श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण गीत  “हो सके तो स्वार्थ…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९८ – गीत –  हो सके तो स्वार्थ… ☆

हो सके तो स्वार्थ, नफरत को जलाओ ।

फूल-सी मुस्कान, अधरों पर सजाओ ।।

*

राह में आती मुसीबत सर्वदा है,

पार करना यह हमारी भी अदा है।

*

लोग हों निर्भीक पथ ऐसा बनाओ।

फूल-सी मुस्कान अधरों पर सजाओ।।

*

जिंदगी कितने दुखों में जी रही है।

और दुख के घूँट कितने पी रही है।

*

दुश्मनों की आँधियों से लड़ रहे जो।

हो सके तो हाथ कुछ अपने बढ़ाओ,

*

खिंचतीं जातीं हैं दीवारें देश में ,

खुद गईं हैं खाइयाँ अब परिवेश में।

*

भारती-संस्कृति को अपनी न भुलाओ,

जो भरा है द्वेष दिल में वह हटाओ।

*

तिमिर छाया है घना, चहुँ ओर देखो,

मौत के पंजे फँसी है भोर देखो।

*

इस घड़ी में कुछ नया करके दिखाओ,

फूल-सी मुस्कान अधरों में सजाओ।।

*

जो समय के साथ आगे नित बढ़ेगा,

मंजिलों की सीढ़ियाँ निर्भय चढ़ेगा।

*

प्रगति के हर द्वार को मिलकर बनाओ,

फूल-सी मुस्कान अधरों पर सजाओ।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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