(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५० ☆ देश-परदेश – International Coffee Day ☆ श्री राकेश कुमार ☆
(1st October)
अंग्रेजों ने हमारे देश की चाय को हमें ही पीना सिखाया था। काफ़ी भी पश्चिम की देन मानी जा सकती है। हमारे देश में तो खालिस याने कि शुद्ध दूध पीने का रिवाज़ हुआ करता था। अब हम लोग उसी दूध की दिन भर चाय या काफी पीते रहते हैं। दूध से होने वाले सारे लाभ, चाय और काफी के उपयोग से गवां देते हैं।
एक जमाना था, जब अंग्रेजों का राज आधी दुनिया पर हुआ करता था, उन्होंने कमाई के चक्कर में हमारे देश की चाय को खूब बेचा था। अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में चाय के बहिष्कार को आजादी का हथियार बनाया गया था। चाय के बदले काफ़ी के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया। इसलिए अमेरिका में आज भी काफी का ही चलन है।
हमारे देश के दक्षिण भाग में भी काफी का चलन बहुत अधिक है। देश के उत्तरी और पश्चिम भाग में काफी के प्रसार में “इंडियन काफी हाउस” नामक चेन ने बहुत बड़ा रोल निभाया था।
कुछ दशकों तक काफी अमीरों के यहां पी जाती थी, मध्यम वर्ग में भी धीरे धीरे खास मेहमानों के लिए काफी परोसे जाने लगी है।
हमारे कुछ मित्र भी जब कभी घर आते है, तो कहते है, हम चाय नहीं पीते, काफी पिलवा दो। इसके विपरीत हम जब उनके घर जाते है, तो चाय परोस देते है, ये कहते हुए तुम तो चाय ही पीते हो, और खुद भी हमारे नाम से चाय ही पीते हैं।
पश्चिम ने काफ़ी को केक, चाकलेट, आइसक्रीम के माध्यम से भी हमारी जुबां के जायके को बदलने की भी साजिश की गई थी। जिंदगी भर चाय पीने वाली महिलाएं भी दुकान पर “काफी कलर” की साड़ी की मांग करती हुई मिल जाएंगी। गर्मी में काफी से तोबा करने वालों के लिए “आइस कॉफ़ी” लोकप्रिय की गई है। जबकि ठंडी या कड़वी चाय का मतलब हमारे देश के युवा अच्छे से जानते हैं।
सिनेमा घर और रेलवे स्टेशन पर एस्प्रेसो काफी की मशीनें लगाई गई थी। शादियों में केसर बादाम वाले दूध के स्थान पर काफी परोसी जाने लगी है। काफी की कड़वाहट कम करने के लिए चाकलेट/ कोको पावडर छिड़ककर स्वादिष्ट बनाया जाता था।
आज काफी की काफ़ी चर्चा हो गई है, अब मेहनत करके घर पर देसी एस्प्रेसो यानी काफी को चम्मच से रगड़ कर पिया जाएगा।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धरम करम …“।)
अभी अभी # ८०८ ⇒ आलेख – धरम करम श्री प्रदीप शर्मा
आम आदमी रोजी रोटी के लिए मेहनत मजदूरी भी करता है, और अपनी श्रद्धा और हैसियत के अनुसार धरम करम भी ! वह कर्म को अगर पूजा समझकर करता है, तो उसका कर्म ही उसका धर्म हो जाता है। वैसे भी मेहनत और ईमानदारी से बड़ा न कोई धरम है और ना कोई करम। पढ़ते रहें लोग वेद पुराण, वह तो बस ढाई आखर प्रेम का पढ़कर ही संतुष्ट है।
सीधी सादी जिंदगी को इंसान ने कितना जटिल और दूभर बना दिया है। पेट की भूख से बड़ा कोई धर्म नहीं। भूखे भजन न होय गोपाला। चींटी से हाथी तक अपने पेट की भूख मिटाने के लिए कर्म करता है। यज्ञ से बढ़कर अगर कोई कर्म नहीं, तो कर्म से बड़ा भी कोई यज्ञ नहीं। रोजी रोटी का और मेहनत मजदूरी का भी वही रिश्ता है जो धर्म से कर्म का है और कर्म का यज्ञ से।।
यज्ञ आहुति को भी कहते हैं और त्याग को भी। ज्ञान भी यज्ञ है और कर्म भी यज्ञ। ज्ञानदान और निष्काम कर्म, दोनों किसी यज्ञ से कम नहीं। यज्ञ को ही sacrifice भी कहा जाता है। किसी अच्छे उद्देश्य के लिए अपने स्वार्थ की आहुति ही बलिदान है, यज्ञ है। अगर अपने करम से आप किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रहे, तो आप एक तरह से धरम ही कर रहे हो। अपने हित से जब परहित जुड़ जाता है, तो वह परमार्थ हो जाता है। परमार्थ से बड़ा कोई धर्म नहीं, कोई यज्ञ नहीं।
कर्म और विचार से वातावरण की शुद्धि ही पर्यावरण की शुद्धि है। आसुरी शक्तियों के विनाश और पर्यावरण की शुद्धि के लिए ही तो यज्ञ हवनादि किये जाते हैं। अगर इंसान अपने काम से काम रखे, मेहनत और ईमानदारी से रोजी रोटी कमाए तो इससे बड़ा कोई कर्म नहीं, कोई धर्म नहीं और कोई यज्ञ नहीं। अपने स्वार्थ और सुख सुविधाओं के लिए आप कितने भी यज्ञ, दान पुण्य और हवन इत्यादि कर लें, जब तक मन, वचन और कर्म में शुद्धि नहीं आ जाती, तब तक किसी भी तरह का यज्ञ अथवा दान फलीभूत नहीं होता।।
मन अशांत, और विश्व शांति के लिए यज्ञ, हवन और पूजा पाठ। कर्म का अहंकार यज्ञ के फल को भी नष्ट कर देता है। असुर बड़े चालाक थे। अपने मनोरथ के लिए उन्होंने इन सबका बड़ी चतुराई से उपयोग किया और अलौकिक और पारलौकिक सिद्धियां प्राप्त कर लीं और बाद में उनका दुरुपयोग किया। आज भी बल, बुद्धि और ज्ञान के बल पर आसुरी शक्तियाँ वही काम कर रही हैं, उनका मायावी स्वरूप हमें छल रहा है। और जब कोई ऐसा ही आसुरी, जैविक हथियार मानवता के खिलाफ़ कोरोना बन उभर आता है, तो मानवता छलनी हो जाती है।
रहने दीजिए बड़े बड़े, मीठे बोल, जो कानों में दे मिश्री घोल ! अपना करम ही अपना धरम है, अगर ईमानदारी, निष्ठा और लगन से किया जाए। भौतिक सुख सुविधा की प्राप्ति के लिए अगर एक बार स्वार्थ, नफ़रत और बेईमानी का मार्ग अपना लिया, तो ना तो गंगा में मुक्ति मिलेगी ना किसी कुंभ स्नान से अमृत की प्राप्ति। करते रहिए नंबर दो के पैसे से दान पुण्य, देते रहिए दान दक्षिणा, यजमान को यश, कीर्ति और आशीर्वाद भले ही मिल जाए, मन को शांति नहीं मिलेगी। जिंदगी की धूप छांव में, कहीं से के.सी. डे साहब की आवाज़ कानों में पड़ रही है ;
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३०७ ☆ तमसो मा ज्योतिर्गमय…
दीपावली, भारतीय लोकजीवन का सबसे बड़ा त्योहार है। कार्तिक मास की अमावस्या को सम्पन्न होने वाले इस पर्व में घर-घर दीप जलाये जाते हैं। अपने घर में प्रकाश करना मनुष्य की सहज और स्वाभाविक वृत्ति है किंतु घर के साथ परिसर को आलोकित करना उदात्तता है। शतपथ ब्राह्मण का उद्घोष है,
असतो मा सद्गमय,
तमसो मा ज्योतिर्गमय,
मृत्योर्मामृतं गमय…!
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ से भौतिक संसार में प्रकाश का विस्तार भी अभिप्रेत है। हर दीप अपने स्तर पर प्रकाश देता है पर असंख्य दीपक सामूहिक रूप से जब साथ आते हैं तो अमावस्या दीपावली हो जाती है।
इन पंक्तियों के लेखक की दीपावली पर एक चर्चित कविता है, जिसे विनम्रता से साझा कर रहा हूँ,
अँधेरा मुझे डराता रहा,
हर अँधेरे के विरुद्ध
एक दीप मैं जलाता रहा,
उजास की मेरी मुहिम
शनै:-शनै: रंग लाई,
अनगिन दीयों से
रात झिलमिलाई,
सिर पर पैर रख
अँधेरा पलायन कर गया
और इस अमावस
मैंने दीपावली मनाई !
कथनी और करनी दो भिन्न शब्द हैं। इन दोनों का अर्थ जिसने जीवन में अभिन्न कर लिया, वह मानव से देवता हो गया। सामूहिक प्रयासों की बात करना सरल है पर वैदिक संस्कृति यथार्थ में व्यष्टि के साथ समष्टि को भी दीपों से प्रभासित करने का उदाहरण प्रस्तुत करती है। सामूहिकता का ऐसा क्रियावान उदाहरण दुनिया भर में मिलना कठिन है। यह संस्कृति ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ केवल कहती नहीं अपितु अंधकार को प्रकाश का दान देती भी है।
प्रभु श्रीराम द्वारा रावण का वध करके अयोध्या लौटने पर जनता ने राज्य में दीप प्रज्ज्वलित कर दीपावली मनाई थी। श्रीराम सद्गुण का साकार स्वरूप हैं। रावण, तमोगुण का प्रतीक है। श्रीराम ने समाज के हर वर्ग को साथ लेकर रावण को समाप्त किया था। तम से ज्योति की यात्रा का एक बिंब यह भी है। स्वाभाविक है कि सामूहिक दीपोत्सव का रेकॉर्ड भी भारतीयों के नाम ही है। यह सामूहिकता, सामासिकता और एकात्मता का प्रमाणित वैश्विक दस्तावेज़ भी है।
तथापि सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि वर्तमान में चंचल धन और पार्थिव अधिकार के मद ने आँखों पर ऐसी पट्टी बांध दी है कि हम त्योहार या उत्सव की मूल परम्परा ही भुला बैठे हैं। आद्य चिकित्सक धन्वंतरी की त्रयोदशी को हमने धन की तेरस तक सीमित कर लिया। रूप की चतुर्दशी, स्वरूप को समर्पित कर दी। दीपावली, प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने, मूल्यों की विजय एवं अर्चना का प्रतीक न होकर केवल द्रव्यपूजन का साधन हो गई।
उत्सव और त्योहारों को उनमें अंतर्निहित उदात्तता के साथ मनाने का पुनर्स्मरण हमें करना ही होगा। अपने जीवन के अंधकार के विरुद्ध एक दीप हमें प्रज्ज्वलित करना ही होगा। जिस दिन एक भी दीपक इस सुविधानुसार विस्मरण के अंधेरे के आगे सीना ठोंक कर खड़ा हो गया, यकीन मानिए, अमावस्या को दीपावली होने में समय नहीं लगेगा।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी.
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्वामी और स्वामिभक्त …“।)
अभी अभी # ८०७ ⇒ आलेख – स्वामी और स्वामिभक्त श्री प्रदीप शर्मा
अपने स्वामी के हर आदेश का जो पालन करता है, उसे स्वामिभक्त कहते हैं। यह संबंध एक भक्त और स्वामी का भी हो सकता है, दास और स्वामी का भी हो सकता है और एक मालिक और नौकर का भी हो सकता है। क्या हुक्म है मेरे आका !
बुरा तो लगता है, लेकिन अंग्रेजी गुलामों की भाषा है, yours faithfully का हिंदी अनुवाद आपका आज्ञाकारी ही तो होता है।
मैनर्स कह लें, तमीज, तहजीब कह लें, अथवा संस्कार कह लें, जहां भक्ति है, वहां शरणागति है। सारा जगत राम का दास है, कोई मोहनदास तो कोई हरि ओम शरण। ।
गुरु और शिष्य का संबंध भी भक्त और भगवान की तरह ही है और अगर घर में एक ईमानदार और आज्ञाकारी नौकर मिल जाए, तो हर गृह स्वामी धन्य हो जाए।
जब एक आदमी का ही दूसरे आदमी पर से विश्वास टूट जाता है, तब बारी आती है एक मूक प्राणी की, जिसे आप चाहें तो जानवर भी कह सकते हैं। पुराने जमाने में गुलामों को खरीदा जाता था, आजकल कुत्तों को खरीदा जाता है।
वैसे यह अनमोल प्राणी तो बिन मोल ही बिकने को तैयार है, इसकी कीमत तो आजकल बाजार लगाने लगा है। मुफ्त में बिकने वाले प्राणी को हम बोलचाल की भाषा में एक वफादार कुत्ता कहते हैं। ।
कुत्ता आपका नमक खाए ना खाए, कभी वफादारी नहीं छोड़ता। कुत्ता अपने स्वामी को पहचानता है, वह चोर को भी पहचानता है और साहूकार को भी। अगर कोई चोर ही कुत्ता पाल ले, तो कुत्ता इतना भी इंसाफपसंद, नमक हराम, स्वार्थी और खुदगर्ज नहीं कि अपने मालिक को ही पुलिस के हवाले कर दे। सबकी स्वामिभक्ति की अपनी अपनी परिभाषा है। जानवर सिर्फ प्रेम की भाषा समझता है, उसके शब्दकोश में केवल एक ही शब्द है, वफादारी और स्वामिभक्ति।
पहले हम गाय पालते थे, आजकल कुत्ता पालते हैं। गाय तो हमारी माता है, कहीं माता को भी पाला जाता है। इसलिए हमने गाय के लिए गौशाला बना दी और कुत्ते को पाल लिया। हम रोजाना गौसेवा करते हैं और कुत्ता हमारी रखवाली करता है। ।
रोज सुबह मैं कई स्वामियों को स्वामिभक्त, वफादार प्राणियों को, जिनको उन्होंने बच्चों की तरह नाम दिया है, टहलाते हुए देखता हूं। गले में पट्टे और जंजीर से बंधा कुत्ता आगे आगे, और मालिक पीछे पीछे। स्वच्छ भारत में सुबह का यह दृश्य आम है। सब्जी मार्केट में जिस तरह सूंघ सूंघ कर सब्जी खरीदी जाती है, ये पालतू श्वान महाशय सूंघ सूंघकर, नित्य कर्म हेतु, अपनी साइट पसंद करते हैं, जिसे हम कभी दिशा मैदान कहते थे। हर प्राणी का अपना अपना निवृत्ति मार्ग होता है।
आज की तारीख में अगर वफादारी और स्वामिभक्ति की बात करें, तो शायद घर का पालतू कुत्ता ही बाजी मार जाए। गृह स्वामी ही नहीं, घर के सभी सदस्यों का प्यारा, जिसे घर में बच्चे जैसा ही प्यार और देखभाल मिले। विशेष भोजन और दवा दारू भी। कभी कभी तो यह भी पता नहीं चलता, सेवक कौन है और स्वामी कौन।
अगर घर से बाहर गांव जाएंगे, तो उसकी भी व्यवस्था करेंगे। बच्चे को कौन अकेला घर में छोड़कर जाता है। ।
कहीं यह स्वामी और एक स्वामिभक्त और वफादार कुत्ते का प्रेम और आसक्ति का रिश्ता हमें जड़ भरत तो नहीं बना देगा। लेकिन इसमें एक बेचारे बेजुबान प्राणी का क्या दोष। उसका तो जन्म ही वफादारी के लिए हुआ है।
कुत्ते की योनि में अगर उसे अपने स्वामी का संरक्षण और प्यार मिलता है, तो उसका तो जीवन धन्य हो गया।
परिवारों का टूटना, बिखरना, रिश्तों में प्रेम की जगह स्वार्थ का प्रवेश, इंसान का दूसरे इंसान से भरोसा उठ जाना, घर में बड़े बुजुर्गों का अभाव, दौड़भाग की जिंदगी का तनाव और टूटते रिश्ते, हमें अनजाने ही इस प्राणी की ओर खींच ले जाते हैं। घर के एकांत को दूर करने का एक वफादार कुत्ते के अलावा कोई विकल्प नहीं। जड़ भरत ही सही, आखिर कोई इंसान हैं, फरिश्ता तो नहीं हम। ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हिंसा के प्रकार…“।)
अभी अभी # ८०६ ⇒ आलेख – हिंसा के प्रकार श्री प्रदीप शर्मा
अगर विद्वान अहिंसा के पुजारी पर शोध कर सकते हैं, हिंसक दरिन्दों पर फिल्में बन सकती हैं ,तो क्या हम हिंसा के स्वरूप पर चर्चा भी नहीं कर सकते। पहले हम चाहते थे कि अहिंसा पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें,लेकिन जब अहिंसा का पुजारी ही हिंसा का शिकार हो गया,तो हमने भी सोचा, अहिंसा को मारो गोली,क्यों न हिंसा पर ही मेहरबान हुआ जाए।
यह शब्दों का संसार भी बड़ा विचित्र है ! एक शब्द है,शांति,जिसके आगे अगर अ लगा दो,तो अशांति फैल जाती है। और इधर,अगर अहिंसा का अ हटा दो,तो हिंसा फैल जाती है। ऐसा क्या है इन शब्दों में कि जब तक जीवित रहे,अशांत ही रहे ,और मरने के बाद, ॐ शांति ? इधर कुछ लोग हिंसा के बाद अहिंसा का पाठ पढ़ाते नजर आते हैं, तो उधर,कुछ लोग,अहिंसा का नाम सुनते ही,हिंसक हो उठते हैं।।
पहले महाभारत,फिर शांति पर्व !पहले कलिंग का युद्ध,और उसके बाद बुद्धं शरणं गच्छामि। अशोक चक्र ,चक्रवर्ती सम्राट का प्रतीक है,अथवा बुद्ध की शरण में गए,शोकग्रस्त अशोक का। हमें दोनों हाथों में लड्डू चाहिए। एक हाथ में शांति और अहिंसा और दूसरे हाथ में अन्याय,अत्याचार के खिलाफ क्रांति,हिंसा और उसके बाद की शांति। राम और कृष्ण के साथ बुद्ध और महावीर भी हों तो ये भारत देश है मेरा।
आइए,हिंसा पर ,शांति से चर्चा करें ! हिंसा तीन प्रकार की होती है। सबसे पहले आती है शारीरिक हिंसा,जिसमें युद्ध भी शामिल है। अस्त्र, शस्त्र,ब्रह्मास्त्र , हथियारों और जैविक हथियारों की हिंसा। एक दूसरे पर हाथ उठाना,मार पीट करना, तथा हत्या जैसे सभी अपराध शारीरिक श्रेणी में आते हैं। यहां यह भी सनद रहे, वैदिक हिंसा,हिंसा नहीं होती।।
हिंसा के दो प्रकार और होते हैं,मानसिक और शाब्दिक हिंसा जिसका आजकल बाजार बड़ा गर्म है। मन तो ऐसा कर रहा था, कि उसको कच्चा चबा जाऊं ! कितना पौष्टिक अंकुरित आहार है न किसी को कच्चा चबाना। कितना फाइबर होगा इस हिंसा में ! यह पूरी तरह ऑर्गेनिक है,स्वदेशी है, शाकाहारी है।
मानसिक हिंसा कोई अपराध नहीं। आप किसी से गले मिलते हुए भी यह सत्कार्य आसानी से कर सकते हैं। कोई आपका दुश्मन अज्ञात हो,अनजान हो,जीवित हो,मृत हो,काल्पनिक हो,सब पर इस मानसिक हिंसा के अस्त्र का आसानी से प्रयोग किया जा सकता है। राजनीति में काल्पनिक शत्रु पर मानसिक हिंसा भी बड़ी कारगर होती है। मन की शक्ति से कोई बड़ी शक्ति नहीं।।
अब आते हैं हम शाब्दिक हिंसा पर। शब्द आप पढ़ ही रहे हैं,आप हिंसा के लिए अपने शब्द घढ़ भी सकते हैं। किसी को नानी याद दिलाना कहां की हिंसा है। सात पुश्तों तक आप आसानी से शाब्दिक हिंसा में। पहुंच सकते हो। कंस से लगाकर केजरी,कांग्रेस,कन्हैया और रागा हमारे मानसिक शब्दकोश में स्थान पा गए हैं। पूरा ककहरा मौजूद है शाब्दिक हिंसा के लिए। व्हाट्सएप,फेसबुक,इंस्टाग्राम और क्या कहते हैं, हां, ट्विटर। शाब्दिक हिंसा से माहौल बनता भी है, और बिगड़ता भी है।
मनसा, वाचा, कर्मणा ! आपके पास तलवार भी है, मन की संकल्प शक्ति भी है और शब्द सामर्थ्य भी ! तलवार सुरक्षा के लिए,अपनी ही नहीं,सबकी। अन्याय,अत्याचार और आतंक के खिलाफ मानसिक आक्रोश सात्विक हिंसा है और अभिव्यक्ति की आजादी की कोई सीमा नहीं। आज मानसिक और शाब्दिक हिंसा जिस मानस को जन्म दे रही है,वह शारीरिक हिंसा से कई गुना अधिक खतरनाक और हिंसक है।।
लोकतंत्र के हथियार हैं ये। इन तीनों का संभलकर उपयोग करें। अहिंसा परमो धर्म..!!
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनुभव और निर्णय। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९६ ☆
☆ अनुभव और निर्णय… ☆
अगर आप सही अनुभव नहीं करते, तो निश्चित् है कि आप ग़लत निर्णय लेंगे–हेज़लिट की यह उक्ति अपने भीतर गहन अर्थ समेटे है। अनुभव व निर्णय का अन्योन्याश्रित संबंध है। यदि विषम परिस्थितियों में हमारा अनुभव अच्छा नहीं है, तो हम उसे शाश्वत् सत्य स्वीकार उसी के अनुकूल निर्णय लेते रहेंगे। उस स्थिति में हमारे हृदय में एक ही भाव होता है कि हम आँखिन देखी पर विश्वास रखते हैं और यह हमारा व्यक्तिगत अनुभव है–सो! यह ग़लत कैसे हो सकता है? निर्णय लेते हुए न हम चिन्तन-मनन करना चाहते हैं; ना ही पुनरावलोकन, क्योंकि हम आत्मानुभव को नहीं नकार सकते हैं?
मानव मस्तिष्क ठीक एक पैराशूट की भांति है, जब तक खुला रहता है, कार्यशील रहता है–लार्ड डेवन का यह कथन मस्तिष्क की क्रियाशीलता पर प्रकाश डालता है और उसके अधिकाधिक प्रयोग करने का संदेश देता है। कबीरदास जी भी ‘दान देत धन न घटै, कह गये भक्त कबीर’ संदेश प्रेषित करते हैं कि दान देते ने से धन घटता नहीं और विद्या रूपी धन बाँटने से सदैव बढ़ता है। महात्मा बुद्ध भी जो हम देते हैं; उसका कई गुणा लौटकर हमारे पास आता है–संदेश प्रेषित करते हैं। भगवान महाबीर भी त्याग करने का संदेश देते हैं और प्रकृति का भी यही चिरंतन व शाश्वत् सत्य है।
मनुष्य तभी तक सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम, सर्वगुण-सम्पन्न व सर्वपूज्य बना रहता है, जब तक वह दूसरों से याचना नहीं करता–ब्रह्मपुराण का भाव, कबीर की वाणी में इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है ‘मांगन मरण एक समान।’ मानव को उसके सम्मुख हाथ पसारने चाहिए, जो सृष्टि-नियंता व जगपालक है और दान देते हुए उसकी नज़रें सदैव झुकी रहनी चाहिए, क्योंकि देने वाला तो कोई और…वह तो केवल मात्र माध्यम है। संसार में अपना कुछ भी नहीं है। यह नश्वर मानव देह भी पंचतत्वों से निर्मित है और अंतकाल उसे उनमें विलीन हो जाना है। मेरी स्वरचित पंक्तियाँ उक्त भाव को व्यक्त करती हैं…’यह किराये का मकान है/ जाने कौन कब तक ठहरेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘प्रभु नाम तू जप ले रे बंदे!/ वही तेरे साथ जाएगा’ यही है जीवन का शाश्वत् सत्य।
मानव अहंनिष्ठता के कारण निर्णय लेने से पूर्व औचित्य- अनौचित्य व लाभ-हानि पर सोच-विचार नहीं करता और उसके पश्चात् उसे पत्थर की लकीर मान बैठता है, जबकि उसके विभिन्न पहलुओं पर दृष्टिपात करना आवश्यक होता है। अंततः यह उसके जीवन की त्रासदी बन जाती है। अक्सर निर्णय हमारी मन:स्थिति से प्रभावित होते है, क्योंकि प्रसन्नता में हमें ओस की बूंदें मोतियों सम भासती हैं और अवसाद में आँसुओं सम प्रतिभासित होती हैं। सौंदर्य वस्तु में नहीं, दृष्टा के नेत्रों में होता है। इसलिए कहा जाता है ‘जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।’ सो! चेहरे पर हमारे मनोभाव प्रकट होते हैं। इसलिए ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ गीत की पंक्तियाँ आज भी सार्थक हैं।
दोषारोपण करना मानव का स्वभाव है, क्योंकि हम स्वयं को बुद्धिमान व दूसरों को मूर्ख समझते हैं। परिणामत: हम सत्यान्वेषण नहीं कर पाते। ‘बहुत कमियाँ निकालते हैं/ हम दूसरों में अक्सर/ आओ! एक मुलाकात/ ज़रा आईने से भी कर लें।’ परंतु मानव अपने अंतर्मन में झाँकना ही नहीं चाहता, क्योंकि वह आश्वस्त होता है कि वह गुणों की खान है और कोई ग़लती कर ही नहीं सकता। परंतु अपने ही अपने बनकर अपनों को प्रताड़ित करते हैं। इतना ही नहीं, ‘ज़िन्दगी कहाँ रुलाती है/ रुलाते तो वे लोग हैं/ जिन्हें हम अपनी ज़िन्दगी समझ बैठते हैं’ और हमारे सबसे प्रिय लोग ही सर्वाधिक कष्ट देते हैं। ढूंढो तो सुक़ून ख़ुद में है/ दूसरों में तो बस उलझनें मिलेंगी। आनंद तो हमारे मन में है। यदि वह मन में नहीं है, तो दुनिया में कहीं नहीं है, क्योंकि दूसरों से अपेक्षा करने से तो उलझनें प्राप्त होती हैं। सो! ‘उलझनें बहुत हैं, सुलझा लीजिए/ बेवजह ही न किसी से ग़िला कीजिए’ स्वरचित गीत की पंक्तियाँ उलझनों को शीघ्र सुलझाने व शिक़ायत न करने की सीख देती हैं।
उत्तम काम के दो सूत्र हैं…जो मुझे आता है कर लूंगा/ जो मुझे नहीं आता सीख लूंगा। यह है स्वीकार्यता भाव, जो सत्य है और यथार्थ है उसे स्वीकार लेना। जो व्यक्ति अपनी ग़लती को स्वीकार लेता है, उसके जीवन पथ में कोई अवरोध नहीं आता और वह निरंतर सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ता जाता है। ‘दो पल की है ज़िन्दगी/ इसे जीने के दो उसूल बनाओ/ महको तो फूलों की तरह/ बिखरो तो सुगंध की तरह ‘ मानव को सिद्धांतवादी होने के साथ-साथ हर स्थिति में खुशी से जीना बेहतर विकल्प व सर्वोत्तम उपाय है।
बहुत क़रीब से अंजान बनके निकला है/ जो कभी दूर से पहचान लिया करता था–गुलज़ार का यह कथन जीवन की त्रासदी को इंगित करता है। इस संसार म़े हर व्यक्ति स्वार्थी है और उसकी फ़ितरत को समझना अत्यंत कठिन है। ज़िन्दगी समझ में आ गयी तो अकेले में मेला/ न समझ में आयी तो भीड़ में अकेला…यही जीवन का शाश्वत् सत्य व सार है। हम अपनी मनस्थिति के अनुकूल ही व्यथित होते हैं और यथासमय भरपूर सुक़ून पाते हैं।
तराशिए ख़ुद को इस क़दर जहान में/ पाने वालों को नाज़ व खोने वाले को अफ़सोस रहे। वजूद ऐसा बनाएं कि कोई तुम्हें छोड़ तो सके, पर भुला न सके। परंतु यह तभी संभव है, जब आप इस तथ्य से अवगत हों कि रिश्ते एक-दूसरे का ख्याल रखने के लिए होते हैं, इस्तेमाल करने के लिए नहीं। हमें त्याग व समर्पण भाव से इनका निर्वहन करना चाहिए। सो! श्रेष्ठ वही है, जिसमें दृढ़ता हो; ज़िद्द नहीं, दया हो; कमज़ोरी नहीं, ज्ञान हो; अहंकार नहीं। जिसमें इन गुणों का समुच्चय होता है, सर्वश्रेष्ठ कहलाता है। समय और समझ दोनों एक साथ किस्मत वालों को मिलती है, क्योंकि अक्सर समय पर समझ नहीं आती और समझ आने पर समय निकल जाता है। प्राय: जिनमें समझ होती है, वे अहंनिष्ठता के कारण दूसरों को हेय समझते हैं और उनके अस्तित्व को नकार देते हैं। उन्हें किसी का साथ ग़वारा नहीं होता और एक अंतराल के पश्चात् वे स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। न कोई उनके साथ रहना पसंद करता है और न ही किसी को उनकी दरक़ार होती है।
वैसे दो तरह से चीज़ें नज़र आती हैं, एक दूर से; दूसरा ग़ुरूर से। ग़ुरूर से दूरियां बढ़ती जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं–प्रथम दूसरों के अनुभव से सीखते हैं, द्वितीय अपने अनुभव से और तृतीय अपने ग़ुरूर के कारण सीखते ही नहीं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। बुद्धिमान लोगो में जन्मजात प्रतिभा होती है, कुछ लोग शास्त्राध्ययन से तथा अन्य अभ्यास अर्थात् अपने अनुभव से सीखते हैं। ‘करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ कबीरदास जी भी इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि हमारा अनुभव ही हमारा निर्णय होता है। इनका चोली-दामन का साथ है और ये अन्योन्याश्रित है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कंडक्टर …“।)
अभी अभी # ८०५ ⇒ आलेख – कंडक्टर श्री प्रदीप शर्मा
वैसे तो कंडक्टर का कंडक्ट से कोई लेना-देना नहीं होता, लेकिन इसमें भी दो मत नहीं कि कंडक्टर शब्द कंडक्ट से ही बना है। फिजिक्स में गुड कंडक्टर भी होते हैं और बेड-कंडक्टर भी। मैं अपने कड़वे अतीत को भूल जाना चाहता हूँ, इसलिए फिजिक्स का पन्ना यहीं बंद करता हूँ।
कंडक्टर को हिंदी में परिचालक कहते हैं। बिना चालक के परिचालक का कोई अस्तित्व नहीं। चालक सिर्फ़ बस चलाता है, परिचालक सवारियों को भी चलाता है।।
न जाने क्यों, जहाज के पंछी की तरह बार बार कांग्रेस काल में प्रवेश करना पड़ता है। हमारे प्रदेश के राज्य परिवहन निगम का इंतकाल हुए अर्सा गुज़र गया ! वे लाल डिब्बे के दिन थे। 3 x 2 की बड़ी-बड़ी बसें, जिनकी सीटों का फोम अकसर निकाला जा चुका होता था, लकड़ी के बचे हुए पटियों पर बिना काँच की खिड़कियों में सफर करने का मज़ा कुछ और ही था। हॉर्न को छोड़ सब कुछ बजने के मुहावरे पर रोडवेज का ही अधिकार था।
जब किसी मंत्री का, चुनाव में अनियमितता के कारण हाईकोर्ट के निर्णय पर, मंत्री-पद से इस्तीफा ले लिया जाता था, तो उन्हें तुरंत पुरस्कार-स्वरूप किसी बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया जाता था। परिवहन निगम भी ऐसे ही किसी काबिल अध्य्क्ष की भेंट चढ़ जाता था।।
वह कम तनख्वाह और अधिक काम का ज़माना था। बसों में चालक और परिचालक को छोड़ अन्य के लिए धूम्रपान वर्जित था। ईश्वर आपकी यात्रा सुरक्षित सम्पन्न करे, जेबकतरों से सावधान, और यात्री अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करे के अलावा बिना टिकट यात्रा करना अपराध है, जैसी चेतावनियां, यथासंभव शुद्ध हिंदी में, बसों में लिखी, देखीं जा सकती थी।
पुलिस की पसंद खाकी वर्दी, चालक-परिचालक को पोशाक के रूप में प्रदान की जाती थी, जिसे वे शॉल की तरह एक तरह से ओढ़े रहते थे। बस में थूकना मना रहता था, इसलिए लोग खिड़की वाली सीट अधिक पसंद करते थे।।
कंडक्टर का खाकी लबादा किसी सांता-क्लास के परिवेश से कम नहीं रहता था। सुविधा के लिए लोग इसे खाकी-कोट भी कहते थे। एक कोट की ही तरह इसमें एक जेब सीने से लगी होती थी, तो दो बड़ी जेब नीचे, जिन्हें बीच के खुले बटन कभी आपस में मिलने नहीं देते थे। वह मोबाइल का ज़माना नहीं था। इसलिए बस जहाँ भी खराब होती थी, बस वहीं अंगद के पाँव की तरह पड़ी रहती थी, और यात्री अपनी ग्यारह नम्बर की बस के भरोसे, अर्थात पैदल ही किसी दूसरे विकल्प की तलाश में निकल पड़ते थे।
कंडक्टर के बैग में यात्रियों के लिए टिकट घर की भी व्यवस्था रहती थी। जो यात्री किसी कारणवश टिकट खिड़की से टिकट नहीं खरीद पाते थे, उन्हें त्वरित सेवा के तहत वहीं टिकट प्रदान कर दिया जाता था। एक कार्बन बिछाकर कान में लगी पेंसिल से भीड़ में खड़े-खड़े कोई कंडक्टर ही टिकट काट सकता है। हमारे सरकारी बाबू तो कुर्सी मेज पर पंखे-कूलर में बैठकर भी कभी कलम खोलने की तकलीफ नहीं करते। कंडक्टर, तुम्हें सलाम।।
ऐसा नहीं कि कंडक्टर को फुर्सत नहीं मिलती थी। फुर्सत के क्षणों में वह एक शीट भरा करता था, जिसमें सवारियों का ब्यौरा होता था। कोई भी फ्लाइंग स्क्वाड कहीं भी, कभी भी, किसी आतंकवादी की तरह, बस को रोक सकती थी। सवारियों को पहले गिना जाता था। फिर कंडक्टर को दूर झाड़ की आड़ में खड़ी जीप के पास ले जाया जाता था और कुछ ले-देकर बस की रवानगी डाल दी जाती थी।
पुलिस के थानों की तरह ही, बस के रूट भी कंडक्टरों के ऊपरी कमाई के साधन थे। जिन रूटों पर अधिक कमाई होती थी, वहाँ कर्मचारी छुट्टी भी कम ही लेते थे। बिना मेहनत-मजदूरी के भी कहीं पापी पेट, और परिवार का हिंदुस्तान में पालन-पोषण हुआ है। यात्रियों से दिन-रात की मगजमारी, यात्रा के सभी जोखिमों से जूझना कंडक्टर के लिए किसी यातना से कम नहीं होता। आप क्या समझोगे, केवल टिकट लेकर सीट के लिए लड़ने वाले यात्रियों ..!।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मीठे की हद-शहद …“।)
अभी अभी # ८०४ ⇒ आलेख – मीठे की हद-शहद श्री प्रदीप शर्मा
निदा फ़ाज़ली इस दुनिया को जादू का खिलौना कहते हैं। कोई कहता है, दुनिया है सराय, रहने को हम आए तो उधर शैलेंद्र शिकायत करते हैं, दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई ! जगत कहें अथवा कुदरत, लेकिन इसे इंसान ने तो नहीं बनाया।
किसान खेत में गन्ना उगाता है, हम घर में बैठे बैठे शर्बत बनाते हैं। शर्बत में चीनी होती है, हम कम ज्यादा कर सकते हैं। किसान गन्ना उगा सकता है, शकर नहीं। वह खेत की मिट्टी में सिर्फ खाद पानी डालता है, कोई शर्बत नहीं, फिर भी गन्ना मीठा पैदा होता है। यह कुदरत का करिश्मा भी किसी जादू से कम नहीं। लेकिन इंसान कर्ता बन इसका भी श्रेय ले लेता है।।
कुदरत में केवल मिठास ही नहीं, सभी रंग भी व्याप्त हैं और खुशबू भी। सागर में मोती भी है और पृथ्वी के गर्भ में खनिज का भंडार भी। पांच तत्वों से बना यह शरीर भी कुदरत की ही देन है और अंत में इसे भी मिट्टी में ही मिल जाना है। किसी के लिए यह मनुष्य जीवन माया है, मिट्टी की काया है, तो किसी के लिए सोने से भी अधिक अनमोल, ईश्वर की दया माया है, उसी की छत्र छाया है ;
माटी के पुतले,
इतना न तू कर गुमान।
पल भर का तू मेहमान ;
यह बुद्धिमान मनुष्य प्रकृति का दोहन कर कभी यहां का राजा बन बैठता है तो कभी मालिक। ईश्वर की तरह उसकी भी सत्ता है, उसके भी नौकर चाकर दास और गुलाम हैं। उसका बस चले, तो स्वर्ग धरती पर ही उतार ले। वैसे भी जननी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी अधिक महान ही माना गया है और देवता भी इस धरती पर जन्म लेने के लिए कतारबद्ध बैठे रहते हैं।
देव भी यहीं दानव भी यहीं, यहीं कोई मानव तो कोई महामानव।
मनुष्य के अलावा अन्य सभी प्राणी यहां अकर्त्ता बनकर कर्म करते हैं।
हमारी मां सिर्फ इंसान के बच्चे को दूध पिलाती है, लेकिन हम तो गाय, भैंस और बकरी का भी दूध पी जाते हैं। दूध, मलाई, मक्खन और मावा भी पका पकाया।
कपास के पौधे से रुई और जंगल की लकड़ी से हमने कपड़ा और मकान बना लिए और खेत में अनाज बो, अपनी रोटी का प्रबंध भी कर लिया। हमारे आलीशान महल और बंगले , सोना, चांदी और हीरे जवाहरात भी हमें इस पृथ्वी की गोद से ही मिले हैं, हम कोई दहेज में नहीं लाए। हां लेकिन इतना दिमाग पृथ्वी के अन्य प्राणियों के पास कहां।।
जीव: जीवस्य भोजनम् से ही प्रकृति का संतुलन है।
क्या आपको नहीं लगता ईश्वर ने मुर्गी का अंडा और जल बिन मछली सिर्फ इस इंसान के लिए ही बनाई है। जंगल में तो खैर जंगल राज है लेकिन हम तो जंगल भी बर्बाद करने पर तुले हैं। आज हर पहाड़ की चोटी और सभ्यता की चोटी पर भी यह मानव ही विराजमान है। चंद्रमा के बाद बस अब शीघ्र ही मंगल पर भी प्रवेश है।
नदियां न पीयें कभी अपना जल, वृक्ष ना खाए कभी अपना फल। एक मधुमक्खी बड़े जतन से फूलों से गंध और पराग चुराती है और अपने छत्तों में शहद बनाती है। चतुर मनुष्य मधुमक्खी को भी पाल लेता है, शहद शहद चाट लेता है। मीठे की हद है शहद। क्या आपने कभी शहद में शकर घोली है ?
रेशम का कीड़ा हमारे लिए रेशम तैयार करता है। कीड़े मकोड़े इतना काम करते हैं, फिर भी कहलाते हैं मक्खी और कीड़े मकोड़े ही। अजब तेरी कारीगरी रे करतार।।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “कार्तिक मास में तुलसी पूजन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २६१ – कार्तिक मास में तुलसी पूजन… ☆
(आध्यात्मिक, पर्यावरणीय एवं सांस्कृतिक चेतना)
कार्तिक मास और तुलसी पूजन का धार्मिक महत्व है। यह मास भगवान विष्णु के जागरण देव उठनी एकादशी को समर्पित है। भक्त पूरे महीने पवित्र नदी में प्रातः स्नान करके कृष्ण जी व तुलसी की पूजा, दीपदान करते हैं। इस महीने में तुलसी माता का विशेष पूजन करने से विष्णु भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
तुलसी विवाह (देवउठनी एकादशी) पर तुलसी का पूजन और भगवान शालिग्राम से विवाह कराया जाता है। यह धर्म, परिवारिक समृद्धि और जीवन में मंगल का प्रतीक माना जाता है। तुलसी माता को लक्ष्मी का अवतार कहा गया है, इसलिए इस मास में उनका पूजन सुख, सौभाग्यवर्द्धक होता है ।
छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन बिन तुलसी प्रभु एक न मानी…
तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु भोजन स्वीकार नहीं करते हैं। इसकी टहनियों से माला, इसकी पत्तियों को जल में डालकर उपयोग किया जाता है। तुलसी का पौधा सात्त्विकता का प्रतीक है। इसके समीप ध्यान करने से मन में एकाग्रता और शांति का अनुभव होता है।
तुलसी पौधा वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है। इसकी खास सुगंध घर और आस-पास के वातावरण कीटाणु रहित करती है। तुलसी लगाने और पूजन की परंपरा हमारे प्रकृति संरक्षण के वैदिक ज्ञान को दर्शाती है। यह केवल आस्था नहीं, पर्यावरणीय संतुलन का केंद्र भी है। तुलसी विवाह में गन्ने का मंडप, हल्दी की पूजा, जैसे अनुष्ठान धार्मिक सामंजस्य और जीवन के नैतिक मूल्यों का संदेश देते हैं।
अतः ये कहा जा सकता है कि कार्तिक मास में तुलसी पौधे की विशेष पूजा आध्यत्मिकता के साथ – साथ पर्यावरणीय व सांस्कृतिक चेतना को भी समृद्ध करती है ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लिखावट…“।)
अभी अभी # ८०३ ⇒ आलेख – लिखावट श्री प्रदीप शर्मा
लिखावट को बोलचाल की हिंदी में हैंडराइटिंग कहते हैं ! अगर इस उम्र में कोई आपसे कहे कि आप अपनी लिखावट सुधारो, बहुत खराब है, तो आपको कितना बुरा लगेगा । लेकिन जब बुरा समय आता है, तो ऐसा ही होता है ।
आपकी हैंडराइटिंग कितनी भी खराब होगी, पढ़ने में तो आ ही जाती होगी ! लेकिन इन डॉक्टरों की लिखावट का तो बस मरीज़ ही मालिक है । उधर केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत योजना की घोषणा की, इधर मेडिकल कॉलेज ने डॉक्टरों की लिखावट सुधारने के लिए वर्कशॉप आयोजित करने का निर्णय ले लिया । जग-जाहिर हो गया, डॉक्टरों का इलाज कितना भी लाजवाब हो,उनकी हैंडराइटिंग तो माशा-अल्लाह ही है ।।
हम छोटे थे, तो स्कूल में सुन्दर-लेखन प्रतियोगिता होती थी ! सुंदर लेखन पर पुरस्कार दिया जाता था । अगर लिखावट खराब हो, तो किसी सुंदर लिखावट वाले लड़के से प्रेमपत्र लिखवाना एक आवश्यक मज़बूरी हो जाती थी । लड़कियों की लिखावट तो उनके चेहरे की सुंदरता से ही टपकती नज़र आती थी ।
हम भी आज डॉक्टर ही होते,अगर हमारा बचपन सुंदर लेखन में स्वाहा न हो गया होता ! पहले हिंदी अंग्रेज़ी का अक्षर-ज्ञान,उँगलियों पर गिनती-पहाड़ा, पट्टी-पेम के बाद कॉपी पर पेंसिल से लिखाई । हिंदी अंग्रेज़ी लेखन की अलग कॉपी,अंग्रेज़ी सिर्फ़ बड़ी,छोटी ही नहीं,इटैलिक भी ! हर अक्षर की पूँछ और मूँछ दोनों रहती थी ।।
स्याही-दवात और होल्डर ही हमारे नसीब में था तब ! पार्कर पेन का तो बस नाम ही सुना था । क्रोसिन की गोल गोली जैसी स्याही की टिकली आती थी,जिसे पानी की दवात में घोल दिया जाता था, और स्याही तैयार ! होल्डर की निब भी टूटने पर बदलनी पड़ती थी । पिताजी की जेब में लगे फाउन्टेन पेन को बड़ी हसरत की निगाह से देखा करते थे ।
हमारे भी दिन फिरे ! हमें भी पेन नसीब हुआ । तब पेन भी स्याही वाले ही आते थे । पेट्रोल की तरह पेन का मुँह खोल स्याही ड्रॉपर से टपकायी जाती थी,और स्याही भी camel की ही होती थी । कितनी बार बस्ता खराब हुआ,ज़ेब ख़राब हुई,कागज़ खराब हुए,तब जाकर लिखावट रंग लाई ।।
परीक्षा में कितने पन्ने रंगे होंगे,
जीवन के कितने पृष्ठ अनलिखे रह गए होंगे,इसका कोई दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं । आज इंसान बच्चे से गया बीता हो गया है, जो कभी दोस्तों को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था,डायरियां लिखा करता था, अचानक लिखना छोड़ फेसबुक पर चला गया है । बरसों पुरानी चिट्ठियों को सहेजकर रखने वाला,फ़ोन पर मैसेज पढ़ते ही डिलीट कर देता है । कागज़ बचाने के चक्कर में,दुनिया डिजिटल हो रही है । हैंडराइटिंग नहीं,पर्यावरण सुधारिये ।
मुझे डॉक्टरों से सहानुभूति है । ज़ल्दी का काम डॉक्टर का ! ज़ल्दी में लिखावट ऐसी ही हो जाती है । याद है जब क्लास में डिक्टेशन लेते थे,हम पैसेंजर और हमारे सर,फ्रंटियर मेल । घर जाकर फेयर ना करो,तो बिल्कुल डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन नज़र आता था ।।
बहुत कम शुभचिंतक मिलते हैं इस ज़माने में ! खुद को सुधारिये,कहने वाले कई समाज सुधारक मिल जाएँगे । आपका सही शुभचिंतक वही,जो आपसे कहे, कृपया अपनी हैंडराइटिंग