हिन्दी साहित्य – ☆ लघुकथा ☆ नीरव प्रतिध्वनि ☆ – डॉ चंद्रेश कुमार छतलानी

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

 

(डॉ चंद्रेश कुमार छतलानी जी  लघुकथा, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ, बालकथा, बोधकथा, लेख, पत्र आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं.  आपकी रचनाएँ प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे पाठकों को आपकी उत्कृष्ट रचनाएँ समय समय पर पढ़ने को मिलती रहेंगी. आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर सार्थक  लघुकथा   “नीरव प्रतिध्वनि”.)

 

☆ लघुकथा – नीरव प्रतिध्वनि ☆ 

 

हॉल तालियों से गूँज उठा, सर्कस में निशानेबाज की बन्दूक से निकली पहली ही गोली ने सामने टंगे खिलौनों में से एक खिलौना बतख को उड़ा दिया था। अब उसने दूसरे निशाने की तरफ इशारा कर उसकी तरफ बन्दूक उठाई। तभी एक जोकर उसके और निशानों के बीच सीना तान कर खड़ा हो गया।

निशानेबाज उसे देख कर तिरस्कारपूर्वक बोला, “हट जा।”

जोकर ने नहीं की मुद्रा में सिर हिला दिया।

निशानेबाज ने क्रोध दर्शाते हुए बन्दूक उठाई और जोकर की टोपी उड़ा दी।

लेकिन जोकर बिना डरे अपनी जेब में से एक सेव निकाल कर अपने सिर पर रख कर बोला “मेरा सिर खाली नहीं रहेगा।”

निशानेबाज ने अगली गोली से वह सेव भी उड़ा दिया और पूछा, “सामने से हट क्यों नहीं रहा है?”

जोकर ने उत्तर दिया, “क्योंकि… मैं तुझसे बड़ा निशानेबाज हूँ।”

“कैसे?” निशानेबाज ने चौंक कर पूछा तो हॉल में दर्शक भी उत्सुकतावश चुप हो गए।

“इसकी वजह से…” कहकर जोकर ने अपनी कमीज़ के अंदर हाथ डाला और एक छोटी सी थाली निकाल कर दिखाई।

यह देख निशानेबाज जोर-जोर से हँसने लगा।

लेकिन जोकर उस थाली को दर्शकों को दिखा कर बोला, “मेरा निशाना देखना चाहते हो… देखो…”

कहकर उसने उस थाली को ऊपर हवा में फैंक दिया और बहुत फुर्ती से अपनी जेब से एक रिवाल्वर निकाल कर उड़ती थाली पर निशाना लगाया।

गोली सीधी थाली से जा टकराई जिससे पूरे हॉल में तेज़ आवाज़ हुई – ‘टन्न्न्नन्न…..’

गोली नकली थी इसलिए थाली सही-सलामत नीचे गिरी। निशानेबाज को हैरत में देख जोकर थाली उठाकर एक छोटा-ठहाका लगाते हुए बोला, “मेरा निशाना चूक नहीं सकता… क्योंकि ये खाली थाली मेरे बच्चों की है…”

हॉल में फिर तालियाँ बज उठीं, लेकिन बहुत सारे दर्शक चुप भी थे उनके कानों में “टन्न्न्नन्न” की आवाज़ अभी तक गूँज रही थी।

 

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर-5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) – 313 002

ईमेल:  chandresh.chhatlani@gmail.com

फ़ोन: 9928544749

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हिन्दी साहित्य – साहित्य निकुंज # 24 ☆ कविता ☆ परिभाषित ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  उनकी कविता परिभाषित। 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 24  साहित्य निकुंज ☆

☆ परिभाषित

 

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित

मन की क्या भाषा लिखूं।

प्रेम की क्या परिभाषा लिखूं।

चिंतनता का बिंदु क्या

सागर का सिंधु क्या

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित

 

आत्मा की गहराई में तुम

प्यार की ऊंचाई क्या?

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित

 

तुम ही हो देवत्व स्वरूप

देवत्व की पहचान क्या?

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित।

 

लिख रहे है खुशबुओं से

मन के मीत हो तुम ही

जीवन का संगीत तुम ही

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित ।

 

जीवन की आभा तुम ही

सुर की साधना तुम ही

प्रेम का संगीत तुम ही

कर दिया तुम्हें परिभाषित।

 

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

wz/21 हरि सिंह पार्क, मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व ), नई दिल्ली –110056

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ये जग राई है ☆ – सुश्री शुभदा बाजपेई

सुश्री शुभदा बाजपेई

 

(सुश्री शुभदा बाजपेई जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप हिंदी साहित्य  की ,गीत ,गज़ल, मुक्तक,छन्द,दोहे विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं। सुश्री शुभदा जी कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं एवं आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर  कई प्रस्तुतियां। आज प्रस्तुत है आपकी एक आपकी एक  अतिसुन्दर कविता  “ये जग राई है ”. )

 

☆ ये जग राई है ☆

 

कश्ती है  या लंगर है

पानी-पानी कंकड़ है

 

सहरा-सहरा देखा है

शाने मस्त कलंदर है

 

मिट्टी- मिट्टी  धरती है

उसके बीच समंदर है

 

उछल कूद ये जारी है

आदमी है  या बंदर है

 

दौडा़  भागा  जाता है

बच्चा बडा़ खेलंदर है

 

बाहर -बाहर दुनिया है

दुनिया घर के अंदर है

 

‘शुभदा” ये जग राई है

या तो  सांप छछुंदर है

 

 

© सुश्री शुभदा बाजपेई

कानपुर, उत्तर प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – नर्मदा परिक्रमा – द्वितीय चरण – कविता # 4 ☆ सहारा ☆ – श्री प्रयास जोशी

श्री प्रयास जोशी

(श्री प्रयास जोशी जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आदरणीय श्री प्रयास जोशी जी भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स  लिमिटेड भोपाल से सेवानिवृत्त हैं।  आपको वरिष्ठ साहित्यकार  के अतिरिक्त भेल हिंदी साहित्य परिषद्, भोपाल  के संस्थापक सदस्य के रूप में जाना जाता है। 

ई- अभिव्यक्ति में हमने सुनिश्चित किया था कि – इस बार हम एक नया प्रयोग  करेंगे ।  श्री सुरेश पटवा जी  और उनके साथियों के द्वारा भेजे गए ब्लॉगपोस्ट आपसे साझा  करने का प्रयास करेंगे।  निश्चित ही आपको  नर्मदा यात्री मित्रों की कलम से अलग अलग दृष्टिकोण से की गई यात्रा  अनुभव को आत्मसात करने का अवसर मिलेगा। इस यात्रा के सन्दर्भ में हमने यात्रा संस्मरण श्री सुरेश पटवा जी की कलम से आप तक पहुंचाई एवं श्री अरुण कुमार डनायक जी  की कलम से आप तक सतत पहुंचा रहे हैं।  हमें प्रसन्नता है कि  श्री प्रयास जोशी जी ने हमारे आग्रह को स्वीकार कर यात्रा  से जुडी अपनी कवितायेँ  हमें,  हमारे  प्रबुद्ध पाठकों  से साझा करने का अवसर दिया है। इस कड़ी में प्रस्तुत है उनकी कविता  “ सहारा  ”। 

☆ नर्मदा परिक्रमा – द्वितीय चरण – कविता # 4 – सहारा  ☆

 

ऊबड़-खाबड़,दलदली खाइ-गड्डों

और धसकती कगारों पर

लाठियों के सहारे/चलते हुये हमें

अकस्मात ऐसा लगा कि जैसे यह

लाठिया न होकर,

पत्नियों के हाथ हों

जो, फिसलन से सचेत करते हुये

कह रहे हों हम से–पैर जमा कर

संभल कर चलो …

और जब भी भटकती हुई,समय की

भूख प्यास हमारे पास आई..

नर्मदा के सुंदर,रेतीले किनारों की

छाया में रोक कर हमें/ घर के झोलों से

निकाल कर खिला रहे हों

गुड़ के खुरमें,मटरीॆ/कई तरह की

साग, पूड़ी-पराठे, मूंगफली, चने,खजूर

बिस्कुट,सूखे-गीले फल…

और यादों से छूटा और भी बहुत कुछ

—हंसी मजाक के स्वाद को आगे बढा़ती

चलती शीतल हवा, पोंछते पसीना

कह रहे हो हम से कि अगर ऐसे ही

चलते रहे तो कब पहुंचोगे

गरूरा घाट  ?

तीन किलो मीटर का भी नहीं निकलेगा

ऐवरेज……

 

(उन हाथों को नमन, जो साथ न चलते हुये भी लाठी की तरह साथ रहे और हमारी नर्मदा यात्रा को पार लगाया)

 

©  श्री प्रयास जोशी

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 14 ☆ चलो मिलकर सरकार बनाएं  ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष”  की अगली कड़ी में प्रस्तुत है उनकी एक सामायिक कविता  “चलो मिलकर सरकार बनाएं ”. आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़ सकेंगे . ) 

 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 14 ☆

☆ चलो मिलकर सरकार बनाएं   ☆

चलो मिलकर सरकार बनाएं

भानुमति का आकार बनाएं  ।।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।

 

झूठ,कपट,धोखा,मक्कारी ।

घात,आघात की तैयारी ।।

स्वयं की जय जयकार लगाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

जनता को दे झूठ दिलासा ।

आगे रख खुद की अभिलाषा ।।

जोड़ तोड़ कर दरबार सजाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

राजनीति की अलग चाल है ।

यहां बस झूठ का धमाल है ।।

सत्ता अब मक्कार चलाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

यहां न कोई सगा संबंधी ।

राजनीति की रीति है गन्दी ।।

सत्ता से सरोकार बनाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

कोर्ट कचहरी आम बात है ।

यहां न कोई जाति पांति है ।।

कुर्सी के ब्यवहार बनाएँ ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

यहां सभी हैं धुन के पक्के ।

एक दूजे को देते गच्चे  ।।

इन्हें कौन संस्कार पढ़ाए ।।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

जागो जागो हे मतदाता ।

तुम्ही सब के भाग्य विधाता ।।

यह अवसर ना हर बार लाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

राजनीति में “संतोष” कहाँ ।

इक दूजे को दें दोष यहाँ ।।

पर खुद को खुद्दार बतायें ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

सपने सभी साकार बनाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

© संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (3) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

 

श्रीभगवानुवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।

भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ।।3।।

भगवान ने बताया-

है अध्यात्म पर ब्रम्ह का स्वाभाविक आधार

कर्म ही प्राणि स्वभाव के उद्भव का व्यवहार।।3।।

      

भावार्थ :  श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है।।3।।

Brahman is the Imperishable, the Supreme; His essential nature is called Self-knowledge;  the  offering  (to  the  gods)  which  causes  existence  and  manifestation  of  beings  and  which  also sustains them is called action.।।3।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 8 ☆ लघुकथा – आईने में माँ ☆ – डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है.  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं.  अब आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे. आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण  लघुकथा “ आईने  में माँ ”)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 8 ☆

☆ लघुकथा – आईने में माँ  ☆ 

 

आईने के सामने खड़ी होती हूँ तो मुझे उसमें माँ का चेहरा नजर आता है, ये आँखें देखो…..माँ की ही तो हैं — वही ममतामयी पनीली आँखें, कुछ सूनापन लिए हुए। बार-बार पीछे पलटकर देखती हूँ – नहीं, कहीं नहीं है माँ आसपास, फिर ?

फिर देखा आईने की ओर, आँखें कुछ कह रही थीं मुझसे – रह गई न तुम भी अकेली अपने घर में ? बच्चे पढ़ लिखकर अपने काम में लग गए होंगे, किसी दूसरे शहर में या क्या पता विदेश में? आजकल तो एजूकेशन लोन लेकर बड़े गर्व से तुम लोग बच्चों को विदेश भेज देते हो। बच्चे विदेश पढने जाते हैं और वहीं बस जाते हैं फिर जिंदगी भर राह तकते बैठे रहो उनके आने की।

आँखें बिना रुके निरंतर बोल रही थीं मानों आज सब कुछ कहे बिना चुप ही न होंगी – जय तो शाम को ही आता होगा ? उसके आने के बाद तुम बहुत कुछ कहना चाहती होगी, दिन भर की बातें, जो तुमने मन ही मन बोली हैं अकेले में,  लेकिन वह सुनता है क्या ?

हमारे समय में तो मोबाईल भी नहीं था फिर भी तेरे  पिता के पास समय नहीं होता था मेरी बातें सुनने का। क्या पता इच्छा ही न होती हो मेरी बात सुनने की ? चाय-नाश्ता करके फिर निकल पड़ते थे अपने दोस्त यारों से गप्पे मारने। अरे हाँ ! अब तो व्हाट्सअप का समय है। खासतौर से पतियों को इसने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। अच्छा लगता है उन्हें अपनी दूर की भाभियों को मैसेज फारवर्ड करते रहना,  पत्नी की क्या सुने ? घर में ही तो है कहाँ जाने वाली है? फारवर्डेड मैसेज से दूसरों पर इम्प्रेशन डालना जरुरी है, भई।

बोलते-बोलते आँखें आँसुओं से लबालब हो रही थीं। शादी के बाद बच्चों और परिवार में औरतें अपने को भूल ही जाती हैं और जब उसका पूरा अस्तित्व  परिवार में समा जाता है तब उसे अकेला छोड़ दिया जाता है यह कहकर – बहुत शिकायत करती थीं ना ‘समय नहीं मिलता अपने लिए’ ? अब लो समय ही समय है ? करो, क्या करना चाहती थीं अपने लिए ?

औरत मूक भाव से देखती रह जाती है पति और बच्चों के चेहरों को किसी अबूझ पहेली की तरह। जब परिवार को जरूरत थी एक माँ की, पत्नी की, तब सब कुछ भूलकर जुट रही, जरूरत खत्म होने पर आदेश- अब जियो जैसे जीना चाहती हो। कैसे बताए कि जिम्मेदारियों की बेड़ियों ने खुलकर जीने की आदत ही नहीं रहने दी अब। ऐसे में घर के हर कमरे में बिखरा समय, सिर्फ सन्नाटा और सजा है एक औरत के लिए।

खाली घर में चादर की सलवटें ठीक करती, कपड़े सहेजती, डाइनिंग टेबिल साफ करती बंद होठों वाली औरत कभी बुदबुदाती है अपने आप से, कभी पाती है अपने सवालों के जवाब खुद से, कभी कमरों में बिखरी बच्चों की खट्टी मीठी यादों के साथ मुस्कुराती है तो कभी आँसुओं की झड़ी गालों को तर कर देती है – पर कोई नहीं है इसे देखने वाला, ना आँसू पोंछनेवाला, ना साथ बैठ यादों को ताजा कर मुस्कुराने वाला।

आईने में दिखती आँखें मानों गुस्से में बरस पड़ीं – ना – ना रोना मत, बतियाना मत अकेले में खुद से, बाहर निकल इस सन्नाटे से, अकेलेपन से  वरना तेरे अपने तुझे पागल करार देंगे।

बेसिन में पानी बह रहा था, हाथों में लेकर मुँह पर ठंडा पानी डाला,  छपाक  – आईने में मेरा चेहरा था, मेरी आँखें ?

कहाँ गई माँ ? उसकी पनीली आँखे ? मैंने फिर पलटकर देखा, वह कहीं नहीं थी।

मेरे चेहरे पर माँ की आँखें उग आई थीं ?

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 17 – Nothingness ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

 

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday Ms. Neelam Saxena Chandra ji is Executive Director (Systems) Mahametro, Pune. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem “Nothingness.)

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 17

☆ Nothingness ☆

 

There are so many sentiments-

The feeling of being loved,

The desire for togetherness,

The emotions of hurtfulness,

The longing of your arms,

The sadness on parting,

The glee on arrival;

But everything in life

Has to settle down!

 

Nature is full of entropy

And the most obvious way

Is to tend to move towards nothingness.

 

The questions are-

When do you move towards zilch?

And how do you tend towards zero?

 

Sadly,

For why,

There are no answers!

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 2 ☆ गीत – मीरा प्रेम दिवानी है ☆ – डॉ. राकेश ‘चक्र’

डॉ. राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा एक लाख पचास हजार के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि डॉ राकेश ‘चक्र’ जी ने  ई- अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से अपने साहित्य को हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर लिया है। इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं उनका एक गीत   “मीरा प्रेम दिवानी है.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 2 ☆

☆  मीरा प्रेम दिवानी है ☆ 

 

रोम-रोम में

श्याम बस गए

मीरा प्रेम दिवानी है

पावन अमर कहानी है

 

अन्तःपुर में ब्याह रचाया

प्रियतम कृष्ण सलोने से

कभी झुलाया कभी रिझाया

खेली प्रेम खिलौने से

 

रचे प्रेम के गीत बन गए

गीता  अमृत वाणी है

 

तुम अजेय हो

तुम विजेय हो

तुम हो पावन धरणी-सी

तुम्हीं नर्मदा, गंगा मैया

पाप,ताप दुख हरनी-सी

 

शिव-सी है श्रद्धा की देवी

सत की देव पुराणी है

 

हँसना-रोना आभूषण थे

जीवन के संग्रामों में

ऋतुओं ने भी राग सुनाए

भोर-दुपहरी-शामों में

 

नाची-गाई रीझी हरदम

दे दी प्रीत जवानी है

 

मेरे उर में मीरा तुम हो

प्यार मुझे भी दे जाना

विषय-वासना हर तापों को

श्याम सखा को दे जाना

 

मैं भी नाचूँ गाऊँ बेसुध

तू ही मेरी सानी है

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी,  शिवपुरी, मुरादाबाद 244001, उ.प्र .

मोबाईल –9456201857

e-mail –  rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य – # 22 ☆ व्यंग्य – हार्स ट्रेडिंग जिंदाबाद ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा  रचनाओं को “विवेक साहित्य ”  शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य  “हार्स ट्रेडिंग जिंदाबाद”.  श्री विवेक रंजन जी का यह  सामयिक व्यंग्य  लोकतंत्र तो क्या घोड़ों को भी  शर्मसार करता हुआ लगता है। खैर, जिसने भी ये शब्द हॉर्स ट्रेडिंग इज़ाद किया हो  या तो वो लोकतंत्र का बिका हुआ घोडा रहा होगा या फिर बिकने को तैयार। बड़ा ही अजीब व्यापार है भाई साहब। वैसे यदि गलत नहीं हूँ तो हॉर्स ट्रेडिंग घोड़ों द्वारा घोड़ों का व्यापार  लगता है। बाकी आप श्री विवेक जी के हॉर्स ट्रेडिंग सम्बन्धी इस  व्यंग्य को पढ़कर कमेंट बॉक्स में बताइयेगा ज़रूर। श्री विवेक रंजन जी ऐसे बेबाक  व्यंग्य के लिए निश्चित ही बधाई के पात्र हैं.  )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 22 ☆ 

☆ हार्स ट्रेडिंग जिंदाबाद ☆

 

अचानक 2000 रुपयो की गड्डियां बाजार से गायब होने की खबर आई, मैं अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा हूं कि 2000 के गुलाबी नोट धीरे धीरे  काले हो रहे हैं.   अखबार में पढ़ा था, गुजरात के माननीय 10 ढ़ोकलों  में बिके. सुनते हैं महाराष्ट्र में पेटी और खोको में बिकते हैं.  बिहार वालों का रेट अभी पत्रकारो को मालूम नहीं हो पाया है, वहां सबकी हमेशा से सोती हुई अंतर आत्मायें एक साथ जाग गईं थी और चिल्ला चिल्लाकर माननीयो को सोने नही दे रहीं. माननीयो ने दिलों का चैनल बदल लिया है, किसी स्टेशन से खरखराहट भरी आवाजें आ रही हैं तो  किसी एफ एम  से दिल को सुकून देने वाला मधुर संगीत बज रहा है, सारे जन प्रतिनिधियो ने वही मधुर स्टेशन ट्यून कर लिया. लगता है कि क्षेत्रीय दल, राष्ट्रीय दल से बड़े होते हैं, सरकारो के लोकतांत्रिक तख्ता पलट, नित नये दल बदल, इस्तीफे,के किस्से अखबारो की सुर्खियां बन रहे हैं.

रेस कोर्स के पास अस्तबल में घोड़ों की बड़े गुस्से, रोष और तैश में बातें हो रहीं थी. चर्चा का मुद्दा था हार्स ट्रेडिंग ! घोड़ो का कहना था कि कथित माननीयो की क्रय विक्रय प्रक्रिया को हार्स ट्रेडिंग  कहना घोड़ो का  सरासर अपमान है. घोड़ो का अपना एक गौरव शाली इतिहास है. चेतक ने महाराणा प्रताप के लिये अपनी जान दे दी,टीपू सुल्तान, महारानी लक्ष्मीबाई  की घोड़े के साथ  प्रतिमाये हमेशा प्रेरणा देती है. अर्जुन के रथ पर सारथी बने कृष्ण के इशारो पर हवा से बातें करते घोड़े,  बादल, राजा,पवन, सारंगी, जाने कितने ही घोड़े इतिहास में अपने स्वर्णिम पृष्ठ संजोये हुये हैं. धर्मवीर भारती ने तो अपनी किताब का नाम ही सूरज का सातवां घोड़ा रखा. अश्व शक्ति ही आज भी मशीनी मोटरो की ताकत नापने की इकाई है.राष्ट्रपति भवन हो या गणतंत्र दिवस की परेड तरह तरह की गाड़ियो के इस युग में भी, जब राष्ट्रीय आयोजनो में अश्वारोही दल शान से निकलता है तो दर्शको की तालियां थमती नही हैं.बारात में सही पर जीवन में कम से कम एक बार हर व्यक्ति घोड़े की सवारी जरूर करता है. यही नही आज भी हर रेस कोर्स में करोड़ो की बाजियां घोड़ो की ही दौड़ पर लगी होती हैं. फिल्मो में तो अंतिम दृश्यो में घोड़ो की दौड़ जैसे विलेन की हार के लिये जरूरी ही होती है, फिर चाहे वह हालीवुड की फिल्म हो या बालीवुड की. शोले की धन्नो और बसंती के संवाद तो जैसे अमर ही हो गये हैं. एक स्वर में सभी घोड़े हिनहिनाते हुये बोले  ये माननीय जो भी हों घोड़े तो बिल्कुल नहीं हैं. घोड़े अपने मालिक के प्रति  सदैव पूरे वफादार होते हैं जबकि प्रायः नेता जी की वफादारी उस आम आदमी के लिये तक नही दिखती जो उसे चुनकर नेता बना देता है.

वाक्जाल से, उसूलो से उल्लू बनाने की तकनीक नेता जी बखूबी जानते हैं.  अंतर्आत्मा की आवाज  वगैरह वे घिसे पिटे जुमले होते हैं जिनके समय समय पर अपने तरीके से इस्तेमाल करते हुये वे स्वयं के हित में जन प्रतिनिधित्व करते हैं और अपने किये गलत को सही साबित करने के लिये इस्तेमाल करते हैं.  नेताजी बिदा होते हैं तो उनकी धर्म पत्नी या पुत्र कुर्सी पर काबिज हो जाते हैं. पार्टी अदलते बदलते रहते हैं  पर नेताजी टिके रहते हैं. गठबंधन तो उसे कहते हैं जो सात फेरो के समय पत्नी के साथ मेरा, आपका हुआ था. कोई ट्रेडिंग इस गठबंधन को नही  तोड़ पाती.  यही कामना है कि हमारे माननीय भी हार्स ट्रेडिंग के शिकार न हों आखिर घोड़े कहां वो तो “वो” ही  हैं !

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर .

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

 

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