हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७८ – आरोपित संस्कृति… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– आरोपित संस्कृति…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७८ — आरोपित संस्कृति — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

अपनी जन्मभूमि मॉरिशस की वह संस्कृति मुझे अच्छी तरह याद है। वह पहली संस्कृति थी जब हम से आज़ादी के लिए खून मांगा जाता था। वह संस्कृति इतनी लुभावनी थी कि वह हमारी धमनियों में रच – बस गई थी। आज़ादी की शर्त पर हम बेबाकी से खून देते थे। हमारे खून से होली खेलने की संस्कृति तो बाद में बनी है। इस विकृत संस्कृति के पक्षधर बहुत ताकतवर हैं। वे बगावत करने वालों को देश द्रोही तक कह लेते हैं।

 © श्री रामदेव धुरंधर

01 / 10 / 2025

 संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०७ – को जागर्ति? ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०७ ☆ को जागर्ति?… ?

इसी सप्ताह शरद पूर्णिमा सम्पन्न हुई। इसे कौमुदी पूर्णिमा अथवा कोजागरी के नाम से भी जाना जाता है।

अश्विन मास की पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा कहलाती है। शरद पूर्णिमा अर्थात द्वापर में रासरचैया द्वारा राधारानी एवं गोपिकाओं सहित महारास की रात्रि, जिसे देखकर आनंद विभोर चांद ने धरती पर अमृतवर्षा की थी।

चंद्रमा की कला की तरह घटता-बढ़ता-बदलता रहता है मनुष्य का मन भी। यही कारण है कि कहा गया, ‘चंद्रमा मनसो जात:।‘

यह समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी के प्रकट होने की रात्रि भी है। समुद्र को मथना कोई साधारण कार्य नहीं था। मदरांचल पर्वत की मथानी और नागराज वासुकि की रस्सी या नेती, कल्पनातीत है। सार यह कि लक्ष्मी के अर्जन के लिए कठोर परिश्रम के अलावा कोई विकल्प नहीं।

लोकमान्यता है कि कोजागरी की रात्रि लक्ष्मी जी धरती का विचरण करती हैं और पूछती हैं, ‘को जागर्ति?’.. कौन जग रहा है?..जगना याने ध्येयनिष्ठ और विवेकजनित कर्म।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का उवाच है,

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

                                               (2.69)

सब प्राणियोंके लिए जो रात्रि के समान है, उसमें स्थितप्रज्ञ संयमी जागता है और जिन विषयोंमें सब प्राणी जाग्रत होते हैं, वह मुनिके लिए रात्रि के समान है ।

सब प्राणियों के लिए रात क्या है? मद में चूर होकर अपने उद्गम को बिसराना,अपनी यात्रा के उद्देश्य को भूलना ही रात है। इस अंधेरी भूल-भुलैया में बिरले ही सजग होते हैं, जाग्रत होते हैं। वे निरंतर स्मरण रखते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, हर क्षण परमात्म तत्व को समर्पित करना ही लक्ष्य है। इन्हें ही स्थितप्रज्ञ कहा गया है।

साधारण प्राणियों का जागना क्या है? उनका जागना भोग और लोभ में लिप्त रहना है।  मुनियों के लिए दैहिकता कर्तव्य है। वह पर कर्तव्यपरायण तो होता है पर अति से अर्थात भोग और लोभ से दूर रहता है। साधारण प्राणियों का दिन, मुनियों की रात है।

अब प्रश्न उठता है कि सर्वसाधारण मनुष्य क्या सब त्यागकर मुनि हो जाए? इसके लिए मुनि शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। मुनि अर्थात मनन करनेवाला, मननशील। मननशील कोई भी हो सकता है। साधु-संत से लेकर साधारण गृहस्थ तक।

मनन से ही विवेक उत्पन्न होता है। दिवस एवं रात्रि की अवस्था में भेद देख पाने का नाम है विवेक। विवेक से जीवन में चेतना का प्रादुर्भाव होता है। फिर चेतना तो साक्षात ईश्वर है। ..और यह किसी संजय का नहीं स्वयं योगेश्वर का उवाच है।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।

इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥

                                            (10.22)

श्रीमद्भगवद्गीता में ही भगवान कहते हैं कि मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और प्राणियों की चेतना हूँ।

जिसने भीतर की चेतना को जगा लिया, वह शाश्वत जागृति के पथ पर चल पड़ा। ‘को जागर्ति’ के सर्वेक्षण में ऐसे साधक सदैव दिव्य स्थितप्रज्ञों की सूची में रखे गए।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५१ – दोहा का रंग आँसू के संग ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा का रंग आँसू के संग।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५१ ☆

☆ दोहा का रंग आँसू के संग ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

आँसू टँसुए अश्रु टिअर, अश्क विविध हैं नाम

नयन-नीर निरपेक्ष रह, दें सुख-दुःख पैगाम

*

भाषा अक्षर शब्द नत, चखा हार का स्वाद

कर न सके किंचित कभी, आँसू का अनुवाद

*

आह-वाह-परवाह से, आँसू रहता दूर

कर्म धर्म का मर्म है, कहे भाव-संतूर

*

घर दर आँगन परछियाँ, तेरी-मेरी भिन्न

साझा आँसू की फसल, करती हमें अभिन्न

*

आल्हा का आँसू छिपा, कजरी का दृष्टव्य

भजन-प्रार्थना कर हुआ, शांत सुखद भवितव्य

*

आँसू शोभा आँख की, रहे नयन की कोर

गिरे-बहे जब-तब न हो, ऐसी संध्या-भोर

*

मैं-तुम मिल जब हम हुए, आँसू खुश था खूब

जब बँट हम मैं-तुम हुए, गया शोक में डूब

*

आँसू ने हरदम रखा, खुद में दृढ़ विश्वास

सुख-दुःख दोहा-सोरठा, आँसू है अनुप्रास

*

ममता माया मोह में, आँसू करे निवास

क्षोभ उपेक्षा दर्द दुःख, कुछ पल मात्र प्रवास

*

आँसू के संसार से, मैल-मिलावट दूर

जो न बहा पाये ‘सलिल’, बदनसीब-बेनूर

*

इसे अगर काँटा चुभे, उसको होती पीर

आँसू इसकी आँख का, उसको करे अधीर

*

आँसू के सैलाब में, डूबा वह तैराक

नेह-नर्मदा का क़िया, जिसने दामन चाक

*

आँसू से अठखेलियाँ, करिए नहीं जनाब

तनिक बहाना पड़े तो, खो जाएगी आब

*

लोहे से कर सामना, दे पत्थर को फोड़

‘सलिल’ सूरमा देखकर, आँसू ले मुँह मोड़

*

बहे काल के गाल पर, आँसू बनकर कौन?

राधा मीरा द्रौपदी, मोहन सोचें मौन

*

धूप-छाँव का जब हुआ, आँसू को अभ्यास

सुख-दुःख प्रति समभाव है, एक त्रास-परिहास

*

सुख का रिश्ता है क्षणिक, दुःख का अप्रिय न चाह

आँसू का मुसकान सँग, रिश्ता दीर्घ-अथाह

*

तर्क न देखे भावना, बुद्धि करे अन्याय

न्याय संग सद्भावना, आँसू का अभिप्राय

*

मलहम बनकर घाव का, ठीक करे हर चोट

आँसू दिल का दर्द हर, दूर करे हर खोट

*

मन के प्रेशर कुकर में, बढ़ जाता जब दाब

आँसू सेफ्टी वाल्व बन, करता दूर दबाव

*

बहे न आँसू आँख से, रहे न दिल में आह

किसको किससे क्या पड़ी, कौन करे परवाह?

*

आँसू के दरबार में, इक सां शाह-फ़क़ीर

भेद-भाव होता नहीं, ख़ास न कहीं हक़ीर

*

धाँसू-फाँसू भी बहा, आँसू होते दीन

नहीं बहाती आँख से, आँसू किंचित मीन

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “सात ताले और चाबी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “सात ताले और चाबी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-अरी लड़की कहां हो?

-सात तालों में बंद।

-हैं? कौन से ताले?

-पहले ताला -मां की कोख पर। मुश्किल से तोड़ कर जीवन पाया।

-दूसरा?

-भाई के बीच प्यार का ताला। लड़का लाडला और लड़की जैसे कोई मजबूरी मां बाप की। परिवार की।

-तीसरा ताला?

-शिक्षा के द्वारों पर ताले मेरे लिए।

-आगे?

-मेरे रंगीन , खूबसूरत कपड़ों पर भी ताले। यह नहीं पहनोगी। वह नहीं पहनोगी। घराने घर की लड़कियों की तरह रहा करो। ऐसे कपड़े पहनती हैं लड़कियां?

-और आगे?

-समाज की निगाहों के पहरे। कैसी चलती है? कहां जाती है? क्यों ऐसा करती है? क्यों वैसा करती है?

-और?

-गाय की तरह धकेल कर शादी। मेरी पसंद पर ताले ही ताले। चुपचाप जहां कहा वहां शादी कर ले। और हमारा पीछा छोड़।

-और?

-पत्नी बन कर भी ताले ही ताले। यह नहीं करोगी। वह नहीं करोगी। मेरे पंखों और सपनों पर ताले। कोई उड़ान नहीं भर सकती। पाबंदी ही पाबंदी।

-अब हो कहां?

-सात तालों में बंद।

-ये ताले लगाये किसने?

-बताया तो। जिसका भी बस चला उसने लगा दिये।

-खोलेगा कौन?

-मैं ही खोलूंगी। और कौन?

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ५ – कविता – शुभ-चिंतक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “शुभ-चिंतक…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ५  ?

? कविता – शुभ-चिंतक ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

 कुछ ऐसे भी शुभचिंतक, जो मेरे शुभ पर चिंतित हैं

सचमुच शुभ की फ़िक्र करें, ऐसे मुट्ठी भर किंचित हैं

=2=

सियासत के रंगमंच पर हर दिन नये प्रपंच हुए

पहना मुखौटा हर चेहरा, नाटक हर दिन मंचित है

 =3=

तथ्यों की चादर जब-जब भी,सच के ऊपर डाली है

तब-तब झूठ के बस्ते में, इतिहास हमारे संचित हैं

=4=

मूल्यों की नींवों में अब स्वार्थों का पानी भरता है

और नीति-अनीति की खानों में,आँकड़े पूर्व सुनिश्चित हैं

=5=

जनमत का मोल चुकाया था, हमने कल भी आशा में

अब फिर बिकते हैं सपनों में, वादे जो सुंदर चित्रित हैं

=6=

‘राजेश‘ अब तक जो पीठ पर, छुरा भोंकते आये हैं

हम अपनों की ऐसी मेहरबानी से अभिसिंचित हैंll

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २६ – लघुकथा – शायद सच में मैं हमेशा सही नहीं होता हूँ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २६ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ शायद सच में मैं हमेशा सही नहीं होता हूँ ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

ए डिक्की के पापा सीढ़ी पर आइये !!….

यह शब्द एक बार नहीं दो बार मेरे कान में गूंजेl मुझे ऐसा लगा कि शायद फिर कोई नया काम मेरे  आज के मिशन में विघ्न डालने वाला हैl

अपनी आगे की बात शुरू करने से पहले  एक बात कह दूँ कि कहीं आप मेरे पत्नी के द्वारा बोले गए इस संबोधन का मजाक  उस सिंगिंग टीवी सीरियल के महान एंकरों की तरह  न बना दें जिसमे उन लोगों उस एक महिला प्रतिभागी का हँसते मजाक उड़ा दे जो गोद में बच्चों को लिए हुए गाना गाने आई थी और उसने गॉड के बच्चे को अपने पति को स्टेज पर बुलाने के लिए सम्बोधन स्वरूप में कहा कि ए फलां के पापा..! आइये

हालांकि उन एंकरों ने उसे महिला को शो के दौरान बहुत ही सम्मान दिया और उसको बहुत ही प्रोत्साहन दियाl

जी… हमारी संस्कृति और हमारे संस्कारों में पत्नी,पति को  नाम नहीं लेती थीl यह उनका अपने पति के प्रति विशेष आदर भाव  और जन्म जन्म के रिश्ते को निभाने वाला संकल्प होता थाl

तब आज की तरह से प्यार से नाम लेकर, थोड़ा सा दुलार कर, फिर एक दूसरे को लाचार कर, अंत में कोर्ट में लाकर खड़ा कर, तलाक के पेपर पर साइन नहीं किए जाते थेl

अब मैं पुनः वापस आता हूं आज अपने मूल विषय पर…

मेरी पत्नी ने ही नीचे से बोला था, –

ए डिक्की के पापा  !! सीढ़ी पर आइये !!

यह शब्द थे मेरे धर्मपत्नी के ही थेl अक्सर जब मैं अपने व्यक्तिगत कार्य या साहित्यिक कार्य में जुटा पड़ा होता हूं तो मेरी प्रिय पत्नी का मैसेज आता है या बोलती है कि फलां काम करना हैl उस समय मेरा मन चिड़चिड़ा उठता हैl दरअसल बात यह है कि हम दोनों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैl यद्यपि मेरी प्राथमिकता से उनकी  प्राथमिकता बड़ी होती हैl लेकिन मैं पति हूं या बच्चों का पिता हूं, यह मेरा धनात्मक पक्ष है, जो वास्तव में नही हैl इसके कारण में यह बताने की कोशिश करता हूं कि देखो मैं बड़ा काम कर रहा हूंl

वास्तव में सबसे बड़ा काम तो उन्होंने  आज से बीस – तीस बर्ष पूर्व किया था, जब मेरे छोटे-छोटे  बच्चों को पाल-पोस बड़ा किया, उन्हें स्कूल जाने के लिए टिफिन तैयार किया और अंत तक उनकी देख रेख कीl तब भी मैं अपने व्यक्तिगत कार्यों को प्राथमिकता मानता थाl सामाजिक एवं संगठन के कार्यों में रात दिन जुटा पड़ा रहता था और बोलना था कि तुम्हें क्या पता है मैं कितना व्यस्त हूंl

खैर मूल विषय पर आते हैं आज सुबह से मैं शाम की एक कार्यक्रम की तैयारी में अपने पुस्तकों के साथ लगा पड़ा या कहिए भिड़ा पड़ा था, मेरी प्राथमिकता कुछ और थीl मैं उठ खड़ा हुआ और जाकर जीने पर देखा तो मेरी पत्नी चाय का प्याला लेकर खड़ी थी और बोल रही थीl इतना देर हो गया कम से कम चाय तो पी लोl

आज मैंने महसूस किया कि शायद सच में मैं हमेशा सही नहीं होता हूँl

☆

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-७ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – ४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

17 जून 2022 को सुबह आठ बजे नेपाल के पर्यटन स्थल भक्तपुर और नगरकोट की यात्रा शुरू की। सामान्यतः देवनागरी और हिंदी का चोली दामन का संग होता है। परंतु नेपाल में ऐसा नहीं है। नेपालियों को देवनागरी से तो प्रेम है। उनकी गोरखाली या नेपाली भाषा लिखी तो देवनागरी में जाती है, परंतु स्कूलों में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती। इसलिए कुछ समय पहले तक हिंदू राष्ट्र रहे देश में हिंदी की हालत ठीक नहीं है। यह ठीक वैसा ही है कि बुंदेलखंड में देवनागरी लिपि में बुंदेली बोली न होकर भाषा होने का दावा करने लगे, या अवध में अवधि या पश्चिमी उत्तरप्रदेश में बृज बोली न होकर भाषा हो। भारतीयों को यह समझना चाहिए कि हिंदी एक महानदी है जिसमें अवधि, बृज, मैथिल, बुंदेली, मालवी सहित न जाने कितनी जानी-अनजानी बोलियाँ आकर मिलती हैं। भाषा के मामले में शुद्ध हिंदी या ख़ालिस उर्दू जैसी बात नहीं होती। देश, काल, परिस्थिति, विवरण, कथानक, पात्र के अनुसार उपयुक्त शब्द लेखन में सौंदर्य के साथ लेखक की शैली विकसित होती है। उदाहरण के लिए अंग्रेज़ी टेबल या उर्दू मेज़ ले सकते हैं। हिंदी में टेबल का उपयुक्त शब्द नहीं है। यदि वातावरण आधुनिक क़िस्म का है तो टेबल उपयुक्त होगा और मध्ययुग के माहौल में मेज़ ठीक बैठेगा। रोटी, चपाती, ब्रेड का कोई उपयुक्त हिंदी शब्द नहीं है। परिस्थिति अनुसार तीन शब्दों में से किसी का भी प्रयोग किया जा सकता है। अन्य भाषाओं से शब्द लेने से भाषा सशक्त होती है।    

नगरकोट

सुबह काठमांडू और भक्तपुर पार करके सीधे नगरकोट के पहाड़ों पर पहुँचे। पहुँचते-पहुँचते नौ बज चुके थे। नगरकोट काठमांडू उपत्यका में स्थित एक रमणीय ग्राम है। यह काठमांडू से 32 किमी पूरब में बागमती अंचल के भक्तपुर जिला में समुद्र तल से 2,195 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। भक्तपुर के सबसे अधिक दर्शनीय स्थलों में से एक है।

नगरकोट काठमांडू घाटी में हिमालय के सबसे व्यापक दृश्यों में से एक है। यहां से 13 में से नेपाल की 8 हिमालय पर्वतमाला दिखाई देती हैं। जिनमें अन्नपूर्णा रेंज, मानसलू रेंज, गणेश हील रेंज, लंगटांग रेंज, जुगल रेंज, रोलवलिंग रेंज, महालंगुर रेंज (एवरेस्ट रेंज) और नंबूर रेंज शामिल हैं, जहां से काठमांडू घाटी और शिवपुरी (नेपाल) नेशनल पार्क के दृश्य दिखाई देते हैं। प्रकृति प्रेमियों और बाहरी उत्साही लोगों के लिए, नगरकोट और उसके आसपास लंबी पैदल यात्रा के कई अवसर हैं। उनमें से, नगरकोट इको ट्रेल (नेचर वॉक) के साथ-साथ नगरकोट पैनोरमिक हाइकिंग ट्रेल सबसे लोकप्रिय हैं। नागरकोट में आप एवरेस्ट के नज़ारों के साथ पैराग्लाइडिंग भी कर सकते हैं। एक रणनीतिक स्थान पर स्थित, नगरकोट काठमांडू घाटी का एक प्राचीन किला था जिसे अन्य राज्यों की बाहरी गतिविधियों की निगरानी के लिए बनाया गया था। बाद में, यह एक अंतरराष्ट्रीय हिल स्टेशन के रूप में लोकप्रिय होने से पहले शाही परिवार के लिए ग्रीष्मकालीन निवास बन गया।

यहाँ से हिमालय पर सूर्योदय का सुहावना दृष्य देखते ही बनता है। माउण्ट एवरेस्ट और अन्य हिमाच्छादित चोटियाँ दिखतीं हैं। काठमांडू उपत्यका का विहंगम दृष्य भी देखा जा सकता है। जैन आवास से पोहा पैक कराकर चले थे। टैक्सी से उतर कर एक चाय की दुकान पर अड्डा जमा लोगों से बातचीत के बीच नाश्ता और चाय का मज़ा लिया। उसके बाद एक पहाड़ी पर विहंगम दृश्य दर्शन करने पहुँचे। पहाड़ी के बीच में बीस-पच्चीस सीढ़ीयों से चढ़कर ऊपर चढ़ना था। सीढ़ियाँ सीधी और ख़तरनाक दिख रही थीं। हिम्मत करके तीनों साथी चढ़ गये। ऊपर से चारों तरफ़ गगनचुंबी श्वेत शिखर और बादलों की अठखेलियाँ देखते बनती थी। उतरने में वांछित सावधानी से नीचे उतरे।

नेपाल राष्ट्र बनने के पूर्व चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरी इस घाटी में तीन राज्य स्थापित हुए थे- पाटन, भक्तपुर और काठमांडू। इन तीनों जगहों पर पुराने राजाओं के दरबार हाल हैं। काठमांडू से चलकर भक्तपुर पार करके समुद्र तल से क़रीबन आठ हज़ार फुट ऊँचाई पर नगरकोट बस्ती है। वहाँ से नीचे देखने पर नगरकोट, भक्तपुर और काठमांडू बस्तियाँ दिखती हैं। ठंड के दिनों में नगरकोट में बर्फ़ पड़ती है तब रोमांटिक नजारा होता है। एक दुकान पर रम की बोतल की क़ीमत पूछने पर 2,000/- रुपए बताई। जिसकी भारत में क़ीमत 200/- से अधिक नहीं होती। इसके बावजूद भी नई उम्र के युवा-युवतियाँ खुलकर मज़ा लेते दिखे।

मानवता का इतिहास आदि मानव से आखेटी मानव, कृषि युग, मध्ययुग का युद्ध काल, औद्योगिक क्रांति से होते हुए दुनिया उपभोगवाद युग में प्रवेश कर चुका है। लोग अच्छे से अच्छा रहना, पहनना, खाना-पीना चाहते हैं। उपभोग वस्तुओं के उत्पादन और सेवाओं में रोज़गार निर्माण से सभी अर्थ व्यवस्थाएँ परिचालित होने लगी हैं। कराधान का आधार भी उपभोक्ता हो गए हैं। इसीलिए माल और सेवा कर (GST) प्रमुख हो गया है। सौंदर्य बोध प्रमुख प्रवृत्ति बनकर उभरी है। हर आदमी-औरत सुंदर दिखना चाहते है। मंगोल नस्ल के लोगों के चेहरे सामने से चपटे और आँखें छोटी होती हैं। काठमांडू में ध्यान से देखने पर पुराने लोगों के चेहरे चपटे और ऊँचाई साढ़े पाँच फुट से अधिक नहीं मिलेगी। नई पीढ़ी के बच्चों के चेहरे आजुबाजू से चपटे और उनकी लम्बाई भी पुराने लोगों से अधिक ऊँची दिखाई देती है। प्रतीत होता है कि नवजात बच्चे का चेहरा मोहरा बदलने की क़वायद की जाने लगी है। जैसे उत्तर भारतीयों में नवजात बच्चे की नाक लम्बी नुकीली करने के लिए नवजात शिशु की नाक को हाथ से दबाया जाता है। भले ही बाद में बच्चा माँ बाप की नाक कटवाता रहे। परंतु ये पीली चमकदार त्वचा वाले लोग छोटी आँखों को बड़ी कैसे करेंगे।  

वहाँ एक बिहारी युवक प्लास्टिक के अंग्रेज़ी अक्षरों को काले सूत की डोरियों में गाँठ लगाकर सौ-सौ रुपयों में कलाई बैंड बना रहा था। बच्चों को फ़्रेंड्शिप बैंड हेतु उपयुक्त लगा। जवाहर जी ने उससे सौदेबाज़ी करके दो सौ के तीन तय कर लिए। बात करते-करते चार सौ में छै बैंड बनवाकर अगले पड़ाव भक्तपुर पहुँचने हेतु टैक्सी की तरफ़ चल दिये। टैक्सी चालक अच्छा था। हमेशा साथ रहा और कुछ न कुछ बताता रहा।

भक्तपुर

काठमांडू और भक्तपुर जुड़े शहर हैं। पिछली बार 1978 में जब यहाँ आए थे तब चारों तरफ़ सीढ़ीनुमा खेत दिखते थे। अब चारों तरफ़ मकान ही मकान दिखते हैं। खेती ग़ायब है। हर चीज़ के लिए भारत पर निर्भरता है। औद्योगिक चीजें चीन से आती हैं।

भक्तपुर नेपाल के सबसे अधिक देखे जाने वाले स्थलों में से एक है जो विदेशी और घरेलू दोनों आगंतुकों के बीच लोकप्रिय है। दरबार स्क्वायर (लयकी) है, जो भक्तपुर का पूर्व शाही महल परिसर है और इसमें पूर्व शाही महल और विभिन्न मंदिर हैं जो इसके आसपास के क्षेत्र में बनाए गए थे। हालाँकि, भक्तपुर के दरबार स्क्वायर को 1934 और 2015 के भूकंप दोनों से भारी क्षति हुई, लेकिन कई गिरे हुए स्मारकों का पुनर्निर्माण किया गया है। दरबार स्क्वायर में विभिन्न स्मारक हैं जैसे कि पचपन खिड़कियों वाला महल, सिंहध्वखा लयकी महल जिसमें राष्ट्रीय कला दीर्घा है, जो नेपाल के पहले संग्रहालय में से एक है, वत्सला देवी और सिद्धि लक्ष्मी का पत्थर का मंदिर है। भक्तपुर दरबार स्क्वायर के पूर्वी भाग में स्थित सिलु महादेव (जिसका अर्थ है “सिलू का शिव”) का मंदिर नेपाल में शिखर शैली की सबसे ऊंची इमारत है।

थंथु लयकी महल का निर्माण पहली बार 17 वीं शताब्दी के अंत में राजा जीतमित्र मल्ल द्वारा किया गया था और इसमें विभिन्न उद्यान, बालकनियाँ और पानी की नाली थी। इसने दरबार स्क्वायर के ऊपरी हिस्से में एक बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और इसे नेवाड़ी शब्द थंथु से थंथु लयकी कहा जाता है जिसका अर्थ है “ऊपरी भाग” और लयकी का अर्थ है “राजघरानों का स्थान”। यह महल रखरखाव और मरम्मत की कमी के कारण 1833 और 1934 के भूकंपों से नष्ट हो गया। आज, महल के आंगनों में से केवल एक, लोंहिती चौकोका, जिसमें सोने की टोंटी और शाही स्नानागार बचा है। जिस क्षेत्र में यह महल कभी खड़ा था, उसे विभिन्न प्रशासनिक भवनों में बदल दिया गया है। जितमित्र मल्ल, राजा जिसने सबसे पहले महल बनाया था, ने एक पत्थर के शिलालेख में थंथु लयकी महल के बारे में लिखा था: “इस महल (तंथु लयकी) को सावधानी से संरक्षित किया जाना चाहिए। मंत्री भगीरीत्मा के समय में बने इस महल से किसी का अहित नहीं करना चाहिए; आंगन, बाहरी और भीतरी भाग, उद्यान, बालकनी और साथ ही पानी की नाली को पारंपरिक नियमों के अनुसार बनाए रखा जाना चाहिए, इन्हें नए ढांचे के रूप में अलग तरीके से नहीं माना जाना चाहिए। शासन करने वाला राजा उनके रखरखाव और मरम्मत के लिए जिम्मेदार होगा; इस संबंध में सभी नियमों का पालन किया जाना है; यदि उनका पालन नहीं किया जाता है, तो व्यक्ति को पाँच महान अपराधों के लिए दी गई सजा भुगतनी पड़ती है।”

तौमधी स्क्वायर में न्यातापोला मंदिर है, जो राजा भूपतिंद्र मल्ल द्वारा बनवाया गया था। पांच मंजिला मंदिर है और शाही जोड़े की व्यक्तिगत देवता तांत्रिक देवी सिद्धि लक्ष्मी का मंदिर है। न्यातपोला की छाया में भैरव से जुड़ा तीन मंजिला मंदिर है जिसे पहले विश्व मल्ल द्वारा बनाया गया था और बाद में जगज्योति मल्ल द्वारा अपने वर्तमान स्वरूप में फिर से बनाया गया था। बेताला मंदिर और एक सुनहरी हिटी भी शामिल है। चौक के पास जगन्नाथ का शिखर मंदिर और लक्ष्मी नरसिंह का छत वाला मंदिर भी स्थापित है। तचपाल टोल में स्थित दत्तात्रेय सुकारे शहर के सबसे पुराने स्मारकों में से एक है।

दत्तात्रेय स्क्वायर में तीन मंजिला शिवालय शैली का दत्तात्रेय मंदिर है, जो गुरु दत्तात्रेय को समर्पित है, जो तीन प्रमुख हिंदू देवताओं का संयुक्त रूप है, (ब्रह्मा निर्माता, विष्णु संरक्षक, और महेश्वर विध्वंसक), के दौरान बनाया गया था। दत्तात्रेय मंदिर के निर्माण की सही तारीख अभी भी अस्पष्ट है। प्रचलित मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण एक पेड़ की लकड़ी के एक टुकड़े से किया गया था। राजा यक्ष मल्ल का शासन काल (1428 ई. – 1482 ई.) और उनकी मृत्यु के बाद ही 1486 ई. के आसपास जनता के लिए खोल दिया गया।

प्रवेश द्वार पर जयपुत पहलवानों (स्थानीय रूप से कुतुवो के रूप में जाना जाता है), जयमाला और पाटा (न्यातापोला मंदिर में), एक “चक्र”, और गरुड़ की एक सोने की धातु की मूर्ति, एक पक्षी जैसी देवत्व की दो बड़ी मूर्तियां हैं। मंदिर के चारों ओर कामुक सजावट वाले लकड़ी के नक्काशीदार पैनल हैं। बाद में 1548 ई. में राजा विश्व मल्ल द्वारा इसकी मरम्मत और जीर्णोद्धार किया गया। दत्तात्रेय स्क्वायर पुजारी मठ का भी घर है जो मल्ल राजाओं का पूर्व महल था और बाद में मंदिर के पुजारियों और तिब्बती व्यापारियों के लिए बसावट के रूप में कार्य करता था। आज पुजारी मठ को वुडक्राफ्ट और कांस्य संग्रहालय में बदल दिया गया है। पुजारी मठ ज्यादातर अपनी कलात्मक खिड़कियों के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें लोकप्रिय म्हायखा झा (लिट। मयूर खिड़की) शामिल है। दत्तात्रेय मंदिर के सामने भीमसेना मंदिर है जो भीम को समर्पित है: वाणिज्य के नेवाड़ी देवता, जो अक्सर पांडव भाई भीमसेना के साथ भ्रमित होते हैं।

चंगु नारायण मंदिर काठमांडू घाटी में चंगुनारायण गांव के पास घाटी के पूर्वी छोर पर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यह भक्तपुर के उत्तर में 6 किलोमीटर (3.7 मील) और काठमांडू से 22 किलोमीटर (14 मील) दूर है। मंदिर घाटी के सबसे पुराने हिंदू मंदिरों में से एक है और माना जाता है कि इसका निर्माण पहली बार चौथी शताब्दी में किया गया था। चंगु नारायण विष्णु का नाम है, और मंदिर उन्हें समर्पित है। मंदिर के आसपास के क्षेत्र में खोजा गया एक पत्थर का स्लैब 5 वीं शताब्दी का है और यह नेपाल में खोजा गया सबसे पुराना पत्थर का शिलालेख है। पुराने मंदिर को तोड़े जाने के बाद इसका पुनर्निर्माण किया गया था। कई पत्थर की मूर्तियां लिच्छवी काल की हैं। चांगु नारायण मंदिर यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध है। मंदिर एक दो छत वाली संरचना है जहां भगवान विष्णु की मूर्ति नारायण के रूप में उनके अवतार में है। मंदिर में बहु-सशस्त्र तांत्रिक देवताओं को दर्शाने वाली जटिल छतें हैं। गरुड़ (5 वीं शताब्दी तक की तारीख) की एक घुटने टेकने वाली छवि, विष्णु के वाहन या वाहन के गले में एक सांप के साथ मंदिर का सामना करना पड़ता है। सोने का पानी चढ़ा हुआ दरवाजा मंदिर की रखवाली करने वाले पत्थर के शेरों को दर्शाता है। सोने का पानी चढ़ा खिड़कियाँ भी दरवाजे को फहराती हैं। प्रवेश द्वार पर दो खंभों पर विष्णु के प्रतीक शंख और चक्र को उकेरा गया है। गैर हिंदुओं को मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं है।

कैलाशनाथ महादेव दुनिया की सबसे ऊंची भगवान शिव की मूर्ति है। इस प्रतिमा की ऊंचाई 143 फीट है और यह नेपाल के काठमांडू से 20 किमी दूर स्थित है। प्रतिमा निर्माण कार्य 2004 में शुरू हुआ था और 2012 में पूरा हुआ था। प्रतिमा का उद्घाटन 21 जून 2012 को हुआ था। यह प्रतिमा ऊंचाई के हिसाब से दुनिया में सभी मूर्तियों की सूची में 32वें स्थान पर है। इसे कॉपर, सीमेंट, जिंक और स्टील से बनाया गया है। इस विशाल संरचना को संभव बनाने के लिए भारत से कई पेशेवर कार्यकर्ता और मूर्ति निर्माता थे।

देवानंद की “हरे रामा हरे कृष्णा” फ़िल्म की अधिकांश सूटिंग भक्तपुर में हुई थी। जिसमें उनकी बहन की भूमिका में ज़ीनत अमान हिप्पियों की संगत में चिलम सुट्टा खीजतीं दिखाई देती है, और देवानंद भक्तपुर दरबार मंदिरों के बीच नायिका मुमताज़ के साथ “काँची रे काँची रे प्रीत मेरी साँची” गाते नज़र आते हैं।  वहीं दरबार के बाहर दोपहर के भोजन में पराठे दही का सेवन किया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १७८ ☆ गीत – ।। कदापि करी गई भलाई व्यर्थ नहीं जाती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १७८ ☆

☆ गीत ।। कदापि करी गई भलाई व्यर्थ नहीं जाती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

कदापि  करी  गई  भलाई  व्यर्थ  नहीं  जाती है।

सबके लिए सरोकार ही जीवन में अर्थ लाती है।।

***

आपके मन वचन कर्म से किसी का अहित  न  हो।

वह जीवन ही नहीं कि आपके हाथ से  हित न  हो।।

व्यक्ति की करी गई मेहनत जरूर सामर्थ्य लाती है।

कदापि  करी    गई  भलाई  व्यर्थ  नहीं  जाती    है।।

***

पतझड़   के   बाद भी जरूर फिर से बसंत आता है।

आपका सौहार्द सहयोग ही दुखों का अंत लाता है।।

मानवता  के  विरुद्ध  हर एक बात अनर्थ लाती है।

कदापि  करी  गई  भलाई  व्यर्थ  नहीं  जाती     है।।

*****

मत आप हमेशा उलझे रहो हर एक छोटी लड़ाई में।

आपका सरोकर रहे  हमेशा  ही  सबकी भलाई में।।

यह  गुण  स्वार्थ नहीं  भावना निस्वार्थ  ही  लाती है।

कदापि   करी  गई  भलाई  व्यर्थ  नहीं   जाती  है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेलीईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈ 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४२ ☆ कविता – निभानी सब को अपनी जिम्मेदारी चाहिये… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – निभानी सब को अपनी जिम्मेदारी चाहिये…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४२ ☆

☆ निभानी सब को अपनी जिम्मेदारी चाहिये… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

 स्वार्थ की अब राजनीति है,  स्वार्थ मय व्यवहार है

सत्ता हथि‌याने को बढ़ा है हर जगह तकरार है।

* 

समस्यायें हल न होती आये दिन नित बढ रहीं

राजनीति में लेन-देन का अब गरम बाजार है।।

 *

समझ हुई कम,  दिख रहा है, बुद्धि भी बीमार है

हौसले लेकिन बड़े हैं, पाने को अधिकार है।

 *

दल के प्रति निष्ठा घटी है दल में भी गुट बन गये-

लड़खड़ाती रहती इससे आये दिन सरकार है।

 *

भूल गये उनको जिन्होंने देश के हित जान दी

कल की पीढी के हित लगाई बाजी अपने प्राण की।

 *

हँसते फाँसी पे फूले त्याग सब कुछ देशहित

गजब की निष्ठा थी जिनको देश के सम्मान की

 *

दूरदर्शी अव रहे,  कम दृष्टि ओछी हो गई

स्वार्थ में डूबी समझ ज्यों अचानक खो गई

 *

बढ़ती जाती द्वेष-दुर्भावना  की मन में भावना

जाने क्यों सद्‌भावना की ऐसी दुर्गति हो गई

 *

राजनीति को सूझ-बूझ  समझदारी चाहिये

और सब जन सेवकों को खबरदारी चाहिये ।

 *

देश ने तो सब को,   सब कुछ चाहिये जो सब दिया

निभाना अब सब को अपनी जिम्मेदारी चाहिये

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “यशवंत होण्यासाठी चाणक्यनीती” – लेखक : डॉ. धनंजय मंडलिक ☆ परिचय – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली☆

श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “यशवंत होण्यासाठी चाणक्यनीती” – लेखक : डॉ. धनंजय मंडलिक ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

पुस्तक : यशवंत होण्यासाठी चाणक्यनीती 

(जीवनाच्या प्रत्येक क्षेत्रात प्रगती आणि यशासाठी चाणक्यांची ७५ सूत्रे)

लेखक : डॉ. धनंजय मंडलिक

पृष्ठे : २४०

मूल्य: २५०₹ 

“यशवंत होण्यासाठी चाणक्यनीती” हे पुस्तक वैयक्तिक तसेच व्यावसायिक जीवनात यश मिळवण्यासाठी एक प्रभावी मार्गदर्शक आहे.

चाणक्यनीतीतील तत्त्वांचा योग्य वापर करून प्रत्येक व्यक्ती स्वतःचे ध्येय निश्चित करून त्याची पूर्तता साध्य करू शकते. चाणक्यांचे विचार अवलंबल्यास कोणत्याही क्षेत्रात यशस्वी होता येते. त्यामुळे हे पुस्तक प्रत्येकासाठी प्रेरणादायी ठरते आणि यशस्वी जीवनाचा मार्ग दाखवते.

या पुस्तकात यश मिळवण्यासाठी चाणक्यांच्या ठरावीक सूत्रांचे चार महत्त्वाचे प्रकरणांत विभाजन केलेले आहे:

१. यशस्वी होण्यासाठी २१ प्रभावी चाणक्यनीती

या प्रकरणात चाणक्यांनी सांगितलेली २१ महत्त्वपूर्ण तत्त्वे दिली आहेत. यात नैतिकता, योग्य वर्तन, वेळेचे नियोजन आणि समस्यांवर मात करण्यासाठी आवश्यक धोरणांचा सखोल ऊहापोह आहे.

२. यशस्वी होण्यासाठी चाणक्यांचे १५ गुण

या प्रकरणात आत्मविश्वास, संयम, धैर्य, दूरदृष्टी आणि निर्णयक्षमता यांसारख्या १५ गुणांचे महत्त्व स्पष्ट केले आहे. हे गुण व्यक्तीला कठीण प्रसंगी मार्ग शोधण्याची ताकद देतात.

३. ध्येय निश्चितीचे महत्त्व

ध्येय निश्चिती आणि नियोजनाविना यश मिळू शकत नाही. या प्रकरणात चाणक्यांनी ध्येय ठरवण्याचे आणि त्यासाठी सातत्याने प्रयत्न करण्याचे महत्त्व अधोरेखित केले आहे.

४. चाणक्यांचे कानमंत्र

या भागात जीवनातील आव्हानांना सामोरे जाण्यासाठी प्रेरणादायी कानमंत्र दिले आहेत. गुप्तता राखणे, योग्य वेळी निर्णय घेणे आणि योग्य सहकारी निवडणे याविषयी मार्गदर्शन केलेले आहे.

–

ही चारही प्रकरणे चाणक्यनीतीचा सारांश असून यशस्वी जीवनासाठी आवश्यक दिशा दाखवतात. आचार्य चाणक्यांनी सुमारे २५०० वर्षांपूर्वी दिलेली सूत्रे आजही तितकीच उपयुक्त आहेत आणि प्रत्येक पिढीला मार्गदर्शन करतात.

…. ध्येय निश्चिती आणि यशप्राप्तीसाठी “यशवंत होण्यासाठी चाणक्यनीती” हे पुस्तक नक्कीच उपयुक्त ठरेल.

परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

पालघर 

मो. 9619800030

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares