हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१ ✍ 

खेत,

खलिहान

नदी,

पर्वत

नगर, गाँव और आदमी

सब बेहाल हैं

सबके एक से हाल हैं

सबकी मुट्ठियों में

जलते हुए सवाल हैं।

सवालों का न तन होता है

न मन होता है

सवालों की उम्र नहीं

केवल वजन होता है।

और/ ये वजन

घन की तरह घिरता है

गिरता है

सपना बिखरता है

मैं/

‘तुम/ये/ वे

सब बैठे हैं- सूखी नदियों के किनारे

हमारे

प्यारे घर

बाढ़ में बह गये हैं

हमारे पाससिर्फ जहरीली रेत के घरौंदे रह गये है।

बाढ़/नदी की होती

तो सब सह लेते

किसी तरह रह लेते

लेकिन…

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८४ “बाप कवितायें लिखता है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “बाप कवितायें लिखता है...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बाप कवितायें लिखता है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

बेटे को अफसोस

“बाप कवितायें लिखता है।”

है अधेड़ पर अधिक आयु का

बेशक दिखता है ॥

 

चुँधियाये चश्में से सबको

ताका करता है ।

तम्बाकू को मसल हथेली

फाँका करता है ।

 

अपभ्रंश है बचा आदमी

की प्रजाति का –

डारवीन के परिकल्पन को

जाँचा करता है ॥

 

जमा हुआ रहता

चबूतरे पर हो स्थायी ।

उसको कोई सीख किसीकी

अब तक ना भायी ।

 

कोई बात सहन करने की

मगर नहीं क्षमता –

माँ के कुछ भी कहने पर

वह  भड़का करता है ॥

 

कोई महिला दरवाजे से

अगर निकल जाये ।

पता नहीं कब उनकी

भीषण त्योरी चढ़  जाये ।

 

फिर तो बस अध्याय

सजग आलोचन का लेकर ।

अपने भाषण में वह उसका

पालन करता है ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16 – 5 – 2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६ – आलेख – “चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक प्रेरणास्पद आलेख “चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६ ☆

☆ आलेख ☆ चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

☆

86 वर्ष की उम्र में भी कर रहे रोगियों की सेवा

ऊंचा कद, गौर वर्ण, इकहरे बदन वाले आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी डॉ. रविशंकर मिश्रा याने डॉ. आर. एस. मिश्रा के जीवन का लक्ष्य ही पीड़ितों का उपचार कर उन्हें रोगमुक्त जीवन प्रदान करना है। मित एवं मधुर भाषी डॉ. मिश्रा गंभीर और शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं। वे परिचतों, अपरिचितों अथवा इलाज कराने आये रोगियों की पूरी बात ध्यान से सुनते हैं और हल्की मुस्कुराहट के साथ ऐसा उत्तर देते हैं कि लोग प्रसन्न और तनाव मुक्त हो जाते हैं। रोगी का आधा इलाज तो उनकी विनम्रता और मीठी वाणी ही कर देती है। वे कहते हैं कि चिकित्सक की वाणी और व्यवहार भी रोगी की प्रतिरोधक क्षमता घटाने – बढ़ने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।

25 सितम्बर 1941 को देवरी, सागर में जन्में डॉ. मिश्रा 86 वर्ष की उम्र में भी अपने माता – पिता को दिया पीड़ितों की सेवा का वचन निभा रहे हैं। प्रारम्भिक शिक्षा देवरी से पूर्ण करने के उपरांत मिश्रा जी ने एम जी एम मेडिकल कॉलेज इंदौर से एम बी बी एस किया और 14 अप्रैल 1968 को शासकीय चिकित्सक के रूप में छतरपुर से सेवा प्रारंभ की। इसके उपरांत रीवा से उनकी सेवाएं आर्मी को स्थानांतरित कर दी गईं। उन्होंने 1971 में बांग्लादेश के आजादी के युद्ध में सीमा पर भारतीय सेना के घायल जवानों का मनोयोग से उपचार किया। आपने पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा पर भी लंबे समय तक सैनिकों का उपचार किया तदोपरांत पुनः जबलपुर स्थानांतरित हुए फिर दमोह, जबलपुर कोतवाली डिस्पेंसरी, मेडिकल कॉलेज अस्पताल एवं पनागर में सेवाएं देते हुए 2003 में सेवानिवृत्त हुए।

चिकित्सक के रूप में वे जहां – जहां पदस्थ रहे उनके संपर्क में आए लोग आज भी उन्हें स्नेह और श्रद्धा से याद करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवाभावी डॉ. मिश्रा ने घर में आराम करने के बजाए अंतिम सांस तक पीड़ितों की सेवा का संकल्प लिया और जबलपुर स्थित महाकौशल के सुप्रसिद्ध चिकित्सालय नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं देना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है।

जब उनसे प्रश्न किया गया कि – “आर्मी में सैनिकों की चिकित्सा के दौरान आपने क्या विशेष अनुभव प्राप्त किया?” तब इस प्रश्न के प्रत्युत्तर में  डॉ. मिश्रा ने कुछ क्षण शून्य में निहारने के उपरांत कहा – “मुझे युद्धों से घृणा हो गई है, मैंने घायल सैनिकों के अत्यंत मार्मिक दृश्य देखे हैं। किंतु हां, नियमित जीवन शैली और लक्ष्य प्राप्ति के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की प्रेरणा मुझे सेना से ही मिली। संभवतः इसी कारण मैं सेवा के अपने लक्ष्य को जीवन के इस पड़ाव में भी निभा पा रहा हूं।”

उन्होंने नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं जारी रहने के प्रति संचालक डॉ. आनंद तिवारी को साधुवाद दिया।

डॉ. आर. एस. मिश्रा जी अपने 58 वर्षीय चिकित्सा सेवा काल में लगभग 25 लाख राेगियों की चिकित्सा का कीर्तिमान रच चुके हैं। अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में वे हाकी, बास्केटबाल और कबड्डी के खिलाड़ी रहे हैं। अब फुर्सत में गीत – संगीत सुनना पसंद करते हैं। डॉ. मिश्रा के सुपुत्र आनंद एयर फोर्स में वाइस एयर मार्शल के रूप में देश सेवा – सुरक्षा में रत हैं। डॉ. मिश्रा को स्वस्थ सुदीर्घ जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆

☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆

☆

यह माना कि जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है

 

कभी अंधेरों ने धमकाया

कभी उजालों ने भरमाया

कभी हवाओं ने जुल्म ढाया

कभी मौसम ने है रुलाया

कभी हार नहीं मानी

यह खुद्दारी का असर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

यह चिलचिलाती धूप

झुलसाती हुई रूप

‘लू ‘ चल रही है खूब

सांस हो रही है चुप

धरा पर भीषण गर्मी का

मचा हुआ कहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

जुल्म सहते सहते

सदियां बीत गई है

हक अधिकारों के लिए

लड़ने की क्या रीत नई है?

तोड़कर रूढ़ियों को आती

यह नई सहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

उनकी आवाज बने

जो बेबस बेघर हैं

उनके आंसू पोंछे

जिनका जीवन बदतर है

दिलों में ज्योत जलाएं 

अंधेरा बहुत पथ पर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

लाचार निर्धन शोषितों के लिए

चलो कुछ करते हैं

इनके लिए जीते हैं

इनके लिए ही मरते है

नेक इरादा हो तो

 आसान हर सफर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

हमारे पथ पर चलकर

आगे कई लोग आएंगे

आजादी के जश्न में

नए तराने गुनगुनाएंगे

इन दीवानों के कदमों में

अर्पित हमारा सर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

यह माना जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०८ – नारी तुम खुद की पहचान हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘नारी तुम खुद की पहचान हो…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १०८ ☆

☆ नारी तुम खुद की पहचान हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆ 

नारी, तुम खुद की पहचान हो,

छाया नहीं किसी की तुम हो,

तुम ही घर की शान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

संस्कार को देने वाली,

प्रेम सभी से करने वाली,

सृजन की पहचान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम्ही अंगनी, तुम्हीं वंदनी,

तुम्हीं संगनी, तुम्हीं नंदनी,

तुम ही लय और तान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम ही शिव की शक्ति हो,

तुम ही पावन भक्ति हो,

तुम धरा का मान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम धरा की श्रेष्ठ कृति हो,

ममता, प्रेम की अनुभूति हो,

ईश्वर का प्रतिदान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “समिधाच सख्या या!!” – लेख क्र. ७ ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “समिधाच सख्या या!!” – लेख क्र. ७. ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

तिनं एकवार बैठकीवर पाहिलं. ती चरकली. गोंधळली. बैठकीवर फक्त टाळ आणि चिपळ्या… बुवांशिवाय! तिला आठवले बुवांचे शब्द, ” आवले, ज्या दिवशी या टाळ-चिपळ्या माझ्या शरीरापासून वेगळ्या झालेल्या दिसतील, त्या दिवशी समज तुझा तुकाराम या जगात नाही “!

 चरकली ती… टाहो फोडला… धनी… धनी… तिचा आकांत ऐकून विठ्ठलाच्या मूर्तीचा थरकाप झाला, पायाखालची वीट थरारली… इंद्रायणी क्षणभर वहायची थांबली!!

हो… हीच ती… टाहो फोडून कोसळलेली, मनानं ढासळलेली… तुकाराम महाराजांची द्वितीय पत्नी… जिजाबाई, जिला तुकोबा प्रेमाने आवली म्हणत!

… हीच ती आवली जिला तुकोबांनी कधीतरी मनाच्या तरल मनस्थितीत, ज्यात त्यांना वाटे… ” विठो तुझे माझे राज्य, नाही दुस-याचे काज”!… मग अशा वेळी त्यांनी एका अभंगात म्हंटले…

” स्त्री द्यावी गुणवंती, तरी तीते गुंते आशा,

म्हणून कर्कशा लावी पाठी”! 

– – झालं… त्यानंतर सगळेच मग आवली कडे कर्कशा पत्नी म्हणूनच बघू लागले. आजही बघतात. पण त्याच तुकोबांनी अजून एका अभंगात म्हंटलंयं…

 ” तुका म्हणे शोधून पाह्य,

 बायको नव-याची माय.

 तिजविण विसावे नाही,

 क्षणार्ध सुद्धा! 

 म्हणोनी संसार थोर! “

पण समाजधुरिणांनी, किर्तनकार, प्रवचनकार, सगळ्यांनीच आवलीवर ‘कर्कशा’… हे शिक्कामोर्तब केले ते केलेच! हाच शिक्का, हीच उमटवलेली मोहोर… पुसण्याचा हा प्रयत्न! तुकोबांच्या परमार्थ कार्य यज्ञात, आयुष्यभर… बोलंत-म्हणंत, त्याना जगरहाटी शिकवंत, लोकांपासून सावध रहाणं सांगंत, प्रापंचिक जबाबदा-यांची जाणीव देत… आणि स्वतः कोंड्याचा मांडा करून प्रपंच नेटका करण्याचा सतत प्रयत्न करंत… कधी पेटंत, कधी धुमसंत, तर कधी धगधगंत पण कुटुंब कबिल्यासाठी चेतती राहिलेली ही… समिधा!!! 

पुण्याच्या गुळवे सावकाराची, खात्या-पित्या घरातली ९-१० वर्षांची लेक… जिजाई! लग्न होऊन तुकारामांच्या घरात येते आणि साखरे सारखी विरघळून जाते त्यांच्या संसारात. द्वितीय पत्नी म्हणून आलेली असूनही, सवतीवर… रखुमाबाईंवर अगदी मनापासून प्रेम आणि तिच्या तब्येतीची काळजी घेणं, तिच्या मुलावर अपत्यवत प्रेम करणं… मोठ्या जावेवर बहिणीसारखी माया केली तिनं! जावेच्या पती विरहाच्या अव्यक्त दु:खानं दु:खी होणारी ही आवली!! प्रपंच मात्र नेटाने आणि नेटका, निगुतीचा करत होती. मोठ्या आत्मविश्वासाने संसार केला तिनं! 

पण तुकाराम मात्र एकापाठोपाठ एक पिता आणि माता यांचं छत्र हरवणं, मोठ्या भावजयीचं अकस्मात जाणं, मोठ्या भावाचं त्या दु:खात, विमनस्क अवस्थेत दूर कायमचं निघून जाणे, पहिल्या पत्नीचा मृत्यू आणि पहिल्या मुलाचा ही मृत्यू, पडलेला भयंकर दुष्काळ, होणारी उपासमार, बुडलेली सावकारी आणि प्रतिष्ठेचे निघालेले दिवाळे… या सगळ्या आपत्ती, विपत्तींच्या झंझावातात कोलमडून पडले. आणि परमार्थाची वाट धरली त्यांनी, प्रपंच जणू वा-यावर सोडून दिला. आणि दोघांच्या जगण्याच्या पातळ्याच भिन्न झाल्या. आवली ढासळली मनाने. हिंमत खचल्या सारखी झाली. आणि मग मात्र तिचा संयम कधी तरी संपला तर तिची चिडचिड होणं साहजिकच नाही कां? आपल्या नव-यानं चारचौघांसारखा संसार करावा असं त्या काळातल्या कुणाही बाईला वाटणाऱच ना? मग आवलीचं संतापणं, चिडणं, पराकोटीला ही गेलं असेल समजा… तरी तो उद्रेक तर घरा-घरांत आजही बघायला मिळतोच की! मग तिलाच ‘कर्कशा’ ठरवून, आणि तुकोबांनीच… तिच्या पतीनेच म्हंटलय़ं… असा पवित्रा घेत… आवलीचं पत्नी, सून, जाऊ, माता, गृहिणी म्हणून असलेलं समर्पण दुर्लक्षित नाहीच ना करता येणार? 

तुकोबांनी एकच उरवून आणलेला ऊस… संतापात तिने, भावनेच्या उद्रेकात फेकला, भिरकावला असेल ही त्यांच्या दिशेने… पण त्याचा विपर्यास करून… पाठीत मारला… असं म्हणणं… ही किंवदंती, आख्यायिका ही असू शकते की कदाचित! हा ही एक विचार असूच शकतो ना? पण म्हणून तिच्या या धगी पेक्षा… तिची ऊब, तिची मायेची, पती प्रेमाची पाखर त्याचा तो अलवार स्पर्श ही कधीतरी जाणवून घ्यावा ना? 

हीच आवली… भंडा-याच्या डोंगरात काटे-कुटे तुडवत तुकोबांच्या भुकेची भाकर झाली. तुकोंबावर मनापासून निरतिशय प्रेम केलं तिनं… म्हणूनच तर चिंतनासाठी कधी… भांबनाथ तर कधी भंडारा अशा विविध डोंगरावर, न सांगता गेलेल्या तुकोबांचा पत्ता तिला बरोबर कळे, आणि मग जाई ती थेट त्यांच्या पर्यंत भाकर घेऊन. तुकोबांच्या पोटात घास गेल्याशिवाय आवलीने कधीच एक घास ही खाल्ला नाही.

तुकारामा सारख्या तेजस्वी सूर्याची किरणे आवली पर्यंत नाही पोहोचू शकली. ती सतत त्यांची सावली बनून राहिली तरीही!! पण तरीही आवलीने एका अभंगात आपल्या आध्यात्मिक ज्ञानाची चुणूक, झलक दाखवलीच आहे असं वाटतं… बघा ना…

” तुकारामाची कांता सांगे लोकांपाशी

 जातो पंढरीशी स्वामी माझा,

 फुटकाची वीणा त्याला दोन तारा

 घालितो येरझारा पंढरीच्या!”

– – – आवलीने आध्यात्मिक सत्यच सांगितले आहे ना यात… नऊ ठिकाणी छिद्रे असलेली ही देहरूपी वीणा आणि श्वास-उच्छवास या दोन तारा छेडीत माझा स्वामी पंढरीसी कां जातो? कळेना!! 

आवलीने… “देह ही पंढरी, आत्मा पांडुरंग! “… हेच तर सांगितलयं ना? 

तुकोबांचं सांगणं… ” आम्हां घरी धन, शब्दांचीच रत्ने! “… हे नसेल उमगलं तिला… पण तरीही तिनं तुकोबांच्या भक्तीचं वादळ पेललंच ना? आभाळ झेललं तिनं!! पण तिचं हे… पेलणं, झेलणं, घराचा सरा होऊन आख्खं घर तोलणं आणि कुटुंबाचा कणा होऊन ताठ उभं करणं… हे जगाने ओळखलंच नाही.

तुका आकाशाएवढा असेलही, आहे ही… पण आवली तर पृथ्वी सिद्ध झाली, जिच्या सोशिकतेने दगडाला ही पाझर फुटावा!!! 

कविवर्य बोरकरांनी सुद्धा तिचा महिमा वर्णिला आहे… म्हणतात…

” तुक्याच्या पायाची व्हाया जिने वीट

 केली पायपीट चौ-यांशीची.

 *

 पोचवाया त्याच्या भूकेला भाकर

 काट्यांचे डोंगर पालाणिले.

 *

न चुकावी त्याची पंढरीची वारी

म्हणून वोसरी नोलांडिली!! “

*
आणि पुढे कविवर्य लिहितात…

 *

” सार्थक होऊन, तुक्याच्या जन्माचे

 विमान देवाचे आले दारी,

 *

असून गर्भार पाचा महिन्यांची

 गाभण म्हशीची आई व्हाया,

 *

आलीये मुक्ती ला लाविले माघारी

 तुक्याहून थोरवी जिजाई ची!! 

अशी ही आवली तुकयाची सावली, गोठ्यातील गाभण म्हशीची माऊली… स्वतः गर्भार असूनही पतीबरोबरच मुक्ती पांडुरंगाने सुचविली, पण तिने नाकारिली… असंही म्हंटलं जातं. ही आख्यायिका जरी असली तरी, एक गोष्ट तर खरीच ना… की… तुकोबांनंतर ही आवलीने संसाराचा गाडा पुढे नेला. पती विरहाचं दु:ख पचवलं आणि त्यानंतर ४ महिन्यांनी जन्माला आलेल्या नारायणा वर अतिशय सुंदर संस्कार केले. आवलीला पतीचे महात्म्य कळले होतेच. फक्त तिची इच्छा होती की तुकोबांनी प्रपंच सांभाळून परमार्थ करावा. पण तसे नाही होऊ शकले. पण तरीही आवलीने, नारायण बापा सारखा व्हावा म्हणून त्याला वारकरी पंथाची शिकवण दिली. नारायणाचा… नारायण महाराज झाला. वारकरी पंथाची पताका तुकोबारायांनंतर नारायण महाराजांनीच खांद्यावर घेतली. ” ग्यानबा-तुकाराम”… हा गजर, नारायण महाराजांनी लिहिला, सुरू केला आणि माऊली -तुकोबांची एकत्रित पालखी ही त्यांनीच सुरू केली. म्हणूनच ते… पालखी सोहळा जनक:- तपोनिधी नारायण महाराज म्हणून ओळखले जातात. दिंडी सोहळ्याचे रूपांतर पालखी सोहळ्यात करण्याचं श्रेय त्यांच्याकडेच जाते.

– – – या सोहळ्याची पताका फडकविणा-या हातांच्या पाळण्याची दोरी मात्र त्या आवली माऊली च्याच हाती होती… हे विसरून नाही ना चालायचं! तिचेच संस्कार भिडले ना, गजर बनून थेट आभाळाला!! या… तिन्ही लोकीं च्या गुंडा पुत्राची माता… आवली… ‘कर्कशा’ कशी असेल ना मग?? 

तुका वारकरी संप्रदायाचा कळस झाला, पण त्या कळसाच्या तेजाचं स्फुल्लिंग… पाया मात्र आवलीच ठरावी, मानावी… असं वाटतं!! 

… ही बायको… तुकोबाची माय बनली, आपल्या लेकरांबरोबरंच, म्हणूनच तुकोबांच्या म्हणण्यानुसार च ते… प्रभु चरणी विसावू शकले.

हा विसावा देणारी त्यांची सावली… आवली… शेवटी त्या पांडुरंगाच्याच चरणी विसावली. खरं म्हणजे पांडुरंगाला तुकोबांपेक्षा तीच जास्त प्रिय होती… तिची विरोधी भक्ती, त्याच्या वरील रागामागचा भक्तीमय अनुराग… जाणला होता त्यानं… म्हणूनच तर ना… काटा निमित्त होते, घेई देव भक्ताचे पाय हाती!! 

– – अशी ही थोरवी त्या आवली ची ! स्वयं दीप होऊन जळत राहणाऱ्या समिधेची !!! 

– लेख क्र. ७.

© प्रा.भारती जोगी

पुणे.

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३५ ☆ व्यंग्य – दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘दलबदलुओं के लिए सहूलियत ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

संसद और विधानसभा में दल-बदल की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र सरकार ने दलबदलुओं की सहूलियत के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं। अभी अपनी पार्टी से तलाक लेने की इच्छा होने पर दलबदलू को नयी पार्टी के नेताओं के दरबार में जाकर चरण-वरण छूने पड़ते हैं, कुछ शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है। उन्हें इस जिल्लत से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि संसद और राज्यों की विधानसभाओं के बाहर ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ का निर्माण किया जाए।  जब भी किसी दलबदलू के पेट में मरोड़ होगी, पुराने दल को छोड़कर किसी मलाईयुक्त पार्टी में संतरण करने की इच्छा बलवती होगी, तब वह वह इस कक्ष के भीतर प्रवेश कर आसन पर बैठ जाएगा और यह खबर तत्काल जंगल की आग की तरह फैल जाएगी कि नेताजी की ‘अक्कल दाढ़’ निकल आयी है और वे दल बदलने की मंशा से पीड़ित हैं। फिर नेताजी उम्मीद करेंगे कि दूसरी पार्टी वाले उन पर डोरे डालेंं और उन्हें बाइज़्ज़त, गाजे-बाजे के साथ अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए ले जाएं।

पुराने ज़माने में यह काम राजाओं के ‘कोप भवन’ के द्वारा होता था। जब रानियां किसी बात पर रुष्ट हो जाती थीं तो वे कोप भवन में प्रवेश कर जाती थीं और सबको पता चल जाता था कि रानी रूठ गयी हैं। फिर राजा साहब सारा राज- काज छोड़कर रानी की रुसवाई को दूर करने में लग जाते थे। कुछ ऐसा ही असर नेताजी के ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ में प्रवेश करने से अपेक्षित है।

दलबदलुओं के साथ एक  गड़बड़ यह होती है कि दल बदलने के साथ उनके ‘सुर’ में ज़रूरी तब्दीली नहीं हो पाती। आदत न होने की वजह से कई बार असावधानी में वे पुराने दल और पुराने नेता का गुणगान और नई पार्टी को पूर्ववत गरियाना शुरू कर देते हैं। ऐसा एक दो दलबदलुओं के साथ हो चुका है। ज़्यादा दल बदलने वालों के सामने यह संकट अक्सर खड़ा हो जाता है। हमारे गायक मन्ना डे ने सही सुर साधने की इसी समस्या को एक गीत में व्यक्त किया है— ‘सुर ना सधे, क्या गाऊं मैं? सुर के बिना जीवन सूना।’ राजनीति ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ वाली चीज़ होती है। दलबदलू  की सही सुर पकड़ने की असावधानी उसके भविष्य के लिए घातक हो सकती है। इसलिए निर्णय लिया गया है कि संसद और विधानसभाओं के निकट ‘सुर’ सुधारने वाले क्लिनिक स्थापित किये जाएंगे जहां ऑपरेशन के द्वारा दलबदलुओं के स्वर-यंत्र में ज़रूरी सुधार किये जाएंगे ताकि वे अपने पुराने दल की भर्त्सना और नये दल की तारीफ बिना चूके कर सकें। इन क्लिनिक्स में चिकित्सा के लिए सरकार ‘सब्सिडी’ प्रदान करेगी।

इसके बाद भी जिन दलबदलुओं का सुर नहीं सुधरेगा, जो अपराध-बोध या आत्मग्लानि से पीड़ित रहेंगे, या जिनकी अंतरात्मा उन्हें फटकारती  रहेगी, उनके लिए बाकायदा ‘हार्ट ट्रांसप्लांट क्लिनिक’ स्थापित किए जाएंगे जहां दिल बदलने का काम किया जाएगा, ताकि दिल और आत्मा की खटखट ही ख़त्म हो जाए। यानी दल-बदल और दिल-बदल का कार्यक्रम साथ-साथ संपन्न होगा। इसके लिए भी सरकार ‘सब्सिडी’ का प्रावधान करेगी।

सरकार को भरोसा है कि इन सुविधाओं से प्रभावित होकर ज़्यादा से ज़्यादा सदस्य सरकारी दल में शामिल होकर उसकी ताकत में इज़ाफ़ा करेंगे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०७ – स्तुत्य कला… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– स्तुत्य कला…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०७ — स्तुत्य कला — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

सुदूर अतीत कालीन एक संत ने एक बड़ा ही भव्य ग्रंथ लिखा था। कथ्य इस तरह से था – शिल्पी इतनी सुन्दर मूर्तियाँ बनाते थे कि उन मूर्तियों में भगवान की छवि देख ली जाती थी। वह कला की पराकाष्ठा थी। निर्मित मूर्तियों में भगवान सर्पधर अथवा क्रोध के महा नायक हो कर भी मान्य होते थे। मूर्तियों में देवियाँ भी हुईं। महाकाल का वैराट्य, लेकिन महामाता की अभिनव प्रतिमा। बहुत छान बीन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया था सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की कल्पना वहीं से उद्भूत हुई थी। यह धारणा सर्व स्वीकृत हो जाने से कंठ – कंठ में बस गई थी। पर एक कमी इस कोण से रह गई संत का वह लिखित ग्रंथ कभी दिखा नहीं। इस कमी की अनुभूति तो बहुत होती है, लेकिन इतना संतोष अवश्य किया जाता है सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का राग सदा के लिए रह गया है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३६ – दशपुत्रसमो द्रुम: ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३६ ☆ दशपुत्रसमो द्रुम:… ?

हमारा फ्लैट हाउसिंग सोसायटी की ऊपरी मंज़िल पर है। सोसायटी के सामने सड़क है। सड़क के दूसरी ओर शिरीष का विशालकाय वृक्ष है। इस पेड़ की फुनगियाँ गुलाबी रंग के फूलों से लकदक हैं।

यह वृक्ष लगभग 70 फीट ऊँचा और अपनी डालियों के माध्यम से लगभग इतना ही चौड़ा हो चुका है। तेज़ हवा, बरसात के साथ इसके फूल उड़ते हैं, यहाँ-वहाँ बिखरते हैं। उसमें से कुछ हमारी बालकनी में रखे पौधों के गमलों में भी गिरते हैं।

पिछले दिनों एक गमले में इसी शिरीष की एक संतान ने जन्म लिया। धरती पर खड़ा 70 फीट का विशाल पेड़  और उसके सामने गमले में जन्मा और बढ़ा लगभग 1 फुट का यह पौधा। देखता हूँ कि पेड़ की फुनगियाँ निरंतर हमारे बालकनी के निकट आ रही हैं। दूरी लगभग 10 फीट की रह गई है।

सोचता हूँ, सड़क के उस पार लगा 70 फीट का यह पेड़ भी कभी अंकुरित हुआ होगा, ऐसे ही पौधा बना होगा। धीरे-धीरे बड़ा हुआ होगा। आंधी, तूफान, भीषण गर्मी सब सहन किए होंगे। पशुओं का भक्ष्य होने से बच गया होगा। इसकी आयु कितने वर्ष है, यह तो पता नहीं पर इसे विकसित होने के समुचित अवसर मिले, फलत: यह 70 फीट का हो चला है।

सही शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक पोषण और उचित परिवेश मिले तो मनुष्य भी इसी तरह विकास कर सकता है। प्रकृति में हरेक अनुपम है। अतः अपने बच्चों पर अपने अधूरे सपने थोपने के बजाय उन्हें विकास के लिए समुचित वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। आगे वे अपने स्वभाव और अपनी मूल प्रकृति के अनुसार स्वयं विस्तार करेंगे।

नन्हा शिरीष थोड़ा बड़ा हो जाए तो किसी सुरक्षित स्थान पर इसे रोप आऊँगा। ऐसे स्थान पर जहाँ इसे विकसित होने के पर्याप्त अवसर मिल सकें।

इन दिनों गर्मी चरम पर है। सामान्यत: हमारी वृत्ति वृक्षों को काटकर बढ़ते तापमान पर सेमिनार आयोजित करने की रही है। यदि 25 से 50 वर्ष के आयुसमूह का हर भारतीय नागरिक दो पौधे भी रोपे, उनका ध्यान रखे, तो 45 डिग्री का औसत तापमान कम करने में समय नहीं लगेगा। पंछी लौटेंगे, अपने घोंसले बुनेंगे, कीटक पेड़ की खोह में घर बसाएँगे, जड़ों में सरीसृप भी बिल बनाएँगे। जैव विविधता का खंडित चक्र फिर अखंड होने की राह पर चल पड़ेगा।

कहा गया है,

दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।

दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥

दस कुओं के समतुल्य एक बावड़ी, दस बावड़ियों के समतुल्य एक सरोवर, दस सरोवरों के समतुल्य एक सुयोग्य पुत्र और दस पुत्रों के समतुल्य एक वृक्ष कल्याणकारी होता है।

पर्यावरण के संरक्षण के लिए अथवा पुण्य के लिए अथवा अकारण, पौधारोपण अवश्य करें। इन पौधों से विकसित होनेवाले वृक्ष, देश को हरा-भरा रख सकते हैं। अनुभव बताता है कि मनुष्य जीवन को भी पल्लवित, पुष्पित एवं सुरभित रखने में हरियाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रयास करें कि प्रकृति हरी रहे, परिसर हरा रहे, मन हरा रहे।

© संजय भारद्वाज 

(14:09 बजे, 23 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८० – ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – मत रोको।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८० ☆

☆ ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

मत रोको, जो होता है, हो जाने दो।

सोना खोना मत, सोना खो जाने दो।।

.

सत्ता जिनका लक्ष्य उन्हें वह पाने दो।

उनको अपने मुख, अपना गुण गाने दो।।

.

हम-तुम निर्धन, कम हो तो भी जी लेंगे।

चैन बिकी, बेचैन न हो बिक जाने दो।।

.

क्रूर बेरहम हैं सारे सत्ताधारी।

पत्रकार चारण बनते बन जाने दो।।

.

चलो पसीना सींच रोप लें आशाएँ।

कुछ कुम्हलाएँ-सूखेँ तो कुम्हलाने दो।।

.

देव मूर्तियाँ दानव जैसी बना रहें।

नादां, मत रोको उनको बनवाने दो।।

.

मन मंदिर में तन की पूजा मत करना।

चाह रहा जो तन, उसको तन पाने दो।।

.

वनवासी के भक्त, भागते पद-पीछे।

सच को झूठ बताते तो बतलाने दो।।

.

जो जा चुके, कोसकर उनको खुश होते

यदि कृतघ्न पामर कुछ तो हो जाने दो।।

.

जन-गण मौन भले हो, गूँगा मत मानो।

पलटेगा यह तंत्र समय तो आने दो।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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