(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हथेली और तलवा…“।)
अभी अभी # ८६६ ⇒ आलेख – हथेली और तलवा श्री प्रदीप शर्मा
हाथ और पांव हमारे शरीर के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। किसी से दो दो हाथ करने के लिए अगर ईश्वर ने हमको दो हाथ दिए है, तो दो कदम चलने के लिए दो पांव भी दिए हैं।
हाथ की पांचों उंगलियों के बीच कोमल, नरम गद्दे सी हथेली स्थित है। जब भी हमारी मुट्ठी बंधती है, हमारी हथेली गर्म हो जाती है। कहा भी तो गया है, बंद मुट्ठी लाख की। वैसे भी मुट्ठी भर पैसे के लिए, जो हाथ का ही मैल है, किसी के आगे हाथ पसारना कहां की समझदारी है। ।
तलवा भी हथेली ही की तरह पांव के पंजों और एड़ियों के बीच सुरक्षित है। तलवा, पांव का सबसे कोमल स्थान है, हथेली की तरह नर्म, गर्म, और कोमल। पूरे शरीर का बोझ पांव के पंजे और एड़ियों पर ही होता है, तलवों को बड़े आराम से रखा जाता है। एड़ियां रगड़ी जाती हैं, तब जाकर काम चलता है। लोगों की एड़ियां ही फटती हैं, तलवे बड़े सुरक्षित रहते हैं।
हथेली और तलवे अपना अपना नसीब लिखाकर लाए हैं ! हथेलियां चूमी जाती हैं, और तलवे चाटे जाते हैं। हम जिसे हथेली पर रखते हैं, उसकी हथेली को प्यार से चूम भी सकते हैं। लेकिन जान हथेली पर कैसे रखी जाती है, यह एक अनबूझ पहेली है।
मैंने लोगों को हथेलियों को चूमते तो देखा है, लेकिन किसी को तलवे चाटते नहीं देखा। बच्चों की प्यारी प्यारी हथेली अक्सर मुट्ठी में बंद रहती है। कहते हैं, बच्चों की मुट्ठी में उनकी तकदीर लिखी होती है। हम जब किसी को अपना हाथ दिखाते हैं, तो वह हमारे हाथ की लकीरें पढ़कर हमारा भविष्य बताता है। ये सारी लकीरें हथेली में ही तो होती है। हथेली, हाथ ही का तो अंग है। ।
हथेली को पाम palm भी कहते हैं, और हस्त रेखा विज्ञान को पामिस्ट्री। हथेली पर पर्वत भी होते हैं, जी हां इन्हें मांउटस कहते हैं। मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और चन्द्र सब यहीं विराजमान होते हैं। हथेली और तलवों पर एक्यूप्रेशर चिकित्सा भी की जाती है। विभिन्न प्रेशर पॉइंट्स को दबाकर रोगों की चिकित्सा ही एक्यूप्रेशर है।
हथेली पर सरसों नहीं जमता, यहां तक तो ठीक है। लेकिन ख़ोपरे का जमा हुआ तेल हथेली की नर्मी और गर्मी से पिघल अवश्य जाता है। इंसान कितना भी कठोर हो, पत्थर दिल हो, उसकी हथेली और तलवे कोमल ही होंगे। ।
बच्चों की नाज़ुक हथेली को अपने हाथ में ले, जब चट्टी, मट्टी खेली जाती है, तो बच्चों का खिलखिलाना शरीर और मन की पूरी थकान दूर कर देता है। उसके कोमल कोमल तलवों पर जब गुदगुदी की जाती है, घोड़ा आया, घोड़ा आया, सुनकर जब वह खुलकर हंसता है, तब एक ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति होती है, मानो हमारे साथ साक्षात बाल गोपाल क्रीड़ा कर रहे हों।
गुदगुदी हर उम्र में होती है, कभी मन में, कभी तन में। रात को सोते वक्त अपने तलवों की मालिश करके सोएं, नींद अच्छी आएगी। प्रातःकाल उठते ही अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ें, गर्म गर्म हाथों को आंखों पर रखें, बड़ा सुकून मिलेगा। ।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५८ ☆ देश-परदेश – राष्ट्रीय गणित दिवस : 22 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆
प्रातः काल समाचार पत्र से ज्ञात हुआ कि आज देश में गणित दिवस मनाया जाता है। गणित जैसा विषय जिसको याद कर हमारे पसीने छूट जाते हैं। पाठशाला के दिनों में क्या ही हाल हुआ करता होगा?
हमारी गणित की कमजोरी का लाभ सब से अधिक हमारे करीबियों ने उठाया था। बाल्य काल में मोहल्ले के बच्चे “छुपन छुपाया” के खेल में अस्सी, नब्बे गिन कर हमेशा, हम से ही ढूंढने का कार्य करवाया करते थे। बाकी सभी बच्चे मस्ती कर कहीं छुप जाते थे।
घर में जब सर्दी के दिनों में देसी घी और मेवे से बने लड्डू (पिन्नी) बनती थी, तब हमारे बड़े भाई अपनी गणित विषय की प्रवीणता के कारण हेरा फेरी कर हमारे हिस्से से टी डी एस काट कर अपने हिस्से में रख लेते थे।
घर आए मेहमान जब भी दो रुपए देकर जाते थे, बड़े भैया तीन भाई बहन में पता नहीं कौन से फार्मूले से बांटते थे, हम सब से कम राशि प्राप्तकर्ता हुआ करते थे। हो सकता है, दो बिल्लियों में बंदरबांट वाली कहानी उन्होंने बहुत पहले पढ़ रखी होगी।
आज भी बाज़ार में 70% तक की सेल का ऑफर हो या 10%+10% की छूट के गणित को बिना समझे ठगे चले आ रहें हैं।
गणित की कमजोरी का लाभ हमारे जिगरी दोस्त भी खूब उठाते हैं। ठेले पर जब गोल गप्पे खाने जाते है, हमारे हिस्से के एक दो गोल गप्पे, मित्र डकार ही जाते हैं।
अब और अधिक नहीं बताऊंगा, लेकिन पिछले चार दशकों से धर्मपत्नी भी हमारे द्वारा उनको दी गई धन राशि को कभी जरूरत के समय मांगने पर मय सूद वसूल ही लेती हैं, वैसे इस गणित से तो हम सब ही पीड़ित हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ला – परवाह…“।)
अभी अभी # ८६५ ⇒ आलेख – ला – परवाह श्री प्रदीप शर्मा
बड़ी विचित्र है यह दुनिया। जिसे खुद की परवाह नहीं, जिसे अपने हित अहित की चिंता नहीं, उससे हम यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वह कहीं से परवाह लेकर आए। बस कह दिया लापरवाह ! पर वह जाए तो कहां जाए परवाह ढूंढने, तलाशने।
भाषा कोई भी हो, एक ही शब्द के थोड़े फेर बदल से न केवल उसका अर्थ बदल जाता है, कभी कभी बड़ी विचित्र स्थिति भी पैदा हो जाती है। अब जवाब को ही ले लीजिए ! किसी से जब कोई प्रश्न पूछा जाता है, तो जवाब तलब किया जाता है। अगर उसने जवाब नहीं दिया तो हम नहीं कहते लाजवाब। यही कहते हैं, क्यों क्या हुआ ! मुंह में क्या दही जमा हुआ है ? और अगर कोई सेर को सवा सेर मिल गया, तो वाह जनाब ? अब कहकर देखिए लाजवाब। ।
ऐसी कोई बीमारी नहीं, जिसका इलाज संभव नहीं, लेकिन संजीवनी बूटी लाना भी सबके बस की बात नहीं, इसलिए कुछ बीमारियों को हम लाइलाज मान बैठते हैं। कोई इलाज ला नहीं सकता, बीमारी ठीक नहीं हो सकती, इसलिए वह लाइलाज हो गई। बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज संभव है लेकिन किसी के स्वभाव अथवा फितरत का कोई क्या करे। वह लाइलाज है।
जवाब से ही जवाबदार शब्द बना है जिसे अंग्रेज़ी में रिस्पांसिबल कहते हैं। जो काम जिसके जिम्मे, वह उसके लिए जिम्मेदार। अगर काम नहीं किया तो वह
इरेस्पोंसीबल हो गया। बोले तो गैर ज़िम्मेदार। वैसे गैर का मतलब दूसरा होता है। तो जिसके लिए वह जिम्मेदार है, उसके लिए कोई गैर कैसे जिम्मेदार हो गया। ।
भाषा और व्याकरण में बहस नहीं होती। Put पुट होता है और but बट। जिस तरह knife में k साइलेंट होता है और psychology में पी साइलेंट होता है, उसी तरह जो अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाता, उसके लिए वह ही जिम्मेदार होता है, कोई दूसरा नहीं। और यह गैर जिम्मेदार इंसान भी वह खुद ही होता है, कोई ऐरा गैरा नहीं।
परवाह कहीं से लाई नहीं जाती, उसे भी जिम्मेदारी की तरह महसूस किया जाता है। हमें अपनी ही नहीं, अपने वालों की भी परवाह हो, अपने परिवेश और पर्यावरण के प्रति हम जागरुक रहें, परिवार, समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों को समझें। सभी समस्याओं और बीमारियों का निदान संभव भी नहीं होता। प्रयत्नरत रहते हुए जीवन के सच को स्वीकारना भी पड़ता है। ।
दो विपरीत दर्शन हैं जीवन के ! मेहनत करे इंसान तो क्या काम है मुश्किल। निकालने वाले पत्थरों और पहाड़ों में से भी रास्ता निकाल लेते हैं तो कहीं कभी कभी जीवन में रास्ता ही नजर नहीं आता। किसी रोशनी की, मददगार की, रहबर की जरूरत महसूस होती है।
जिसका कोई हल नहीं, कोई निदान नहीं, कभी कभी उसके साथ साथ भी चलना ही पड़ता है। What cannot be cured, must be endured. हमारी सहन शक्ति और इच्छा शक्ति की वास्तविक परीक्षा संकट के समय ही होती है। यही वह पल होता है जब हमें अपनी जिम्मेदारी का अहसास होता है, हमें अच्छे बुरे की पहचान होती है। अपनों की परवाह होती है। और लापरवाही दूर खड़े तमाशा देख रही होती है।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लेखन और अवचेतन…“।)
अभी अभी # ८६४ ⇒ आलेख – लेखन और अवचेतन श्री प्रदीप शर्मा
लेखन का संबंध सृजन से है, चेतना और विचार प्रक्रिया से है। पठन पाठन, अध्ययन, चिंतन मनन, अनुभव और अनुभूति के प्रकटीकरण का माध्यम है लेखन, जिसमें वास्तविक घटनाओं एवं कल्पनाशीलता का भी समावेश होता है। एक अच्छे लेखक के लिए, एक अच्छी याददाश्त और अनुभवों का खजाना बहुत जरूरी है। अगर चित्रण रुचिकर ना हुआ, तो लेखन नीरस भी हो सकता है।
जिन लोगों का चेतन अधिक सक्रिय होता है, वे अच्छे लेखक बन जाते हैं लेकिन जिनका अवचेतन अधिक प्रबल होता है, वे केवल सपने ही देखते रह जाते हैं। ।
लेखन की ही तरह एक संसार सपनों का भी होता है, जहां कथ्य भी होता है, घटनाएं भी होती है, सस्पेंस, रोमांस और मर्डर मिस्ट्री, क्या नहीं होता अवचेतन के इस संसार में ! लेकिन अफसोस, यहां कर्ता केवल दृष्टा बनकर सोया होता है, मानो किसी ने उसके हाथ पांव बांधकर पटक दिए हों। जब इस लाइव टेलीकास्ट वाले एपिसोड का अंत आने वाला होता है, तब उसे सपने के अवचेतन के चंगुल से मुक्त कर होश में ला दिया जाता है। ना कोई
डायरी ना कोई वीडियो शूटिंग, सब कुछ सपना सपना।
सपना मेरा टूट गया। जागने पर चेतन मन अवचेतन की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश जरूर करता है, लेकिन कामयाब नहीं होता, क्योंकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। जागृत और सुषुप्तावस्था में यही तो अंतर है। सोते समय बहुत कुछ याद रहता है, जो अवचेतन को प्रभावित करता है, लेकिन जागने के बाद अवचेतन मन इतना प्रभावित नहीं करता। सपनों के सहारे कोई लेखक नहीं बना। केवल जाग्रत प्रयास से ही कई लेखकों के सपने सच हुए हैं और वे एक अच्छा लेखक बन पाए हैं। ।
लेखन साहित्य का विषय है मनोविज्ञान का नहीं, सपने और अवचेतन, मनोविज्ञान का विषय है, लेखन का नहीं। लोग कभी सपनों को गंभीरता से नहीं लेते, उनकी अधिक रुचि सपनों को सच करने में होती है, जो जाहिर है, कभी कभी सपने में भी सच हो जाती है, जब वे कहते हैं, मैने तो सपने में भी नहीं सोचा था, मैं एक सफल लेखक बन पाऊंगा।
सपनों का एक लेखक के जीवन में कितना योगदान होता है, यह तो कोई लेखक ही बता सकता है। सुना है लेखन में एक लेखक को इतना आत्म केंद्रित होना पड़ता है कि भूख प्यास और नींद सब गायब हो जाती है। मुर्गी की तरह विचार अंडा देने को बेताब होते हैं और तब तक देते रहते हैं, जब तक सुबह मुर्गा बांग नहीं दे देता। उधर सूर्योदय और इधर हमारे सूर्यवंशी जी ऐसी तानकर सोते हैं कि आप चाहो तो घोड़े बिकवा लो।
सपना तो पास ही नहीं फटक सकता उनके और गहरी नींद के बीच।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डाॅ अनोख सिंग…“।)
अभी अभी # ८६३ ⇒ आलेख – डाॅ अनोख सिंग श्री प्रदीप शर्मा
कुछ लोग अनोखे होते हैं तो कुछ लोगों के नाम में कुछ अनोखापन होता है, लेकिन डाॅ अनोख सिंग तो यथा नाम तथा गुण थे यानी एक अनोखे दिलचस्प इंसान। किसी व्यक्ति के आगे डॉक्टर लगते ही यह भ्रम हो जाता है कि जरूर वह कोई डॉक्टर होगा, और वाकई अनोख सिंग एक डॉक्टर ही थे।
भले ही जात न पूछो साधु की, लेकिन किसी डॉक्टर की डिग्री तो परख ही लेनी चाहिए। चिकित्सा एक व्यवसाय है और आजकल जितने रोग उतने डॉक्टर ! एलोपैथी की तरह ही कई समानांतर चिकित्सा आज उपल्ब्ध है, जिनमें एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर प्रमुख हैं। डा अनोख सिंग एक्यूपंक्चर चिकित्सा में पारंगत थे और दमा यानी अस्थमा का इलाज करने माह में एक बार भटिंडा से इंदौर आते थे। वे नियमित रूप से माह के हर पहले रविवार और सोमवार को आते मरीजों का इलाज करते थे। ।
उनके पास कोई जादू की छड़ी अथवा भभूत नहीं थी, लेकिन हां एक झोला जरूर था जिसमें कुछ सुइयां थीं, जो मरीजों को चुभाई जाती थी। डॉक्टर तो वैसे भी कसाई ही होते हैं, जब कि यह तो सिर्फ सुई ही चुभाता था। हमारे शरीर में हर बीमारी के कुछ पॉइंट्स होते हैं, जिनमें कहीं एक्यूप्रेशर काम करता है तो कहीं /एक्यूपंक्चर।
सर्दी जुकाम, नजला और खांसी जब बेइलाज हो जाती है, तो वह सांस का रोग बन जाती है। कई इलाज हैं अस्थमा के एलोपैथी में ! गोली, इंजेक्शन, और सबसे अधिक कारगर इन्हेलर। बस मुंह खोलें और फुस फुस करते हुए दवा मुंह के अंदर। मछली की तरह तड़फता है एक दमे का रोगी, जब उसकी सांस उखड़ जाती है। एलर्जी टेस्ट से निदान में सहायता अवश्य मिलती है। कुछ लोग तो साउथ जाकर मछली का सेवन भी करने को तैयार हो जाते हैं तो कुछ आयुर्वेद पर भरोसा करते हैं। ।
अगर मैं भी सांस का शिकार ना होता तो शायद इस अनोखे इंसान से मिल भी नहीं पाता। किसी भुक्तभोगी सज्जन ने मुझे ना केवल इनकी जानकारी ही दी, एक दिन इनसे मेरा एक मरीज के रूप में परिचय भी करा दिया। छः फिट का एक आकर्षक खुशमिजाज सरदार, मानो अभी फौज से ही लौटकर आया हो।
नाम बताइए ? मैने अपना नाम बताया, पी के शर्मा !
उन्होंने मुझे घूरा अथवा निहारा, फिर बोले, महाराष्ट्र में हमें एक पी के झगड़े मिले थे, और हंस दिए।
हमारा उपचार शुरू हुआ, हमें भी छाती सहित कुछ जगह सुइयां चुभाई गई। खटमल मच्छर के काटने से थोड़ा अधिक दर्द भी महसूस हुआ, लेकिन असहनीय नहीं। केवल बीस मिनिट का खेल था सुइयां चुभाने का। हिदायतों का पिटारा लिए हमने उनसे विदा ली। ।
नीम हकीम, खतरे जान ! हम जहां भी गए हैं, अंध श्रद्धा नहीं, कुछ शंका लेकर ही गए हैं। सोचा अगर तत्काल असर ना भी हुआ तो अपनी दर्द निवारक सांस की गोली तो पास है ही। कुछ दिन तक हम अपनी सांस ढूंढते रहे लेकिन सांस ने उखड़ने से साफ इंकार कर दिया। हमें लगा डॉक्टर तेरा जादू चल गया।
अगले माह डॉक्टर ने फिर बुलाया था। मरीजों की भीड़ कहां नहीं, कितनी बीमारियां कितने रोग ! मुझे देखकर मुस्कुराए, कैसे हो झगड़े साहब ? यानी यहां मेरा नामकरण भी हो चुका था। अब मैं उनसे झगड़ा करने से तो रहा, क्योंकि उन्होंने मुझे पी.के.झगड़े के इतिहास के बारे में पहले ही बता दिया था। वे जितने आत्मीय थे, उतने ही मजाकिया भी।
हंसते हंसते सुइयां चुभाना कोई उनसे सीखे। ।
हर मरीज से उनका वार्तालाप बड़ा रोचक होता था। एक रिश्ता जो मन को भी मजबूत करे और रोगी में विश्वास का संचार करे। कई क्रॉनिक पेशेंट्स को स्ट्रेचर पर लाया जाता था, दूर दूर से रोगी इसी आस से आते थे, कि सांस में कुछ फायदा हो। लेकिन अगर हर डॉक्टर मसीहा ही होता तो शायद इस संसार में कोई रोगी ही नहीं होता।
हर व्यक्ति के जीवन में उतार चढ़ाव आते है, डाॅ अनोख सिंग भी आखिर थे तो एक इंसान ही। एक बार उन्हें लकवा मारा, फिर उठ खड़े हुए, बेटे की मौत का सदमा भी हंसते हंसते झेला, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। जब भी वापस आते, उसी उत्साह और उमंग के साथ। जिस माह नहीं आते, मरीज निराश हो जाते। ।
मैं हमेशा उनके लिए मिस्टर पी.के.झगड़े ही रहा। हमेशा सबसे मेरा परिचय यही कहकर कराते, ये झगड़े साहब हैं, लेकिन कभी हमसे नहीं झगड़ते। कोरोना काल में उनका आना जो एक बार बंद हुआ तो हमेशा के लिए ही हो गया। कोरोना ने उनको भी नहीं छोड़ा।
आज जब भी कभी थोड़ी सांस उखड़ती है अथवा किसी अस्थमा के मरीज को देखता हूं, तो अनायास ही इस अनोखे इंसान की याद आ जाती है। कुछ सुइयां रिश्तों की भी होती हैं, जब याद आती है, बहुत चुभती है। एक ऐसा दर्द जो मर्ज को ही गायब कर दे। क्या इसे ही रिश्तों का मीठा दर्द कहते हैं, सुइयां चुभाने वाले डाॅ अनोख सिंग अगर आज होते, तो जरूर जवाब देते। ।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख फ्रेम में सजी तस्वीर। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०२ ☆
☆ फ्रेम में सजी तस्वीर… ☆
सुगंधा तीन विषयों में एम•ए• थी तथा हर कला में पारंगत थी।वह स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी।उसका विवाह एक बैंक कर्मचारी के साथ हुआ था।भरा-पूरा परिवार पाकर वह बहुत प्रसन्न थी।वह दिन भर घर के कामों में व्यस्त रहती तथा सबको खुश रखने की चेष्टा करती। वह सब की आशाओं पर ख़रा उतरने का भरसक प्रयास करती।
एक माह पश्चात् उसने स्कूल जाना प्रारंभ कर दिया। इसी बीच उसके पति ने एक योजना बनाई और उसे कार्यान्वित करने का अवसर तलाशने लगा। एक दिन उसने सुगंधा से कहा कि उसका मित्र मेडिकल अस्पताल में दाखिल है, उसे देखने चलेंगे।सो! उस दिन वह स्कूल से जल्दी लौट आई और तैयार होकर पति के साथ जल दी।
वह बहुत खुश थी कि आज उसकी पिकनिक हो जाएगी और पति के साथ अकेले समय गुज़ारने का अवसर भी प्राप्त होगा। वे सीधे उसके मित्र के पास गये और उसका पति सुगंधा को अपने मित्र के पास छोड़कर उसकी दवाइयां लेने के बहाने, वहां से चला गया। इसी बीच वह सुगन्धा की पर्ची बनवा कर व उसका ट्रीटमेंट लिखवा कर लौट आया।
सुगन्धा पति की प्रतीक्षा करते-करते थक गई थी। उसने आते ही पति से शिकायत की और उस ने क्षमा-याचना करते हुए उसे वापस घर चलने को कहा। रास्ते में उन्होंने होटल में खाना खाया और उससे कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर करने को कहा। रास्ते में उसने उसे बताया कि वह उसके नाम कुछ पैसा जमा कर पा रहा है… यह कागज़ उसी पॉलिसी के हैं।
वह मन ही मन फूली नहीं समा रही थी कि उसका भाग्य कितना अच्छा है… कितना अच्छा जीवन साथी मिला है उसे, जो उसका आवश्यकता से अधिक ख्याल करता है। वे दोनों हंसी-खुशी से देर रात घर लौट आए।
एक सप्ताह के पश्चात् सुगन्धा के श्वसुर ने उसके माता-पिता को बुलवाया तथा उसे घर ले जाने का फरमॉन सुनाया, जिसे सुनकर वे सकते में आ गये। उन्होंने उन पर इल्ज़ाम लगाया कि ‘उनके साथ धोखा हुआ है…उन्होंने अपनी पागल बेटी को उनके माथे मढ़ दिया है। इसलिए वे उसे अपने घर में नहीं रख सकते। इसके साथ ही उन्होंने उस पर यह भी आरोप लगाया कि उनकी बेटी चरित्रहीन है तथा वह स्वयं उनके बेटे से तलाक़ लेना चाहती है, जिसका प्रमाण वे अपनी आंखों से देख सकते हैं।
सुगन्धा के माता-पिता की बातें सुनकर उनके पांव तले से ज़मीन खिसक गयी। वे ग़ुहार लगा रहे थे कि उनकी बेटी सुशील है, पढ़ी-लिखी है, नौकरी भी करती है। सो! वे उस पर ऐसे घिनौने इल्ज़ाम लगा कर उन्हें शर्मिंदा न करें।
सुगंधा के आते ही उन्होंने उसे घर से निकल जाने को कहा। उसे काटो, तो खून नहीं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था– कि आखिर माज़रा क्या है? उसके नेत्रों से अजस्त्र अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। सुगंधा उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयास कर रही थी कि वह तो कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती। वह तो यहां पर बहुत खुश है।
इसलिए सुगन्धा ने अपने माता-पिता से लौट जाने का कहा कि वह स्वयं ही सब ठीक कर लेगी।उसने अपने पति के आने पर उससे सब कुछ कह डाला, परंतु ढाक के वही तीन पात। यह सब तो उनकी चाल थी। उसका पति किसी अन्य लड़की से विवाह करना चाहता था। इसलिए उसने माता-पिता की आज्ञा पालन हेतु उससे विवाह तो कर लिया, परंतु वह अपनी प्रेयसी को धोखा नहीं देना चाहता था। सो! उससे मुक्ति पाने के लिए उसने सुगन्धा को पागल करार कर दिया तथा कोर्ट में तलाक़ की अर्ज़ी लगा दी। रात के घने अंधकार में सुगन्धा को घर से बाहर निकाल दिया।
सुगन्धा के माता-पिता भारी मन से लौट गये, परंतु वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनके साथ यह सब क्यों और कैसे हो गया? उनका अनुमान था कि उसने पैसा देकर उसके पागल होने का प्रमाण-पत्र बनवाया होगा तथा पालिसी के बहाने तलाक़ के कागज़ों पर दस्तख़्त करवा लिए होंगे और सुगंधा ने पति पर विश्वास कर, आँखें मूंद कर उन कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे, जिसका परिणाम उसे भुगतना पड़ रहा है। एक पत्नी अपने पति से ऐसे विश्वासघात की कल्पना भी कैसे कर सकती है कि उसका जीवन-साथी उसके साथ ऐसा व्यवहार- विश्वासघात कर सकता है… जो सर्वथा ग़लत है, अशोभनीय है, अविश्वसनीय है, असंभव है। परंतु कलयुग में सब चलता है… ख़रा-खोटा, अच्छा-बुरा, मीठा-कड़वा।
गहन कालिमामयी अमावस्या की रात, आकाश में बादलों का गर्जन, सांय-सांय करती तेज़ हवाएं सुगन्धा को भयभीत कर रही थीं। वह दरवाज़े की चौख़ट पर सिर टिकाए रात भर बैठी अपनी नियति के बारे में सोच रही थी और वह समझ नहीं पा रही थी कि विधाता ने उसे किस जन्म के कर्मों की सज़ा दी है? इस जन्म में तो उसने कभी कोई ग़लत काम किया नहीं, उसने तो कभी किसी के सामने अपनी ज़ुबान भी नहीं खोली… किसी को अप-शब्द तक नहीं कहे…घर से बाहर कदम भी नहीं रखा और न ही किसी के बारे में गलत सोचा है।
सुगन्धा पति के क़ारनामे को देख बहुत परेशान थी। अचानक एक कार वहां आकर रुकी, उसमें से एक व्यक्ति उतरा और उसने उसके श्वसुर का नाम लेकर घर का पता पूछा। सुगन्धा को काटो, तो खून नहीं।
वह असमंजस में थी कि वह उस अजनबी को वांछित पता बताए या चुप रहे। कार के मालिक ने पुन: प्रश्न दोहराया, परंतु उसने अनजान होने का नाटक किया।उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? मूसलाधार वर्षा में वह कहां जाए? वह अजनबी लौटकर वहीं आएगा और उसे घर के बाहर बैठा देख, प्रश्नों की झड़ी लगा देगा। सो! उसने निर्णय लिया कि वह वहां से चली जाएगी। पड़ोस के घर में जाकर दस्तक देगी और उनसे वहां रात गुज़ारने का अनुरोध करेगी। बहुत देर तक वह दरवाज़ा खटखटाती रही, परंतु कोई बाहर नहीं निकला। इसका कारण शायद तेज़ गति से होने वाली वर्षा रही होगी।
रात सुरसा के मुख की भांति लंबी होती जा रही थी। सुगन्धा सूर्य देवता के प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रही थी। विवाह के बाद का एक-एक दृश्य सिनेमा के रील की भांति उसकी आंखों के सामने घूम रहा था। वह उस चक्रव्यूह से बाहर आने की कोशिश कर रही थी, परंतु उसे सफलता नहीं मिल पा रही थी।
वह रात भर सर्दी से कांपती रही। यह कंपन केवल ठंड की नहीं थी, भय व आतंक की थी। वह जानती थी कि रईसज़ादे, गुंडे, मवाली सब रात को अपने- अपने शिकार की तलाश में निकलते हैं। वह भगवान से ग़ुहार लगा रही थी कि जिस प्रकार उसने द्रौपदी की लाज बचाई थी; गज को मगर के पाश से मुक्त कराया था; होलिका की गोद में बैठे प्रह्लाद को अग्नि की लपटों से बचाया था… उसी प्रकार वे स्याह काली रात में, विचरण करने वाले निशाचरों से उसकी रक्षा कर अभयदान प्रदान करें।
सूर्य की प्रथम रश्मि ने भोर होने का संदेश दिया और उसके मन में विश्वास ने करवट ली। उसने पति के घर पर पुन: दस्तक दी। दरवाज़ा खुला और उसे सामने देख बंद कर लिया गया। उसने साहस बटोर कर दोबारा द्वार खटखटाया तो उसके पति ने उसे फटकारते हुए कहा कि ‘कितनी निर्लज्ज हो तुम… फिर लौट आई…लगता है अब तुम्हें धक्के मार कर इस गली से बाहर करना पड़ेगा।’ उसने रोते हुए क्षमा -याचना की तथा घर के भीतर प्रवेश पाने की ग़ुहार लगाई।
परंतु उस घर के लोग तो थे संवेदनशून्य ‘औ’ हृदयहीन… शायद उनके दिल पत्थर के हो चुके थे, किसी को उस पर तरस नहीं आया। पैदल चलते- चलते स्टेशन पहुंच कर उसने किसी यात्री से अनुनय-विनय की…वह उसे कोलकाता जाने का टिकट दिलवा दे। पहले तो उसने आश्चर्य से उसे देखा। परंतु उसके भीगे वस्त्र तथा अश्रुसिक्त नेत्रों को देख वह समझ गया कि वह मुसीबत की मारी हुई है। उसने उसे लोकल ट्रेन का टिकट दिलवा दिया।
वह हैरान-परेशान सी अपने माता-पिता के घर पहुंची, जहां से चंद दिन पहले ही वह रुख़्सत हुई थी। माता-पिता भाई-बहन सब ने उसे बड़े अरमानों से विदा किया था। उसने अपनी व्यथा-कथा उन्हें सुनाई और वहां से लौटने की हक़ीक़त से अवगत कराया।
घर में मातम-सा पसर गया। पिता सकते में आ गये और अपने भाग्य को कोसने लगे कि कितनी मुश्किल से उन्होंने पहली बेटी का विवाह किया था, जो ससुराल से लौटा दी गई। ‘लोग क्या कहेंगे… कैसी-कैसी बातें बनाएंगे और उसकी अन्य तीन बेटियों का क्या होगा?
एक महीने पश्चात् उसके पिता ने पंचायत में अर्ज़ी लगाई, परंतु कोई समाधान नहीं निकला। कोर्ट में दर्ज मुकदमे के फैसले का वे तीन वर्ष से इंतज़ार कर रहे हैं… शायद उसे दोबारा उसी नरक में धकेलने के लिए, क्योंकि बेटियां माता-पिता के घर आंगन में अच्छी नहीं लगतीं।
सब कुछ जानते हुए भी माता-पिता ऐसे विश्वासघाती लोगों के यहां पुन: भेजने में तनिक भी संकोच नहीं करते। भले ही वे इस तथ्य से अवगत होते हैं कि उनके चंगुल से बच कर उनकी बेटी कभी ज़िंदा नहीं लौटेगी। परंतु वे अपनी झूठी आन-बान-शान व मान-मर्यादा के लिए उसे नरक में धकेल देते हैं, क्योंकि वे समाज के खोखले नियमों व दकियानूसी मान्यताओं के आतंक से डरते हैं।
सुगन्धा स्वयं को असहाय व फ़ालतू वस्तु-मात्र अनुभव कर रही थी, जो निरुद्देश्य व निष्प्रयोजन होती है और उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि ‘जैसे वह एक तस्वीर है, जिसे सुविधानुसार दो-चार दिन बाद, घर की सफाई करते हुए कभी एक कमरे के कोने में और कभी दूसरे कमरे के कोने में टांग दिया जाएगा।’
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कल्याण…“।)
अभी अभी # ८६२ ⇒ आलेख – कल्याण श्री प्रदीप शर्मा
ईश्वर का एकमात्र उद्देश्य इस सृष्टि का कल्याण है। सिरजनहार, पालनहार और संहारक ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही तो हैं। कल्याण
एक सर्वविदित, सार्वभौमिक, सकारात्मक शब्द है, जिसमें सबका हित, मंगल और शुभ-लाभ निहित है। गीता प्रेस गोरखपुर की मासिक पत्रिका कल्याण एक समय घर-घर आती थी। बिना किसी विज्ञापन का, कम कीमत, अधिक ज्ञानवर्धक, धार्मिक सामग्री अपने आप में समेटे हुए। परिवार के लोग बड़ी आस्था और श्रद्धा से इसे उलट-पुलटकर देख लेते थे। यही वह समय था जब सरिता-मुक्ता के साथ बच्चों का चंदामामा घर में प्रवेश पा जाता था।
जब सामंती युग था, तब राजा का जन्म प्रजा के कल्याण के लिए होता था। समय के साथ राजा बदलते गए, सामंती युग का स्थान लोकतंत्र ने ले लिया। आज भी सरकार का प्रथम एवं एकमात्र कर्तव्य आम आदमी का कल्याण है। अंग्रेज़ लोग इसे वेलफेयर ऑफ स्टेट कहते थे।।
पहले मुझे हर शब्द के डिक्शनरी मीनिंग जानने की आदत थी ! आजकल मैं भी गूगल सर्च कर लिया करता हूँ। मन हुआ, kalyaan को गूगल सर्च करूँ ! गूगल सर्च मुझे कल्याण मटके की ओर ले गया। कल्याण का यह अर्थ मेरे लिए नया था। सिर्फ रतन खत्री का मैंने नाम भर सुन रखा था। अंग्रेज़ी में भी कल्याण का एकमात्र अर्थ welfare निकला।
मैंने हिंदी दिवस के उपलक्ष में कल्याण को हिंदी में सर्च किया, तब जाकर उसका अर्थ कल्याण पत्रिका निकला। कल्याण पत्रिका ने कितनों का कल्याण किया, इस पर गूगल सर्च मौन है, लेकिन शायद इस पर, कहीं ना कहीं, कोई ना कोई, रिसर्च अवश्य चल रही होगी।।
पंडितों, महात्माओं और बुजुर्गों का तकिया कलाम है यह शब्द कल्याण ! समाज में देखो तो हर कोई एक दूसरे का कल्याण करने में लगा है। नारायण सेवा संस्थान, उदयपुर कितने वर्षों से अपाहिजों का कल्याण करता चला आ रहा है। कलयुग में केवल एक ही कैलाश ने मानव के रूप में जन्म लिया है, और उनका नाम है अपाहिजों के मसीहा, 1008 संतश्री कैलाश मानव। लेकिन अपाहिज, जो अब दिव्यांग हो गए हैं, कम होने का नाम ही नहीं ले रहे।
एक ओर विदिशा के हमारे कैलाश सत्यार्थी जिन्हें जब तक बाल मजदूरी के लिए, उनके द्वारा किये गए उनके अनथक प्रयासों पर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल गया, उन्हें कोई प्रसिद्धि नहीं मिली, और दूसरी ओर अपनी अच्छाई का और समाज कल्याण का सोशल मीडिया पर प्रचार करते व्यक्ति और संस्थाएं, कभी भ्रमित कर देती हैं, तो कभी आश्चर्यचकित, कि इतने लोगों के प्रयत्नों के बावजूद ऐसा क्या है, जो हमें आगे बढ़ने से रोक रहा है। इतना कल्याण, फिर भी यही शिकायत, लो हो गया कल्याण।।
इतने संत, बाबा, समाज सुधारक, एनजीओ, मंदिर, मस्ज़िद, चर्च, गुरुद्वारे किसके लिए ! मानव मात्र की भलाई के लिए। पिछले 70 वर्षों का इतिहास हम टटोलें, उसके पहले ही हमारा ध्यान एक ऐसे शख्स पर चला जाता है, जिसे देश की जनता ने पाँच वर्ष की अवधि के लिए, अपने हित और कल्याण के लिए एक आम- मुख्तयारनामा लिखकर दिया है। और वह इंसान अकेला 135 करोड़ के कल्याण के लिए जी जान एक कर रहा है। आज उसका एक पाँव यहाँ है तो कल चीन में। उसकी आँखों के आँसू थम नहीं रहे, आँखों से नींद गायब है। बस एक झोला लेकर आया है यह मसीहा, हम सबके कल्याण के लिए।
यह देश सदा से धर्म, नैतिकता और सदाचार को सर आंखों पर बिठाता रहा है। जन जन में धर्म के प्रति आस्था का सम्मान करते हुए पहले गीता प्रेस गोरखपुर जैसे संस्थान को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा और फिर राम की भद्रता का ध्यान धरते हुए प्रज्ञाचक्षु रामभद्राचार्य के चरणों में भी ज्ञानपीठ पुरस्कार अर्पित कर दिया।।
हम अपना कल्याण खुद क्यों नहीं कर पाते ! क्यों हमें बाबा, महात्मा, राजनेता और स्वयंभू मसीहाओं की आवश्यकता पड़ती है, इसका उत्तर जब हमें मिल जाएगा, विश्व का ही या न हो, हमारा कल्याण अवश्य हो जाएगा।।
☆ “तेरी मिट्टी में मिल जावां !” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆
लहानपणापासूनच त्यांना लढाऊ विमानांचा गगनभेदी आवाज ऐकण्याची आणि ती विमाने प्रचंड वेगाने आकाशात झेपावताना पाहण्याची सवय झाली होती…आणि आपणही एकेदिवशी अशाच विमानांतून आभाळात भरारी मारण्याचे त्यांचे स्वप्न होते! वडील भारतीय वायुदलात सेवेत असल्याने,विमानतळाजवळच त्यांचे घर होते…आणि मनात विमानांनी घर केले होते!
१७ जुलै १९४३ रोजी त्यांचा जन्म झाला….दोन वर्षांपूर्वी म्हणजे २०२३ मध्ये त्यांच्या एक हजार पौर्णिमा पाहून झाल्या असत्या..सहस्रचंद्र दर्शन घडले असते! पण आता तर ते शौर्याच्या आभाळातला एक अत्यंत तेजस्वी तारा झालेले आहेत…सूर्य आणि चंद्र असेतो त्यांची कीर्ती राहील!
ते लढाऊ वैमानिक म्हणून भारतीय हवाई दलात commissioned होण्यापूर्वी म्हणजे ४ जून,१९६७ पूर्वी भारत-पाक,भारत-चीन यांच्या दरम्यान मिळून तीन युद्धे होऊन गेली होती.
इंग्रजांनी एका स्वातंत्र्याचे दोन तुकडे अर्थात पाकिस्तान आणि भारत करून दिल्यानंतर काहीच महिन्यांत म्हणजे केवळ दोन महिने आणि सात दिवसांत १९४७ मध्ये पाकिस्तानने भारतात सैन्य घुसवले….पाकिस्तानने ऑगस्ट १९४७ मध्येच ‘ऑपरेशन गुलमर्ग प्लान’ नावाने शिजवलेल्या कटाचा हा पुढचा अंक होता! यामुळेच हिंदुस्थानाला २७ ऑक्टोबर,१९४७ रोजी काश्मीरमध्ये श्रीनगर हवाई तळावर लढाऊ विमाने उतरवावी लागली होती. पुढे झालेल्या आंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप आणि त्यात झालेल्या समझोत्यामध्ये श्रीनगरमध्ये शांतता काळात Air Defence Aircraft लढाऊ विमाने ठेवू नयेत असे ठरले होते. पण पुढे पाकिस्तानशी १९७१मध्ये युद्धाची स्थिती उत्पन्न झाली आणि भारतीय हवाई दलाची Knat जातीच्या लढाऊ विमानांची एक तुकडी (18 Squadran detatchment) श्रीनगरमध्ये तैनात करण्यात आली! या तुकडीतील वैमानिकांना काश्मीरमधील पहाडी हवाई क्षेत्र,तिथले प्रचंड थंड हवामान यांचा सराव व्हायला वेळ लागणार होता. पण जातीचे सैनीक..त्या हवामानाला पुरून उरले. पण श्रीनगर हवाई तळाच्या आणि एकूणच त्या परिसराच्या संरक्षण सिद्धतेत एक कमतरता होती…..Operational Radar System उपलब्ध नव्हते. पाकिस्तानी हवाई दलाने काही आगळीक केलीच तर त्याची आगाऊ खबर मिळावी म्हणून पीर पंजाल येथील पर्वतांवर आपली निरीक्षण पथके तैनात मात्र होती. पण डिसेंबर १९७१ मध्ये त्या भागात प्रचंड धुके होते. शिवाय लढाऊ विमाने कमी उंचीवरून उडत आली तर ती लवकर दृष्टीस पडणे अवघड. त्यात पाकिस्तान हवाई दलाकडे असलेली F-86 Sabre जातीची अमेरिकन विमाने आपल्याकडील Knat च्या तुलनेत अधिक ताकदवान होती…आणि अशी १२.७ एम.एम मशीनगन आणि बॉम्ब,रॉकेटसने मारा करू शकणारी अशी १३९ विमाने तयार होती. पण आपली ब्रिटीश Knat विमाने वजनाने हलकी,कमी उंचीवरच्या dog fight (लढाऊ विमानांची एकमेकांशी हवेत समोरासमोर लढत) मध्ये सरस होती….त्यांना flying bullets ही उपाधी प्राप्त होती…पण त्याही जास्त सामर्थ्यशाली होते ते भारतीय वायूवीर…यंत्रांपेक्षा ती यंत्रे चालवणारी हृदये जास्त मजबूत असावी लागतात…आणि अशी असंख्य हृदये भारतीय हवाईदलात धडधडत होती…पाकच्या लढाऊ विमानांच्या डरकाळ्या या आवाजापुढे कमीच पडतील!
१४ डिसेंबर १९७१ची सकाळ…धुक्याचे साम्राज्य आणि जीवघेणी थंडी. श्रीनगर हवाई तळावर readiness duty अर्थात काही विपरीत झालेच तर त्वरीत प्रत्युत्तर देण्याच्या कामावर दोन Knat विमाने आणि दोन लढाऊ वैमानिक, २८ वर्षांचे तरुण फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजित सिंग सेखां आणि अनुभवी लढाऊ वैमानिक फ्लाईट लेफ्टनंट बी.एस.बलधीर सिंग घुम्मान तैनात होते. घुम्मान साहेब पुढे Air Commodore या पदापर्यंत पोहोचले! ३ डिसेंबरला सुरु झालेल्या युद्धात भारताची सर्वच आघाड्यांवर सरशी होत होती…त्यात भारतीय हवाई दलाचा वाटा अत्यंत मोठा होता. त्यामुळे कातावलेल्या पाकिस्तानला काहीतरी करून दाखवायची खुमखुमी आली..आणि त्यांची तब्बल सहा सेबर विमाने श्रीनगर हवाई तळ उध्वस्त करण्याच्या कामगिरीवर निघाली आणि काहीच वेळात हवाई तळाच्या आभाळात अवतरली सुद्धा….पीर पंजाल येथील निरीक्षण चौक्यांनी तसा रेडीओ संदेश धाडलाही होता…पण हा हल्ला इतका वेगवान होता की आपले दोन्ही वैमानिक Knat पर्यंत पोहोचून हवाई उड्डाण पट्टीवरून वेग घेण्याच्या प्रयत्नात असतानाच पाकिस्तानी सेबर्स त्यांच्या जवळजवळ डोक्यावर आलेली होती आणि त्यांनी हवाईपट्टीवर बॉम्ब फेक सुरूही केली होती. त्यामुळे धावपट्टीवर मोठा धूर झाला होता…तरीह घुम्मान साहेबांनी त्यांचे विमान धावापट्टीवर दामटले! पण air traffic control बरोबर झालेल्या संदेशवहनामध्ये अचानक काही समस्या आली…आणि घुम्मान साहेबांना त्या धावपट्टीवरून उड्डाण करता आले नाही…धुके,धूर होताच…घुम्मान साहेब दुस-या धावपट्टीकडे गेले! त्यांच्या उजवीकडून wingman म्हणून आपले कथानायक फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजित सिंग सेखां उड्डाण करण्याच्या तयारीत होते. अशा परिस्थितीत अजिबात विचलीत न होता सेखां साहेबांनी त्यांचे विमान त्या धावपट्टीवरून पुढे नेले…त्यांच्या अगदी समोरून काही फुटांवरून पाकिस्तानी विमान खाली सूर मारत येत होते..बॉम्ब टाकण्यासाठी! सेखांसाहेबांच्या अगदी काही शे यार्डावर त्या विमानाने बॉम्ब टाकला….त्या धुरातून सेखां साहेबांनी आपले knat अचूक उडवले…दुसरा बॉम्ब त्यांच्या मागेच काही यार्डावर पडला!
आता हवेत एक भारतीय आणि सहा पाकिस्तानी विमाने असा सामना सुरु झाला! हल्ला करणा-या लांडग्यांवर सिंह त्वेषाने पाठलाग करीत धावून जावा, तशी स्थिती होती. सेखांसाहेब त्या सहाही विमानांच्या मागे लागले…सेखांसाहेबांनी प्रशिक्षण काळात आत्मसात केलेले सारे कौशल्य त्या एकाच लढ्यात अगदी पणाला लावले….शत्रूच्या त्या बलाढ्य विमानांना जबर हुलकावण्या दिल्या…रानडुकरे जेंव्हा धावून येतात तेंव्हा त्यांना अगदी जवळ येऊ देऊन ऐनवेळी बाजूला सरायचे असते…ती पुढे निघून जातात आणि त्यांना वळून यायला आणि एकूणच काय झाले ते समजायला उशीर लागतो…तशातली ही गोष्ट! आपण आकाशात एकटेच आहोत…असा सेखां साहेबांनी विचार नाही केला…’सवा लाख से एक लड़ाऊं, चिड़ियन ते मैं बाज तुड़ाऊं, तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाउं!’ परम गुरु गोविंद सिंह साहेबांचे वचन पुन्हा एकदा प्रत्यक्षात उतरत होते.
सेखां साहेबांनी एका सेबर वर तुफान गोळीबार करून ते जमिनीच्या भेटीला पाठवले…आणि काही क्षणांत दुस-याही सेबरची खबर घेतली…तेही विमान आगीने वेढले गेले आणि दूर भरकटत गेले! आणि बाकी पाकी विमानांनाही सेखां-फायरचा प्रसाद मिळाला होताच. Knat विमानांना Sabre slayer म्हणजे सेबर विमानांचे मारेकरी,कसाई का म्हणतात हे १९६५ नंतर पुन्हा एकदा सिद्ध झाले होते….पण या कत्तलीत विमानांपेक्षा वैमानिक अधिक धारदार होते, हे लक्षात घेतले पाहिजे! तोवर घुम्मान साहेबांनीही दुस-या धावपट्टीवरून उड्डाण घेत या संघर्षात उडी घेतली होती. पाकिस्तानी विमानांची पळता आभाळ थोडे अशी गत झाली…पण त्यातील एका विमानाने सेखां साहेबांच्या विमानावर अगदी समोरून भयावह हल्ला केला…तोपर्यंत सेखां साहेबांच्या विमानाने कित्येक गोळ्या पचवल्या होत्या…पण पाकी विमानांचा आताचा हल्ला मात्र निकराचा होता…सेखां साहेबांचे ते छोटेसे विमान खूपच नुकसानग्रस्त झाले होते…तरीही ते उडत होते…इकडे घुम्मान साहेबांनी सुद्धा पाकी विमानांना अचूक लक्ष्य करायला आरंभ केल्याने उरलेली चार सेबर्स पळून निघून गेली…पराजित होऊन..पाकिस्तानचे आणखी एक मिशन नाकाम ठरले होते!
Air Traffic Control मधून Squadron Leader वीरेंद्र सिंघ पठानिया साहेबांनी सेखां साहेबांना विमानतळावर परत आणावे,असा संदेश दिलाही होता… आटोकाट प्रयत्न केला…पण शेवटी ते यंत्र…त्याची क्षमता संपुष्टात आली होती…आणि सेखांसाहेबांचे या पृथ्वीवरचे श्वाससुद्धा बहुदा! प्रचंड वेगाने त्यांचे विमान एका अत्यंत खोल दरीच्या दिशेने निघाले…आणि त्या खोल पाताळात दिसेनासे झाले…केवळ धुराचा एक मोठा लोट मात्र दरी चढून वर आला! पाकिस्तानी हल्ला परतवून लावण्यात केवळ संख्येने दोनच असलेल्या आपल्या विमानांनी यश मिळवले होते…पण त्यातील एक वैमानिक फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजित सिंग सेखां काश्मीरच्या मातीत कायमचे मिसळून गेले! खूप प्रयत्न करूनही या परमवीराचे पार्थिव मिळून आले नाही…ते आजतागायत! मातृभूमीच्या,मातीच्या सेवेते त्याच मातीत समाधी घेण्याचे भाग्य लाभले निर्मलजीत यांना…त्यांचे आयुष्य ‘निर्मल’ झाले!
देशाने या पराक्रमाची दखल घेतलीच पण नव्या वायूसैनिकांसाठी सेखां साहेब एक आख्यायिका बनून राहिलेले आहेत! निर्मलजित १९७० मध्ये म्हणजे लढाईच्या एकच वर्ष आधी विवाहबद्ध झाले होते! त्यांच्या विवाहाच्या दिवशीच त्यांच्या बंधूंचे, सुखमिंदर सिंग यांचे दुर्दैवी निधन झाले होते, हाही दैवदुर्विलास!
एकदा त्यांच्या चुलतभावासोबत जावा मोटार सायकलवर रपेट मारताना निर्मलजित त्यांना म्हणाले होते…”लढाई झालीच ना..तर मी एक मेडल तर नक्कीच पटकवणार!” तसेच झाले…निर्मलजित सिंग साहेबांना भारताचे सर्वोच्च सैन्य पदक..परमवीर मिळाले…पण ते मरणोत्तर! भारतीय हवाई दलातले असा सन्मान प्राप्त झालेले निर्मलजीत सिंग सेखां हे आजवरचे एकमेव वायूवीर आहेत! निर्मलजित यांचे पिताश्री सेवानिवृत्त वायुसेना अधिकारी श्री.तीरलोचन सिंग यांनी २६ जानेवारी,१९७२ रोजी तत्कालीन राष्ट्रपती महोदय श्री.व्ही.व्ही.गिरी यांच्या हस्ते मोठ्या अभिमानाने त्यांच्या लेकाच्या,हुतात्मा निर्मलसिंग सेखां यांच्या वतीने परमवीर चक्र स्वीकारले!
निर्मलजित सिंग मनाने सुद्धा नावासारखेच निर्मल…प्रत्येकाला प्राजी अर्थात बंधू संबोधत असत…त्यावरून त्यांना त्यांचे सहकारी G-man म्हणत असत!
२०२३ मध्ये अंदमान निकोबार मधील एका बेटाला सेखां साहेबांचे नाव दिले गेले आहे! पालम मध्ये त्यांच्या नावाचे एक संग्रहालय, जम्मूमध्ये एक बलिदान-स्तंभ,लुधियाना न्यायालयाच्या आवारात पूर्णाकृती पुतळा,शाळेला नाव,विशेष टपाल तिकीट इत्यादी अनेक मार्गांनी या परमवीर वायूयोद्ध्याच्या स्मृती जतन करून ठेवण्याचा प्रयत्न केला गेला आहे! नव्या पिढीला आणि विशेषत: आपल्यासारख्या civilians लोकांना अशा वीरांची माहिती असायलाच पाहिजे!
तेरी मिट्टी में मिल जावां म्हणत मृत्यूला सामोरे गेलेले निर्मलजित सिंग सेखांसाहेब गुल बन के खिल जावां म्हणत नव्या शूर वीरांच्या रुपात पुन्हा उगवलेही असतील…किंबहुना त्यांच्या बलिदानातून स्फूर्ती घेऊन आजही आपले वायूसैनिक आपल्या नभाचे संरक्षण करीत आहेत….”नभः स्पृशं दीप्तम्” म्हणत आहेत…आम्ही नभाला मोठ्या अभिमानाने स्पर्श करतो! जय हिंद!
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चाय के बहाने…“।)
अभी अभी # ८६१ ⇒ आलेख – चाय के बहाने श्री प्रदीप शर्मा
मौसम के करवट बदलते ही, गुलाबी ठंड का असर मेरे गुलाबी गालों और होठों पर पड़ने लगता है।
पंखों में हवा की जगह मानो हवा में ही पंख लग गए हों। हवा के झोँकों में इतनी ताजगी रहती है, कि नींद की खुमारी तो गायब हो जाती है, लेकिन गुलाबी चाय की तलब कुछ और ही बढ़ जाती है।
पीने वाले को पीने का बहाना चाहिए, लेकिन चाय एक हकीकत है, कोई फसाना नहीं ! एक ऐसी कड़वी सच्चाई जिसके लिए झूठी कसमें नहीं खाई जाती, बस एक कप गर्मागर्म चाय से मुंह जूठा किया जाता है। होठों से छू लो तुम, मेरा स्वाद अमर कर दो।।
बंदर को भले ही अदरक का स्वाद ना मालूम हो, लेकिन चाय के स्वाद से यह जरूर पता चल जाता है कि चाय में अदरक है कि नहीं। मसाले वाली चाय में तो तुलसी, अदरक, लौंग इलायची और दालचीनी के अलावा भी बहुत कुछ डाला जाता है। जो नर सुरापान नहीं करते, उन्हें तो चाय की चुस्कियों में ही जन्नत नजर आ जाती है।
अगर चाय में नशा ना होता, तो हर नर इस तरह मोदी मोदी नहीं करता।
चाय पीने वालों के भी विभिन्न स्तर और स्टाइल होती हैं। कौन मेहमान आज प्लेट में चाय डालकर
चाय पीता नहीं, सुड़कता है। एक चाय ट्रे की चाय कहलाती है। दूध अलग, चाय का खौलता पानी अलग। अपनी पसंद अनुसार दूध और शकर मिलाएं और चाय का स्वाद लें। शुगर फ्री चाय भी लोग बिना शुगर फ्री डाले नहीं पीते।।
अधिक चाय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है, इसलिए डॉक्टर कॉफी पीने की सलाह देते हैं।
एक चायवाले ने न केवल हमारे जीवन में क्रांति ला दी है, आजकल चाय के जीवन में भी हरित क्रांति ने प्रवेश कर लिया है।
घर घर मोदी की तरह, घर घर ग्रीन टी का प्रचलन बढ़ गया है। यह वजन नहीं बढ़ाती, कोलोस्ट्राल घटाती है। जो लड़की अपने फिगर से करे प्यार, वह ग्रीन टी से कैसे करे इंकार। लेकिन कुछ लोगों को क्रांति हजम नहीं होती।
सम्पूर्ण क्रांति से जले लोग आज आंदोलन का हर कदम फूंक फूंक कर रखते हैं।।
सबसे भली चाय के प्याले की क्रांति है। कड़क उबली हुई चाय की तुलना आप बासी कढ़ी में उबाल से नहीं कर सकते। अगर जल ही जीवन है तो चाय भी एक जीवन शैली है।
गर्म चाय की भाप ना केवल फिक्र को वाष्प के साथ उड़ाती है, कई लोगों के लिए थिंक टैंक का काम भी करती है।
चाय अगर टी स्टॉल पर मिलती है, तो कॉफी कॉफी हाउस में। चाय पर चर्चा होती है और कॉफी हाउस में बहस। लोग चाय तो प्रेम से पीते हैं लेकिन कॉफी पीते ही बहस करने लग जाते हैं। आजकल मेरे शहर में भी येवले ने एक ही जगह पर चाय कॉफी का मेल करवा दिया है। लेकिन जो मज़ा चाय के ठेले पर कड़क मीठी चाय पीने का है, वह येवले की चाय में कहाँ;
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “भविष्य को समृद्ध करते: पेड़ पौधे…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २६९ ☆ भविष्य को समृद्ध करते: पेड़ पौधे… ☆
जब हम सफलता की बात करते हैं, तो अक्सर हमारी कल्पना में ऊँची इमारतें, तेज़ रफ्तार जीवन और भौतिक उपलब्धियाँ उभरती हैं। परंतु यदि गहराई से देखा जाए, तो सच्ची और टिकाऊ सफलता की जड़ें हरियाली में ही छुपी हैं। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर किया गया विकास ही वह मार्ग है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र—तीनों को दीर्घकालिक समृद्धि की ओर ले जाता है।
हरियाली केवल आँखों को सुकून देने वाला दृश्य नहीं है, बल्कि यह जीवन-दृष्टि है। एक पौधा लगाना दरअसल भविष्य में विश्वास बोना है। जैसे बीज मिट्टी में दबकर, धैर्य और देखभाल से वृक्ष बनता है, वैसे ही निरंतर प्रयास, अनुशासन और सही दिशा से सफलता का वृक्ष तैयार होता है।
प्लांटेशन एक सामूहिक जिम्मेदारी है—यह नेतृत्व का भी प्रतीक है। जो व्यक्ति या संस्था आज पेड़ लगाती है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए छाया, ऑक्सीजन और स्थिरता का उपहार देती है। यही सोच जब कार्यस्थलों, उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों में अपनाई जाती है, तो वहां ग्रीन लीडरशिप जन्म लेती है—जहाँ लाभ के साथ-साथ प्रकृति का सम्मान भी होता है।
आज की दुनिया में हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुकी है।
वृक्षारोपण, जैव-विविधता संरक्षण और टिकाऊ कृषि से-
संसाधनों का संरक्षण होता है,
स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है,
रोजगार के नए अवसर बनते हैं,
और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।
जो समाज हरियाली में निवेश करता है, वही भविष्य की अनिश्चितताओं से सुरक्षित रहता है। पौधा हमें अनुशासन सिखाता है—समय पर पानी, सही धूप, और निरंतर देखभाल। यही गुण सफलता की रीढ़ हैं। जो व्यक्ति पौधे की भाषा समझ लेता है, वह जीवन की भी भाषा समझने लगता है। धैर्य रख, प्रक्रिया पर भरोसा करने से, परिणाम समय पर स्वयं आयेंगे।
विद्यालयों और समुदायों में प्लांटेशन को संस्कृति का हिस्सा बनाना चाहिए। जब बच्चे अपने हाथों से पौधा लगाते हैं, तो वे जिम्मेदारी, करुणा और भविष्य-चिंतन सीखते हैं। यह संस्कार उन्हें केवल अच्छे नागरिक ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और सफल मानव बनाते हैं।
आज सफलता की नई परिभाषा यह है कि हमने विकास के साथ कितना संरक्षण किया। कितने पेड़ लगाए, कितनी ज़मीन को जीवन दिया, और कितनी पीढ़ियों के लिए बेहतर कल छोड़ा।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हर उपलब्धि के साथ एक पौधा अवश्य लगाएँ। क्योंकि जब जड़ें मज़बूत होती हैं, तभी ऊँचाइयाँ स्थायी बनती हैं।
हरियाली ही सफलता है, और सफलता की सच्ची पहचान हरियाली से ही होती है। यही वह पूँजी है जो हम अगली पीढ़ी को स्थानांतरित कर उनके उज्ज्वल भविष्य को निर्मित कर सकते हैं।