श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बड़े भाग, बैंक जॉब पायो…“।)
अभी अभी # ८१८ ⇒ आलेख – बड़े भाग, बैंक जॉब पायो
श्री प्रदीप शर्मा
हम जहाँ शिक्षण ग्रहण करते हैं, उस स्थान को alma mater कहते हैं ! संसार एक विश्व-विद्यालय है, मुझे वास्तविक व्यावहारिक ज्ञान तो तब ही प्राप्त हुआ, जब मेरी एक राष्ट्रीयकृत बैंक में नियुक्ति हो गई। अतः मैं उसे ही alma mater मानता हूँ। जब शब्दों के अर्थ बदल रहे हैं, तो मुहावरे भी क्यों पीछे रहें।
वैसे मुझे कोई खास खुशी नहीं हुई थी, इस नियुक्ति से ! पढ़ने-पढ़ाने और लिखने का शौक तब से ही लग गया था, जब पिताजी के लिए, अहिल्या लाइब्रेरी से, पढ़ने के लिए किताबें लाता था। गुरुदत्त को छोड़ शरद, बंकिम, आचार्य चतुरसेन, बिमल मित्र और रेणु, प्रेमचंद के साहित्य से अच्छा लगाव हो गया था। शौकत थानवी, फिक्र तौंसवी, और जी पी श्रीवास्तव तो मानो सराफे के चाट हो गए थे। मुझे खेद है कि जासूसी उपन्यास तो ठीक गुलशन नंदा तक कभी मेरी नज़रों में चढ़ ना सके। बहुत कोशिश की पढ़ने की, बस पन्ने पलटकर रह गया। हां ! चंद्रकांता संतति न जाने कैसे, पूरी पढ़ गया।।
करेला और नीम चढ़ा ! बचपन से ही मेरी आँखों पर चश्मा चढ़ा था। छोटा मोटा नहीं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल वाला, बिल्लोरी काँच वाला। माँ बताती थी, किसी मंदिर के घंटे की निशानी थी, जिसने नज़र और याददाश्त दोनों कमज़ोर कर दी।
मेरी नज़र भले ही कमज़ोर थी, नीयत ठीकठाक थी। स्कूल कॉलेज में कभी किसी कन्या को नज़र उठाकर नहीं देखा, नज़र नीची रखकर ही देखा। जिनकी नज़र नीची होती है, वे नज़र कम ही मिलाते हैं। ज़िन्दगी के नजारे देखना हो तो, नज़र उठानी भी पड़ती है, किसी से मिलानी भी पड़ती है। वर्ना खयाली पुलाव बनाते रहिये, कोई निगाह आप पर नज़र नहीं उठाएगी।।
हम यूँ ही बैंक-कर्मी नहीं बन गए ! बड़े अरमान थे डॉक्टर, इंजीनियर बनने के। पर क्या करें, गणित कमज़ोर था। गणित छोड़ बायोलॉजी का दामन पकड़ा। वहाँ भी फिजिक्स, केमिस्ट्री ने साथ नहीं दिया। बीएससी रिटर्न हुए, कला-वाणिज्य महाविद्यालय की ओर रुख किया। तब और विकल्प था ही क्या हमारे पास ? कोई बीबीए, एमबीए का कोर्स नहीं, शहर में कोई कोचिंग इंस्टीटूट नहीं। ले देकर बीए, बीकॉम कर लो।
तब कॉमर्स विषय को हम हीन दृष्टि से देखते थे। जो हमारे साथ के छात्र ढंग से बीए नहीं कर पाए, एलएलबी पास करके वकील बन गए और हम आयएएस बनने के चक्कर में ना घर के रहे ना घाट के। और तब का हमारा पूरा घान का घान बैंकों और एलआयसी की ओर दौड़ पड़ा। बीए, बीकॉम, बीएससी हो या एमएससी ! चलो बुलावा आया है, बैंक, एलआईसी ने बुलाया है।।
वह आज ही का दिन तो था, 22 अक्टूबर 1971, जब मुख्य प्रबंधक अमेरिकन मेहता की साँटा बाजार, इंदौर शाखा में मेरी नियुक्ति हुई थी। समय कैसे निकल गया, कुछ पता ही नहीं चला। आज लगता है, मानो एक फ़िल्म चल रही हो। खट्टे-मीठे अनुभव, सहयोगियों का प्रेम और अपनापन और ग्राहकों के रूप में कुछ विलक्षण व्यक्तित्वों से प्रगाढ़ परिचय, किसी की दुआ और किसी का आशीर्वाद शायद जीवन की सबसे बड़ी कमाई रही।
तब बैंक और एलआईसी वालों की शादी बड़ी आसानी से हो जाती थी। डॉक्टर, इंजीनियर न सही, बैंक वाला तो है। लड़का लोन भी ले लेगा, और हर तीन साल में बीवी बच्चों को एलटीसी पर घुमाने भी ले जाएगा। शुरू शुरू में तो सैलरी फ़ॉर सविंग और ओ टी फ़ॉर रोटी का रिवाज था। लेकिन हमारे जैसे संतों के पाँव पड़ते ही सब बंटा-धार हो गया। अब तो बैंकें ही मर्ज़ हो रही हैं और आदमी मशीन होता जा रहा है।।
एक नौकरीपेशा इंसान को कभी तो रिटायर होना ही है। मनोरंजन के लिए टीवी तो था ही, अब तो 4-G एंड्रॉइड फ़ोन भी मुट्ठी में आ गया है। फेसबुक के जरिये नये नये मित्र सम्पर्क में आते हैं। बड़ा आश्चर्य हुआ जब अधिकतर फेसबुक मित्रों को बैंक से जुड़ा देखा। जब तक सेवारत रहे, केवल काम-धंधे, पे- रिवीजन और डीए की बातें ही होती रहीं। अब रिटायरमेंट के बाद उनकी असली प्रतिभा का पता चला।
कितने कवि, लेखक, चिंतक, साहित्यकार और व्यंग्यकार कभी बैंककर्मी रहे हैं, जानकर मन प्रसन्न हो गया। विश्व में, यत्र तत्र सर्वत्र कभी बैंक से जुड़े लोग, छाए हुए हैं। ब से बँक वाले सुरेश कांत जी भी कभी रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। अमोल पालेकर भी कभी हमारी बैंक से ही जुड़े थे, लेकिन उनकी कला और प्रतिभा उन्हें कहां से कहां ले गई। हम सबके प्रिय प्रतिभाशाली फेसबुक मित्र श्री सुरेंद्र मोहन, भी स्टेट बैंक से जुड़े थे। हमारे परम मित्र और सहयोगी, व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर श्री धर्मपाल महेंद्र जैन तब भी हमारे साथ थे, और आज भी हमारे साथ ही हैं। उनकी अध्य्यनशीलता, साहित्यिक ज्ञान, और सृजनशीलता से आज कौन परिचित नहीं।।
हम भाग्यशाली हैं कि फेसबुक के माध्यम से ही सही, आज भी हम एक दूसरे के इतने करीब हैं। लोग टाटा का नमक खाते हैं, आज अगर पीछे मुड़कर देखें तो लगभग ५५ बरसों से हम बैंक का ही तो नमक खा रहे हैं। तब यह हमारी रोजी रोटी थी, और आज भी इसके ही बदौलत हम दाल रोटी खा रहे हैं, और बैंक के गुण गा रहे हैं। आज बस यही मन में आता है, बड़े भाग, बैंक जॉब पायो, और उन्हीं साथियों को पुनः फेसबुक पर पायो। सभी बैंक के वर्तमान, भूतपूर्व और अभूतपूर्व फेसबुक मित्रों, सहयोगियों का सादर अभिवादन।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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