हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६२ ⇒ रिश्ते और डोर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ते और डोर।)

?अभी अभी # ९६२ ⇒ आलेख – रिश्ते और डोर  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बचपन में हम मुंह से गुब्बारे फुलाते थे, इधर हमारा मुंह फूलता, उधर गुब्बारा फूलता। फूलने और फुलाने की भी एक सीमा होती है, जल्द से हमारा मुंह हटाते, गुब्बारे का मुंह मोड़ मोड़ कर बंद करते, और उसके मुंह पर एक धागा बांध देते। उसे वॉलीबॉल की तरह हवा में उछालते, लेकिन वह बेचारा हवा में टिक ही नहीं पाता। रिश्ते हवा में ऐसे ही नहीं टिकते।

कुछ गुब्बारे गैस के होते थे, वे हवा में भी उड़ते थे, बिना डोर के उड़ते थे। आसमान भी छूने की कोशिश करते, लेकिन हवा निकलते ही, उनकी उड़ान भी हवा हो जाती।।

फिर हमने आकाश में पतंग भी उड़ाई, जब तक डोर हमारे हाथ में रही, पतंग भी हवा में आसमान छूती रही। इधर डोर टूटी, उधर पतंग जमीन पर आ गिरी। बिना डोर के, हमने एक पंछी को आसमान छूते देखा है लेकिन कभी किसी पतंग को बिना डोर के आसमान में उड़ते नहीं देखा।

हमारे रिश्ते भी तो गुब्बारे जैसे ही हैं, थोड़ा प्रेम से मुंह लगाया, और रिश्ता खुशी के मारे फूलने, उछलने कूदने लगता है। कहीं रंग बिरंगी रिश्तों की पतंग आसमान छू रही है, और हम सिर्फ डोर संभाले हुए हैं। रिश्ते हवा में हो, बड़े सुंदर लगते हैं, अगर हवा प्रतिकूल हुई, डोर कमजोर हुई, रिश्ते औंधे मुंह जमीन पर आ गिरते हैं।।

आजकल हमने रिश्तों को गुब्बारों की तरह फुलाना सीख लिया है। बच्चों का जन्मदिन हो, मंगल प्रसंग हो, शिलान्यास, उद्घाटन, लोकार्पण, शादी की सालगिरह और अमृत महोत्सव, हार फूल के साथ गुब्बारों के प्रवेश द्वार, वातावरण को और अधिक रम्य और आकर्षक बना देते हैं। बस गुब्बारों का मुंह बंद हो, वे मुस्कुराहट बिखेरना जानते हैं।

आजकल हमारे रिश्तों की डोर किसके हाथ में है, हमें ही पता नहीं। लगता है आज के रिश्ते भी रिमोट से ही चल रहे हैं। रिमोट से रिश्ते कंट्रोल ही नहीं होते, ऑफ/ऑन भी हो जाते हैं।।

पहले रिश्ते करीबी होते थे, हवा में नहीं होते थे। आप उन्हें छूकर, महसूस कर सकते थे। हमने रिश्तों को बहुत टटोलकर, सहेजकर रखा था कभी। आज रिश्ते, समय की तरह हाथों से फिसलते चले जा रहे हैं, और हम लाचार, असहाय, बस हाथ मलते जा रहे हैं।

पहले, हर रिश्ते पर हमारी नजर रहती थी। पानी के बीच भले ही लकीर खिंच जाए, रिश्तों के बीच लकीर खींचना कहां इतना आसान था। आज उन रिश्तों को किसी की नज़र लग गई है।।

कहां कहां जा बसे हैं आज, कभी हर पल साथ रहने वाले रिश्ते। जिन रिश्तों को हमने आज तक यादों में संजोया है, सपने भले ही रंगीन देखे हों, तब तो तस्वीरें भी श्वेत श्याम ही होती थी। आज दूर के रिश्ते रंगीन कैमरा कैद कर लेता है। गजब की मेमोरी है उसकी, उसका भी अपना मेमोरी कार्ड है।

हमारी मेमोरी आज तक फुल नहीं हुई, सभी यादें, तस्वीरें जीवंत कैद हैं। आज सबके हाथों में कैमरा है और मेमोरी फुल है। कोई चिंता नहीं, पैन ड्राइव है न।।

तस्वीरों के साथ साथ, आप चाहें तो रिश्ते भी डिलीट कर दें। कच्चे धागों के रिश्ते अधिक मजबूत होते थे आज के डिजिटल रिश्तों की तुलना में। यह राखी भी अब ई – राखी हो गई।

दर से दर, डोअर टू डोअर से हमारे रिश्तों की डोर आज बस गुब्बारा बनकर रह गई है। आज फुलाया, कल मुरझाया।

एक सुई की नोक ही काफी है इस रिश्ते की हवा निकालने के लिए।।

बच्चे समझदार हैं। गुब्बारे से खेल भी लेते हैं और उसे फोड़ना भी उनका खेल ही होता है। अभी उनकी उम्र गुब्बारों की उम्र है और हमारी उम्र, एक गुब्बारे जितनी। हमें अभी गुब्बारों से प्यार है, रिश्तों से प्यार है। बिना डोर के भी हम सहेज रहे हैं, प्रेम के रिश्ते, कुछ फूले हुए गुब्बारे, कुछ गुलदस्ते प्यारे प्यारे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१६ ☆ यह भी गुज़र जाएगा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख यह भी गुज़र जाएगा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१६ ☆

☆ यह भी गुज़र जाएगा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘गुज़र जायेगा यह वक्त भी/ ज़रा सब्र तो रख/ जब खुशी ही नहीं ठहरी/ तो ग़म की औक़ात क्या?’ गुलज़ार की उक्त पंक्तियां समय की निरंतरता व प्रकृति की परिवर्तनशीलता पर प्रकाश डालती हैं। समय अबाध गति से निरंतर बहता रहता है; नदी की भांति प्रवाहमान् रहता है, जिसके माध्यम से मानव को हताश-निराश न होने का संदेश दिया गया है। सुख-दु:ख व खुशी-ग़म आते-जाते रहते हैं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। मुझे याद आ रही हैं स्वरचित पंक्तियां ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के साथ-साथ/ फूल और पात बदलते हैं अर्थात् समयानुसार दिन-रात, हालात व मौसम के साथ फूल व पत्तियों का बदलना अवश्यंभावी है। प्रकृति के विभिन्न उपादान धरती, सूर्य, चंद्रमा, तारे आदि निरंतर परिक्रमा लगाते रहते हैं; गतिशील रहते हैं। सो! वे कभी भी विश्राम नहीं करते। मानव को नदी की प्रवाहमयता से निरंतर बहने व कर्म करने का संदेश ग्रहण करना चाहिए। परंतु यदि उसे यथासमय कर्म का फल नहीं मिलता, तो उसे निराश नहीं होना चाहिए;  सब्र रखना चाहिए। ‘श्रद्धा-सबूरी’ पर विश्वास रख कर निरंतर कर्मशील रहना चाहिए, क्योंकि जब खुशी ही नहीं ठहरी, तो ग़म वहां आशियां कैसे बना सकते हैं? उन्हें भी निश्चित समय पर लौटना होता है।

‘आप चाह कर भी अपने प्रति दूसरों की धारणा नहीं बदल सकते,’ यह कटु यथार्थ है। इसलिए ‘सुक़ून के साथ अपनी ज़िंदगी जीएं और खुश रहें’– यह जीवन के प्रति सकारात्मक सोच को प्रकट करता है। समय के साथ सत्य के उजागर होने पर लोगों के दृष्टिकोण में स्वत: परिवर्तन आ जाता है, क्योंकि सत्य सात परदों के पीछे छिपा होता है; इसलिए उसे प्रकाश में आने में समय लगता है। सो! सच्चे व्यक्ति को स्पष्टीकरण देने की कभी भी दरक़ार नहीं होती। यदि वह अपना पक्ष रखने में दलीलों का सहारा लेता है तथा अपनी स्थिति स्पष्ट करने में प्रयासरत रहता है, तो उस पर अंगुलियाँ उठनी स्वाभाविक हैं। यह सर्वथा सत्य है कि सत्य को हमेशा तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है… ‘उपहास, विरोध व अंततः स्वीकृति।’ सत्य का कभी मज़ाक उड़ाया जाता है, तो कभी उसका विरोध होता है…परंतु अंतिम स्थिति है स्वीकृति, जिसके लिए आवश्यकता है– असामान्य परिस्थितियों, प्रतिपक्ष के आरोपों व व्यंग्य-बाणों को धैर्यपूर्वक सहन करने की क्षमता की। समय के साथ जब प्रकृति का क्रम बदलता है… दिन-रात, अमावस-पूनम व विभिन्न ऋतुएं, निश्चित समय पर दस्तक देती हैं, तो उनके अनुसार हमारी मन:स्थिति में परिवर्तन होना भी स्वाभाविक है। इसलिए हमें इस तथ्य में विश्वास रखना चाहिए कि यह परिस्थितियां व समय भी बदल जायेगा; सदा एक-सा रहने वाला नहीं। समय के साथ तो सल्तनतें भी बदल जाती हैं, इसलिए संसार में कुछ भी सदा रहने वाला नहीं। सो! जिसने संसार में जन्म लिया है, उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। इसके साथ-साथ आवश्यकता है मनन करने की… ‘ इंसान खाली हाथ आया है और उसे जाना भी खाली हाथ है, क्योंकि कफ़न में कभी जेब नहीं होती।’ इसी प्रकार गीता का भी यह सार्थक संदेश है कि मानव को किसी वस्तु के छिन जाने का ग़म नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसने जो भी पाया व कमाया है, वह यहीं से लिया है। सो! वह उसकी मिल्कियत कैसे हो सकती है? फिर उसे छोड़ने का दु:ख कैसा? सो! हमें सुख-दु:ख से उबरना है, ऊपर उठना है। हर स्थिति में संभावना ही जीवन का लक्ष्य है।  इसलिए सुख में आप फूलें नहीं, अत्यधिक प्रसन्न न रहें और दु:ख में परेशान न हों…क्योंकि इनका चोली-दामन का साथ है। एक के जाने के पश्चात् ही दूसरे का पदार्पण होना स्वाभाविक है। इसमें एक अन्य भाव भी निहित है कि जो अपना है, वह हर हाल में मिल कर रहेगा और जो अपना नहीं है, लाख कोशिश करने पर भी मिलेगा नहीं। वैसे भी सब कुछ सदैव रहने वाला नहीं; न ही साथ जाने वाला है। सो! मन में यह धारणा बना लेनी आवश्यक है कि ‘समय से पूर्व व भाग्य से अधिक कुछ मिलने वाला नहीं।’ कबीरदास जी का यह दोहा ‘माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आय फल होइ’…. समय की महत्ता व प्रकृति की निरंतरता पर प्रकाश डालता है।

समय का पर्यायवाची आने वाला कल अथवा भविष्य ही नहीं, वर्तमान है। ‘काल करे सो आज कर. आज करे सो अब/ पल में प्रलय होयेगी, मूरख करेगा कब’ में भी यही भाव निर्दिष्ट है कि कल कभी आएगा नहीं। वर्तमान ही गुज़रे हुए कल अथवा अतीत में परिवर्तित हो जाता है। सो! आज अथवा वर्तमान ही सत्य है। इसलिए हमें अतीत के मोह को त्याग, वर्तमान की महत्ता को स्वीकार, आगामी कल को सुंदर, सार्थक व उपयोगी बनाना चाहिए। दूसरे शब्दों में ‘कल’ का अर्थ है– मशीन व शांति। आधुनिक युग में मानव मशीन बन कर रह गया है। सो! शांति उससे कोसों दूर हो गयी है। वैसे शांत मन में ही सृष्टि के विभिन्न रहस्य उजागर होते हैं, जिसके लिए मानव को ध्यान का आश्रय लेना पड़ता है।

ध्यान-समाधि की वह अवस्था है, जब हमारी चित्त-वृत्तियां एकाग्र होकर शांत हो जाती हैं। इस स्थिति में आत्मा-परमात्मा का तादात्म्य हो जाता है और उसका संबंध संसार व प्राणी-जगत् से कट जाता है; उसके हृदय में आलोक का झरना फूट निकलता है। इस मन:स्थिति में वह संबंध-सरोकारों से ऊपर उठ जाता है तथा वह शांतमना निर्लिप्त-निर्विकार भाव से सरोवर के शांत जल में अवगाहन करता हुआ अनहद-नाद में खो जाता है, जहां भाव-लहरियाँ हिलोरें नहीं लेतीं। सो! वह अलौकिक आनंद की स्थिति कहलाती है।

आइए! हम समय की सार्थकता पर विचार- विमर्श करें। वास्तव में हरि-कथा के अतिरिक्त, जो भी हम संवाद-वार्तालाप करते हैं; वह जग-व्यथा कहलाती है और निष्प्रयोजन होती है। सो! हमें अपना समय संसार की व्यर्थ की चर्चा में नष्ट नहीं करना चाहिए, क्योंकि गुज़रा हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। इसलिए हमें उसका शोक भी नहीं मनाना चाहिए। वैसे भी यह कहावत प्रसिद्ध है कि ‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन’ अर्थात् ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’… पुरातन की महिमा सदैव रहती है। यदि सोने के असंख्य टुकड़े करके कीचड़ में फेंक दिये जाएं, तो भी उनकी चमक बरक़रार रहती है; कभी कम नहीं होती है और उनका मूल्य भी वही रहता है। सो! हम में समय की धारा की दिशा को परिवर्तित करने का साहस होना चाहिए, जो सबके साथ रहने से, मिलकर कार्य को अंजाम देने से आता है। संघर्ष जीवन है…वह हमें आपदाओं का सामना करने की प्रेरणा देता है; समाज को आईना दिखाता है और गलत-ठीक व उचित-अनुचित का भेद करना भी सिखाता है। इसलिए समय के साथ स्वयं को बदल लेना ही श्रेयस्कर है। जो लोग प्राचीन परंपराओं को त्याग, नवीन मान्यताओं को अपना कर जीवन-पथ पर अग्रसर नहीं होते; पीछे रह जाते हैं… ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकते तथा उन्हें व उनके विचारों को मान्यता भी प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए संतोष रूपी रत्न को धारण कर, जीवन से नकारात्मकता को निकाल फेंके, क्योंकि संतोष रूपी धन आ जाने के पश्चात् सांसारिक धन-दौलत धूलि के समान निस्तेज, निष्फल व निष्प्रयोजन भासती है; शक्तिहीन व निरर्थक लगती है और उसकी जीवन में कोई अहमियत नहीं रहती। इसलिए हमें जीवन में किसी के आने  और भौतिक वस्तुओं व सुख-सुविधाओं के मिल जाने पर खुश नहीं होना चाहिए और उसके अभाव में दु:खी होना भी बुद्धिमत्ता नहीं है, क्योंकि सुख-दु:ख का एक स्थान पर रहना असंभव है, नामुमक़िन है… यही जीवन का सार है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६१ ⇒ हल्दी और मेंहदी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हल्दी और मेंहदी।)

?अभी अभी # ९६१ ⇒ आलेख – हल्दी और मेंहदी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हल्दी और मेंहदी दो ऐसी दी हैं, जो अपने ही रंग में रंगी हुई हैं, और जिसके हाथ लग जाती हैं, उन्हें भी हाथों हाथ रंग जाती हैं।

जहां भी रस्म है, रिवाज है, उत्सव है, तीज त्योहार है, खुशी का मौका है, शादी ब्याह है, दोनों दीदियां सज धजकर तैयार हैं।

हल्दी अगर एक गांठ है तो मेंहदी एक हरा भरा कांटेदार पौधा। हल्दी इतनी हेल्दी है कि खाई भी जाती है और लगाई भी जाती है। जब कि मेंहदी सिर्फ लगाई जाती है। कुदरत ने इन दोनों को इतना तबीयत से रंगा है कि जो भी इन्हें पीसता है, अथवा घोलता है, खुद इनके रंग में सराबोर हो जाता है।।

मेंहदी लगी मेरे हाथ! सिर्फ हाथ ही क्यों ? सर से पांव तक आजकल मेंहदी का सम्राज्य फैला हुआ है। कहीं कहीं तो यह आलम है कि रविवार की छुट्टी का दिन मेंहदी दिवस ही बन जाता है। मेंहदी आजकल सिर्फ श्रृंगार नहीं, फटते पांवों के लिए राहत है, किसी के लिए शौक है तो किसी के लिए रोजगार। चारों ओर फल फूल रहा मेंहदी का कारोबार।

गोरे गोरे हाथों में मेंहदी लगा के

नैनों में कजरा डाल के।

चली दुल्हनिया पिया से मिलने

छोटा सा घूंघट निकाल के।।

एक नहीं ऐसे कई लोकगीत ढोलक की थाप पर महिलाओं द्वारा गाये जाते हैं जब मेंहदी और हल्दी की रस्म होती है।

मेंहदी तो खैर महिलाओं की जीवन संगिनी है लेकिन हल्दी रस्म बड़ी खास होती है। एंटी बैक्टिरियल और एंटीसेप्टिक गुण तो होते ही हैं हल्दी में, रंग में निखार तो आता ही है, एक तरह का उबटन ही तो है हल्दी। हल्दी लगाई नहीं जाती, लगवाई जाती है। दूल्हा हो अथवा दुल्हन, गालों पर कितनी उंगलियां हल्दी लगाती हैं, कोई हिसाब नहीं।।

मेंहदी जहां जहां भी रच जाती है, बस प्रेम और रंग बरसाती है। जब कि हल्दी दूध में भी घुल जाती है, हड्डियों को मजबूत ही नहीं करती, खून भी बढ़ाती है। हल्दी का नाम लेकर हल्दीराम भले ही मशहूर हो गया हो, हमारे घर में एक बार नमक नहीं हो, चलेगा, हल्दी नहीं हो, नहीं चलेगा। कच्ची हल्दी भी बड़ी गुणकारी होती है। इसका अचार भी बनता है और सब्जी भी।

कैसी कहावत है यह, हींग लगे ना फिटकरी….? जब कि ना हींग में कोई रंग है और ना ही फिटकरी में। माना कि हींग में ही हिना के समान ही खुशबू है और फिटकरी पानी साफ करती है लेकिन जब भी चोखे रंग की बात होगी, खुशबू और महक की रात होगी, वहां हल्दी और मेंहदी हमेशा साथ होंगी। देखिए मेंहदी का रंग ;

बन्नी के गोरे गोरे हाथ

मेंहदी लगाओ रे।

इस पे बन्ने का लिख दो

नाम ..!!!

और अब हल्दी का रंग ;

सोने के कटोरवा में पिसल

हरदी अम्मा लहे लहे

हरदी लगावे ;

चटकार अम्मा लहे लहे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८४ ☆ हनुमान जयंती विशेष – भक्ति, शक्ति और हरियाली… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना भक्ति, शक्ति और हरियाली। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८४ ☆

☆ हनुमान जयंती विशेष – भक्ति, शक्ति और हरियाली… ☆  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

भक्ति, शक्ति और हरियाली: हनुमान जी का वो संदेश जिसे आज का युवा भूल रहा है… और फिर से पा सकता है।

हनुमान जयंती केवल शक्ति और पराक्रम का उत्सव नहीं, बल्कि अटूट भक्ति और प्रकृति से जुड़ाव का भी पावन अवसर है। हनुमान जी की सबसे बड़ी पहचान उनकी शक्ति नहीं, उनकी निष्कलंक भक्ति है—एक ऐसी भक्ति जिसमें अहंकार नहीं, केवल समर्पण है।

आज की युवा पीढ़ी सफलता, नाम और पहचान की दौड़ में कहीं न कहीं भीतर की शांति और जुड़ाव खोती जा रही है। ऐसे समय में हनुमान जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची शक्ति भक्ति से ही जन्म लेती है। जब मन ईश्वर से जुड़ता है, तब वही ऊर्जा प्रकृति के प्रति प्रेम में भी बदल जाती है।

हनुमान जी “पवनपुत्र” हैं—वायु के पुत्र। उनकी भक्ति केवल प्रभु तक सीमित नहीं थी, बल्कि हर उस तत्व तक फैली थी जो जीवन को सम्भव बनाता है। यही कारण है कि उनकी भक्ति हमें सिखाती है कि पेड़-पौधे, जल, वायु—ये सब भी पूजनीय हैं। जब हम एक पौधा लगाते हैं, उसकी सेवा करते हैं, तो वह भी एक प्रकार की भक्ति ही है—प्रकृति के प्रति समर्पण की भक्ति।

युवा अगर इस भाव को समझ ले, तो उसकी ऊर्जा केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समाज और पर्यावरण को भी संवारने लगेगी। आज की “ग्रीन मोटिवेशन” दरअसल वही भक्ति है, जो हनुमान जी ने अपने जीवन से सिखाई—सेवा, संरक्षण और संतुलन।

इस हनुमान जयंती पर, आइए हम केवल मंदिरों में दीप न जलाएँ, बल्कि अपने भीतर भी भक्ति का दीप प्रज्वलित करें। एक पेड़ लगाएँ, उसे प्रेम से सींचें, और हरियाली को अपना साथी बनाएँ। यही भक्ति का आधुनिक रूप है—जहाँ ईश्वर और प्रकृति दोनों का सम्मान हो।

“हनुमान जी की भक्ति जब जीवन में उतरती है, तो हाथ सेवा में लगते हैं और दिल प्रकृति से जुड़ जाता है।”

आपका यह भाव ही भक्ति को जीवित रखेगा और धरती को भी हरा-भरा बनाएगा।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०८ ☆ मानवीय सभ्यता और युद्ध ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०८ ☆

?  आलेख – मानवीय सभ्यता और युद्ध ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

मानवीय सभ्यता की कहानी वास्तव में मनुष्य की जिजीविषा और उसके संघर्षों की एक लंबी दास्तान है।

सभ्यता सामाजिक नियमों का परिपालन चाहती है, इन मान्य प्रचलित नियमों की अवहेलना युद्ध की जन्मदात्री बनती है।

संपत्ति, संसाधन , स्त्री , या जमीन के लिए युगों से युद्ध होते रहे हैं।  हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि विकास और विनाश  सिक्के के दो पहलू रहे हैं। सभ्यता का अर्थ अगर सुसंस्कृत होना है तो युद्ध उसी संस्कृति का एक काला अध्याय है।

आदिम युग में जब मनुष्य वनों में रहता था तब उसकी लड़ाई केवल अस्तित्व को बचाने की थी। वह भोजन के लिए लड़ता था और जंगली जानवरों से स्वयं की रक्षा करता था। धीरे धीरे उसने समूह में रहना सीखा और यहीं से समाज की नींव पड़ी। समाज बनने के साथ ही अधिकारों की भावना जागी और इसी भावना ने युद्ध को जन्म दिया।

प्रारंभिक बस्तियों ने जब नगरों का रूप लिया तो संसाधनों पर कब्जे की होड़ शुरू हो गई। नदियों के किनारों पर फली फूली सभ्यताएं पानी और उपजाऊ भूमि के लिए आपस में टकराने लगीं। विकास की दौड़ में मनुष्य ने पहिए का आविष्कार किया और इसी पहिए ने युद्ध के रथों को गति दी। धातु की खोज हुई तो कुल्हाड़ी के साथ साथ तलवारें भी बनाई जाने लगीं। यह एक विडंबना ही है कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि का उपयोग जीवन को सुगम बनाने के साथ साथ दूसरों के जीवन को संकट में डालने के लिए भी किया। जैसे जैसे साम्राज्य बढ़े वैसे वैसे सीमाओं का विस्तार हुआ और उन सीमाओं की रक्षा के लिए रक्तपात अनिवार्य मान लिया गया।

इतिहास के पन्ने पलटें तो महान सभ्यताओं के उदय और पतन में युद्धों की बड़ी भूमिका रही है। मेसोपोटामिया से लेकर सिंधु घाटी तक और रोम के वैभव से लेकर चीन की महान दीवार तक हर जगह विजय और पराजय की गाथाएं अंकित हैं। महान सम्राटों ने शांति की स्थापना के नाम पर विशाल सेनाएं खड़ी कीं। उन्होंने विशाल किलों का निर्माण किया जो आज भी हमारी वास्तुशिल्प की उन्नति के गवाह हैं। लेकिन इन किलों की दीवारों के पीछे अनगिनत चीखें और रक्त की बूंदें दफन हैं। विकास ने हमें विज्ञान दिया और विज्ञान ने हमें बारूद थमा दिया। तलवारों की जगह तोपें आ गईं और आमने सामने की लड़ाई दूर से वार करने वाले हथियारों में बदल गई।

मध्यकाल तक आते आते युद्ध केवल जमीन का टुकड़ा जीतने का माध्यम नहीं रह गए। अब विचारधाराओं और धर्मों के नाम पर तलवारें खिंचने लगीं। मनुष्य ने कला और संस्कृति के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की लेकिन उसके भीतर का शिकारी कभी शांत नहीं हुआ। वह महलों में रहने लगा और रेशमी वस्त्र पहनने लगा पर उसकी आंखें अब भी पड़ोसी के वैभव पर टिकी रहती थीं। व्यापार के मार्ग खुले तो उन पर अधिकार जमाने के लिए नौसेनाएं तैयार की गईं। समुद्रों की लहरें भी मानवीय रक्त से लाल होने लगीं। खोज और आविष्कार की इस यात्रा ने मानवता को सात महाद्वीपों तक पहुँचाया लेकिन साथ ही गुलामी और शोषण की नई व्यवस्थाएं भी दीं।

औद्योगिक क्रांति ने दुनिया का चेहरा पूरी तरह बदल दिया। कारखानों से उत्पादन बढ़ा और देशों की भूख भी बढ़ गई। कच्चे माल की तलाश और तैयार माल को बेचने की होड़ ने विश्व को दो भयानक युद्धों की आग में झोंक दिया। बीसवीं सदी का विकास अभूतपूर्व था लेकिन इसी सदी ने हिरोशिमा और नागासाकी का वह मंजर भी देखा जिसने मानवीय चेतना को झकझोर दिया। परमाणु शक्ति जो ऊर्जा का स्रोत बन सकती थी वह सर्वनाश का प्रतीक बन गई। विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि ने ही मनुष्य को सबसे अधिक डरा दिया। आज हम अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने की सोच रहे हैं लेकिन धरती पर शांति स्थापित करने में अब भी संघर्ष कर रहे हैं।

युद्ध ने तकनीकी विकास को गति तो दी है पर मानवीय मूल्यों को पीछे धकेल दिया है। हवाई जहाज से लेकर रडार और इंटरनेट तक कई महान आविष्कार युद्ध की जरूरतों के कारण ही अस्तित्व में आए। सेनाओं को बेहतर संचार चाहिए था इसलिए हमने सूचना क्रांति का सूत्रपात किया। सैनिकों की जान बचाने के लिए चिकित्सा विज्ञान ने नई ऊंचाइयां छुईं। लेकिन क्या इस भौतिक उन्नति की कीमत उन करोड़ों मासूमों की जान से ज्यादा है जो इन युद्धों में स्वाहा हो गए। सभ्यता का विकास तभी सार्थक है जब वह संवेदनशील समाज का निर्माण करे। आज की दुनिया हथियारों के ढेर पर बैठी है और एक छोटी सी चूक सदियों की मेहनत को राख कर सकती है।

आधुनिक युग में युद्ध का स्वरूप बदल गया है। अब केवल सीमाओं पर गोलियां नहीं चलतीं बल्कि आर्थिक और साइबर युद्ध के माध्यम से भी देशों को घुटनों पर लाया जाता है। हमने विकास के नाम पर प्रकृति को भी युद्ध का मैदान बना दिया है। जंगलों का कटना और प्रदूषण का बढ़ना भी एक तरह का युद्ध ही है जो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के खिलाफ लड़ रहे हैं। सच्चा विकास वह है जो समन्वय और सहअस्तित्व की भावना पर आधारित हो। मानवीय सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमारे पास कितने उन्नत हथियार हैं बल्कि इस पर निर्भर करता है कि हम आपसी मतभेदों को कितनी समझदारी से सुलझाते हैं।

सभ्यता की लंबी यात्रा में हमने बहुत कुछ सीखा है। हमने लोकतंत्र को अपनाया और मानवाधिकारों की बात की। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं बनाई गईं ताकि संवाद के माध्यम से विवाद सुलझाए जा सकें। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य अब युद्ध की विभीषिका से ऊब चुका है। वह शांति और प्रेम की भाषा समझना चाहता है। बुद्ध और गांधी जैसे महापुरुषों ने हमें अहिंसा का मार्ग दिखाया जो आज भी सबसे अधिक प्रासंगिक है। विकास की परिभाषा केवल ऊंचे भवन और तेज रफ्तार गाड़ियां नहीं होनी चाहिए। एक ऐसा समाज जहां हर व्यक्ति सुरक्षित महसूस करे वही वास्तव में विकसित समाज कहलाने का अधिकारी है।

अंत में हमें यह समझना होगा कि युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। हर युद्ध अपने पीछे विनाश और प्रतिशोध की नई कहानियां छोड़ जाता है। मानवीय सभ्यता का वास्तविक उत्कर्ष तभी संभव है जब हमारी बुद्धि और हृदय के बीच संतुलन हो। हम विज्ञान की शक्ति का उपयोग दुखों को दूर करने के लिए करें न कि नए जख्म देने के लिए। भविष्य की राहें तभी प्रशस्त होंगी जब हम हथियारों को त्याग कर ज्ञान और करुणा के दीप जलाएंगे। सभ्यता की मशाल को जलते रहने के लिए शांति की हवा की जरूरत है न कि नफरत के तूफान की। मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना ही विकास की अंतिम मंजिल होनी चाहिए।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६० ⇒ कदर जाने ना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कदर जाने ना।)

?अभी अभी # ९६० ⇒ आलेख – कदर जाने ना ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हम सभी की भावनाओं का ख्याल रखते हैं, और महिलाओं का सम्मान ही नहीं, कद्र भी करते हैं। साहित्य ने भले ही हमारी कद्र ना की हो, हम संगीत के कद्रदान हैं, और फिल्मी संगीत सुन सुनकर ही आज कानसेन बन बैठे हैं।

हमें ना तो कोई शिकायत जमाने से है और न ही कोई शिकायत अपनी पत्नी से। जिस तरह संगीत ने पिछले सत्तर सालों से हमारा साथ निभाया है, हमारी धर्मपत्नी भी पचास वर्षों से हमारा साथ निभाती चली आ रही है।

चले थे साथ मिलकर, चलेंगे साथ मिलकर। तुम्हें रुकना पड़ेगा, मेरी आवाज सुनकर।।

संगीत की हमारी शिक्षा दीक्षा केवल रेडियो सीलोन सुनने तक ही सीमित रही। आप चाहें तो हमें एक अच्छा श्रोता कह सकते हैं। हुस्न, इश्क, जुल्फ और दामन जैसे शब्द हमने यहीं से सीखे हैं। सहगल का दौर निकल चुका था और अनारकली, बैजू बावरा, मुगले आजम और मेरे महबूब का जमाना था। सुरैया, शमशाद, नूरजहां और खुर्शीद के साथ लता, आशा, रफी, तलत, किशोर और राजकपूर की आवाज मुकेश, के तराने लोग गुनगुनाते रहते थे।

जब जीवन में कोई कद्रदान मिलता है, तो आपकी लाइफ बन जाती है। आप किसी के हसबैंड बन जाते हैं, कोई आपकी वाइफ बन जाती है। आपने, अपना बनाया, मेहरबानी आपकी! हम तो इस काबिल ना थे, है कद्रदानी आपकी।।

मदनमोहन ही तो लाए थे वह खूबसूरत नगमा हमारे लिए!

आपकी नज़रों ने समझा, प्यार के काबिल हमें, और, जी हमें मंजूर है, आपका हर फैसला।

हर नजर कह रही, बंदा परवर शुक्रिया।

गृहस्थी की गाड़ी बस ऐसे ही तो चल निकली थी हमारी भी। सारे तीज, त्योहार और उत्सव कितने उत्साह से संपन्न होते थे। हरताली तीज हो अथवा करवा चौथ! तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा। तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं देवता। हमें अपने आप पर भरोसा नहीं होता था जब ऐसे गीत कानों में पड़ते थे; मैं तो भूल चली बाबुल का देस, पिया का घर प्यारा लगे।।

हमारे गीतकार वर्मा मलिक भी कम नहीं आग में घी डालने में! तेरी दो टकियां दी नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए। हाय हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी। लेकिन हमारी धर्मपत्नी बहुत समझदार निकली। छोड़ दें सारी दुनिया, किसी के लिए। ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए। प्यार से जरूरी कई काम हैं, प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए।

लेकिन किसे पता था, उम्र के इस पड़ाव पर आकर हमें भी मदन मोहन का ही यह गीत भी सुनना पड़ेगा ;

कदर जाने ना

मोरा बालम, बेदर्दी

कदर जाने ना …

हम संगीत प्रेमी तरानों और पत्नी के तानों को बराबर का महत्व और सम्मान देते हैं। आखिर इन ५० बरसों में ऐसा क्या बदल गया कि बालम, बेदर्दी हो गए। हमने तो कभी नहीं कहा, सजनवा बैरी हो गए हमार। कुछ तो गड़बड़ है।।

उम्र के साथ अगर महिलाएं धार्मिक होती चली जाती हैं तो पुरुष पॉलिटिकल! जिस टीवी पर कभी पूरा परिवार बैठकर दूरदर्शन देखता था, आजकल धर्मपत्नी में आस्था और सत्संग के संस्कार जाग गए हैं। न्यूज, शेयर मार्केट और कॉमेडी शो के लिए पति को मोबाइल और लैपटॉप का सहारा लेना पड़ता है। घर, घर नहीं, राज्यसभा लोकसभा टी वी हो चला है।

टेबल पर पत्नी चाय रखकर चली गई है, सीहोर वाले लाइव आ रहे हैं। नाश्ता कब का ठंडा हुआ पड़ा है। कानों में कुछ गर्मागर्म शब्द प्रवेश कर रहे हैं। पूरी जिंदगी इनके लिए खपा दी, लेकिन इन्होंने हमारी कभी कद्र ही नहीं की।।

लेकिन शब्द मोम बनकर नहीं पिघल रहे। लता का मधुर स्वर याद आ रहा है ;

लाख जतन करूं

बात न माने जी

बात न माने

मेरा दरद न जाने जी।

कदर जाने ना

हो कदर जाने ना

मोरा बालम बेदर्दी

कदर जाने ना …

सोचता हूं, अगर अभी भी कद्र नहीं जानी, तो बहुत देर हो जाएगी। घर घर की यही कहानी है। जागो बेदर्दी बालमों, अब तो जागो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५९ ⇒ ॥ गणगौर॥ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “॥ गणगौर॥ ।)

?अभी अभी # ९५९ ⇒ आलेख – ॥ गणगौर॥ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लोग जब मुझसे जन्म तारीख पूछते हैं तो मेरा जवाब होता है 1 अप्रैल लेकिन जब कोई मुझे जन्म तिथि पूछता है तो मुझे गणगौर बोलना पड़ता है। ‌

वैसे व्रत तिथि और वार त्यौहार के बारे में मेरी जानकारी इतनी पुष्ट नहीं है लेकिन फिर भी केवल इतना याद है कि जिस दिन मेरा जन्म हुआ उस दिन गणगौर थी।

संयोग से आज ईद है और गणगौर भी, यानी मेरी जन्म तिथि भी आज ही है। बचपन में केवल मां को मेरा जन्मदिन याद रहता था। जब स्कूल में दाखिला लिया तब जन्म तारीख 1 अप्रैल लिखाई गई बस तब से रेकॉर्ड में 1 अप्रैल ही दर्ज है। अपनी खुशी के लिए आज भी मैं अपना जन्मदिन गणगौर के अवसर पर ही मनाना पसंद करता हूं, क्योंकि गणगौर से मेरी मां और ननिहाल की स्मृति जुड़ी हुई है।।

जन्मदिन के अवसर पर अगर कोई पर्व अथवा उत्सव भी हो तो सोने में सुहागा, एक तरह से हमारा जन्मदिन पूरी दुनिया मनाती है। तिथि और तारीख का यह अंतर हमेशा जन्मदिन को दो तारीखों में बांट देता है। क्या ऐसा कोई उपाय नहीं की हमारी जन्मदिन की तिथि और तारीख एक ही दिन कर दी जाएं।

वैसे दो दो बार पैदा होना, और दो विभिन्न दिनों पर जन्मदिन मनाना भी इतना बुरा नहीं। एक जन्मदिन पारिवारिक खुशी का और एक समाजिक, औपचारिक और व्यावहारिक जगत का। आज घर घर गणगौर की पूजा होती है, व्रत उपवास होते हैं, गुड़ के गुने के साथ साथ ही पकवान, मिष्ठान्न भी बनाए जाते हैं। नवरात्रि का उत्साह इस खुशी को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।।

आप बधाई दें, अथवा ना दें, आज का दिन मेरे लिए विशेष है, क्योंकि ना फोन पर जन्मदिन की बधाई और ना ही फेसबुक, व्हाट्सएप पर जन्मदिन के शुभकामना संदेश। खुद ही अपना जन्मदिन मनाओ और खुश हो लो, अपने परिवार के बीच ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७२ – देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७२ ☆ देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज उपरोक्त ख़बर दैनिक समाचार पत्र में पढ़ी तो बड़ा सुकून मिला। जबसे होश संभाला है, जीवन में जब भी कोई मिला, हर व्यक्ति ये ही कहता रहा, “तुम कुछ भी नहीं करते हो”।

आज इस खबर से बड़ी राहत मिली। बचपन में पाठशाला के शिक्षक, परिजन आदि सभी ये ही कहते थे, कब तुम कुछ करोगे? अब बड़े हो रहे हो, कब कुछ करोगे ?

महाविद्यालय के गुरुजन भी ये ही तोहमत दिया करते थे। जीवन में क्या करोगे? आदि आदि। विवाहोपरांत भी पत्नी ये ही कहती आ रही हैं, तुम तो निठल्ले हो, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है।

कार्यालय के साथी भी वरिष्ठ अधिकारी से कह देते थे, हमारे पास तो कोई काम है, ही नहीं, इसी चक्कर में सभी सीटों का पेंडिंग कार्य हमें ही करना पड़ता था। ठप्पा जो लगा हुआ था, कि हमारे सीट पर कुछ भी काम नहीं है।

बच्चे, अब बड़े हो गए हैं, वो भी मीठे शब्दों में ऐसा ही कुछ कह देते हैं। जो करना है, जल्दी करना आरंभ कर देवें। जीवन में एक्टिव रहना चाहिए।

मित्र मंडली भी खुले आम, भरी महफिलों में हमारी फुरसतिया आदत का मखौल उड़ाते रहते हैं।

अब सब का मुंह बंद हो जायेगा, जब उनको मालूम चलेगा हम वर्षों से कुछ नहीं कर, दिमाग को ब्रेक दिए हुए हैं। अब जब भी ब्रेक समाप्त होगा, हम बहुत कुछ कर सकने लायक बन जाएंगे। बस दिल साथ नहीं दे रहा, वो कमबख्त तो ये चाहता है, हम कभी भी कुछ ना करें।

हद, तो तब हो जाती है, दिल के निकट वाले दोस्त इस लेख को पढ़ कर ये कह देते हैं, उसके पास कोई काम नहीं है, बस मोबाइल में कुछ भी लिख कर सांझा कर देता है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५८ ⇒ विचारों का लॉक डाउन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारों का लॉक डाउन।)

?अभी अभी # ९५८ ⇒ आलेख – विचारों का लॉक डाउन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चित्त, मन और बुद्धि के साम्राज्य में विचार कहां से उठते हैं, कहां चले जाते हैं, कहना बड़ा मुश्किल होता है। विचार आपके कहने से नहीं आता। जब किसी एक विषय पर आप अपना मन केंद्रित करते हैं, तब विचारों को एक दिशा अवश्य मिल जाती है।

एकांत हो, और लेखन का मूड हो, तो विचार मानो नोट बंदी की कतार में खड़े मिलते हैं। मेरा नंबर कब आयेगा! कुछ विचार ऐसे भी होते हैं जो कतार तोड़कर आगे निकल जाते हैं। अगर इनकी तकदीर अच्छी हुई तो उनको लेखक के पन्नों में जगह मिल जाती है। कभी कभी तो विचारों का आगमन तय होता है और इतने में ही पत्नी चाय का प्याला लेकर चली आती है, और आया हुआ विचार चाय की भाप के साथ हवा हो जाता है।।

विचारों को जितनी जल्दी कलम में कैद कर लिया जाए उतना अच्छा क्योंकि विचारों की फितरत आवारा किस्म की होती है। आज ऐसा ही कुछ अहसास हुआ, जब कुछ लिखने के लिए कलम उठाई। विषय तक तय था लेकिन अचानक विचारों पर ऐसा ब्रेक लगा, मानो लॉक डाउन घोषित हो गया हो। बहुत दिमाग पर ज़ोर डाला, लेकिन न तो वह शीर्षक स्मृति में वापस आया, न ही कोई विचार।

मैं आंखें बंद करके लेट गया।

आसपास की आवाज़ें साफ सुनाई दे रही थी, लेकिन विचारों का आवागमन पूरी तरह बंद था। सृजन की अवस्था से अचानक एक बंजर जमीन जैसी अवस्था किसी को भी असहज कर सकती है, लेकिन मैं इस अवस्था में भी आनंद तलाश कर रहा था। बिना प्रयत्न किए, विचार शून्य होना, सहजावस्था के संकेत हैं। जो चित्त हमेशा समुद्र की लहरों की तरह अशांत रहता है, अचानक गहरे पानी पैठ गया है। वहां कोई हलचल नहीं, कोई सात्विक, राजसी अथवा तामसी विचार नहीं।।

उस विचारशून्य अवस्था से जब पुनः विचारों के प्रवाह ने मुझे झंझोड़ा, तब मुझे आभास हुआ मैं विचारों के शून्य से गुजर चुका हूं। विचारों का लॉक डाउन समाप्त हो गया है, अब विचार किसी के बाप से नहीं रुकने वाले।

शून्य में ऐसा क्या है, जो किसी अंक में नहीं। क्या विचारों के अभाव का चित्त पर इतना प्रभाव पड़ता है कि वह संकल्प विकल्प करना भूल जाता है। यह वह अवस्था नहीं जिसे किंकर्तव्यविमूढ़ कहा जाता है। विचारों का अभाव ही ध्यान है, समाधि है, जहां प्रज्ञा पूर्ण रूपेण जाग्रत रहती है। विचारशून्यता एक ऐसा आकाश है, जहां जागृति होते हुए भी जड़ता नजर आती है। हमारा अस्तित्व उसी शून्य से है, वही संभवतः चिदाकाश है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५७ ⇒ संगीत चिकित्सा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संगीत चिकित्सा।)

?अभी अभी # ९५७ ⇒ आलेख – संगीत चिकित्सा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लिपटन माने अच्छी चाय!

संगीत चिकित्सा माने

म्यूज़िक थेरेपी।

जहाँ चाह, वहाँ राह! चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत चिकित्सा की कई प्रणालियों का समावेश होता है। जिनमें देसी, विदेशी और यूनानी पद्धति प्रमुख हैं। हमारे देश में प्रमुखतः एलोपैथी, होमियोपैथी और नेचुरोपैथी का प्रचलन अधिक है। महर्षि धन्वन्तरी की आयुर्वेदिक चिकित्सा आज भी अपना महत्व रखती है।

मर्ज़ बढ़ता गया, ज्यूं ज्यूं दवा की! जब रोग असाध्य हो जाता है, तो इंसान सभी पेथियों को लात मार थेरैपी पर उतर आता है। चिकित्सा भी स्थूल से सूक्ष्म पर उतर आती है। कहीं यौगिक क्रिया, कहीं रेकी तो कहीं एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर का सहारा लिया जाता है। जोड़ों और नसों के दर्द के लिए अगर फिजियोथेरेपी है तो पेट की समस्याओं के लिए हायड्रोथेरैपी।।

जो योग आत्मा से परमात्मा को जोड़ता था, वह इंसान को रोगमुक्त करने के काम आने लग गया। सही भी है! पहले रोग-मुक्त तो हो जाएं, मुक्ति और मिलन बाद की बात है। कुंडलिनी को जब जागना होगी, जाग लेगी! पहले रात को चैन की नींद और सुबह खुलकर शौच तो हो ले। कहा भी है, पहला सुख निरोगी काया।

स्वच्छता और स्वास्थ्य ही हमारी मूलभूत आवश्यकता है। देश से बीमारी और गंदगी दूर करने का बीड़ा केवल राजयोगी और योगी मिलकर ही उठा सकते हैं। बाबा रामदेव और मोदी हैं, तो यह मुमकिन है। दोनों की अपनी अपनी आलीशान दुकान है।।

संगीत और आध्यात्म तन की नहीं, मन की साधना है। कौन जानता था कि जो कभी सङ्गीत महाविद्यालय था, वह आगे चलकर संगीत चिकित्सालय का रूप धारण कर लेगा। जिस तरह आसन और प्राणायाम का उपयोग बीमारियां ठीक करने के लिए किया जाने लगा है, संगीत से भी आजकल रोगोपचार किया जा रहा है।

मुझे रात को नींद नहीं आती आचार्य जी! ऐसा कीजिए, आप रोज रात को आधा घंटा, राग यमन सुना कीजिये, आपको तुरंत नींद आ जाएगी। शास्त्रीय संगीत की सभा में इसका मुझे कई बार अनुभव हुआ है। म्यूजिकथेरेपी का दावा है कि इसका असर कोमा के मरीज पर भी संभव है। मन की सूक्ष्म तरंगें अवचेतन में संगीत की स्वर-लहरियों से आंदोलित होने लगती हैं। स्वर की साधना परमेश्वर की साधना तो है ही, असाध्य रोगों पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।

इसमें कोई शक नहीं कि संगीत संजीवनी का काम करता है। जिन्हें शास्त्रीय संगीत से एलर्जी है, उनके लिए शास्त्रीय रागों पर आधारित फिल्मी गाने हैं न।

डर लगे तो गाना गा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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