हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #२९७ ☆ भावना के दोहे – दीवाली के दीप ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – दीवाली के दीप।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # २९७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – दीवाली के दीप ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

बढ़ता जब अँधियार है, दीपक होता दीप्त।

समरसता सँग प्रेम का, करता भाव प्रदीप्त।।

*

द्वार-द्वार पर सज रहे, दीवाली के दीप।

चौक पुरतीं बेटियाँ आँगन गोबर लीप।।

*

दीवाली का अर्थ है,  मन में भरो उजास।

करिए शुभ की कामना, रखिए शुभ की आस।।

*

मन में हो सौहार्द यदि, लेंगे हिरदय जीत।

प्रेम भाव से भेंटिए, शत्रु बनेंगे मीत।।

*

जगमग होती हर गली, फैल रहा आलोक।

करिए ऐसी कामना, मिटें हृदय के शोक।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #६८ – गीत – गोरी ने शृंगार किया… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गोरी ने शृंगार किया…।

? रचना संसार # ६८ – गीत – गोरी ने शृंगार किया…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

मेघों का संदेशा आया,

गोरी ने शृंगार किया ।

वसुंधरा भी हर्षित पुलकित ,

प्राणों का संचार किया।।

*

लगी झड़ी सावन की ऐसी

दिशा-दिशा मुस्कायी है।

सप्त सुरों ने छेड़ी सरगम,

मनहर प्रियता लायी है।

महके-चहके वातायन ने

 मेघों का सत्कार किया।

*

मेघों का संदेशा आया,

गोरी ने शृंगार किया ।।

**

शीतल- शीतल बौछारों से,

कंचन-सा ये तन सारा ।

पाकर सोंधी गंध पवन की,

हृदय चपल मेरा हारा।।

कनक भोर है लाल शर्म से,

भँवरों ने गुंजार किया ।

*

मेघों का संदेशा आया,

गोरी ने शृंगार किया।।

**

प्रेम-ज्वार सागर में आया

पर पंछी ने फैलाए।

पाकर छुअन नेह की तेरे,

मृगनयनी भी इठलाए।

यौवन मद में डूबे मन का

बूँदों ने उद्धार किया।

*

मेघों का संदेशा आया ,

गोरी ने शृंगार किया।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२७८ ☆ संतोष के दोहे… दीवाली ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – संतोष के दोहे… दीवाली… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

 ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २७८ ☆

☆ संतोष के दोहे… दीवाली ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

अंतस दीपक जब जले, हो मन में उजियार

रखिये दीपक देहरी, रोशन हों घर द्वार

*

धर्म-कर्म ही बढ़ाता, अंतस का आलोक

यही लगाता है सदा, बुरे कर्म पर रोक

*

अंधकार की आदतें, रोकें सदा उजास

सूरज की पहली किरण, करतीं तम का नाश

*

सामाजिक सौहार्द्र में, रहे प्यार सहकार

सच्चे मानव धरम का, एक यही उपहार

*

लिए वर्तिका प्रेम की, दीप देहरी द्वार

दीवाली में हो रही, खुशियों की बौछार

*

धरती-सूरज– आसमाँ, सबका अपना मोल

इनके ये उपकार सब, होते हैं अनमोल

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २६८ – जननी घराची…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २६८  – विजय साहित्य ?

☆ जननी घराची…! ☆

(वृत्ताचे नाव – दिंडी, वृत्त प्रकार – मात्रावृत्त, वृत्त मात्रा संख्या – १९, मात्रांची विभागणी – ९ + १०)

☆

चार शब्दांची, मिळे साथ जेव्हा

शोध कवितेचा,लागलाय तेव्हा.

छंदात पाया, खणविला कवीने

वृत्तांत तिजला,बसविले खुबीने. १

*

गणांच्या समुहा, नवे रूप आले

छंदात रमता, स्वयें संत झाले

काव्यात रमता,पदी पंत आले

वाद्यात रमले,आणि तंत झाले. २

*

जनांची कविता जनी बोलताना

रसिकांस ठेवी हृदी नांदताना

सौंदर्य आले, कवींच्या घराला

अर्थात रमली,गृही शब्दबाला. ३

*

ओवीत आली, घरातील माया

लागली कविता,घरे गाजवाया

कधी जोजविले, मुला नादवीले

भुपाळीमधुनी,घरा जागवीले.४

*

गीतात आली,घरंदाज नारी

जीच्या दर्शनी,घराला उभारी

अशी‌ ही कविता,नवे नाम घेते

नव्याने कविता,‌ नवे धाम देते.५

*

नाना प्रकारे, घरे जोडताना

वैश्विक झाली, मने वाचताना

रमे कल्पनेत, तिथे मुक्त झाली

बंधाविना ती,जगण्यासी आली.६

*

कविताच आहे,मने जोडणारी

जननी घराची, घरे बांधणारी

शोधात जाता,घरांच्या तिच्या रे

कविता मनाच्या,तळाशी पहा रे.७

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६१ ☆ कार्तिक मास में तुलसी पूजन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “कार्तिक मास में तुलसी पूजन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६१ – कार्तिक मास में तुलसी पूजन… ☆

(आध्यात्मिक, पर्यावरणीय एवं सांस्कृतिक चेतना)

कार्तिक मास और तुलसी पूजन का धार्मिक महत्व है। यह मास भगवान विष्णु के जागरण देव उठनी एकादशी को समर्पित है। भक्त पूरे महीने पवित्र नदी में प्रातः स्नान करके कृष्ण जी व तुलसी की पूजा, दीपदान करते हैं। इस महीने में तुलसी माता का विशेष पूजन करने से विष्णु भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

तुलसी विवाह (देवउठनी एकादशी) पर तुलसी का पूजन और भगवान शालिग्राम से विवाह कराया जाता है। यह धर्म, परिवारिक समृद्धि और जीवन में मंगल का प्रतीक माना जाता है। तुलसी माता को लक्ष्मी का अवतार कहा गया है, इसलिए इस मास में उनका पूजन सुख, सौभाग्यवर्द्धक होता है ।

छप्पन भोग छत्तीसों  व्यंजन बिन तुलसी प्रभु एक न मानी…

तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु भोजन स्वीकार नहीं करते हैं। इसकी टहनियों से  माला, इसकी पत्तियों को जल में डालकर  उपयोग किया जाता है। तुलसी का पौधा सात्त्विकता का प्रतीक है। इसके समीप ध्यान करने से मन में एकाग्रता और शांति का अनुभव होता है।

तुलसी पौधा वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है। इसकी खास सुगंध घर और आस-पास के वातावरण कीटाणु रहित करती है। तुलसी लगाने और पूजन की परंपरा हमारे प्रकृति संरक्षण के वैदिक ज्ञान को दर्शाती है। यह केवल आस्था नहीं, पर्यावरणीय संतुलन का केंद्र भी है। तुलसी विवाह में गन्ने का मंडप, हल्दी की पूजा, जैसे अनुष्ठान धार्मिक सामंजस्य और जीवन के नैतिक मूल्यों का संदेश देते हैं।

अतः ये कहा जा सकता है कि कार्तिक मास में तुलसी पौधे की विशेष पूजा आध्यत्मिकता के साथ – साथ पर्यावरणीय व सांस्कृतिक चेतना को भी समृद्ध करती है ।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६७ – लघुकथा – चुप्पी का काला साया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – चुप्पी का काला साया।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६७ – लघुकथा  – चुप्पी का काला साया ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कल्पना कीजिए एक ऐसे शहर को जहां हवाएं भी फुसफुसाती हैं, वहां रहता था विशाल नामक एक साधारण क्लर्क, जो दफ्तर की फाइलों में छिपे भ्रष्टाचार की परतें उघाड़ता था, हर रिपोर्ट में वह लिखता ‘यह लूट है, जनता की कमर टूट रही है’, लेकिन एक शाम, जब सूरज डूब रहा था, अचानक काले कोट वाले लोग आए और उसे घसीट ले गए, आरोप था ‘गोपनीय दस्तावेजों का दुरुपयोग कर सिस्टम को बदनाम करना’, अब विशाल उस ठंडी कोठरी में है जहां दीवारें कान लगाकर सुनती हैं, बाहर उसके सहकर्मी चुपचाप काम कर रहे हैं, डर से कि कहीं उनकी बारी न आ जाए, जबकि ऊपर वाले अधिकारी पार्टियां मना रहे हैं, व्यंग्य की धार यह कि जो ईमानदारी की मशाल जलाता है वही अंधेरे में फेंक दिया जाता है, जैसे कोई पुराना कागज कूड़ेदान में, विशाल की यादें अब उसके मन में घूमती हैं, बचपन की वे गलियां जहां वह सपने बुनता था एक बेहतर दुनिया के, लेकिन अब वे सपने सलाखों से टकराकर टूट रहे हैं, उसकी बूढ़ी मां घर के कोने में बैठी रोती है, हर दरवाजे पर दस्तक देती है न्याय की गुहार लगाते, लेकिन मिलते हैं सिर्फ खाली वादे और ठंडे जवाब, सिस्टम की यह ठंडी क्रूरता ऐसी है कि इंसान को धीरे-धीरे खोखला कर देती है, जैसे कोई जहर जो नसों में घुलता जाता है, विशाल की डायरी में आखिरी पन्ना खाली है, शायद वह लिखना चाहता था ‘मैं हार नहीं मानूंगा’, लेकिन हाथ कांपते हैं, आंखें धुंधली, और एक रात जब चांद छिप जाता है, विशाल की सांसें थम जाती हैं, वह अंतिम पल जहां वह फुसफुसाता है ‘क्यों?’, वह करुण फुसफुसाहट पूरे शहर की चुप्पी बन जाती है, एक ऐसी पीड़ा जो सीने को चीरती हुई निकलती है। विशाल की मौत के बाद उसके सहकर्मी चुप रहते हैं, मां की आंखें सूख जाती हैं आंसुओं से, और सिस्टम चलता रहता है अपनी रफ्तार से, लेकिन वह खालीपन, वह साया कभी नहीं मिटता, बस फैलता जाता है दिलों में, एक दर्द जो चीखता नहीं बल्कि सिसकता है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७७ ☆ व्यंग्य – “बुरा जो देखन मैं चला” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७७ ☆

?  व्यंग्य – बुरा जो देखन मैं चला ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कबीर दास जी ने कहा था  ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।’  सीधा सा अर्थ है कि दुनिया में बुराई ढूंढने निकलोगे तो शायद ही मिले, लेकिन अगर अपने अंदर झांकोगे तो पाओगे कि सबसे बड़ी बुराई तो हमारे भीतर ही विद्यमान है। पर आज का मनुष्य इस सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं। वह दुनिया को कोसता है, व्यवस्था को गाली देता है, पर अपने अंदर झाँककर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ।

श्रीमान सच्चिदानंद जी की आईने की दुकान सूनी पड़ी थी, जबकि ठीक सामने, ‘मॉडर्न मुखौटा एम्पोरियम’ में भीड़ ही भीड़ है ।

एक दिन मैं सच्चिदानंद जी से मिलने पहुँचा। दुकान के अंदर अलग अलग आकार प्रकार के आईने लटके हुए थे, जिन पर धूल की हल्की परत  जम गई थी। सच्चिदानंद जी चश्मे के पीछे से किसी किताब का अध्ययन कर रहे थे, दुनिया की इस भीड़-भाड़ से कोसों दूर वे खुद से साक्षात्कार कर रहे थे।

मेरे पूछने पर कि व्यवसाय कैसा चल रहा है, उन्होंने  गहरी सांस ली और एक तीखी, परन्तु शांत मुस्कान के साथ बोले, “आजकल लोगों को अपना चेहरा देखने से डर लगता है। वे आईने में नहीं, सेल्फी तक ‘फिल्टर’ में देखने के आदी हो गए हैं।”

सामने वाली दुकान में तरह-तरह के मुखौटे सजे थे। ‘सेल्फी-रेडी स्माइल’ वाला मुखौटा सबसे ज्यादा बिक रहा था, जो हमेशा एक जैसी, बिना दिल की चमकती हुई हंसी दिखाता। फिर था ‘सोशल मीडिया संजीदगी’ का मुखौटा, जिसे पहनकर लोग दुनिया को ज्ञान बाँटते नज़र आते, भले ही अंदर से खोखले हों। ‘कार्यालयीन कर्मयोगी’ का मुखौटा, ‘शादी-पार्टी में रिश्तेदारी का भाव’ वाला मुखौटा, और तो और छोटे-बड़े का भेद भाव हटाता मुस्कुराता  मुखौटा भी खूब चलन में था। लोग बड़े चाव से अपने लिए वक्त जरूरत के हिसाब से उपयोग के लिए कई कई मुखौटे चुन रहे थे, उसे पहनते, देखते और संतुष्ट होकर ले जाते।

सच्चिदानंद जी ने बताया, “पहले लोग आते थे। आईने के सामने खड़े होते, अपने चेहरे पर पड़ रही झुर्रियों, आँखों के नीचे के काले घेरों, या फिर मन के भावों को निहारते। कभी शर्मिंदा होते, कभी खुश। अपने आप से मिलते,  अपनी कमियाँ सुधारने का संकल्प लेते। अब तो लोग अपनी सच्चाई से ही भाग रहे हैं। असली चेहरा तो शायद याद ही नहीं रहता।”

यह विसंगति सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं है। यह तो हमारे सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा बन गई है। हम सुबह उठते ही मुखौटे पहनना शुरू कर देते हैं। ऑफिस जाते वक्त ‘आदर्श कर्मचारी’ का मुखौटा, सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट लाइफ’ वाला मुखौटा, दोस्तों के बीच ‘हैप्पी-गो-लकी’ का मुखौटा। हमने इतने मुखौटे ओढ़ लिए हैं कि असली चेहरा कौन सा था, यह भूल रहे हैं। आईना दिखाने वाले को हम दुश्मन समझने लगते हैं, क्योंकि वह हमें हमारा वह रूप दिखा देता है, जिसे हमने कब का दफन कर दिया है।

खुद की सच्चाई से सामना सबसे डरावना काम है।

मुखौटों की इस दुकान ने एक नया धंधा खोल दिया है , ‘मुँह देखी बातों’ का। यहाँ हर मुखौटे के लिए एक प्री रिकॉर्डेड बातें भी  हैं। ‘कैसे हो?’ के जवाब में ‘बढ़िया’ की रिकॉर्डिंग, ‘काम कैसा चल रहा है?’ के उत्तर में’ऑल इज वेल’ की आवाज। असलियत चाहे जो भी हो, मुखौटे और उसकी आवाज़ हमेशा लगभग एक जैसी रहती है। लोग इसी बनावटीपन में खुशी महसूस करते हैं। सच्चाई का सामना करने के लिए साहस चाहिए वह गुमशुदा है।

सच्चिदानंद जी की दुकान सूनी है, लेकिन वे निराश नहीं हैं। उनका कहना है, “जिस दिन किसी  का मुखौटा टूटेगा, जब उसे अपनी असलियत का अहसास होगा, तो वह जरूर यहाँ आएगा। शायद तब वह खुद से मिल पाएगा।”

आज भले समाज का यह सामान्य चरित्र बन गया है कि हम दिखावे की इमारत खड़ी करने में मशगूल हैं, जबकि भीतर से हम  टूट रहे है। आईना हमें वास्तविकता से वाकिफ कर टूटने से बचा सकता है, लेकिन हमने तो मुखौटों के सहारे जीना सीख लिया है। सवाल यह है कि क्या हम कभी अपने वास्तविक चेहरे को देखने की हिम्मत जुटा पाएंगे? या फिर मुखौटों की यह भीड़ ही हमारी पहचान बनकर रह जाएगी? शायद, जब तक हम कबीर की उक्ति को अपने ऊपर लागू नहीं करेंगे, तब तक हम सच्चिदानंद जी की दुकान तक नहीं पहुँच पाएंगे। और तब तक, मुखौटे की दुकान की भीड़ बढ़ती ही जाएगी।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२४ – व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२४ ☆

☆ व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

(कभी आपको महसूस हुआ है डर का आतंकवाद)

जब भी मैं आतंकवाद का नाम सुनता हूँ, तब अंदर तक काँप जाता हूँ। मुझे अपने साथ हुए आतंकवादी हादसे याद आ जाते हैं। भले ही सेना के एक नायक ने कहा है कि यह ताजुब नहीं है कि तीन आतंकवादियों ने सीधे 26 लोगों को गोली से खून कर मार डाला! कारण स्पष्ट है कि हम कोई प्रतिकार नहीं करते हैं।

वे कहते हैं कि कई सैनिक लड़ाई में जब साफ टारगेट नहीं होते हैं तब वे प्रतिरोध के कारण 20-25 गोलियां खाने (लगने) के बावजूद जिंदा बच जाते हैं। उनकी यह बात याद आते ही मुझे मोहम्मद गौरी का आक्रमण याद आ जाता है। जिसने कुछ लोगों के बल पर हमारे मंदिरों को लूट लिया था। जबकि उसे देखने वाले यदि उसके सैनिकों पर कूद पड़ते तो सबके सब मारे जाते।

मगर तभी मुझे अपनी स्थिति का स्मरण हो आता है। भले ही सेनानायक ने उक्त बात कही हो, मगर मैं स्वयं भी इस आतंकवाद का शिकार रहा हूँ। चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मेरी मानसिकता ही ऐसी बनी हुई है। चाहूँ तो भी कुछ नहीं कर पाता हूँ। इस बात को मेरा लड़का अच्छी तरह जानता था।

उसे पता था कि पापा को आतंकवाद कब दिखाना है? इस कारण वह अपनी एक माँग को हमेशा तैयार रखना था। जब कभी घर में कोई मेहमान आते वह इस एक माँग को पूरी करने की जिद करने लगता। मैं मना करता तो वह उन मेहमानों के सामने धूल मिट्टी में लौटने लगता। इस कारण मेहमानों को आगे मैं उसके आतंकवाद से हमेशा त्रस्त हो जाता। फलस्वरुप उसकी माँग पूरी करना पड़ती।

मगर एक दिन मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद को अब चलने नहीं दूंगा। इससे मुक्त होकर रहूँगा। इसलिए अपने एक खास मित्र को मैंने मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया। लड़के ने फिर आतंकवाद मचाया। मगर, मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद से मुक्ति पाकर रहूँगा। इसलिए मैं जमीन पर बैठकर उसको मारने की कोशिश करने लगा। ताकि उसके गाल पर थप्पड़ लगा सकूं।

मगर, शायद उसने सेनानायक का उक्त कथन पढ़ रखा होगा। वह तीव्र गति से इधर-उधर लौटकर रोने लगा। मैं थप्पड़ लगाने के लिए गाल ढूंढ रहा था। मगर उसका शरीर व गाल स्थिर नहीं था। इस कारण गाल पर मारने की कोशिश करता तो थप्पड़ कभी पांव पर लग जाता, कभी हाथ पर। यह देखकर मैं समझ गया कि इस फुर्तीले लड़के को मैं गाल पर थप्पड़ नहीं मार सकता। तब यह सोचकर मैंने उसके पैर पकड़कर उसे धर दबोचा कि इसकी मरम्मत करके रहूँगा।

जैसे ही मैंने उसे घर दबोचा, मित्र आ पहुंचा। वह आतंकवादी पुत्र मेरे काबू में आ गया था। यह देखकर मेरा शेर दिल कलेजा फूलकर कूंपा हो गया। मगर, तभी मेरी पत्नी यानि शेरनी आ पहुंची। वह आते ही बोली कि यह क्या करते हो? मेरे लाडले को मार डालोगे क्या?

यह सुनते ही वह लाडला फिर आतंकवादी बन गया। यह देखकर मेरे हाथ पांव फूल गए। मैं समझ गया कि शेर, शेरनी के सामने, मोर, मोरनी के सामने, बड़े से बड़ा डाकू, अपनी पत्नी के सामने, क्यों नाचने लगता है? तब मुझे लगा कि काश मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों से कुछ गुर सीख पाता। ताकि इस आतंकवाद से मुक्त हो सकता।

तभी मुझे एक घटना याद आ गई। जब मुझे शिक्षक ने प्रेरित किया था। उन्होंने कहा था कि बोलने वाले की गुठली बिक जाती है, नहीं बोलने वालों के आम पड़े रह जाते हैं। इसलिए तुम्हें मंच पर बोलना पड़ेगा। तब मैं उनका आदेश पाकर रटा रटाया, पूरा भाषण याद करके मैं मंच पर चला गया। मगर जब हाल में हजारों लोगों की भीड़ देखी तो मुझ पर डर का आतंकवाद हावी हो गया। मेरी बोलती बंद हो गई। थरथर कांपने लगा। सब रटा रटाया दिमाग से गायब हो गया। मैं चुपचाप मंच से वापस भाग कर आ गया।

तब पहली बार मुझे पता चला की डर का आतंकवाद क्या होता है? यह हर एक व्यक्ति को सताता है। इसमें आपको भी सताया होता। इसका उपचार आपने भी ढूंढा होगा। यदि आपको इसका उपचार मिल जाए या मालूम हो जाए तो मुझे अवश्य बताइएगा। ताकि मैं भी अपने डर के आतंकवाद से मुक्त हो सकूं।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

03/05/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २६९ ☆ बाल गीत – जल्दी सोएँ,जल्दी जागें… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २६९ ☆ 

☆ बाल गीत – जल्दी सोएँ,जल्दी जागें… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’☆

☆

सुबह हो गई अब तो जागो,

बुलबुल,कोयल बोल रही हैं।

सूरज दादा की किरणें भी

अपनी आँखें खोल रही हैं।।

 *

प्यारे मुन्ना अब मत सोओ,

पक्षीगण का सुनो तराना।

योग कर रही बूढ़ी नानी,

और तुम्हारे प्यारे नाना।।

 *

समय कीमती लाभ उठाओ,

सदा भोर अनमोल रही है।।

सुबह हो गई अब तो जागो,

बुलबुल,कोयल बोल रही हैं।।

 *

कलियों ने भी आँखें खोलीं,

फूल बनीं सब मुस्काती हैं।

हवा झुलाए लतिकाओं को,

तन-मन को हर्षाती हैं।।

 *

जल्दी सोएँ,जल्दी जागें,

चिड़ियाँ मिलकर बोल रही हैं।

सुबह हो गई अब तो जागो,

बुलबुल,कोयल बोल रही हैं।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ७४ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ७४ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- अचानक झालेली ती डी. जी. एम् साहेबांची अनपेक्षित भेट ‘ सगळेच दिवस सारखे नसतात’ हे आपल्या सर्वांच्याच बाबतीतले सत्य त्यांच्याबाबतीत अतिशय बोचरेपणानं सत्यात उतरलेलं असल्याची भावना निर्माण करणारी ठरली, जी पुढे कितीतरी दिवस माझ्या मनात रेंगाळत राहिलेली होती!

माझ्या पुण्यातल्या त्या अल्पकाळातील असंख्य आठवणींपैकी अशा इतरही अनेक आठवणी मला नेमक्या वास्तव्याचं भान देत माझ्या विचारांना योग्य दिशा देणाऱ्या ठरलेल्या आहेत! )

या घटनेनंतर लगेचच आलेला एक अनुभव, माझी कसोटी पहाणारा आणि अखेर मला चटका लावून जाणाराही ठरला होता. त्या सगळ्याची सुरूवातही माझं तिथलं नवखेपण संपण्यापूर्वीच झाली होती. बँकिंग करिअरमधील त्यापूर्वीचा जवळजवळ तीस वर्षांचा माझा कार्यकाळ फिल्डलेव्हललाच व्यतित झालेला होता. अॅडमिनिस्ट्रेटीव्ह आॅफिसमधे आणि तेही या अधिकारपदावर काम करण्याचा हा माझा पहिलाच अनुभव. तोवर प्रत्येक प्रमोशननंतरची माझी पोस्टिंग्ज माझ्या नवीन ग्रेडनुसारच्या मोठ्या ब्रॅंचेस् ना ‘ब्रॅंच मॅनेजर’ म्हणून झालेली. प्रत्येकवेळी सर्वसाधारण कामाचं स्वरूप तेच असलं तरी प्रत्येक ब्रँचची पार्श्वभूमी, प्रश्न, ब्रॅंचमधील स्टाफ-मेंबर्स आणि ग्राहक यामधे जाणवण्याइतकं वैविध्य असे. कधी सुसह्य तर कधी प्रत्येक क्षणी परीक्षा पहाणारं! त्यामुळे त्या त्या ब्रँचमधील वातावरणात मिसळून, अत्यल्प काळात त्याचाच एक भाग बनून कोणतीही अवास्तव तडजोड न करता सर्वांचं समाधान होईल असे रिझल्ट्स् देणं म्हणजे तारेवरची कसरतच असे.

उजाडणारा प्रत्येक दिवस ‘आज पुढं काय वाढून ठेवलं असेल’ ही विवंचना घेऊनच उगवायचा. या पार्श्वभूमीवर आमचं ‘रिजनल आॅफिस’ जे आमच्या ब्रॅंचेसचे वरिष्ठ-कार्यालय असे त्यांचा सर्व ब्रॅंचेस वर असणारा अंकुश आणि त्यांचे अधिकार याचे फिल्डवर्कर्सच्या मनावर अर्थातच एक वेगळं दडपण असायचेच. सर्वसाधारणपणे सर्वच ब्रॅंचमॅनेजर्सना तिथे काम करणाऱ्या अधिकारीवर्गाबद्दल अर्थातच हेवाच वाटायचा. रिजनल आॅफिस किंवा त्यावरील झोनल किंवा सेंट्रल आॅफिसमधे काम करण्यासारखं सुख ब्रॅचलेव्हलला काम करण्यात कुठून असायला? ‘ असंच वाटे. ‘.. तिथे ना कधी दिवसभराची ग्राहकांची सततची वर्दळ, ना कॅशची जबाबदारी, ना कामांची दडपणं.. सगळं कसं शांत आणि सुरळीत.. ‘ असा आमचा समज दृढ झालेला.

या पार्श्वभूमीवर माझं झोनल ऑफिसला झालेलं हे पोस्टिंग म्हणजे माझ्यासाठी अॅडमिनिस्ट्रेटिव्ह ऑफिसला काम करायचा आयुष्यात प्रथमच मिळत असलेला नवा अनुभव होता. माझ्याप्रमाणेच आमचे डी. जी. एम् श्री. वखरे साहेब आणि त्यांच्या सोबतचे इतर दोन नवीन प्रमोटीज् यांचाही माझ्यासारखा हा पहिलाच अनुभव असल्याने आम्हा सर्वांच्याच पाट्या नवीन जबाबदारी स्वीकारताना कोऱ्याच होत्या!

या पार्श्वभूमीवर इथलं रुटीन सुरू झाल्यानंतरचा माझा अनुभव मनातला तो दृढ समज पुसून टाकणारा होता. इथं येऊन आठ एक दिवसच झाले असतील. त्यादिवशी मी मस्टरवर सही करून केबिनमधे जाताच ड्राॅवर उघडून डायरी घेऊन नेहमीप्रमाणे त्या दिवशी करायच्या कामांच्या नोंदींवरून नजर फिरवू लागलो तेवढ्यांत इंटरकॉमची रिंग वाजली. डी. जी. एम्. साहेबांनी मला तातडीने त्यांच्या केबिनमधे बोलावलेलं होतं.

मी जाण्यापूर्वीच माझ्याबरोबरचे इतर दोघे चीफ मॅनेजर्सही आधीच तिथे येऊन बसले होते. त्या तिघांचेही चेहरे कांहीसे गंभीर होते.

“मिस्टर लिमये, पी. अॅण्ड डी. डिपार्टमेंटमधील ‘लाॅंग पेंडिंग मॅटर्स’ ची पूर्ण माहिती घेऊन त्याची नोट तयार करून घ्या. सर्व पॅरामीटर्सवरील नुकत्याच संपलेल्या वर्षातला परफाॅर्मन्स आणि प्रेझेंट पोझिशन यांचं संपूर्ण स्टॅटॅस्टीक एकदा पाहून घ्या. वुई वुईल हॅव टू फेस अवर एम्. डी. पर्सनली. ही इज एक्पेक्टेट हिअर फाॅर हिज प्रीप्लॅन्ड व्हिजीट डे आफ्टर टूमारो. ” वखरेसाहेब घाईघाईने म्हणाले. मी नेमकं काय करायचंय हे समजलं होतं पण एवढ्या कमी वेळेत कसं करायचं याचा विचार करीत मी क्षणभर घुटमळलो.

“मिसेस् जोगळेकर तुम्हाला मदत करतील. शी नोज एव्हरीथिंग” माझी अडचण त्यांनी न सांगताच ओळखली होती.

मी माझ्या केबिनमधे येऊन मिसेस् जोगळेकरांना इंटरकाॅमवरून बोलावून घेण्याचा विचार करीत माझ्या केबिनचं दार ढकललं. पाहिलं तर मिसेस् जोगळेकर तिथे आधीच येऊन माझी वाट पहात बसलेल्या होत्या.

“गुड माॅर्निंग सर” म्हणत त्या अदबीने उठून उभ्या राहिल्या.

“गुड माॅर्निंग मॅडम.. कशा आहात? .. ” मी हसत विचारलं. त्या थोड्या रिलॅक्स झाल्या.

“आता एकतर्फी आक्रमण फेस करायची तयारी सुरू आहे. ” सोबत आणलेल्या दोन मोठ्या बॉक्स फाईल्सकडे निर्देश करीत कसनुसं हसत त्या म्हणाल्या.

त्या लगेचच होत असलेल्या एम्. डी. व्हिजीटबद्दलच बोलत होत्या हे उघडच होतं!

“एकतर्फी आकमण? ” मी न समजून विचारलं.

“तर काय? अशा मीटिंगची पंधरा पंधरा दिवस आधीपासून आम्ही तयारी करायचो. आता कसाबसा आजचा एकच दिवस हातात आहे. डिटेल डिस्कशनसाठी आपल्या सर्वांचा उद्याचा अख्खा दिवस डी. जी. एम् साहेबांच्या केबिनमध्ये जाईल. आजच सगळं निपटायला हवं. ” त्या म्हणाल्या.

“म्हणजे काय करायचं? “

“एम. डीं सोबत सर्व पोर्टफोलिओजचे तीन जी. एम् सुध्दा असतील. या नव्या एम्. डी. नीही गेल्याच आठवड्यात चार्ज घेतलाय. परवा होणारी ही व्हिजिट म्हणजे आधीच्या साहेबांमुळे या झोनची विस्कटलेली घडी तातडीने पुन्हा नीट बसवण्याची युद्धपातळीवर सुरू झालेली तयारी आहे. कारण पुढे लगेचच एम्. डी ऑफिसमधे सर्व झोनलहेडस् ची हाय लेव्हल मिटींग आहे. त्याची ही पूर्वतयारीच असणाराय. सर्वजण इथे येतील ते प्रत्येक डिपार्टमेंटमेंटसमधील त्रुटींची अख्खी कुंडली घेऊनच बघालच तुम्ही. मीटिंगमधील चर्चा म्हणजे फक्त एकतर्फी आक्रमण असणाराय नक्कीच. ते कसंबसं थोपवायचा प्रयत्न करायचा एवढंच. “

मिसेस् जोगळेकर पी अॅण्ड डी डिपार्टमेंटमधे गेल्या दोन वर्षांपासून अॅसिस्टंट मॅनेजर म्हणून कार्यरत होत्या. शिवाय ऑफिसर म्हणून त्यानी पुण्याच्या रिजनल ऑफिसमधेही पूर्वी काम केलेलं होते. त्यांच्या बोलण्यातून हा अनुभव जाणवतही होता. पण इथला काहीच अनुभव नसणाऱ्या माझ्यासाठी मात्र हाकेच्या अंतरावर असणारी ही एम्. डी. मिटिंग दडपण वाढवणाराच विषय होती!

मधले दोन दिवस आम्हा सर्वांनाच श्वास घ्यायलाही फुरसत नव्हती अशी अवस्था!

ती एम्. डी. व्हिजीट आणि प्रत्येक डिपार्टमेंटची तिथं झालेली चिरफाड हा अक्षरश: अंगावर काटा आणणारा अनुभव होता. सुरूवातीच्या इंट्राॅडक्शन सेशनमधे आम्ही तिन्ही चीफ मॅनेजर्सनी इथे नुकताच चार्ज घेतल्याचे समजल्यामुळे आम्ही तसे सेफ झोनमधे होतो. कोणत्याही गंभीर बाबींबद्दल सविस्तर उत्तरं द्यायची वेळ येईल तेव्हा आमच्या डिपार्टमेंटमधील मॅनेजर्सना आत बोलावून घेतले जायचे. इतर डिपार्टमेंटसच्या तुलनेत मिसेस जोगळेकरांनी पी. अॅण्ड डी. डिपार्टमेंटची आघाडी मात्र खरोखरच हिंमतीने आणि त्यांच्या अंगभूत हजरजबाबीपणामुळे चांगली सांभाळली. तरीही एका प्रसंगात मात्र त्या निरूत्तर होऊन अस्वस्थपणे उभ्या होत्या. निमित्त झालं ते पुण्यातीलच आमच्या एका ब्रॅंचमधल्या ग्राहकाची गेल्या तीन वर्षापासून निराकरण व झालेल्या एका गंभीर तक्रारीचं! ग्राहकाच्या तक्रारीचं निवारण न होता ते घोंगडं तीन तीन वर्षं भिजत पडलेलं पाहून एम्. डी. संतापले आणि वातावरण अचानक तापलं. चांगली ग्राहकसेवा हा बँकिंग इंडस्ट्रीचा पाया भक्कमच असायलाच हवा हे अतिशय कठोरपणे बजावून “सेंट्रल आॅफिसमधे लवकरच होणाऱ्या सर्व झोनलहेडसच्या मिटींगपूर्वी या लाॅंग पेंटिंग कस्टमर कम्प्लेंटचं कोणत्याही परिस्थितीत निराकरण व्हायलाच पाहिजे” असं त्यांनी निक्षून सांगितलं.

यासारखे इतर डिपार्टमेंटमधीलही बर्निंग इश्यूज्

होतेच. याबद्दलच्या सविस्तर चर्चा म्हणजे खरोखरच प्रतिकार करताच न येणारं फायरिंगच होतं आणि त्या त्या प्रत्येकवेळी स्वत:च्या त्या ए. सी. केबिनमधेही घामाघूम झालेल्या वखरेसाहेबांना खिशातून रुमाल काढून आपला घाम टिपत असताना पहाणं आम्हा सर्वांसाठीच अतिशय क्लेशकारक होतं!

जवळजवळ तीन तास चाललेली ती एम्. डी. मीटिंग म्हणजे इतकी वर्षे मनात रूजलेला ‘ब्रॅंचेसच्या तुलनेत ऍडमिनिस्ट्रेटीव ऑफिसमधे काम करणं किती सुखाचं असतं! ‘ हा भ्रम नाहीसा होत वास्तवाची लख्ख जाणिव करून द्यायला पुरेशी होती!

मीटिंग संपताच आम्ही बाहेर आलो तरी पुढे दीड दोन तास आत वखरे साहेबांसोबत सर्व जी. एम्. आणि एम् डी. साहेबांची हाय लेव्हल टॉक्ज् सुरू होतीच. त्याची सांगता होऊन सर्व टीम मुंबईला निघून जाताच आम्हा सर्व चीफ मॅनेजर्सना वखरेसाहेबांनी केबिनमधे बोलावून घेतलं.

मी आत जाण्यापूर्वीच जोगळेकर मॅडमनाही त्यांनी ‘कंप्लेंटस् फाईल’ घेऊन आत यायला सांगितलं होतं त्यामुळे माझ्यापाठोपाठ त्याही आत आल्या.

अर्थातच हा विषय इतक्या सविस्तरपणे माझ्यापुढे प्रथमच येत होता आणि त्यातलं गांभीर्य मलाही हादरवून सोडणारं होतं.

“तुम्ही या केसची फाईल वाचून पूर्ण समजून घ्या. कांहीही करून ही तक्रार समाधानकारक रित्या चार-सहा दिवसात मागे घेतली जायला हवी यासाठी काय करावं लागेल याचा विचार करून ठेवा. आपण संध्याकाळी इतर कामं आवरली की त्यावर चर्चा करू. ” वखरेसाहेब म्हणाले.

मिसेस् जोगळेकर माझ्या पाठोपाठ माझ्या केबिनमधे आल्या. “या तक्रारदाराला प्रत्यक्ष भेटणं, चर्चा करणं, आणि सामोपचाराने त्यातून मार्ग काढणं यासाठी करायचे सगळे प्रयत्न संपलेले आहेत सर ” असं म्हणत त्या संबंधीच्या पत्रव्यवहाराची बॉक्स फाईल माझ्यासमोर ठेवून त्या खाली मान घालून बसून राहिल्या. तो क्षण माझ्यासाठी अतिशय हतबल करणाराच होता!

यापूर्वीच्या अशा प्रत्येक हतबल क्षणी ‘त्या’ची आठवण व्हायचीच आणि अतिशय अकल्पितपणे तो मदतीला धावून आल्याचा अलौकिक अनुभव मला दिलासा देऊन जायचा. ‘यावेळीही आपण प्रामाणिक प्रयत्न करायचे. ‘तो’ आहेच. ‘ हा विचार मनात आला आणि मी सावरलो.

फाईल पूर्ण वाचून झाली तेव्हा मात्र मन अंधारून गेलं होतं. समोर कणभर प्रकाशही दिसेना. यापुढं येणारा प्रत्येक क्षण माझीच नव्हे तर ‘त्या’चीही कसोटी पहाणारा होता या विचाराने निर्माण केलेली अस्वस्थता मनातल्या अंधारावर तरंगत राहिली होती…!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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