हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०२ ⇒ सत्य सनातन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सत्य सनातन।)

?अभी अभी # ९०२ ⇒ आलेख – सत्य सनातन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्रेम की ही तरह ढाई अक्षर के सत्य के बारे में भी सब कुछ साफ, स्पष्ट और उजागर है, जैसा कि हमारे पंडित नरेन्द्र शर्मा ने उद्धोषित किया है, सत्य ही शिव है, सत्य ही सुंदर है, सत्यं, शिवम्, सुंदरम् और सत्य की सदा विजय होती है और अगर सत्य सनातन हो तो सोने में सुहागा। तेरी जय हो, महाविजय हो।

सत्य और प्रेम का भले ही कोई कॉपराइट ना हो लेकिन सनातन के बारे में आपका क्या कहना है।

सभी जानते हैं कि सत्य और प्रेम की तरह जो शाश्वत है, वही सनातन है। सत्य की खोज पर कई ग्रंथ उपलब्ध हैं लेकिन सनातन खोजा नहीं जा सकता। न ये ज़मीं थी, न आसमां था, मगर ये सच है, सत्य सनातन फिर भी वहां था।।

आपके पास जो आएगा, वो जल जाएगा ! सूर्य एक आग का गोला है, हमारी धरती माता भी सूर्य का ही एक अंश तो है, इस हिसाब से हम भी सूर्य पुत्र ही हुए। वैज्ञानिक चांद पर पहुंचकर खुश हो गए, और थोड़ा अंतरिक्ष में घूम फिर लिए, अब क्या बाल हनुमान बनने का इरादा है। कभी सोचना भी मत। बहुत यान और पक्षेपास्त्र हवा में उड़ा लिए, पहले जरा हवा में उड़ना तो सीख लो, फिर हमारे सूर्यनारायण को चुनौती देना। ऐसा कोई फायरप्रूफ जैकेट अभी पैदा नहीं हुआ, जो सूरज जैसे आग के गोले के आसपास भी फटक सके।

जब धरती पर ज्वालामुखी फटता है तब विज्ञान कहां जाता है।

सूर्य को सविता भी कहते हैं, ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरैण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात्। जिस तरह गणेश जी ने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा की जगह, अपने माता पिता की ही परिक्रमा कर ली, उसी तरह आप केवल गायत्री मंत्र और सूर्य नमस्कार के जरिए सूर्य की परिक्रमा कर सकते हैं।।

लो जी, भरोसा नहीं होता।

जिस परम ब्रह्म से इस ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है, वह घट घट व्यापक है। हम यहां किसी को अणु परमाणु का ज्ञान नहीं बांट रहे। आज के युग में सतयुग की बातें शोभा नहीं देती। यह अवतार और चमत्कार का युग है। कोई दसवें कल्कि अवतार की राह देख रहा है तो कोई किसी मसीहा की। कोई दुआ कर रहा है कि खुदा करे कि कयामत हो, और तू आवे।

भले ही हम कलयुग में हों, हमारे आदर्श आज भी सतयुग, त्रेता और द्वापर के ही हैं। आपस में ही अवतार अवतार का खेल खेलकर खुश हो लेते हैं। कष्ट इतने हैं कि कहे नहीं जाते। जो सुन ले, वही हमारा मसीहा, हमारा परमात्मा। एक बेरोजगार दस जगह अर्जी लगाता है, जहां मंजूर हो गई, वहां की चाकरी शुरू। अगर स्टार्ट अप में खुद का धंधा चल निकला तो वारे न्यारे, वर्ना हम खानाबदोश जनम जनम के बेचारे।।

आज के भौतिकवादी युग में न तो हमें सत्य खोजने की फुर्सत है और न ही ईश्वर के अनुसंधान की।

जिधर से बुलावा आ जाता है, हम चले जाते हैं। ओशो आए और चले गए, कृष्णमूर्ति भी बहुत कुछ देकर चले गए, लेकिन भक्तों और जिज्ञासुओं की प्यास बुझने का नाम ही नहीं ले रही। श्रीश्री रविशंकर सुदर्शन क्रिया लेकर चले आए तो बाबा रामदेव पूरा पतंजलि ही उठा लाए।

आज चित्रकूट के घाट पर सभी संतों की भीड़ जमा है। हमेशा की तरह कुछ विरोध की लहर जरूर उठ रही है लेकिन समर्थन की आंधी इस बार ऐसी उठी है कि सब कुछ आर पार हुआ लगता है। इस बार धर्म ध्वजा हिंदुत्व की नहीं, सनातन धर्म की है।

किसी भी प्रोडक्ट को अगर नया पैकेज और ब्रांड दे दिया जाए, तो उसकी मार्केटबिलिटी बढ़ जाती है। हमें सनातन पसंद है।

मार्केट रिपोर्ट और कई संतों, बुद्धिजीवियों के प्रमाण पत्र भी इस सनातन धर्म के पक्ष में आ चुके हैं। सनातन ही सत्य है, सत्य ही सनातन है। आपका क्या खयाल है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७५ ☆ वर्ल्ड वेटलैंड डे… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना वर्ल्ड वेटलैंड डे। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २७५ ☆ वर्ल्ड वेटलैंड डे…

प्रकृति की सबसे शांत भाषा पानी है।जहाँ पानी ठहरता है, वहीं जीवन आकार लेता है। नदियाँ, झीलें, तालाब, पोखर और दलदली भूमि-इन्हें ही वेटलैंड्स कहा जाता है।

ये केवल जलस्रोत नहीं हैं, बल्कि प्रकृति की नाज़ुक जीवनधारा हैं। हर वर्ष 2 फ़रवरी को वर्ल्ड वेटलैंड डे मनाया जाता है, ताकि हम यह समझ सकें कि वेटलैंड्स की रक्षा करना,असल में जीवन की रक्षा करना है। पानी जहाँ थमता है,वहीं जीवन बोलता है…

वेटलैंड्स पक्षियों का आश्रय हैं,मछलियों का घर हैं, मिट्टी को उपजाऊ बनाने का आधार हैं और पर्यावरण को संतुलित रखने की अदृश्य शक्ति भी।

जब हम अपने गार्डन में नमी भरी मिट्टी देखते हैं, फूलों पर मंडराती तितलियाँ देखते हैं, या चिड़ियों को पानी पीते देखते हैं, तो यह सब हमें वेटलैंड्स के महत्व की याद दिलाता है। हर छोटा गार्डन, प्रकृति का एक मौन संदेश होता है। गार्डन केवल सौंदर्य नहीं है, वह प्रकृति से जुड़ने का माध्यम है। थोड़ा-सा पानी, थोड़ी-सी मिट्टी और थोड़ा-सा प्रेम। बस इतना ही चाहिए जीवन को पनपने के लिए। आज जब शहरीकरण बढ़ रहा है, तालाब सूख रहे हैं, और नदियाँ सिमटती जा रही हैं। तब यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि हम अपने स्तर पर प्रकृति को सँभालें।

प्रकृति विशाल है, पर उसकी साँसें बहुत नाज़ुक हैं। पानी की बचत करना, हरियाली बढ़ाना, अपने गार्डन को जीवंत रखना। ये छोटे-छोटे प्रयासवेटलैंड्स संरक्षण की दिशा में बड़ा योगदान बन सकते हैं। वर्ल्ड वेटलैंड डे हमें यही सिखाता है कि प्रकृति हमसे कुछ माँगती नहीं, बस समझदारी चाहती है। जहाँ वेटलैंड्स जीवित हैं, वहीं भविष्य सुरक्षित है।

प्रकृति से जुड़ना केवल पर्यावरण की चिंता नहीं,यह आत्मा की शांति का मार्ग भी है। जो इसे सहेजता है,वह अनजाने में स्वयं को भी सहेज लेता है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०१ ⇒ कढ़ाव का दूध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कढ़ाव का दूध।)

?अभी अभी # ९०१ ⇒ आलेख – कढ़ाव का दूध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आपके रसोईघर में रोटी बनाने का लोहे का तवा भी होगा और सब्जी बनाने वाली कढ़ाई भी। चाय बनाने और दूध गर्म करने के लिए भी हमारे पास अलग बर्तन होते हैं। कुछ बर्तन बड़े होते हैं और कुछ छोटे। विशेष आयोजनों के लिए हलवाई और बड़े बड़े भगोने, कढाई और परात की व्यवस्था होती थी। जमीन में गड्ढा खोदकर भट्टी बनाई जाती थी। पत्तल दोने और पंगत का जमाना था वह।

बाहर होटलों में खाने का प्रचलन कम था। बस कुछ दूध, दही और मिठाई नमकीन की दुकानें ही शौकीन लोगों का खर्चीला व्यसन था। दूध जलेबी का इतिहास पोहे से अधिक पुराना और पौष्टिक है।

वह जमाना अमूल और सांची का नहीं था। घर घर दूध की बंदी लगी रहती थी और हर मोहल्ले में दूध दही की दुकानें मौजूद रहती थी।।

चौराहों और मोहल्लों के नुक्कड़ों पर सुबह शाम इन्हीं दूध और मिठाई की दुकान के बाहर एक आग उगलती भट्टी पर खौलते दूध का बड़ा सा कढ़ाव देखा जा सकता था, जिसमें पानी में काई की तरह, सफेद सफेद मोटी मलाई देख, मुंह में पानी आ जाता था। इधर कढ़ाव में गर्मागर्म दूध और उधर एक कड़ाही से निकलती रस भरी असली घी की जलेबियां। बस यही हमारा ब्रेड एंड बटर था, ब्रेकफास्ट था और सुबह का नाश्ता भी।

दिसंबर की सर्द रातें हों अथवा गर्मियों की शबे मालवा, दूध के ये कढ़ाव शहर की रौनक में चार चांद लगा देते थे। लकड़ी की बड़ी सी बेंच पर बीच बाजार में सौ ग्राम रबड़ी मारकर, मलाई वाला दूध, अगर आपने नहीं पीया तो क्या जिंदगी जी। दूध इतना गर्म कि फूंक मारो तब भी जबान जल जाए, लेकिन दूध का स्वाद ऐसा कि कहीं जान ही ना निकल जाए।।

रात को भोजन के बाद, तब का आम इंदौरी, घर में नहीं बैठता था, सराफे की ओर रुख करता था। दिन भर की मेहनत के बाद सराफे में उसे सोने चांदी की नहीं, कुछ मीठे की तलाश होती थी। डिनर के बाद डेजर्ट तो बनता ही है। और कुछ नहीं तो कढाव का दूध ही सही। वैसे भी रात का दूध स्वास्थ्यवर्धक होता है।।

आज सभी नगर महानगर हो गए हैं। एक एक इंच जमीन पर भू – माफियाओं का कब्जा है। सड़क पर अब इतनी जगह नहीं कि, अतिक्रमण कर दुकान के आगे दूध का कढ़ाव लगाया जा सके। स्मार्ट सिटी मॉल और ट्रेड सेंटर के लिए होती है, दूध के कढ़ाव के लिए नहीं। KFC और पिज़्ज़ा, बर्गर, मैगी, सैंडविच के जमाने में दूध और वह भी मलाई वाला ? अच्छे बच्चे आजकल दूध में मलाई नहीं पीते। सिर्फ आइसक्रीम खाते हैं।

हमारे प्रदेश की नई आबकारी नीति शराब को भी आब ही मानकर चल रही है। पानी भले ही महंगा हो, शराब सस्ती होनी चाहिए। शहर से लोग आजकल वैसे ही दूर हैं, अच्छा है, नशे में भी चूर रहें। करोड़पति बनें, घर में ही बार खोलें। आप क्या दूध पीते बच्चे हैं, जो भरे बाजार में जाकर कढ़ाव का दूध पीकर प्रदश की मद्य नीति की अवहेलना करेंगे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ प्रस्थान ज्ञानरंजन का… मिलते रहेंगे ज्ञानरंजन! ☆ श्री रविकान्त वर्मा ☆

श्री रविकान्त वर्मा

 

☆ आलेख ☆ प्रस्थान ज्ञानरंजन का… मिलते रहेंगे ज्ञानरंजन! ☆ श्री रविकान्त वर्मा ☆

ज्ञानरंजन

ज्ञानरंजन उन विरल लेखकों  में थे जिन्हें अपने जीते जी अपनी कृतियों को क्लासिक में बदलते देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। लगभग पच्चीस कहानियों में कम- से – कम दर्जन भर कहानियाँ निश्चित रुप से हिन्दी की कालजयी कहानियाँ हैं। इन पर लिखा गया है और आगे भी लिखा जाता रहेगा।

 विचारक:- श्री सुरेश पांडेय

एक ऐसा कथाकार जिसे अलविदा कह पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है। वैसे भी ज्ञानरंजन अपनी रचनाओं से इतर अपनी जीवंत अभिव्यक्तियों में, अपने लेखन की विशिष्ट शैली में, अपने बेलौस और बिंदास अंदाज में और सबसे ज्यादा एक मोटीवेटर या उत्प्रेरक के रुप में लोगों के दिलों में  बसे थे, बसे हैं, बसे रहेंगे।

ज्ञानरंजन आज के दौर की तरह के व्यावसायिक वक्ता या मोटीवेशनल स्पीकर भी नहीं थे। वो तो किसी को भी अपनी बातों से अंतरतम की गहराईयों तक छू जाते थे। साहित्यिक शब्दावलियों और अपने प्रेरक तर्कों से किसी भी उम्र के व्यक्ति को जिसमें स्त्री- पुरुष सब शामिल हुआ करते थे, ज्ञानरंजन उनकी अभिप्रेरणा बन जाते थे।

अक्सर लोग किसी के होने और न होने में उसकी तलाश और पड़ताल किया करते हैं। ज्ञानरंजन इसके अपवाद हैं। वो तो हमें हमेशा मिलते रहेंगे!

अपनी विशिष्ट लेखन शैली में! अपनी वक्तृत्व कला की प्रति ध्वनियों में! अपनी सहजता और सरलता में!

हर किसी के लिए हर वक्त आसानी से उपलब्ध होने के अंदाज में!

असाधारण सादगी में और किसी भी श्रेय से दूर रहने की दुर्लभ इच्छाशक्ति में दिखाई देंगे ज्ञानरंजन! 

अकोला में जन्मे, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में शिक्षा के संस्कार मिले और फिर जबलपुर में उन्होंने अपने अनुभवों को शाब्दिक विस्तार दिया। आगे चलकर इस विद्रोही कामरेड ने परंपरागत लेखन की अलग शैली में विचारों को कलमबद्ध करना शुरू किया।

नौकरीपेशा ज्ञानरंजन हिन्दी के प्रोफेसर थे। वैसे किसी भी लेखक के लिए उच्चतर शिक्षा का कोई ज्यादा या खास महत्व नहीं होता है। अनुभवों और बेहतर सामान्य बोध ही अच्छे लेखक होने की अनिवार्य शर्त मानी जा सकती हैं जो ज्ञानरंजन के पास भरपूर मात्रा में थी या कहें वे इसके धनीधोरी थे।

तभी तो बीसवीं सदी के साठ के दशक में लिखीं उनकी कहानियाँ तब के साहित्य समाज के लिए एक सनसनी का विषय होने के बावजूद आज अमरत्व पा चुकीं हैं।उनकी लिखीं गिनती की कुछ कहानियों ने ज्ञानरंजन के दृष्टि बोध का व्यापक परिचय दे दिया था।

उनकी सोच के कैनवास पर विचारों की अदभुत व्यापकता दीख पड़ती थी।समय के अनुरूप समाज के और मानवीय रिश्तों की पड़ताल में वो बेहद दक्ष थे।वस्तुतः आरंभिक दौर में या कहें किशोर वय और युवावस्था के दौर में वे एकाकी चिंतक और वैश्विक साहित्य के अध्येता रहे थे। जिनमें वे जीवन मूल्यों और मानवीय रिश्तों के विरोधाभास ढूंढा करते थे। परिष्कृत भाषायी संस्कार तो उन्हें विरसे में  विश्व साहित्य के नामचीनऔर हिन्दी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न हस्ताक्षर  स्व.रामनाथ “सुमन” से मिले थे।जो उनके पिता थे।

कालांतर के साथ उन्होंने स्वयं उसे तराशना शुरू किया। फिर तो साहित्य और शब्दशक्ति के उच्चतर सोपानों का स्पर्श करते हुए ज्ञानरंजन ने स्वयं की एक शैली निर्मित की। जो अनूठी और अतुलनीय थी और बेहद प्रभावी भी!

प्रख्यात लेखक निर्मल वर्मा ने भी उनके शब्द विन्यासों की ताकत और भावार्थ को अनेक मंचो से सराहा था। उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक कबाड़ खाना इसका एक उत्कृष्ट प्रमाण है। संस्कार धानी में उनकी एक बड़ी फैन फालोइंग है पर कहने में जरा भी गुरेज़ नही कि लेखकों की एक बेहद पकी हुई फसल भी उनके लेखन के समकक्ष नहीं पहुंच पाई है। यही ज्ञानरंजन का वैशिष्ट्य है।

पिछली सदी की जिन तीन साहित्यिक विभूतियों ने शहर जबलपुर को वैश्विक पहचान दी उस कड़ी के ये आखिरी स्तंभ थे।

छायावादी कविता के कुछ शेष बचे रचनाकारों में एक रामेश्वर शुक्ल  “अंचल” और अपने धारदार व्यंग्य और सामाजिक और वैयक्तिक विसंगतियों को उधेड़ने वाले हरिशंकर परसाई तो हमें पिछली यानि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ही छोड़ कर जा चुके हैं।

पर ज्ञानरंजन नयी सदी के एक चौथाई हिस्से तक पूरी सक्रियता और तत्परता से हिन्दी साहित्य की उपादेयता और सार्थकता सिद्ध करने की कोशिशों में लगे रहे।

उनमें न तो नायकत्व का आग्रह था और न ही महत्वपूर्ण समझे जाने की कोई अतिरिक्त लालसा।

प्रोफेसर रहते हुए भी वे छात्रों को अचंभित करते थे। धाराप्रवाह में हिन्दी के किसी भी विषय पर  उनका आख्यान विद्यार्थियों को हतप्रभ और आल्हादित कर देता था। न केवल भारतीय छात्र वरन् विदेशी  विद्यार्थी भी उनके घर पहुंच जाया करते थे।

उनका व्यक्तित्व अंग्रेज कवि लार्ड बायरन और कथाकार – नाटककार ऑस्कर वाइल्ड की तरह दुर्निवार आकर्षण से युक्त था। उनमें अप्रतिम चुम्बकीय आकर्षण था। वे एक साथ अभिभूत और आल्हादित दोनों करते थे।  लोग उनसे मिल कर गौरवान्वित महसूस करते थे। यहाँ तक कि उनसे मिलकर लोग दूसरों से पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते मैं ज्ञान जी से कहकर आपका काम करवा दूंगा। और वे अपने ऊपर अतिरिक्त दबाव लेकर कोई भी काम पूरा करने की जद्दोजहद में जुट जाया करते थे।

अपने समय से आगे के लोगों में उनका शुमार किया जा सकता है। वे उपदेशक भी नहीं थे। हमेशा जीवन के शाश्वत सच्चेपन के साथ ही अभिव्यक्त होते थे। तभी तो वे लोगों के दिलों को छू लिया करते थे।

और शायद कोई भी जटिल काम उनकी सादगी और करिश्माई जनसंपर्क से पूरा भी हो जाया करता था।

ये काम किसी के रोजगार से जुड़े हो सकते थे। या फिर लेखकीय पहचान या फिर लव मैरिज और कन्यादान के भी हुआ करते थे। संगीत, पेटिंग एक्टिंग, स्वर साधना से जुड़े कलाकार और फोटोग्राफी से जुड़े लोग भी हमेशा उनके ईर्द गिर्द रहा करते थे। उनका पत्र व्यवहार अनूठा था आज के मोबाइल नेटवर्क से भी ज्यादा मजबूत और बेहद कारगर!

उनके जनसंपर्क का का कैनवस बहुरंगी, विविधतापूर्ण और व्यापक था।

साहित्य और मीडिया की प्रभावी हस्तियों पर उनका नाम तारी रहता था।

एक बेफिक्र जीवनशैली, एक लापरवाह पर संवेदनशील सोच और कभी सधा हुआ तो कभी अनगढ़ से जीवनयापन की बदौलत ज्ञानरंजन तैयार हुए थे।

वे कभी उनमुक्तता तो कभी दायरों वाली सोच के साथ आगे बढ़ते रहे। जो अमूमन सबके साथ ही घटित होता है।

पढ़ना और सिर्फ अच्छा पढ़ना उनका प्रिय शगल था। मानवीय रिश्तों की पड़ताल में मसरुफ़ियत कुछ ज्यादा ही थी। उनका समग्र व्यक्तित्व सह अस्तित्व बोध

 का प्रतीक और उसके उत्कर्ष से भी आप्लावित था।

युवा ज्ञानरंजन में भी उस दौर के युवाओं की तरह प्रेम के लिए अतिरेक और प्रबल आग्रह भी थे। यही वजह है जीवन संगिनी भी आग्रहों के इसी उहापोह से ही हासिल हो सकी।

वैसे भी एक अच्छा जीवनसाथी आपके किसी भी प्रशस्तिपत्र से कम नहीं होता है। ज्ञान जी इस मामले में सौभाग्यशाली रहे। अस्सी पार की सुनयना ज्ञानरंजन अब उनकी भाव संपदा के  साथ एकाकी हैं। लेकिन चौबीस कैरेट का साथ तो वो निबाह चुकीं हैं।

जहाँ तक उनके लेखन की बात की जाए तो कह सकते हैं वो व्यावसायिक लेखक नहीं थे। न तो वो सेलेबल थे न ही सेलिब्रिटी। वो तो सहज अनुभूतियों को लयबद्धता से वाक्यों में बदलते थे। फेंस के आसपास से वैश्विक सोच तक उनकी अनुभूतियों का दायरा था। उनका समय पारंपरिक लेखन का समय था न कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का। ज्ञानरंजन ने उसी परंपरा को विस्तार दिया। नया शिल्प दिया। अनूदित वैश्विक और भारतीय साहित्य की पत्रिका “पहल” का कुशल और सार्थक समायोजन इसका प्रत्यक्ष  प्रमाण है।

सदी के बदलते ही इस तरह का लेखन हाशिये में और शेल्फों की शोभा बन कर रह गया था। लेखन शैली मोबाइल की भाषा शैली में बदलने लगी ! कंटेंट और ब्लॉग लेखन शुरू हो गया था।ब्रॉडकास्ट पर पॉडकास्ट भारी पड़ने लगा तब ज्ञानरंजन सरीखे उमदराज़ लेखकों के लिये ये बौद्धिक संक्रमण का समय बन गया था । सिनेमा में भी बुजुर्ग फिल्म मेकर्स कैमरे के पीछे से हटने लगे थे।

पर इससे परंपरागत लेखन और उसके समकालीन बनीं फिल्मों का औचित्य कम नहीं होता है और न ही फीका पड़ता है। हर रचनात्मक प्रयास अपने समय का सच होता है। और ये भी सच है कि हर व्यक्ति अपने समय को ही जीता है।

ज्ञानरंजन ने भी अन्यान्य की तरह अपने समय को जिया और भरपूर जिया।

एक अविस्मरणीय यात्रा थी ज्ञानरंजन की वो भले ही थम चुकी है पर कहते हैं न किसी का भी कोई विकल्प नहीं होता है। ज्ञानरंजन का भी कोई विकल्प नहीं होगा।

लेखन अपना कलेवर बदलेगा, तकनीक बदलेगी, कंटेंट बदलेगा, लेखक बदलेंगे लेकिन जिस तरह ट्रेन आगे बढ़ती रहती है पर स्टेशन अपनी खासियत के साथ वहीं खड़े रहते हैं। ज्ञानरंजन एक जंक्शन बन कर हमेशा खड़े रहेंगे।

वे एक कथा लेखक थे।”कथाकार” शब्द उनकी पहचान था। उनकी कथा पूर्णविराम के साथ पूरी हो चुकी है।

अब तो बरसों-बरस ज्ञानरंजन पर सिर्फ उपसंहार लिखे जाते रहेंगे।

साहित्य के माध्यम से विश्व संस्कृति को ज्ञानरंजन का अवदान अतीत और व्यतीत दोनों का अतिक्रमण करता है। साथ ही कालातीत और कालजयी की नयी परिभाषा गठन की अप्रतिम चुनौती देता है। ज्ञानरंजन के अस्तित्व का यही औचित्य है और यही उसकी सात्विक सार्थकता भी!

पुलिसवाला परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि। 

आलेख – श्री रविकान्त वर्मा

मो.न.:- 9589972355

साभार – श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३९७ ☆ न्यूयॉर्क से ~ आलेख – “दादा कैलाश चंद्र पंत, भोपाल को पद्मश्री की घोषणा पर” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९७ ☆

? न्यूयॉर्क से ~ आलेख – “दादा कैलाश चंद्र पंत, भोपाल को पद्मश्री की घोषणा पर” ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री कैलाशचंद्र पंत हिंदी पत्रकारिता, भाषा सेवा और सांस्कृतिक चेतना के ऐसे वरिष्ठ पुरोधा हैं, जिन्होंने भोपाल को न सिर्फ राजनीतिक राजधानी, बल्कि साहित्यिक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में पहचान दिलाने में निरंतर महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। महू (जिला इंदौर) में 26 अप्रैल 1936 को जन्मे पंत जी ने एमए, साहित्याचार्य तथा साहित्य रत्न जैसे उच्च साहित्यिक उपाधियों के माध्यम से अपने अध्ययन को सुदृढ़ आधार दिया और आगे चलकर उसी विवेकपूर्ण दृष्टि को उन्होंने लेखन, संपादन तथा संस्थागत विकास से जोड़ा।वे मूलतः ऐसे रचनाशील पत्रकार और साहित्यसेवी हैं, जिन्होंने हिंदी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज, शिक्षा, संस्कृति और जनजागरण की धारदार शक्ति में रूपांतरित किया है।

भोपाल में रहते हुए कैलाशचंद्र पंत ने यहाँ की साहित्यिक गतिविधियों, गोष्ठियों और वैचारिक विमर्श को नई दिशा दी।वे भोपाल से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका “अक्षरा” के संपादक के रूप में लंबे समय तक सक्रिय रहे, जहाँ उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों को मंच दिया और समकालीन मुद्दों पर सार्थक बहसों को प्रोत्साहित किया।

उनकी संवाद शैली सरल, स्पष्ट और लोकाभिमुख रही, जिसके कारण वे आम पाठक, रचनाकार और श्रोता सभी के बीच प्रिय बने।

कैलाशचंद्र पंत का एक बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भाषा सेवा को संस्थागत स्वरूप दिया। वे मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में मंत्री संचालक की भूमिका निभाते हुए हिंदी के प्रचार प्रसार के अनेक कार्यक्रमों से जुड़े रहे और नए लेखकों, विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए सतत प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।भोपाल स्थित हिंदी भवन न्यास और कृषि भवन जैसे सांस्कृतिक–बौद्धिक केंद्रों के विकास में उनकी भागीदारी उल्लेखनीय रही, जिससे साहित्यिक कार्यक्रमों, विमर्शों और सांस्कृतिक आयोजनों को स्थायी मंच प्राप्त हुआ। महू में स्थापित स्वध्याय विद्यापीठ के माध्यम से उन्होंने शिक्षा, भारतीय संस्कृति और जीवन–मूल्यों के प्रसार की जो पहल की, उससे असंख्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने लाभ उठाया और एक वैचारिक अनुशासन की परंपरा विकसित हुई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कैलाशचंद्र पंत ने हिंदी और भारतीय संस्कृति की गरिमा को सुदृढ़ किया। भारत सरकार और मध्यप्रदेश शासन के प्रतिनिधि के रूप में वे विभिन्न देशों की साहित्यिक यात्राओं पर गए और विश्व हिंदी सम्मेलनों सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी भाषा की सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। इससे उन्हें वैश्विक साहित्यिक पहचान तो मिली ही, साथ ही प्रवासी भारतीय समुदाय में हिंदी के प्रति आत्मविश्वास भी जागृत हुआ।उनकी इस बहुआयामी साधना को देखते हुए उन्हें पूर्व में अनेकों  सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है, जबकि हाल में भारत सरकार द्वारा वर्ष 2026 के लिए पद्मश्री अलंकरण हेतु उनके चयन ने मध्यप्रदेश और हिंदी जगत – दोनों का मान बढ़ाया है।

आज कैलाशचंद्र पंत केवल एक वरिष्ठ पत्रकार या हिंदी सेवी नहीं, बल्कि एक लोकसंग्रही, अध्ययनशील और विनम्र व्यक्तित्व के रूप में हमारे सामने हैं, जिनके जीवन–कर्म पर “संघर्ष से विजयपथ की ओर” जैसी पुस्तकों के माध्यम से विस्तार से प्रकाश डाला गया है।उनकी साधना यह संदेश देती है कि यदि भाषा को समाज, शिक्षा और संस्कृति से जोड़ा जाए तो वह मात्र विषय न रहकर जनचेतना की धारा बन जाती है। भोपाल के साहित्यिक परिदृश्य में पंत जी की उपस्थिति एक ऐसा स्थायी स्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों को हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता, ईमानदारी और सामाजिक सरोकार का पाठ पढ़ाती रहेगी।

उन्हें पद्मश्री सम्मान भोपाल के हिंदी जगत का सम्मान है। उनसे जुड़े हम साहित्य प्रेमियों के लिए गर्व का पल है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९०० ⇒ मुर्गी और अंडा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मुर्गी और अंडा।)

?अभी अभी # ९०० ⇒ आलेख – मुर्गी और अंडा ? श्री प्रदीप शर्मा ?

सुबह सुबह मुर्गा बांग देता है और मुर्गी अंडा ! मुर्गा अगर दुनिया को जगाने का काम करता है तो मुर्गी सुबह अंडा दे, सबके लिए सुबह का नाश्ता तैयार करती है। जो मुर्गे की बांग से भी सुबह जल्दी नहीं उठते, वे लेट ही सही, अंडे का आमलेट ज़रूर खा लेते हैं।

स्कूल में सुबह मास्टरजी के डंडे से पहले हमारा हाथ गर्म होता था, फिर हमें सबके सामने दंड – स्वरूप मुर्गा बनाया जाता था। सह शिक्षा का अभाव होने के कारण हमें पता नहीं, लड़कियों को स्कूल में मुर्गा बनाया जाता था या मुर्गी।।

लोगों को सुबह जल्दी जगाना वैसे तो सामाजिक जागरण का ही काम है, लेकिन कुछ सोनू निगम जैसे सूर्यवंशी कलाकार, देर रात तक सुर की साधना के कारण, सुबह सुबह की मुर्गे की बांग अथवा अजान, उनकी नींद में खलल डालती है। आप जाग गए, यही बहुत है, अपनी ध्वनि के विस्तार से दुनिया को सर पर उठा लेना कहां की समझदारी है। जो बेजुबां प्राणी होता है, उसे तो इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। अज़ान का कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन बेचारा मुर्गा तो हलाल हो ही जाता है। शायद इसे ही कहते हैं, नेकी कर, फिर अपनी गर्दन आगे कर।

निष्काम कर्म करते हुए अगर आपको अपनी गर्दन भी कटवानी पड़े, तो कोई हर्ज नहीं। जो उस पे जान देते हैं, वो मरते नहीं कभी। उस पर मरना ही अपने उसूल के लिए मरना है। मुर्गे मुर्गी का त्याग कहीं लिखा जाएगा या नहीं, जब तक सूरज उगता रहेगा, मुर्गा बांग देता रहेगा, मुर्गी अंडे देती रहेगी।।

हम एक इंसान होकर वह नहीं कर पाते, जो मुर्गा और मुर्गी जानवर होकर कर गुजरते हैं। संडे हो या मंडे, रोज अंडा, चिकन और मुर्गा अपनी सेवाएं मानवता को दिया करता है।

शायद इसी से प्रेरित होकर घड़ी में सुबह की पांच बजती है और अभी अभी की शक्ल ले, रोज एक अंडा फेसबुक पर उतर आता है। यह अभी अभी उतना परिपक्व और सेहतमंद नहीं होता, फिर भी इस बहाने सुबह सुबह सृजन सुख अवश्य मिल जाता है।।

सृष्टि में कुछ नियम है, मर्यादा है। जीव जंतु तक इसी मर्यादा में बंधे हुए हैं। एक चींटी से लगाकर चिड़िया तक, सभी प्राणी, बिना गीता पढ़े अपना कर्म कुशलता से करते रहते हैं। हमारे जीवन की सार्थकता भी इसी में है कि अपने स्वार्थ से उपर उठकर, ईश्वर प्रदत्त अपनी प्रतिभा और प्रभाव का उपयोग कम से कम हमारे आसपास के संसार में तो हो।

प्यार और निष्काम सेवा से बड़ा कोई परमार्थ नहीं। शिक्षा का क्षेत्र बड़ा विस्तृत है। दीन दुखियों की दुनिया में कमी नहीं। अंतस में ज्ञान का प्रकाश हमें अपने कर्तव्य का बोध कराता है। मुर्गा बनें, जागरूकता फैलाएं, बांग दें, मुर्गी बनें, अंडे का फंडा समझें। फूल को रोज खिलना है, कोई उसे देखे, या ना देखे, सूरज को रोज उगना है, लोग चाहे लंबी तान सोते रहें। आप अभी अभी पढ़ें, अथवा कभी नहीं पढ़ें, ईश्वर करे, यह क्रम अनवरत चलता रहे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६३ – देश-परदेश – किस्सा टूटी कुर्सी का ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६३ ☆ देश-परदेश – किस्सा टूटी कुर्सी का ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अभी तक तो लोग कुर्सी ना मिलने पर परेशान रहते थे, अब तो किसी को टूटी कुर्सी मिल जाने से ही बेहद परेशानियां होने लगी हैं। मीडिया कुछ दिन से लेकर चर्चा कर रहा है। हमने भी घर की सब कुर्सियां बढ़ई से चेक करवा ली हैं। यदि गलती से कोई मेहमान आ गए और कुर्सी कुछ गड़बड़ हो तो नाहक बेज़्ज़ती हो जाएगी।

अब तो घर के बाहर कहीं भी किसी कार्यालय आदि में जाते है, तो कुर्सियों पर ही नज़र रहती हैं। कल एक राज्य सरकार के कार्यालय में जाना हुआ, तो वहां आगंतुकों के लिए रखी हुई उपरोक्त कुर्सियों का चित्र खींच लिया।

हमारी सरकारी पाठशाला में भी कुर्सियों की कील निकल जाती थी। अनेकों बार पेंट में अल ( L) आकर का चीरा लग जाता था। उस जमाने में रफ़ूगर से उसे दुरस्त कर उपयोग लिया जाता था। आजकल तो तुरंत नई पेंट ऑनलाइन दस मिनिट में उपलब्ध हो जाती हैं।

आज के युग में तो अधिकतर प्लास्टिक की कुर्सियों का चलन हो गया हैं। उसमें कील लगने का खतरा भी नहीं रहता हैं। हमने भी बैंक की नौकरी में आरंभ लकड़ी की कुर्सियों से ही किया था। कैशियर की कुर्सी सामान्य से अधिक ऊंची होती थी। समय के साथ गोदरेज की केन वाली कुर्सियां चलन में आ गई। बिना हैंडल वाली बैठने की “यू” आकर की कुर्सी बड़ी आरामदायक होती थी। पीठ और बैठने के स्थान पर केन  होने से शरीर को हवा भी मिलती रहती थी।

कंप्यूटर युग में पहिए लगी हुई कुर्सियां आ गई हैं। एक सीट से दूसरी सीट तक जाने के लिए उठने की आवश्यकता भी नहीं हैं। शरीर को और आलसी बनाने में सहायक भी हैं। अधिकारियों की श्रेणी के अनुसार कुर्सी का बजट भी होता हैं। जितना बड़ा अधिकारी होगा, उतनी ही महंगी कुर्सी पर बैठेगा।

अब लेखनी को विराम देता हूं, कुर्सी पर बैठ कर मोबाइल में लिखते लिखते थक जो गया हूं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – गणतंत्र दिवस 🇮🇳 ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – गणतंत्र दिवस 🇮🇳 ? ?

जिस भूभाग पर जन्म लेने का सौभाग्य मिला, उस गौरवशाली भूभाग अर्थात हमारे भारत का आज गणतंत्र दिवस है। अड़ोस-पड़ोस के देश इसी कालखंड में जब राजनीतिक, सामरिक अस्थिरता का शिकार होते रहे, समानता, समता और बंधुत्व को अंगीकार करने वाले संविधान के माध्यम से हम अखंड, अटूट खड़े रहे, निरंतर बड़े होते रहे।

यह यात्रा इसी भाँति चलायमान रहे, नागरिक की हैसियत से यथासंभव हमारा योगदान सदा रहे।

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🇮🇳

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Articles ☆ 🇮🇳 India at 77: The Constitution, the Republic, and the Ongoing Democratic Experiment /भारतीय संविधान, गणराज्य और लोकतंत्र के 77 वर्ष ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of HappinessHe served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🇮🇳 India at 77: The Constitution, the Republic, and the Ongoing Democratic Experiment 🇮🇳

☆ ☆ ☆ ☆

On the eve of India’s 77th Republic Day, this article invites the reader to pause and reflect on a journey that began with a bold constitutional promise and continues as a living democratic experiment. From the historic choices that shaped the Constitution to the scepticism it overcame, from remarkable achievements to uncomfortable reckonings, it traces how the Republic has endured, adapted, and asserted itself over seven decades. Neither celebratory nor cynical, this reflection seeks to understand what truly sustains Indian democracy—and what it demands from its citizens as the nation looks ahead.

☆ ☆ ☆ ☆

India became free from British rule on 15 August 1947, a day we celebrate as Independence Day. It reminds us of a long, brave, and often painful struggle for freedom, marked by sacrifice, courage, and unwavering faith in self-rule.

On 26 January 1950, celebrated as Republic Day, the Constitution of India came into force, transforming the nation into a sovereign democratic republic. It replaced the Government of India Act, 1935 as the governing document, formally ending Dominion status and establishing a republic with an elected President as the Head of State. Although the Constitution was adopted on 26 November 1949, the date 26 January was deliberately chosen to honour the Purna Swarajya (complete independence) resolution adopted by the Indian National Congress on 26 January 1930. Republic Day is therefore a moment to take pride in, and reflect upon, our great Constitution, to remember the stalwarts of the Constituent Assembly, and to honestly assess the state of our democracy.

The Indian Constitution is the longest written constitution of any sovereign country in the world. The Constituent Assembly took exactly 2 years, 11 months, and 18 days to complete the final draft. The original Constitution was neither printed nor typed; it was entirely handwritten and exquisitely calligraphed in both English and Hindi. The first draft underwent more than 2,000 amendments before finalisation. Interestingly, the Constitution of India is also among the most frequently amended national constitutions in the world. As of late 2025, it has been amended 106 times since its enactment in 1950. Its detailed and comprehensive nature means that many matters handled by ordinary legislation elsewhere require constitutional amendments in India. These frequent amendments reflect the need for the Constitution to remain a “living document”, capable of responding to the vast socio-economic and political changes of a diverse nation over more than seven decades.

Winston Churchill, the British Prime Minister at the time, expressed deep scepticism about India’s capacity to govern itself after independence. A vehement opponent of Indian self-rule, he argued that Indian leaders lacked the ability to maintain stable governance. He predicted that without British oversight, India would descend into chaos, famine, and communal violence, unable to uphold the rule of law amid its diversity. These views were most pronounced around 1947, when the Indian Independence Act was passed. Churchill denounced both Partition and self-governance as reckless experiments. Such rhetoric reflected broader imperial doubts—predictions that history has since decisively contradicted.

Contrary to these gloomy forecasts, India has demonstrated remarkable stability and growth despite its vast diversity. Peaceful transfers of power, rising literacy, economic progress, and the endurance of inclusive institutions stand out as major achievements. Together, they underline India’s resilience as the world’s largest and one of its oldest continuous democracies.

India has conducted free and fair elections since 1951, with universal adult suffrage enabling participation by over 900 million voters in recent electoral cycles. Transfers of power have taken place peacefully through constitutional means, avoiding the coups and prolonged instability witnessed in several neighbouring regions.

Democratic reforms, particularly after the economic liberalisation of 1991, accelerated GDP growth, and India today stands as the world’s fourth-largest and a flourishing economy. Stable institutions have fostered innovation, entrepreneurship, and policies aimed at inclusive and sustainable development. A vibrant civil society, an independent judiciary, and a diverse media landscape continue to uphold democratic values, even amidst persistent challenges.

India has, however, faced serious setbacks and trials that have tested the strength of its social and democratic fabric from time to time. These include the suspension of rights, censorship, detentions, and institutional erosion during the Emergency of 1975; communal violence such as the anti-Sikh riots of 1984 following the assassination of Prime Minister Indira Gandhi; the demolition of the Babri Masjid in 1992; and the Gujarat riots of 2002 after the Godhra train incident. Added to these have been instances of political corruption, major scandals, insurgencies and secessionist movements, and the criminalisation of politics.

In conclusion, it bears reiteration that the Indian Constitution guarantees fundamental rights, universal adult suffrage, and a clear Separation of Powers among the Legislature, Executive, and Judiciary, ensuring a robust system of checks and balances. In the prevailing circumstances, it is the duty of every citizen to remain vigilant against internal and external forces that seek to weaken democratic institutions or promote disorder. The continuing threat of cross-border terrorism and the risk of military escalation remain persistent challenges that demand firm and prudent responses.

Let us remain optimistic and hope that India’s economic growth will stay exceptionally strong in the years ahead, emerging as a decisive force in shaping the nation’s future—both domestically and on the global stage. India’s geopolitical influence is likely to deepen further as a digital economy powerhouse and the pharmacy of the world. Ultimately, the enduring strength of Indian democracy lies in the foundational principles laid down by the Constituent Assembly and the resilience of its institutions, sustained by the collective will of a richly diverse people.

#RepublicDay2026 #IndianConstitution #DemocracyInAction #IndiaAt77 #WeThePeople

 

🇮🇳 भारतीय संविधान, गणराज्य और लोकतंत्र के 77 वर्ष – श्री जगत सिंह बिष्ट  🇮🇳

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[8:13 am, 16/1/2026] Jagat Singh Bisht: भारत के 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर यह लेख पाठक को ठहरकर उस यात्रा पर मनन करने के लिए आमंत्रित करता है, जिसकी शुरुआत एक साहसिक संवैधानिक प्रतिज्ञा से हुई थी और जो आज भी एक जीवंत लोकतांत्रिक प्रयोग के रूप में निरंतर आगे बढ़ रही है। संविधान को आकार देने वाले ऐतिहासिक निर्णयों से लेकर उसे मिली शंकाओं पर विजय पाने तक, उल्लेखनीय उपलब्धियों से लेकर असहज आत्ममंथन तक—यह लेख बताता है कि किस प्रकार गणराज्य ने सात दशकों से अधिक समय में स्वयं को बनाए रखा, परिस्थितियों के अनुरूप ढाला और अपनी पहचान को सुदृढ़ किया। न तो अतिशय उत्सवधर्मी और न ही निराशावादी, यह विचार भारतीय लोकतंत्र को वास्तव में संबल देने वाले तत्वों को समझने का प्रयास है—और यह भी कि भविष्य की ओर बढ़ते हुए यह राष्ट्र अपने नागरिकों से क्या अपेक्षा करता है।

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भारत 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से मुक्त हुआ। इस दिन को हम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। यह हमें स्वतंत्रता के लिए हुए उस लंबे, साहसिक और कई बार अत्यंत पीड़ादायक संघर्ष की याद दिलाता है, जो त्याग, वीरता और स्वशासन में अडिग विश्वास से भरा हुआ था।

26 जनवरी 1950 को, जिसे हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं, भारत का संविधान लागू हुआ और देश एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना। इसने 1935 के भारत सरकार अधिनियम का स्थान लिया और औपचारिक रूप से डोमिनियन का दर्जा समाप्त कर एक ऐसे गणराज्य की स्थापना की, जिसमें राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष बने। यद्यपि संविधान को 26 नवम्बर 1949 को अंगीकार किया गया था, पर 26 जनवरी की तिथि जानबूझकर इसलिए चुनी गई कि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा पारित ‘पूर्ण स्वराज’ के संकल्प को सम्मान दिया जा सके। इस प्रकार गणतंत्र दिवस हमारे महान संविधान पर गर्व करने, संविधान सभा के महान सदस्यों को स्मरण करने और अपने लोकतंत्र की स्थिति का ईमानदारी से मूल्यांकन करने का अवसर है।

भारतीय संविधान विश्व के किसी भी संप्रभु देश का सबसे लंबा लिखित संविधान है। संविधान सभा ने इसका अंतिम प्रारूप तैयार करने में ठीक 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगाए। मूल संविधान न तो छापा गया था और न ही टाइप किया गया; इसे अंग्रेज़ी और हिंदी—दोनों भाषाओं में सुंदर सुलेख के साथ हाथ से लिखा गया था। प्रारूप को अंतिम रूप देने से पहले इसमें 2,000 से अधिक संशोधन किए गए। रोचक तथ्य यह भी है कि भारतीय संविधान विश्व के सर्वाधिक संशोधित राष्ट्रीय संविधानों में से एक है। 1950 में लागू होने के बाद से, 2025 के अंत तक इसमें 106 संशोधन किए जा चुके हैं। इसकी विस्तृत और समग्र प्रकृति के कारण अनेक ऐसे विषय, जो अन्य देशों में सामान्य कानूनों द्वारा निपटाए जाते हैं, भारत में संवैधानिक संशोधनों की मांग करते हैं। ये बार-बार किए गए संशोधन इस आवश्यकता को दर्शाते हैं कि संविधान एक ‘जीवंत दस्तावेज़’ बना रहे, जो सात दशकों से अधिक समय में एक विविधतापूर्ण राष्ट्र के व्यापक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों के अनुरूप स्वयं को ढाल सके।

उस समय के ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने स्वतंत्रता के बाद भारत की स्वयं शासन करने की क्षमता पर गहरा संदेह व्यक्त किया था। वे भारतीय स्वशासन के कट्टर विरोधी थे और उनका तर्क था कि भारतीय नेता स्थिर शासन बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि ब्रिटिश निगरानी के बिना भारत अराजकता, अकाल और साम्प्रदायिक हिंसा में डूब जाएगा तथा अपनी विविधता के बीच कानून का शासन कायम नहीं रख पाएगा। ये विचार विशेष रूप से 1947 के आसपास मुखर थे, जब भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित हुआ। चर्चिल ने विभाजन और स्वशासन—दोनों को ही लापरवाह प्रयोग बताया था। इस प्रकार की भाषा व्यापक साम्राज्यवादी शंकाओं को दर्शाती थी—ऐसी भविष्यवाणियाँ जिन्हें इतिहास ने बाद में निर्णायक रूप से गलत सिद्ध कर दिया।

इन निराशाजनक आकलनों के विपरीत, भारत ने अपनी विशाल विविधता के बावजूद उल्लेखनीय स्थिरता और प्रगति का परिचय दिया है। सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण, बढ़ती साक्षरता, आर्थिक उन्नति और समावेशी संस्थाओं की निरंतरता इसकी प्रमुख उपलब्धियाँ हैं। ये सभी मिलकर इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि भारत विश्व का सबसे बड़ा और निरंतर चलने वाला सबसे पुराना लोकतंत्रों में से एक है।

भारत ने 1951 से निरंतर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए हैं। हाल के चुनावों में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के तहत 90 करोड़ से अधिक मतदाताओं की भागीदारी रही है। सत्ता का हस्तांतरण संवैधानिक तरीकों से शांतिपूर्वक होता रहा है, जिससे उन तख्तापलटों और लंबे राजनीतिक अस्थिरता से बचाव हुआ है, जो कई पड़ोसी क्षेत्रों में देखने को मिले हैं।

विशेष रूप से 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद लोकतांत्रिक सुधारों ने सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि को गति दी। आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी और फलती-फूलती अर्थव्यवस्था के रूप में उभर चुका है। सशक्त संस्थाओं ने नवाचार, उद्यमिता और समावेशी व सतत विकास की नीतियों को बढ़ावा दिया है। एक जीवंत नागरिक समाज, स्वतंत्र न्यायपालिका और विविध मीडिया परिदृश्य निरंतर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते रहे हैं, भले ही चुनौतियाँ बनी रही हों।

फिर भी, समय-समय पर भारत को गंभीर झटकों और परीक्षाओं का सामना करना पड़ा है, जिन्होंने इसके सामाजिक और लोकतांत्रिक ताने-बाने की शक्ति को परखा है। इनमें 1975 के आपातकाल के दौरान अधिकारों का निलंबन, सेंसरशिप, गिरफ्तारियाँ और संस्थागत क्षरण; 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख-विरोधी दंगे; 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस; तथा 2002 में गोधरा रेलकांड के बाद हुए गुजरात दंगे शामिल हैं। इसके अतिरिक्त राजनीतिक भ्रष्टाचार, बड़े घोटाले, उग्रवाद और अलगाववादी आंदोलनों तथा राजनीति के अपराधीकरण जैसी समस्याएँ भी सामने आई हैं।

अंत में, यह दोहराना आवश्यक है कि भारतीय संविधान मौलिक अधिकारों, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच स्पष्ट शक्तियों के पृथक्करण की गारंटी देता है, जिससे नियंत्रण और संतुलन की एक मजबूत व्यवस्था सुनिश्चित होती है। वर्तमान परिस्थितियों में प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह उन आंतरिक और बाहरी शक्तियों के प्रति सतर्क रहे, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करना या अव्यवस्था फैलाना चाहती हैं। सीमापार आतंकवाद का निरंतर खतरा और सैन्य टकराव की आशंका ऐसी चुनौतियाँ हैं, जिनका सामना दृढ़ता और विवेकपूर्ण नीतियों से किया जाना चाहिए।

आइए आशावादी बने रहें और आशा करें कि आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि असाधारण रूप से मजबूत बनी रहे, जो देश के भविष्य को—देश के भीतर और वैश्विक मंच पर—निर्धारित करने वाली निर्णायक शक्ति बने। एक डिजिटल अर्थव्यवस्था के केंद्र और ‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में भारत का भू-राजनीतिक प्रभाव और गहरा होने की संभावना है। अंततः भारतीय लोकतंत्र की स्थायी शक्ति संविधान सभा द्वारा स्थापित मूल सिद्धांतों और उसकी संस्थाओं की दृढ़ता में निहित है, जिन्हें एक अत्यंत विविधतापूर्ण जनता की सामूहिक इच्छा निरंतर संबल देती है।

#RepublicDay2026 #IndianConstitution #DemocracyInAction #IndiaAt77 #WeThePeople

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© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८९९ ⇒ फूल और कांटे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूल और कांटे।)

?अभी अभी # ८९९ ⇒ आलेख – फूल और कांटे ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हमारी इस पृथ्वी पर अगर दो तिहाई जल है, तो इसके गर्भ में ज्वालामुखी भी है। कांटों और फूलों का भी चोली दामन का साथ है। फूल नाजुक होते हैं, खुशबूदार होते हैं, लेकिन समय के साथ मुरझा जाते हैं, लेकिन कांटे, बचपन में भले ही नर्म और नाजुक मिजाज़ हों, समय के साथ सख्त और नुकीले होते जाते हैं। उन्होंने शायद डार्विन को पढ़ लिया हो, सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट।

हम जब बद्रीनाथ जाते हैं, तो रास्ते में एक स्थान गोविंदघाट आता है, जहां से एक रास्ता अगर फूलों की घाटी की ओर जाता है तो दूसरा हेमकुंड साहेब ! फूलों की घाटी तक पहुंचने का रास्ता भले ही कांटों भरा ना हो, लेकिन कठिन बहुत है। लगता है फूल अपने आपको कांटों से ही नहीं, इंसानों से भी बचाना चाहते हैं। लेकिन बेचारे कांटे कहां फूलों को नुकसान पहुंचाते हैं। गुलाब के फूल के साथ कांटे तो मुफ्त में ही चले आते हैं। कांटों से हमें शिकायत है, किसी फूल को नहीं।।

मध्यप्रदेश में रतलाम के पास एक सैलाना एस्टेट है, जहां सैलाना पैलेस में ही एक कैक्टस गार्डन है। फूलों से दोस्ती है, कांटों से यारी है, ऐसी मज़े की यारों जिंदगानी हमारी है। हमारी प्रकृति भी बड़ी विचित्र है। कैक्टस प्रजाति के पौधे भले ही कांटेदार हों, इनमें भी फूल खिलते हैं। फूलों की घाटी और सैलाना गार्डन फूल और कांटों का विचित्र समागम है।

प्यार करता जा ! कांटों में भी फूल खिला। लेकिन कंकरीले और कांटों भरे रास्तों पर तो हमको संभलकर ही चलना पड़ता है। जब कोई कांटा पांव में लगता है, तो उसे निकालना भी पड़ता है। हम कांटे से ही कांटा निकालते हैं और डाइनिंग टेबल पर खाना भी छुरी कांटे से ही खाते हैं।।

हमें कांटों से भले ही बैर हो, कांटों में उगे बेर हम प्रेम से खाते हैं। बेर कांटों में ही क्यों उगते हैं, गुलाब कांटों में ही क्यों खिलता है, लगता है संघर्ष और मेहनत का फल ही मीठा होता है। कांटे भरे रास्तों से होकर ही सफलता की मंजिल हासिल होती है।

फूल अगर प्रेम का प्रतीक है तो कांटे बैर का। पुरुष गुलाब अगर अपनी शेरवानी में लगाते हैं तो परंपरागत महिलाएं फूलों के आभूषण धारण करती हैं, बालों में फूल को जूड़ा भी कहते हैं। कजरा और गजरा क्या होता है, एक जूडो कराटे वाला इंसान क्या जाने।।

हमें भी फूलों से ही प्यार है। हम क्यों व्यर्थ कांटों में उलझें। हमारे आदर्श कितने भी उच्च हों, मध्यम मार्ग पर चलते रहें, कभी संसारी, कभी व्यवहारिक और कभी टोटल प्रैक्टिकल ! हमें फूलों की सेज पर सोना है, कांटों की सेज अथवा भीष्म पितामह की शर शैय्या पर नहीं। हम क्यों किसी की बैरी के बेर तोड़ने के चक्कर में अपने दामन को कांटों में उलझा लें। बाजार से दस रुपए में बेर क्यों न खरीद लें, जिन्हें साहिर ने मेवा गरीबों का कहा है।

किसी से बैर ना पालें। लेकिन अगर हमारे सजनवा ही बैरी हो जाएं तो क्या करें। कांटों को पैर तक ही रखें, उलझने पर उसे निकालकर फैंका जा सकता है, लेकिन कांटे को कभी सीने से ना लगाएं और ना ही कांटों पर चलकर इतने सफल हो जाएं, कि दुनिया आपको फूलों की जगह कांटों का ही ताज पहना दे। बस किसी के रास्ते का कभी कांटा ना बनें। बहुत कांटों भरी जिंदगी जी रहे हैं लोग यहां, किसी के पांव का कांटा निकालने में, हो सके तो मदद करें। स्वयं फूल से कोमल बनें।।

एक प्रार्थना ही काफी है, जिसे मैं अक्सर दोहराते रहता हूं ;

तेरे फूलों से भी प्यार

तेरे कांटों से भी प्यार।

जो भी देना चाहे दे दे करतार

दुनिया के पालनहार।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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