हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ ज़ुबान… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता जुबान

? कविता – ज़ुबान ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

किसी की जुबान होती है मीठी

किसी की होती कड़वी

किसी की मिश्री डली सी

किसी की होती जहरीली

*

किसी की जुबान मधुर घंटी सी

किसी की तूफान सी गरजती

किसी की शहद घोलती सी

किसी की आतंक पैदा करती

*

किसी की जुबान अमृत बरसाती

किसी की गालियों की बौछार

किसी की जुबान मन मोह लेती

किसी की दिल पर करती वार

*

किसी की जुबान कानों में रस घोलती

किसी की मन में घाव करती

किसी की जुबान स्वर लहरियां बिखेरती

किसी की कर्कश  दिलों को दुखाती

*

किसी की जुबान फूल बिखराती

किसी की कांटों में उलझाती

किसी से जुबान खुशियां बांटती

किसी की ईर्ष्या द्वेष झलकाती

*

किसी की जुबान आशीष बरसाती

किसी की कहलाती काली जुबान

किसी की बांटती आनंद सभी को

किसी की करती छलनी प्राण

*

किसी की जुबान उत्साह बढ़ाती

किसी की बांटती निराशा के बोल

किसी की अंधेरे में रोशनी भरती

किसी की बोले व्यर्थ नकारात्मक बोल

*

किसी की जुबान नाप तौलकर बोलती

किसी की कैंची सी चलती जाती

किसी की रहती सहयोग को तत्पर

किसी की बहाने बाजियां  बनाती

*

किसी की जुबान सत्य पर अडिग

किसी की होती झूठ का पुलिंदा 

किसी का मकसद होता मानव सेवा

किसी का केवल स्वार्थ दिखावा

*

सभी जुबानें समान दीं प्रकृति ने

फिर क्यों इतने भेद विसंगतियां हैं

सभी मीठी मधुर सकारात्मक हो जाएं

तो जहान का नक्शा ही बदल जाए

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० – कविता – अंबिके ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक कविता  अंबिके”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० ☆

🌻कविता🌻 अंबिके 🌻

*

हे अंबिके माँ ज्ञान देना, कर सकूं आराधना।

नित ध्यान में बैठी रहूँ मैं, पूर्ण कर माँ साधना।।

*

मारे सभी दानव दलों को, शस्त्र तू ही धारती।

रण भेद करती अंबिका तू, निर्बलों को तारती।।

 काली बनी कल्याण करती, रक्त खप्पर साजती।

नारायणी तूअंबिके नित, क्रोध में ललकारती।।

*

दानव दलों के अंग सारे, धार लेती देह में।

दो नैन जलते राह में है, छल रहे सब नेह में।।

 आगे बढ़ी माँ छोड़ के सब, रौंदती अंगार है।

ममता जगी है भाव में माँ , प्रेम के भंडार है।।

*

शिव जानते हैं अंबिका को, क्रोध में जलती रही।

 चरणों पड़े फिर आपके ही, जीभ तो निकली रही।।

हर अंग में लाली जगी है, लाज भरते नैन है।

हे अंबिके जगदंबिके माँ, आप ही तो चैन है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “संविधान और समझ की आवश्यकता” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ आलेख ☆ “संविधान और समझ की आवश्यकता” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

“संविधान लिखने वाले के पास 32 डिग्रियां और 9 भाषाओं का ज्ञान था,

और आज अनपढ़ लोग संविधान में कमियां निकाल रहे हैं।”

यह वाक्य केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय की एक विडंबना को उजागर करता है।

भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर केवल एक नाम नहीं, बल्कि विद्वता, संघर्ष और दूरदर्शिता का प्रतीक थे। उन्होंने Columbia University तथा London School of Economics जैसे विश्वविख्यात संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे विधि, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र और इतिहास के गहरे ज्ञाता थे। अनेक डिग्रियों और बहुभाषीय ज्ञान से सम्पन्न होकर उन्होंने भारत जैसे विविधताओं से भरे देश के लिए ऐसा संविधान रचा, जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।

भारतीय संविधान कोई साधारण दस्तावेज़ नहीं है। यह सदियों के अनुभव, संघर्ष और चिंतन का परिणाम है। इसमें प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ कर्तव्यों का भी उल्लेख है। यह केवल शासन का ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है।

परंतु आज सोशल मीडिया के युग में बिना अध्ययन और बिना गहराई के समझ के लोग संविधान की आलोचना करने लगते हैं। आलोचना करना गलत नहीं है—लोकतंत्र में यह अधिकार है। परंतु बिना जानकारी, बिना अध्ययन और बिना संदर्भ के आलोचना करना समाज को भ्रमित करता है।

संविधान में संशोधन की व्यवस्था स्वयं इसी दस्तावेज़ में दी गई है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं, इसलिए संशोधन भी होते हैं। अब तक कई संशोधन हुए हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि संविधान लचीला भी है और जीवंत भी।

वास्तव में आवश्यकता संविधान की आलोचना करने की नहीं, बल्कि उसे पढ़ने और समझने की है। जब तक हम संविधान के मूल सिद्धांत—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—को आत्मसात नहीं करेंगे, तब तक उसकी महत्ता को पूर्ण रूप से नहीं समझ पाएंगे।

डॉ. अम्बेडकर ने संविधान बनाते समय चेतावनी दी थी कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो वह प्रभावी नहीं रहेगा। इसका अर्थ स्पष्ट है—दस्तावेज़ से अधिक महत्वपूर्ण उसे लागू करने की निष्ठा और समझ है।

आज हमें आवश्यकता है अध्ययनशील नागरिक बनने की। केवल डिग्रियों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि समझ और विवेक आवश्यक है। संविधान पर प्रश्न उठाने से पहले हमें स्वयं से प्रश्न करना चाहिए—क्या हमने उसे पढ़ा है? क्या हमने उसके मूल भाव को समझा है?

संविधान में कमियां खोजने से पहले हमें अपनी समझ को समृद्ध करना होगा। तभी हम सच्चे अर्थों में लोकतंत्र के सजग और जिम्मेदार नागरिक बन सकेंगे।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५२ ⇒ विचारक और प्रचारक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारक और प्रचारक।)

?अभी अभी # ९५२  ⇒ आलेख – विचारक और प्रचारक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

विचारक और प्रचारक का रिश्ता भी कुछ कुछ लेखक और पाठक जैसा ही होता है, बस अंतर यह है कि हर पाठक लेखक का प्रशंसक नहीं होता, जब कि हर प्रचारक, विचारक का प्रशंसक भी होता है।

पहले विचार आया, फिर विचार का प्रचार आया। आप चाहें तो विचारक को चिंतक भी कह सकते हैं, लेकिन चिंतक इतना अंतर्मुखी होता है कि उसे अपने विचार से ही फुर्सत नहीं मिलती। हमारी श्रुति, स्मृति और पुराण उसी विचार, गूढ़ चिंतन मनन का प्रकटीकरण ही तो है। जिस तरह वायु, गंध और महक को अपने साथ साथ ले जाकर वातावरण को सुगंधित करती है, ज्ञान का भी प्रचार प्रसार विभिन्न माध्यमों से होता चला आया है।।

चिंतन सामाजिक मूल्यों का भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों का भी। विचारक जहां सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, एक दार्शनिक जीवन के मानवीय और भावनात्मक पहलुओं पर अपनी निगाह रखता है। विचार और दर्शन हमेशा साथ साथ चले हैं। विचार ने ही क्रांतियां की हैं, और विचारों के प्रदूषण ने ही इस दुनिया को नर्क बनाया है। ऐसा क्या है बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण में कि वे आज भी किसी के आदर्श हैं, पथ प्रदर्शक हैं, कोई उन्हें पूजता है तो कोई उन्हें अवतार समझता है। मार्क्स, लेनिन आज क्यों दुनिया की आंख में खटक रहे हैं। विचार ही हमें देव बना रहा है, और विचार ही हमें असुर। देवासुर संग्राम अभी थमा नहीं।

एक अनार सौ बीमार तो ठीक, पर एक विचारक और इतने प्रचारक! अगर सुविचार हुआ तो सबका कल्याण और अगर मति भ्रष्ट हुई तो दुनिया तबाह। देश, दुनिया, सभ्यता, संस्कृति विचारों से ही बनती, बिगड़ती चली आ रही है। मेरा विचार, मेरी सभ्यता, मेरी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ, हमारा नेता कैसा हो, इसके आगे हम कभी बढ़ ही नहीं पाए। जो विचार भारी, जनता उसकी आभारी।।

आज सबके अपने अपने फॉलोअर हैं, प्रशंसक हैं, आदर्श हैं। सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र जन मानस पर इतना हावी है कि आम आदमी की विचारों की मौलिकता को ग्रहण लग गया है। एक भेड़ चाल है, जिससे अलग वह चाहकर भी नहीं चल सकता।

हमारी विचारों की बैलगाड़ी दो बैलों की जोड़ी से शुरू हुई और गाय बछड़े पर आकर रुक गई। विकास ट्रैक्टर पर चढ़कर आया और कीचड़ में कमल खिल गया। हमने बछड़े को हटा दिया, गाय को माता बनाकर गौशाला में भेज दिया। अब यह गऊ माता ही हमें इस भव सागर से पार लगाएगी। आज हमारे पास अच्छे विचारक भले ही नहीं हों, अच्छे प्रचारक जरूर हैं।।

आज का युग विचार का नहीं, प्रचार का युग है। अच्छाई एक ब्रांड है, जो बिना अच्छे पैकिंग, विज्ञापन और ब्रांड एंबेसेडर के नहीं बेची जा सकती। धर्म, राजनीति, आदर्श, नैतिकता और समाज सेवा बिना प्रचार और प्रचारक के संभव ही नहीं। कोई सेवक है, कोई स्वयंसेवक, कोई गुरु है कोई चेला, कोई स्वामी है कोई शिष्य, कोई भगवान बना बैठा है तो कोई शैतान। सबकी दुकान खुली हुई है, मंडी में बोलियां लगवा रही हैं समाजवाद, पूंजीवाद, वंशवाद और राष्ट्रवाद की। सबके आदर्श, सबके अपने अपने विचारक, प्रचारक और डंडे झंडे। मंडे टू संडे। जिसका ज्यादा गल्ला, उसका बहुमत। लोकतंत्र जिंदाबाद।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७१ – देश-परदेश – विश्व निद्रा दिवस : 13 मार्च 2026 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७१ ☆ देश-परदेश – विश्व निद्रा दिवस : 13 मार्च 2026 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

जब निद्रा दिवस की जानकारी मिली तो आरंभ में लगा, ये अवश्य ही कुंभकरण का जन्मदिवस होगा। हमारे जैसे निद्रा प्रेमी उसकी याद में इसको मनाते होंगे।

आखिर, आज वो दिन आ ही गया, जिसका हम पूरे साल भर इंतजार करते करते, सोते ही रहते हैं। इस खुशी को मानने के लिए हमारी पूरी योजना रहती हैं।

सभी संबंधित आवश्यक सामग्री ऑनलाइन मंगवा कर रखी पड़ी रहती हैं। शयन कक्ष की खिड़कियों को मोटे पर्दे से ढकना हो, या आंख पर पहनने वाली पट्टी से लेकर कान में ठूसने वाली रुई, सब तैयार हैं।

घर के द्वार पर बाहर से ताला लगवा दिया जाता हैं। टीवी, मोबाइल, पेपर सब कोसों दूर रख कर सोने की शुरुआत होती हैं।

भरपेट गरिष्ठ भोजन के पश्चात मीठी लस्सी की ओवरडोज लेकर, वातानुकूल कमरे में नींद लेने में सहायक सभी उपकरणों का उपयोग कर, मखमली शैय्या पर शांत चित्त लेटते ही, दूसरी दुनिया में चल देते हैं।

कितना मज़ा आता है, इसकी कल्पना करना भी संभव नहीं हैं। आप भी इसका आनंद लेवें।

अभी आंखें बंद ही हुई थी, हमारे कमरे के दरवाजे पर इतनी तेज आवाज़ आई, मानो पश्चिम एशिया की कोई मिसाइल हमारे कक्ष के दरवाजे के बाहर गिरी हैं। हड़बड़ाहट के मारे गिरते पड़ते दरवाजा खोला, बाहर श्रीमती जी खाली गैस के सिलेंडर के साथ खड़ी थी, और बोली गैस एजेंसी जाएं और सिलेंडर भरवा कर आए, ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम बंद पड़ा है, घर में गैस खत्म हो गई, अब खाना नहीं बन सकता हैं।

मरता क्या ना करता, खाली सिलेंडर लेकर डीलर के यहां कूच कर रहें हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२१ ☆ गुणगान माझे… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२१ ?

गुणगान माझे… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

(चाल : पुकारता चला हूँ)

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

*

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

*

मैत्रिणीच्या सोबती असायची

उठून त्यांत तीच तर दिसायची

मैत्रिणीकडे तिच्या मी पाहता

व्यर्थ का ती दात ओठ खायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

*

मीही चोरुनी तिला पाहातसे

अनंत काळजावरी तिचे ठसे

गप्प ती तरीही कान ऐकती

अखंड गुणगान माझे गायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ जैत… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ जैत... ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

अलगद घाट

वळणाची वाट

दूरांतरी काठ

तरावे नित्य.

लहरींचे झेल

पेलीतच जावे

सुख-दुःख यावे

संघर्ष सत्य.

 *

श्वासालाही बळ

वेदनेची कळ

तोडितच गळ

जगणे तथ्य.

 *

सरितेची धार

लोचनांचे सार

नियतीचा भार

संयम पथ्य.

 *

जीवन सफर

समयाचे तर

भयावीना जर

यत्नांचे जैत.

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ आकाश कवेत, पाय मात्र जमिनीवर… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

🔅 विविधा 🔅

☆ आकाश कवेत, पाय मात्र जमिनीवर… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

१९९२ मध्ये भारत सरकारने जे आर डी टाटा यांना ‘भारतरत्न’ हा सर्वोच्च नागरी किताब देऊन त्यांचा सन्मान केला. ही आनंदाची बातमी त्यांना रतन टाटा यांनी कळवली. ही बातमी ऐकल्यानंतर त्यांनी जी प्रतिक्रिया दिली, ती त्यांचे मोठेपण दर्शवणारी आहे. ते म्हणाले, ” O my God, why I am selected for this honour? आपण हे थांबवण्यासाठी काही करू शकतो का? भारतात इतरही अनेक महान लोक आहेत जे भारतरत्न या किताबास पात्र आहेत. मी असे काय मोठे केले? मी जे काही माझ्या आयुष्यात केले ते माझे कर्तव्यच होते. मी ते उत्तम प्रकारे पार पाडले एवढेच! मी देशाला विमानसेवा दिली आणि मूल्याधारीत उद्योगसंस्कृती रुजविण्याचा प्रयत्न केला. पण म्हणून मी एवढ्या मोठ्या सन्मानाला पात्र आहे का? “

पदव्यांसाठी, पुरस्कारांसाठी हव्यास करणाऱ्या लोकांच्या डोळ्यात अंजन घालणारी ही प्रतिक्रिया आहे. आज प्रत्येक जण मोठेपणाला हपापलेला असतो. मी इतरांपेक्षा किती श्रेष्ठ, मला किती समजते हे दाखवण्याच्या प्रयत्नात असतो. कधी कधी हे दाखवण्याच्या प्रयत्नात ती व्यक्ती केविलवाणी दिसते हेही खरेच! राजकारण हे खरे तर समाजसेवेचे क्षेत्र. परंतु या क्षेत्रात काम करणारे समाजसेवेच्या उद्देशाने अभावानेच येतात. बहुतेकांना सत्ता किंवा पद हवे असते. ते नाही मिळाले तर ते वाटेल त्या थराला जाण्यासाठी कमी करत नाही हे आजकाल आपण पाहतो आहोत. या पक्षातून त्या पक्षात, त्या पक्षातून दुसऱ्या पक्षात असे सारखे पक्षांतर सत्तेसाठी सुरू राहते.

ज्याप्रमाणे जेआरडी टाटा यांनी त्यांना भारतरत्न पुरस्कार भारत सरकारने जाहीर केल्यानंतर प्रतिक्रिया दिली ती पाहून म्हणावेसे वाटते की खरोखर अशा व्यक्ती धन्य होत. भारताचे भूषण होत. कोणतीही अपेक्षा न बाळगता अशा व्यक्ती आपले कर्तव्य निरलसपणे करीत राहतात.

असेच आणखी एक उदाहरण आठवते. १९५२ सालची गोष्ट आहे. प्रख्यात शास्त्रज्ञ आईन्स्टाईन यांनी जर्मनीतून इस्रायलमध्ये स्थलांतर केले होते. त्यावेळी इस्रायलचे पहिले अध्यक्ष चॅम वेजमेन यांचे नुकतेच निधन झाले होते. अशावेळी आईन्स्टाईन यांना इस्रायलचे दुसरे अध्यक्ष होण्याबद्दल विचारण्यात आले. त्यांच्यासारख्या अत्यंत बुद्धिमान व्यक्तीने इस्रायलचे अध्यक्ष व्हावे अशी जनतेची इच्छा होती. वास्तविक जर्मनीतून आलेल्या एका अलौकिक व्यक्तिमत्त्वाचा हा फार मोठा सन्मान होता. परंतु आईन्स्टाईन यांनी अत्यंत नम्रपणे ही ऑफर नाकारली. ते आपल्या उत्तरात म्हणाले, ” तुम्ही माझ्यावर दाखवलेल्या विश्वासामुळे आणि प्रेमामुळे मी भारावून गेलो आहे. त्यासाठी आपला मनापासून आभारी आहे. परंतु त्याचबरोबर मला हेही आपल्याला सांगितले पाहिजे की आपण जे पद मला देऊ करत आहात त्या पदावर बसण्याची माझी पात्रता नाही. कारण गुंतागुंतीच्या अशा मानवी संबंधांच्या क्षेत्रात मला फारसं कळत नाही. त्या विषयाचा मी कधी अभ्यासही केला नाही. मला गणितात आणि भौतिकशास्त्रात थोडीफार गती असेल पण माझी मनापासून अशी इच्छा आहे की त्याच क्षेत्रात मी आणखी परिश्रम करावेत आणखी अभ्यास करावा. “

महान व्यक्ती खरोखरच महान का असतात त्याचे उत्तर म्हणजे मला वाटतं वर आईन्स्टाईन यांनी दिलेली प्रतिक्रिया. नाहीतर आपल्याला एखादे पद मिळावे म्हणून आपण किती आसुसलेले असतो. आपल्याला कोणत्याही विषयात गती आहे आणि आपल्याला कोणतेही काम जमू शकते अशा विचाराने सत्तेकडे किंवा पदांकडे धाव घेणाऱ्यांची सध्या कमतरता नाही. परंतु जेव्हा अशा अयोग्य किंवा अपात्र व्यक्ती पदावर येतात तेव्हा ते त्या पदाला न्याय देऊ शकत नाहीत हे आपण पाहतो.

रामकृष्ण परमहंस, संत गाडगेबाबा, विनोबा भावे, साने गुरुजी यांच्यासारखी थोर मंडळी कोणालाही आपल्या पाया पडू देत नसत. वास्तविक ते काय किंवा आणखी इतर संत काय यांची योग्यता खरोखरच फार मोठी! पण त्यांचे म्हणणे असे असायचे की वाकायचंच असेल तर त्या सर्वशक्तिमान अशा परमेश्वरापुढे वाका. इतरांपुढे नाही. दुसऱ्याला आपल्यापुढे वाकायला लावून काहीच साधत नाही. वाकायला लावणाऱ्याचा अहं वाढत जातो आणि वाकणाऱ्याच्या मनात कमीपणाची भावना!

आम्हाला तर आमच्या कोणी पाया पडले तर केवढा आनंद होतो! आमचा अहम सुखावतो! मला किती लोक नमस्कार करतात हे आपण इतरांना अप्रत्यक्षपणे दाखवून देतो आणि आपण किती मोठे आहोत हेही त्यातून दाखवण्याचा प्रयत्न असतो. अर्थात सगळेच असे असतात असे नाही. काही जण ज्यांच्या पुढे वाकावे किंवा नम्र व्हावे अशा योग्यतेचे असतातच!  

या सगळ्या थोर व्यक्तींनी दाखवून दिले आहे की, ‘पद’ माणसाला मोठे करत नाही, तर ‘कर्तृत्व’ आणि ‘नम्रता’ या गुणांमुळे माणूस मोठा होतो. कवी दत्ता हलसगीकर आपल्या कवितेत म्हणतात

“आभाळाएवढी उंची ज्यांची, त्यांनी थोडे खाली झुकावे,

मातीत मळले जन्म ज्यांचे, त्यांना जरा उचलून घ्यावे…”

महाराष्ट्राच्या मातीतील संतांनी तर ही ‘उंची’ प्रत्यक्ष जगून दाखवली. संत गाडगेबाबा यांनी आयुष्यभर हातात खराटा घेऊन स्वच्छतेचे कार्य केले. लोक त्यांच्या चरणी नतमस्तक व्हायचे, पण ते स्वतः मात्र गरिबांच्या झोपड्यांत जाऊन त्यांना ‘उचलून धरण्याचे’ काम करत राहिले. त्यांनी सत्तेच्या सावलीलाही स्पर्श केला नाही. तर दुसरीकडे साने गुरुजी यांनी आपल्या साध्या राहणीतून आणि उच्च विचारांतून समाजाला माणुसकीचे धडे दिले. त्यांनी कधीही राजकीय पदाची अभिलाषा धरली नाही, उलट मातीत मळलेल्या कष्टकरी वर्गाला स्वाभिमान मिळवून दिला.

आज आपण पाहतो की, कोणत्याही छोट्या पदासाठी लोक एकमेकांचे पाय ओढतात. ‘आधी सिद्धी आणि मग प्रसिद्धी’ हे जीवनाचे सूत्र आहे. यशाचा मंत्र आहे. पण याचा विसर पडल्यामुळे केवळ नावासाठी आणि प्रसिद्धीसाठी धावणारी माणसांची शर्यत दिसते. खरी श्रेष्ठता आधी ‘सिद्ध’ करण्यात असते. मग प्रसिद्धी आपोआपच मिळते. ‘ न मागे तयाची रमा होय दासी ‘ असे म्हटले जाते. ज्यांच्याकडे खरोखरच ‘उंची’ असते, त्यांना ती ओरडून सांगावी लागत नाही; ती त्यांच्या नम्रतेतूनच झळकत असते.

शिखरावर जाणे महत्त्वाचे आहेच, पण त्याच वेळी पाय जमिनीवर असणे हे त्याहूनही अधिक महत्त्वाचे आहे. कारण जमिनीवर पाय असतील तरच माणसाला दुसऱ्याची वेदना समजते आणि आकाशाचा आवाका उमजतो. या सगळ्या व्यक्तींच्या कवेत आकाश होते पण पाय मात्र जमिनीवर होते.

कविवर्य बा भ बोरकर यांच्या ‘लावण्यारेखा’ या कवितेतील या ओळी मला फार आवडतात. ते म्हणतात

जीवन त्यांना कळले हो

मी पण ज्यांचे पक्व फळापरी सहजपणाने गळले हो.

****

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ जलसाक्षर… भाग – १ ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ जलसाक्षर… भाग – १ ☆ श्री सुनील देशपांडे

ऐका ऐका जलदेवता तुमची कहाणी… 

अर्थात जलसाक्षरतेची कहाणी… जेहेत्ते कालाचे ठायी एका आटपाट नगरीमध्ये वासू हा एक मध्यमवर्गीय, मध्यमवयीन, मध्यममार्गी असा एक सर्वसामान्य मध्यम माणूस रहात असे. आता मध्यम म्हटले की त्याचा फ्लॅट असणार बंगला नव्हे. त्याची दुचाकी असणार चारचाकी नव्हे. मध्यमवयीन म्हणल्यानंतर तो कुठेतरी नोकरी करीत असणार रिटायर्ड नव्हे. तसेच त्याला वाङ्मयाची व्याख्यानांची आवड वगैरे असणारच. ओघानेच त्याच्या बायकोचे नाव वसू असायलाच हवे. वाङ्मयीन नियमानुसार त्याला एक सासू असायला हवी. हो ना? तशी ती या वासुला सुद्धा आहे. जेहेत्ते कालाच्या पद्धतीनुसार वासुला एकच मूल असणार आणि ती मुलगीच असायला काय हरकत आहे? नाही का? म्हणजे समाज प्रबोधन वगैरेच्या दृष्टीने ते बरे असावे. होय की नाही? तर असे हे चौकोनी कुटुंब आपल्या कथानायकाचे. अरे हो पण त्या कन्यारत्नाचे नाव काय? ते काहीही असू शकेल. सुशीला, सुकन्या, सुधन्वा वगैरे वगैरे. छे छे ही नावे जुनी वाटतात. त्यामानाने सुधन्वा 

ठीक वाटेल नाही का? पण ते आपल्याला काय करायचंय? कारण त्या कन्यकांना शॉर्ट फॉर्म ची सवय. आणि प्रत्येक नावाचा शॉर्ट फॉर्म करूण्याचा वसा त्या आटपाट नगरीच्या लोकांनी इतिहासकाळापासून घेतलेला होता असे म्हणतात. तेथील एका नव्या दमाच्या इतिहास संशोधकाने पुरातन काळी श्रीराम दशरथ रघुवंशी यांना एसडीआर व लक्ष्मण दशरथ रघुवंशी यांना एलडीआर म्हणत असत असे कोणत्या तरी जवळपास सापडलेल्या पुराणकालीन शिलालेखावरून स्पष्ट होते. असे विधान करून पुराव्या दाखल संबंधित शिलालेखाचे फोटो व्हाट्सअप वरून व्हायरल केलेत असे ऐकले आहे. अरे पण हे असे जुन्या जाणत्या लेखकांसारखे मी विषयांतर का बरे करीत आहे? पण. तर आपला मूळ विषय म्हणजे वासू. तर या वासूच्या कन्येचे नाव काय ते काही का असेना? पण तिच्या सर्व मित्रमैत्रिणी तिला सू या नावानेच पुकारत असल्याचे व त्यांनाही तिचे नक्की नाव माहित नसल्याने आपणालाही ते माहित करून घेण्याची आवश्यकता नाही. असो. तर ते कन्यारत्न म्हणजे सू. तर असे हे चौकोनी कुटुंब वासू, वसू, सासू आणि सू ही झाली या चौकोनी कुटुंबाची ओळख. तूर्त एवढीच ओळख पुरे. तर झालं काय की वासुने एका दिवशी पेपरात वाचलं अर्थात मध्यमवर्गीय व मध्यमवयीन म्हटल्यावर तो पेपर लहान सहान बातम्यांसह संपूर्ण वाचत असणार हे ओघाने आलंच. असो. तर त्याने वाचलं की अर्थात अत्यंत छोट्या व न दिसणाऱ्या कोपऱ्यात छापलेल्या बातमीत वाचलं. या आटपाट नगरीमध्ये जलसाक्षरता या विषयावर एका प्रसिद्ध जलतज्ज्ञाचं व्याख्यान आहे. अर्थात तज्ज्ञ म्हणजे मराठी नसणार. जलतज्ज्ञ म्हणजे उत्तरेकडील असू शकतो. त्याचं आडनाव सिंग वगैरे असायला काहीच हरकत नाही. अर्थात तो कोणी का असेना. पण तो अत्यंत बुद्धिमान, प्रभावी वक्ता व त्या विषयावरील जाणकार मराठी आहे असे वासुला खात्रीने वाटले. हे मात्र नक्की. असो. तर त्या जाणकाराच्या व्याख्यानाला जायचे वासुने ठरवले. अर्थात मध्यम वगैरे असल्यामुळे वासुची अशीही इच्छा होती की आपले संपूर्ण कुटुंब जलसाक्षर व्हावे. परंतु कौटुंबिक सभेमध्ये नेहमीप्रमाणे त्याचा हा प्रस्ताव एक विरुद्ध तीन मतांनी फेटाळण्यात आला. सासूचा अर्थातच भजनी मंडळाचा कार्यक्रम असल्याने ते मत विरोधी पडलं. साड्यांच्या भव्य सेलची पानभर जाहिरात आजच्याच पेपरला असल्याने वसूचं मत सुद्धा विरोधात गेलं आणि चि. सू पूर्ववतच सायंकाळी मैत्रिणींबरोबर भटकंतीस जात असल्याने व तारुण्यपूर्व वयोमानात असल्याने वडिलांबरोबर जाण्याची शक्यता नसल्याने ते मत विरोधात जाणार हे वासुने कायमचे गृहित धरलेले असते. अशा तऱ्हेने फेटाळल्या गेलेल्या ठरावाचा एकमेव समर्थक वासुने एकट्यानेच व्याख्यानाला जायचे असे वाचून ठरवले असणार हे आमच्या चाणाक्ष वाचकांच्या ध्यानात आत्तापर्यंत आले असेलच. 

तर अशा तऱ्हेने आपला कथानायक श्री वासूजी हे बरोबर सहा वाजता तेथे पोहोचले येथे एकही वाहन अथवा प्रेक्षक वा संयोजक यांचे पैकी कोणाचाही पत्ता नव्हता. फक्त दोन कर्मचारी गेटवर फ्लेक्स लावण्याच्या खटपटीत होते. गेटवरचा बोर्ड पाहून वासूने मोठा आ वासला. बोर्डवर ‘जलसा मंडळ’ असे लिहिले होते. त्यांनी त्या कर्मचाऱ्याला विचारले “अहो येथे व्याख्यान आहे ना? ”

“ कुणास ठाऊक? आम्हाला फक्त इथे हा जलसाचा बोर्ड लावायला सांगितले आहे”. 

बुचकळ्यात पडलेल्या वासूचा आs असून तसाच उघडा असताना, घाईघाईत एक मनुष्य हातात पिशवी व काही गुच्छ सांभाळण्याची कसरत करत करत आत शिरला. त्याच्या मागोमाग आत शिरत वासूने त्याला विचारले “अहो येथे व्याख्यान आहे का हो? ”

“हो”

“मग हे जलसा मंडळ काय आहे? ”

“ ते आमच्या संस्थेचं नाव आहे. ‘जल ललकार साहित्य मंडळ’ या संस्थेतर्फे ते व्याख्यान आहे.”

“मग ते व्याख्यान आहे केंव्हा? ” 

“सात वाजता” 

“अहो पण पेपर मध्ये सहा वाजता छापलंय” 

“हो बातमीत वेळ सहाची दिली की आटपाट नकरीचे लोक सात वाजेपर्यंत येतात. तुम्ही इथले दिसत नाही? आता बघा ना, सहाची वेळ द देऊन सुद्धा तुमच्याशिवाय अजून कोणी दिसते का? जर पाहुणे चुकून वेळेवर आले तर संस्थेच्या इभ्रतीचा पंचनामा होणार ना? पण तुम्ही जाऊ नका, चहा येईलच इतक्यात आपण चहा घेऊ” 

चहा आला. चहा पिता पिता मी त्याला विचारलं

“का हो पण या कार्यक्रमाला किती प्रेक्षक येतील! ” 

कार्यक्रम ठरवतानाच त्याची सोय करून ठेवावी लागते. आता असं पहा स्वागत गीतासाठी आम्ही पाच मुली घेतल्यात. आवाज कसा का असेना पण त्यांचे मित्र मंडळ मोठे असावे. कुठल्यातरी क्लासच्या असाव्यात, म्हणजे ते मित्र मंडळ, त्यांच्या घरची व काही कॉलनीतली मंडळी यापैकी साधारण हिशोबासाठी कमीत कमी 15 पकडा. एक सामूहिक जलनृत्य आहे. त्यांचीही अशाच हिशोबाने २० धरा, जलकाव्य स्पर्धेचे पाच विजेते त्यांची पंधरा, जलावतरण सन्मान चिन्हासाठी मनपाचे पाणी सोडणारे कर्मचारी व प्लंबर यांचे कुटुंबीय किमान 20 धरू. म्हणजे 70‌ संस्थेचे किमान पाच‌. असे 75 नक्की‌. मग बातमी वाचून येणारे काही रिकामटकडे बावळट चार-पाच, असे 80 जण आले की चित्कार गर्दी झाली‌. हो की नाही? ” 

वासूने पुन्हा एकदा आ वासला बायको व्यतिरिक्त आपला बावळटपणा तोंडावर बोलणारे असेही काही लोक असू शकतात ही शक्यता त्यांने कधीच गृहीत धरली नव्हती‌. तेवढ्यात त्यांच्या वॉर्ड मध्ये मनापाचे पाणी सोडणारा कर्मचारी (आता वाचकांना त्याचं नाव कशाला हवंय? त्याची काही गरज नाही. आणि कुणाला हवं असल्यास त्यांनी त्यांच्या कल्पनाशक्तीने काहीही समजावं. सगळं लेखकांनंच कशाला सांगायला हवं? वाचकांनीही थोडसं स्वतःचं डोकं वापरायला काय हरकत आहे? ) असो. 

“काय वासूनाना;” करत तो सहकुटुंब त्यांचे जवळ येऊन बसला आणि आपण कसे प्रामाणिक व कर्तबगार कर्मचारी आहोत याचे रसभरीत वर्णन करत वासूला कार्यक्रमाच्या वेळेपर्यंत पकडून ठेवले. अर्थात नंतरचा कार्यक्रम रटाळपणा आणि गोंधळाने भरलेला असला तरी जलतज्ञाचे भाषण मात्र अत्यंत उद्बोधक प्रभावी व समर्पक होते. वासूला आपण तो रटाळपणा सहन करत थांबल्याचे सार्थक झाले असे वाटले. पूर्वीच्या सर्व नकारात्मक गोष्टींना झटकून तो जलतज्ञांच्या भाषणातील महत्त्वाचे मुद्दे मनात घोळवीत राहिला.

सतत तीन वर्षाच्या कमी पावसामुळे पाणीसाठे कमी झाले आहेत. मुळातच पाणी अपुरे. आठवड्यातून एक दिवस पाणी बंद करून सुद्धा उपलब्ध पाणीसाठा अपुरा असल्याने पाणी बचती शिवाय पर्याय नाही. नागरिकांनी पाणी अत्यंत काटकसरीनेच वापरणे आवश्यक आहे. श्रीमंतांनी बाथटब बंद ठेवले पाहिजेत. शॉवर मुळे एका बादलीत होऊ शकणारऱ्या स्नानासाठी पाच सहा ल्या पाणी वापरले जाते. म्हणजे चार-पाच बदल्यांचा अपव्यय होतो. सतत नळ बंद ठेवणे आवश्यक आहे. पण त्यांच्या ऐवजी नळ सतत चालू ठेवून पाण्याचा अपव्य केला जातो. शर्ट एक दिवस वापरत असाल तर तीन दिवस वापरून मग धुवायला टाका. जीन्सच्या पॅन्ट वापरा त्या आठवड्यातून एकदा धुतल्या तरी चालतात. वाहने पाईपने धुण्यापेक्षा ओल्या फडक्याने पुसा वगैरे वगैरे अशा अनेक गोष्टी आपल्याला अमलात आणता येण्यासारख्या आहेत हे वासूला मनोमन पटले. आणि या सर्व गोष्टी आपण उद्यापासून आपल्या घरात करायच्या असा त्यांने दीर्घ संकल्प केला. या संकल्पनेवर विचार करीतच वाचू रात्री शांत झोपी गेला.

– क्रमशः भाग पहिला 

© श्री सुनील देशपांडे 

 फोन :९६५७७०९६४०

 ई मेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ पंचेचाळीशीनंतरची नवी सप्तपदी… लेखक : श्री मंगेश दोरके ☆ श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) ☆

श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) 

? मनमंजुषेतून ?

☆ पंचेचाळीशीनंतरची नवी सप्तपदी… लेखक : श्री मंगेश दोरके ☆ श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) 

– – सहजीवनाचे नवे ऋतू

– – पंचेचाळीशीनंतरची नवी सप्तपदी – – 

१. पहिले पाऊलः जोडीदाराच्या बदलत्या रूपाचा आणि वयाचा मूक स्वीकार करणे.
२. दुसरे पाऊलः मुले मार्गी लागल्यानंतरच्या रिकाम्या घरट्यात एकमेकांना नव्याने शोधणे.
३. तिसरे पाऊल: जोडीदाराच्या मूक त्यागाबद्दल कृतज्ञता व्यक्त करणे आणि नवे सामायिक छंद शोधणे.
४. चौथे पाऊलः समाजाच्या अपेक्षांतून मुक्त करून हरवलेल्या स्वप्नांना नवे पंख देणे.
५. पाचवे पाऊलः जुने हिशेब सोडून भूतकाळाचे ओझे कायमचे उतरवून ठेवणे.
६. सहावे पाऊल: आजारपणातील निस्वार्थ आधार आणि एकमेकांचा ‘समांतर एकांत’ जपणे.
७. सातवे पाऊल: वेळेचे भान ठेवून कोणत्याही मृगजळामागे न धावता निखळ मैत्री जपणे.

≡ ≡ ≡ ≡ ≡ 

काल माझ्या मावस भावाच्या लग्नाचा मांडव सनईच्या मंगल सुरांनी ओसंडून वाहत होता. होमकुंडातून उसळणाऱ्या पवित्र धुराच्या लोटामुळे माझे डोळे किंचित पाणावले आणि माझी नजर सहजच शेजारी बसलेल्या माझ्या अर्धांगिनीकडे वळली. उकाड्याने तिच्या कपाळावर घामाचे मोत्यांसारखे थेंब चमकत होते. मी खिशातून रुमाल काढला आणि अत्यंत सहजतेचा स्पर्श देत ते टिपले. तिने माझ्याकडे पाहून एक अत्यंत आश्वासक स्मितहास्य केले. समोर सनईचे सूर आकाशाला भिडत होते आणि त्या तरुण जोडप्याने एकमेकांचा हात धरून अग्नीभोवती फेरे घ्यायला सुरुवात केली होती. त्यांच्या डोळ्यांत भविष्यातली सोनेरी स्वप्ने होती आणि जग जिंकण्याची एक खळाळती उमेद होती. ते दृश्य पाहताना मला अचानक पंचवीस वर्षांपूर्वीचा माझा तो दिवस आठवला ज्या दिवशी आम्हीही अशीच एकमेकांना वचने देत ती पहिली सप्तपदी घेतली होती.

विशीच्या उंबरठ्यावर घेतलेली ती पहिली सप्तपदी मुळात संसाराचा डोलारा उभा करण्यासाठी होती. त्यात स्वतःचे घर घेण्याची शर्यत होती; मुलांचे भविष्य घडवण्याची धावपळ होती आणि समाजाला स्वतःचे अस्तित्व सिद्ध करून दाखवण्याची एक अथांग धडपड होती. पण आज पंचेचाळीशीचा उंबरठा ओलांडताना मला तीव्रतेने जाणवत होते की तो धावपळीचा ग्रीष्म ऋतू आता मागे पडला आहे. आता पैशांची पूर्वीसारखी ओढाताण नाही पण वेळेची आणि शरीराची मर्यादा पावलोपावली जाणवू लागली आहे. त्यामुळे आता मृगजळामागे धावायचे नाही तर थांबून निवांतपणे हा उभा केलेला संसार केवळ साजरा करायचा आहे. त्या क्षणी त्या मंडपाच्या कोलाहलातच मी मनातल्या मनात तिच्याशी संवाद साधू लागलो. कोणत्याही अग्नीच्या साक्षीने नाही तर आमच्यातल्या या प्रगल्भ शांततेच्या साक्षीने मी आज स्वतःला आणि तिला संसाराच्या या सांजवेळी एक नवी सप्तपदी देत होतो.

माझे पहिले पाऊल तिच्या बदलत्या रूपाचा आणि वयाचा मूक स्वीकार करण्याचे असेल. तारुण्यातला तो तजेलदारपणा आणि शरीराची ओढ आता ओसरली आहे आणि हे निसर्गाचे सत्य मला हसत हसत स्वीकारायचे आहे. तिचे ते रुपेरी होणारे केस; हसताना डोळ्यांच्या कडेला जमा होणाऱ्या अनुभवांच्या सुरकुत्या आणि शरीराचा वाढलेला डौल या सगळ्या बदलत्या ऋतूंमध्ये मला तिची अभेद्य ढाल बनायचे आहे. पूर्वी तिच्या सुगंधाने मला भुरळ पडायची पण आता रात्री झोपताना सांधेदुखीवर तिने लावून दिलेल्या औषधाच्या वासात मला अधिक सुरक्षित वाटते. तिने विसरलेला चष्मा न रागावता शोधून देण्यापासून ते वयोमानानुसार येणाऱ्या उष्ण झळांमध्ये मी आहे ना हा दिलासा देण्यापर्यंतचा हा आपला नवा बहरलेला रोमान्स असेल.

माझे दुसरे पाऊल या रिकाम्या घरट्यात एकमेकांना नव्याने शोधण्याचे असेल. पहिली सप्तपदी मुलांचे घरटे विणण्यासाठी होती पण आज आपला छावा मोठा होऊन त्याच्या नव्या आकाशात उडून गेला आहे. घर पुन्हा एकदा तसेच रिकामे आणि शांत झाले आहे जसे लग्नाच्या सुरुवातीला होते. पण आता आपण दोघेही काळाच्या प्रवाहात प्रगल्भ झालो आहोत. या रिकाम्या घरात हरवून न जाता आलेल्या या शांततेची कोणतीही भीती न बाळगता मी तिच्या डोळ्यांत माझा तो जुना सखा नव्याने शोधेन. हीच तर खऱ्या प्रेमाची पावती नाही का?

माझे तिसरे पाऊल तिच्या मूक त्यागाबद्दल कृतज्ञता व्यक्त करण्याचे आणि नवे सामायिक छंद शोधण्याचे असेल. गेल्या दोन तपांत तिने स्वतःच्या आवडीनिवडी मारून या घरासाठी जो मूक त्याग केला त्याची जाण मला या वळणावर ठेवायची आहे. संसाराच्या इमारतीचा पाया होताना तिने स्वतःला चंदनासारखे झिजवले आणि त्याची कृतज्ञता केवळ शब्दांत नाही तर माझ्या कृतीत असावी. आता सकाळी उठल्यावर रोजच्या धावपळीऐवजी तिच्या हातात चहाचा गरम कप देणे किंवा बाल्कनीतल्या कुंडीत एकत्र रोपटे लावणे हा आमचा नवा सामायिक छंद असेल. या छोट्या सवयी संसाराची दुसरी इनिंग अधिक सुगंधी करतील.

माझे चौथे पाऊल तिला समाजाच्या अपेक्षांतून मुक्त करण्याचे आणि तिच्या हरवलेल्या स्वप्नांना नवे पंख देण्याचे असेल. आजवर तो संसार आपण केवळ समाजासाठी आणि नातेवाईकांसाठी केला पण इथून पुढचा प्रवास लोक काय म्हणतील या अनामिक भीतीखाली जगायचा नाही. घरात एखादी वस्तू जागेवर नसली किंवा कंटाळा आला म्हणून एखादे काम राहिले तर आता आमच्यात कसलाच अपराधीपणा नसेल. आता आमच्याकडे वेळेची शिदोरी आहे त्यामुळे तिने तिची ती राहून गेलेली सफर करावी; मैत्रिणींसोबत मनसोक्त हसावे किंवा एखादा जुना विसरलेला छंद नव्याने जोपासावा. आयुष्याच्या या दुसऱ्या पर्वात मी माझा पुरुषी अहंकार पूर्णपणे विसरून तिचा सर्वात मोठा चाहता बनेन.

माझे पाचवे पाऊल भूतकाळाचे ओझे कायमचे उतरवून ठेवण्याचे असेल. संसाराच्या पहाटे आपल्या दोघांकडूनही अनेक चुका झाल्या; पैशांच्या ओढाताणीतून झालेले वाद; एकमेकांचे दुखावलेले अहंकार आणि नात्यांमधील कटकटी या सगळ्यातून आपण तावून सुलाखून निघालो आहोत. पण आता उरलेल्या प्रवासात हे जुने हिशेब मला सोबत न्यायचे नाहीत. ज्या गोष्टी आपण बदलू शकलो नाही त्याचे ओझे आता वाहायचे नाही. तिला मनापासून माफ करून आणि स्वतःच्या चुकांची क्षमा मागून एक पूर्णपणे कोरी पाटी घेऊन मला आयुष्याच्या वाटेवर पुढे चालायचे आहे.

माझे सहावे पाऊल आजारपणातल्या निस्वार्थ आधाराचे आणि समांतर एकांताचे असेल. विशीत आपण एकमेकांच्या हातात हात घालून जग जिंकण्यासाठी धावलो पण आता ती जीवघेणी शर्यत उरलेली नाही. ती बाल्कनीत तिच्या पुस्तकात रमलेली असताना आणि मी माझ्या जुन्या गाण्यांत हरवलो असताना आमच्यातली ती अथांग शांतता आम्हाला अधिक जोडेल. हा समांतर एकांत आम्ही जपू. पण जेव्हा वेळ येईल तेव्हा औषधांच्या वेळा सांभाळताना किंवा दवाखान्याबाहेर वाट पाहत असताना मी तिचा तोच हात तितक्याच आश्वासकपणे धरेन. तारुण्यातला स्पर्श केवळ आवेगाचा होता पण आताचा माझा स्पर्श हा थेट तिच्या आत्म्याला मायेची ऊब देणारा असेल.

आणि माझे सातवे पाऊल वेळेचे भान ठेवून निखळ मैत्री जपण्याचे असेल. तारुण्यात वाटायचे आपल्याकडे अमर्याद वेळ आहे पण आता जाणवते आहे की आयुष्याच्या पुस्तकातील वाचून झालेली पाने आता उरलेल्या पानांपेक्षा नक्कीच जास्त आहेत. हातातून आयुष्याची वाळू वेगाने निसटते आहे. त्यामुळे आता कोणत्याही मृगजळामागे न धावता उरलेला अमूल्य वेळ मला तिच्यासोबत शांतपणे जगायचा आहे. इथून पुढचा प्रवास केवळ पती आणि पत्नी म्हणून नाही तर दोन अत्यंत जवळचे मित्र म्हणून आपण पार करू. मिळवण्याची धडपड कायमची संपवून या आयुष्याच्या सांजवेळी सूर्य मावळताना मी तिच्या अस्तित्वाचा आणि ती माझ्या प्रवासाची एकमेव आणि सर्वात सुंदर साक्षीदार बनेल.

माझ्या विचारांची तंद्री अचानक तुटली. मंडपात गुरुजींनी शेवटचा मंत्र म्हटला आणि समोरच्या माझ्या मावस भावाने शेवटचा फेरा पूर्ण केला. मंडपात टाळ्यांचा कडकडाट झाला आणि मी भानावर आलो. माझ्या शेजारी बसलेल्या माझ्या अर्धांगिनीकडे मी पाहिले. ती अत्यंत शांतपणे आणि कौतुकाने तो सोहळा पाहत होती. मी माझा हात हळूच तिच्या मांडीवर विसावलेल्या तिच्या हातावर ठेवला. तिने दचकून माझ्याकडे पाहिले पण माझ्या डोळ्यांतला तो प्रगल्भ आणि आश्वस्त भाव तिने एका क्षणात वाचला. मंडपातल्या त्या अथांग गोंधळातही आम्ही एकही शब्द न बोलता एकमेकांशी खूप काही बोललो होतो. तिने माझ्या हातावरची तिची पकड थोडी अधिक घट्ट केली आणि तिच्या चेहऱ्यावर एक अत्यंत तृप्त हास्याची लकेर उमटली. कोणत्याही अग्नीची साक्ष न घेताही पंचेचाळीशीनंतरची आमची ही नवी सप्तपदी खऱ्या अर्थाने पूर्ण झाली होती.

लेखक :  श्री मंगेश दोरके

प्रस्तुती : श्री संदीप सुंकले (दासचैतन्य)

मो. 8380019676

 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर

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