हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५० ⇒ उसकी रोटी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उसकी रोटी…“।)

?अभी अभी # १०५० ⇒ आलेख – उसकी रोटी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दीवाना आदमी को बनाती है रोटियाँ ! रोटी तो रोटी होती है। तेरी, मेरी, उसकी रोटी। गर्मागर्म, गोल-मटोल रोटियां। दुनिया के किस कोने में रोटी नहीं खाई जाती। नाम अलग होगा, शक्ल अलग होगी, लेकिन जहां भूख होगी, मेहनत होगी, वहाँ रोटी अवश्य होगी।

रोटी गेहूं की होती है, ज्वार, मक्के, बाजरे, जौ की होती है, रोटी तवे की होती है, तंदूर की होती है, चूल्हे, गैस और स्टोव्ह की रोटी होती है, मोटी पतली, रूखी सूखी, चिकनी चुपड़ी रोटी होती है। कहीं इसे फुलका कहते हैं तो कहीं चपाती। किसी के लिए यह टिक्कड़ है तो किसी के लिए पोळी। कहीं उत्सव है, पूजा त्योहार श्राद्ध है, तो वहां यह पूड़ी है, कहीं पंजाबी परांठा तो कहीं मिस्सी रोटी है। न जाने क्यूं, मुझे अपनी रोटी से उसकी रोटी ज्यादा पसंद है।।

भूख है जहाँ, रोटी है वहां ! जहाँ भूख नहीं, वहाँ रोटी का क्या काम। गुलामी के घी से आज़ादी की घास अच्छी। महाराणा प्रताप जंगलों में घास फूस की रोटियाँ खाते थे। जहाँ पेट भरा हो, अपच हो, कब्जियत हो, अथवा हराम की कमाई हो, वहाँ दाल रोटी को घास फूस ही कहते हैं।

जहाँ पापड़, सलाद, एपिटाइजर और स्टार्टर के बिना भूख ही नहीं लगती हो, वे रोटी का स्वाद ही नहीं जानते। उनकी रोटी रूमाली रोटी होती है, नान होती है, कभी पिज्जा तो कभी बर्गर होती है।

उसकी रोटी मेरी रोटी से स्वादिष्ट कैसे ! जिसके पास मुझसे ज्यादा अभाव है, गरीबी है, मुफलिसी है, मज़बूरी है, भूख है, चैन है, नींद है, प्यास है, मुझे उसकी रोटी अपनी रोटी से ज्यादा प्यारी है। गांव हो या कस्बा, झुग्गी हो या झोपड़ी, आश्रम हो या मठ, बस चूल्हे से उठता हुआ धुआं हो, और तवे पर गर्मागर्म सिकती रोटियां हों, उसकी खुशबू मेरे लिए किसी फूल की महक से कम नहीं। एक फूल जब खिलता है, बस वही उसकी इबादत हो जाती है। साँसों के साथ वह सात्विक भाव मेरी आत्मा के लिए छप्पन भोग का काम करता है। बिन खाए मुझ पे नशा छाया है, तेरी रोटी ने गजब ढाया है।।

हेल्थ हाइजीन एक तरफ, कड़कती भूख एक तरफ। आज भी जब भरी दोपहर को अचानक भूख लग आती है, तो कटोरदान से चुपके से दो ठंडी रोटी निकालता हूं, थोड़ा आम के अचार का मसाला लपेटता हूं, और उसकी पुंगी बना, प्रेम से खाता हूं। उसके बाद जब पानी पीता हूं, तो लगता है, महीनों की भूख प्यास शांत हो गई।

मैं कितना भाग्यशाली हूं, मुझे रोटी के साथ अचार भी नसीब है। मेरी भूख प्यास कायम है, भूख प्यास मिटने के बाद ही चैन की नींद नसीब होती है। ज्यादा की नहीं लालच मुझको, बस हर इंसान को इसी तरह भूख लगने पर मेहनत और ईमानदारी की दो रोटी नसीब हो। कोई मेहनती और ईमानदार इंसान का परिवार भूखा ना सोए, रोटी के कारण उसका ईमान न डोले। ईमान रोटी से नहीं, पैसे की हवस के कारण डोलता है। पैसे वालों के लिए तो बड़े बड़े होटल, रेस्तरां, अस्पताल और डॉक्टर मौजूद हैं ही ;

तुम्हें होटलों के पिज्जा बर्गर मुबारक

हमें उसके चूल्हे की गर्मागर्म रोटी, रास आ गई है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८५ – देश-परदेश – World Day for International Justice: 17th July ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८५ ☆ देश-परदेश – World Day for International Justice: 17th July ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज प्रातः ज्ञात हुआ कि आज विश्व न्याय दिवस है। मन को बड़ी शांति मिली कि पूरा विश्व न्याय व्यवस्था को मानता है।

न्यायालय में कार्यरत कर्मचारी, अधिकारी और न्यायधीश के बारे में हम मुंह ना ही खोलें तो अच्छा है। इस विषय पर मित्र मंडली में चर्चा होती रहती है, वैसे हमारे व्हाट्स ऐप ने इनकी व्यवस्था के चिथड़े उखाड़ने में कोई कमी नहीं रखी है।

एक मित्र बोले अब तो न्याय की देवी की आँखों से पट्टी उतार दी गई है, अब न्याय सब देख सकता है। कुछ जानकारों का कहना है, पट्टी हटाने के बाद से न्याय व्यवस्था में कार्य करवाने का नगद में होने वाला खर्च भी अब पहले से एक चौथाई बढ़ गया है।

अब कोई सम्राट विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठ कर न्याय तो नहीं कर रहा है, या बत्तीस पुतलियां हैं, जो न्याय पर सवाल उठाए जाएंगे। इतिहास में तो बादशाह जहांगीर की न्याय जंजीर की चर्चा भी है। हमारा इतिहास लिखने वाले कौन से राजा हरीश चंद्र के वंशज थे ? जो सब सच लिखा होगा।

देश के दक्षिण भाग में एक “संगोल राजदंड” प्रतीकात्मक रूप में संसद स्पीकर के पास रखा हुआ। उसके आने के बाद भी सांसद अपने घटिया व्यवहार में कोई बदलाव नहीं ला पाए हैं।

“Justice Delayed is Justice Denied” या कानून अंधा होता है, वाली कहावते अमर हो चुकी हैं। न्याय व्यवस्था की पैरवी करने वाले भी न्याय व्यवस्था को नीचा दिखाने में भरपूर सहयोग करते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ मैं पैसा हूँ… पर तुम्हारी पहचान नहीं ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ मैं पैसा हूँ… पर तुम्हारी पहचान नहीं ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“मैं बाज़ार की ज़रूरत हूँ, जीवन का उद्देश्य नहीं।”

मैं पैसा हूँ।

सदियों से मनुष्य के हाथों में घूम रहा हूँ। कभी सिक्का बना, कभी नोट और अब एक स्क्रीन पर चमकता हुआ अंक।

समय के साथ मेरा रूप बदलता रहा, पर एक बात कभी नहीं बदली-मैं आज भी इंसान की नीयत का सबसे सच्चा आईना हूँ।

मुझे दोष देना आसान है।

लोग कहते हैं कि मैंने भाई-भाई को बाँट दिया, रिश्तों में दरार डाल दी, इंसान को स्वार्थी बना दिया।

पर सच यह है कि मैं किसी के मन में लालच नहीं बोता। मैं तो केवल उस लालच को उजागर कर देता हूँ, जो पहले से भीतर छिपा होता है।

मैंने कभी किसी से नहीं कहा कि ईमान बेच दो, किसी का हक मार लो या अपनों को भूल जाओ।

मैं तो बस वहीं जाता हूँ, जहाँ मुझे ले जाया जाता है।

किसी के हाथों में पहुँचकर मैं भूखे का भोजन बन जाता हूँ, किसी की शिक्षा, किसी का उपचार और किसी के सपनों का आधार बन जाता हूँ।

लेकिन जब मैं अहंकार की मुट्ठी में कैद हो जाता हूँ, तब घर बड़े हो जाते हैं और दिल छोटे।

तिजोरियाँ भर जाती हैं, पर रिश्ते खाली होने लगते हैं।

याद रखना, मुझे कमाना बुरा नहीं है।

बुरा तब है, जब मुझे कमाने की दौड़ में तुम अपने होने का अर्थ ही खो बैठो।

जिस दिन तुम्हारे जीवन का अंतिम हिसाब होगा, उस दिन कोई बैंक बैलेंस साथ नहीं चलेगा।

सिर्फ दो चीज़ें तुम्हारे साथ होंगी-तुम्हारे कर्म और लोगों के दिलों में तुम्हारी स्मृतियाँ।

इसलिए मुझे इतना ही महत्व देना, जितना जीवन को सहज बनाने के लिए आवश्यक है।

मैं सुविधा दे सकता हूँ, सुख नहीं।

मैं सुरक्षा दे सकता हूँ, अपनापन नहीं।

मैं वैभव दे सकता हूँ, सम्मान नहीं।

सम्मान तो आज भी चरित्र से मिलता है।

इसलिए…

मुझे कमाओ, पर चरित्र खोकर नहीं।

मुझे बचाओ, पर रिश्ते गँवाकर नहीं।

मुझे खर्च करो, पर संवेदनाएँ बेचकर नहीं।

और अंत में…

मुझे जेब में रखना,

दिल में नहीं।

क्योंकि दिल में यदि किसी को जगह मिलनी चाहिए, तो वह प्रेम, विश्वास, करुणा और इंसानियत है।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४९ ⇒ घोड़ा, घास और यारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घोड़ा, घास और यारी …“।)

?अभी अभी # १०४९ ⇒ आलेख – घोड़ा, घास और यारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घोड़ा घास से यारी नहीं करता ! घोड़े पर अक्सर सवारी की जाती है। आप गाय और कुत्ते की तरह घोड़े को नहीं पाल सकते। घोड़ा बिना घुड़सवार के शोभा नहीं देता। गाय और कुत्ता तो कोई भी रहम दिल इंसान पाल सकता है, घोड़े को पालने के लिए शारीरक बल के अलावा एक अस्तबल की भी आवश्यकता होती है।

युद्ध की कलाओं में घोड़े का विशिष्ट स्थान है। अश्वारोही सेना के बिना कोई भी युद्ध अधूरा होता था। महाराणा प्रताप हों, छत्रपति शिवाजी हों या फिर रानी लक्ष्मीबाई, घोड़ा ही इनकी पहचान थी। अश्व – विश्व में चेतक का नाम अमर है।।

फ़ौज में आज भी कैवेलरी यूनिट, अश्ववाहिनी सेना होती है। कर्फ्यू के वक्त कुछ बीएसएफ के जवान सड़कों पर मार्च करते देखे जा सकते हैं। कभी इंदौर शहर भी ताँगों का शहर हुआ करता था। आज शहर से घोड़ा और घास दोनों गायब हैं।।

घुड़सवारी अगर एक शौक है, तो घुड़दौड़ एक जुनून। मुम्बई का महालक्ष्मी रेस कोर्स घुड़दौड़ के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ घोड़ों पर दाँव लगाया जाता है। यह एक तरह का जुआ है, जिसमें कई रईस अपनी दौलत लुटा बैठते हैं। पुरानी हिंदी फिल्मों में कई राय साहब बने चरित्र अभिनेता किसी नंबर के घोड़े पर दाँव लगाकर अपना सब कुछ हार जाते हैं, और दिल के दौरे में अपनी जान गँवा बैठते हैं। तब हीरो रायसाहब की लड़की और माँ को सहारा देता है। अंग्रेजों का यह एक प्रिय खेल था, इसलिए हर छोटे-बड़े शहर में रेस कोर्स रोड और पोलोग्राउंड आज भी देखे जा सकते हैं।

कभी घोड़े तांगा और बग्घी में जोते जाते थे। महाभारत काल में कृष्ण जिस अर्जुन के रथ के सारथी बने थे, उसमें भी घोड़े ही शोभायमान होते थे। जब घोड़े को घास मिलनी बंद हो गई, तो ताँगों का स्थान सायकल रिक्शा और ऑटो रिक्शा ने ले लिया। एक आम इंसान ने भले ही ज़िन्दगी में कभी कोई घोड़ा न खरीदा हो, सोते वक्त वह अक्सर घोड़े बेचकर ही सोता है।।

जो लोग धंधे-व्यवसाय को यारी से अधिक महत्व देते हैं, वे दोस्ती के लिहाज में एक पैसा नहीं छोड़ते। उनका यह तकिया कलाम होता है, भैया ! घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खायेगा क्या ? उन्हें यारी से ज़्यादा घास प्यारी है। उसूल अपना अपना।

अब तो घोड़ा बस बारात में देखा जा सकता है। माफ़ कीजिये, वह भी शायद घोड़ी ही होती है। घोड़ी पे हो के सवार … गाना चला करता है। दूल्हे राजा घोड़े पर बैठे हैं। एक रस्म में घोड़े को आग्रहपूर्वक एक पात्र में भीगी हुई चने की दाल खिलाई जाती है। बस शायद यही एक मौका होता है, जब घोड़ा घास से नहीं, चने की दाल से भी यारी कर लेता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४५ – इनबिल्ट ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४५ ☆ इनबिल्ट… ?

अपने दैनिक पूजा-पाठ में या जब कभी मंदिर जाते हो,  सामान्यतः याचक बनकर ईश्वर के आगे खड़ा होते हो। कभी धन, कभी स्वास्थ्य, कभी परिवार में सुख-शांति, कभी बच्चों की प्रगति तो कभी…, कभी की सूची लंबी है, बहुत लंबी।

लेकिन कभी विचार किया कि दाता ने सारा कुछ, सब कुछ पहले ही दे रखा है। ‘जो पिंड में, सोई बिरमांड में।’ उससे अलग क्या मांग लोगे? स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि ब्रह्मांड की सारी शक्तियाँ पहले से हमारे भीतर हैं। अपनी आँखों को अपने ही हाथों से ढककर हम ‘अंधकार, अंधकार’ चिल्लाते हैं। कितना गहन पर कितना सरल वक्तव्य है। ‘एवरीथिंग इज इनबिल्ट।’…तुम रोज़ मांगते हो, वह रोज़ मुस्कराता है।

एक भोला भंडारी भगवान से रोज़ लॉटरी खुलवाने की गुहार लगाता था। एक दिन भगवान ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा, ‘बावरे! पहले लॉटरी का टिकट तो खरीद।’

तुम्हारा कर्म, तुम्हारा परिश्रम, तुम्हारा टिकट है। ये लॉटरी नहीं जो किसी को लगे, किसी को न लगे। इसमें परिणाम मिलना निश्चित है। हाँ, परिणाम कभी जल्दी, कभी कुछ देर से आ सकता है।

उपदेशक से समस्या का समाधान पाने के लिए उसके पीछे या उसके बताए मार्ग पर चलना होता है। उपदेशक के पास समस्या का सर्वसाधारण हल है।  राजा और रंक के लिए, कुटिल और संत के लिए, बुद्धिमान और नादान के लिए, मरियल और पहलवान के लिए एक ही हल है।

समुपदेशक की स्थिति भिन्न है। समुपदेशक तुम्हारी आंतरिक प्रेरणा को जाग्रत करता है। यह प्रेरणा बताती है कि अपनी समस्या का हल तलाशने का सामर्थ्य तुम्हारे भीतर है। तुम्हें अपने तरीके से अपना प्रमेय हल करना है। प्रमेय भले एक हो, हल करने का तरीका प्रत्येक की अपनी दैहिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है।

समुपदेशक तुम्हारे इनबिल्ट को एक्टिवेट करने में सहायता करता है। ईश्वर से मत कहो कि मुझे फलां दे। कहो कि हे प्रभो,  फलां हासिल करने की मेरी शक्ति को जाग्रत करने में सहायक हो। जिसने ईश्वर को समुपदेशक बना लिया, उसने भीतर के ब्रह्म को जगा लिया….और ब्रह्मांड में ब्रह्म से बड़ा क्या है?

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४८ ⇒ || रबड़ी प्लेट || ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रबड़ी प्लेट ||“।)

?अभी अभी # १०४८ ⇒ आलेख – || रबड़ी प्लेट || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आप भले ही लड्डू को मिठाइयों का राजा मान लें, लेकिन जलेबी, इमरती और रबड़ी का नाम सुनकर ज़रूर आपके मन में लड्डू फूट पड़े होंगे। जिन्हें गुलाब जामुन पसंद है, उन्हें मावा बाटी की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। होते हैं कुछ लोग, जो चाशनी से परहेज करते हैं, लेकिन रसगुल्ला देख, उनके मुंह से भी पानी टपकने लगता है।

हम तो शुगर को शक्कर ही समझते थे, लेकिन जब से सुना है, शुगर एक बीमारी भी है, हमने भी मीठे से परहेज करना शुरू कर दिया है। लेकिन चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से ना जाए, रबड़ी तब भी हमारी कमजोरी थी, और आज भी है।।

कुछ समय के लिए शुगर को भूल जाइए, आइए रबड़ी की बात करें। ठंडी रातों में दूध के कढ़ाव और केसरिया, मलाईदार दूध, रबड़ी मार के, मानो चाय मलाई मार के। गर्मी में मस्तानी दही की लस्सी और वह भी रबड़ी मलाई मार के। खाने वाले खाते होंगे दही के साथ गर्मागर्म जलेबी, हम तो जलेबी भी रबड़ी के साथ ही खाते हैं।

आज हम जिस रबड़ी प्लेट का जिक्र कर रहे हैं, उसके लिए हमें थोड़ा अतीत में जाना पड़ेगा। नालंदा जितना अतीत नहीं, फिर भी कम से कम पचास बरस। हमारे होल्करों के शहर इंदौर के बीचों बीच एक श्रीकृष्ण टाकीज था, जहां गर्मियों में सुबह साढ़े आठ बजे एक ठेला नजर आता था, जो हीरा लस्सी के नाम से प्रसिद्ध था। यह लस्सी केवल गर्मियों में ही नसीब होती थी। एक बारिश हुई, और वहां से ठेला नदारद।

एक श्रृंगारित ठेला, जिसमें कई शरबत की बोतलें सजी हुई, ठेले के नीचे के स्टैण्ड पर कई ताजे दही के कुंडे, ठेले के बीच टाट पर विराजमान एक बर्फ की शिला, एक विशाल तपेले में, लबालब रबड़ी और इन सबके बीच कार्यरत एकमात्र व्यक्ति हीरा और उनका चीनी मिट्टी का बड़ा पात्र और एक लकड़ी की विशाल रवई, दही को मथने के लिए। (सब कुछ हाथ से ही)

हीरा लस्सी ही उस लस्सी का ब्रांड था, जो किसी जमाने में आठ आने से शुरू होकर दस रुपए तक पहुंच गई थी। पहले कुंडे से दही निकालकर तबीयत से मथना, फिर कांच के ग्लासों में बर्फ छील छीलकर डालना, लस्सी और बोतलों में रखे शकर के केसरिया शरबत को मिलाना, और ग्लासों को लस्सी से भरना, फिर थोड़ी रबड़ी और उसके बाद लबालब लस्सी पर दही की मलाई की एक मोटी परत। लीजिए, हीरा लस्सी तैयार।।

हमारा विषयांतर में विश्वास नहीं। वहां रबड़ी प्लेट भी उपलब्ध होती थी, जो मेरी पहली और आखरी पसंद होती थी। भाव लस्सी से उन्नीस बीस, लेकिन एक कांच की बड़ी प्लेट में लच्छेदार रबड़ी, उस पर थोड़ा बर्फ का चूरा और ऊपर से गुलाब का शर्बत। एक लोहे की डब्बी में काजू, बादाम, पिस्ते का चूरा

लस्सी और रबड़ी प्लेट दोनों पर कायदे से बुरकाया जाता था। तब जाकर हमारी रबड़ी प्लेट तैयार होती थी।

हाइजीन वाले हमें माफ करें, क्योंकि हम रबड़ी प्लेट खाने के बाद हाथ नहीं धोते थे, रबड़ी और गुलाब के शरबत की खुशबू हमारे हाथों में हमारे साथ ही जाती थी और साथ ही जबान पर रबड़ी प्लेट का स्वाद भी।।

आज न तो वहां श्रीकृष्ण टाकीज है और ना ही वह हीरा लस्सी वाला। पास में बोलिया टॉवर के नीचे, उसके वंशज जरूर फ्रिज में रखी लस्सी, हीरा लस्सी के नाम से, साल भर बेच रहे हैं, लेकिन वह बात कहां।

जिस तरह शौकीन लोग, अपना शौक घर बैठे भी पूरा कर लेते हैं, हमारी रबड़ी प्लेट भी आजकल घर पर ही तैयार हो जाती है। तैयार केसरिया रबड़ी मांगीलाल दूधवाले अथवा रणजीत हनुमान के सामने विकास रबड़ी वाले के यहां आसानी से उपलब्ध हो ही जाती है, बस एक प्लेट में रबड़ी पर थोड़ा सा, मौसम के अनुकूल बर्फ और गुलाब का शर्बत ही तो डालना है, लीजिए, रबड़ी प्लेट तैयार। शौकीन हमें ज्वाइन कर सकते हैं।।

विशेष : शुगर फ्री वालों से क्षमायाचना सहित …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४७ ⇒ भागने/भगाने की कला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भागने/भगाने की कला…“।)

?अभी अभी # १०४७ ⇒ आलेख – भागने/भगाने की कला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम यहाँ उड़नसिख मिल्खा अथवा उड़नपरी पी टी उषा की बात नहीं कर रहे, जो भागने में देश का नाम रोशन कर चुके हैं, हम उस भागने/भगाने का जिक्र कर रहे हैं, जिसे समाज अच्छी निगाह से नहीं देखता।

हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे कई मौके आते हैं, जब हमें भागकर सिटी बस, अथवा ट्रेन पकड़नी पड़ती है। कुछ लोग तो स्कूटर पर भी भागते-भागते ऑफिस पहुँचते हैं। आखिर जीवन में दौड़-भाग तो लगी ही रहती है।।

एक समय था, जब कुछ बच्चे बचपन में बिना बताए घर छोड़कर भाग जाते थे ! माँ बाप बेचारे परेशान। अखबारों में इश्तहार देते थे। गुमशुदा की तलाश। बेटा गौरव ! तुम जहाँ कहीं भी हो घर चले आओ। दादीजी ने चार रोज से खाना नहीं खाया है। तुम्हारी माँ का रो-रोकर बुरा हाल है। पैसे की ज़रूरत हो तो बताना। लाने वाले, या पता बताने वाले को उचित ईनाम दिया जाएगा।

वह ज़माना था, जब एक खोया हुआ, या भागा हुआ बच्चा भी सुरक्षित वापस घर आ जाता था। आजकल छोटे बच्चों तक का अपहरण फिरौती वसूलने के लिए किया जाता है। क्या ज़माना आ गया है।।

जितनी छूट आज लड़कियों को है, उतनी हमारे जमाने में नहीं थी। लड़कियों के लिए अलग कन्या विद्यालय और महा-विद्यालय भी था। लड़की सीधी स्कूल जाती थी, और सीधी घर आती थी।

उसकी सहेलियाँ होती थी, बॉय फ्रेंड नहीं। आग लगे इन कॉलेज गर्ल, लव इन शिमला, और लव इन टोकियो जैसी फिल्मों को, जिन्होंने लड़कियों को सिनेमाघर का रास्ता दिखा दिया। एक लड़की भीगी-भागी सी।

फिर भी लड़कियों की हिम्मत नहीं होती थी कि लड़कों की तरह घर से भाग जाए। उनकी दौड़ नानी या मामा के घर तक की ही होती थी और भाई चौवीस घंटे यमदूत की तरह आगे पीछे। बड़ी मुश्किल से कुछ ही लड़कियां किसी लड़के के साथ घर से भाग सकती थी। उन्हें लोग अच्छी लड़की नहीं समझते थे।

फिर समय ने करवट ली। विद्यालय कान्वेंट हो गए, को-एजुकेशन अर्थात सह -शिक्षा प्रारंभ हो गई। स्कूलों में निबंध और वाद-विवाद के लिए एक नया विषय मिल गया। आज के आधुनिक दौर में क्या सह-शिक्षा जरूरी है ? पक्ष हो या विपक्ष, न जाने क्यों, लड़कियाँ ही प्रथम आती थी।।

अब समय बदल गया है। नर्सरी से पीजी तक लड़के-लड़कियां साथ-साथ उठते-बैठते, पढ़ते-लिखते हैं। एक दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं। अब उन्हें सड़क अथवा कॉलेज की किसी लड़की को देख सीटी मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पांडुबा, पोरगी फसली रे फसली जैसे घटिया गानों का ज़माना गया। चाहे माँ रूठे या बाबा, मैंने तेरी बाँह पकड़ ली, जैसा अब कुछ नहीं है। अब लड़के-लड़की घर छोड़कर भागते नहीं, माता-पिता की सहमति से अपना घर बसाते हैं। बच्चे भी समझदार हैं और माता-पिता भी।

आज की पीढ़ी के सामने वैसे ही कई चुनौतियाँ हैं। उनके जीवन में वैसे भी स्थिरता कहाँ ! उन्हें तो भागते ही रहना है, पहले उच्च-शिक्षा के लिए तो बाद में एक अच्छी नौकरी के लिए। उन्हें भी एक ऐसे जीवन साथी को तलाश है जो जीवन की इस भागम-भाग में उनका साथ दे। उन्हें भागकर शादी करने की फुर्सत ही कहाँ है ! माता-पिता थक जाते हैं कहकर, अपनी पसंद का लड़का, अथवा लड़की ही बता दो, ताकि हम अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो सकें, और आज की पीढ़ी है कि उसे भागने की तो छोड़िए, घड़ी दो घड़ी, प्यार करने की फुर्सत ही नहीं।।

भागने/भगाने की आदर्श स्थिति भी होती है। शास्त्रों में इसे गंधर्व विवाह कहा गया है ! रुक्मी की बहन रुक्मिणी मंदिर जाने के बहाने श्रीकृष्ण से मिलने नहीं गई, वे तो माँ भवानी से आशीर्वाद लेने गई थी कि उन्हें श्रीकृष्ण ही पत्नी के रूप में वरण करे। और यहाँ तो काजी भी राजी थे।

केवल रुक्मी इस भ्रम में था कि कृष्ण उसकी बहन को भगाकर ले जा रहा है। मर्ज़ी से जाने और भागने में ज़मीन आसमान का अंतर है।

जहाँ प्रेम हो, वहाँ विवाह हो !

हमारी भारतीय नारियाँ तो इतनी समर्पित हैं, कि जहाँ विवाह होता है, वहीं प्रेम कर लेती हैं। बदले में उन्हें क्या मिलता है, यह या तो वे जानें, या फिर रब ही जानें। अगर आप सगाई ही को शादी मान लें तो जगजीत-चित्रा एक आदर्श उदाहरण हैं, जो साथ साथ मिलकर यह घोषणा करते हैं –

सबसे ऊँची, प्रेम सगाई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३० ☆ हॉउ से हू तक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख हॉउ से हू तक। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मोहे भावें ना दुनिया के रंग / स्वर- विकास यशकीर्ति, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३० ☆

☆ हॉउ से हू तक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘दौलत भी क्या चीज़ है, जब आती है तो इंसान खुद को भूल जाता है, जब जाती है तो ज़माना उसे भूल जाता है।’ धन-दौलत, पैसा व पद-प्रतिष्ठा का नशा अक्सर सिर चढ़कर बोलता है, क्योंकि इन्हें प्राप्त करने के पश्चात् इंसान अपनी सुधबुध खो बैठता है … स्वयं को भूल जाता है। तात्पर्य यह है कि धन-सम्पदा पाने के पश्चात् इंसान अहं के नशे में चूर रहता है और उसे अपने अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। उस स्थिति में उसे कोई भी अपना नज़र नहीं आता…सब पराए अथवा दुश्मन नज़र आते हैं। वह दौलत के नशे के साथ-साथ शराब व ड्रग्स का आदी हो जाता है। सो! उसे समय, स्थान व परिस्थिति का लेशमात्र भी ध्यान तक नहीं रहता और संबंध व सरोकारों का उसके जीवन में अस्तित्व अथवा महत्व नहीं रहता। इस स्थिति में वह अहंनिष्ठ मानव अपनों अर्थात् परिवार व बच्चों से दूर…बहुत…दूर चला जाता है और वह अपने सम्मुख  किसी के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता। वह मर्यादा की सभी सीमाओं को लाँघ जाता है और रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पाँव रख कर आगे बढ़ता चला जाता है और उसकी यह दौड़ उसे कहीं भी रुकने नहीं देती।

धन-दौलत का आकर्षण न तो कभी धूमिल पड़ता है; न ही कभी समाप्त होता है। वह तो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ता चला जाता है। यह प्रसिद्ध कहावत है…’पैसा ही पैसे को खींचता है।’ दूसरे शब्दों में इंसान की पैसे  की हवस कभी समाप्त नहीं होती…सो! उसे उचित-अनुचित में भेद नज़र आने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। धन कमाने का नशा उस पर इस क़दर हावी होता है कि वह राह में आने वाले  आगंतुकों-विरोधियों को कीड़े-मकोड़ों की भांति रौंदता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है। इस मन:स्थिति में वह पाप-पुण्य के भेद को नकार; अपनी सोच व निर्णय को सदैव उचित ठहराता है।

इस दुनिया के लोग भी धनवान अथवा दौलतमंद  इंसान को सलाम करते हैं अर्थात् करने को बाध्य होते हैं…  और यह उनकी नियति होती है। परंतु दौलत के खो जाने के पश्चात् ज़माना उसे भूल जाता है, क्योंकि  यह तो ज़माने का चलन है। परंतु इंसान माया के भ्रम में सांसारिक आकर्षणों व दुनिया-वी चकाचौंध में इस क़दर खो जाता है कि उसे अपने आत्मज भी अपने नज़र नहीं आते; दुश्मन प्रतीत होते हैं। एक लंबे अंतराल के पश्चात् जब वह उन अपनों के बीच लौट जाना चाहता है, तो वे भी उसे नकार देते हैं। अब उनके पास उस अहंनिष्ठ इंसान के लिए समय का अभाव होता है। यह सृष्टि का नियम है कि जैसा आप इस संसार में करते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। यह तो हुई आत्मजों अर्थात् अपने बच्चों की बात, जिन्हें अच्छी परवरिश व सुख- सुविधाएं प्रदान करने के लिए वह दिन-रात परिश्रम करता रहा; ठीक-ग़लत काम करता रहा…परंतु उन्हें समय व स्नेह नहीं दे पाया, जिसकी उन्हें दरक़ार थी; जो उनकी प्राथमिक आवश्यकता थी।

‘फिर ग़ैरों से क्या शिक़वा कीजिए… दौलत के समाप्त होते ही अपने ही नहीं, ज़माने अर्थात् दुनिया भर के लोग भी उसे भुला देते हैं, क्योंकि वे संबंध स्वार्थ के थे;  स्नेह सौहार्द के नहीं।’ मैं तो संबंधों को रिवाल्विंग चेयर की भांति मानती हूं। आपने मुंह दूसरी ओर घुमाया; अवसरवादी बाशिंदों के तेवर भी बदल गए, क्योंकि आजकल संबंध सत्ता व धन-संपदा से जुड़े होते हैं… सब कुर्सी को सलाम करते हैं। जब तक आप उस पर आसीन हैं, सब ठीक चलता है; आपको झूठा मान-सम्मान मिलता है, क्योंकि लोग आपसे हर उचित-अनुचित कार्य की अपेक्षा रखते हैं। वैसे भी समय पर तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है… सो! इंसान की तो बात ही अलग है।

लक्ष्मी का तो स्वभाव ही चंचल है, वह एक स्थान पर ठहरती ही कहाँ है। जब तक वह मानव के पास रहती है, सब उससे पूछते हैं ‘हॉउ आर यू’ और लक्ष्मी के स्थान परिवर्तन करने के पश्चात् लोग कहते हैं ‘हू आर यू।’ इस प्रकार लोगों के तेवर पल-भर में बदल जाते हैं। ‘हॉउ’ में स्वीकार्यता है—अस्तित्व-बोध की और आपकी सलामती का भाव है, जो यह दर्शाता है कि वे लोग आपकी चिंता करते हैं…विवशता-पूर्वक या मन की गहराइयों से… यह और बात है। परंतु ‘हॉउ’ को ‘हू’ में बदलने में पल-भर का समय भी नहीं लगता। ‘हू’ अस्वीकार्यता बोध…आपके अस्तित्व से बे-खबर अर्थात् ‘कौन हैं आप?’ ‘कैसे से कौन’ प्रतीक है स्वार्थपरता का; आपके प्रति निरपेक्षता के भाव का; अस्तित्वहीनता का तथा यह प्रतीक है मानव के संकीर्ण भाव का, क्योंकि उगते सूर्य को सब सलाम करते हैं और डूबते सूर्य को निहारना भी लोग अपशकुन मानते हैं। आजकल तो वे बिना काम अर्थात् स्वार्थ के ‘नमस्ते’अथवा ‘दुआ सलाम’ भी नहीं करते।

इस स्थिति में चिन्ता तथा तनाव का होना अवश्यंभावी है। वह मानव को अवसाद की स्थिति में धकेल देता है; जिससे मानव लाख चाहने पर भी उबर नहीं पाता। वह अतीत की स्मृतियों में अवगाहन कर संतोष का अनुभव करता है। उसके सम्मुख प्रायश्चित करने के अतिरिक्त दूसरा विकल्प होता ही नहीं। सुख व्यक्ति के अहं की परीक्षा लेता है, तो दु:ख उसके धैर्य की…दोनों स्थितियों अथवा परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले व्यक्ति का जीवन सफल कहलाता है। यह भी अकाट्य सत्य है कि सुख में व्यक्ति फूला नहीं समाता; उस के कदम धरा पर नहीं पड़ते…वह अहंवादी हो जाता है और दु:ख के समय वह हैरान-परेशान होकर अपना धैर्य खो बैठता है। वह अपनी नाकामी अथवा असफलता का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ता है। इस उधेड़बुन में वह सोच नहीं पाता कि यह संसार दु:खालय है और सुख बिजली की कौंध की मानिंद जीवन में दस्तक देता है…परंतु बावरा मन उसे स्थायी समझ कर अपनी बपौती स्वीकार बैठता है और उसके जाने के पश्चात् वह शोकाकुल हो जाता है।

सुख-दु:ख का चोली दामन का साथ है। एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा आता है। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवारों का रहना असंभव है; उसी प्रकार दोनों का एक छत्र-छाया में रहना भी असंभव है। परंतु सुख-दु:ख को साक्षी भाव से देखना अथवा सम रहना आवश्यक है। दोनों अतिथि हैं–जो आया है, उसका लौटना भी निश्चित है। इसलिए न किसी के आने की खुशी, न किसी के जाने का ग़म-शोक मनाना चाहिए। हर स्थिति में सम रहने का भाव सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम है। इसलिए सुख में अहं को शत्रु समझना आवश्यक है और दु:ख में अथवा दूसरे कार्य में धैर्य का दामन छोड़ना स्वयं को मुसीबत में डालने के समान है। जीवन में कभी भी किसी को छोटा समझ कर किसी की उपेक्षा मत कीजिए, क्योंकि आवश्यकता के समय पर हर व्यक्ति व वस्तु का अपना महत्व होता है। सूई का काम तलवार नहीं कर सकती। मिट्टी, जिसे आप पाँव तले रौंदते हैं; उसका एक कण भी आँख में पड़ने पर इंसान की जान पर बन आती है। सो! जीवन में किसी तुच्छ वस्तु व व्यक्ति की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए… उसे स्वयं से अर्थात् उसकी प्रतिभा को ग़लती से भी कम नहीं आँकना चाहिए।

पैसे से सुख-सुविधाएं तो खरीदी जा सकती हैं, परंतु मानसिक शांति नहीं। इसलिए दौलत का अभिमान कभी मत कीजिए। पैसा तो हाथ का मैल है; एक स्थान पर कभी नहीं ठहरता। परमात्मा की कृपा से पलक-झपकते ही रंक राजा बन सकता है; पंगु पर्वत लाँघ सकता है और अंधा देखने लग जाता है। इस जन्म में इंसान को जो कुछ भी मिलता है; उसके पूर्वजन्म के कर्मों का फल होता है…फिर अहं कैसा? गरीब व्यक्ति अपने कृतकर्मों का फल भोगता है…फिर उसकी उपेक्षा व अपमान क्यों? इसलिए मानव को हर स्थिति में सामंजस्य बनाए रखना चाहिए…यही सफलता का मूल है। समन्वय, सामंजस्यता का जनक है, उपादान है; जो जीवन में समरसता लाता है। यह कैवल्य अर्थात् अलौकिक आनंद की स्थिति है, जिसमें ‘हॉउ आर यू’ और ‘हू आर यू’ का वैषम्य भाव समाप्त हो जाता है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १७ ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – २ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # १७ ☆

? – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – २ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

आगे बढ़ते हैंl आज बताती हूँ कि कैसे कच्छ राज्य की स्थापना हुई?

कच्छ सिंध प्रान्त का प्रशासनिक हिस्सा हुआ करता थाl पर जब अरबों ने इसी सिंध प्रान्त के राजा दाहिर के राउर किले पर आक्रमण किया तब वहाँ जबरदस्त युद्ध हुआl उस समय राजा की सेना में ब्राम्हण, राजपूत और जाट भी शामिल थेl जिसमे राजा दाहिर वीरगति को प्राप्त हुएl उनकी रानी लाड़ी ने बचे हुए सैनिको को एकत्रित कर किले के दरवाजे को अंदर से बन्द कर शत्रु का सामना कियाl पर जब शत्रु किले की दीवार तोड़ने लगा तब असहाय रानी ने जोहर का फैसला लियाl तब उनके साथ वहाँ उपस्थित सभी महिलाओं ने जोहर कियाl परन्तु दुर्भाग्यवश राजा की दो बेटियों को अरबों ने बंदी बनाकर खलीफ़ा को तोहफ़े में भेज दियाl और हिन्दू आबादी पर जरिया कर लगा दियाl इन सभी के चलते सम्मा राजपूत, ब्राम्हण परिवार के साथ कुछ जाट परिवारों ने सिंध छोडकर कच्छ में अपना ठिकाना बनाने का निश्चय कियाl उस समय कच्छ में वाघेला और काठी जातियाँ राज्य करती थींl इन राजपूतों ने यहाँ के शासकों को पराजित कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना शुरू कियाl

एक बार फिर से सिंध ने कच्छ पर आक्रमण कियाl तब कच्छ के झारा पहाड़ियों पर घमासान युद्ध हुआ जिसमे सिंध को मुँह की खानी पड़ी परन्तु हजारों की मात्रा में हिन्दू जडेजाओं ने अपने प्राणो की आहुतियाँ भी दींl

कुछ दिनों में ये सभी राजपूत आपस में लड़ने झगड़ने लगेl जिसे देख इसी वंश के एक प्रतापी राजा राव खेंगरजी जी ने सभी को समझा बुझा कर एकत्रित किया और कच्छ राज्य की स्थापना कीl

इस तरह राव खेंगरजी प्रथम कच्छ पर शासन करने वाले जडेजा राजपूत वंश के प्रथम आधिकारिक संस्थापक भी कहलाएl राव साहब ने कच्छ के क्षेत्रफल, सुचारु अर्थव्यवस्था और भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रख अपने प्रान्त को बारह रियासतों में बाँट दियाl भुज को राजधानी घोषित कर दियाl ये रियासतें निम्न हैंl

1- अबडासा – ये कच्छ के महाबलशाली जागीरदारों का गढ़ थाl यहाँ के राजपूत भुज महाराजा के वंश घराने से थेl ये क्षेत्र इतना बडा था कि इसकी अपनी चार जागीरें थींl

2-अंजार – ये क्षेत्र सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध को जोड़ने वाले मुख्य व्यापारिक मार्ग पर बसा था और इसी वजह से ये कच्छ की समृद्ध रियासत थीl आज भी यह संतों की भूमि कहलाती हैl यह क्षेत्र अपने पारंपरिक धातु बर्तनों के साथ अजरख और ब्लॉक प्रिंट हेतु प्रसिद्द हैl

2- बाणी या बन्नी – यहाँ सिंधु नदी की सहायक नदियों के साथ आई उपजाऊ मिट्टी ने इस क्षेत्र को एशिया के सबसे बड़े घास के मैदान में परिवर्तित कर दियाl यहाँ मिट्टी के गोल घर बनाये जाते है जिसे भुंगा कहते हैंl ये घर भूकंप और तूफानो से रक्षा करते हैंl यहाँ की मुतवा और हलेपोत्रा कढ़ाई विश्व भर में प्रसिद्द हैl

4- भुवड चौवीसी – यह क्षेत्र भुवड गाँव के पास के चौबीस गावों के समूह से बना थाl यहाँ के कारीगर पत्थरों पर नक्काशी कर उनमें प्राण फूंक देते थेl

5- गराडो – यह क्षेत्र शांत और रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण थाl इसे आज नखत्राना और लखपत कहा जाता हैl यह क्षेत्र बाहरी घुसपैठ को रोकने हेतु चौकी का काम करता थाl यह पहाडियों से घिरा हुआ थाl इसी क्षेत्र में कच्छ की कुलदेवी माँ आशापुरा निवास करतीं हैंl सबसे ज्यादा ओस गिरने से इस क्षेत्र को माकपट भी कहा जाता है

6- हालार चौवीसी – इस क्षेत्र की चौबीस जागीरों में किसान वर्ग रहता था जिसने कडी मेहनत कर अपने क्षेत्र को सबसे उपजाऊ बनायाl अच्छी फ़सल ने इसे समृद्धि बनाया और अपने राजा को सबसे ज्यादा राजस्व दियाl

7- कंठ – यह क्षेत्र ऊंचाई पर होने से राजधानी भुज का ढाल कहलायाl कंठ की पहाड़ियों में जडेजा राजा अपनी सेना के साथ मिलकर गोरिल्ला नीति अपनाकर शत्रु पर हमला बोल देते थेl

8- काँठो – मांडवी और मुंद्रा तटीय शहरों ने इसे कच्छ को समृद्ध, आर्थिक दृष्टि मजबूत और व्यापारिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना दियाl यह राजा की आय का मुख्य स्रोत थाl इसी क्षेत्र के सागर खेडू अपनी वीरता हेतु मशहूर थेl आज भी यहाँ के कारीगर समुद्री जहाज बनाते हैंl यहाँ खजूर, चीकू और नारियल की पैदावार होती हैl

9- खड़ीर – कच्छ के सफ़ेद रन के दलदल के बीच का यह क्षेत्र द्वीप थाl मानसून में चारों तरफ पानी भरने पर इसका सम्पर्क टूट जाता थाl इस क्षेत्र को अभेद सुरक्षा चक्र भी कहा जाता थाl धोलावीरा इसी क्षेत्र में हैl और आज सरकार ने इसे रोड टू हेवन नमक सड़क से जोड़ दिया हैl

10- मोथाडा – भुज और अबडासा के बेच का यह क्षेत्र बाजरा और ज्वार की पैदावार करता थाl

11- प्रांथल – आज यह रापर और भाचाऊ का क्षेत्र हैl व्यापारिक मार्ग होने से यहाँ राजा ने विशेष चौकीयाँ बनवाई थींl

12- प्रवर – रण के पास का यह क्षेत्र जिसकी जमीन में नमक की मात्रा अत्यधिक होने से यहाँ की भूमि बंजर बन गईl यहाँ लखपथ का किला थाl इस किले पर राजपूत सेना प्रति प्रहर पहरा देती थीl पहले यहाँ बंदरगाह था जहाँ सिंध और गुजरात के व्यापारी व्यापार करने आया जाया करते थेl नारायण सरोवर आज भी यहाँ का मुख्य पर्यटल स्थल हैl

—- क्रमशः

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४६ ⇒ दिव्य मौन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिव्य मौन …“।)

?अभी अभी # १०४६ ⇒ आलेख – दिव्य मौन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमें भव्य की आदत है, दिव्य की नहीं। भव्य का पड़ोसी आलीशान है।

हमें चमक और जगमगाहट आकृष्ट करती है, मोमबत्ती का प्रकाश नहीं। जो मज़ा हंसते गाते, गुनगुनाते जिंदगी गुजारने में है, वह एकाकी जीवन बिताने में कहां।

किसी की चुप्पी हमें काटने को दौड़ती है, विशेषकर उस व्यक्ति की, जो हमेशा बोलता चालता रहता है, महफिलों को रोशन करते रहता है। दो अंतरंग मित्र अगर बहुत देर से चुपचाप बैठे हों, तो अनायास ही एक कह उठता है, कुछ तो बोलो, कुछ तो बात करो।

कक्षा में छात्र से मास्टर जी द्वारा कोई प्रश्न पूछे जाने पर जब कोई जवाब नहीं मिलता तो मास्टर जी यही कहते नजर आते हैं, कुछ जवाब क्यों नहीं देते, क्या सांप सूंघ गया है।।

बिना बोले रहने की हमें आदत नहीं। ईश्वर ने जबान बोलने को दी है, दो प्रेम के मीठे शब्द बोलने अथवा किसी के हाल चाल पूछने में क्या हमारी जबान घिस जाती है। लानत है ऐसे लोगों पर, जो हर पूछे सवाल का जवाब सिर्फ हां ना में ही देते हैं। इतनी कंजूसी भी किस काम की ! अंदर स्टॉक भरा हो, और जबान पर ताला लगा रखा हो।

किसी से नाराज होने पर हम उससे बात नहीं करते। जा, तोसे नहीं बोलूं कन्हैया, राह चलत, पकड़ी मोरी बैंया। लेकिन यह रूठना मनाना मौन का हिस्सा नहीं होता। जब नाराजी खत्म होती है, तो शिकायतों का अम्बार लग जाता है। कसम, वायदों और माफी के बाद ही मामला सुलझता है।।

मौन एक चित्त की अवस्था है। यह एक प्रकार की साधना भी है। दुख एवं अवसाद के क्षणों में भी हमें किसी से बात करने का मन नहीं होता। कुछ लोग, जब गुस्से में भरे हुए होते हैं तो एकाएक बोलचाल बंद कर देते हैं।

हमारे परिवारों में फूफाजी बहुत बदनाम हैं, बात बात पर गुस्सा करने, बात नहीं करने, और मुंह फुलाने में।

उनको मनाना एक असंतुष्ट नेता को मनाने से भी मुश्किल काम होता है। बहुत भाव खाते हैं अक्सर ये फूफा लोग।

गुस्से के अलावा व्रत के रूप में भी लोग मौन धारण करते हैं। इसे मौन व्रत भी कहते हैं। यह मन और जिव्हा पर संयम के लिए किया जाता है। साधारण लोगों के लिए आसान नहीं होता यह मौन व्रत। चौबीस घंटे फोन पर बात करने वालों के फोन की जब घंटी बजती है, तो एक तरह से उनकी घंटी बज जाती है। जब कभी कभी लगातार घंटी बजती रहती है तो वे आवेश में आकर, फोन उठाकर साफ साफ बोल ही देते हैं, हेलो, देखिए मेरा मौन व्रत चल रहा है। आगे से मुझे फोन ना करें।।

जो अधिक व्यस्त और गणमान्य होते हैं, उनका जब इशारों से काम नहीं चलता तो एक स्लेट अथवा काग़ज़ कलम का सहारा लेना पड़ता है। लोग उनके मौन के कई अर्थ लगा लेते हैं। सरकारें खतरे में पड़ जाती हैं। घर में कोहराम मच जाता है। मौन में भी संवाद कितना जरूरी होता है, यह एक मौन धारण करने वाला ही जान सकता हैं।

आइए, अब दिव्य मौन में चलें ! यहां कोई शब्द नहीं होता, कोई विचार नहीं होता, कोई संकेत अथवा किसी तरह की प्रकट अथवा अप्रकट अभिव्यक्ति नहीं होती। यह केवल बाहरी नहीं, अंतस का भी मौन होता है। अक्सर होता यह है कि हम तो मौन धारण कर लेते हैं, लेकिन हमारा मन तो मुक्त है, वह तो आपसे सतत वार्तालाप करता ही रहता है और मन ही मन आप उसको जवाब भी देते ही रहते हो।।

दिव्य मौन, मन से भी पार जाने की अवस्था है। यहां ना कोई बोलने वाला होता है और ना कोई सुनने वाला। शायद कबीर की इसी आध्यात्मिक अनुभूति को पंडित कुमार गंधर्व ने इस तरह प्रकट किया है ;

सुनता है गुरु ज्ञानी, गुरु ज्ञानी

गगन में आवाज हो रही झीनी झीनी झीनी झीनी

पहिले आए आए पहिले पाए

नाद बिंदु से पीछे जमया पानी पानी हो जी ….

सुनता है गुरु ज्ञानी

कबीर हो अथवा कोई भी दिव्य सत्पुरुष, सभी आध्यात्मिक उपलब्धियां और उपदेश दिव्य मौन में ही प्रकट होते हैं। अंतर्चेतना ही अंतर्गुरु है, बाहरी गुरु तो निमित्त मात्र है। दिव्य मौन का उपदेश ही एक साधक को गुरु पूर्णिमा का उपदेश है।

आइए मन के पार चलें इस गुरु पूर्णिमा पर, बस हम आप और दिव्य मौन।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥
© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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