श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जूता पुराण…“।)
अभी अभी # ८१३ ⇒ आलेख – जूता पुराण
श्री प्रदीप शर्मा
यूं तो फिलहाल त्योहारों और जीएसटी में भारी छूट का मौसम चल रहा है, बूंद बूंद की बचत से घड़ा भर रहा है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में हर तरफ जूता छाया हुआ है। यह जूता कोई साधारण जूता नहीं है, यह एक ऐतिहासिक कृत्य को अंजाम देने वाला सुप्रीम कोर्ट रिटर्न जूता है।
वैसे देखा जाए, तो जूते बहुत चलते हैं, क्योंकि आजकल लोग कम ही पैदल चलते हैं। मैं सिर्फ पैसे वसूल करने के लिए अधिक से अधिक पैदल चलता हूं, इसलिए मेरे जूते कम चलते हैं। मेरा जूता बहुत चल गया है, उसे शर्म आ गई, लेकिन मुझे अभी तक शर्म नहीं आई।।
थक हारकर एक महंगा जूता (चार अंकों वाला) खरीद ही लिया। जब एक विवाह समारोह में उसका उद्घाटन किया, तो उसने मेरा पांव ही काट लिया।
यह तो मेरी बिल्ली, मुझसे ही म्याऊं वाली बात हो गई। मैने अपना गुस्सा जूते पर निकाला और उसे ठंडे डब्बे में बंद कर दिया। जब कोई इंसान एक बार निगाह से उतर जाता है, तो फिर उसे मुंह नहीं लगाया जाता, फिर इस जूते की क्या औकात, जो मैं इसे सिर पर बिठाऊं।
हम भारतीय, वस्तुओं का मूल्य भी जानते हैं और उसकी उपयोगिता भी। घूरे से सोना बनाना कोई हमसे सीखे। हमारे लिए कोई वस्तु अनुपयोगी नहीं होती। यहां तक कि सड़े टमाटर और अंडों का सदुपयोग भी हम कवि सम्मेलन और नेताओं के भाषण के वक्त कर लिया करते हैं। राजनीतिक गोष्ठियों में जूता चलना तो आम बात है। इसके लिए जूतम पैजार जैसे शब्द का आविष्कार यूँ ही नहीं हो गया।।
वैसे तो राग दरबारी में जुतियाने पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है, लेकिन आप शायद नहीं जानते, कोल्हापुरी चप्पल का आविष्कार भी सिर्फ मजनुओं को पीटने के लिए ही हुआ है। गांवों में कभी चमरौधा जूता चलता था, जो चमड़े का होता था, और उस पर पॉलिश नहीं होती थी, अपितु उसे सरसों का तेल पिलाया जाता था।
चलते समय वह चर्र चर्र की आवाज करता था, लेकिन जब किसी को पड़ता था, तो उसकी तबीयत हरी हो जाती थी।
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है, जिसका उपयोग संसद से सड़क तक आसानी से किया जा सकता है। हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह अपना फटा पुराना जूता फेंककर नया खरीद ले, लेकिन किसी की जूते से पूजा करना यह किसी भी धर्म पद्धति में नहीं लिखा है। सम्मान में हार और अपमान में जूतों का हार, यह कहां की तहजीब है, कानून कायदा है।।
होते हैं कुछ कायर लोग, जिनमें शालीन तरीके से विरोध करने की ना तो तमीज होती है और ना ही हिम्मत। ऐसे लोग दूर से ही जूता फेंककर मारते हैं।
आम आदमी अदालत की अगर तौहीन करता है, तो यह अदालत की मानहानि कहलाती है। क्या न्याय के मंदिर में जूता चलाना, और मंदिर में जूते पहनकर जाना एक ही बात है। मंदिर और पुजारी को इसमें आपत्ति हो सकती है, लेकिन भगवान को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एक विशुद्ध आस्था का मामला है।
ईश्वर में विश्वास और न्याय के मंदिर पर अविश्वास और अश्रद्धा होने पर ही ऐसे कुकृत्यों को अंजाम दिया जा सकता है।।
जितना ईश्वर दयालु है उतने ही दयालु सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी निकले।
उन्होंने इस घटना का संज्ञान ही नहीं लिया। यक्ष प्रश्न, फिर आखिर वह जूता किसके सर पर पड़ा।
हमारी कहावत तो यही कहती है, जिसका जूता, उसी का सर। फिर भी दिल बहलाने को यह खयाल अच्छा है, कि कानून अंधा, गूंगा और बहरा हो सकता है, लेकिन सनातन प्रेमियों के रहते हमारे विष्णु भगवान असहाय, लाचार नहीं, सर्वशक्तिशाली, सर्व व्यापक, घट घट व्यापक, जगत नियंता, परम पिता परमेश्वर हैं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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