हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४७ ⇒ भागने/भगाने की कला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भागने/भगाने की कला।)

?अभी अभी # १०४७ ⇒ आलेख – भागने/भगाने की कला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम यहाँ उड़नसिख मिल्खा अथवा उड़नपरी पी टी उषा की बात नहीं कर रहे, जो भागने में देश का नाम रोशन कर चुके हैं, हम उस भागने/भगाने का जिक्र कर रहे हैं, जिसे समाज अच्छी निगाह से नहीं देखता।

हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे कई मौके आते हैं, जब हमें भागकर सिटी बस, अथवा ट्रेन पकड़नी पड़ती है। कुछ लोग तो स्कूटर पर भी भागते-भागते ऑफिस पहुँचते हैं। आखिर जीवन में दौड़-भाग तो लगी ही रहती है।।

एक समय था, जब कुछ बच्चे बचपन में बिना बताए घर छोड़कर भाग जाते थे ! माँ बाप बेचारे परेशान। अखबारों में इश्तहार देते थे। गुमशुदा की तलाश। बेटा गौरव ! तुम जहाँ कहीं भी हो घर चले आओ। दादीजी ने चार रोज से खाना नहीं खाया है। तुम्हारी माँ का रो-रोकर बुरा हाल है। पैसे की ज़रूरत हो तो बताना। लाने वाले, या पता बताने वाले को उचित ईनाम दिया जाएगा।

वह ज़माना था, जब एक खोया हुआ, या भागा हुआ बच्चा भी सुरक्षित वापस घर आ जाता था। आजकल छोटे बच्चों तक का अपहरण फिरौती वसूलने के लिए किया जाता है। क्या ज़माना आ गया है।।

जितनी छूट आज लड़कियों को है, उतनी हमारे जमाने में नहीं थी। लड़कियों के लिए अलग कन्या विद्यालय और महा-विद्यालय भी था। लड़की सीधी स्कूल जाती थी, और सीधी घर आती थी।

उसकी सहेलियाँ होती थी, बॉय फ्रेंड नहीं। आग लगे इन कॉलेज गर्ल, लव इन शिमला, और लव इन टोकियो जैसी फिल्मों को, जिन्होंने लड़कियों को सिनेमाघर का रास्ता दिखा दिया। एक लड़की भीगी-भागी सी।

फिर भी लड़कियों की हिम्मत नहीं होती थी कि लड़कों की तरह घर से भाग जाए। उनकी दौड़ नानी या मामा के घर तक की ही होती थी और भाई चौवीस घंटे यमदूत की तरह आगे पीछे। बड़ी मुश्किल से कुछ ही लड़कियां किसी लड़के के साथ घर से भाग सकती थी। उन्हें लोग अच्छी लड़की नहीं समझते थे।

फिर समय ने करवट ली। विद्यालय कान्वेंट हो गए, को-एजुकेशन अर्थात सह -शिक्षा प्रारंभ हो गई। स्कूलों में निबंध और वाद-विवाद के लिए एक नया विषय मिल गया। आज के आधुनिक दौर में क्या सह-शिक्षा जरूरी है ? पक्ष हो या विपक्ष, न जाने क्यों, लड़कियाँ ही प्रथम आती थी।।

अब समय बदल गया है। नर्सरी से पीजी तक लड़के-लड़कियां साथ-साथ उठते-बैठते, पढ़ते-लिखते हैं। एक दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं। अब उन्हें सड़क अथवा कॉलेज की किसी लड़की को देख सीटी मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पांडुबा, पोरगी फसली रे फसली जैसे घटिया गानों का ज़माना गया। चाहे माँ रूठे या बाबा, मैंने तेरी बाँह पकड़ ली, जैसा अब कुछ नहीं है। अब लड़के-लड़की घर छोड़कर भागते नहीं, माता-पिता की सहमति से अपना घर बसाते हैं। बच्चे भी समझदार हैं और माता-पिता भी।

आज की पीढ़ी के सामने वैसे ही कई चुनौतियाँ हैं। उनके जीवन में वैसे भी स्थिरता कहाँ ! उन्हें तो भागते ही रहना है, पहले उच्च-शिक्षा के लिए तो बाद में एक अच्छी नौकरी के लिए। उन्हें भी एक ऐसे जीवन साथी को तलाश है जो जीवन की इस भागम-भाग में उनका साथ दे। उन्हें भागकर शादी करने की फुर्सत ही कहाँ है ! माता-पिता थक जाते हैं कहकर, अपनी पसंद का लड़का, अथवा लड़की ही बता दो, ताकि हम अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो सकें, और आज की पीढ़ी है कि उसे भागने की तो छोड़िए, घड़ी दो घड़ी, प्यार करने की फुर्सत ही नहीं।।

भागने/भगाने की आदर्श स्थिति भी होती है। शास्त्रों में इसे गंधर्व विवाह कहा गया है ! रुक्मी की बहन रुक्मिणी मंदिर जाने के बहाने श्रीकृष्ण से मिलने नहीं गई, वे तो माँ भवानी से आशीर्वाद लेने गई थी कि उन्हें श्रीकृष्ण ही पत्नी के रूप में वरण करे। और यहाँ तो काजी भी राजी थे।

केवल रुक्मी इस भ्रम में था कि कृष्ण उसकी बहन को भगाकर ले जा रहा है। मर्ज़ी से जाने और भागने में ज़मीन आसमान का अंतर है।

जहाँ प्रेम हो, वहाँ विवाह हो !

हमारी भारतीय नारियाँ तो इतनी समर्पित हैं, कि जहाँ विवाह होता है, वहीं प्रेम कर लेती हैं। बदले में उन्हें क्या मिलता है, यह या तो वे जानें, या फिर रब ही जानें। अगर आप सगाई ही को शादी मान लें तो जगजीत-चित्रा एक आदर्श उदाहरण हैं, जो साथ साथ मिलकर यह घोषणा करते हैं –

सबसे ऊँची, प्रेम सगाई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१२ ☆ मुक्तक – ।। आओ मिल दुनिया की कहानी नई लिखते हैं ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१२ ☆

☆ मुक्तक ।। आओ मिल दुनिया की कहानी नई लिखते हैं ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

आओ मिल कर कहानी, नई लिखते हैं।

जीवन रंग-ढंग रवानी, नई लिखते हैं।।

सबके लिए सरोकार, की बात हैं करते।

जीने का सलीका जिंदगानी, नई लिखते हैं।।

=2=

बात मेहरबानी की हर, किसी के लिए हो।

परेशानी नहीं हर, किसी के लिए हो।।

अधिकार और कर्तव्य, का मेल हो खूब।

दुनिया दीवानी -सी हर, किसी के लिए हो।।

=3=

कड़ी से कड़ी जोड़ कर, एक जंजीर बनाते हैं।

मेहनत से मिल कर, चलो तक़दीर बनाते हैं।।

कण- कण में जहाँ पर, प्रेम हो बिखरा हुआ।

दुनिया की ऐसी कोई, नई तस्वीर बनाते हैं।।

=4=

हमदर्द हमसाया कोई, समाज नया रचते हैं।

हमराह सा अब रिवाज़, कोई नया रचते हैं।।

प्यार की हर रीत, प्रेम की प्रथा हो जहाँ पर।

हमदम मेरे दोस्त का, कोई साज़ नया रचते हैं।।

=5=

स्नेह-प्रेम प्यार के हम सब, बनते चित्रकार हैं।

दोस्ती और दुआ के बनते, हमसब दस्तकार हैं।।

महाभारत के पांसे न, लाते रमायण के आदर्श।

स्वर्ग सरीखी दुनिया के, बनते अब शिल्पकार हैं।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७५ ☆ कविता – सुभाष चंद्र बोस… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सुभाष चंद्र बोस…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७५

☆ सुभाष चंद्र बोस…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

तेइस जनवरी जन्म दिवस है उस भारत के लाल का

जिसका प्रेरक जीवन मन में पावन याद उभारता ।।

*

इस दिन ने ही भारत मां को दिया सपूत सुभाष था

जिस पर भारत जनमानस का अडिग अमर विश्वास था।।

*

जिन के गौरव से गौरान्वित भारत का इतिहास है

उन महानपुरुषों में से एक अनुपम वीर सुभाष है।।

*

एक चरित्र अनोखा ऐसा जिसके प्रखर प्रकाश में

सभी दूसरे तारे धूमिल दिखते हैं आकाश में।।

*

जिसे गृहस्थी, सुख-सपना सब दिखता था जंजाल सा।।

पा ऊंची शिक्षा भी जिसने रखी न वैभव लालसा ।।

*

उपन्यास सी जिसकी जीवन गाथा कई आयाम की

जिसने कभी न की आकांक्षा कहीं किसी आराम की।।

*

दृष्टि रही पाने स्वदेश की आजादी का रास्ता

लक्ष्य एक ही रहा, रखा न अधिक और से वास्ता।।

*

दल के भीतर भी विरोध का गरल पान कर शांति से

होकर दूर भ्रांति से, जिसने जोड़ा नाता क्रांति से।।

*

अपना दर्शन और दिशा ले आगे बढ़ते शान से

अमर आज भी है जो जग में, जन मन में सम्मान से।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ युद्ध… ☆ श्री हरिश्चंद्र कोठावदे ☆

श्री हरिश्चंद्र कोठावदे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ युद्ध ☆ श्री हरिश्चंद्र कोठावदे ☆

अजिंक्य त्यांना वाटे किल्ला बुरूज माझे अभेद्य नव्हते

बरे जाहले गुपीत माझे हल्लेखोरां कळले नव्हते

दीड वितीचे इथे रणांगण समोर नखभर होते योद्धे

प्रेक्षणीय पण लुटूपुटूचे रण लढणेही नशिबी होते

 *

दिग्विजय कुणी बहाल केला गल्लीमधल्या विजयालाही

नाचविले कुणी माझे घोडे फत्ते जणु की अश्वमेधही

 *

तहास आणिक माघारिसही रणनीतीची चढली झूल

पराजयाला कधी लाभली हौतात्म्याची उदात्त भूल

 *

लुटूपुटूचे घावहि घातक ओरखड्यांच्या जखमा प्राणा

चकमकसुद्धा गांभीर्याने घ्यावी, उशिरा आले ध्याना

 *

केली जी मी घायाळांस्तव फळास आली चुकुन प्रार्थना

अर्पू लागले पामर काही मला फुकाची श्रेयवंदना

 *

न्यूनांचे अन् वैगुण्यांचे फिटता फिटता फिटले रिंगण

चक्रव्यूहही आले ध्यानी सरले सारे बाळबोधपण

 *

नुरली ईर्ष्या अजिंक्यतेची तटबंदीची सरली चिंता

युद्ध न उरले मुळी कुणाशी स्वतः स्वतःशी लढणे आता!

© श्री हरिश्चंद्र कोठावदे

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “युद्ध, इतिहास, आणि मी…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “युद्ध, इतिहास, आणि मी …” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे

युध्द म्हंटल कि ते करण्यापूर्वी, आणि झाल्यावर त्याचा अभ्यास होतो, नाहीतर करावा लागतो. अगोदर युध्द करायचं का, कसं, कधी असा विचार करणारे अभ्यास करतात. आणि नंतर झालेलं युध्द का, कसं, किती दिवस झालं आणि त्याचे परिणाम याचा अभ्यास विचारवंत करतात. पण विद्यार्थ्यांच तस नसतं. त्यांना मात्र दोघांनी केलेला अभ्यास अभ्यासावा लागतो. युध्दाचे चांगले वाईट परिणाम नंतर दिसतातच. पण वाईट परिणाम मात्र बर्‍याच काळापर्यंत चांगलेच दिसतात. चांगल दिसणं, आणि वाईट परिणाम चांगलेच दिसणं यातला फरक स्पष्ट होतो.

माझ्या जन्माअगोदर, नंतर, मला समजायला लागेपर्यंत नक्की किती युध्द झाली हे सांगता आलं नाही तरी शाळेत वरच्या वर्गात जात होतो तस छत्रपती शिवाजी महाराज यांनी केलेल्या युध्दापासून दुसर्‍या महायुद्धाचा अभ्यास होता. जसजसं वरच्या वर्गात जात होतो तसतशी लुटुपूटूची लढाई घनघोर युध्दाच रुप धारण करायची. बर्‍याचदा यांच्या सनावळी, तह, आक्रमण, आपापसात ठरलेल्या काल्पनिक रेषा यांचा वास्तवाशी संबंध वाटलानाही तरीही युध्दपातळीवर अभ्यास केला होता.

निजामशहा, आदिलशहा, शाहिस्तेखान, अफझलखान यांच्या काळात घोडदळ, पायदळ, तलवार, भाला, दाणपट्टा, गनिमीकावा यांच्या सहाय्याने खेळलेलं युध्द, नंंतर विमानाने हिरोशिमा, नागासाकीवर केव्हा बाॅॅम्ब टाकून गेले ते लक्षातच आलं नाही.

पेशव्यांनी अटकेपार झेंडा फडकवला असेल, पण आम्ही इतिहासात पास झालो की आमचा झेंडा डौलायला लागायचा आणि वर्ष पार पडायचं.

या व्यतिरिक्त दोन युध्द, यांचा अभ्यास करावा लागला नाही तरी अभ्यासाइतकेच प्रश्न त्या बाबतीत विचारले जायचे. ही युध्द म्हणजे अर्थातच रामायण आणि महाभारत. रामायणात प्रभु श्रीराम व रावण यांच्यात, म्हणजे दोन वेगवेगळ्या राजांमधे युध्द झाल होतं. पण महाभारतात झालेलं युध्द मात्र नातेवाईकांमधलच होत. आणि इतिहासात कमी मार्क मिळाले की त्या कमी मिळालेल्या मार्कांवरुन घरात वाक् युध्द सुरु व्हायचं. म्हणजे इतिहासावरुनच घरात महाभारत घडायचं. थोडक्यात महाभारतातली आपसात लढाई करायची परंपरा कमी मिळणार्‍या मार्कांमुळे पुढे घरात सुरुच राहिली. युध्दात सामान्य जनता विनाकारण होरपळते तसंच यांच्या युध्दाचा आमचा अभ्यास कमी झाल्याने शाब्दिक चटके बसायचे. यानंतर धर्मयुद्ध, गृहयुध्द, वाक् युध्द, शीतयुद्ध असे युध्दाचे उपप्रकार असतात हे लक्षात आलं.

मावळ्यांंनी लढाईत झालेले वार अंगावर झेलले. आम्ही इतिहासामुळे झालेले वार पाठीवर झेलले. पाठीवर वार करणं भ्याडपणाच लक्षण समजल जात असेल, पण आमच्या बाबतीत सगळेच निधड्या छातीने सहसा पाठीवरच वार करायचे. आणि त्यात कोणालाही म्हणजे वार करणारा आणि झेलणारा यांना भ्याडपणा वाटालाच नाही. आता आपल्या पाठीवर वार होणार हे समजायचं. मावळ्यांकडे वार चुकवायला ढाल असेलही. पण आमची पाठ मात्र ढोल वाजवल्यासारखी बदडली जायची. थोडक्यात इतिहास शिकवला तेव्हा आम्ही कुंभकर्णासारखे झोपलो होतो. आणि जाग आली तेव्हा इतिहास घडून गेला होता, आणि मिळालेले मार्क आमचा अभ्यासाचा इतिहास सांगायला सिध्द होते.

रामायण, महाभारत यात वाली, सुग्रीव, अंगद, जांबुवंत, बिभीषण, द्रोणाचार्य, भिष्म, विदुर, शकुनी, युधिष्ठिर, दुर्योधन, दुश्यासन आणि इतर… यांच्या नावाचा गोंधळ व्हायचा. तर नंतर जर्मन, ईटली, पोलंड, रशिया, अमेरिका, जापान, चिन या देशांपैकी मित्र कोण आणि शत्रु कोण याच्यात गोंधळ व्हायचा. याच गोंधळामुळे आम्ही एक वेगळा इतिहास तयार करायचो आणि त्यावर परत मार मिळायचा.

युध्द म्हंटल की वैर हिच भावना लक्षात येते. पण आमचे सर म्हणायचे तुमच्या अभ्यासासाठी दुसरं महायुद्ध फक्त तोंडओळख आहे. युध्दाची तोंडओळख करायची काय गरज. नंतर काय आपसात चहापाण्याचा कार्यक्रम करायचा होता… पण ही तोंडओळखसुध्दा जुलूमाचा रामराम केल्यासारखी वाटायची. पण यातली दोस्तराष्ट्र ही संकल्पना जवळची वाटली. कारण असेच कमी मार्क मिळालेले आम्ही काहीजण एकत्र आलो, आणि नंतर एकमेकांचे दोस्त बनलो. आणि ही दोस्ती कायम राहिली. आजही गोलमेज परिषदेसारखं चर्चा करायला आम्ही टेबलवर एकत्र येतो. चर्चा वेगळ्या गोष्टींवर असली तरी त्यात शाळेचा इतिहास व सध्या सुरु असलेली युध्द हा विषय डोकावतोच.

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ते दहा तास… – भाग – १ ☆ श्री दीपक तांबोळी ☆

श्री दीपक तांबोळी

? जीवनरंग ?

☆ ते दहा तास… – भाग – १ ☆ श्री दीपक तांबोळी

गाडी हलली तसं मी बॅगेतून पुस्तक वाचायला काढलं. उद्या माझा नागपूरच्या एका कंपनीत इंटरव्ह्यू होता. गेल्या वर्षभरापासून मी नोकरीसाठी प्रयत्न करत होतो. सहा महिन्यापुर्वी वडिलांनी तब्येतीच्या कारणांमुळे रेल्वेतून स्वेच्छानिवृत्ती घेतल्यापासून मला नोकरी मिळवण्याचं जास्तच टेंशन आलं होतं. वडिलांच्याच पासवर मी सेकंड ए. सी. चं रिझर्वेशन करुन नागपूरला निघालो होतो. पावसाळा असल्याने गाडीला अजिबात गर्दी नव्हती. माझ्यासमोरचे बर्थ तर रिकामेच होते.

नाशिक आलं तसा एक देखणा तरुण बॅगा घेऊन आत चढला. माझ्यासमोरच्या बर्थखाली त्यानं बॅग ठेवली. तेवढ्यात त्याच्यामागेच एक बाई आत आली. तिला पाहीलं आणि माझ्या काळजाचा ठोकाच चुकला. माय गाॅड! काय सुंदर होती ती!

” कुठं जाताय? ” तो तरुण मला विचारत होता.

“नागपूरला “मी शुध्दीवर येत म्हंटलं.

” थोडं लक्ष ठेवाल का? मिसेस गोंदीयाला जातेय. एकटीच आहे आणि मुलाची तब्येत जरा नरमगरम आहे “

तिच्या कडेवरच्या बाळाकडे बोट दाखवून तो म्हणाला.

” हो ठेवेन की. त्यात काय विशेष! “

मी त्याच्याशी बोलताबोलता तिच्याकडे नजर टाकली. गाडी निघाली तसा तो उतरुन गेला.

” गोंदियाला पोहचली की फोन कर ” खिडकीबाहेरुन तो तिला म्हणाला.

” हो करते ” असं म्हणून तिनं खिडकीतून त्याला बायबाय केलं. समोरच्या बर्थवर तिनं किरकिर करणाऱ्या मुलाला ठेवलं आणि ती त्याला थोपटू लागली. माझी नजर मात्र तिच्या चेहऱ्यावरच खिळली होती. खरोखर इतकी सुंदर स्त्री मी आयुष्यात आजपर्यंत पाहीली नव्हती. मी माझ्या काॅलेजच्या मुली आठवून पाहील्या. त्यातली एकही तिच्या जवळपासही जाणारी नव्हती. तिचे डोळे, नाक, ओठ, त्वचा, केस फारच सुरेख होते. विशेष म्हणजे तिनं मेकअपही केलेला दिसत नव्हता तरीही ती अप्रतिम सुंदर दिसत होती. माझ्या लक्षात आलं की आपल्या फिल्म इंडस्ट्रीतली कोणतीही हिरोईन तिच्याइतकी सुंदर नव्हती. बाळंतपणानंतर बायका बेढब होतात म्हणे. पण तिची फिगर अतिशय सुरेख होती. मनात विचार आला, स्वर्गातील अप्सरा अशाच सुंदर असतील का? की हिच्यापेक्षा जास्त? नाही. यापेक्षा सुंदर असूच शकत नाही.

मी भान हरपून तिच्याकडे बघत होतो. ती मात्र तिच्या विश्वात मग्न होती. मुलाला बाटलीने दुध पाजतांना, त्याला काहीतरी खाऊ घालतांना ती त्याच्याशी गप्पा मारत होती. गाणी म्हणत होती. अधूनमधून तो किरकिर करायचा तेव्हा ती त्याला प्रेमाने थोपटत होती.

एकदोनदा तिनं माझ्याकडे पाहीलं. तेव्हा मी घाईगडबडीने दुसरीकडे नजर फिरवली. नंतर मी मोबाईलशी चाळा करु लागलो पण माझी नजर तिच्याकडेच वारंवार वळत होती. जांभळ्या साडीत ती अप्रतिम शब्दही कमी पडावा इतकी सुंदर दिसत होती. पण त्या सौंदर्यात कुठेही उथळपणा, भडकपणा नव्हता. घरंदाजपणा आणि शालीनता त्यात ओतप्रोत भरलेली होती. काॅलेजमध्ये असतांना या बाईने अनेकांना वेड लावलं असणार हे स्पष्टच होतं. आणि आजही तिला पाहिल्यावर प्रत्येक पुरुष वेडा होत असेल यात मला शंका वाटत नव्हती. ती जर विवाहित नसती तर कदाचित मीसुद्धा तिच्या प्रेमात पागल झालो असतो. तिचा नवराही तोडीसतोड देखणा होता म्हणून तरी बरं नाहितर इतक्या सुंदर बायकोला सांभाळणं ऐऱ्यागैऱ्याचं काम नाही हे मला जाणवत होतं.

मी हातातलं पुस्तक वाचायचं सोडून तिच्याकडेच वारंवार बघतोय हे तिलाही कळत असावं पण ती ते चेहऱ्यावर दाखवत नव्हती.

आठ वाजले तसा मी थोडा भानावर आलो. भुक लागल्याची जाणीव मला झाली. मी बॅगेतून डबा काढून जेवण केलं. साडेआठ वाजता तिचा मुलगा झोपला असावा. तिनं बॅगेतून एक सुबकसा मोठा डबा काढला आणि ती जेवायला बसली.

“या जेवायला”

अनपेक्षीतपणे तिच्याकडून आलेलं निमंत्रण ऐकून मी एकदम गडबडून गेलो.

” मी आताच जेवलो बघा “

ती सौम्य हसली. मग म्हणाली

” हो पाहिलं मी. हे स्वीट तरी घ्या ” एका डिशमध्ये बंगाली मिठाई ठेवून तिनं मला दिली. मी ओशाळलो कारण मी जेवत असतांना तिला विचारलंसुध्दा नव्हतं. खरं म्हणजे मी दिसायला बरा असलो तरी इतक्या सुंदर बाईशी स्वतःहून बोलण्याची माझी हिंमतच झाली नसती.

” नागपूरला रहाता? “

तिनं जेवता जेवता विचारलं.

” नाही. इंटरव्ह्यूला चाललोय “

” कोणत्या कंपनीत? “

मी कंपनीचं नाव सांगितलं.

” इंजीनियर आहात? “

” हो मी बी. ई. केलंय केमिकल मध्ये ” मी जरा अभिमानानेच सागितलं.

” मी सुध्दा इंजीनियरच आहे ” ती म्हणाली. “एम. ई. केलंय इलेक्ट्रॉनिक्स मध्ये”

मी वरमलो. माझ्यापेक्षा ती जास्तच शिकली होती.

” मग जाॅब करताय कुठे? ” मी विचारलं

” नाही. करायची खुप इच्छा होती. पण एम. ई. झाल्यावर लगेच लग्न झालं आणि सगळंच राहून गेलं. “

” मिस्टर काय करतात तुमचे? ” मी थोडं इर्ष्येने विचारलं.

” ते सुध्दा इंजीनियर आहेत. एम. एस. केलंय अमेरिकेतून आणि आता फॅक्टरीज सांभाळतात. “

” फॅक्टरीज? “

” हो. नाशिकमध्ये आमच्या तीन फॅक्टरीज आहेत आणि पुणे, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, इंग्लंड, आफ्रिका, अमेरिका आणि गल्फ कंट्रिजच्या मिळून सोळा फॅक्टरीज आहेत. अर्थात माझे सासरे, हे आणि माझे दोन लहान दिर मिळून सगळं सांभाळतात “

बापरे! मी गार झालो. एवढं प्रचंड साम्राज्य असलेल्या धनाढ्य आणि कर्तृत्ववान माणसाच्या बायकोसमोर मी बसलो होतो. तिच्या तुलनेत सर्वच बाबतीत मी अक्षरशः दरिद्री होतो. माझ्यासारखे अनेक इंजीनियर्स तिच्या फॅक्टरीत पगारी नोकर असतील. तरी ती माझ्याशी सहजतेने बोलत होती. कोणताही गर्व किंवा अहंकार तिच्या बोलण्यातून जाणवत नव्हता.

” तुम्ही एकट्याच जाताय? नाही म्हणजे कुणी सोबत नाही आलं? “

एवढ्या सुंदर बाईसोबत रात्रीच्या प्रवासात कुणी नसावं याचं मला आश्चर्य वाटत होतं.

“का? कशासाठी? नाशिकला ह्यांनी गाडीत बसवून दिलं. गोंदियाला कुणीतरी घ्यायला येईलच. एका रात्रीचा तर प्रश्न होता. तसे हे येणार होते पण उद्या फँक्टरीत मुख्यमंत्री येणार आहेत. त्यामुळे त्यांना येता आलं नाही. आणि माझ्या मामांची तब्येत सिरीयस आहे त्यामुळे मला तातडीने निघावं लागलं. तसं कारनेही जाता आलं असतं पण रेल्वे प्रवास सगळ्यात सेफ. नाही का? “

” तरीपण कुणीतरी.. …. “

“अहो मागच्या महिन्यात मी याला घेऊन एकटीच अमेरिकेत जाऊन आले, आमच्या नातेवाईकाच्या लग्नाला. हा तर आपला महाराष्ट्र आहे. इथं सोबतीची काय गरज? “

मी चुपच झालो. बाई मोठी धीट दिसत होती.

– क्रमशः भाग पहिला 

© श्री दीपक तांबोळी

जळगांव

मो – 9503011250

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ “भिकारी…???” – भाग २ ☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆

डॉ अभिजीत सोनवणे

© doctorforbeggars 

? मनमंजुषेतून ?

☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ भिकारी…???” – भाग २ ☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆

(आत्ता आत्तापर्यंत आईचा पदर धरून भिकेतले मिळालेले पैसे वाटून घेण्याचा “हट्ट” धरणारा ‘तो” आणि आता टॅलीचे क्लास लावा म्हणून “हट्ट” धरणारा “हा”…! एका टोकापासून दुसऱ्या टोकापर्यंत झालेला हा अचंबित करणारा बदल ज्याच्या समोर झाला आहे, त्या कुणाच्याही डोळ्यात, हा बदल पाहून नक्की पाणी येईल… मी तरी काय वेगळा…?) 

इथून पुढे – – – 

मी या अगोदरही सांगितलं आहे, मी बारावीपर्यंत पूर्णतः वाया गेलेलं एक नालायक कार्ट होतो, माझ्या दहावीत मला बीजगणित आणि भूमिती मध्ये 120 पैकी 18 मार्क पडले होते, याच गणितामुळे मला दहावी रिपीट करावी लागली होती, घरच्यांचा मार आणि बाहेरच्यांचे टोमणे खावे लागले होते. गणितावर माझा भयंकर राग आहे…!

आणि म्हणूनच आमच्या दोघांमध्ये “36 चा आकडा” आहे…

आजही गणित माझ्या वाट्याला जात नाही आणि मी त्याच्या…!

आज त्याच गणिताच्या नाकावर बुक्की मारून, मी गणितावर घ्यायचा सूड माझ्या या मुलाने पूर्ण केला 

मला बीजगणित जमलं नाही… पण याचना करणाऱ्या माऊलींच्या मुळाशी जाऊन, आपल्या सर्वांच्या साथीनं, त्यांचं “बीज ” शोधून, तिथे खत पाणी घालून आलो, आयुष्यातील चुकलेल्या गणितातील, वाईट गोष्टी “वजा” करून, “बेरीज” मांडून आलो…!

भूमिती मधली प्रमेयं आणि सूत्र, मला पाठ झाली नाहीत, पण रस्त्यावरच्या लोकांची दुःखं मला पाठ झाली, त्यांना यातून बाहेर काढायचे “सूत्र” समजावून घेण्याचा प्रयत्न केला…!

अल्फा साईन कॉस थिटा मला कधीच समजलं नाही, मात्र या लोकांची दुःख, भाव भावना, मन:स्थिती समजून घेता घेता, नमःस्थिती म्हणजे काय हे मात्र समजले…!

प्रत्येक झाडानं फळ द्यावं असं काहीच नाही… जमेल त्यांनी सावली द्यावी…!

मी झाड झालो… फळ देण्याची माझी पात्रता नव्हतीच, मग मी सावली देण्याचा प्रयत्न केला, अर्थात तुम्हा सर्वांच्याच साथीनं…!

छान छान फुलं सुद्धा माझ्या झाडाला लागली नाहीत, मग बाभूळ होऊन कोणालातरी जपण्याचा प्रयत्न केला…!

आणि…

‘लावाल ना टॅलीचा क्लास…??? ‘ त्याच्या या प्रश्नाने मी तंद्रीतून जागा झालो.

योगायोगाने याच दिवशी फादर्स डे होता, तसा तो रोजच असतो हे वेगळं…!

माझ्यासाठी टॅलीचा क्लास लावा, म्हणून मागे लागणाऱ्या या मुलाच्या हट्टापेक्षा आणखी कोणतंही मोठं गिफ्ट माझ्यासाठी असूच शकत नाही…!

360 अंशाच्या कोनात या मुलाचा झालेला हा बदल असो किंवा दोन वर्षांपूर्वी रस्त्यावर पडलेल्या एका मुलाने स्वतःला बदलून जॉब करायला सुरुवात केली आणि पगारातले पैसे संस्थेला देणगी म्हणून द्यायला आलेला असो. (“देणगी” याच नावाने या मुलाविषयी सविस्तर लिहिले होते)

फुटबॉल च्या खेळात अव्वल असूनही, केवळ फुटबॉलचे स्टड नाहीत म्हणून नाकारला गेलेला, अन्याय झालेला भिक मागणाऱ्या एका आईचा मुलगा.

फोडणे, तोडणे, मारणे, झोडणे हिच भाषा तोंडात…

आज तोच मुलगा तुम्हा सर्वांच्या मदतीमुळे येत्या काही दिवसात फुटबॉल कोच होत आहे. ‘गरीब मुलांना मी फ्री मध्ये शिकवणार सर, मला नोकरी लागली की काही गरीब मुलांना मी सुद्धा शैक्षणिक मदत करणार सर… ‘ 

आज हि भाषा घेऊन तो “माणूस” झाला आहे.

(“घातक” या नावाने याच्यावरही सविस्तर लेख लिहिला होता)

तर… गेल्या अकरा वर्षात खोटे वाटतील, इतके खरे आणि डोळ्यासमोर घडणारे हे बदल पाहायला खरंच खूप भाग्य लागतं, आणि तो भाग्यवान मी आहे…

हे भाग्य आपणा सर्वांमुळे आमच्या पदरी पडलं…!

मी आणि मनीषा आम्ही कृतज्ञ आहोत आपले

उद्या ही मुलं मोठी होतील, स्वतःबरोबर इतरांचंही आयुष्य बदलतील…

जगणं असं या मुलांसारखं असावं… फुलांसारखं… विखुरले तरी सुगंध मागे राहतोच…!

*वैद्यकीय. 

आतापर्यंतच्या कामात मला एक कळलंय, “जिवंत हाय तवंर जगून घ्या… मेल्यावर जाळायची / पुरायची गडबड करून लोकांना घरी लवकर जेवायला जायचं असतं… “

हेच अंतिम आणि अंतिम सत्य आहे… काहीही म्हणा…!!!

इथं सर्व काही महाग आहे परंतु वेदना मोफतच मिळतात आणि या वेदना देणारा आपलाच असतो…

अशा या वेदनायुक्त आयुष्य जगणाऱ्या लोकांच्या आयुष्यात एक हळुवार फुंकर घातली आहे, आपल्या सर्वांच्या मदतीने…!

  1. अंध अपंग आणि वृद्ध असे जे लोक आजारी आहेत, अशांना रस्त्यावरच तपासून वैद्यकीय सेवा दिली आहे, कमरेचे, मानेचे, गुडघ्याचे पट्टे, वॉकर, कुबड्या, काठ्या इत्यादी साधने देऊन शारीरिक दृष्ट्या उभे केले आहे.

 

  1. ज्या गोष्टी रस्त्यावर करणे शक्य नाही उदा. रक्त लघवी तपासणी, सोनोग्राफी एक्स-रे वैगरे वैगरे… या गोष्टी हॉस्पिटलमध्ये करवून घेतल्या आहेत. ज्यांना गरज आहे अशांना मल्टी स्पेशालिटी हॉस्पिटलमध्ये उपचार करण्यासाठी एडमिट केलं आहे.

पूर्णपणे बरे झाल्यानंतर, तुमच्या मुळगावी जाऊन किंवा इथं पुण्यात काहीतरी व्यवसाय किंवा नोकरी करा… भीक मागणं सोडा, अशी प्रेमाची गळ, नेहमीप्रमाणे घातली आहे…!

सन्मानाचे स्वावलंबी जीवन… Rehabilitation

वैद्यकीय सेवा रस्त्यावर देत असलो, तरीही हे माझे प्रमुख उद्दिष्ट नाही. त्यांच्यात उठून – बसून, त्यांच्यासोबत जेवण करून, भीक मागण्याचे मूळ कारण त्यांच्या नकळत शोधणे आणि हळूच त्यांच्या हृदयात प्रवेश करून, या लोकांना सन्मानाने जगायला शिकवणे, भीक मागणे सोडायला लावून काहीतरी व्यवसाय करायला तयार करणे, त्यांना तो व्यवसाय टाकून देणे, भीक मागणाऱ्या पालकांशी चांगलं नातं करून, त्यांच्या मुलांनी शिक्षणाच्या प्रवाहात यावे यासाठी त्यांची परवानगी मिळवणं, आणि “भिक्षेकरी” म्हणून नाही तर “गावकरी” म्हणून जगायला लावणं… हे माझे प्रमुख ध्येय आहे…! 

  1. जगायलाच थकलेले एक आजोबा, काही काम करू शकतील अशी शारीरिक कुवत नाही. या आजोबांना एक वजन काटा घेऊन दिला आहे. लोक येतील, या वजन काट्यावर स्वतःचे वजन करतील आणि आजोबांना पैसे देतील.

हे कोणालाही करायला जमेल असं सोपं आणि बैठं काम आहे.

प्रचंड गर्दी असणाऱ्या रस्त्यावर, परंतु यांना काही त्रास होणार नाही, अतिक्रमण होणार नाही, अशा ठिकाणी त्यांना बसवलं आहे.

आयुष्यातून कायमचे “उठण्याआधी” शांतपणे काहीतरी काम करत ते आता “बसले” आहेत…!

लोकांनी वजन काट्यावर केलेल्या “वजनामुळे” यांच्या आयुष्याचा “भार” थोडा हलका होईल, अशी आशा करतो.

या महिन्यात एक जण सुलभ शौचालयात (Public Toilet) व्यवस्थापक म्हणून काम करू लागला आहे. याच्या मुलालाही आपण शैक्षणिक प्रवाहात आणले आहे.

याचं जगणं आणखी “सुलभ” करण्यासाठी प्रयत्नात आहे…!

इतर… 

  1. तीव्र उन्हाळा आणि पुढे येणारा पावसाळा दोन्ही लक्षात घेऊन सर्वांना आपण छत्र्या घेऊन दिल्या आहेत.
  2. जी पुरुष मंडळी काम करू लागली आहेत त्यांना पुढील महिन्यात आपण रेनकोट देणार आहोत.
  3. आंघोळ… किती साधी गोष्ट…! आपण या गोष्टीचा विचार सुद्धा करत नाही.

परंतु रस्त्यावर राहताना आंघोळ करणे हा एक मोठा टास्क असतो, आंघोळीसाठी पैसे लागतात, साबण लागतो, आंघोळ केल्यावर घालायला कपडे नसतात, असलेच तर कपडे धुवायला साबण नसतो, अंगावरचे कपडे धुवून वाळायला टाकले, तर अंगावर घालायचे काय…? अजूनही बरंच काही प्रश्न असतात…

आणि मग आंघोळ टाळण्याकडे कल वाढतो…

आपण म्हणतो हे लोक किती गलिच्छ राहतात…

अनेकांना गलिच्छ राहायची इच्छा नसते, परिस्थिती त्यांना तसे राहायला भाग पाडते…!

आंघोळीसारखी साधी सर्वसामान्य गोष्ट, पण रस्त्यावर राहणाऱ्यांसाठी हा एक फार मोठा टास्क आहे, याची कुणालाच जाणीवही होत नाही…

बरोबर आहे, ठेच लागल्यावरच अंगठा असल्याची जाणीव होते, तोपर्यंत नाही, “हि वस्तुस्थिती आहे…! “

असो, आंघोळीसाठी लागणाऱ्या सर्व गोष्टी उदा. टॉवेल, अंगाचे – कपड्याचे साबण आणि इतर कपडे दिले आहेत.

बऱ्याच लोकांचे, आंघोळ करण्यासाठी सुलभ शौचालयामध्ये ऍडव्हान्स पैसे भरले आहेत.

या महिन्यात महाराष्ट्र शासनाच्या वरिष्ठ स्तरावरून, भीक मागणाऱ्या लोकांचे पुनर्वसन कसे करता येईल, या चर्चेसाठी बोलावले होते.

मला आलेल्या अनुभवांच्या आधारावर, पुनर्वसनासाठी सहज करता येतील असे 14 मुद्दे मी सादर केले आहेत.

चर्चेत उपस्थित असणाऱ्या इतर मान्यवरांनीही अत्यंत उपयुक्त सूचना दिल्या.

या सर्वांची अंमलबजावणी झाली, तर महाराष्ट्रात खरोखर एकही व्यक्ती भीक मागताना दिसणार नाही.

असो…

माझे आणि मनीषा चे दोन दोन हात आणि तुम्हा सर्वांचे हजारो हात घेऊन, माझ्या सदसद्विवेक बुद्धीला जे पटलं ते या महिन्यात केलं… आपल्यासमोर मांडलं…

खूप लोक म्हणतात, ‘तुम्ही हे काम करता, रात्री किती शांत आणि सुखाने झोप लागत असेल तुम्हाला…? ‘

खरं सांगू…???

स्वातंत्र्य मिळून इतकी वर्षे लोटली, पण या दुर्लक्षित समाजाचा अजूनही विकास झाला नाही… झोप कशी येणार…?

आपल्या साथीने गेली अकरा वर्षे पूर्ण वेळ मी या लोकांसाठी काम करत आहे… अजूनही म्हणावं तसं यश हाताला लागलं नाही… अजूनही वरच्या पायरीवर सरकलो नाही… झोप कशी येणार…?

अकरा वर्षे काम करून आज सुद्धा, मला असं वाटतं की मी आजही – अजूनही या कामाच्या बालवाडीच्याच इयत्तेत आहे… वरच्या इयत्तेत मी कधी जाणार…? मग झोप कशी येणार…?

अकरा वर्ष एकाच इयत्तेत राहणं, याच्या वेदना काय असतात कशा सांगू…? झोप कशी येणार…??

तुम्ही सर्वांनी मिळून माझ्या हातात पाटी पेन्सिल दिलीत,

पण आज 11 वर्ष, बाराखडी शिकताना अजूनही मी पाटीवर अ.. अ… आंघोळीचा, हेच गिरवत आहे, याची खंत आहे…

झोप कशी येणार…??

प… प… पसायदानाचा मी कधी गिरवणार…?

ज्ञ… ज्ञ… ज्ञानेश्वर माऊलींचा…

हा “ज्ञ” माझ्या पाटीवर उमटून, माझी बाराखडी पूर्ण होऊन वरच्या इयत्तेत माझे लोक कधी जाणार? याच विचारात मी असतो…! मग शांत सुखाने कशी झोप येणार…?

मध्यरात्री एखाद वेळी वाटतं, जाऊ दे थांबवू हे सर्व… बास झालं आता…! या विचाराने शांत सुखाने कशी झोप येणार…?

केव्हातरी पहाटे मग, कुशीवरून वळताना, तुमची आठवण येते…

तुमची प्रत्येक कृती, तुमचे मदतीचे हात आणि कौतुकाचे शब्द… माझ्यासाठी गाणं होऊन कानात रुंजी घालतात…

रुक जाना नहीं तू कहीं हार के 

काँटों पे चल के मिलेंगे साए बहार के… ओ राही, ओ राही…

तू तो चला था सपने ही ले के 

कोई नहीं तो हम तेरे अपने हैं, 

रुक जाना नहीं… रुक जाना नहीं… ओ राही, ओ राही…

तुम्ही गायलेलं हे गीत, माझ्यासाठी जीवन गाणं बनतं…!

हे गाणं ऐकता ऐकता मात्र मी निश्चिंत झोपी जातो, “उद्याची सकाळ” होण्याची वाट पहात…!!!

– समाप्त – 

© डॉ अभिजित सोनवणे

डाॕक्टर फाॕर बेगर्स, सोहम ट्रस्ट, पुणे

मो : 9822267357  ईमेल :  abhisoham17@gmail.com,

वेबसाइट :  www.sohamtrust.com  

Facebook : SOHAM TRUST

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ ”फक्त समजून घेता यायला हवं…” ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “फक्त समजून घेता यायला हवं… ☆ संध्या बेडेकर ☆

Life is a balance of holding on and letting go

आपण नेहमी ऐकतो वाचतो की वर्तमान काळात जगावं. भूतकाळ म्हणजे जे घडायचे होत ते घडून गेलं. चांगलं वाईट, नमकीन खटठा मीठा सर्व स्वाद चाखायला मिळाले. तरी भूतकाळ अगदी भूतासारखा मागे लागलेलाच असतो. त्याला कितीदा सांगितलं अरे बाबा!!

“Pl do not knock at my door, I do not have anything new to tell you. ”

सर्व माहित असून सुद्धा पुन्हा पुन्हा त्रास द्यायला मागेच असतो.

मी आता तुला (भूतकाळ) मागे सोडलय.

हे नक्की की भूतकाळात घडलेल्या घटना, आपण घेतलेले निर्णय, माणसांचे खरे चेहरे, यावरून मी खूप शिकले आणि आता बऱ्यापैकी हुशार झाले आहे.

Life is a balance of holding on and letting go.

आयुष्यात खूप अनुभव आले. खूपदा हेच कळत नाही की सरळ उभ रहाव की थोडं तिरकच , कारण तिरक ऊभ राहिल्याशिवाय काही लोक सरळ उभे रहात नाही. हे कळलय. कधी कधी आपले मत मांडणे ही गरजेचे असते. नाही तर भोवऱ्यात अडकायला होत.

आयुष्याच्या परीक्षेपेक्षा शाळेची परीक्षा सोपी होती.

तेंव्हा एक सिलेबस तरी असायचा.

आपण कोणत्या वर्गात आहोत. हे माहीत असायचे. परीक्षा झाली की पास की फेल हेही कळायचे.

म्हणजे असं म्हणावस वाटतं

शाळेतला अभ्यासाचा आयुष्यात तसा काही फारसा उपयोग होत नाहीं. तो अभ्यास फक्त डिग्री मिळविण्यापूरताच असतो. मी पदवीधर आहे. हे जगाला सांगायला. बाकी अभ्यासाची हुशारी आयुष्यात उपयोगात येत नाही. कारण येथे कोणताही एक नियम नसतो जो Universal नियम म्हणता येईल. येथे परिस्थीती प्रमाणे नियम बदलतात. येथे चेहरा बघून, गरजेप्रमाणे लोक बदलतात म्हणून नियमही बदलतात..

“एवढ्या लवकर जगातील कोणतीच गोष्ट बदलत नाही, जेवढ्या लवकर माणसाची वृत्ती आणि दृष्टी बदलते. ”

पायथागोरस चे प्रमेय किंवा न्युटन चे नियम काही आयुष्यात लागू पडत नाहीत.

आता आपण नेहमी चांगल वागावं हा आयुष्यातील एक नियम आहे,

न्युटनच्या नियमाप्रमाणे

Every action has equal and opposite reaction.

पण त्या नुसार तसं काही आयुष्यात घडत नाही. चांगल्या वागण्याचे परिणाम नेहमीच चांगले मिळतात असं नाही. चांगल्या वागण्याने लोक बुद्धू समजतात. They take you for granted. म्हणजे खूप दा तर असं वाटतं

आपल status Fill in the Blank सारखं आहे. म्हणजे,

वेळ आल्यावर/ गरज पडल्यावर लोक जसं कावळ्याला ही मानाने बोलावतात ना तसंच काहीसं वाटतं.

म्हणजे असं म्हणावस वाटतं,

जिंदगी इन लोगों के नखरों से बेहतर तो स्कूल की किताबें थी, जो देर से ही सही लेकिन समझ में तो आ जाती थी।

येथे माणसं समजतच नाहीत.

चांगुलपणा असण चांगलंच आहे. पण त्या बरोबर तितकच सजग सावध डोळसही असायला हवे.

आता वयानुसार, अनुभवावरून बऱ्याच गोष्टी समजायला लागल्या.

कोणी आपल्याला सोडून जातंय तर जाऊ दे. का?? कशाला? काय झालं?? वगैरे विचारायच नाही. त्यात वेळ घालवायचा नाही.

हे असं वागणं म्हणजे माझा घमंड, गुरूर नाही, मी सर्वांना आवडली पाहिजे असा माझा हट्टही नाही. कधी नव्हताच.

People pleasing च्या चक्रात फसायचंच नाही.

What people think about me is not important for me, What I think about myself means a lot for me.

लोक असं का वागतात? याच दुःख आता मला होत नाही. फक्त वाईट याच वाटतं हे सर्व समजेपर्यंत माझं अर्ध्याहून अधिक आयुष्य संपल. याच दुःख जास्त होतंय.

आता वयानुसार विचारांची range वाढली. एकाच ठिकाणी पोहचण्याचे अनेक मार्ग असतात, त्याचप्रमाणे एकाच गोष्टीला बघण्याचे वेगवेगळे दृष्टिकोन असू शकतात. हे कळलय.

सर्वांबरोबर आपले विचार जुळणे शक्यच नाही. बेमेल विचारांना ही समजून घेता आले पाहिजे. हे कळलय.

खरी परिस्थिती ही आहे की

जब तक जिंदगी के रास्ते समझे में आते हैं तब तक लौटने का वक्त हो जाता हैं ।

 

© संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७५ आणि ७६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७५ आणि ७६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

 श्लोक क्र. ७५ – – 

समस्तामध्ये सार साचार आहे ।

कळेना तरी सर्व शोधून पाहे ।

जिवा संशयो वाउगा तो तजावा ।

प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ।।७५।।

अर्थ : परमेश्वर प्राप्तीच्या सर्व साधनांमध्ये भगवंताचे नाम हेच सार (उत्कृष्ट साधन) आहे. जर हे समजत नसेल तर श्रुती, स्मृती, पुराणे, वेद, उपनिषदे आणि संतांची वचने यांचा अभ्यास करून पहा. भगवंताच्या नामाबद्दल विनाकारण येणाऱ्या संशयाचा त्याग कर. पहाट समयी भगवंताचे चिंतन कर.

(समस्तामध्ये – भगवंत प्राप्तीच्या साधनांमध्ये, सार – महत्वाचे/शाश्वत सत्य, साचार – खरोखरच /आचरणात आणण्याजोगे, वाउगा – व्यर्थ/निरर्थक, तजावा – त्याग करावा)

विवेचन :: समर्थ पुन्हा पुन्हा भगवंताच्या नामाची महती वेगवेगळ्या प्रकारे आपल्याला पटवून देत आहेत. आधीच्या श्लोकांमध्ये त्यांनी इतर साधनांपेक्षा रामनाम हे घेण्यासाठी किती सोपे आहे हे समजावून सांगितले. या श्लोकात ते म्हणतात की रामनाम हेच सार आहे. बाकी सर्व असार आहे. संत ज्ञानेश्वर महाराज म्हणतात, ” सार सार सार विठोबा, नाम तुझे सार, म्हणोनि शूळपाणी जपताहे वारंवार. ” बा विठ्ठला, तुझे नाम हेच एक सार आहे. म्हणून तर प्रत्यक्ष देवाधिदेव महादेव त्याचा वारंवार जप करीत असतात.

फळे जमिनीतील पाणी, जीवनसत्वे शोषून घेतात. फळातून ते सार आपल्यापर्यंत पोचवतात. नदी पर्वतातील गाळ, कचरा इ. वाहून आणते पण गोड पाणी आपल्यापर्यंत पोचवते. सूर्याच्या उष्णतेमुळे समुद्राच्या खाऱ्या पाण्याची वाफ होते. मेघ आपल्याला जीवनदायी जलधारांचा वर्षाव करतात. आपले शरीर देखील आपण खाल्लेल्या अन्नातील सार शोषून घेते. असार आहे ते बाहेर टाकते. निसर्गातील सर्वच घटक अशा प्रकारे सार ग्रहणाचे कार्य करीत असताना आपल्याला दिसतील. त्याप्रमाणेच ज्याने हे विश्व निर्माण केले, त्याचे नामच सर्व सार आहे. नामातच त्याचा वास आहे. तेच नाम आपणही घ्यावे. पण आपण मात्र असार असलेला हा संसार खरा मानून सारभूत असलेले भगवंताचे नाम घेत नाही.

पण नामाचा महिमा वारंवार सांगूनही काही लोकांना पटत नाही. अशा लोकांना समजावणे अवघड असते. स्वतः शोध घेतल्याशिवाय त्यांची खात्री पटत नाही. त्यांच्या मनात अपार शंका असतात. यांना सांगायला काय जाते? नुसत्या नामामध्ये एवढे सामर्थ्य असणे कसे काय शक्य आहे? नुसते नाम घेऊन काय होणार आहे? कशाला त्यात वेळ घालवायचा? अशा लोकांसाठी समर्थ म्हणतात की माझे बोलणे तुम्हाला खरे वाटत नसेल तर स्वतः खात्री करून घ्या. विविध ग्रंथ, पुराणे, वेद, उपनिषदे अभ्यास. संतांच्या वचनांचे वाचन करा. हे सगळे वाचल्यानंतर तुमच्या लक्षात येईल की सगळे ग्रंथ, पोथ्या पुराणे एकमुखाने भगवंताच्या नामाचा उद्घोष करीत आहेत. सर्व संतांनी देखील नामाचा महिमा एकमुखाने गायिला आहे. हे जेव्हा तुमच्या लक्षात येईल, तेव्हा आपल्या मनातील व्यर्थ शंकांचा त्याग करा. सर्व संशय टाकून द्या. ‘ संशयात्मा विनश्यति ‘ असे म्हणतात. तेव्हा परमेश्वराचे नाम हेच सर्व सार असल्याची जेव्हा खात्री होईल तेव्हा सगळ्या शंका टाकून देऊन निःशंक मनाने भगवंताचे नाम घ्या. कवी अशोक परांजपे आपल्या एका सुंदर गीतात म्हणतात – – 

नाम आहे आदि अंती, नाम सर्व सार ।

आहे बुडत्याला नौका ठेवली जीवनी आधार ।।

या गीताच्या शेवटच्या कडव्यात ते म्हणतात – – 

नाम जपो वाचा नित्य श्वासांतही नाम

नाममय होवो देवा माझे नित्य कर्म

असे आपलेही कर्म नाममय व्हावे. संत ज्ञानेश्वर महाराज म्हणतात – – 

नामापरतें तत्त्व नाहीं रे अन्यथा ।

वायां आणिका पंथा जासील झणीं ॥

– – म्हणूनच समर्थ आपल्याला सांगतात की प्रभात समयी भगवंताचे चिंतन करावे. म्हणजे दिवसभर त्याचे स्मरण राहते.

स्वसंवाद :: 

१. निसर्गातील प्रत्येक घटक जर केवळ ‘सार’ ग्रहण करत असेल, तर मी मात्र संसारातील ‘असार’ (क्षणभंगुर) गोष्टींनाच आयुष्यभराचे सत्य मानून त्यात गुंतलो आहे का?

२. भगवंताच्या नामाबद्दल किंवा भक्तीबद्दल माझ्या मनात नकळत काही ‘वाउगा’ (व्यर्थ) संशय किंवा तर्क-वितर्क येत राहतात का?

३. सर्व संतांनी आणि श्रेष्ठ ग्रंथांनी ज्या नामाला ‘जीवनाचा आधार’ म्हटले आहे, त्या नामाचा अनुभव मी स्वतः कधी निःशंक मनाने घेऊन पाहिला आहे का?

४. माझे नित्य कर्म ‘नाममय’ व्हावे यासाठी मी रोजच्या धावपळीत किती जागृत राहतो?

– – – – 

श्लोक क्र. ७६ – – 

नव्हे कर्म ना धर्म ना योग काही ।

नव्हे भोग ना त्याग ना सांग पाही ।

म्हणे दास विश्वास नामी धरावा ।

प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ।।७६।।

अर्थ : आपल्या हातून कर्म, धर्म किंवा योग यातील एकही गोष्ट व्यवस्थित होत नाही. माणूस पूर्णपणे भोगातही रमत नाही किंवा पूर्णपणे त्यागही त्याच्या हातून घडत नाही. अशा परिस्थितीत समर्थ म्हणतात नामावर विश्वास ठेवा. पहाटेच्या वेळी श्रीरामाचे चिंतन करा.

(त्याग – विरक्ती, सांग – यथासांग/व्यवस्थितपणे)

विवेचन : प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा या श्लोकमालिकेतील हा शेवटचा श्लोक. या दहा श्लोकांच्या गटात समर्थांनी भगवंताच्या नामाचा महिमा निरनिराळ्या प्रकारे वर्णन केला आहे. प्रत्येक श्लोकाचा शेवट ‘ प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ‘ या ओळीने झाला आहे. या श्लोकांनी नामस्मरणाचे आणि प्रभात समयी श्रीरामाच्या चिंतनाचे महत्व आपल्या मनावर ठसवले आहे.

आपण प्रापंचिक माणसे. जसे जमेल तसे आपल्या वाट्याला आलेले कर्म करण्याचा प्रयत्न करीत असतो. परंतु मतमतांच्या गलबल्यात आपण एवढे हरवून किंवा गोंधळून जातो की हाती आलेल्या कर्माला व्यवस्थितपणे न्याय देणे आपल्याला जमत नाही. धर्मपालनाच्या बाबतीतही असेच होते. धर्मपालनासाठीच्या विविध गोष्टी, विविध मार्ग ऐकून सामान्य माणूस गोधळतो. मग हे करू की ते करू अशी त्याची अवस्था होते. योगाचा किंवा ध्यानधारणेचा अभ्यास करणे त्याला शक्य होत नाही. थोडक्यात सांगायचे तर सामान्य माणसाची स्थिती एक ना धड भाराभर चिंध्या या म्हणीप्रमाणे होते. लोकांची ही मानसिकता ओळखून त्यांची दिशाभूल करणारे बुवा बाबा त्यांचे उखळ मात्र पांढरे करून घेतात. समर्थांसारखे सद्गुरू लोकांना अशा प्रकारच्या गोंधळाच्या स्थितीतून बाहेर काढण्याचे अचूक कार्य करतात. लोकांना सन्मार्गाची दिशा दाखवतात.

समर्थांच्या काळात तर सामान्य माणूस अशा गोंधळलेल्या स्थितीतच होता. तो कर्मकांडात अडकला होता. त्यामुळे ईश्वरप्राप्तीच्या खऱ्या मार्गापासून दूरच चालला होता. अशा वेळी समर्थ, संत तुकाराम आदी संतांनी लोकांना खरा धर्म काय आहे हे समजावून सांगितले. लोकांची परंपरा, अंधश्रद्धा आदींवर प्रहार करून त्यांना खरा ईश्वरभक्तीचा मार्ग दाखवला. समर्थांनी नामस्मरण हे सर्वात सोपे साधन आहे. त्यासाठी काही पैसा, वेगळा वेळ, शारीरिक श्रम या गोष्टी लागत नाहीत हे सांगितले.

कालमान बदलले आहे. पूर्वीप्रमाणे लोकांना योग, याग, तप करणे जमणार नाही हे ओळखून त्यांनी परमेश्वर प्राप्तीसाठी लोकांच्या हाती नामस्मरणाची गुरुकिल्ली दिली. आपल्या वाट्याला आलेल्या कर्माचे जेवढया चांगल्या प्रकारे शक्य होईल तसे पालन करा, आपण जे काही धार्मिक विधी करतो, त्यात काही तरी अपूर्णता राहून जाण्याची शक्यता असते. म्हणून आपण शेवटी म्हणतो, ” आवाहनं न जानामी, न जानामी तव अर्चनं… ” असे म्हणून परमेश्वराची क्षमा मागतो आणि काही अपूर्ण राहिले असेल ते पूर्ण करून घे अशी प्रार्थना करतो. म्हणूनच धर्म, योग, याग या गोष्टी पूर्णपणे जशाच्या तशा पालन करणे जमणार नाही हे समर्थ जाणतात. पण या सगळ्यात एकच महत्वाची गोष्ट लक्षात ठेवा असे त्यांचे सांगणे आहे. ती गोष्ट कोणती? तर ते म्हणतात, “म्हणे दास विश्वास नामी धरावा. ” इतर गोष्टी जशा जमतील तशा करा. पण नामावर विश्वास ठेवून नामस्मरणाचा सोपा मार्ग अवलंबा असेच त्यांचे सांगणे आहे. संत ज्ञानेश्वर महाराज देखील म्हणतात, ” एक तत्व नाम दृढ धरी मना, हरिसी करुणा येईल तुझी. ” तेव्हा सर्व संतांचे सांगणे एकच आहे. परमेश्वराचे नाम भक्तिभावाने घ्या. जणू तो समोर उभा आहे अशी कल्पना नाम घेताना करा. तुकाराम महाराज म्हणतात, “नाम उच्चारिता कंठी, पुढे उभा जगजेठी । ऐसे धरोनिया ध्यान, मनी करावे चिंतन. ” तेव्हा अशा प्रकारे प्रभात समयी श्रीरामाचे चिंतन करा.

स्वसंवाद :: 

१. विविध ग्रंथांचे मतमतांतर आणि संभ्रम यात अडकून न पडता, मी समर्थांनी सांगितलेल्या ‘नामावरील विश्वासाची’ गुरुकिल्ली स्वीकारायला तयार आहे का?

२. “आवाहनं न जानामी” म्हणताना माझ्या मनात माझ्या अपूर्णतेची जाणीव आणि भगवंताप्रती संपूर्ण शरणागती असते का?

३. तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे, मुखात नाम घेताना प्रत्यक्ष ‘जगजेठी’ (परमेश्वर) माझ्या समोर उभा आहे, अशी अनुभूती घेण्याचा मी कधी प्रयत्न करतो का?

४. या १० श्लोकांच्या मालिकेतून मी नेमके काय शिकलो? उद्यापासून माझ्या मनात ‘राम चिंतनाची’ नवी पहाट होईल का?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ७५ आणि ७६

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मुंबईची तहान भागवणारे ‘७ तलाव’ ☆ प्रस्तुती – श्री. मंगेश जांबोटकर ☆

श्री मंगेश जांबोटकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मुंबईची तहान भागवणारे ‘७ तलाव’  ☆ प्रस्तुती – श्री. मंगेश जांबोटकर ☆

आपण रोज सकाळी उठल्यावर नळाला पाणी आलं की ते वापरतो, पण हे पाणी मुंबईत नक्की कुठून येतं?

मुंबईला पाणी पुरवणारे तलाव असं म्हटलं की आपल्याला फक्त ‘तानसा-वैतरणा’ एवढीच नावं माहिती असतात. पण या तलावांचं अफाट जाळं, त्यांचा रंजक इतिहास आणि तिथली रंजक माहिती आपल्यापैकी अनेकांना ठाऊक नसेल!

आज आपण मुंबईला दररोज जवळपास ३, ८५० दशलक्ष लिटर (MLD) पाणी पुरवणाऱ्या या ७ तलावांची आणि धरणांची संपूर्ण कुंडली अगदी सविस्तरपणे पाहणार आहोत.

१. विहार तलाव (Vihar Lake) — मुंबईचा ‘पहिला’ जलस्रोत

संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानाच्या (बोरीवली नॅशनल पार्क) घनदाट जंगलात, तुळशी आणि पवई तलावाच्या अगदी मधोमध हा तलाव आहे.

खरा इतिहास: मुंबईला पाईपलाईनद्वारे पाणीपुरवठा करणारा हा मुंबईचा पहिला मोठा तलाव आहे. ब्रिटिशांच्या काळात १८५६ मध्ये याचं काम सुरू झालं आणि १८६० मध्ये ते पूर्ण झालं.

विशेष माहिती: या तलावाचा एक भाग मिठी नदीच्या उगमाशी जोडलेला आहे. हा परिसर पूर्णपणे संरक्षित (Protected Zone) असल्यामुळे इथे प्रचंड मोठे मासे, स्थलांतरित पक्षी आणि मुख्य म्हणजे मगरींचा मोठा वावर आहे. सुरक्षेच्या कारणास्तव इथे सामान्य नागरिकांना जाण्यास पूर्णपणे बंदी आहे.

२. तुळशी तलाव (Tulsi Lake) — मुंबईतील दुसरा जुना तलाव

विहार तलावा शेजारीच संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानात हा तलाव वसलेला आहे.

इतिहास व वैशिष्ट्य: विहार तलाव बांधल्यानंतरही मुंबईची पाण्याची गरज भागली नाही, म्हणून ब्रिटिशांनी १८७९ मध्ये तुळशी तलाव बांधला. हा मुंबईतील दुसरा सर्वात जुना तलाव आहे.

खास गोष्ट: या तलावाचं पाणी अत्यंत शुद्ध मानलं जातं. पावसाळ्यात हा तलाव ओसंडून वाहू लागला की त्याचं अतिरिक्त पाणी विहार तलावात आणि पुढे मिठी नदीला जाऊन मिळतं. हा परिसरही पूर्णपणे प्रतिबंधित क्षेत्र आहे.

३. पवई तलाव (Powai Lake) — निसर्गरम्य पण दुर्लक्षित

मुंबईतील प्रसिद्ध आयआयटी बॉम्बे आणि हिरानंदानी कॉम्प्लेक्सच्या जवळ असलेला हा अतिशय सुंदर तलाव आहे.

खरा इतिहास: ब्रिटिशांनी १८९०-९१ मध्ये मिठी नदीच्या पात्रावर धरण बांधून हा कृत्रिम तलाव तयार केला होता.

महत्त्वाची फॅक्ट: सुरुवातीला हे पाणी पिण्यासाठी वापरण्याचा विचार होता, पण तलावाच्या आजूबाजूला झालेल्या मानवी हस्तक्षेपामुळे आणि प्रदूषणामुळे हे पाणी पिण्यास अयोग्य ठरले. सध्या याचा वापर औद्योगिक कामांसाठी होतो. केंद्र सरकारने १९९५ नंतर याला राष्ट्रीय तलाव संवर्धन योजनेत स्थान दिले. इथे आजही मगरी आणि विविध पक्षी पाहायला मिळतात. या तलावाच्या बाजूला फिरण्यासाठी सुंदर उद्यान (बागेची जागा) आहे, जिथे लोक निसर्गाचा आनंद घेऊ शकतात.

४. तानसा तलाव (Tansa Lake) — शुद्ध पाण्याचा खजिना

ठाणे जिल्ह्यातील शहापूर तालुक्यातील माहुली डोंगराच्या कुशीत हा अवाढव्य तलाव वसलेला आहे.

खरा इतिहास: या तलावाचे मुख्य काम ब्रिटिशांनी १८९२ मध्ये पूर्ण केले आणि मुंबईला पाणी सुरू झाले. पुढे १९१५ ते १९२५ दरम्यान मुंबईची लोकसंख्या वाढली, तेव्हा धरणाची उंची वाढवण्यात आली आणि प्रसिद्ध ‘तानसा ट्विन पाईपलाईन्स’ (१८०० मिमी व्यासाच्या दोन मोठ्या वाहिन्या) टाकण्यात आल्या.

तानसा अभयारण्य: या धरणाच्या भोवती ‘तानसा वन्यजीव अभयारण्य’ आहे. या जंगलात बिबट्या, जंगली डुक्कर, भेकर, तरस आणि शेकडो प्रजातींचे पक्षी राहतात. ट्रेकर्ससाठी हा परिसर म्हणजे स्वर्ग आहे.

५. मोडकसागर धरण (Modak Sagar / Lower Vaitarna) — भारतीय अभियंत्याचा चमत्कार

हे धरण स्वातंत्र्यानंतरच्या काळात म्हणजेच १९५४ मध्ये पूर्ण झाले.

इतिहास आणि नाव: हे धरण वैतरणा नदीवर बांधण्यात आले आहे. मुंबई महानगरपालिकेचे (BMC) ख्यातनाम भारतीय मुख्य अभियंता नारायणराव मोडक यांच्या मार्गदर्शनाखाली आणि अफाट कष्टांतून हे धरण उभे राहिले. म्हणूनच त्यांच्या सन्मानार्थ या धरणाला ‘मोडकसागर’ नाव देण्यात आले.

विशेष माहिती: जेव्हा हे धरण ओव्हरफ्लो होतं, तेव्हा त्याचा विसर्ग एखाद्या मोठ्या धबधब्यासारखा दिसतो. मात्र, सुरक्षेसाठी आणि पाण्यात मगरींचा वावर असल्यामुळे इथे पूर्वपरवानगीशिवाय जाणे निषिद्ध आहे.

६. मध्य व अप्पर वैतरणा (Middle & Upper Vaitarna) — आधुनिक मुंबईची लाईफलाईन

वैतरणा नदी ही मुंबईसाठी वरदान ठरली आहे. या नदीवर वेगवेगळ्या कालखंडात धरणे बांधली गेली.

अप्पर वैतरणा: हे धरण नाशिक जिल्ह्यात आहे, पण त्याचे पाणी पाईपलाईनद्वारे मुंबईला आणले जाते.

मध्य वैतरणा (बाळासाहेब ठाकरे मध्य वैतरणा धरण): मुंबईची तहान भागवण्यासाठी २०१२ मध्ये हे धरण बांधून पूर्ण झाले. हे धरण अवघ्या २ वर्षांत बांधून रेकॉर्ड तयार करण्यात आले होते. हे पाणी वसई-विरारसाठी नसून पूर्णपणे मुंबई शहरासाठी आरक्षित आहे.

७. भातसा तलाव (Bhatsa Dam) — मुंबईचा ‘सर्वात मोठा’ पाठीराखा

मुंबई-नाशिक हायवेवर (NH-3) शहापूर आणि खर्डीच्या दरम्यान भातसा आणि चोरणा नदीच्या संगमावर हे अवाढव्य धरण आहे.

खरा इतिहास: १९७० आणि १९८० च्या दशकात हे धरण टप्प्याटप्प्याने विकसित करण्यात आले.

सर्वात मोठी फॅक्ट: मुंबईला रोज लागणाऱ्या एकूण पाण्यापैकी जवळपास ५०% पाणी एकट्या भातसा धरणातून पुरवले जाते! म्हणजेच भातसा धरण नसेल तर मुंबईची तहान भागणे अशक्य आहे. हा परिसर अतिशय डोंगराळ, घनदाट जंगलाने वेढलेला आणि प्रचंड प्रसन्न आहे. हायवेवरून जाताना येथील निसर्गाचा गारवा मनाला सुखावून जातो.

थोडक्यात सांगायचं तर…

मुंबईला पाणी पुरवणाऱ्या या ‘सात बहिणींमागे’ (विहार, तुळशी, पवई, तानसा, मोडकसागर, वैतरणा आणि भातसा) अनेक भारतीय आणि ब्रिटिश अभियंत्यांचे अफाट कष्ट आणि दूरदृष्टी आहे. शेकडो किलोमीटर दुरून डोंगरांना पोखरून, बोगदे तयार करून हे पाणी आपल्या घरापर्यंत पोहोचवले जाते.

 … म्हणूनच, पाण्याचा प्रत्येक थेंब जपून वापरा!

  ☆ ☆ ☆ ☆

लेखिका : अबोली पेंडूरकर

प्रस्तुती : श्री. मंगेश जांबोटकर

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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