(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सफ़ेद बाल…“।)
अभी अभी # 730 ⇒ सफ़ेद बाल श्री प्रदीप शर्मा
बाल उगाना तो बच्चों का खेल है, लेकिन उन्हें हमेशा काले बनाए रखना बड़े-बूढ़ों का खेल है। सभी बच्चे अमूमन बाल लेकर पैदा होते हैं, कुछ ज़्यादा तो कुछ कम। बिना बाल के बच्चे कम ही पैदा होते हैं। इसीलिए उन्हें बाल बच्चे कहते हैं।
बच्चों के साथ बाल भी बढ़ते हैं। लड़कों के बाल कटते रहते हैं, लड़कियों के बाल बढ़ते रहते हैं। बाल और नाखून साथ साथ बढ़ते हैं, दोनों में खून नहीं होता। लेकिन जब कोई उखाड़ता है तो दर्द होता है। नाखून घर में काटे जाते हैं, केश, आपले केश कर्तनालय में।।
बहुत से घरों में छुट्टी के दिन बाल दिवस मनाया जाता है। एक समय था जब शिकाकाई और मुल्तानी मिट्टी से महिलाएँ बाल-सेवा में व्यस्त रहा करती थी। रेडियो सीलोन पर लोमा हेयर आयल का विज्ञापन आता था। तब तक शैम्पू का तो जन्म भी नहीं हुआ था। केवल दादियों के बाल सफ़ेद हुआ करते थे। बालों में जुओं और घरों में खटमलों का राज हुआ करता था।
बालों की सुरक्षा शरीर की सुरक्षा का एक प्रमुख अंग है। किसी के सर में एक भी सफेद बाल बुढापे की निशानी समझा जाता था। इसी कारण हाथों में लगने वाली मेंहदी सर पर चढ़ गई। बाज़ार में बालों की सुरक्षा के लिए शैम्पू, कंडीशनर और मॉइस्चराइजर आ गए। इंदौर में एक मॉडर्न लांड्री थी, जो अपनी दुकान के नाम के नीचे डायर्स और ड्राइकलीनर्स भी लिखती थी।।
जब से वॉशिंग मशीन घरों में आ गई कपड़े घरों में ही ड्राई-क्लीन होने लगे और गोदरेज डाई से बाल भी काले होने लगे। बाल डाई करने के बाद किसी भद्र महिला-पुरुष की उम्र का पता ही नहीं चलता। महिलाओं के चेहरे और बालों की सुंदरता के लिए ब्यूटी पार्लर की सेवाएँ ली जाने लगी तो पुरुषों ने भी जेंट्स पार्लर की ओर रुख कर लिया।
जॉनीवाकर का एक मशहूर गीत है -तेल मालिश चम्पी ! सर की मालिश और शरीर की मालिश अब फेशियल और बॉडी मसाज हो गई है। ए के हंगल भी जब मेन्स पार्लर से बाहर आता है तो अपने आप को देवानंद समझता है। बाल काले करने से दुनिया उजली नज़र आने लगती है।।
कुछ ही भाग्यशाली पुरुष ऐसे होते हैं जिन्हें बालों की चिंता नहीं होती। लोग उन्हें मुफ्त ही बदनाम करते हैं कि चिंता से बाल उड़ जाते हैं। महिलाओं के बाल कम उड़ते हैं, जब कि उन पर जिम्मेदारियों का बोझ अधिक होता है।
एक ऐसी मान्यता है कि धूप में बाल सफेद होते हैं। जिनके बाल सफेद होने लगते हैं, वे सफाई देते हैं कि हमने बाल धूप में सफेद नहीं किये। कहाँ किये, कभी नहीं बताते। उन्हें इतना नहीं समझता कि सफेद बाल काले करना तो आसान है लेकिन काले बाल सफेद करना इतना आसान नहीं।।
जिन्हें हम सफ़ेद बाल कहते हैं, उन्हें अंग्रेज़ी में grey hair कहते हैं। सफेद बाल सम्मान का प्रतीक है। लोग सम्मान की आशा तो रखते हैं, लेकिन बूढ़ा नहीं दिखना चाहते। बुढापा विचारों से तो आता ही है, बार बार आईना देखने, और सफ़ेद बाल गिनने से भी आता है।
बाल काले हों, सफेद हों, कोई फ़र्क नहीं पड़ता ! बस दिल काला न हो। सुंदर दिखना और लगना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। अच्छे दिखें, अच्छे लगें, साथ साथ अच्छे बनें भी। जो देखे, बस यही कहे,
अहा ! आप मुझे अच्छे लगने लगे। कितना पुराना गीत है, लेकिन हमेशा जवां ;
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “बापू की कुटिया…“।)
अभी अभी # 729 ⇒ बापू की कुटिया श्री प्रदीप शर्मा
(BAPU KI KUTIYA)
बापू का कॉपीराइट वैसे तो गांधीजी के पास ही है, लेकिन घर के किसी भी बुजुर्ग को आप निश्चिंत हो, बापू कह सकते हैं। अपने बाप की उम्र के काका, बाबा तो ठीक, कुछ परिवारों में तो बच्चों को भी बाबू, बाबा और बापू कहकर संबोधित किया जाता था।
पहले हमें नाम से लगा, सेवाग्राम और साबरमती आश्रम की तरह, शायद यह कुटिया भी कभी बापू का निवास स्थान रही होगी, लेकिन आज से ५० वर्ष पूर्व, भोपाल प्रवास में, जब मैं टीटी नगर के आसपास, देर रात ९ बजे, कोई भोजनालय तलाश रहा था, अचानक मेरी निगाह इस बापू की कुटिया पर पड़ी, जहां कुछ लोग भोजन कर रहे थे।।
नाम में सादगी झलक रही थी, अतः मैं निश्चिंत हो गया, यहां जरूर मुझे शुद्ध, सात्विक, शाकाहारी भोजन अवश्य उपलब्ध होगा, और यकीन मानिए, बापू की कुटिया ने मुझे निराश नहीं किया।
कम कीमत पर मुझे घर जैसा भोजन नसीब हुआ।
उसके बाद जब भी भोपाल जाता, एक नजर बापू की कुटिया पर अवश्य डालता।
मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब मेरे शहर इंदौर में भी अचानक एक जगह मेरी नजर “बापू की कुटिया” पर पड़ी। बापू की तो खैर गुडविल ही इतनी है कि हर छोटे बड़े शहर में आपको एम जी रोड, महात्मा गांधी मार्ग, गांधी हॉल, गांधी नगर और गांधी प्रतिमाएं मिल जाएंगी। उनके नाम से कई मेडिकल कॉलेज होंगे। गांधी आदर्श ना सही, लेकिन ब्रांड बनकर तो रह ही गए हैं। उन्होंने भले ही पैसे से मोह ना पाला हो, लेकिन भारतीय मुद्रा अभी तक उनकी तस्वीर के मोह को छोड़ नहीं पा रही है। बोलचाल की भाषा में बड़े नोटों को लोग गांधी छाप नोट भी कहने लगे हैं।।
आखिर एक दिन वह भी आ गया, जब मुझे मेरे शहर की बापू की कुटिया के स्वादिष्ट भोजन का स्वाद लेने का सुअवसर मिला।
कुटिया जैसा यहां कुछ भी नहीं था। हां, भोजन शाकाहारी ही था।
अगर आप सात्विक भोजन चाहते हैं तो जैन फूड हाजिर है। संक्षेप में अगर कहें तो बापू की कुटिया ने मुझे यहां भी निराश नहीं किया।
वैसे भी आजकल सादगी का नहीं, तड़क भड़क का जमाना है, इसलिए बापू की कुटिया पर भी रात में चकाचौंध रोशनी जगमगाती रहती है। यहां सत्संग अथवा सर्व धर्म की प्रार्थना नहीं होती, बस सशुल्क पेट पूजा होती है।
भाषा विवाद से दूर, इसका हिन्दी में नियॉन साइनबोर्ड (नामपट्ट), “बापू की कुटिया”, भी दूर से ही अपनी छटा बिखेरता है। अगर यही साइनबोर्ड अंग्रेजी में लिखा होता तो
शायद कुछ इस प्रकार होता, “BAPU KI KUTIYA”.
आजकल सभी आश्रम वातानुकूलित हो चले हैं, और कुटिया, कॉटेज।
हर अमीर अपने महल को दौलतखाना और गरीबखाना ही कहता है।
जब से रामराज्य में किसी गरीब की झोपड़ी के भाग खुले हैं, हर भक्त अपने कॉटेज को झोपड़ी ही मानने लगा है, और वहां भी राम जी की कृपा से आराम ही आराम है।
बापू की कुटिया में आपको विदुर का साग मिले ना मिले, दुर्योधन का मेवा मिलने से तो रहा।।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय चिंतन – ‘सूली पर टंगा आदमी‘। इस विचारणीय रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 296 ☆
☆ चिंतन ☆ सूली पर टंगा आदमी ☆
12 जून को अहमदाबाद में हुई वायुयान दुर्घटना ने पूरी दुनिया को हिला दिया। 270 आदमियों का जीवन पल भर में बुझ गया। कल्पनातीत अन्त। इनमें से कितने ही बच्चे थे जिनका जीवन शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया। एक परिवार में पति-पत्नी के अलावा तीन बच्चे थे, सात आठ साल के जुड़वां बेटे और उनसे एक दो साल बड़ी उनकी प्यारी सी दीदी। बेटियों का मोह मुझे ज़्यादा होता है, इसलिए उस नन्हीं बेटी का फोटो देखकर मुझे रोना आया।
इस घटना के दो-तीन दिन बाद ही एक हेलीकॉप्टर केदारनाथ से लौटते में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इसमें पायलट समेत सात व्यक्तियों की मौत हुई। सवारियों में एक नाबालिग बच्ची भी थी। फिर एक बार आदमी की असहायता शिद्दत से महसूस हुई।
ये सब स्थितियां आदमी के वश से बाहर हैं। आदमी आज टेक्नोलॉजी का गुलाम है। टेक्नोलॉजी जिस तरफ घुमाती है, उसी तरफ घूमने के लिए मजबूर है। आदमी बैलगाड़ी से चलकर तांगे, इक्के, फिटन, मोटर, रेल से बढ़कर वायुयान तक पहुंचा। ट्रेन के पंद्रह सोलह घंटे के सफर को वायुयान से तीन-चार घंटे में तय कर लेने का लोभ बढ़ा, भले ही उसके लिए जेब कुछ ज़्यादा हल्की करनी पड़े। जो आदमी मोटर पर चलने का आदी हो, उसके लिए साइकिल-रिक्शे की धीमी सवारी असहनीय हो जाती है। लेकिन वायुयान में बैठकर पूरे समय ‘राम-राम’ जपना पड़े तो यात्रा कैसी होगी? ‘न निगलते बने, न उगलते’ वाली स्थिति है।
परसों के अखबार की खबर के अनुसार पिछले एक वर्ष में हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ये सब 35 वर्ष से कम आयु के युवा हैं जो मंझोले शहरों से महज़ घूमने और मनोरंजन के लिए विदेश गये।
बैलगाड़ी-युग में बारातें भी बैलगाड़ी में जाती थीं। बैलगाड़ी की बारात में लड़की वाले को आदमियों के अलावा बैलों की खूराक का भी इन्तज़ाम करना पड़ता था। तब की बारातें दो-तीन दिन रुकती थीं, इसलिए लड़की वालों की फजीहत का अन्दाज़ लगाया जा सकता है। मेरे एक रिश्तेदार बताते थे कि जब उनके घर की शादी होती थी तब जिनको निमंत्रण नहीं मिलता था वे भी पता चलने पर बैलगाड़ी सजाकर इष्ट-मित्रों सहित चल पड़ते थे। नतीजतन बारातियों की संख्या हज़ारों में पहुंचती थी।
एक ज़माना वह भी था जब आम आदमी को कोई सवारी मयस्सर नहीं थी। तब अपनी पांवगाड़ी ही काम आती थी। आठ दस मील की यात्रा आराम से पैदल हो जाती थी। बहुत से तीर्थयात्री पैदल ही लंबी यात्राएं करते थे। तब तीर्थयात्रियों को घर से अन्तिम विदाई दी जाती थी क्योंकि सयाने लोगों के जीवित लौट कर आने की उम्मीद कम ही रहती थी। अभी भी कांवड़िये कांवड़ों के साथ सैकड़ो मील की यात्राएं पैदल कर रहे हैं।
वायु-यात्रा के अलावा दूसरी फिक्र महानगरों में गगनचुम्बी इमारतों को देखकर होती है। तीस चालीस फ्लोर की इमारतों के माचिस जैसे फ्लैटों को देखकर रीढ़ में फुरफुरी या झुरझुरी दौड़ती है। कुछ दिन पहले दुबई में एक 67 मंज़िली इमारत में आग लगने से बड़ी मुश्किल से करीब 3500 लोगों को निकाला जा सका। सवाल यह उठता है कि जब आदमी का सुरक्षित निकलना मुश्किल हो जाए तो उसकी गृहस्थी के माल- असबाब का क्या होगा? अमेरिका के ट्रेड टावरों को हम अभी भूले नहीं हैं।
दिल्ली के एक इलाके में पांचवीं या छठवीं मंज़िल पर आग लगने से एक सज्जन ऐसे घबराये कि अपने पुत्र और भतीजी को ऊपर से कूदने के लिए कह दिया और उनके पीछे खुद भी कूद गये। नतीजतन तीनों की ही मृत्यु हो गयी।
कुछ दिन पहले टीवी पर एक बिल्डर का इंटरव्यू देखा था। उनका कहना था कि ज़मीन की कमी और उसकी आसमान-छूती कीमतों के कारण ‘होरिज़ोंटल’ निर्माण के बजाय ‘वर्टिकल’ निर्माण ज़रूरी है। उन्होंने बताया कि उनका ख़्वाब एक किलोमीटर ऊंची टावर बनाने का है। सुनकर मेरी हालत खराब हो गयी। लगता है आदमी जीते जी स्वर्ग का सफर तय कर लेगा। ‘गगन मंडल पर सेज पिया की, किस विधि मिलना होय।’
मकान की ऊंचाई बढ़ने के साथ आदमी पूरी तरह ‘लिफ्ट’ पर निर्भर हो रहा है। लिफ्ट काम न करे तो आदमी पिंजरे में बन्द चूहा हो जाए। हाल में लिफ्ट का दरवाज़ा न खुलने और आदमी के फंस जाने की घटनाएं सामने आयीं। एक घटना में लिफ्ट का दरवाज़ा न खुलने के कारण एक आठ दस साल का बालक उसमें फंस गया था। यह दिक्कत कुछ मिनट ही रही, लेकिन लिफ्ट के बाहर प्रतीक्षारत बालक के पिता ऐसे बदहवास हुए कि उन्हें ‘हार्ट अटैक’ आ गया और उनकी मृत्यु हो गयी। ऐसी घटनाओं से आदमी की बढ़ती लाचारी सामने आती है।
कुछ दिन पहले गुड़गांव या गुरुग्राम में एक संबंधी के घर में रुकने का मौका मिला था। फ्लैट बारहवीं मंज़िल पर था। शाम को मुझे सलाह दी गयी कि नीचे जाने के बजाय थोड़ी देर बालकनी में ही टहल लूं। सलाह मान कर बालकनी के दो-तीन चक्कर लगाये, लेकिन नीचे झांकने पर मुझे चक्कर आने लगे। परिणामत: टहलना मुल्तवी करके कमरे में आ गया।
मजबूरी में आज लोग स्थितियों से संगत बैठाने की जद्दोजहद में लगे हैं। आज के महानगरों के हालात को देखकर सब की ख़ैर ही मनायी जा सकती है।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 297 ☆ प्रकृति…विकृति…
वर्तमान जीवन शैली में चलना, दौड़ना, व्यायाम आदि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हो चले हैं। मुझे भ्रमण प्रिय है। सामान्यतः प्रातः समय भ्रमण कर लेता हूँ तथापि अनेक बार ऐसी अपरिहार्यताएँ होती हैं कि सुबह से रात तक काम के अलावा दूसरा कुछ करने की स्थिति नहीं बन पाती।
आज भी ऐसा ही एक दिन था। रात के लगभग 10:30 बज रहे थे। विचार किया कि भ्रमण का कोटा पूरा कर लूँ। तुलनात्मक रूप से कम भीड़-भाड़ और चौड़े फुटपाथ वाली एक सड़क पर निकल पड़ा। देखता हूँ कि जो लोग भ्रमण कर रहे हैं, उनमें भोजन कर पान खाने निकले कुछ दुकानदारों की टोली है, कुछ युगल हैं। एकाध परिवार हैं, शेष एकल पुरुष हैं। पूरे मार्ग पर भी एक भी अकेली स्त्री नहीं है।
चिंतन का चक्र आरंभ हुआ। स्त्रियों के साथ यह भेदभाव क्यों? जैसे देर रात भ्रमण की मेरी इच्छा हुई, अनेक स्त्रियों की भी होती होगी पर उनके कदम बँधे हैं। भीतर से तर्क आया कि यह तो प्रकृतिगत है कि देर रात सुनसान रास्ते पर कोई महिला अकेली नहीं निकलेगी। भीतर ने ही तर्क से तर्क की काट भी तलाशी।
सत्य तो यह है कि शेर के डर से खरगोश दुबका रहे, यह तो प्रकृति है पर शेर के डर से शेरनी बाहर ना निकल सके, यह विकृति है। पृथ्वी पर अन्य किसी भी सजीव की एक ही प्रजाति में यह डर देखने को नहीं मिलता। स्त्री-पुरुष पूरक हैं। एक घटक को भय होगा तो पूरक मिलकर संपूर्णता कैसे प्राप्त करेंगे? दुखद यथार्थ है कि सामान्यतः हर स्त्री को अपने जीवन में अपनी कुछ इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है। इच्छाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप पुरुष पर है और उसे ईमानदारी से इस आरोप को स्वीकार करना भी चाहिए।
मनुष्य ने अरण्य से निकल कर नगर बसाए। नगर के अपने नियम-कानून बनाए। तथ्य बताते हैं कि ये कानून स्त्रियों को संरक्षण देने में विफल रहे। लैंगिक समानता के विषय पर अरण्य, नागरी सभ्यता से बहुत आगे खड़े हैं। नीति कहती है कि जब मनुष्य के नियम प्रभावहीन होने लगें तो उसे अपौरुषेय की शरण में जाना चाहिए।
वेद अपौरुषेय हैं। अथर्ववेद का उद्घोष है कि स्त्रियाँ शुद्ध स्वभाव वाली, पवित्र आचरण वाली, पूजनीय, सेवा योग्य, शुभ चरित्र वाली और विदुषी हैं। यजुर्वेद स्त्री, पुरुष दोनों में से किसी को भी शासक होने का समान अवसर प्रदान करते हुए अपेक्षा व्यक्त करता है कि राजा की भाँति रानी भी न्याय करनेवाली होनी चाहिए।
न्याय का अधिकार रखनेवाली के साथ होता अन्याय समर्थनीय नहीं है। वेदों के दिशा-निर्देश और आचरण तत्व स्त्री-पुरुष दोनों पर लागू होते हैं। स्त्री को समानता और निर्भय वातावरण उपलब्ध कराना प्रत्येक पुरुष का कर्तव्य है। इस कर्तव्य को चर्चा तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना ही बुद्धिमान मनुष्य प्रजाति से अपेक्षित है।…इति।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी।
इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे।
101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रबड़ी प्लेट ||“।)
अभी अभी # 728 ⇒ || रबड़ी प्लेट || श्री प्रदीप शर्मा
आप भले ही लड्डू को मिठाइयों का राजा मान लें, लेकिन जलेबी, इमरती और रबड़ी का नाम सुनकर ज़रूर आपके मन में लड्डू फूट पड़े होंगे। जिन्हें गुलाब जामुन पसंद है, उन्हें मावा बाटी की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। होते हैं कुछ लोग, जो चाशनी से परहेज करते हैं, लेकिन रसगुल्ला देख, उनके मुंह से भी पानी टपकने लगता है।
हम तो शुगर को शक्कर ही समझते थे, लेकिन जब से सुना है, शुगर एक बीमारी भी है, हमने भी मीठे से परहेज करना शुरू कर दिया है। लेकिन चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से ना जाए, रबड़ी तब भी हमारी कमजोरी थी, और आज भी है।।
कुछ समय के लिए शुगर को भूल जाइए, आइए रबड़ी की बात करें। ठंडी रातों में दूध के कढ़ाव और केसरिया, मलाईदार दूध, रबड़ी मार के, मानो चाय मलाई मार के। गर्मी में मस्तानी दही की लस्सी और वह भी रबड़ी मलाई मार के। खाने वाले खाते होंगे दही के साथ गर्मागर्म जलेबी, हम तो जलेबी भी रबड़ी के साथ ही खाते हैं।
आज हम जिस रबड़ी प्लेट का जिक्र कर रहे हैं, उसके लिए हमें थोड़ा अतीत में जाना पड़ेगा। नालंदा जितना अतीत नहीं, फिर भी कम से कम पचास बरस। हमारे होल्करों के शहर इंदौर के बीचों बीच एक श्रीकृष्ण टाकीज था, जहां गर्मियों में सुबह साढ़े आठ बजे एक ठेला नजर आता था, जो हीरा लस्सी के नाम से प्रसिद्ध था। यह लस्सी केवल गर्मियों में ही नसीब होती थी। एक बारिश हुई, और वहां से ठेला नदारद।
एक श्रृंगारित ठेला, जिसमें कई शरबत की बोतलें सजी हुई, ठेले के नीचे के स्टैण्ड पर कई ताजे दही के कुंडे, ठेले के बीच टाट पर विराजमान एक बर्फ की शिला, एक विशाल तपेले में, लबालब रबड़ी और इन सबके बीच कार्यरत एकमात्र व्यक्ति हीरा और उनका चीनी मिट्टी का बड़ा पात्र और एक लकड़ी की विशाल रवई, दही को मथने के लिए। (सब कुछ हाथ से ही)
हीरा लस्सी ही उस लस्सी का ब्रांड था, जो किसी जमाने में आठ आने से शुरू होकर दस रुपए तक पहुंच गई थी। पहले कुंडे से दही निकालकर तबीयत से मथना, फिर कांच के ग्लासों में बर्फ छील छीलकर डालना, लस्सी और बोतलों में रखे शकर के केसरिया शरबत को मिलाना, और ग्लासों को लस्सी से भरना, फिर थोड़ी रबड़ी और उसके बाद लबालब लस्सी पर दही की मलाई की एक मोटी परत। लीजिए, हीरा लस्सी तैयार।।
हमारा विषयांतर में विश्वास नहीं। वहां रबड़ी प्लेट भी उपलब्ध होती थी, जो मेरी पहली और आखरी पसंद होती थी। भाव लस्सी से उन्नीस बीस, लेकिन एक कांच की बड़ी प्लेट में लच्छेदार रबड़ी, उस पर थोड़ा बर्फ का चूरा और ऊपर से गुलाब का शर्बत। एक लोहे की डब्बी में काजू, बादाम, पिस्ते का चूरा लस्सी और रबड़ी प्लेट दोनों पर कायदे से बुरकाया जाता था। तब जाकर हमारी रबड़ी प्लेट तैयार होती थी।
हाइजीन वाले हमें माफ करें, क्योंकि हम रबड़ी प्लेट खाने के बाद हाथ नहीं धोते थे, रबड़ी और गुलाब के शरबत की खुशबू हमारे हाथों में हमारे साथ ही जाती थी और साथ ही जबान पर रबड़ी प्लेट का स्वाद भी।।
आज न तो वहां श्रीकृष्ण टाकीज है और ना ही वह हीरा लस्सी वाला। पास में बोलिया टॉवर के नीचे, उसके वंशज जरूर फ्रिज में रखी लस्सी, हीरा लस्सी के नाम से, साल भर बेच रहे हैं, लेकिन वह बात कहां।
जिस तरह शौकीन लोग, अपना शौक घर बैठे भी पूरा कर लेते हैं, हमारी रबड़ी प्लेट भी आजकल घर पर ही तैयार हो जाती है। तैयार केसरिया रबड़ी मांगीलाल दूधवाले अथवा रणजीत हनुमान के सामने विकास रबड़ी वाले के यहां आसानी से उपलब्ध हो ही जाती है, बस एक प्लेट में रबड़ी पर थोड़ा सा, मौसम के अनुकूल बर्फ और गुलाब का शर्बत ही तो डालना है, लीजिए, रबड़ी प्लेट तैयार। शौकीन हमें ज्वाइन कर सकते हैं।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “सृजन और विसर्जन…“।)
अभी अभी # 727 ⇒ सृजन और विसर्जन श्री प्रदीप शर्मा
एक इमारत बनती है, एक इमारत ढहती है, एक दीया जलता है, एक दीया बुझता है, एक कली खिलती है, एक फूल मुरझाता है, बहार के साथ खिजां भी चली ही आती है। चमन में रह के मेरा दिल, वीराना होता जाता है। खुशी के साथ, कुछ गम, भी शामिल होता जाता है।
सृजन में भले ही हमें सुख प्रतीत होता है, लेकिन सृजन की प्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं। वैसे देखा जाए तो इस सृष्टि का एक ही सरजनहार है, एक ही पालनहार है और इसे समेटने वाला, विसर्जित करने वाला, संहारक भी एक ही है। सृजन विसर्जन सृष्टि का एक चक्र है, साइकल है, अथवा कहें तो रिसाइकल है।।
बनाना और मिटाना, क्रिएशन और डिस्ट्रक्शन है, आजकल हम जिसे विकास और विनाश में परिभाषित करते हैं। लेकिन देखा जाए तो ये दोनों हैं एक ही, केवल इनकी अवस्था में अंतर है। हमने एक गुब्बारे में हवा भरी, उसे फुलाया, और हवा के अधिक दवाब के कारण वह फूट गया। जितनी हवा का सर्जन हुआ था, वह विसर्जित हो गई।
हवा तो पहले से ही हवा थी, फिर हवा हो गई। कबीर भी यही कहना चाहते हैं ;
पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय।
अब के बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय।।
सृजन का सिद्धांत भी शायद यही है। ऐसा कहा जाता है, पीड़ा से सृजन होता है, लेकिन सृजन में सुख है, इसलिए सृजन की पीड़ा में भी सुख है। जब एक मूर्तिकार किसी पत्थर को तराशकर मूर्ति बनाता है, तो भले ही उसे परिश्रम लगता हो, आनंद की अनुभूति होती हो, बेचारा पत्थर तो टूटता ही है न, बिखरता ही है न। जब पत्थर टूटता है, बिखरता है, पिघलता है, तब ही तो पत्थर में प्राण आते हैं।
पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल अपना स्वरूप बदलता है। ख़ाक होने से, ख़ाक तो फिर भी बच ही जाती है, वही ख़ाक मिट्टी में मिल फिर कोई नई कहानी लिख जाती है। बीज में वृक्ष की संभावना है, लेकिन एक जला हुआ बीज कभी अंकुरित नहीं होता। सृजन का भी कुछ विधान है।।
क्या सृजन का दिखाई देना, प्रकट होना, अथवा बाहर आना जरूरी है। क्या जो प्रकट नहीं है, प्रकाशित नहीं है, वह सृजन नहीं है। हमारी पृथ्वी के गर्भ में क्या है, ऐसा नहीं है कि हम नहीं जानते। धधकते ज्वालामुखी हैं पृथ्वी के गर्भ में। उनका पृथ्वी के गर्भ में रहना ही सृष्टि का रहस्य है। ज्वालामुखी बाहर, सृष्टि अंदर। क्या कोरोना वायरस मानवता के साथ घिघौना मज़ाक नहीं ? सृजन वही श्रेष्ठ, जो कल्याणकारी हो। इसीलिए सृजन को क्रिएशन कहा गया है। सत्यं, शिवम्, सुंदरम्।
एक सृजनोन्मुख साहित्यसेवी की रचना जब एक पुस्तक का आकार ले लेती है, तब वह बड़ा प्रसन्न होता है। उसे याद आती है सृजन की पीड़ा। अधिक चिंतन से उसे कब्ज़ हो गई थी। घंटों विसर्जन कक्ष में बिताए थे उसने, इसबगोल और सिगरेट के धुएं के छल्लों के बीच। तब जाकर कुछ सृजन हो पाया था। जब सृजन शुरू होता है, तो विसर्जन बुरा मान जाता है। अब पुस्तक छपने के बाद कितनी हलकान, व्हाट ए रीलीफ।।
उसे याद आते हैं वे दिन, जब उसकी रचना संपादक द्वारा अस्वीकृत कर वेस्ट पेपर बास्केट के हवाले कर दी जाती थी। Love’s labour lost वाला फीलिंग आता था उसे। उसका संघर्ष रंग लाया। उसकी रचना ने पहले अखबार का मुंह देखा फिर
सप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं का। बाद में तो कैलेंडर की तरह उसकी रचनाएं छपने लगी। सृजन सुख, छपास सुख, और पारिश्रमिक का सुख, यानी 3 इन 1 का सुख।
आज भी जब उसे कब्ज़ का अहसास होता है, वह जान जाता है, कलम से कुछ बाहर आने वाला है, सृजन सुख से बड़ा कोई सुख नहीं। दुनिया गोल है, जब तक पास में इसबगोल है। पहले सृजन सुख, बाद में विसर्जन सुख।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख गुण और ग़ुनाह। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 283 ☆
☆ गुण और ग़ुनाह… ☆
‘आदमी के गुण और ग़ुनाह दोनों की कीमत होती है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि गुण की कीमत मिलती है और ग़ुनाह की उसे चुकानी पड़ती है।’ हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। गुणों की एवज़ में हमें उनकी कीमत मिलती है; भले वह पग़ार के रूप में हो या मान-सम्मान व पद-प्रतिष्ठा के रूप में हो। इतना ही नहीं, आप श्रद्धेय व वंदनीय भी बन सकते हैं। श्रद्धा मानव के दिव्य गुणों को देखकर उसके प्रति उत्पन्न होती है। यदि हमारे हृदय में उसके प्रति श्रद्धा के साथ प्रेम भाव भी जाग्रत होता है, तो वह भक्ति का रूप धारण कर लेती है। शुक्ल जी भी श्रद्धा व प्रेम के योग को भक्ति स्वीकारते हैं। सो! आदमी को गुणों की कीमत प्राप्त होती है और जहां तक ग़ुनाह का संबंध है, हमें ग़ुनाहों की कीमत चुकानी पड़ती है; जो शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना रूप में हो सकती है। इतना ही नहीं, उस स्थिति में मानव की सामाजिक प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग सकती है और वह सबकी नज़रों में गिर जाता है। परिवार व समाज की दृष्टि में वह त्याज्य स्वीकारा जाता है। वह न घर का रहता है; न घाट का। उसे सब ओर से प्रताड़ना सहनी पड़ती है और उसका जीवन नरक बन कर रह जाता है।
मानव ग़लतियों का पुतला है। ग़लती हर इंसान से होती है और यदि वह उसके परिणाम को देख स्वयं की स्थिति में परिवर्तन ले आता है, तो उसके ग़ुनाह क्षम्य हो जाते हैं। इसलिए मानव को प्रतिशोध नहीं; प्रायश्चित करने की सीख दी जाती है। परंतु प्रायश्चित मन से होना चाहिए और व्यक्ति को उस कार्य को दोबारा नहीं करना चाहिए। बाल्मीकि जी डाकू थे और प्रायश्चित के पश्चात् उन्होंने रामायण जैसे महान् ग्रंथ की रचना की। तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली के प्रति बहुत आसक्त थे और उसकी दो पंक्तियों ने उसे महान् लोकनायक कवि बना दिया और वे प्रभु भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने रामचरित मानस जैसे महाकाव्य की रचना की, जो हमारी संस्कृति की धरोहर है। कालिदास महान् मूर्ख थे, क्योंकि वे जिस डाल पर बैठे थे; उसी को काट रहे थे। उनकी पत्नी विद्योतमा की लताड़ ने उन्हें महान् साहित्यकार बना दिया। सो! ग़ुनाह करना बुरा नहीं है, परंतु उसे बार-बार दोहराना और उसके चंगुल में फंस कर रह जाना अति- निंदनीय है। उसे इस स्थिति से उबारने में जहां गुरुजन, माता-पिता व प्रियजन सहायक सिद्ध होते हैं; वहीं मानव की प्रबल इच्छा- शक्ति, आत्मविश्वास व दृढ़-निश्चय उसके जीवन की दिशा को बदलने में नींव की ईंट का काम करते हैं।
इस संदर्भ में, मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगी कि यदि ग़ुनाह किसी सद्भावना से किया जाता है, तो वह निंदनीय नहीं है। इसलिए धर्मवीर भारती ने ग़ुनाहों का देवता उपन्यास का सृजन किया,क्योंकि उसके पीछे मानव का प्रयोजन द्रष्टव्य है। यदि मानव में दैवीय गुण निहित हैं; उसकी सोच सकारात्मक है, तो वह ग़लत काम कर ही नहीं सकता और उसके कदम ग़लत दिशा की ओर अग्रसर हो ही नहीं हो सकते। हाँ! उसके हृदय में प्रेम, स्नेह, सौहार्द, करुणा, सहनशीलता, सहानुभूति, त्याग आदि भाव संचित होने चाहिए। ऐसा व्यक्ति सबकी नज़रों में श्रद्धेय, उपास्य, प्रमण्य व वंदनीय होता है। ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु तिन मूरत देखी तैसी’ अर्थात् मानव की जैसी सोच, भावना व दृष्टिकोण होता है; उसे वही सब दिखाई देता है और वह उसमें वही तलाशता है। इसलिए सकारात्मक सोच व सत्संगति पर बल दिया जाता है। जैसे चंदन को हाथ में लेने से उसकी महक लंबे समय तक हाथों में बनी रहती है और हमें उसके बदले में मानव को कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। इसके विपरीत यदि आप कोयला हाथ में लेते हो, तो आपके हाथ काले अवश्य हो जाते हैं और आप पर कुसंगति का दोष अवश्य लगता है। कबीरदास जी का यह दोहा तो आपने सुना होगा–’कोयला होय न उजरा, सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन लाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। परंतु बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान बन सकता है। इसलिए मानव को निराश नहीं होना चाहिए और अपने सत् प्रयास अवश्य जारी रखने चाहिए।
यह कथन कोटिश: सत्य हैं कि यदि व्यक्ति ग़लत संगति में पड़ जाता है, तो उसको लिवा लाना अत्यंत कठिन होता है, क्योंकि ग़लत वस्तुएं अपनी चकाचौंध से उसे आकर्षित करती हैं, जैसे माया रूपी महाठगिनी अपनी हाट सजाए सबका ध्यान आकर्षित करने में प्रयासरत रहती है।
शेक्सपीयर भी यही कहते हैं कि जो दिखाई देता है; वह सदैव सत्य नहीं होता और हमें छलता है। सो! सुंदर चेहरे पर विश्वास करना स्वयं को छलना व धोखा देना है। इक्कीसवीं सदी में सब धोखा है, छलना है, क्योंकि मानव की कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है। लोग अक्सर मुखौटा धारण कर जीते हैं। इसलिए रिश्ते भी विश्वास के क़ाबिल नहीं रहे। रिश्ते खून के हों या अन्य भौतिक संबंध– भरोसा करने योग्य नहीं हैं। संसार में हर इंसान एक-दूसरे को छल रहा है। इसलिए रिश्तों की अहमियत रही नहीं; जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा मासूम बच्चियों को भुगतना पड़ रहा है। अक्सर आसपास के लोग व निकट के संबंधी उनकी अस्मत से खिलवाड़ करते पाए जाते हैं। उनकी स्थिति बगल में छुरी ओर मुंह में राम-राम जैसी होती है। वे एक भी अवसर नहीं चूकय और दुष्कर्म कर डालते हैं, क्योंकि उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई जाती। वास्तव में उनकी आत्मा मर चुकी होती है, परंतु सत्य भले ही देरी से उजागर हो; होता अवश्य है। वैसे भी भगवान के यहां सबका बही-खाता है और उनकी दृष्टि से कोई भी नहीं बच सकता। यह अकाट्य सत्य है कि जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का फल मानव को किसी भी जन्म में भोगना अवश्य पड़ता है।
आइए! आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता पर दृष्टिपात करें, जो ‘खाओ पीयो,मौज उड़ाओ’ में विश्वास कर ग़ुनाह पर ग़ुनाह करती चली जाती है निश्चिंत होकर और भूल जाती है ‘यह किराये का मकाँ है/ कौन कब तक ठहर पायेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यही संसार का नियम है कि इंसान कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। परंतु वह आजीवन अधिकाधिक धन-संपत्ति व सुख- सुविधाएं जुटाने में लगा रहता है। काश! मानव इस सत्य को समझ पाता और देने में विश्वास रखता तथा परहितार्थ कार्य करता, तो उसके ग़ुनाहों की फेहरिस्त इतनी लंबी नहीं होती। अंतकाल में केवल कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है और कृत-कर्मों के परिणामों से बचना असंभव है।
मानव के सबसे बड़े शत्रु है अहं और मिथ्याभिमान; जो उसे डुबो डालते हैं। अहंनिष्ठ व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हेय मानता है। इसलिए वह कभी दयावान नहीं हो सकता। वह दूसरों पर ज़ुल्म ढाने में विश्वास कर सुक़ून पाता है और जब तक व्यक्ति स्वयं को उस तराजू में रखकर नहीं तोलता; वह प्रतिपक्ष के साथ न्याय नहीं कर पाता। सो! कर भला, हो भला अर्थात् अच्छे का परिणाम अच्छा व बुरे का परिणाम सदैव बुरा होता है। शायद! इसीलिए शुभ कर्मण से कबहुं न टरौं’ का संदेश प्रेषित है। गुणों की कीमत हमें आजीवन मिलती है और ग़ुनाहों का परिणाम भी अवश्य भुगतना पड़ता है; उससे बच पाना असंभव है। यह संसार क्षणभंगुर है, देह नश्वर है और मानव शरीर पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि व आकाश तत्वों से बना है। अंत में इस नश्वर देह को पंचतत्वों में विलीन हो जाना है; यही जीवन का कटु सत्य है। इसलिए मानव को ग़ुनाह करने से पूर्व उसके परिणामों पर चिन्तन-मनन अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने के पश्चात् ही आप ग़ुनाह न करके दूसरों के हृदय में स्थान पाने का साहस जुटा पाएंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “सुख सुविधा…“।)
अभी अभी # 726 ⇒ सुख सुविधा श्री प्रदीप शर्मा
कहते हैं, सुख दुख तो दिन रात और धूप छांव की तरह है, कभी सुख है, कभी दुख है, अभी क्या था, अभी क्या है। लेकिन सुख बड़ा स्वार्थी होता है, उसे जहां भी सुविधा नजर आती है, वह दुख का साथ छोड़ देता है और दुख बेचारा दुविधा में पड़ जाता है।
इसी तरह धन कभी निर्धन के पास नहीं जाता, उसे भी किसी दौलतमंद की तलाश होती है। धन दौलत और सुख सुविधा का एक अलग ही संसार होता है।
आप कह सकते हैं इनकी आपस में सांठगांठ होती है, nexus होता है।
क्या सुख, सुविधा का मोहताज है, क्या जहां सुविधा नहीं है, वहां सुख नहीं है। ऐसा नहीं है। सुख बड़ा खुदगर्ज और अवसरवादी है। क्या जब आज जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं थी, इंसान सुखी नहीं था। क्या बिजली का आविष्कार होने से पहले गर्मी लगने पर, हाथ से पंखा झलते हुए उसे सुख का अहसास नहीं होता था। एक हाथ जब दुखने लग जाता था, तो वह दूसरे हाथ से पंखा झलने लग जाता था। यहां देखिए सुख दुख दोनों साथ साथ चल रहे हैं। एक हाथ भी दुख रहा है, पंखा भी चल रहा है और सुख भी मिल रहा है।।
तब कहां इतनी सुख सुविधाएं थीं, कहां घर घर नल, ट्यूबवेल और डीजल के पंप सेट थे। लोग कुएं पर जाते थे, रस्सी बाल्टी से पानी निकालते थे, और स्नान करते थे। तब क्या उन्हें नहाने में सुख नहीं मिलता था। मेहनत और पसीना बहाने के बाद का सुख, कालांतर में आधुनिक सुविधा और धन दौलत ने हमसे छीन लिया।
इतनी सुख सुविधाओं और धन दौलत के बाद भी सुख में वह स्वाद क्यों नहीं जो असुविधा में रहते हुए, चूल्हे की रोटी और सिल बट्टे पर हाथ से पिसी चटनी में आता था। आज सुख सुविधा की यह स्थिति है कि रात में अचानक बत्ती गुल हो जाने से हम परेशान हो जाते हैं, पावर और नेट अगर एक साथ चला जाए तो सुखी दुखी हो जाते हैं।।
क्या सुख सुविधा और धन दौलत हमें चैन की नींद, सुख शांति और कड़ाके की भूख दे पाया है। अगर इसका उत्तर हां है तो हम जैसा सुखी कोई नहीं। और अगर इसका उत्तर ना है, तो हम जैसा दुखी, निर्धन और कंगाल कोई दूसरा नहीं। कोरोना काल में भी हमारे पास वह सब कुछ था, जो आज है, लेकिन केवल ईश्वर का साथ और इंसानियत ही हमारे काम आई। हमारे बीच कई अपने सगे, करीबी, दोस्त और रिश्तेदार ऐसे थे, जो सबका साथ छोड़ गए। नियति इतनी क्रूर भी हो सकती है, हमने पहली बार महसूस किया।
यह इंसान का स्वभाव है।
उसे सुख का पलना चाहिए, दुख की बैसाखी नहीं। पर क्या करें, हम छुट्टी के दिन चैन से परिवार के बीच बैठे हैं, अचानक फोन पर कोई बुरी खबर आ जाती है। सभी विचलित और दुखी हो जाते हैं। सुख सुविधा, धन दौलत अपनी जगह है। आप भले ही तत्काल प्लेन के टिकट बुक करा लें, कोई भी भौतिक सुख सुविधा आपका दुख कम नहीं कर सकती। यही हमारी नियति है। यही संसार है।।
सुख सुविधा और धन दौलत से ऊपर भी एक संसार संवेदना का है। किसी के सुख दुख में शामिल होना, सबके कल्याण की भावना रखना। हम ईश्वर से अपने लिए, अपने परिवार और परिजनों के लिए क्या नहीं मांगते। कहां कहां मन्नत नहीं मांगते। लेकिन क्या हमारा ध्यान कभी उधर भी जाता है, जो उपेक्षित हैं, असहाय हैं।
सुख सुविधा ही जीवन में सब कुछ नहीं होती। सब कुछ कहां शब्दों में बयां हो पाता है ;
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “बूंदों के संग-संग…” । इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 250 ☆ बूंदों के संग-संग… ☆
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छायी है घनघोर घटाएँ।
ऋतु मतवाली छम- छम आए।।
मेघा बरसे रिमझिम ऐसे।
पायल खनके गोरी जैसे।।
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सावन की बूंदों में झूमें।
झूले की रस्सी बन घूमें।।
हरियाली की बात निराली।
हाथ रचाए लाली आली।।
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मेंहदी भरे हाथ, खनकती हुई चूड़ियाँ सबका मन मोह लेतीं हैं। सावन न केवल बारिश के लिए जाना जाता वरन इसके आते ही शिवार्चन भी पूरे उत्साह के साथ शुरू होता है। कजरी, झूला, मल्हार, रक्षा बंधन, तीज का सिंघारा, घेवर, सजी- धजी सुहागन इन सबकी शोभा देखते ही बनती है। ये पूरा मास जहाँ एक ओर धरती को नव जीवन देता है, तो वहीं दूसरी ओर सभी जीव जंतु मानसिक रूप से खिल उठते हैं। प्रसन्न मन से क्या नहीं किया जा सकता। नागपंचमी का त्योहार सर्प की पूजा व उनकी उपयोगिता को आस्था के साथ समृद्ध करता है। कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष तक उमंगित हृदय से इस माह का आनन्द उठाएँ। सावन की पूर्णिमा भाई-बहन के स्नेहिल सूत्र को और भी दृढ़ करती है। मायके व ससुराल दोनों कुलों को जोड़ने वाली कड़ी प्रसन्न रहे तभी सावन चहकेगा, महकेगा।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 296 ☆ सच्चा गुरु…
मनुष्य अशेष विद्यार्थी है। प्रति पल कुछ घट रहा है, प्रति पल मनुष्य बढ़ रहा है। घटने का मुग्ध करता विरोधाभास यह कि प्रति पल, पल भी घट रहा है।
हर पल के घटनाक्रम से मनुष्य कुछ ग्रहण कर रहा है। हर पल अनुभव में वृद्धि हो रही है, हर पल वृद्धत्व समृद्ध हो रहा है।
समृद्धि की इस यात्रा में प्रायः हर पथिक सन्मार्ग का संकेत कर सकने वाले मील के पत्थर को तलाशता है। इसे गुरु, शिक्षक, माँ, पिता, मार्गदर्शक, सखा, सखी कोई भी नाम दिया जा सकता है।
विशेष बात यह कि जैसे हर पिता किसी का पुत्र भी होता है, उसी तरह अनुयायी या शिष्य, मार्गदर्शक भी होता है। गुरु वह नहीं जो कहे कि बस मेरे दिखाये मार्ग पर चलो अपितु वह है जो तुम्हारे भीतर अपना मार्ग ढूँढ़ने की प्यास जगा सके। गुरु वह है जो तुम्हें ‘एक्सप्लोर’ कर सके, समृद्ध कर सके। गुरु वह है जो तुम्हारी क्षमताओं को सक्रिय और विकसित कर सके।
एक संत थे जिनके लिए कहा जाता था कि वे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानते हैं। स्वाभाविक था कि उनके शिष्यों की संख्या में उतरोत्तर वृद्धि होती गई। हरेक के मन में ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानने की सुप्त इच्छा थी। एक दिन दैनिक साधना के उपरांत उनके परम शिष्य ने इस बाबत पूछ ही लिया। गुरुजी बोले, मैं तुम्हें ईश्वर तक पहुँचने के मार्गदर्शक तत्व बता सकता हूँ पर अपना मार्ग तुम्हें स्वयं ढूँढ़ना होगा।
ज्ञानी जानता है कि पुल पार करने से नदी पार नहीं होती। नदी पार करने के लिए उसमें कूदना पड़ता है। लहरों के थपेड़ों के साथ अन्य सभी आशंकाओं को भी तैरकर परास्त करना होता है। तैराकी के गुर सिखाये जा सकते हैं पर तैरते समय हरेक को अपने हिस्से की चुनौतियों से स्वयं दो-दो हाथ करने पड़ते हैं।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहें तो जीपीएस लगाकर गंतव्य तक पहुँचा तो जा सकता है पर रास्ते का ज्ञान नहीं होता। रास्ता समझने के लिए स्वयं भटकना होता है। अपना रास्ता स्वयं ढूँढ़ना होता है। स्वयं की क्षमताओं को सक्रिय करना होता है। स्वयं को स्वयं ही अपना शोध करना होता है, स्वयं को स्वयं ही अपना बोध करना होता है।
ध्यान रहे कि पथ तो पहले से ही है। तुम उसका अनुसंधान भर करते हो, आविष्कार नहीं। यह भी भान रहे कि पथ का अनुसंधान करनेवाले तुम अकेले नहीं हो, असंख्य दूसरे भी अपने-अपने तरीके से अनुसंधान कर रहे हैं। सारे मार्गों का अंतिम लक्ष्य एक ही है। अत: यह एकाकार का मार्ग है।
सच्चा गुरु वह है जो तुम्हें एकल नहीं एकाकार की यात्रा कराये। एकाकार ऐसा कि पता ही न चले कि तुम गुरु के साथ यात्रा पर हो या तुम्हारे साथ गुरु यात्रा पर है। दोनों साथ तो चलें पर कोई किसी की उंगली न पकड़े।
यदि ऐसा गुरु तुम्हारे जीवन में है तो तुम धन्य हो। तुम्हारा मार्ग प्रशस्त है।
जिनकी गुरुता ने जीवन का मार्ग सुकर किया, उनका वंदन। जिन्होंने मेरी लघुता में गुरुता देखी, उन्हें नमन।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से प्रारंभ होगी। इस साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी।
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≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈