम चहाही मिळाला असता. उगीच नाही भारताला “अतिथ्यशील देश” म्हणतात. मी कोणत्या विचारात गुंग झाले हे ज्योतिकाने ओळखले असावे. ती लगेच म्हणाली, ” मम्मी त्या घराकडे अशी एकटक नजर लावून बघू नकोस. अमेरिकेत कुठल्याही कारणाने कुणालाही अरेस्ट करतात बरं का? ”

मी “भारतीय” असल्याचा अभिमान मात्र मला त्या क्षणी नक्कीच जाणवला.

पण तेवढ्यात एक अमेरिकन यंग कपल आमच्या जवळ येऊन थांबलं आणि ते त्यांच्या कार्ट मधून उतरले आणि त्यांनी त्यांची कार्ट आम्हाला देऊ केली आणि “आम्ही तुमची बंद पडलेली कार्ट रेंटल शॉप मध्ये घेऊन येऊ, डोन्ट वरी फोक्स, बी रिलॅक्स्ड” असं म्हणत आम्हाला अगदी गोड हसत त्यांनी ‘बाय’ केलं. आमच्या ‘थँक्स’ ला अगदी शालीनतेने “यु आर वेलकम मेन. ” असंही म्हटलं.

बेधुंद पावसात, गारांच्या तडाख्यात भिजण्यातला त्यांचा रोमान्स बघून कुठेतरी मनाला खरोखरच गुदगुल्या झाल्या.

एक क्षण तक्रारीचा तर दुसरा क्षण असा आपुलकीचा. त्या दुसऱ्या क्षणांनी अमेरिकन, भारतीय वगैरे लेबलं तोडून टाकली. उगीच दुभाजक असलेल्या भींती मनातल्या मनातच कोसळल्या. शेवटी निसर्गाच्या या महान पटांगणात माणूस हा फक्त माणूसच असतो. कुठल्याही राष्ट्रीयत्त्वाचा, धर्माचा शिक्का नसलेला. हा थरारक, नाट्यमय आणि नंतरचा मनुष्यपणाचा अविस्मरणीय अनुभव प्रवासात नेहमीच घेतला.

– क्रमशः भाग ७४..

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६९ – अर्थहीन संख्याएँ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – अर्थहीन संख्याएँ…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६९ – अर्थहीन संख्याएँ ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

2 मरे 10 घायल

10 मरे 100 घायल

100 मरे 1000 घायल

बस यूँ ही बढ़ती जायेगी

शून्यों की संख्या बनते जायेंगे आँकड़े

और छपते रहेंगे अखबारों में।

पढ़ते रहें लोग

 बिना किसी उत्तेजना के।

होता है

 ऐसा होता है तब

जब आदमी संख्या में बदल जाता है,

भला, आदमी और संख्या का नाता है?

हम सब संख्यातीत

अब बन कर रह गये हैं

अर्थहीन संख्याएँ।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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