हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१३ ⇒ जूता पुराण ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जूता पुराण।)

?अभी अभी # ८१३  ⇒ आलेख – जूता पुराण ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यूं तो फिलहाल त्योहारों और जीएसटी में भारी छूट का मौसम चल रहा है, बूंद बूंद की बचत से घड़ा भर रहा है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में हर तरफ जूता छाया हुआ है। यह जूता कोई साधारण जूता नहीं है, यह एक ऐतिहासिक कृत्य को अंजाम देने वाला सुप्रीम कोर्ट रिटर्न जूता है।

वैसे देखा जाए, तो जूते बहुत चलते हैं, क्योंकि आजकल लोग कम ही पैदल चलते हैं। मैं सिर्फ पैसे वसूल करने के लिए अधिक से अधिक पैदल चलता हूं, इसलिए मेरे जूते कम चलते हैं। मेरा जूता बहुत चल गया है, उसे शर्म आ गई, लेकिन मुझे अभी तक शर्म नहीं आई।।

थक हारकर एक महंगा जूता (चार अंकों वाला) खरीद ही लिया। जब एक विवाह समारोह में उसका उद्घाटन किया, तो उसने मेरा पांव ही काट लिया।

यह तो मेरी बिल्ली, मुझसे ही म्याऊं वाली बात हो गई। मैने अपना गुस्सा जूते पर निकाला और उसे ठंडे डब्बे में बंद कर दिया। जब कोई इंसान एक बार निगाह से उतर जाता है, तो फिर उसे मुंह नहीं लगाया जाता, फिर इस जूते की क्या औकात, जो मैं इसे सिर पर बिठाऊं।

हम भारतीय, वस्तुओं का मूल्य भी जानते हैं और उसकी उपयोगिता भी। घूरे से सोना बनाना कोई हमसे सीखे। हमारे लिए कोई वस्तु अनुपयोगी नहीं होती। यहां तक कि सड़े टमाटर और अंडों का सदुपयोग भी हम कवि सम्मेलन और नेताओं के भाषण के वक्त कर लिया करते हैं। राजनीतिक गोष्ठियों में जूता चलना तो आम बात है। इसके लिए जूतम पैजार जैसे शब्द का आविष्कार यूँ ही नहीं हो गया।।

वैसे तो राग दरबारी में जुतियाने पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है, लेकिन आप शायद नहीं जानते, कोल्हापुरी चप्पल का आविष्कार भी सिर्फ मजनुओं को पीटने के लिए ही हुआ है। गांवों में कभी चमरौधा जूता चलता था, जो चमड़े का होता था, और उस पर पॉलिश नहीं होती थी, अपितु उसे सरसों का तेल पिलाया जाता था।

चलते समय वह चर्र चर्र की आवाज करता था, लेकिन जब किसी को पड़ता था, तो उसकी तबीयत हरी हो जाती थी।

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है, जिसका उपयोग संसद से सड़क तक आसानी से किया जा सकता है। हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह अपना फटा पुराना जूता फेंककर नया खरीद ले, लेकिन किसी की जूते से पूजा करना यह किसी भी धर्म पद्धति में नहीं लिखा है। सम्मान में हार और अपमान में जूतों का हार, यह कहां की तहजीब है, कानून कायदा है।।

होते हैं कुछ कायर लोग, जिनमें शालीन तरीके से विरोध करने की ना तो तमीज होती है और ना ही हिम्मत। ऐसे लोग दूर से ही जूता फेंककर मारते हैं।

आम आदमी अदालत की अगर तौहीन करता है, तो यह अदालत की मानहानि कहलाती है। क्या न्याय के मंदिर में जूता चलाना, और मंदिर में जूते पहनकर जाना एक ही बात है। मंदिर और पुजारी को इसमें आपत्ति हो सकती है, लेकिन भगवान को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एक विशुद्ध आस्था का मामला है।

ईश्वर में विश्वास और न्याय के मंदिर पर अविश्वास और अश्रद्धा होने पर ही ऐसे कुकृत्यों को अंजाम दिया जा सकता है।।

जितना ईश्वर दयालु है उतने ही दयालु सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी निकले।

उन्होंने इस घटना का संज्ञान ही नहीं लिया। यक्ष प्रश्न, फिर आखिर वह जूता किसके सर पर पड़ा।

हमारी कहावत तो यही कहती है, जिसका जूता, उसी का सर। फिर भी दिल बहलाने को यह खयाल अच्छा है, कि कानून अंधा, गूंगा और बहरा हो सकता है, लेकिन सनातन प्रेमियों के रहते हमारे विष्णु भगवान असहाय, लाचार नहीं, सर्वशक्तिशाली, सर्व व्यापक, घट घट व्यापक, जगत नियंता, परम पिता परमेश्वर हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९७ ☆ शिकायतें नहीं वाज़िब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शिकायतें नहीं वाज़िब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९७ ☆

☆ शिकायतें नहीं वाज़िब… ☆

न जाने कौन सी शिकायतों का हम शिकार हो गये/ जितना दिल साफ रखा, उतने हम गुनहगार हो गये–गुलज़ार की यह पंक्तियाँ हमें जीवन के कटु सत्य से अवगत कराती हैं। मानव जितना छल-कपट, राग-द्वेष व स्व-पर से दूर रहेगा, लोग उसे मूर्ख समझेंगे; अकारण दोषारोपण करेंगे और उसका उपहास करेंगे–जिसका मूल कारण है आत्मकेंद्रिता का भाव अर्थात् स्व में स्थित रहना और बाह्याडंबरों में लीन न होना तथा अपने से इतर व्यर्थ की बातों का चिंतन-मनन न करना। ऐसा इंसान दुनियादारी से दूर रहता है, मानव निर्मित कायदे-कानूनों की परवाह नहीं करता तथा प्रचलित परंपराओं, मान्यताओं व अंधविश्वासों में लिप्त नहीं होता। ऐसे व्यक्ति से लोगों को बहुत-सी शिकायतें रहती हैं, जिससे उसका दूर का नाता भी नहीं होता।

वैसे भी आजकल लोग शुक्रिया कम, शिकायतें अधिक करते हैं। वैसे तो यही दुनिया का दस्तूर है। शिकायत करने से अहम् का पोषण होता है और शुक्रिया करते हुए अहम् का विगलन व विसर्जन होता है और दूसरे को महत्ता देने का भाव रहता है, जो उन्हें स्वीकार्य नहीं होता। शिकायतें न करने से दोनों पक्षों का हित होता है।

शिकायत व निंदा का निकट का संबंध है। शिकायतें आप व्यक्ति के मुख पर करते हैं और निंदा उसके पीछे करते हैं। यदि हम दोनों में भेद करना चाहें, तो शिकायतें निंदा से बेहतर हैं और उनका समाधान भी लभ्य होता है। शायद! इसलिए ही कबीर ने निंदक को अपने समीप  रखने का संदेश दिया है, क्योंकि वह आपको आपकी कमियों, दोषों व सीमाओं से अवगत कराता है तथा स्वयं से अधिक अहमियत देता है; अपना अमूल्य समय आपके हित नष्ट करता है। है ना वह आपका सबसे बड़ा हितैषी? चलिए, उसके द्वारा निर्दिष्ट सुझावों पर ध्यान दें।

शिकायतें यदि स्वार्थ हित की जाती है तो उन पर ध्यान ना देना उचित है। यदि वे वाज़िब हैं, तो उसे दूर करने का प्रयास करें। इससे आत्मविश्वास ही नहीं, परहित भी होगा। परंतु यह तभी संभव है, जब आपके हृदय में किसी के प्रति मलिनता का भाव ना हो। उसके लिए आवश्यक है, अपने हृदय को गंगा जल की भांति पावन व निर्मल रखने की। जैसे गंगाजल बरसों तक पवित्र रहता है, उसमें कोई दोष उत्पन्न नहीं होता, हमें भी स्वयं को माया-मोह के बंधनों से मुक्त रखना चाहिए। ‘ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या’ को स्वीकारते हुए मानव शरीर को पानी के बुलबुले की भांति नश्वर, क्षणिक व अस्तित्वहीन स्वीकारना चाहिए और संसार को दो दिन का मेला, जहां मानव को दिव्य खुशी पाने के लिए एकांत में रहना अपेक्षित है, क्योंकि मौन हमें ऊर्जस्वित करता है।

समय नदी की भांति निरंतर गतिशील है तथा प्रकृति पल-पल रंग बदलती है। मौसम भी आते- जाते रहते हैं। इस संसार में जो भी मिला है, प्रभु का कृपा प्रसाद समझ कर स्वीकारें, क्योंकि सब यहीं छूट जाना है। ‘यह किराए का मकाँ है/  कौन तब तक ठहरेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जायेगा।’  वैसे शिकायत अपनों से होती है, गैरों से नहीं, क्योंकि शिकायत का सीधा संबंध निजी स्वार्थ से होता है; दूसरों के हृदय में आपके प्रति ईर्ष्या भाव नहीं होता– क्योंकि उनका आपके साथ गहन संबंध नहीं होता। अपनों की भीड़ में अपनों को तलाशना दुनिया का सबसे कठिनतम कार्य है। अक्सर अपने ही आप पर पीछे से वार करते हैं। इसलिए मानव को यह सीख दी गई है कि ‘पीठ हमेशा पीछे से मज़बूत रखें, क्योंकि शाबाशी और धोखा दोनों पीछे से मिलते हैं।’ जो इंसान दूसरों पर अधिक विश्वास करता है, सबसे अधिक धोखे खाता है।

बहुत कमियाँ निकालते हैं हम, दूसरों में अक्सर/ आओ! एक मुलाकात हम उस आईने से भी कर लें’ अर्थात् दूसरों से शिकायतें व दोषारोपण करने से पूर्व आत्मावलोकन करना अत्यंत आवश्यक है। आईना हमें हक़ीक़त से परिचित कराता है, अपने पराये का भेद बताता है/  ज़िंदगी कहाँ रुलाती है हमें/ रुलाते तो वे लोग हैं/  जिन्हें हम अपनी/ ज़िंदगी समझ बैठते हैं। वैसे भी सुक़ून बाहर से नहीं मिलता, इंसान के अंतर्मन में बसता है। बाहर ढूंढने पर तो उलझनें ही मिलेंगी। सो! ‘उलझनें बहुत हैं, सुलझा लीजिए/  बेवजह न किसी से ग़िला कीजिए।’ जी हाँ! मेरे गीत की पंक्तियाँ इसी कटु यथार्थ से परिचित कराती हैं कि जीवन में उलझनें बहुत है। परंतु हमें उनका समाधान अपने अंतर्मन में ढूँढना चाहिए, क्योंकि जब समस्या हमारे मन में है तो समाधान दूसरों के पास कैसे संभव है?

हम अपने मन के मालिक हैं और उस पर अंकुश लगा दिशा परिवर्तन कर सकते हैं। परंतु है तो यह अत्यंत कठिन, क्योंकि वह तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। ‘मन को मंदिर हो जाने दो/ देह को चंदन हो जाने दो/ मन में उठ रहे संशय को/ उमड़-घुमड़ कर बरस जाने दो’ स्वरचित गीत की पंक्तियाँ इसी भाव को प्रकट करती हैं। यदि मन मंदिर होगा, तो देह चंदन की भांति पावन रहेगी और मन प्रभु चरणों में समर्पित होगा। ऐसी स्थिति में संदेह, संशय व शंका के बादल बरस जाएंगे और मन उस दिशा  की ओर चल निकलेगा। ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ यदि आपका हृदय पवित्र है, तो आपको गंगा स्नान की आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसमें दुष्भावनाओं का वास नहीं होना चाहिए। परंतु 21वीं सदी इसका अपवाद है। आजकल वही व्यक्ति दोषी ठहराया जाता है, जिसका हृदय निर्मल, निश्छल व पवित्र होता है तथा उसमें कलुषता नहीं होती। ‘शक्तिशाली विजय भव’ आज का नारा है। निर्बल पर प्रहार किए जाते हैं। वैसे तो यह युगों-युगों की परंपरा है। आइए! स्वयं को इस जंजाल से मुक्त रखें। सरल, सहज व सामान्य जीवन जीएँ। अपेक्षा व उपेक्षा से दूर रहें, क्योंकि यह संसार दु:खालय है। जीवन अनमोल है और हर पल को अंतिम जानकर जीएँ। पता नहीं, यह हंसा तब उड़ जाएगा। खाली हाथ तू आया है/ खाली हाथ तू जाएगा। ‘जितना दिल साफ रखा/ उतना हम गुनहगार हो गए।’ परंतु हमें यही सोचना है कि जीवन यात्रा बहुत छोटी है। हमें तेरी-मेरी अर्थात् निंदा-स्तुति के जाल में नहीं फँसना है ।भले ही हम पर कितने ही इल्ज़ाम लगाए जाएं। झूठ के पाँव नहीं होते और सत्य सात परर्दों के पीछे से भी उजागर हो जाता है। संघर्ष अखरता ज़रूर है, लेकिन बाहर से सुंदर व भीतर से मज़बूत बनाता है।

समय और समझ दोनों को दोनों एक साथ किस्मत वालों को मिलते हैं, क्योंकि अक्सर समय पर समझ नहीं आती और समझ आने पर समय निकल चुका होता है। सो! दस्तूर-ए- दुनिया को समझिए, पर अपने मन को मालिन मत होने दें। ‘ज़िंदगी में समझ में आ गई तो अकेले में मेला/ समझ में नहीं आई तो मेले में अकेला।’ सो! चिंतन-मनन कीजिए और प्रसन्नता के भाव से ज़िंदगी बसर कीजिए। शिकायतें तज, शुक्रिया करें और जो मिला है, उसी में संतोष से रहें। यह जीवन व समय बहुत अनमोल है, लौट कर आने वाला नहीं। हर लम्हे को अंतिम साँस तक खुशी से जी लें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१२ ⇒ प्रशंसक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रशंसक।)

?अभी अभी # ८१२  ⇒ आलेख – प्रशंसक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गुण के गाहक सहस नर !

यह मनुष्य का स्वभाव है कि उसे जो चीज पसंद आती है, वह उसका प्रशंसक बन जाता है। हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते, मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना ! यह हकीकत भी हो सकती है और अतिशयोक्ति भी, लेकिन इसमें भी प्रशंसा का भाव ही निहित है। गुणगान भी प्रशंसा ही है, और तो और किसी चीज का विज्ञापन भी प्रशंसा ही। भले ही प्रशंसा आजकल पेशा बन गया हो, लेकिन सच तो यह है कि प्रशंसा हर इंसान की कमजोरी है। कुछ पति इतने कंजूस होते हैं कि दुनिया भर की तारीफ करेंगे, लेकिन कभी अपनी पत्नी की प्रशंसा में एक शब्द नहीं बोलेंगे। दो मीठे बोल ही तो प्रशंसा है। प्रशंसा जीवन का टॉनिक है। तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया। हम सब में एक प्रशंसक छुपा है।

कल अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों का दिन था। अमिताभ की एक पुरानी फिल्म थी, सौदागर, जरा उसके इस गीत पर गौर फरमाइए ;

हर हंसीं चीज का मैं तलबगार हूं।

रस का, फूलों का,

गीतों का बीमार हूं।।

कुछ ऐसे ही भाव इस गीत में भी देखे जा सकते हैं ;

आने से उसके आए बहार

जाने से उसके जाए बहार

बड़ी मस्तानी है, मेरी महबूबा।

रुत ये सुहानी है, मेरी महबूबा।।

एक प्रशंसक कोई संपादक, समीक्षक, आलोचक अथवा समाज सुधारक नहीं होता। एक प्रशंसक के लिए कोई स्कूल, कॉलेज नहीं, कोई कोचिंग क्लास नहीं, कोई डिग्री डिप्लोमा नहीं, उसका कवि, लेखक अथवा साहित्यकार होना भी जरूरी नहीं ! एक अंगूठा छाप, निरक्षर भी किसी का प्रशंसक हो सकता है। प्रशंसा पर किसी का कॉपीराइट नहीं।।

प्रेम में तो फिर भी ढाई अक्षर है, फैन जी हां, फैन में तो सिर्फ दो अक्षर है।

किसी का मुरीद होना, अथवा प्रशंसक होना क्या इतना आसान है। हमें पता ही नहीं चलता, हम कब किसके प्रशंसक बन जाते हैं। उसकी तारीफ के पुल बांधने लगते हैं, उसकी बुराई नहीं सुन सकते, लोगों से लड़ने लग जाते हैं। क्या किसी का प्रशंसक होना, उसकी गिरफ्त में होना नहीं। ऐसे ही प्रशंसक जब किसी गलत व्यक्ति या विचारधारा के प्रशंसक हो जाते हैं, तो गिरफ्तार भी हो जाते हैं।

मैं भी एक इंसान हूं, और किसी का प्रशंसक भी ! एक लंबी चौड़ी फेहरिस्त है, जो अगर शुरू हुई, तो खत्म होने का नाम नहीं लेगी। कहीं मेरी स्मरण शक्ति जवाब दे देगी तो कहीं मेरे शब्द और मेरी जुबां। एक शब्द है चुनिंदा जिसमें शामिल हैं मोहम्मद रफी, महमूद और अमीन सयानी, लता, सुरैया और खुर्शीद, मंटो, मोहन राकेश और शैलेश मटियानी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव वेद, परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल, कुबेरनाथ राय, विनोद खन्ना, जगजीत सिंह और गिरीश कर्नाड। पंडित जसराज, भीमसेन जोशी और कुमार गंधर्व, साहिर, शैलेंद्र और संगीतकार उषा खन्ना।।

जो इन चुनिंदा में शामिल नहीं, उन सबमें वे शामिल हैं, जिनके आप भी प्रशंसक हैं। सूर, तुलसी, कबीर और मीरा बाई के तो सब प्रशंसक हैं, अगर छूट जाती हैं तो सहजोबाई। इन्हें सुना नहीं जाता, गुना जाता है। जब किशोरी अमोणकर गाती हैं, म्हारो प्रणाम, बांके बिहारी जी, तो वही प्रशंसा स्मरण, कीर्तन और भजन में परिवर्तित हो जाती है। सहज समाधि लग जाती है।

प्रशंसा क्या है, राम का गुणगान, कृष्ण का ध्यान ही तो उस निर्गुण, निराकार, ओंकार की आराधना है। जहां साकार निरंकार एक होते हैं, यही वह सृष्टि है, वही सगुण है और वही निर्गुण।

जो घट घट में व्याप्त है, हम तो वास्तव में उसी के प्रशंसक हैं ;

जाकी रही भावना जैसी।

प्रभु मूरत, तिन देखी तैसी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप  ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप ? ?

तीसरा शब्ददीप

आज भाईदूज है। प्रातःभ्रमण पर हूँ। हर तरफ सुनसान, चुप। दीपावली के बाद शहर अलसाया हुआ है। सोसायटी का चौकीदार भी जगह पर नहीं है। इतनी सुबह दुकानें अमूमन बंद रहती हैं पर अख़बार वालों, मंडी की ओर जाते सब्जीवालों, कुछ फलवालों, जल्दी नौकरी पर जाने वालों और स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों से सड़क ठसाठस भरी रहती है। आज सार्वजनिक छुट्टी है। नौकरीपेशा, विद्यार्थी सब अपने-अपने घर पर हैं। सब्जी मंडी भी आज बंद है। अख़बारों को कल छुट्टी थी। सो आज अख़बार विक्रेता भी नहीं हैं। वातावरण हलचल की दृष्टि से इतना शांत जैसे साइबेरिया में हिमपात के बाद का समय हो।

वातावरण का असर कुछ ऐसा कि लम्बे डग भरने वाला मैं भी कुछ सुस्ता गया हूँ। डग छोटे हो गये हैं और कदमों की गति कम। देह मंथर हो तो विचारों की गति तीव्र होती है। एकाएक इस सुनसान में एक स्थान पर भीड़ देखकर ठिठक जाता हूँ। यह एक प्रसिद्ध पैथालॉजी लैब का सैम्पल कलेक्शन सेंटर है। अलसुबह सैम्पल देने के लिए लोग कतार में खड़े हैं। उल्लेखनीय है कि इनमें वृद्धों के साथ-साथ मध्यम आयु के लोग काफी हैं। मुझे स्मरण हो आता है, ‘ शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसम्पदा।’

सबसे बड़ी सम्पदा स्वास्थ्य है। हम में से अधिकांश  अपनी जीवन शैली और लापरवाही के चलते प्रकृति प्रदत्त इस सम्पदा की भलीभाँति रक्षा नहीं कर पाते हैं। चंचल धन और पार्थिव अधिकार के मद ने आँखों पर ऐसी पट्टी बांध दी है कि हम त्योहार या उत्सव की मूल परम्परा ही भुला बैठे हैं। आद्य चिकित्सक धन्वंतरी की त्रयोदशी को हमने धन की तेरस तक सीमित कर लिया। रूप की चतुर्दशी, स्वरूप को समर्पित कर दी। दीपावली, प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने, मूल्यों की विजय एवं अर्चना का प्रतीक न होकर केवल द्रव्यपूजन का साधन हो गई।

उत्सव और त्योहारों को उनमें अंतर्निहित उदात्तता के साथ मनाने का पुनर्स्मरण हमें कब होगा? कब हम अपने जीवन के अंधकार के विरुद्ध एक दीप प्रज्ज्वलित करेंगे? जिस दिन एक भी दीपक सुविधा के अर्थ के अंधेरे के आगे सीना ठोंक कर खड़ा हो गया, यकीन मानिये, अमावस्या को दीपावली होने में समय नहीं लगेगा।

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६२ ☆ कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६२ ☆ कार्तिक मास: आँवला नवमी: स्वास्थ लाभ का पर्याय

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को  आँवला नवमी,अक्षय नवमी या धात्री नवमी भी कहा जाता है।इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है।

माना जाता है कि इस वृक्ष में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी सहित निवास करते हैं।जो व्यक्ति इस दिन आँवले की पूजा और इसका दान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और गरुड़ पुराण में  इसे“अमृत फल” कहा गया है ।इसकी छाया में बैठने मात्र से भी पाप नष्ट होते हैं। ये सब तो आध्यात्मिक महत्व है । इसके साथ ही इसके औषधीय गुण भी हैं जैसे-

त्रिदोष नाशक: वात, पित्त, कफ — तीनों दोषों को संतुलित करता है।

विटामिन C का भंडार: एक आँवले में एक संतरे से 20 गुना अधिक विटामिन C होता है।

  • प्रतिरक्षा शक्ति (इम्युनिटी) बढ़ाता है।
  • बालों को काला और घना रखता है।
  • आंखों की रोशनी में सुधार करता है।
  • पाचन क्रिया सुधारता है।
  • त्वचा को चमकदार बनाता है।

च्यवनप्राश, त्रिफला, आंवला मुरब्बा, रस, तेल आदि में मुख्य घटक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है ।

हरियाली से जुड़े पर्व सनातन संस्कृति को वैज्ञानिक आधार पर भी संपुष्ट करते हैं ।

यह वृक्ष यह हवा को शुद्ध करता है।इसके पत्ते, फल, और जड़ सब उपयोगी है।भूमि की उर्वरता बनाए रखने में मदद करता है।

हमारी संस्कृति हमें अध्यात्म के साथ- साथ चैतन्य भी बनाती है, हम सपरिवार वनभोज करने आँवला वृक्ष के नीचे जाते हैं, उसकी छायातले बैठकर, पूजन अर्चन करके महाप्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करते हैं ।

आइए मिलकर संकल्प लें कि इस तरह के त्योहारों से अपने बच्चों को जरूर जोड़ेंगे जिससे ये चेतना दिनों दिन बढ़े और हमारी धरती हरी- भरी रहे ।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८११ ⇒ गाँधीजी की बकरी और… तीन बंदर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाँधीजी की बकरी और… तीन बंदर।)

?अभी अभी # ८११  ⇒ आलेख – गाँधीजी की बकरी और… तीन बंदर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बकरी के लिए गाँधीजी का स्मरण ज़रूरी है क्या ? वैसे हमें बकरी क्यूँ याद आने लगी ! बचपन में गाँधीजी के तीन बंदर हर जगह नज़र आते थे, किताबों में और नीति कथाओं में। अब हम बड़े हो गए ! बच्चे भी अब जिंगल से ऊपर उठ चुके हैं। ब्लू व्हेल तक उनकी गहराई है आजकल।

आइए ! बकरी के साथ बंदर की ही बात भी कर लें। गाँधीजी बकरी का दूध पीते थे और तीन बंदरों द्वारा प्रतीक रूप में, उनके विचार लोगों तक पहुंचाए जाते थे। बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो। जब एक बंदर इतने अनुशासन में रहता है, तो हम तो आदमी हैं।।

आज का तर्क है, आँखें बंद करने से बुराई खत्म नहीं हो जाएगी ! आंखें खोलकर बुराई को खत्म करने की कोशिश करो। बुरा नहीं बोलने में क्या आपत्ति है भाई ? कोई हमें भला-बुरा कहता रहे, और हम चुपचाप बैठे रहें ? कतई नहीं ! हम या तो उसका मुँह नोंच लेंगे, या ईंट का जवाब पत्थर से देंगे।

बुरा मत सुनो ! एक बंदर से कुछ तो सीख ले लो। चलो हमने यह बात मान ली। जो हमें बुरा लगता है, हम उसे अनसुनी कर देते हैं लेकिन अगर कोई किसी की बुराई कर रहा होता है, तो कान खड़े हो जाते हैं। कंट्रोल नहीं होता। दीवारों से कान लगाकर सुनते हैं। इसीलिए आजकल गाँधी जयंती पर भी तीन बंदरों के आदर्शों पर ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया जाता।।

लेकिन बकरी की उपेक्षा हमसे बर्दाश्त नहीं हुई ! आखिर गाँधीजी की बकरी ने हमारा क्या बिगाड़ा है। कितने प्रतिशत गांधीवादी बकरी का दूध पीते हैं ? आपके ऑप्शन हैं ! 100 %, 75 %, 33 % अथवा 0 %।

चर्खे की चर्चा आज इसलिए भी प्रासंगिक नहीं है कि आजकल चरखा केवल फोटू खिंचाने के काम आता है। हमारे नंबर एक स्कूल के प्रधानाध्यापक रामचंद्र जोशी पक्के गांधीवादी थे। वे हमसे स्कूल में तकली कतवाते थे और सुबह की प्रार्थना में सर्व-धर्म प्राथना भी करवाते थे। उनके ही प्रयासों से, हमारे स्कूल में पधारे, विनोबा जी के दर्शन लाभ का सुअवसर हमें प्राप्त हुआ था।

आज गाँधीजी का यत्र, तत्र, सर्वत्र गुणगान हो रहा है लेकिन बंदर तो ठीक, बकरी का भी कहीं पता नहीं है। गाँधीजी का सेवाग्राम एक बकरी बिना अधूरा था। हम गाय का दूध पीते हैं, भैंस का दूध पीते हैं, अमूल और साँची का दूध पी सकते हैं, तो बकरी ने हमारा क्या बिगाड़ा है। बकरी के दूध में वे सभी गुण विद्यमान हैं जो गाय के दूध में है। इसमें कैल्शियम है और प्रोटीन भी। इम्यून पॉवर को बढ़ाता है, कोलोस्ट्रॉल घटाता है, रक्तचाप सामान्य रखता है, बच्चों के शरीर के लिए लाभकारी माना गया है बकरी का दूध।।

लाठी में गुण बहुत है, की तर्ज़ पर बकरी में भी बहुत गुण हैं, लेकिन दूध के अलावा न तो हमने कहीं बकरी के दूध का दही बनते देखा, और न ही घी। मावे की तो बात छोड़ ही दीजिए। कुछ तो गड़बड़ है।

गाँधी जी ने बकरी का दूध तो पीया, लेकिन कभी दूध का फर्ज नहीं निभाया। अहिंसा के पुजारी बकरियों का दूध पीते रहे, और बकरी के परिवार की बलि चढ़ती रही। स्वदेशी आंदोलन और हिन्दू मुस्लिम एकता में वे इतने व्यस्त रहे कि इन छोटी छोटी बातों पर उनका ध्यान ही नहीं गया। अंग्रेजों से पंगा लेना ज़्यादा आसान लगा उन्हें।।

हम भले ही गाँधीजी के बंदरों के संदेश भूल जाएँ, एक भेड़ बकरी पालने वाला बकरी के दूध को नहीं भूला ! वह आज भी अपने बच्चों को बकरी का दूध ही पिलाता है। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वह गाँधीजी के बताए रास्ते पर ही चल रहा है। आप, हम और गाँधीजी के अनुयायी कब पियेंगे, कभी बकरी का दूध ?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्द-दीप ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

पुनर्पाठ-

? संजय दृष्टि – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्द-दीप ? ?

दूसरा शब्द-दीप

आज बलि प्रतिपदा है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि। देश के अनेक भागों में बोलचाल की भाषा में इसे पाडवा कहते हैं।

शाम के समय फिर बाज़ार में हूँ। बाज़ार के लिए घर से अमूमन पैदल निकलता हूँ। दो-ढाई किलोमीटर चलना हो जाता है, साथ ही पात्र-परिस्थिति का अवलोकन और खुद से संवाद भी।

दीपावली यानी पकी रसोई के दिन। सोचता हूँ फल कुछ अधिक ले लूँ ताकि पेट का संतुलन बना रहे। मंडी से फल लेकर मेडिकल स्टोर की ओर आता हूँ। एक आयु के बाद फलों से अधिक बजट दवाइयों का होता है।

सड़क खचाखच भरी है। दोनों ओर की दुकानों ने सड़क को अपने आगोश में ले लिया है या सड़क दुकानों में प्रवेश कर गई है, पता ही नहीं चलता। दुकानदार मुहूर्त की बिक्री करने में और ग्राहक उनकी बिक्री करवाने में व्यस्त हैं। जहाँ पाँव धरना भी मुश्किल हो उस भीड़ में एक बाइक पर विराजे ट्रिप्सी ( ट्रिपल सीट का यह संक्षिप्त रूप आजकल खूब चलन में है)  मतलब तीन नौजवान गाड़ी आगे ले जाने की नादानी करना चाहते हैं। कोलाहल में हॉर्न की आवाज़ खो जाने से कामयाबी कोसों दूर है और वे बुरी तरह झल्ला रहे हैं। भीड़ मंथर गति से आगे बढ़ रही है। देह की भीड़ में मन का एकांत मुझे प्रिय है। मन खुद से बातें करने में तल्लीन है और देह भीड़ के साथ कदमताल। किर्रररर .. किसी प्राणी के एकाएक आगे आ जाने से कोई बस ड्राइवर जैसे ब्रेक लगाता है, वैसे ही भीड़ की गति पर विराम लग गया। कौतूहलवश आँखें उस स्थान पर गईं जहाँ से गति शून्य हुई थी। देखता हूँ कि दो फर्लांग आगे चल रही लगभग अस्सी वर्ष की एक बूढ़ी अम्मा एकाएक ठहर गई थीं। अत्यंत साधारण साड़ी, पैरों में स्लीपर, हाथ में कपड़े की छोटी थैली। बेहद निर्धन परिवार से सम्बंध रखने वाली, सरकारी भाषा में ‘बीपीएल’ महिला। हुआ यों कि विपरीत दिशा से आती उन्हीं की आयु की, उन्हीं के आर्थिक वर्ग की दूसरी अम्मा उनके ठीक सामने आकर ठहर गई थीं। दोनों ओर का जनसैलाब भुनभुना पाता उससे पहले ही विपरीत दिशा से आ रही अम्मा भरी भीड़ में भी जगह बनाकर पहली के पैरों में झुक गईं। पूरी श्रद्धा से चरण स्पर्श किये। पहली अम्मा के चेहरे पर मान पाने का नूर था।  स्मितहास्य दोनों गालों पर फैल गया था। हाथ उठाकर पूरे मन से आशीर्वाद दिया। प्रणाम करने वाली ने विनय से ग्रहण किया। दोनों अपने-अपने रास्ते बढ़ीं, भीड़ भी चल पड़ी।

दीपावली की धोक देना, प्रतिपदा को मिलने जाना, प्रणाम करने की परम्पराएँ जाने कहाँ लुप्त हो गईं! पश्चिम के अंधानुकरण ने सामासिकता की चूलें ही हिलाकर रख दीं।

हिलाकर रखनेवाला एक तथ्य यह भी है कि वर्तमान में सर्वाधिक युवाओं का देश, भविष्य में सर्वाधिक वृद्धों का होगा। परम्पराओं की तरह उपेक्षित वृद्ध या वृद्धों की तरह उपेक्षित परम्पराएँ!  हम अपनी परम्पराओं को धोक देंगे, उनका चरणस्पर्श करेंगे, उनसे आशीर्वाद ग्रहण करेंगे या ‘हाय’ कहकर ‘बाय’ करते रहेंगे?

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८१० ⇒ लिखावट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लिखावट।)

?अभी अभी # ८१०  ⇒ आलेख – लिखावट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लिखावट को बोलचाल की हिंदी में हैंडराइटिंग कहते हैं ! अगर इस उम्र में कोई आपसे कहे कि आप अपनी लिखावट सुधारो, बहुत खराब है, तो आपको कितना बुरा लगेगा। लेकिन जब बुरा समय आता है, तो ऐसा ही होता है।

आपकी हैंडराइटिंग कितनी भी खराब होगी, पढ़ने में तो आ ही जाती होगी ! लेकिन इन डॉक्टरों की लिखावट का तो बस मरीज़ ही मालिक है। उधर केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत योजना की घोषणा की, इधर मेडिकल कॉलेज ने डॉक्टरों की लिखावट सुधारने के लिए वर्कशॉप आयोजित करने का निर्णय ले लिया। जग-जाहिर हो गया, डॉक्टरों का इलाज कितना भी लाजवाब हो, उनकी हैंडराइटिंग तो माशा-अल्लाह ही है।।

हम छोटे थे, तो स्कूल में सुन्दर-लेखन प्रतियोगिता होती थी ! सुंदर लेखन पर पुरस्कार दिया जाता था। अगर लिखावट खराब हो, तो किसी सुंदर लिखावट वाले लड़के से प्रेमपत्र लिखवाना एक आवश्यक मज़बूरी हो जाती थी। लड़कियों की लिखावट तो उनके चेहरे की सुंदरता से ही टपकती नज़र आती थी।

हम भी आज डॉक्टर ही होते, अगर हमारा बचपन सुंदर लेखन में स्वाहा न हो गया होता ! पहले हिंदी अंग्रेज़ी का अक्षर-ज्ञान, उँगलियों पर गिनती-पहाड़ा, पट्टी-पेम के बाद कॉपी पर पेंसिल से लिखाई। हिंदी अंग्रेज़ी लेखन की अलग कॉपी, अंग्रेज़ी सिर्फ़ बड़ी, छोटी ही नहीं, इटैलिक भी ! हर अक्षर की पूँछ और मूँछ दोनों रहती थी।।

स्याही-दवात और होल्डर ही हमारे नसीब में था तब ! पार्कर पेन का तो बस नाम ही सुना था। क्रोसिन की गोल गोली जैसी स्याही की टिकली आती थी, जिसे पानी की दवात में घोल दिया जाता था, और स्याही तैयार ! होल्डर की निब भी टूटने पर बदलनी पड़ती थी। पिताजी की जेब में लगे फाउन्टेन पेन को बड़ी हसरत की निगाह से देखा करते थे।

हमारे भी दिन फिरे ! हमें भी पेन नसीब हुआ। तब पेन भी स्याही वाले ही आते थे। पेट्रोल की तरह पेन का मुँह खोल स्याही ड्रॉपर से टपकायी जाती थी, और स्याही भी camel की ही होती थी। कितनी बार बस्ता खराब हुआ, ज़ेब ख़राब हुई, कागज़ खराब हुए, तब जाकर लिखावट रंग लाई।।

परीक्षा में कितने पन्ने रंगे होंगे,

जीवन के कितने पृष्ठ अनलिखे रह गए होंगे, इसका कोई दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं। आज इंसान बच्चे से गया बीता हो गया है, जो कभी दोस्तों को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था, डायरियां लिखा करता था, अचानक लिखना छोड़ फेसबुक पर चला गया है। बरसों पुरानी चिट्ठियों को सहेजकर रखने वाला, फ़ोन पर मैसेज पढ़ते ही डिलीट कर देता है। कागज़ बचाने के चक्कर में, दुनिया डिजिटल हो रही है। हैंडराइटिंग नहीं, पर्यावरण सुधारिये।

मुझे डॉक्टरों से सहानुभूति है। ज़ल्दी का काम डॉक्टर का ! ज़ल्दी में लिखावट ऐसी ही हो जाती है। याद है जब क्लास में डिक्टेशन लेते थे, हम पैसेंजर और हमारे सर, फ्रंटियर मेल। घर जाकर फेयर ना करो, तो बिल्कुल डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन नज़र आता था।।

बहुत कम शुभचिंतक मिलते हैं इस ज़माने में ! खुद को सुधारिये, कहने वाले कई समाज सुधारक मिल जाएँगे। आपका सही शुभचिंतक वही, जो आपसे कहे, कृपया अपनी हैंडराइटिंग

यानी लिखावट सुधारिये।

मोती जैसे दाँत हों,

मोती जैसे शब्द।

जो भी पढ़े लिखावट आपकी

हो जाए निःशब्द।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप ? ?

पहला शब्ददीप…✍️

दीपावली की शाम.., बाज़ार से लक्ष्मीपूजन के भोग के लिए मिठाई लेकर लौट रहा हूँ। अत्यधिक भीड़ होने के कारण सड़क पर जगह-जगह बैरिकेड लगे हैं। मन में प्रश्न उठता है कि बैरिकेड भीड़ रोकते हैं या भीड़ बढ़ाते हैं?

प्रश्न को निरुत्तर छोड़ भीड़ से बचने के लिए गलियों का रास्ता लेता हूँ। गलियों को पहचान देने वाले मोहल्ले अब अट्टालिकाओं में बदल चुके। तीन-चार गलियाँ अब एक चौड़ी-सी गली में खुल रही हैं। इस चौड़ी गली के तीन ओर शॉपिंग कॉम्पलेक्स के पिछवाड़े हैं। एक बेकरी है, गणेश मंदिर है, अंदर की ओर खुली कुछ दुकानें हैं और दो बिल्डिंगों के बीच टीन की छप्पर वाले छोटे-छोटे 18-20 मकान। इन पुराने मकानों को लोग-बाग ‘बैठा घर’ भी कहते हैं।

इन बैठे घरों के दरवाज़े एक-दूसरे की कुशल क्षेम पूछते आमने-सामने खड़े हैं। बीच की दूरी केवल इतनी कि आगे के मकानों में रहने वाले इनके बीच से जा सकें। गली के इन मकानों के बीच की गली स्वच्छता से जगमगा रही है। तंग होने के बावजूद हर दरवाज़े के आगे रंगोली रंग बिखेर रही है।

रंगों की छटा देखने में मग्न हूँ कि सात-आठ साल का एक लड़का दिखा। एक थाली में कुछ सामान लिए, उसे लाल कपड़े से ढके। थाली में संभवतः दीपावली पर घर में बने गुझिया या करंजी, चकली, बेसन-सूजी के लड्डू हों….! मन संसार का सबसे तेज़ भागने वाला यान है। उल्टा दौड़ा और क्षणांश में 45-48 साल पीछे पहुँच गया।

सेना की कॉलोनी में हवादार बड़े मकान। आगे-पीछे  खुली जगह। हर घर सामान्यतः आगे बगीचा लगाता, पीछे सब्जियाँ उगाता। स्वतंत्र अस्तित्व के साथ हर घर का साझा अस्तित्व भी। हिंदीभाषी परिवार का दाहिना पड़ोसी उड़िया, बायाँ मलयाली, सामने पहाड़ी, पीछे हरियाणवी और नैऋत्य में मराठी।  हर चार घर बाद बहुतायत से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते पंजाबी। सबसे ख़ूबसूरत पहलू यह कि राज्य या भाषा कोई भी हो, सबको एकसाथ जोड़ती, पिरोती, एक सूत्र में बांधती हिंदी।

कॉलोनी की स्त्रियाँ शाम को एक साथ बैठतीं। खूब बातें होतीं। अपने-अपने  के प्रांत के व्यंजन बताती और आपस में सीखतीं। सारे काम समूह में होते। दीपावली पर तो बहुत पहले से करंजी बनाने की समय सारणी बन जाती। सारणी के अनुसार निश्चित दिन उस महिला के घर उसकी सब परिचित पहुँचती। सैकड़ों की संख्या में करंजी बनतीं। माँ तो 700 से अधिक करंजी बनाती। हम भाई भी मदद करते। बाद में बड़ा होने पर बहनों ने मोर्चा संभाल लिया।

दीपावली के दिन तरह-तरह के पकवानों से भर कर थाल सजाये जाते। फिर लाल या गहरे कपड़े से ढककर मोहल्ले के घरों में पहुँचाने का काम हम बच्चे करते। अन्य घरों से ऐसे ही थाल हमारे यहाँ भी आते।

पैसे के मामले में सबका हाथ तंग था पर मन का आकार, मापने की सीमा के परे था। डाकिया, ग्वाला, महरी, जमादारिन, अखबार डालने वाला, भाजी वाली, यहाँ तक कि जिससे कभी-कभार खरीदारी होती उस पाव-ब्रेडवाला, झाड़ू बेचने वाली, पुराने कपड़ों के बदले बरतन देनेवाली और बरतनों पर कलई करने वाला, हरेक को दीपावली की मिठाई दी जाती।

अब कलई उतरने का दौर है। लाल रंग परम्परा में सुहाग का माना जाता है। हमारी सुहागिन परम्पराएँ तार-तार हो गई हैं। विसंगति यह कि अब पैसा अपार है पर मन की लघुता के आगे आदमी लाचार है।

पीछे से किसी गाड़ी का हॉर्न तंद्रा तोड़ता है, वर्तमान में लौटता हूँ। बच्चा आँखों से ओझल हो चुका। जो ओझल हो जाये, वही तो अतीत कहलाता है।

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© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८०९ ⇒ प्रेम और विवाह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रेम और विवाह।)

?अभी अभी # ८०९  ⇒ आलेख – प्रेम और विवाह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे भारतीय परिवेश में प्रेम और विवाह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहां प्रेम है, वहां विवाह जरूरी है, जहां विवाह है, वहां प्रेम जरूरी नहीं। विवाह एक संस्कार है, एक मर्यादा है, विवाह एक मर्यादित प्रेम है। प्रेम के सूत्र में धर्म का मोती पिरोकर मंगल सूत्र तैयार किया जाता है। विवाह को मंगल परिणय नाम दिया जाता है। अग्नि को साक्षी मानकर इसे एक पवित्र बंधन माना गया है, किसी राजनीतिक पार्टी का गठबंधन नहीं।

विवाह एक परंपरा है और एक समय में विवाह के कई प्रकार प्रचलन में थे और विधि और विधान द्वारा मान्य थे। आज की परिस्थिति में सिर्फ विवाह है और सिर्फ प्रेम विवाह है।।

प्रेमी प्रेमिका को कल तक सामाजिक मान्यता नहीं थी, लिव इन को तो अब वैधानिक मान्यता भी मिल चुकी है, जिसमें धर्म और नैतिकता का भले ही अभाव हो, उदात्त प्रेम संभवतः इसका आधार हो।

राधा और कृष्ण के पारलौकिक प्रेम को आध्यात्मिक और धार्मिक मान्यता तो खैर मिली ही हुई है, लेकिन यह संबंध किसी धार्मिक, और सामाजिक बंधन का मोहताज नहीं। वैष्णव जन हो अथवा एक आम भक्त, वह प्रेम से सीताराम के साथ राधेश्याम भी बोल सकता है। विवाह जरूरी है भाई, लेकिन सबसे ऊंची प्रेम सगाई।।

विवाह परंपरागत हो अथवा प्रेम, अरेंज्ड अथवा लव, इस रिश्ते में प्रेम के साथ साथ स्थायित्व भी जरूरी है। अगर शादी टिक जाती है, तो प्रेम भी रिश्ते में दबे पांव प्रवेश कर ही जाता है। एक वह भी समय था, जब माता पिता ही संतान के लिए रिश्ता ढूंढते थे और पसंद करते थे। संतान की मर्जी अथवा नाराजी कोई मायने नहीं रखती थी। परिवार फला फूला, बाल बच्चे हुए, पहले बच्चों को प्यार करते रहे, उन्हें प्यार करते करते बूढ़े हो गए। कब आपस में प्यार हो गया, पता ही नहीं चला।

प्रेम विवाह की तो बात ही अलग है। कहीं खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों, मियां बीवी राजी तो क्या करे काजी, कहीं भागकर, तो कहीं छुपकर, तो कहीं खुले आम, आम के आम गुठली के दाम, हम तो हैं आपके गुलाम। साहब और बीवी, दोनों एक दूसरे के गुलाम।।

प्यार में अगर सौदा नहीं और प्यार में अगर धोखा नहीं, तो समझिए वैवाहिक जीवन सुधर गया। अगर आप आंख मूंदकर गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं, इधर उधर ताक झांक नहीं कर रहे, कौन सुखी है और कौन सुखी, इसका हिसाब नहीं रख रहे, तो आपका खुद का गणित कभी गड़बड़ नहीं होगा। आधी छोड़ पूरी को पाने की कोशिश यहां कभी कामयाब नहीं होती। जो मिल गया, वही मुकद्दर। कभी मुकद्दर के सिकंदर तो कभी सिर्फ चर्चगेट से बोरीबंदर।

परंपरागत विवाह भले ही कराया जाता हो, ऐसे मामलों में अधिकतर, प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। साथ रहना, प्रेम की पहली निशानी है। अच्छा खाना, इंसान की दूसरी कमजोरी है। पेट के जरिए भी प्यार हासिल किया जा सकता है। कहीं तन की सुंदरता, तो कहीं मन की सुंदरता। और धन की तो पूछिए ही मत। एक तू ही धनवान है गौरी, बाकी सब कंगाल, अगर चांदी जैसा रंग हो और सोने जैसे बाल।।

कल ही दिलीपकुमार और मनोज कुमार पर फिल्माया गया, फिल्म आदमी का एक गीत सुना, शायद तेरी, मेरी और किसी और की ही दास्तान हो, गौर फरमाइए, रफी साहब और तलत की आवाज में ;

कैसी अजीब आज

बहारों की रात है,

एक चांद आसमां में है

एक मेरे पास है।

जिसके जवाब में हमारे हताश भारत कुमार कहते हैं;

ओ देने वाले तूने तो

कोई कमी ना की,

अब किसको क्या मिला

ये मुकद्दर की बात है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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