Tag: #e-abhivyakti

हिंदी साहित्य – राजभाषा दिवस विशेष ☆ कविता – पुरानी तस्वीरें ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

 

(राजभाषा मास  में हम ख्यातिलब्ध मराठी साहित्यकार सुश्री प्रभा सोनवणे जी की हिंदी कविता को प्रकाशित कर अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं.  ई-अभिव्यक्ति में आपका मराठी में प्रकाशित साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात”  को पाठकों का ह्रदय से प्रतिसाद मिल रहा है.  आपकी कवितायेँ अत्यंत संवेदनशील एवं हृदयस्पर्शी होती हैं.  अक्सर मैं उनकी ह्रदय स्पर्शी  कवितायेँ पढ़ कर  प्रत्युत्तर में निःशब्द अनुभव  करता हूँ .  आज प्रस्तुत हैं उनकी एक और हृदयस्पर्शी  हिंदी कविता पुरानी तस्वीरें यह सच है क़ि हम अक्सर पुरानी तस्वीरें देख कर उस गुजरे वक्त में पहुँच जाते हैं, जहाँ इस जीवन में पुनः जा पाना असंभव है. उन तस्वीरों  के कुछ पात्र तो समय के साथ खो गए होते हैं.  हमारे पास रह जाती हैं मात्र स्मृतियाँ.  समय के साथ जीना हमारी नियति है और शेष ईश्वर के हाथों में है. इस अतिसुन्दर रचना के लिए उनकी लेखनी को नमन. )

 

☆ पुरानी तस्वीरें ☆

 

आज  पुरानी तस्वीरें भेजी,

WhatsApp Group पर भाँजे ने….

तो गुजरा हुआ जमाना याद आया ।

कितने सीधे सादे दिन थे,

सीधे सादे लोग,

वह बहुत बडा बुलंद सा घर आँगन !

 

शहर में रह कर भी,

अपने छोटे से गाँव से बहुत लगाव  था…..

हर छुट्टियों में वहाँ आना जाना था ।

अच्छा लगता था

दादी की कहानी सुनना

और

दादाजी के साथ घुड़सवारी करना…..

 

वह लहराते खेत,

फलों से  लदे पेड….

गाय बैल…भैंसें….

कुत्ते, बिल्लीयाँ…

मुर्गे मुर्गियाँ ……

 

आँगन में आयी हुई चिडियों को

दाना डालना….

वो बुआ की शानदार शादी…

चाचा के लिए लड़की देखने जाना…..

कितनी चहल-पहल थी…

बचपन की यादें तो बहुत मीठी हैं ।

पर कहाँ जान पाए….

चूल्हा चौका करनेवाली,

माँ और चाचियों का दुखदर्द….

लगता था उनके आँसू है,

चूल्हे की गीली लकड़ियों से आते हुए धुएँ की वजह से …..

 

जब औरत बनी तो अपनी ही समस्याएँ सताने लगीं…..

कहाँ जान पायी उन औरतों की कहानी….

 

आज बहुत दिनों के बाद

पुरानी तस्वीरें देखी तो उनमें से…

बिना वजह…

महसूस किये कुछ आँसू…..और सिसकियाँ भी……

आज पुरानी तस्वीरें देखी

जिन्दगी के आखिरी दौर में …..

 

© प्रभा सोनवणे,  

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

Please share your Post !

Shares

रंगमंच – ☆ विवेचना का 26 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह (25 से 29 सितंबर) ☆ – श्री वसंत काशीकर

श्री वसंत काशीकर

(यह विडम्बना है कि  – हम सिनेमा की स्मृतियों को तो बरसों सँजो कर रखते हैं और रंगमंच के रंगकर्म को मंचन के कुछ दिन बाद ही भुला देते हैं। रंगकर्मी अपने प्रयास को आजीवन याद रखते हैं, कुछ दिन तक अखबार की कतरनों में सँजो कर रखते हैं और दर्शक शायद कुछ दिन बाद ही भूल जाते हैं।

इस मंच से हम रंगमंच के कार्यक्रमों को जीवंतता प्रदान करने का प्रयास करते हैं.  यदि रंगमंच से सम्बंधित कुछ प्रयोग, मंचन, उपलब्धियां आपके पास हों तो आप अवश्य साझा करें. हमें रंगमंच सम्बन्धी प्रत्येक उपलब्धि साझा करने में प्रसन्नता होगी.  आज प्रस्तुत है विवेचना के २६वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह की विशिष्ट जानकारी श्री वसंत काशीकर जी  के सौजन्य से.)

 

☆ रंगमंच  – विवेचना का 26 वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह (25 से 29 सितंबर) ☆

☆ पांच चुनिंदा नाटकों का मंचन ☆

 

विवेचना थियेटर ग्रुप ( विवेचना, जबलपुर ) का 26 वां  राष्ट्रीय नाट्य समारोह इस वर्ष 25 सितंबर से 29 सितंबर 2019 तक आयोजित होगा।

इसका उद्घाटन 25 सितंबर को संध्या 7 बजे होगा। यह समारोह  5 दिवसीय होगा।

इस समारोह में विवेचना ने विशेष नाटकों का चुनाव किया है। इस समारोह के सभी नाटक कहानी उपन्यास पर आधारित हैं। हर नाटक की अपनी अपनी खासियत है।

 

 

  • पहले दिन 25 सितंबर को विवेचना का वसंत काशीकर निर्देशित नाटक ’’हमदम’ अपनी कहानी और अभिनय की श्रेष्ठता के लिये लाजवाब है। इसे स्व दिनेश ठाकुर ने लिखा है। यह नाटक बुजुर्गों के अकेलेपन और प्रेम को नई दृष्टि से देखता है।
  • दूसरे दिन 26 सितंबर को होने वाला नाटक ’नागिन तेरा वंश बढ़े’ प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता व नाट्य निर्देशक अवतार साहनी के निर्देशन में विजयदान देथा की कहानी पर आधारित है। इसे एक्टर्स रिपर्टरी थियेटर, दिल्ली के कलाकार प्रस्तुत करेंगे।
  • तीसरे दिन 27 सितंबर को नाटक ’सीमापार’ हिन्दी के प्रथम नाटककार भारतेन्दु के जीवन पर आधारित है जिसे राइजिंग सोसायटी भोपाल के कलाकार प्रीति झा तिवारी के निर्देशन मंचित करेंगे। उल्लेखनीय है कि अभी अभी प्रीति झा तिवारी को संगीत नाटक अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
  • चौथे दिन 28 सितंबर को महान भारतीय लेखक फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पर आधारित नाटक ’पंचलेट’ मंचित होगा। पिंक बर्ड सोसायटी भोपाल की इस रोचक प्रस्तुति का निर्देशन कमलेश दुबे,भोपाल ने किया है।
  • पांचवें और अंतिम दिन 29 सितंबर को अदाकार थियेटर सोसायटी, दिल्ली के कलाकार रोचक नाटक ’शादी के मंडप में’ का मंचन करेंगे। इसका निर्देशन गुनीत सिंह ने किया है।
  • यह समारोह तरंग प्रेक्षागृह में एम पी पावर मैनेजमेंट कं लि, केन्द्रीय क्रीड़ा व कला परिषद के सहयोग से आयोजित होगा। नाटकों का मंचन प्रतिदिन संध्या 30 बजे होगा।
  • विवेचना थियेटर ग्रुप की ओर हिमांशु राय, बांकेबिहारी ब्यौहार, वसंत काशीकर ने सभी नाट्य प्रेमी दर्शकों से समारोह के सभी नाटकों को देखने का अनुरोध किया है।

 

© वसंत काशीकर 

जबलपुर, मध्यप्रदेश

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सकारात्मक सपने – #16 – कचरे के खतरे ☆ सुश्री अनुभा श्रीवास्तव

सुश्री अनुभा श्रीवास्तव 

(सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार, विधि विशेषज्ञ, समाज सेविका के अतिरिक्त बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी  सुश्री अनुभा श्रीवास्तव जी  के साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत हम उनकी कृति “सकारात्मक सपने” (इस कृति को  म. प्र लेखिका संघ का वर्ष २०१८ का पुरस्कार प्राप्त) को लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने के अंतर्गत आज अगली कड़ी में प्रस्तुत है “कचरे के खतरे” ।  इस लेखमाला की कड़ियाँ आप प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।)  

 

Amazon Link for eBook :  सकारात्मक सपने

 

Kobo Link for eBook        : सकारात्मक सपने

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने  # 16 ☆

 

☆ कचरे के खतरे ☆

 

घर-आँगन सब आग लग रही, सुलग रहे वन-उपवन
दर-दीवारें चटख रही हैं, जलते छप्पर-छाजन

तन जलता है, मन जलता है जलता जन-धन जीवन
एक नहीं जलते सदियों से जकड़े गर्हित बन्धन।

दूर बैठकर ताप रहा है, आग लगाने वाला
मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला।

….. डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन

विकास का सूचक और अर्थव्यवस्था का आधार  बढ़ता मशीनीकरण आज आधुनिक जीवन के हर क्षेत्र को संचालित कर रहा है । आधुनिक जीवन मशीनों पर इस कदर निर्भर है कि इसके बिना कई काम रूक जाते हैं । इंटरनेट और मोबाइल  दूरी व समय की सीमाओं को लांघ कर सारी दुनिया को अपने में समेटने का दावा करते हैं । इस यंत्र युग में सारी दुनिया में हिंसा, शोषण, विषमता और बेरोजगारी भी बढ़ रही है । स्वास्थ्य समस्याएँ और पर्यावरण विनाश भी अपने चरम पर हैं । दौड़ती-भागती जिंदगी में समय का अभाव प्राय: आम शिकायत रहती है । रिश्तों में कृत्रिमता और दूरियाँ बढ़ रही हैं।  लोग स्वयं को बेहद अकेला महसूस करने लगे हैं । बढ़ती मशीनों ने मनुष्य की शारीरिक श्रम की आदत को कम करके स्वास्थ्य समस्याओ का आधार तैयार किया है । दूरदर्शी गांधीजी ने चेताया था – ”अगर मशीनीकरण की यह सनक जारी रही, तो काफी संभावना है कि एक समय ऐसा आएगा जब हम इतने असमर्थ और लाचार हो जाएगे कि अपने को ही यह कोसने लगेंगे कि हम भगवान द्वारा दी गई शरीर रूपी मशीन का इस्तेमाल करना क्यों भूल गए” । बढ़ता मशीनीकरण उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर समाज में विषमता की नींव को पुख्ता करता आया है । एक औद्योगिककृत अर्थव्यवस्था में अंधाधुंध बढ़ता मशीनीकरण वस्तुत: स्थानीय जरूरतों व सीमाओ को लांघकर व्यापक स्तर पर वस्तुओ के उत्पादन, बिक्री या खपत को बढ़ाने की महत्वाकांक्षाओ से प्रेरित होता है । औद्योगिक कचरे को व्यापाकता से बढ़ाता है ! ग्लोबल वार्मिंग को जन्म देता है । पर्यावरण प्रदूषण की  ऐसी आग को जन्म देता है जिसे बुझाने वाला सचमुच  कोई नहीं है ।

भोपाल गैस त्रासदी को २३ वर्ष हो गए हैं । वहां पर पड़ा जहरीला अपशिष्ट प्रत्येक मानसून में जमीन में रिस कर प्रति वर्ष  क्षेत्र को और अधिक जहरीला बना रहा है । कंपनी को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिये कि वह इसे अमेरिका ले जाकर इसका निपटान वहां के अत्याधुनिक संयंत्रों में करे । परन्तु इसके बजाय सरकारें अब भोपाल ही नहीं गुजरात में अंकलेश्वर व म.प्र. के पीथमपुर के भस्मकों में इसे जला कर इस औद्योगिक कचरे को नष्ट करना चाहती है ।

इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अनुपयोगी हो जाने से इकट्ठा हो रहे कचरे का निपटान सही ढंग से नहीं हो पाने के कारण पर्यावरण के खतरे बढ़ रहे है । एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष डेढ़ लाख टन ई-वेस्ट या इलेक्ट्रॉनिक कचरा बढ़ रहा है । इसमें देश में बाहर से आने वाले कबाड़ को जोड़ दिया जाए तो न केवल कबाड़ की मात्रा दुगुनी हो जाएगी, वरन् पर्यावरण के खतरों और संभावित दुष्परिणामों का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकेगा । प्रतिवर्ष भारत में बीस लाख कम्प्यूटर अनुपयोगी हो जाते हैं । इनके अलावा हजारों की तादाद में प्रिंटर, फोन, मोबाईल, मॉनीटर, टीवी, रेडियो, ओवन, रेफ्रिजरेटर, टोस्टर, वेक्यूम क्लीनर, वाशिंग मशीन, एयर कंडीशनर, पंखे, कूलर, सीडी व डीवीडी प्येयर, वीडियो गेम, सीडी, कैसेट, खिलौने, फ्लोरेसेंट ट्यूब, बल्ब, ड्रिलिंग मशीन, मेडिकल इंस्टूमेंट, थर्मामीटर और मशीनें आदि भी बेकार हो जाती हैं । जब उनका उपयोग नहीं हो सकता तो ऐसा औद्योगिक कचरा खाली भूमि पर इकट्ठा होता रहता है, इसका अधिकांश हिस्सा जहरीला और प्राणीमात्र के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है । कुछ दिनों पहले इस तरह के कचरे में खतरनाक हथियार व विस्फोटक सामगी भी पाई गई थी । इनमें धातुओ व रासायनिक सामग्री की भी काफी मात्रा होती है जो संपर्क में आने वाले लोगों की सेहत के लिए खतरनाक होती है । लेड, केडमियम, मरक्यूरी, एक्बेस्टस, क्रोमियम, बेरियम, बेटीलियम, बैटरी आदि यकृत, फेफड़े, दिल व त्वचा की अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं । अनुमान है कि यह कचरा एक करोड़ से अधिक लोगों को बीमार करता है । इनमें से ज्यादातर गरीब, महिलाएँ व बच्चे होते हैं । इस दिशा में गंभीरता से कार्रवाई होना जरूरी है । मगर देश के लोगों की मानसिकता अभी कबाड़ संभालने व कचरे से आजीविका कमाने की बनी हुई है ।

उर्जा उत्पादन हेतु ताप विद्युत संयंत्र , बड़े बाँध , प्रत्यक्ष, परोक्ष बहुत अधिक मात्रा में औद्योगिक कचरा फैला रहे हैं।  सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा, ऊर्जा के बेहतरीन विकल्प माने गए हैं । राजस्थान में इन दोनों विकल्पों के अच्छे मानक स्थापित हुए हैं । सोलर लैम्प, सोलर कुकर जैसे कुछ उपकरण प्राय: लोकप्रिय रहे हैं।   एशियन डेवलपमेंट बैंक के साथ मिलकर टाटा पॉवर कंपनी लिमिटेड देश में (विशेषकर महाराष्ट्र में) कई करोड़ों रूपये के बड़े पवन ऊर्जा प्लांट लगाने की योजना बना रही है । इसी तरह से दिल्ली सरकार भी ऐसी कुछ निजी कंपनियों की ओर ताक रही हैं जो राजस्थान में पैदा होती पवन ऊर्जा दिल्ली पहुंचा सकें । परमाणु ऊर्जा के निर्माण से पैदा होते परमाणु कचरे में प्लूटोनियम जैसे ऐसे रेडियोएक्टिव तत्वों का यह प्रदूषण पर्यावरण में भी फैल सकता है और भूमिगत जल में भी ।

एशियन डेवलपमेट बैक ने हाल ही गंगा के प्रदूषण रोकने के लिए एक योजना तैयार की है । गंगा के किनारे के  नगरों की पानी, सवरेज, सॉलिड वेस्ट मेनेजमेंट, सड़क, ट्रेफिक व नदियों के प्रदूषण को दूर किया जायेगा।संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट में कहा है कि व्यापक औद्योगिक कचरे ,भूमि का जरूरत से ज्यादा दोहन और सिंचाई के गलत तरीकों से  जलवायु परिवर्तन हो रहा है .मरूस्थलों के बढ़ते क्षैत्रफल के कारण लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं।  रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमि का मरूस्थल में बदलना पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है और विश्व की एक तिहाई जनसंख्या इसका शिकार बन सकती है । रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिक संतुलन, कृषि के कुछ सरल तरीके अपनाने आदि से वातावरण में कार्बन की मात्रा कम हो सकती है । इसमें सूखे क्षैत्रों में पेड़ उगाने जैसे कदम शामिल हैं।औद्योगिक अपशिष्ट से दिल्ली की जीवन धारा यमुना, इस कदर मैली हो चुकी है कि राज्य सरकार १९९३ से ही ‘यमुना एक्शन प्लान’ जैसी कई योजनाओ द्वारा सफाई अभियान चला रही है, जिस पर करोड़ों-अरबों रूपए लगाए जा चुके हैं। किसी भी नदी को जिंदा रखने के लिए ‘इको सिस्टम’ की सुरक्षा उतनी ही जरूरी है जितनी उसमें बहते पानी की गुणवत्ता।

पर्यटन जनित डिस्पोजेबल प्लास्टिक कचरे से बढ़ता प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच रहा है ,जिस पर त्वरित नियंत्रण जरूरी है .सरकार ने  रिसायकल्ड पॉलिथिन के उपयोग पर पाबंदी लगा रखी है । केवल नए प्लास्टिक दानों से बनी बीस माइक्रोन से अधिक की थैलियों का ही उपयोग किया जा सकता है । 25 माइक्रोन से कम की रिसायकल्ड प्लास्टिक की थैलियां और २० माइक्रोन से कम की नई प्लास्टिक की थैलियों के उपयोग पर प्रतिबंध रहेगा। किसी भी नदी-नाले, पाइप लाइन और पार्क आदि सार्वजनिक स्थलों पर इन थैलियों का कचरा डालने पर रोक रहेगी । नगरीय निकाय इन थैलियों के लिए अलग-अलग कचरा पेटी रखेंगे।  पॉलीथिन के कारण सीवर लाइन बंद हो जाती है । इस वजह से दूषित पानी बहकर पाइप लाइन तक पहुंचकर पेयजल को दूषित करता है जिससे बीमारियां फैलती है । इसे उपजाऊ जमीन में फेंकने से भूमि बंजर होती जाती है । कचरे के साथ जलाने से जहरीली गैसे निकलती है जो वायु प्रदूषण फैलाती  है और ओजोन परत को क्षति पहुंचाती है ।गाय बैल आदि जानवर पालिथिन में चिपके खाद्य पदार्थ खाने के प्रलोभन में पतली पालीथिन की पन्नियां गुटक जाते हैं जो उनके पेट में फँस कर रह जाती हैं एवं उनकी मृत्यु हो जाती है . अतः पालीथिन पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है ।

प्रधानमंत्री जी ने बेहद महत्वपूर्ण देशव्यापी स्वच्छता अभियान चलाया हुआ है । रोजमर्रा शहरो से निकलने वाले घरेलू कचरे का सुरक्षित निष्पादन बहुत जरूरी है । ज्वलनशील कचरे को जलाकर बिजली उत्पादन की परियोजनायें बनाई जा रही हैं . जबलपुर में एक ऐसी ही परियोजना से प्रतिदि ८ मेगावाट बिजली इन दिनो बन रही है । जो प्लास्टिक, कागज, पुट्ठे का कचरा रिसाइकिल हो सकता है उसे निरंतर पुनरूपयोग किया जाना आवश्यक है । इसके लिये भी उद्योग स्थापित किये जाने को प्रोत्साहन की आवश्यकता है । जो बायो डिग्रेडबल कचरा कम्पोस्ट जैसी खाद बना सकता है उससे खाद बनाने की इकाईयां लगानी जरूरी हैं ।  समग्र रूप से कहा जा सकता है कि  कचरा प्रगति का दूसरा पहलू है जिससे बचना मुश्किल है, पर उसके समुचित तरीके से डिस्पोजल से ही हम मानव जीवन और प्रगति के बीच तादात्म्य बना कर विज्ञान के वरदान को अभिशाप बनने से रोक सकते हैं ।

 

© अनुभा श्रीवास्तव

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ रंजना जी यांचे साहित्य #-15 – कधी प्रेम माझे समजशील सूर्या ☆ – श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

 

(श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।  आज  प्रस्तुत है  पृथ्वी , सूर्य एवं प्रकृति के काल्पनिक प्रेम पर आधारित कविता  – “कधी प्रेम माझे समजशील सूर्या। )

 

? साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य #- 15? 

 

? कधी प्रेम माझे समजशील सूर्या  ?

(वृत्त- लगावली- लगागा लगागा लगागा लगागा )

युगे लोटली रे फिरावे किती मी।

कधी प्रेम  माझे समजशील सूर्या।

 

कितीदा नव्याने स्मरावे तुला मी

कधी साद हृदयात गुंजेल सूर्या?

 

असे रोज वेळेत येणे नि जाणे।

कधी तू जिवाला रमवशील सूर्या।

 

तुला सावलीचे असे वावडे का?

कधी खेळ खेळात हरशील सूर्या?

 

उगा अट्टहासे किती तापसी रे

तलम प्रेम धागे उसवशील सूर्या ?

 

नको तापवू रे जरा शांत होई।

किती या धरेला ठकवशील सूर्या ?

 

जरी पारदर्शी तुझी कार्य  कीर्ती।

परी डाग दुनियेस  दिसतील सूर्या

 

किती गूज चाले नभी तारकांचे।

खुळे भास त्यांचे पुसशील सूर्या ।

 

©  रंजना मधुकर लसणे✍

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

Please share your Post !

Shares

आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – षष्ठम अध्याय (6) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

षष्ठम अध्याय

( आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण )

 

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।

अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌ ।।6।।

 

जीता जिसने स्वतः को, तो वह उसका मित्र

जीत सका न स्वतः को ,तो है स्वयं का शत्रु।।6।।

 

भावार्थ :  जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है।।6।।

The self is the friend of the self for him who has conquered himself by the Self, but to the  unconquered self, this self stands in the position of an enemy like the (external) foe. ।।6।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – अभियंता दिवस विशेष – ☆ भारत रत्न अभियंता सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर विशेष ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

अभियंता दिवस विशेष 
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(अभियंता दिवस पर  वरिष्ठ साहित्यकार एवं अभियंता  श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी का  विशेष आलेख  भारत रत्न अभियंता सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर विशेष.) 

 

 ☆ भारत रत्न अभियंता सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया के जन्म दिवस पर विशेष ☆

 

आज अमेरिका में सिलिकान वैली में तब तक कोई कंपनी सफल नही मानी जाती जब तक उसमें कोई भारतीय इंजीनियर कार्यरत न हो, भारत के आई आई टी जैसे संस्थानो के इंजीनियर्स ने विश्व में अपनी बुद्धि से भारतीय श्रेष्ठता का समीकरण अपने पक्ष में कर दिखाया है, प्रतिवर्ष भारत रत्न सर मोक्षगुण्डम विश्वेश्वरैया का जन्मदिवस इंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है, पंडित नेहरू ने कल कारखानो को नये भारत के तीर्थ कहा था, इन्ही तीर्थौ के पुजारी, निर्माता इंजीनियर्स को आज अभियंता दिवस पर बधाई,…विगत कुछ दशको में इंजीनियर्स की छबि में भ्रष्टाचार के घोलमाल में बढ़ोत्री हुई है, अनेक इंजीनियर्स शासनिक अधिकारी या मैनेजमेंट की उच्च शिक्षा लेकर बड़े मैनेजर बन गये हैं, आइये आज इंजीनियर्स डे पर कुछ पल चिंतन करे समाज में इंजीनियर्स की इस दशा पर, हो रहे इन परिवर्तनो पर

… इंजीनियर्स अब राजनेताओ के इशारो चलने वाली कठपुतली नही हो गये हैं क्या? देश में आज इंजीनियरिंग शिक्षा के हजारो कालेज खुल गये हैं, लाखो इंजीनियर्स प्रति वर्ष निकल रहे हैं, पर उनमें से कितनो में वह योग्यता या जज्बा है जो भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया में था,……मनन चिंतन का विषय है.

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया की जीवनी, अध्ययन और  प्रेरणा पुंज

भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्म स्थान से ही पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। विश्वेश्वरैया ने 1881 में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।

दक्षिण भारत के मैसूर, कर्र्नाटक को एक विकसित एवं समृद्धशाली क्षेत्र बनाने में भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया का अभूतपूर्व योगदान है। तकरीबन 55 वर्ष पहले जब देश स्वंतत्र नहीं था, तब कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत अन्य कई महान उपलब्धियां एमवी ने कड़े प्रयास से ही संभव हो पाई। इसीलिए इन्हें कर्नाटक का भगीरथ भी कहते हैं। जब वह केवल 32 वर्ष के थे, उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए समिति बनाई। इसके लिए भारत रत्न इंजीनियर सर मोक्षगुण्डम विश्वेवश्वरैया ने एक नए ब्लॉक सिस्टम को ईजाद किया।

उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने मुक्तकंठ से की। आज यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है।

विश्वेश्वरैया ने मूसा व इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किए। इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया।

उस वक्त राज्य की हालत काफी बदतर थी। विश्वेश्वरैया लोगों की आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि को लेकर भी चिंतित थे। फैक्टरियों का अभाव, सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भरता तथा खेती के पारंपरिक साधनों के प्रयोग के कारण समस्याएं जस की तस थीं। इन समस्याओं के समाधान के लिए विश्वेश्वरैया ने इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस के गठन का सुझाव दिया। मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया।

कृष्णराजसागर बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट नहीं बनता था, इसके लिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। 1912 में विश्वेश्वरैया को मैसूर के महाराजा ने दीवान यानी मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया।

विश्वेश्वरैया शिक्षा की महत्ता को भलीभांति समझते थे। लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दिया। इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई। मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल तथा पहला फ‌र्स्ट ग्रेड कॉलेज (महारानी कॉलेज) खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन दिनों मैसूर के सभी कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। उनके ही अथक प्रयासों के चलते मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने श्रेष्ठ छात्रों को अध्ययन करने के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था की। उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेजों को भी खुलवाया।

वह उद्योग को देश की जान मानते थे, इसीलिए उन्होंने पहले से मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, संदल, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया। धन की जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने बैंक ऑफ मैसूर खुलवाया। इस धन का उपयोग उद्योग-धंधों को विकसित करने में किया जाने लगा। 1918 में विश्वेश्वरैया दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए। औरों से अलग विश्वेश्वरैया ने 44 वर्ष तक और सक्रिय रहकर देश की सेवा की। सेवानिवृत्ति के दस वर्ष बाद भद्रा नदी में बाढ़ आ जाने से भद्रावती स्टील फैक्ट्री बंद हो गई। फैक्ट्री के जनरल मैनेजर जो एक अमेरिकन थे, ने स्थिति बहाल होने में छह महीने का वक्त मांगा। जोकि विश्वेश्वरैया को बहुत अधिक लगा। उन्होंने उस व्यक्ति को तुरंत हटाकर भारतीय इंजीनियरों को प्रशिक्षित कर तमाम विदेशी इंजीनियरों की जगह नियुक्त कर दिया। मैसूर में ऑटोमोबाइल तथा एयरक्राफ्ट फैक्टरी की शुरूआत करने का सपना मन में संजोए विश्वेश्वरैया ने 1935 में इस दिशा में कार्य शुरू किया। बंगलूर स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स तथा मुंबई की प्रीमियर ऑटोमोबाइल फैक्टरी उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। 1947 में वह आल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। उड़ीसा की नदियों की बाढ़ की समस्या से निजात पाने के लिए उन्होंने एक रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट के आधार पर हीराकुंड तथा अन्य कई बांधों का निर्माण हुआ।

वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे। 1928 में पहली बार रूस ने इस बात की महत्ता को समझते हुए प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार की थी। लेकिन विश्वेश्वरैया ने आठ वर्ष पहले ही 1920 में अपनी किताब रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया में इस तथ्य पर जोर दिया था।

इसके अलावा 1935 में प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया भी लिखी। मजे की बात यह है कि 98 वर्ष की उम्र में भी वह प्लानिंग पर एक किताब लिख रहे थे। देश की सेवा ही विश्वेश्वरैया की तपस्या थी। 1955 में उनकी अभूतपूर्व तथा जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। जब वह 100 वर्ष के हुए तो भारत सरकार ने डाक टिकट जारी कर उनके सम्मान को और बढ़ाया। 101 वर्ष की दीर्घायु में 14 अप्रैल 1962 को उनका स्वर्गवास हो गया। 1952 में वह पटना गंगा नदी पर पुल निर्माण की योजना के संबंध में गए। उस समय उनकी आयु 92 थी। तपती धूप थी और साइट पर कार से जाना संभव नहीं था। इसके बावजूद वह साइट पर पैदल ही गए और लोगों को हैरत में डाल दिया। विश्वेश्वरैया ईमानदारी, त्याग, मेहनत इत्यादि जैसे सद्गुणों से संपन्न थे। उनका कहना था, कार्य जो भी हो लेकिन वह इस ढंग से किया गया हो कि वह दूसरों के कार्य से श्रेष्ठ हो।

उनकी जीवनी हमारे लिये प्रेरणा है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 

ए-1, एमपीईबी कालोनी, शिलाकुंज, रामपुर, जबलपुर, मो. ७०००३७५७९८

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ संजय उवाच – #12 – समष्टि….व्यष्टि! ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली    । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 12 ☆

 

☆ समष्टि …. व्यष्टि ! ☆

 

रेल में भीड़-भड़क्का है। हर कोई अपने में मशगूल। एक तीखा, अनवरत स्वर ध्यान बेधता है। साठ से ऊपर की एक स्त्री, संभवतः स्वर यंत्र में कोई दोष है। बच्चा मचलकर किसी वस्तु के लिए हठ करता है, एक साँस में रोता है, कुछ उसी तरह के स्वर में भुनभुना रही है वह। अंतर इतना कि बच्चे के स्वर को उसके अबोध भाव के चलते बहुत देर तक बरदाश्त किया जा सकता है पर यह स्वर बिना थके इतना लगातार कि खीज पैदा हो जाए। दूर से लगा कि यह भीख मांगने का एक और तरीका भर है। वह निरंतर आँख से दूर जा रही थी और साथ ही कान भुनभुनाहट से राहत महसूस कर रहे थे।

किसी स्टेशन पर रेल रुकी। प्लेटफॉर्म की विरुद्ध दिशा में वही भुनभुनाहट सुनाई दी। वह स्त्री पटरियों पर उतरकर दूसरी तरफ के प्लेटफॉर्म पर चढ़ी। हाथ से इशारा करती, उसी तरह भुनभुनाती बेंच पर बैठे एक यात्री से उसका बैग छीनने लगी। बैगवाला व्यक्ति हड़बड़ा गया। उस स्टेशन से रोज यात्रा करनेवाले एक यात्री ने हाथ के इशारे से महिला को आगे जाने के लिए कहा। बुढ़िया आगे बढ़ गई।

माज़रा समझ में आ गया। बुढ़िया का दिमाग चल गया है। पराया सामान, अपना समझती है, उसके लिए विलाप करती है।

चित्र दुखद था। कुछ ही समय में चित्र एन्लार्ज होने लगा। व्यष्टि का स्थान समष्टि ने ले लिया था। क्या मर्त्यलोक में मनुष्य परायी वस्तुओं के प्रति इसी मोह से ग्रसित नहीं है? इन वस्तुओं को पाने के लिए भुनभुनाना, न पा सकने पर विलाप करना, बौराना और अंततः पूरी तरह दिमाग चल जाना।

अचेत अवस्था से बाहर आओ। समय रहते चेत जाओ अन्यथा समष्टि का चित्र रिड्युस होकर व्यष्टि पर रुकेगा। इस बार हममें से कोई उस बुढ़िया की जगह होगा।

इति।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पितृ पक्ष पर कुछ दोहे सादर समर्पित ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(पितर पक्ष के अवसर पर जब हम अपने पितरों का स्मरण करते हैं ऐसे अवसर पर प्रस्तुत हैं आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  के कुछ  अविस्मरणीय दोहे .)

 

☆ पितृ पक्ष पर कुछ दोहे सादर समर्पित ☆

 

पितरों को सादर नमन, वंदन शत शत बार

सदा आप ही हमारे, जीवन का आधार

 

तुम बिन सूना सा लगे, यह अपना घर द्वार

कोई देता है कहाँ, तुम सा लाड़ प्यार

 

तर्पण पितरों का करें, सदा प्रेम से आप

श्रद्धा से ही श्राद्ध है, हरती भव के ताप

 

जिनके पुण्य प्रताप से, जीवन में उल्लास

उनके ही आशीष से, रिद्धि सिद्धि का वास

 

पुण्य कर्म से सुधरता, अपना ही परलोक

करनी ऐसी कर चलो, घर में हो आलोक

 

आना जाना है लगा,यह जीवन का सार

अपने कर्मों से मिले,जीवन में सत्कार

 

पितृ भक्ति से सदा ही,जीवन सफल महान

पित्र चरण की धूल को,पूजे सकल जहान

 

ईश्वर के अस्तित्व का,हो जिनसे अहसास

धन्य धन्य वो लोग हैं, रहें पिता के पास

 

पितरों के आशीष से,जीवन में “संतोष”

सांची सेवा से बढ़े, सुखद शांति का कोष

————————

@ संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 15 – व्यंग्य – हश्र एक उदीयमान नेता का ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

 

(आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  e-abhivyakti के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं.  हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे. डॉ कुंदन सिंह परिहार जी ने अपने प्राचार्य जीवन में अपने छात्रों को  छात्र नेता , वरिष्ठ नेता , डॉक्टर , इंजीनियर से लेकर उच्चतम प्रशासनिक पदों  तक जाते हुए देखा है. इसके अतिरिक्त  कई छात्रों को बेरोजगार जीवन से  लेकर स्वयं से जूझते हुए तक देखा है.  इस क्रिया के प्रति हमारा दृष्टिकोण भिन्न हो सकता है किन्तु, उनके जैसे वरिष्ठ प्राचार्य का अनुभव एवं दृष्टिकोण निश्चित ही भिन्न होगा जिन्होंने ऐसी प्रक्रियाओं को अत्यंत नजदीक से देखा है. आज प्रस्तुत है  उनका  व्यंग्य  “हश्र एक उदीयमान नेता का” .)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 15 ☆

 

☆ व्यंग्य – हश्र एक उदीयमान नेता का ☆

 

भाई रामसलोने के कॉलेज में दाखिला लेने का एकमात्र कारण यह था कि वे सिर्फ इंटर पास थे और धर्मपत्नी विमला देवी बी.ए.की डिग्री लेकर आयीं थीं।  परिणामतः रामसलोने जी में हीनता भाव जाग्रत हुआ और उससे मुक्ति पाने के लिए उन्होंने बी.ए. में दाखिला ले लिया।

दैवदुर्योग से जब परीक्षा-फार्म भरने की तिथि आयी तब प्रिंसिपल ने उनका फार्म रोक लिया।  बात यह थी कि रामसलोने जी की उपस्थिति पूरी नहीं थी।  कारण यह था कि बीच में विमला देवी ने जूनियर रामसलोने को जन्म दे दिया, जिसके कारण रामसलोने जी ब्रम्हचारी के कर्तव्यों को भूलकर गृहस्थ के कर्तव्यों में उलझ गये।  कॉलेज से कई दिन अनुपस्थित रहने के कारण यह समस्या उत्पन्न हो गयी।

प्रिंसिपल महोदय दृढ़ थे।  रामसलोने की तरह आठ-दस छात्र और थे जो पढ़ाई के समय बाज़ार में पिता के पैसे का सदुपयोग करते रहे थे।

सब मिलकर प्रिंसिपल महोदय से मिले।  कई तरह से प्रिंसिपल साहब से तर्क-वितर्क किये, लेकिन वे नहीं पसीजे।  रामसलोने जी आवेश में आ गये।  अचानक मुँह लाल करके बोले, ‘आप हमारे फार्म नहीं भेजेंगे तो मैं आमरण अनशन करूँगा।’ साथी छात्रों की आँखों में प्रशंसा का भाव तैर गया, लेकिन प्रिंसिपल महोदय अप्रभावित रहे।

दूसरे दिन रामसलोने जी का बिस्तर कॉलेज के बरामदे में लग गया।  रातोंरात वे रामसलोने जी से ‘गुरूजी’ बन गये।  कॉलेज का बच्चा-बच्चा उनका नाम जान गया।  साथी छात्रों ने उनके अगल-बगल दफ्तियाँ टांग दीं जिनपर लिखा था, ‘प्रिंसिपल की तानाशाही बन्द हो’, ‘छात्रों का शोषण बन्द करो’, ‘हमारी मांगें पूरी करो’, वगैरः वगैरः।  उन्होंने रामसलोने का तिलक किया और उन्हें मालाएं पहनाईं।  रामसलोने जी गुरुता के भाव से दबे जा रहे थे।  उन्हें लग रहा था जैसे उनके कमज़ोर कंधों पर सारे राष्ट्र का भार आ गया हो।

अनशन शुरू हो गया।  साथी छात्र बारी- बारी से उनके पास रहते थे।  बाकी समय आराम से घूमते-घामते थे।

तीसरे दिन रामसलोने जी को उठते बैठते कमज़ोरी मालूम पड़ने लगी।  प्रिंसिपल महोदय उन्हें देखने आये, उन्हें समझाया, लेकिन साथी छात्र उनकी बातों को बीच में ही ले उड़ते थे।  उन्होंने प्रिंसिपल की कोई बात नहीं सुनी, न रामसलोने को बोलने दिया।

रामसलोने जी की हालत खस्ता थी।  उन्हें आवेश में की गयी अपनी घोषणा पर पछतावा होने लगा था और पत्नी के हाथों का बना भोजन दिन-रात याद आता था।  उनका मनुहार करके खिलाना भी याद आता था।  लेकिन साथियों ने उनका पूरा चार्ज ले लिया था। वे ही सारे निर्णय लेते थे। रामसलोने जी के हाथ में उन्होंने सिवा अनशन करने के कुछ नहीं छोड़ा था।

डाक्टर रामसलोने जी को देखने रोज़ आने लगा।  प्रिंसिपल भी रोज़ आते थे, लेकिन न वे झुकने को तैयार थे, न रामसलोने जी के साथी।

आठवें दिन डाक्टर ने रामसलोने जी के साथियों को बताया कि उनकी हालत अब खतरनाक हो रही है। रामसलोने जी ने सुना तो उनका दिल डूबने लगा। लेकिन उनके साथी ज़्यादा प्रसन्न हुए।  उन्होंने रामसलोने जी से कहा, ‘जमे रहो गुरूजी! अब प्रिंसिपल को पता चलेगा। आप अगर मर गये तो हम कॉलेज की ईंट से ईंट बजा देंगे।’  रामसलोने के सामने दुनिया घूम रही थी।

दूसरे दिन से उनके साथी वहीं बैठकर कार्यक्रम बनाने लगे कि अगर रामसलोने जी शहीद हो गये तो क्या क्या कदम उठाये जाएंगे।  सुझाव दिये गये कि रामसलोने जी की अर्थी को सारे शहर में घुमाया जाए और उसके बाद सारे कॉलेजों में अनिश्चितकालीन हड़ताल और शहर बन्द हो।  ऐसा उपद्रव हो कि प्रशासन के सारे पाये हिल जाएं।  उन्होंने रामसलोने जी से कहा, ‘तुम बेफिक्र रहो, गुरूजी। कॉलेज के बरामदे में तुम्हारी मूर्ति खड़ी की जाएगी।’

रात को आठ बजे रामसलोने जी  अपने पास तैनात साथी से बोले, ‘भैया, एक नींबू ले आओ, मितली उठ रही है।’  इसके पाँच मिनट बाद ही एक लड़खड़ाती आकृति सड़क पर एक रिक्शे पर चढ़ते हुए कमज़ोर स्वर में कह रही थी, ‘भैया, भानतलैया स्कूल के पास चलो। यहाँ से लपककर निकल चलो।’

एक घंटे के बाद बदहवास छात्रों का समूह रामसलोने जी के घर की कुंडी बजा रहा था, परेशान आवाज़ें लगा रहा था। सहसा दरवाज़ा खुला और चंडी-रूप धरे विमला देवी दाहिने कर-कमल में दंड।  धारे प्रकट हुईं।  उन्होंने भयंकर उद्घोष करते हुए छात्र समूह को चौराहे के आगे तक खदेड़ दिया।  खिड़की की फाँक से दो आँखें यह दृश्य देख रही थीं।

कुन्दन सिंह परिहार

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – राज भाषा दिवस विशेष ☆ हिंदी पर दोहे और कविता ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

राजभाषा दिवस विशेष 

डॉ भावना शुक्ल

(राज भाषा दिवस पर प्रस्तुत है डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘)  जी की  विशेष प्रस्तुति हिंदी पर दोहे और कविता. )

 

☆ हिंदी पर दोहे और कविता ☆

 

हिंदी पर दोहे और कविता की प्रस्तुति

अपने मन की अभिव्यक्ति।

 

☆ दोहे ☆

 

हिंदी पा़ये प्रतिष्ठा, बढ़े देश का मान।

वरना थोथे शब्द है,मेरा देश महान ।।

शब्द शब्द में है बसी, शब्द शब्द की जान।

तोल मोल कर बोलना, शब्दों का सम्मान।।

हिन्दी प्रेमी जगत में, हिन्दी है पहचान ।

अंतस में भाषा बसे, ज्योकि ह्रदय में प्राण।।

हिंदी परचम देश का हिंदी है पहचान ।

लिखो पढ़ो तुम राम जी या पढ़ लो रहमान।।

 

☆ हिंदी ☆

 

हिंदी हमारी

आन-बान और शान है

दिलों में हमारे

बसती जान है।

हिंदी के

सुवर्ण से रचा शब्द

शब्दों से बना वाक्य

और वाक्य ने रच दी

आत्मकथा ,काव्य ,कहानी

साहित्यकारों की जुबानी

जिसमें रस,छंद है अलंकार

जिससे होता है

काव्य का श्रृंगार है।

हिंदी भाषा तो

रस की खान है

भाव  से भरा

रहीम रसखान है ।

धन्य है भाषा धन्य है साहित्य

जो महान मनीषियों की जान है

हिंदी के स्वर और व्यंजन

है साहित्य का अंजन

है इनमे सुंदरता का प्रतिमान

नहीं है इसको अभिमान।

हिंदी में होती है बिंदी

मातृ भाषा ,राजभाषा है हिंदी

हर वर्ण में सुरों की

झंकार है।

मीठी है हिंदी

मधुर है वाणी

हिंदी की  हम करते पुकार है।

 

© डॉ भावना शुक्ल
सहसंपादक…प्राची

Please share your Post !

Shares

Our Visitors

800318
Optimized by Optimole