हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५६ ⇒ चाह और राह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चाह और राह।)

?अभी अभी # ८५६ ⇒ आलेख – चाह और राह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यह विल और वे का मामला है! क्या चाह को हम इच्छा-शक्ति कह सकते हैं। आखिर कुछ तो अंतर होगा डिजायर और विल में! प्रबल इच्छा-शक्ति हमारा मार्ग प्रशस्त कर सकती है,लेकिन सांसारिक चाह तो हमें किसी भी रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर सकती है।

क्या वासना और चाहत में कोई अंतर है ? क्या कोई भी गलत राह सही रास्ते पर पहुँचा सकती है, ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो हमेशा अनुत्तरित रहते चले आए हैं।।

नीति और राजनीति में बहुत अंतर होता है। राजनीति विज्ञान के किताबी दायरे से, जब राजनीति खुले मैदान में आती है,तो खुला खेल फरूखाबादी शुरू हो जाता है। हमने राजनीति के शयनकक्ष में अंतरात्मा और अवसरवाद को हमबिस्तर होते देखा है। सिद्धांत पर आस्था को हावी होते भी देखा है और धर्म और अधर्म को हाथ में हाथ डालकर खुले बाजार में टहलते देखा है।

चाह को हम चाहत अथवा विश भी कह सकते हैं। निरंतर प्रयास, पुरुषार्थ और उचित अवसर मिलने पर कदम मंज़िल की ओर बढ़ ही जाते हैं, और जो चाहा है, वह हासिल हो ही जाता है।।

बर्नार्ड शॉ का तो कहना है कि जो चाहते हो, वह पा लो! वर्ना जो पाया है, उसे ही चाहने लगोगे। एक चाह जीवन का एक नया अध्याय खोल भी सकती है तो एक गलत राह जीवन को बर्बाद भी कर सकती है। शायद इसीलिए किसी अच्छे उद्देश्य की प्राप्ति लिए रास्ते का चुनाव भी सही होना चाहिए।

कर्म की कुशलता न केवल वांछित फल देती है, एक सात्विक संतुष्टि का भाव भी पैदा करती है,जिसके मूल में आस्था और विश्वास होता है। चाह और राह का सामन्जस्य जीवन के सोपान को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में सक्षम होता है। आदर्श और शुचिता ही वह मूल-मंत्र है,जो जहाँ चाह , वहाँ राह के सिद्धांत को व्यवहार रूप में परिणत करता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६८ ☆ एक पौधा… उम्मीद भरा…… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना एक पौधा… उम्मीद भरा…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २६८ ☆ एक पौधा… उम्मीद भरा…

गाँव के बीचों-बीच एक छोटी-सी पगडंडी थी। उस पगडंडी से रोज कई लोग गुजरते थे—कुछ जल्दी में, कुछ थके हुए, और कुछ अपने ही विचारों में खोए हुए। लेकिन वहाँ एक बुजुर्ग महिला रहती थी, जिसका नाम था श्यामली अम्मा।

अम्मा रोज सुबह सूरज निकलते ही एक छोटा-सा पौधा लेकर पगडंडी के किनारे लगा देतीं। फिर उसे थोड़ा पानी डालतीं, थोड़ी माटी थपथपातीं और मुस्कुराकर कहतीं—

“बेटा, बढ़ते रहो… किसी की छाँव बनना।”

एक दिन गाँव के बच्चों ने अम्मा से पूछा,

“अम्मा, आप रोज एक पौधा क्यों लगाती हैं? इससे होगा क्या?”

 

अम्मा ने हँसकर कहा,

“बच्चों, जब मैं नहीं रहूँगी, ये पौधे मेरे शब्द बनकर बोलेंगे…

किसी को छाँव देंगे, किसी को फल देंगे, किसी को ऑक्सीजन देंगे।

एक पौधा सिर्फ पौधा नहीं होता—ये जीवन को बढ़ाने का प्रण होता है।”

 

उनकी बात बच्चों के दिल में उतर गई। अगले दिन बच्चे भी अपने-अपने हाथों में पौधे लेकर आ गए। फिर क्या था—

धीरे-धीरे हर घर से एक व्यक्ति निकलता…

हर हाथ में एक पौधा होता…

और हर मन में एक संकल्प।

 

कुछ महीनों में वही पगडंडी, जो कभी सूनी थी,

अब हरियाली से भर गई।

तितलियाँ उड़ने लगीं, परिंदे चहकने लगे,

और हवा में एक मीठी ठंडक फैल गई।

 

गाँव वालों ने महसूस किया कि

“एक पौधा लगाना छोटा काम नहीं,

ये आने वाली पीढ़ी के लिए दिया गया एक उपहार है।”

 

और आज वह गाँव पूरे इलाके में जाना जाता है—

“एक व्यक्ति, एक पौधा” गाँव।

 

क्योंकि वहाँ हर इंसान जान गया था कि

अगर हर व्यक्ति सिर्फ एक पौधा भी लगा दे…

तो धरती फिर से मुस्कुरा सकती है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८८ ☆ ~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ “फेसबुक की कहानी” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८८ ☆

?  आलेख ?~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ फेसबुक की कहानी ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

फेसबुक एक ऐसे विचार से शुरू हुआ था  जिसमें कुछ युवा अपने विश्वविद्यालय परिसर में आपस में जुड़ने का सरल तरीका खोज रहे थे। समय के साथ वही विचार इतना विशाल रूप ले चुका है कि दुनिया के लगभग हर कोने में लोग दिन की शुरुआत और बिस्तर पर दिन का अंत इसी मंच की खिड़की पर झांककर करते हैं। इसकी शुरुआत दो हजार चार में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से हुई थी और धीरे धीरे इंटरनेट से आज फेसबुक सीमित दायरे वाले कॉलेज नेटवर्क से निकलकर वैश्विक मंच बन गया है। इस यात्रा में इसके संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में बने रहे और आज भी कंपनी का नियंत्रण मुख्य रूप से उनके हाथ में ही है। बाद में कंपनी ने अपना नाम बदलकर मेटा प्लेटफार्म्स कर लिया, जबकि फेसबुक उसी नाम से अपनी सेवाएं देता रहा।

फेसबुक की सबसे बड़ी सफलता उसका फैलाव है। यह केवल परिचितों से संपर्क बनाए रखने का साधन नहीं रहा, बल्कि विचार, अनुभव, समाचार, कला, व्यापार, जनमत और मनोरंजन का ऐसा सम्मिलित मंच बन चुका है जिसकी तुलना किसी अन्य माध्यम से करना कठिन है। इसके उपयोगकर्ता दुनिया भर में करोड़ों की संख्या में हैं और हर दिन अरबों पोस्ट, फोटो, वीडियो और संदेश यहां पर साझा होते हैं। लोग अपने विचार व्यक्त करते हैं, समूह बनाते हैं, समुदायों से जुड़ते हैं, खरीद फरोख्त करते हैं, विज्ञापन चलाते हैं और अपनी पहचान को मजबूत करते हैं। यही व्यापकता इसे आज के दौर में सबसे प्रभावी डिजिटल मंचों में शामिल करती है।

फेसबुक के आर्थिक ढांचे की रीढ़ विज्ञापन है। इसका लगभग पूरा राजस्व इसी पर आधारित है। फेसबुक उपयोगकर्ताओं के व्यवहार और रुचियों को समझकर विज्ञापनदाताओं को ऐसा मंच देता है जहां वे लक्षित दर्शकों तक सीधे पहुंच सकते हैं। इस सटीकता ने छोटे और बड़े सभी व्यवसायों के लिए इसे अत्यंत उपयोगी बना दिया  है। धीरे धीरे कंपनी ने कंटेंट निर्माताओं के लिए भी अवसर खोले हैं। पेशेवर मोड, वीडियो मोनेटाइजेशन, पेड सदस्यता जैसे कई साधन उपयोगकर्ताओं को सीधे कमाई का अवसर दे रहे  हैं। इस तरह फेसबुक एक साधारण सोशल नेटवर्क से विकसित होकर एक व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार बन गया है।

फेसबुक का उपयोग समझदारी और सावधानी से किया जाए तो यह उपयोगकर्ता को अत्यंत लाभ पहुंचा सकता है। गोपनीयता सेटिंग्स की समय समय पर जांच, निजी जानकारी साझा करने में संयम, उपयोगी समूहों और पृष्ठों से जुड़ाव, संतुलित समय प्रबंधन और स्वस्थ संवाद की आदत इसे सकारात्मक अनुभव बना सकती है। जो लोग रचनात्मक हैं और नियमित रूप से लेख, फोटो या वीडियो साझा करते हैं, उनके लिए यह अपनी पहचान बनाने और  लोगों तक पहुंच बढ़ाने का एक प्रभावी मोबाइल एप है। इसे कंप्यूटर पर भी उसी सरलता से चलाया जा सकता है, किसी तरह के व्यक्तिगत डेटा स्टोरेज की अलग से आवश्यकता नहीं होती। निजी व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए तो अब फेसबुक आधुनिक ऑनलाइन बाजार का अनिवार्य उपकरण बन चुका है।

भविष्य की दिशा में फेसबुक और उसकी मूल कंपनी मेटा नई संभावनाओं की ओर कदम बढ़ा रही है। आभासी और संवर्धित वास्तविकता के माध्यम से वे एक ऐसे डिजिटल जगत की कल्पना कर रहे हैं जिसमें लोग एक दूसरे से केवल संवाद ही नहीं करेंगे बल्कि एक साझा आभासी संसार में चल फिर सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नए प्रयोग भी इस अनुभव को और उन्नत बनाने की ओर अग्रसर हैं। यह सब सफल हुआ तो सोशल कनेक्शन, मनोरंजन, शिक्षा और व्यापार के बिल्कुल नए स्वरूप सामने आ सकते हैं।

फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। गलत सूचना, गोपनीयता का जोखिम, अत्यधिक स्क्रीन समय से आँखें खराब होना ,सामाजिक ध्रुवीकरण और डिजिटल निर्भरता जैसे पहलू चिंता का विषय बने रहते हैं। इस कारण फेसबुक की उपयोगिता तभी अर्थपूर्ण है जब इसे समझदारी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए। एक ओर यह अवसरों की दुनिया खोलता है, दूसरी ओर यह अपने साथ अपेक्षित सतर्कता भी मांगता है।

समग्र रूप से फेसबुक आधुनिक समाज का ऐसा दर्पण बन गया है जिसमें पूरी दुनिया एक साथ दिखाई देती है। यह लोगों को जोड़ता है, विचारों को दिशा देता है, रचनात्मकता को बढ़ावा देता है और आर्थिक अवसरों के नए मार्ग खोलता है। साथ ही यह याद दिलाता है कि हर तकनीक उतनी ही उपयोगी है जितनी समझदारी से हम उसका उपयोग करें।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

इन दिनों न्यूयार्क से

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५५ ⇒ हार और उपहार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हार और उपहार।)

?अभी अभी # ८५५ ⇒ आलेख – हार और उपहार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इस बार शादी की सालगिरह पर पत्नी ने मुझसे उपहार स्वरूप सोने का हार मांगा है। मेरी गिरह में इतना पैसा नहीं है, वह भी जानती है, लेकिन सोना एक ऐसी चीज है, जिससे किसी का पेट नहीं भरता। जितना सोना, उतनी अधिक भूख।

देव उठ गए हैं ! शादियों का मौसम है। ज्वैलर्स की चांदी है। जितनी कभी शहर में पान की दुकानें होती थीं, उतनी आज ज्वैलर्स की दुकानें हो गई हैं।।

मेरा शहर भी अजीब है ! लोग यहां सराफा आभूषण खरीदने नहीं, चाट और पकवान खाने जाते हैं। सही भी है ! सोना चांदी भूख बढ़ा भी देते हैं। जो भला आदमी, आभूषण नहीं खरीद सकता, वह सराफा की चाट तो खा ही सकता है।

मंदी और तेजी दो विरोधाभासी शब्द है। मंदी में कीमतें कम नहीं होती, व्यापारी की ग्राहकी कम हो जाती है। जैसे जैसे बाज़ार में मंदी बढ़ती जाती है, भावों में तेजी और ग्राहकी एक साथ बढ़ने लगती है। जितनी भीड़ कभी पान की दुकान पर लगती थी, उतनी आज एक ज्वैलर की दुकान पर देखी जा सकती है।।

उपहार में पत्नी को हार देने की समस्या का समाधान भी पत्नी ने ही कर दिया। उसके एक कान का भारी भरकम बाला कहीं गुम गया। मैं उस वक्त शहर में नहीं था, इसलिए ढूंढो ढूंढो रे साजना, मेरे कान का बाला, जैसी परिस्थिति से बच गया।

महिलाओं के बारे में एक भ्रम है कि उनके पेट में कोई बात नहीं पचती। मैं इससे असहमत हूं। कई बार ऐसे मौके आए हैं, जब अप्रिय प्रसंगों को पत्नी ने मुझसे छुपाया है। आप इसके दो अर्थ लगा सकते हैं ! एक, वह मुझे दुखी नहीं देखना चाहती। दो, वह मुझसे डरती है। मुझे कान के बाले के गुमने की कानों कान खबर भी नहीं होती, अगर मैं उसे यह नहीं कहता, वे कान के बालेे कहां हैं, जो मैंने आपको 25वीं सालगिरह पर दिलवाए थे।।

कुछ बहाने बनाए गए, काम की अधिकता का बखान किया गया, लेकिन जब बात न बनी, तब राज़ खुला, कि अब दो नहीं, एक ही कान का बाला अस्तित्व में है। उन्हें लगा, अब सर पर पहाड़ टूटने वाला है। लेकिन मुझे उल्टे खुश देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। क्यों न, इस एक बाले के बदले में एक गले का हार ले लिया जाए इस सालगिरह पर, मैंने सुझाव दिया।

नेकी और पूछ पूछ ! उनके चेहरे के भावों को मैंने पढ़ लिया। तुरंत ज्वेलर से संपर्क साधा गया। बीस प्रतिशत के नुक़सान पर वह बाला बेचा गया, और एक अच्छी रकम और मिलाने पर उपहार-स्वरूप एक हार क्रय कर लिया गया।।

उपहार में दिए हार को हम गले में धारण कर सकते हैं, जीवन में मिली हार को हम गले लगाने से कतराते हैं। हमें हमेशा जीत ही उपहार में चाहिए, हार नहीं। ऐसा क्यों है, जीत को सम्मान, हारे को हरि नाम।

सुख दुख, सफलता असफलता को गले लगाना ही हारे को हरि नाम है। शादी की सालगिरह पर उपहार का हार भी एक सकारात्मक संदेश दे सकता है, कभी सोचा न था।।

(प्रसंगवश : शादी की ५२वीं सालगिरह, ४ दिसंबर १९७३)

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३१ – बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३१

☆ बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

जानलुई एक होटल में बैठा था। वह नाश्ता करने आया था। पास रेडियो पर गाना आ रहा था।

जानलुई गाना सुन रहा था। तभी उसके ध्यान में आया कि जब रेडियो में गाना दूसरे स्टेशन से आ सकता है तो इसी तरह चित्र भी हवा में क्यों नहीं आ सकते? यह सोचकर जानलुई वहाँ से उठा और पर चल दिया।

पर आ कर उसने रेडियो की कार्यविधि का अध्ययन किया। कही से कांच, घूमने वाला चक्का, वायर, बैटरी आदि सामान एकत्र कर के प्रयोग करने लगा।

चुंकि जानलुई को बचपन से फोटोग्राफी का शौक था। इसलिये यह फोटो और आवाज को एक साध यंत्र में लाना चाहता था।

इसी कोशिश में वह दिन-रात मेहनत करता रहा। एक कमरे में कैमरा लगा दिया। उसमें कुछ परिवर्तन किया। जिस तरह रेडियो की आवाज को विद्युत तरंग में बदलने की कोशिश की जाती है।

कुछ दिनों तक लगातार कोशिश करने के बाद वह इस कार्य में सफल हो गया। तब उसने दूसरे कमरे में चमकीले शीशे लगा कर उसके पीछे एक चक्का लगाया, जो एक मोटर से घूमता था। इसे कई यंत्रों से जोड़ कर तैयार किया गया था।

जानलुई ने कैमरे के सामने रंगीन गुड़िया रख दी। जिस के ऊपर फोकस से प्रकाश डाला गया। तब दूसरे कमरे में जा कर शीशे पर चित्र प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया।

बहुत कोशिश के बाद जानलुई चित्र को विद्युत तरंग से वापस चित्र प्राप्त करने में सफल हो गया। उसने यह चित्र एक सामान्य सिद्धांत को कार्य में बदल कर प्राप्त किया, जिस के अनुसार पहले चित्र को कैमरे में प्राप्त कर के विद्युत तरंग में बदला जाता है। फिर विद्युत तरंग को वापस चित्र में बदल दिया जाता है।

जानलुई द्वारा प्राप्त किए गए चित्र साफ नहीं आ रहे थे। इसलिये यह उन्हें साफ प्राप्त करने की कोशिश करने लगा।

उसके कमरे में तारों का जाल फैला हुआ था। वह उन्हें सावधानी से पार करता  था।मगर,  एक तार से उलझ गया, जिससे कमरे की खिड़की खुल गई।

एक हजार बैटरियों का प्रकाश सड़क पर फैल गया। लोग इकट्ठे हो गए। कोलाहल सुनकर मकान मालिक आ गया। उसने जानलुई को घर से निकाल दिया। तब जानलुई अपना सामान लेकर लंदन आ गया। जहाँ उसने अपना प्रयोग वापस दोहराया।

इस हेतु वह एक लड़के को ले कर आया। जिसे कमरे के सामने खड़ा किया। पर वह लड़का तेज प्रकाश देखकर घबरा गया और प्रकाश से दूर हट गया।

उधर जानलुई को कोई चित्र प्राप्त नहीं हो रहा था। वह पुनः कमरे में आया। देखा, लड़का प्रकाश से अलग खड़ा था।

“अरे भाई, डरो मत!” जानलुई ने जेब से कुछ रुपये निकाल कर लड़के को दिये.” तुम्हें कुछ नहीं होगा।”

फिर वह दूसरे कमरे में आ कर प्रयोग करने लगा। उसका प्रयोग सफल रहा। वह स्पष्ट चित्र प्राप्त करने में कामयाब हो चुका था।

इस तरह कई साल तक प्रयोग करने के बाद जानलुई बेयर्ड टेलीविजन का आविष्कार करने में सफल हुआ। यह आविष्कार उसकी अथक मेहनत का परिणाम है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५४ ⇒ ज़हर उगलना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ज़हर उगलना।)

?अभी अभी # ८५४ ⇒ आलेख – ज़हर उगलना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या यह विचित्र किन्तु सत्य नहीं कि जिस देश की मिट्टी सोना और हीरे मोती उगले, वहां उसी मिट्टी से बना इंसान अचानक ज़हर उगलने लगे। हमें अपनी धरती से सहन करने की शक्ति और प्रेरणा लेने को कहा जाता है। धरती भी आखिर हमारी मां है, उसका भी सब्र का कोई बांध होगा। जब इस धरती पर पाप बढ़ेंगे तो उस पर भी जरूर इसका असर पड़ेगा। ज्वालामुखी यूं ही नहीं फूट उठता। अरे कोई कारण होगा।

क्यों आते हैं भूकंप और जलजले और क्यूं फूटते हैं ज्वालामुखी। इंतहां हो गई बर्दाश्त की। बस कुछ कुछ यही फितरत इंसान की भी है। जब तक आदर और मान सम्मान मिलता है, वह भी मुंह में मिश्री घोलता है। दावत में अचानक रबड़ी खाते खाते अंधेरा हो जाए और रोशनी होते ही अगर पता चले कि रबड़ी में कुछ चलता फिरता काला था, तो निवाले का एकदम घर निकाला हो जाता है। प्रथमा ग्रासे मक्षिकापात: प्रथम ही ग्रास में हे सखी, मक्खी।।

हमारे भोजन को अमृत कहा गया है। सुगंधम् पुष्टि वर्धनम ! लेकिन अपमानजनक कड़वे बोलों के साथ भोजन नहीं पचाया जा सकता। कोई अगर एक तरफ कानों में ज़हर घोले और दूसरी ओर रबड़ी में केसर, तो जबान भी मुंह का स्वाद भूल जाती है। स्वादिष्ट केसरिया रबड़ी ज़हर हो जाती है।

कभी कभी खाने में असावधानीवश कुछ जहरीला पदार्थ मिल जाने से मेहमान फूड पॉइजनिंग के शिकार हो जाते हैं। उल्टी दस्त की शिकायत आम हो जाती है। इसी प्रकार अगर, किसी व्यक्ति को, अंधेरे में कोई जहरीला सांप काट खाए तो पूरे शरीर में जहर फैल जाता है। जितनी जल्दी जहर को शरीर से बाहर निकाला जाए, उतनी ही जल्दी स्वस्थ होने की संभावना बढ़ जाती है।।

करेला और नीम दोनों कड़वे होते हैं, लेकिन लाभकारी होते हैं। कड़वी बातें भी लाभकारी हो सकती हैं लेकिन स्वस्थ व्यक्ति को कभी जहर के इंजेक्शन नहीं दिए जाते।

लोग कैसे मीठा खाकर जहर उगल देते हैं। जरूर अंदर कहीं जहर का भंडार होगा।

कांटे से कांटा निकाला जाता है और लोहा ही लोहे को काटता भी है। सिर्फ एक बूंद जहर काफी होता है किसी स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ को जहरीला बनाने के लिए। कैसे होते होंगे जहरीले इंसान, जो सिर्फ नफरत की आग ही उगलते होंगे और जहर भरी बातों के तीर ही चलाते होंगे।।

जो सांपों को अभय देते हैं, भले ही उनके कलेजे पर सांप लौटे, वे नीलकंठ ही कहलाते हैं। बुराई रूपी जहर को न निगलना और ना ही उगलना। ब्लड बैंक तो सुना था, आशुतोष नीलकंठ तो पॉइजन बैंक हैं। एक ऐसा स्विस बैंक जहां ज़हर भी अमृत की तरह ही सुरक्षित है। अगर हमें भी अमर होना है तो सहनशक्ति और धैर्य के साथ, जहर को कंठ में ही धारण करना होगा। और कुछ ना सही, तो कम से कम, हम यह प्रार्थना तो कर ही सकते हैं ;

हे नीलकंठ, हे महादेव

ऐसी कृपा अब कर दो।

मेरे मन में ज़हर भरा है

उसको अमृत कर दो।

हे नीलकंठ हे महादेव।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५३ ⇒ संचार क्रांति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संचार क्रांति।)

?अभी अभी # ८५३ ⇒ आलेख – संचार क्रांति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे देश में क्रांतियाँ वैसे भी कम ही होती हैं ! आज़ादी के बाद ले-देकर एक संपूर्ण क्रांति हुई, और उसके बाद संचार क्रांति ! हमारे देश में जब भी क्रांति होती है, न जाने क्यों सत्ता परिवर्तन भी हो जाता है।

आज हमारे जिन हाथों में एंड्राइड फोन है, वह कभी एक पेजर के लिए भी तरस जाता था। पेजर को पैंट के बेल्ट के साथ एक रिवाल्वर की तरह लटकाया जाता था, पेजर की घंटी बजती थी, और आपको सन्देश मिलता था। पेजर-मैन दौड़कर किसी एस टीडी से कॉल लगा लेता था।।

फिल्मों में एक हास्य-अभिनेता सतीश कौशिक थे, डेविड धवन के कारण उनका एक किरदार पप्पू पेजर बहुत लोकप्रिय हुआ।

आज पप्पू लोकप्रिय है, और पेजर आउट ऑफ डेट। वैसे इतिहास गवाह है कि पप्पू भी हमारे लिए नया नहीं। हर पाँच परिवार में एक पप्पू पैदा होता है, जो माँ का भी लाड़ला होता है। पप्पू आज भी लाड़ला है, पेजर गायब हो गया।

काजल की कोठरी और कोयले की दलाली में काले हाथ, दो विपरीत परिस्थितियां हैं, कोलगेट कांड और 2-G स्पेक्ट्रम ने फिर क्रांति की, और कांग्रेस विक्स फॉर्मूला-44 बनकर रह गई। हरिवंश राय के वंशज एक आईडिया लेकर आए, वॉक एंड टॉक ! What an idea Sir ji ? आज अभिषेक कहाँ वॉक कर रहे हैं, और कहाँ टॉक, ऐश्वर्या ही जाने।।

कभी कुछ मीठा हो जाए, और नवरत्न तेल से मालिश के वाद, अगर कुछ दिन गुजरात में गुज़ार लिए जाएँ, तो क्या बुरा है। बाद में तो रोजी-रोटी के लिए वापस केबीसी में आना ही पड़ता है।

मन की बात के पश्चात देश में सेल्फ़ी-क्रांति आ गई। अब आप देश के प्रमुख सेवक के साथ भी सेल्फी ले सकते हैं। मधुर पलों की सेल्फी तक तो ठीक है, लेकिन खतरों के खिलाड़ी बनकर सेल्फ़ी लेना खतरे से खाली नहीं।।

आज इंसान की कमाई भी ऑन लाइन हो गई है, और खर्चे भी ऑन लाइन ! वह सुबह जागते ही ऑन लाइन हो जाता है। जिओ का फ्री डेटा उसके पास है। जब तक फ़ोन चार्ज होता है, वह भी चार्ज हो जाता है। फिर तो पूरा दिन ऑन लाइन ही निकलना है। दफ़्तर में भी ऑन लाइन, घर में भी ऑन लाइन ! और तो और गाँव में, भीड़ में, मेले में, अकेले में भी ऑन लाइन।

आज बच्चों को स्कूल में

i-lessons दिए जाते हैं। बच्चों को मोबाइल से दूर करना माँ-बाप से दूर करना जैसा है। ब्ल्यू-व्हेल से पीछा छूटा तो और कई खतरनाक मछलियाँ मौजूद है, एंड्राइड के तालाब में। राम नाम की माला जिन बुजुर्गों के हाथ में होनी थी, उनके हाथों में एंड्राइड फ़ोन देख यही कहा जा सकता है, हम 21 वीं सदी में पहुँच गए हैं। अगर गलती से कभी आपके घर नारायण पधार जाएँ, तो वीडियो-शॉट लेना न भूलें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५६ – देश-परदेश – गोल गप्पा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५६ ☆ देश-परदेश – गोल गप्पा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गोल गप्पे खाना भी एक कला हैं। हर व्यक्ति के खाने का तरीक़ा अलग अलग होता हैं। कभी गोल गप्पे के ठेले पर चटोरे लोगों को कुछ दूरी से इत्मीनान से देखिए, कसम से मुंह में पानी की बाढ़ ना आ जाय।

आज उपरोक्त समाचार को पढ़ा तो किसी जमाने में इस पर की गई रिसर्च याद आ गई। यदि आप चार लोगों से कम के ग्रुप में है, और खाने की गति धीमी है, फिर तो आप नुकसान में रहेंगे। कुछ लोग तो मुंह के अंदर बहुत दूर तक उंगलियों के सहारे गोल गप्पे को अंदर तक सुरक्षित छोड़ कर, आंनद प्राप्त करते हैं। कुछ अन्य लोग जिनका मुंह कुछ छोटा होता है वो गोल गप्पे को जिह्वा पर रख, एक उंगली से अंदर धकेल देते हैं। कुछ लोग तो टुकड़ा कर गोल गप्पे खा पाते हैं। इनके मुंह का आकार बहुत छोटा होता है, लेकिन ये लोग बड़ी बड़ी बातें खूब करते हैं। इनको देख कर ही “छोटा मुंह, बड़ी बात” जैसी किंवदंती का जन्म हुआ होगा।

गोल गप्पे की ख्याति पूरे विश्व में हो चली हैं। अमेरिका जैसे देश के सबसे बड़े ब्रांड आउटलेट “कास्को” तक ने गोल गप्पों की बिक्री आरंभ कर दी हैं। गोल गप्पे शर्त लगा कर खाए जाने की परंपरा देश में विगत कई दशकों से चल रही है।

जब हम गोल गप्पे खाते थे, तो जब भी ठेले वाले से पूछते थे, हो गए क्या ? उसका एक ही जवाब होता था, बस एक और बचा है, जिसको मीठी चटनी, बिना पानी के ग्रहण किया जाता था। पत्ते की कटोरी से, कागज की प्लेट से चाइना क्ले की प्लेट में गोल गप्पों का रस्वादन के अलावा कई बार ठेले वाले के हाथ से ही सीधा मुख में ही गप्प कर जाते थे।

व्हाट्स ऐप पर गोल गप्पों को लेकर कई भ्रांतियां फैलाई गई, लेकिन गोल गप्पों की खपत दिन दो गुनी और शाम चौगुनी बढ़ रही हैं। इसलिए ऊपर छपी खबर से डरना नहीं है। हमारे कुछ पाठक तो आलेख को मध्य में छोड़ कर गोल गप्पों के ठेले पर भाग गए है, आप क्यों नहीं गए, अभी तक?

© श्री राकेश कुमार

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५२ ⇒ क्रोध और अपमान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “क्रोध और अपमान।)

?अभी अभी # ८५२ ⇒ आलेख – क्रोध और अपमान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्रोध और अपमान एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी ने आपका सम्मान किया हो, और आपको क्रोध आया हो। क्रोध को पीकर किसी का सम्मान भी नहीं किया जा सकता। इंसान और पशु पक्षियों की तरह, शब्द भी अपनी जोड़ी बना लेते हैं। खुदा जब हुस्न देता है, तो नज़ाकत आ ही जाती है। बांसुरी कृष्ण के मुंह लग जाती है और गांडीव अर्जुन के कंधे पर ही शोभायमान होता है। हुस्नलाल के साथ भगतराम ही क्यों ! शंकर प्यारेलाल की जोड़ी नहीं बनी, लक्ष्मीकांत जयकिशन के लिए नहीं बने। जहां कल्याणजी हैं, वहां आनंदजी ही होंगे, नंदाजी अथवा भेरा जी नहीं। धर्मेंद्र हेमा की जोड़ी भी रब ने क्या बनाई है। शब्दों की ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे।

करेला और नीम चढ़ा ! भाई तुम आम के पेड़ पर भी चढ़ सकते थे। अगर आपका सार्वजनिक सम्मान हो रहा हो तो आपके मन में लड्डू ही फूटेंगे, आप अपमान के घूंट थोड़े ही पिएंगे। हंसी के साथ खुशी है, वार के साथ त्योहार, आदर के साथ अगर सत्कार है तो नौकरी के साथ धंधा। आसमान में अगर खुदा है तो ज़मीन पर बंदा है। धंदा जो कभी तेज रहा करता था, आजकल मंदा है। सूरज है तो किरन है, चंदा है तो चांदनी है।।

शब्दों में आपस में दोस्ती भी है और दुश्मनी भी। जब दुश्मनी की बात आएगी तो सांप – नेवले, भारत – पाकिस्तान और भारत – चीन का जिक्र होगा। कांग्रेस मोदीजी को फूटी आंखों नहीं सुहाएगी और कंगना कभी शिव सेना को माफ नहीं कर पाएगी। देव – असुर कभी एक थाली में बैठकर खाना नहीं खाएंगे, मोदीजी अब कभी चाय पीने लाहौर नहीं जाएंगे। न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।

जिस तरह बर्फ कभी जमती और कभी पिघलती है, शब्द भी कभी कभी जमते और पिघलते रहते है। ये ही शब्द कभी शोले बन जाते हैं तो कभी शब्दों को सांप सूंघ जाता है। शब्दों की मार से ही कभी किसी को सदमा होता है तो किसी को दमा। शब्द कानों में शहद भी घोल सकते हैं और ज़हर भी। कभी शब्द आंसू बनकर बह निकलते हैं तो कभी आग उगलने लगते हैं।।

शब्द ही भ्रम भी है और ब्रह्म भी। शब्दों का भ्रम जाल ही माया जाल है। शब्द ही जीव है, शब्द ही ब्रह्म। कभी नाम है तो कभी बदनाम। सस्ता शब्द अगर मूंगफली है तो महंगा शब्द बादाम। राम तेरे कितने नाम।

क्या कोई ऐसी रामबाण दवा है इस संसार में कि दुर्वासा को कभी क्रोध न आवे, चित्त की ऐसी स्थिति बन जावे कि मान अपमान दोनों उसमें जगह न पावे। शब्द मार करने के पहले ही पिघल जावे, तो शायद हमें क्रोध ही न आवे। शकर आसानी से पानी में घुल जाती है, सभी रंग मिलकर एक हो जाते। हमारा चित्त बड़ा विचित्र। यहां शब्द ही नहीं पिघल पाते। काश क्रोध और अपमान भी आसानी से द्रवित हो जावे। कितना अच्छा हो यह चित्त, बाल मन हो जावे, सब कुछ अच्छा बुरा, बहुत जल्द भूल जावे। लाख डांटे – डपटे, मारे मां, बच्चा मां से ही बार बार जाकर लिपट जावे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१४ – बेसुरा होना कठिन है ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१४ ☆ बेसुरा होना कठिन है… ?

एक संगीतमय आध्यात्मिक आयोजन से लौट रहे थे। वृंद के एक युवा गायक ने किसी संदर्भ में एकाएक कहा, “गुरुजी, बेसुरा गाना बहुत कठिन है।” उसके इस वाक्य पर पूरे वृंद में एक ठहाका उठा। कुछ क्षण तो मैं भी उस ठहाके में सम्मिलित रहा पर बाद में ठहाका अंतर्चेतना तक ले गया और चिंतन में बदल गया। इतनी सरलता से कितनी बड़ी बात कह गया यह होनहार युवक कि बेसुरा होना कठिन है।

जीवन जीने के लिए मिला है। जीने का अर्थ हर श्वास में एक जीवन उत्पन्न करना और उस श्वास को जी भर जीना है। श्वास और उच्छवास भी मिलकर एक लय उत्पन्न करते हैं, अर्थात साँसों में भी सुर है। सुर का बेसुरा होना स्वाभाविक नहीं है। वस्तुत:  ‘बेसुरा होना कठिन है’, इस वाक्य में अद्भुत जीवन-दर्शन छिपा है।  इस दर्शन का स्पष्ट उद्घोष है कि जीवन सकारात्मकता के लिए है।

स्मरण आता है कि जयपुर से वृंदावन की यात्रा में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से न्यायप्रणाली की विसंगतियों को लेकर संवाद हुआ था। उन्होंने बताया कि न्यायालय में आया हर व्यक्ति प्रथमदृष्टया न्यायदेवता के लिए निर्दोष है। उसे दोषी सिद्ध करने का काम पुलिस का है, व्यवस्था का है ।

महत्वपूर्ण बात है कि न्यायदेवता हरेक को पहले निर्दोष मानता है। इसका एक अर्थ यह भी है कि मनुष्य का मूल सज्जनता है। यह हम ही हैं जो भीतर के सज्जन को दुर्जन करने के अभियान में लगे होते हैं।

जीवन का अभियान सुरीला है, जीवन गाने के लिए है। नदी को सुनो, लगातार कलकल गा रही है। समीर को सुनो, निरंतर सरसर बह रहा है। पत्तों को सुनो, खड़खड़ाहट, एक स्वर, एक लय, एक ताल में गूँज रही है। बूँदों की टपटप सुनो, जो बरसात के साथ जब नीचे उतरती हैं तो एक अलौकिक संगीत उत्पन्न होता है। बादल की गड़गड़ाहट हो या बिजली की कड़कड़ाहट, संगीत का रौद्र रस अवतरित होता है। कभी रात्रि के नीरव में रागिनी का दायित्व उठाने वाले कीटकों के स्वर सुनो। बरसात में मेंढ़क की टर्र-टर्र सुनो।  कोयल की ‘कुहू’ सुनो, मोर की ‘मेहू’ सुनो। प्रकृति में जो कुछ सुनोगे वह संगीत बनकर कानों में समाएगा। शून्य में, निर्वात में जो कुछ अनुभव हो रहा है, वह संगीत है। तुम्हारे मन में जो गूँज रहा है, उसकी अनुगूँज भी संगीत है। हर तरफ राग है, हर तरफ रागिनी सुनाई पड़ रही है। यह कल्लोल है, यह नाद है, यही निनाद है।

इन सुरों को हम भूल गए। हमारे कान आधुनिकता और शहरीकरण के प्रदूषण से ऐसे बंद हुए कि प्रकृति का संगीत ही विस्मृत हो चला। हमने जीवन में प्रदूषण उत्पन्न किया, हमने जीवन में कर्कशता उत्पन्न की, हमने जीवन में कलह उत्पन्न किया, हमने जीवन में असंतोष उत्पन्न किया, हमने जीवन में अनावश्यक संघर्ष उत्पन्न किया। इन सबके चलते सुरीले से बेसुरे होने की होड़-सी लग गई।

कभी विचार किया कि इस होड़ में क्या-क्या खोना पड़ा?  परिवार छूटा, आपसी संबंध छूटे, संतोष छूटा, नींद छूटी, स्वास्थ्य का नाश हुआ। इतना सब खोकर कुछ पाया भी तो क्या पाया,…बेसुरा होना!.. सचमुच बेसुरा होना कठिन है।

संसार सुरीला है। जीवन के सुरीलेपन की ओर लौटो। तुम्हारा जन्म सुरीलेपन के लिए हुआ है।  सुरमयी संसार में सुरीले बनो। यही तुम्हारा मूल है, यही तुम्हारी प्रकृति है, यही तुम्हारी संस्कृति है।

स्मरण रहे, सुरीला होना प्राकृतिक है, सुरीला होना सहज है, सुरीला होना सरल है, बेसुरा होना बहुत कठिन है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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