हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 725 ⇒ वृद्धाश्रम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “वृद्धाश्रम।)

?अभी अभी # 725 ⇒ वृद्धाश्रम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मनु महाराज के चार वर्ण घोर कलयुग में शीर्षासन कर रहे हैं। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष पर आधारित चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास में वृद्धाश्रम का कहीं नामो निशान ही नहीं है।

किसी ने ठीक ही कहा है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। सौ बरस की ज़िंदगी को अपने हिसाब से चार आश्रमों में बांट देना, आज के युग में कहां की समझदारी है। सह शिक्षा में २५ वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन, कहीं बाल विवाह तो कहीं पढ़ने लिखने और नौकरी की तलाश ही में लाखों का सावन चला जाता है। आंखों पर चश्मा चढ़ जाता है, फिर भी घोड़ी चढ़ना नसीब नहीं होता आज की पीढ़ी को। कहीं अटल जी का आदर्श तो कहीं मोदीजी का राष्ट्र सेवा का संकल्प गृहस्थाश्रम की नींव कमजोर करता प्रतीत होता है।।

अब अगर २५ वर्ष की उम्र में गृहस्थाश्रम में प्रवेश ले भी लिया तो शादी, नौकरी, बाल बच्चे, और मकान बनाने के बाद लड़कियों के हाथ पीले करने में ही बाल सफेद हो जाते हैं। कहीं रिटायरमेंट ६० का, तो कहीं ६२ का, अगर प्रोफेसरी कर ली, तो ६५ तक अटके रहो। बी पी, शुगर, कोलेस्ट्रॉल के बाद अब वानप्रस्थ के लिए क्या बचा। बाबा जी का ठुल्लू !

वानप्रस्थ क्षत्रियों के लिए वंशवाद का एक आदर्श उदाहरण है। गृहस्थाश्रम के २५ वर्षों में राज भी कर लो, आठ दस पटरानियों से विवाह कर बच्चों की पलटन खड़ी कर, खुद ५० होते ही वानप्रस्थ के लिए निकल लो। आपके पीछे लूटपाट हो या खून खराबा, पूजा पाठ से अपना परलोक सुधारो। आज की तरह नहीं, कि बेटे बहू का घर में राज और माता पिता वृद्धाश्रम चले आज।।

कहने को तो हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, लेकिन वृद्धाश्रम का उजला पक्ष अभी तक अंधकार में ही है। क्या यह पीढ़ियों का टकराव है या फिर नई पीढ़ी का स्वार्थ और खुदगर्ज़ी। क्या इसके लिए एक ही पीढ़ी दोषी है अथवा इसके कुछ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण भी हैं। सुना है पूर्व चुनाव आयुक्त टी एन शेषन आखरी समय तक सपत्नीक वृद्धाश्रम में ही रहे। उन्हें भूल जाने की बीमारी हो गई थी। कई मानवीय पहलू हैं इस समस्या के, जिनका हल अभी समाज को ढूंढना है।

न जाने क्यों, वृद्धाश्रम को एक सकारात्मक स्थान नहीं माना जाता। ऐसी मान्यता है कि वहां केवल प्रताड़ित माता पिता ही रहते हैं। औलाद ने या तो मकानों पर कब्जा कर लिया है अथवा सब कुछ अपने नाम कर खुद विदेश चले गए हैं और माता पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ गए हैं। जिनकी असहाय की कोई औलाद नहीं होती, ऐसे प्रौढ़ भी वृद्धाश्रम में देखे जा सकते हैं।

विधवाओं की स्थिति देखना हो तो कभी वृंदावन चले जाएं। उनके निमित्त कुछ दान दक्षिणा कर आएं, थोड़ा पुण्य थोड़ा आशीर्वाद कमाएं।।

अगर आदमी थोड़ा पढ़ा लिखा है, व्यावहारिक है। कुछ रिश्वत का पैसा बच्चों से बचा रखा है तो वृद्धाश्रम के बजाय वानप्रस्थ से एक सीढ़ी ऊपर डायरेक्ट सन्यास लेना अधिक समझदारी का काम है।

शहर से थोड़ा दूर कुछ जमीन हथियाकर एक कुटिया नहीं, कॉटेज बनवाएं। कुछ महात्माओं, महामण्डलेश्वरों के प्रवचन करवाएं। एक अच्छे यजमान बनें। अगर ईश्वर और महात्माओं की कृपा हुई, तो संन्यास पक्का। बस मान लिजिये, आपका पुनर्जन्म हुआ। इतना सम्मान, भेंट सम्मान और चढ़ावा, कि आप स्वयं कितनी ही गौ – शालाएं और वृद्धाश्रम संचालित कर अपना जीवन धन्य कर सकते हैं। अन्यथा अपनी पेंशन में संतुष्ट रहें, बाल बच्चों का खयाल रखें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 724 ⇒ कीड़े मकोड़े ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख  – “कीड़े मकोड़े।)

?अभी अभी # 724 ⇒ कीड़े मकोड़े ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

Worms & insects 

आप इन्हें कीड़े मकोड़े कहें, या कीट पतंग, रेंगने वाले, उड़ने वाले, जमीन के अंदर रहने वाले, ये जीव बेचारे इस सत्य से अनभिज्ञ हैं, कि ये नर्क का जीवन भोग रहे हैं। भोग में रस होता है और इनकी भी यह भोग योनि है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच पसरी माया का भेद, एकमात्र केवल मानव ही जान पाया है, क्योंकि उसमें भेद बुद्धि है।

प्राणी मात्र में ईश्वर का वास होते हुए भी, वह ईश्वर तत्व से कोसों दूर है। मनुष्य जन्म हमें कितनी भोग योनियों के बाद प्राप्त हुआ है, विज्ञान इस सत्य को आज तक नहीं जान पाया। डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत एक अलग कहानी कहता है तो हमारे विभिन्न धर्म ग्रंथ कुछ और। कोई मनु की संतान है तो कोई adam eve और आदम हौवा की। लेकिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और इसीलिए वह अपने आप को ईश्वर के अधिक करीब पाता है।।

सृष्टि के जन्म और प्रलय अथवा कयामत की भी कई गाथाएं हैं। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा जी को इस सृष्टि का जन्मदाता, भगवान विष्णु को पालनकर्ता और शिव को संहारकर्ता माना गया है। एक अज्ञात शक्ति है, उसे आप जितना चाहे नाम और स्वरूप दे सकते हैं। सब कुछ जानते हुए भी, इंसान के हाथ में कुछ नहीं है।

एक समझदार प्राणी होने के कारण आज इंसान विश्व की जनसंख्या को लेकर चिंतित और परेशान है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी वह इंसान को ही जिम्मेदार मानता है। सभ्यता की कीमत प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद करके ही चुकाई जा सकती है। मनुष्य को अभी और विकसित होना है, उसे मानव से महामानव और खुद से खुदा यानी इंसान से भगवान बनना है।।

वह आज भी अवतारवाद में विश्वास करता है। वो मसीहा आएगा, और हमें कल्कि अवतार की इतनी आस है कि हम हर महान इंसान में उसे ढूंढने लग जाते हैं। भक्तों के अनुसार तो कई कल्कि अवतार अभी भी इस धरा पर विचर रहे होंगे।

एक कीड़ा मकोड़ा बेचारा इन सबसे अनजान है। उसका तो जन्म ही कितने समय के लिए हुआ है, वह नहीं जानता। उसे कहीं भी कहीं भी, मक्खी और मच्छर की तरह मसल दिया जाता है। जीवः जीवस्य भोजनम्, कौन कब किसका आहार बन जाए, क्या पता।।

रेंगने वाले कीड़े अक्सर ज़मीन के अंदर ही रहते हैं, इधर दिन में बाहर आए और किसी का शिकार बने। बेचारे इसलिए रात में ही बाहर आते हैं। मक्खी मच्छर तो गंदगी में ही पनपते हैं, ईश्वर इन पर इतना मेहरबान है कि इनके जनसंख्या नियत्रण की चिंता तो इंसान भी नहीं कर पाता। ये थोक में पैदा होते हैं, और थोक में मुक्ति पाते हैं। ईश्वर जाने उनकी यात्रा कब शुरू हुई और कब तक चलेगी। कितने जन्म उन्हें और लेने पड़ेंगे, अभी इंसान बनने के लिए। क्या पता कभी बन पाएंगे भी या नहीं।

देवताओं को दुर्लभ यह मानव जन्म हमें तो मिल गया, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के बाद किसको मिलेगा, किसको नहीं मिलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इंसान एक समझदार प्राणी है, वह कीड़े मकोड़ों की तरह बच्चे पैदा करके नहीं छोड़ सकता। वह भी जानता है, बच्चे दो ही अच्छे।।

कीड़े मकोड़ों में किसी तरह के विकास की संभावना नहीं, फिर भी वे सृष्टि का एक आवश्यक अंग हैं, वे कभी प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करते, केवल मनुष्य मात्र ही ऐसा प्राणी है, जो उनका दोहन और शोषण करता है।

जिस दिन हम ईश्वर की अहैतुकी कृपा और इन कीट पतंगों और कीड़े मकोड़ों के अस्तित्व का कारण जान जाएंगे, शायद इस सृष्टि और ब्रह्मांड के रहस्य को भी पहचान पाएंगे। सुबह की इस अमृत वेला में एक कॉकरोच मुझे देखकर मुंह छुपा रहा है, और एक मैं हूं, जो उसे देख यह सोच रहा हूं, क्या इसमें भी परमेश्वर का वास है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ न्यूज़ का मोर्स कोड… – ☆ श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरणीय आलेख न्यूज़ का मोर्स कोड…।)

☆ आलेख – न्यूज़ का मोर्स कोड… – अजीत सिंह ☆

स्कूल, कॉलेज और यूपीएससी के मोर्स कोड कुछ हाथ लगे, तो हम न्यूज का मोर्स कोड सीखने आकाशवाणी की मॉनिटरिंग सर्विस में पहली नौकरी करने 15 जून 1971 को शिमला पहुंचे। पहले ही दिन हम इस बात को लेकर कुछ हैरान परेशान से हुए कि वहां समाचारों को स्टोरी कहा जा रहा था। स्टोरी तो कुत्ते, बिल्ली, बंदर, भालू, शेर आदि के काल्पनिक विवरण होते हैं, पंचतंत्र की तरह। लड़ते झगड़ते, बतियाते लोगों के विवरण कहानी कैसे हो सकते हैं!

कोई बुद्धु समझ मज़ाक न उड़ाए, इस डर से हमने पूछा भी नहीं। बस कबूल करते गए। आज 54 साल बाद आत्म मंथन से मुझे लगता है कि आदमी और जानवरों की कहानियों में कोई बड़ा फर्क नहीं है। और टीवी न्यूज चैनलों की प्राइम टाइम बहस को देख कर तो बिल्कुल नहीं लगता।

इन दिनों वॉट्सएप पर वायरल एक चुटकुला पढ़ा। पड़ोस का एक व्यक्ति एक लड़की से पूछता है, तुम क्या जॉब करती हो?

“जी मैं कुत्ते लड़वाने का काम करती हूं, लड़की ने कहा।

व्यक्ति ने पूछा, यह कैसी जॉब हुई, कुत्ते लड़वाने की जॉब?

लड़की ने कहा, जी मैं न्यूज चैनल की एंकर हूं।

यह न्यूज का मुद्दा है ही झगड़े का मुद्दा। सब शांत हो, हंसी खुशी का माहौल हो, तो कोई खबर नहीं होती। झगड़ा हो, गाली गलौज हो, मार पीट हो, तोड़ फोड़ हो, जितनी बड़ी हो, इतनी ही बड़ी न्यूज होती है।

न्यूज़ के चलन ने दादी नानी की कहानियां ख़तम कर दी हैं।

डर, सनसनी, जासूसी, ड्रग्स, सेक्स और क्या क्या मसाले डाले जाते हैं न्यूज बनाने के लिए,  इसे समझना ही न्यूज के मोर्स कोड को समझना है।

शुक्र है हम सब कुछ सीखने से बच गए। आकाशवाणी पर उन दिनों साफ सुथरे ढंग से सच्ची बात कहने का समय था।

आज भी बचा है, पर श्रोता दर्शक तो नीजि चैनल ले गए। सिग्नल की कवरेज तो 100% है, पर इसे पकड़ने वाले कितने हैं?

मास मीडिया लत डालता है, फिर आपकी जेब से पैसे निकालता है कि आपको पता भी नहीं लगता। और अब तो हमारे दिमाग की भी चोरी हो रही है।

बड़ा टेढ़ा मोर्स कोड है आजकल के सोशल मीडिया का। हर नागरिक को स्मार्टफोन से ज़्यादा स्मार्ट बनने की जरूरत है। यही कह रही थी पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ की प्रो अर्चना सिंह गत दिवस हमारे वेबिनार में।

बीते युग की बात कर रहा हूं, जब समाचार टेलीग्राम से भेजे जाते थे, मोर्स कोड की विधि से।

अपने मुंह मियां मिट्ठू होने का संभावित इल्ज़ाम अपने सिर लेते हुए मैं कहना चाहता हूं कि 70 के दशक में जब मैं  संवाददाता बना तो, सही या ग़लत, मुझे अक्सर ऐसा लगता था कि संवाददाता के रूप में मेरा पद आकाशवाणी में सबसे बढ़िया पद था। बड़े बड़े लोगों के संग बातचीत, देश विदेश की यात्राएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस और इंटरव्यू, डिनर व लंच, घर व दफ्तर में एस टी डी सुविधा के फोन और राष्ट्रीय समाचार  बुलेटिन में बाइलाइन। और तो और, दफ्तर में आने जाने की कोई समय बद्धता भी नहीं। स्टोरी फाइल की और निकल गए । प्रेस क्लब की ओर या फिर कहीं और गपशप और खाने पीने  के लिए।

इतना कुछ तो  था इस पद के साथ। और क्या चाहिए था! पर धीरे धीरे प्रैसनोट व प्रेस कॉन्फ्रेंस कुछ रूटीन और बोरिंग से लगने लगे। मुझे साहित्यिक गोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाना अच्छा लगता था। मेरी पत्रकारिता पर साहित्य का असर होना शुरू हो गया था। कुछ निखार दिखाई देता था। मैंने साहित्य की शैली  तो पकड़ी पर कल्पना का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी। वो कहते हैं न sometimes facts are stranger than fiction. मेरे सामने फील्ड में ऐसे ही तथ्य थे जो साहित्यिक कल्पना जैसे लगते थे। मैंने जो लिखा, वह कहानियां नहीं हैं, रिपोर्ट्स हैं।

साहित्यिक कार्यक्रमों में  पत्रकार नहीं होते थे। उन्हे वहां कोई न्यूज की संभावना नहीं लगती थी। पर शब्दों पर लेखकों और कवियों की जो पकड़ थी, वह पत्रकारिता में अक्सर नहीं होती थी। मुझे साहित्य में रस आने लगा। पत्रकारिता को जल्दी में लिखा साहित्य कहा जाता है पर साहित्य तो जल्दबाजी में लिखा ही नहीं जा सकता। साहित्य में ठहराव होता है। पत्रकारिता में होड़ लगी रहती है कौन किस से पहले खबर प्रसारित करा लेता है। बदहवास हो जाते हैं पत्रकार इस भाग दौड़ में। कुछ समाचारों को गड्डमगड्डा भी कर जाते हैं। कुछ पत्रकार समाचारों को बढ़ा चढ़ा कर भेजते हैं ताकि उनकी खबर छपे, कहीं समाचार एजेंसी बाज़ी न मार जाएं और उन पर अगले दिन संपादक की डांट पड़े। 

उन दिनों खबर  सबसे पहले आकाशवाणी से ही जाती थी। इसके लिए मुझे ज़्यादा अलर्ट रहना पड़ता था। धीरे धीरे समझ में आने लगा कि तथ्य इकट्ठे कर लेने मात्र से रिपोर्टिंग नहीं होती।

उसे 5 W और 1 H के पारम्परिक स्टाइल में लिखा जाए या वॉयसकास्ट के रूप में पर्सनल टच के साथ। न्यूज़ मैनेजमेंट भी ज़रूरी है। अर्ली मॉर्निंग, लेट मॉर्निंग, अर्ली मिड डे, लेट मिड डे , अर्ली इवनिंग लेट इवनिंग, 6 टाइमजोन  होते थे एक खबर के। वॉइस कास्ट, न्यूजरील, सामयिकी, स्पॉटलाइट, मॉर्निंग कमेंट्री , तब्सरा, कितनी ही संभावनाएं हर खबर में ढूंढ कर रखनी पड़ती थी।

खबर का इंट्रो या मुखड़ा लिखना आसान नहीं होता। इसके लिए पत्रकारों को मेंटल कांस्टिपेशन हो जाती है। लिखते हैं, काटते हैं, फिर लिखते हैं। मुखड़ा लिख लिया जाय तो फिर काम सीधा हो जाता है।

न्यूज़ का मोर्स कोड धीरे धीरे समझ में आता है।

रिपोर्टिंग सामयिक इतिहास लिखने की प्रक्रिया भी है। रिपोर्टर इतिहासिक घटनाओं का गवाह होता है।

संवाददाता के तौर पर मेरी कार्य स्थली जम्मू कश्मीर राज्य रहा।  13 वर्ष जम्मू में और करीबन साढ़े 6 साल श्रीनगर में।

कठिन परिस्थितियों में काम किया। ठीक ही हो गया कुल मिला कर।  ‘कारेस्पांडेंट ऑफ द  ईयर’ नाम से आकाशवाणी पुरस्कार भी मिला । एक ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट’ भी मिला।

दिल्ली में न्यूज सर्विसेज डिविजन का न्यूजरूम बड़ी अजीब जगह है। वहां आपकी सर्विस  सेनियोरिटी नहीं चलती। प्रोफेशनल योग्यता की सेनियोरिटी चलती है। बड़े सीनियर अधिकारी छोटे बुलेटिन कर रहे होते हैं और जूनियर अधिकारी एडिटर इन चार्ज बने होते हैं। बड़े धुरंधर किस्म के लोग हैं वहां। कोई स्टेनोग्राफर चिल्ला कर न्यूज एडिटर को कहता है, सर, पार्लियामेंट से पहले द नहीं लगता। अगर आपने क्यों कह दिया तो सुनने को मिल सकता है, अंग्रेज़ी में क्यों नहीं चलता सर।

डी जी हरीश अवस्थी की न्यूज मीटिंग में जाने से लोग डरते थे। पर आदमी कमाल का प्रोफेशनल था। पहली क्लास के बच्चों की तरह हम उनसे न्यूज के  गुर सीखते थे। किसी को तो भयंकर किस्म की डांट भी पड़ती थी। इस सब के बीच न्यूज़ का मोर्स कोड सरल होता गया।

नौकरी से रिटायर हुए तो क्या करें। प्रेस नोट, प्रेस कॉन्फ्रेंस बंद हो गए, अब कैसे और किसकी रिपोर्टिंग करें!

हमने अपने आपको चुनौती दी कि अब आम आदमी की रिपोर्टिंग करेंगे। आम आदमी वह जिसका नाम, काम, संघर्ष और उपलब्धि मीडिया के लिए अक्सर कोई खबर नहीं बनती।

वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब नाम से 8-10 साथियों के साथ मिलकर एक संस्था बनाई। हर सदस्य के विस्तृत आत्म परिचय का कार्यक्रम शुरू हुआ। मैंने रोचक न्यूज फीचर लिख कर स्थानीय समाचार पत्रों को भेजना शुरू किया। यह सिलसिला आज 18  साल बाद भी जारी है और संस्था के सदस्यों की संख्या 140 के करीब पहुंच गई है।

दिमाग में कुछ अजीब से ख्याल आते हैं। दिल को छूने वाली यादें उमड़ने लगती हैं।

लिखने पर मज़बूर कर देती हैं।

बेकस का मकान’,

‘ हरसिंहपुरा की पंजाबी बेटियां, क्यूं बार बार लेती हैं गांव का नाम’

‘छत्रपाल की याद में’,

‘श्रीनगर में सीआरपीएफ की लड़कियां’,

‘रेडियो अनाऊंसर का रेलवे स्टेशन’ ,

‘पूरे परिवार का जन्मदिन 15 अगस्त को ‘,

‘Jingoism, on the rise or on the wane?

‘पीली मंढोरी में जसिया को ढूढने आए थे पंडित जसराज ‘, ‘पितृपक्ष में पिता-स्मृति’

और

‘सुमित्रा ने कहा था…’ 

जैसे लेख बन जाते हैं।

अपने पिता और पत्नी पर लेख लिखना आसान भी है क्योंकि आपसे बेहतर उन्हे कौन जानता है। और मुश्किल भी कि अंतरंग बातों को पाठकों के लिए रुचिकर बना पाना आसान नहीं होता। निजता का सवाल भी है।

कई बार मुझे लगता है कि मानव सभ्यता के विकास में किसी कारण यह त्रुटि आ गई है कि हमें खून खराबा, लड़ाई झगडे, मृत्यु और विध्वंस में न्यूज नजर आती है जिसे हम अति उत्साहित हो प्रचारित करते हैं जबकि हंसते खेलते बच्चों, लहलहाते फूलों, उत्सव मनाते समुदायों में कोई न्यूज नजर नहीं आती। समाज में जैसी  सूचनाएं प्रचारित होगी, वैसा ही समाज बन जाएगा। आजकल हर व्यक्ति ऐसे बहस करता है जैसे टेलीविजन चैनलों पर होती है, उद्वेग और क्रोध से भरी हुई बातें।

गुड न्यूज जैसे गुम ही हो गई है। मैं गुड न्यूज ढूंढ़ता हूं। मेरा यह भी मानना है कि हर व्यक्ति के पास बड़ी कहानियां होती हैं। अगर ढंग से पूछा जाए तो वह बताने का इच्छुक भी है। मैं यही कोशिश करता हूं अपने सीमित सामर्थ्य के साथ।

और पिछले छह साल से मैं गुणीजनों के कई ग्रुपों से जुड़ा हूं जहां मुझे अति  प्रेम और  कुछ करने का उत्साह व प्रेरणा मिलती है।

न्यूज़ का मोर्स कोड शायद धीरे धीरे लेखन के मोर्स कोड की तरफ अग्रसर हो रहा है। मोर्स कोड वाला टेलीग्राम भेजने का सिस्टम अब बंद हो चुका है। नई तकनीक आ रही हैं। उन्हीं के अनुरूप लेखन शैली भी बदल रही हैं। अब फोन पर किसी भी लिपि में बोलकर लिखा और इसे भेजा जा सकता है। सुविधा के अनुरूप मेरी शैली भी बदल रही है। कुछ मित्र कहते हैं मेरा लेखन है तो पत्रकारिता पर इसकी शैली साहित्यिक लगती है।

मैं आपकी कहानियां सुनना चाहता हूं। अपनी कहानियां सुनाना चाहता हूं।

न्यूज़ का मोर्स कोड भी रोचक है, नीरस नहीं।

कठिन है, पर आनंददायक भी। मैंने इसे समझने की कोशिश भी की और इसे अपने अनुरूप ढालने की भी।

धन्यवाद मित्र विजय दीक्षित जी।

एक नई phrase देने के लिए, न्यूज का मोर्स कोड

☆ ☆ ☆ 

 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.01.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 725 ⇒ घंटियाँ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी आलेख – “घंटियाँ।)

?अभी अभी # 724 ⇒ घंटियाँ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घण्टा बड़ा होता है और घंटियाँ छोटी। 24 घंटे मिलकर एक दिन बनता है, जिसमें रात भी शामिल होती है। 60 मिनिट मिलकर एक घंटा बना सकते हैं लेकिन सभी घंटियाँ मिल-जुलकर एक घण्टा नहीं बना सकती। घण्टा, घण्टा है, घंटी घंटी।

घंटा-घर में कोई घंटा नहीं होता, एक घड़ी ज़रूर होती है, जो हर घंटे का अहसास दिलाती है,

टन टन की ध्वनि पैदा करती है। घड़ी भले ही खराब हो, घंटा घर को कोई फर्क नहीं पड़ता।।

घरों में पूजा-घर में घंटियाँ होती हैं, जो आरती के समय बजाई जाती है। बड़े बड़े मंदिरों में छोटे-बड़े घंटे-घंटियाँ बज उठती हैं, सुबह शाम, जब आरती का वक्त होता है।

आते-जाते, घंटों से छेड़छाड़ करना, छोटे बच्चों को गोद में लेकर घंटी बजाना बड़ा सुखद और मनोरंजक मंज़र होता है।

बचपन में अपने पाँवों पर खड़े होते ही पिताजी ने एक पहिये वाली साईकल दिलवा दी थी, जिसमें एक घंटी लगी हुई थी। घूमते पहिये के साथ-साथ घंटी की भी आवाज़ आती थी। दो पहिये की साईकल में अगर घंटी ना हो, तो चालान बन जाता था।

समय के साथ घंटी का स्थान हॉर्न ने ले लिया। कभी किसी घंटी वाले को निवेदन नहीं करना पड़ता था, कृपया घंटी बजाएँ।

जब कि भारी वाहनों के पीछे उसूलन लिखना पड़ता है, हॉर्न प्लीज।।

घर की डोअर बेल, दूध वाले की घंटी और गर्मी में कुल्फी-आइसक्रीम की घंटी पर सबका ध्यान रहता था। कितना भी पढ़ाकू छात्र क्यों न हो, छुट्टी की घंटी बरबस ध्यान आकर्षित कर ही लेती थी। गाँव में तो जानवरों के गले में भी घंटी बाँधने का रिवाज है। कहीं जंगल में चरने बहुत दूर न निकल जाए।

एक कहावत मेरे गले आज तक नहीं उतरी ! बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे ? ठीक है, बिल्ली शेर की मौसी है, लेकिन इतनी खूँखार भी नहीं। कभी कभी मेरी बिल्ली मुझसे भी म्याऊं कर लेती है, लेकिन मेरे लिए मेरी बिल्ली के गले में घंटी बाँधना कोई टेढ़ी खीर नहीं। लेकिन केवल किसी कहावत को गलत सिद्ध करने के लिए बिल्ली की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ गले में घंटी बाँधना मुझे मंजूर नहीं। चोरी-चुपके चूहे का शिकार करने वाली बिल्ली क्या घंटी बजाकर शिकार करेगी ! बिल्ली के गले में घंटी बाँधना, उसके पेट पर लात मारने जैसा है।।

बच्चों के पाँव में पैजनियाँ और किसी नृत्यांगना के पाँव में घुँघरू, घंटी का ही, लघुतम स्वरूप है। जो कानों में मधुर रस घोल दे, वह घंटी। किसी की फ़क़त याद से ही दिल में घंटियाँ बजनी शुरू हो जाएं, वह स्थिति सबसे श्रेयस्कर है। ऐसे भी अवसर आते हैं जीवन में, साहब घंटी बजाते रह जाते हैं, और चपरासी का कहीं पता नहीं रहता। और वह बाहर बैठा साहब को कोस रहा होता है, क्या घर में भी बीवी को घंटी बजाकर बुलाते हैं। अपने हाथ से एक ग्लास पानी तक नहीं पी सकते साहबज़ादे।

सभी आवाज़ों के ऊपर अन्तरात्मा की आवाज़ की तरह, अचानक टेलीफोन की घंटी मेरा ध्यान आकर्षित करती है।

जब तक ना उठाओ, घर को सर पर उठा लेती है। मैं फ़ोन उठाकर घंटी की ध्वनि को विराम दे देता हूँ।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 138 – देश-परदेश – राष्ट्रीय घड़ी दिवस: 19 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 138 ☆ देश-परदेश – राष्ट्रीय घड़ी दिवस: 19 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

घड़ी के उपयोग द्वारा, समय के सदुपयोग के लिए घड़ी का प्रचार प्रसार करने के लिए आज 19 जून को राष्ट्रीय घड़ी दिवस के रूप में चयन किया गया होगा।

सन 1950 तक तो लोग समय देखने के लिए घंटाघर जाते थे। ये सुविधा तो मात्र कुछ शहरों में हुआ करती थी। रेडियो भी समय की जानकारी प्राप्त करने का एक मुख्य स्रोत हुआ करता था। साठ का दशक आते आते घरों में घड़ी नामक यंत्र पैर पसारने लगा था। अमीरों के यहां पेंडुलम वाली घड़ी होती थी। एच एम टी ने लोगों को कलाई में घड़ी बांधना सिखाया था। चाबी से चलने वाली अलार्म घड़ी ने हमारे अनेकों सपनों को अधूरा रखने का कार्य बखूबी निभाया था।

हर कमरे में घड़ी, हर कलाई घड़ी, हर हाथ के मोबाइल में घड़ी पहुंच चुकी है। इस के बावजूद समय नहीं है, समय देखने का, हम अधिकतर सब जगह देरी से ही पहुंचते हैं।

क्या फ़ायदा ऐसी घड़ियों का जो समय का अनुशासन सिखाने में असफल रही हो। हवाई जहाज से यात्रा करने वाले औसतन 5% यात्री अपनी यात्रा नहीं कर पाते हैं। ट्रेन और बस के हालात इस से भी गए बीते हैं।

देरी से गंतव्य पर पहुंचने का ठीकरा अब ट्रैफिक जाम के माथे मढ़ना पुराना बहाना माना जाता है। स्वयं की अपनी इस लेट लतीफी की आदत को “राष्ट्रीय समय सूचक” ( I S D) तक कहने में हम सब अग्रणी रहते हैं।

ईश्वर ने पूरे विश्व में 24 घंटे का समय सब को दिया है। लोग फिर भी कह देते है, मरने का भी टाइम नहीं है। घड़ी के नाम से अब स्मार्ट वॉच भी आ गई है, लेकिन समय की पाबंदी को ना मानने वाले, जीवन में कभी भी स्मार्ट नहीं बन सकते हैं।

आप सबने भी इस फालतू का लेख पढ़ने में बहुत समय व्यर्थ कर दिया है, क्योंकि तय समय पर कार्य करने की खराब आदत अब क्या ठीक होगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 723 ⇒ एक भारतीय आत्मा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक भारतीय आत्मा।)

?अभी अभी # 723 ⇒ एक भारतीय आत्मा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिक्र होता है जब एक भारतीय आत्मा का, दद्दा माखनलाल चतुर्वेदी की बात होती है। दद्दा का जन्म 1889 ईसवी में होशंगाबाद जिले के बाबई ग्राम में हुआ था। वैसे हमारा पैतृक निवास भी बाबई और सेमरी हरचंद ही है। हमारे बाप दादा भी वहीं पैदा हुए। देखिए, हमारी आत्मा भी कितनी भारतीय है। वैसे देखा जाए तो आज देश की सभी १४० करोड़ आत्माएं भी भारतीय ही हैं। भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, की तर्ज पर अगर आत्मा से पूछा जाए कि आत्मा रे आत्मा तेरा स्वरूप कैसा, तो शायद वह भी यही कहे, जिस जीव में विद्यमान, उस जैसा। आत्मा के बारे में गीता से अधिक ज्ञान कहां से मिल सकता है। बात सीधी नैनं छिन्दंति शस्त्राणि, नैनं दहति पावक: तक पहुंच जाती है। संक्षेप में हमारे जन्म के साथ ही आत्मा का प्राण के साथ हमारे शरीर में प्रवेश हो जाता है और जब प्राण पखेरू उड़ जाते हैं तो आत्मा भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। ।

लेकिन जब तक यह आत्मा हमारे शरीर में रहती है, इसे मन के अधीन रहना होता है और सारे सांसारिक प्रपंचों का साक्षी बनना पड़ता है। अगर हमारी आत्मा भारतीय है तो दुनिया के हर देशवासी की आत्मा भी उसी देश की वासी होगी। यथा An American Soul, A British Soul अथवा A Chinese Soul. एक देशसेवक फौजी जब अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाता है तो उसका शरीर और आत्मा एकरूप हो जाते हैं। आत्मा की तरह वह भी अमर हो जाता है।

जो अपने वतन अथवा मानवता के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं, उनकी आत्मा उनसे अलग नहीं होती और वे जन्म मरण के बंधन से सदा सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

यह तो स्पष्ट है कि हमारे शरीर में कहीं न कहीं आत्मा है जरूर और उसी आत्मा में परमात्मा का भी वास है। उंगली में अंगूठी, अंगूठी में नगीना ! लेकिन काम, क्रोध, लोभ और मोह का आवरण हमें शुद्ध आत्मा तक नहीं पहुंचने देता। हम तो कम परेशान हैं, बेचारी आत्मा बहुत दुखी और परेशान है। सब गीता ज्ञान धरा रह जाता है, जब हमारी आत्मा दुखी सुखी होती है। हम कलेजे को ही आत्मा समझ बैठते हैं।

किसी आत्मा को अच्छी आत्मा और किसी आत्मा को दुष्टात्मा समझ बैठते हैं। ।

हमारी आत्मा कब कर्ता बनकर दुआ और बद्दुआ देने लगती है, हमें पता ही नहीं चलता। तुमने हमारी आत्मा को कष्ट पहुंचाया, ईश्वर तुम्हें देख लेगा। जब हमसे कुछ नहीं बन पड़ा, तो ईश्वर की धौंस दे दी। वाह रे मानुस की जात ?

जात पात तो हमसे छूटती नहीं, बड़े आत्मा परमात्मा की बात करते हैं। बात एक भारतीय आत्मा से शुरू हुई थी, ज्यादा दूर तलक नहीं गई। आत्मा का अपना दायरा है। आत्मा को भारतीय ही रहने दें चलेगा। देखा जाए तो बस वही परम सत्य और सनातन है। कम से कम इसे तो धर्म और राजनीति से दूर रखें। बड़ी मुश्किल होगी, अगर आत्मा भी कांग्रेस बीजेपी अथवा हिंदू मुसलमान हो गई। ।

कबीर बार बार जिस चादर की बात करते हैं और हमारे साहिर साहब जिस चुनरी के दाग के लिए फिक्रमंद हैं, क्या यह वही आत्मा तो नहीं। ओढ़ने की चुनरी हो या चादर, बात तो एक ही है।

आत्मा का क्या है, वह तो नित्य, शुद्ध और मुक्त है। वह तो काया का पिंजरा छोड़ परमात्मा में विलीन हो जाएगी और चित्रगुप्त अपने बही खाते खोलकर बैठे होंगे और घर में गरुड़ पुराण का पाठ चल रहा होगा। करते रहो दान पुण्य मृतात्मा की शांति और मुक्ति के लिए। लागा चुनरी में दाग, छुपा लो, छुपा सको तो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 295 – हर काल, हर हाल ! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 295 हर काल, हर हाल !… ?

संध्या समय प्राय: बालकनी में मालाजप या ध्यान के लिये बैठता हूँ। देखता हूँ कि एक बड़ी-सी छिपकली दीवार से चिपकी है। संभवत: उसे मनुष्य में काल दिखता है। मुझे देखते ही भाग खड़ी होती है। वह भागकर बालकनी के कोने में दीवार से टिकाकर रखी इस्त्री करने की पुरानी फोल्डिंग टेबल के पीछे छिप जाती है।

बालकनी यूँ तो घर में प्रकाश और हवा के लिए आरक्षित क्षेत्र है पर अधिकांश परिवारों की बालकनी का एक कोना पुराने सामान के लिये शनै:-शनै: आरक्षित हो जाता है। इसी कोने में रखी टेबल के पीछे छिपकर छिपकली को लगता होगा कि वह काल को मात दे आई है। काल अब उसे देख नहीं सकता।

यही भूल मनुष्य भी करता है। धन, मद, पद के पर्दे की ओट में स्वयं को सुरक्षित समझने की भूल। अपने कथित सुरक्षा क्षेत्र में काल को चकमा देकर जीने की भूल। काल की निगाहों में वह उतनी ही धूल झोंक सकता है जितना टेबल के पीछे छुपी छिपकली।

एक प्रसिद्ध मूर्तिकार अनन्य मूर्तियाँ बनाता था। ऐसी सजीव कि जिस किसीकी मूर्ति बनाये, वह भी मूर्ति के साथ खड़ा हो जाय तो मूल और मूर्ति में अंतर करना कठिन हो। समय के साथ मूर्तिकार वृद्ध हो चला। ढलती साँसों ने काल को चकमा देने की युक्ति की। मूर्तिकार ने स्वयं की दर्जनों मूर्तियाँ गढ़ डाली। काल की आहट हुई कि स्वयं भी मूर्तियों के बीच खड़ा हो गया। मूल और मूर्ति के मिलाप से काल सचमुच चकरा गया। असली मूर्तिकार कौनसा है, यह जानना कठिन हो चला। अब युक्ति की बारी काल की थी। ऊँचे स्वर में कहा, ‘अद्भुत कलाकार है। ऐसी कलाकारी तो तीन लोक में देखने को नहीं मिलती। ऐसे प्रतिभाशाली कलाकार ने इतनी बड़ी भूल कैसे कर दी?” मूर्तिकार ने तुरंत बाहर निकल कर पूछा,” कौनसी भूल?”  काल हँसकर बोला,” स्वयं को कालजयी समझने की भूल।”

दाना चुगने से पहले चिड़िया अनेक बार चारों ओर देखती है कि किसी शिकारी की देह में काल तो नहीं आ धमका? …चिड़िया को भी काल का भान है, केवल मनुष्य बेभान है। सच तो यह है कि काल का कठफोड़वा तने में चोंच मारकर भीतर छिपे  कीटक का शिकार भी कर लेता है। अनेक प्राणी माटी खोदकर अंदर बसे कीड़े-मकोड़ों का भक्ष्ण कर लेते हैं। काल, हर काल में था, काल हर काल में है। काल हर हाल में रहा, काल हर हाल रहेगा।  काल से ही कालचक्र है,  काल ही कालातीत है। उससे बचा या भागा नहीं जा सकता।

थोड़े लिखे को अधिक बाँचना, बहुत अधिक गुनना।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 722 ⇒ पर्दा फिल्मी और फेसबुकी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # 722 ⇒ आलेख – पर्दा फिल्मी और फेसबुकी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवन केवल सच्चाई और वास्तविकता से नहीं जीया जाता ! सपने सच नहीं होते, फिर भी सपने सुहाने लगते हैं। जीवन का सफर कभी सुहाना होता है, तो कभी काँटों भरा। मन को बहलाना ही मनोरंजन है। दुःख को कुछ समय के लिए भुलाना ही क्षणिक निवृत्ति है।

संगीत, कला और साहित्य जीवन को एक दिशा देते हैं, रोजमर्रा की उबाऊ दिनचर्या को रोचक और आकर्षक बना देते हैं। दुनिया फिल्मी हो, साहित्यिक हो, या फिर संगीतमय, जीवन में रस की सृष्टि करते हैं। साहित्य और संगीत अगर खास विधा है तो फ़िल्म एक आम विधा।।

संगीत अगर कानों में रस घोलता है तो दृश्य मन को आनंदित और आंदोलित करते हैं। आलमआरा और जहाँआरा जैसी फिल्मों से शुरू हुआ यह फिल्मी सफर आज उस मुकाम पर आ गया है, जहाँ सिनेमाहॉल का बड़ा पर्दा पहले टीवी का छोटा पर्दा हुआ और अब एंड्रॉयड के जरिये हमारी हथेली में कैद हो गया।

याद कीजिए सहगल, पृथ्वीराज कपूर, महिपाल, दिलीप, देव और राजकपूर की फिल्मों का दौर ! सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़। नर्गिस, मीनाकुमारी, साधना और सायराबानो की फिल्मों के पोस्टर्स। बिनाका गीत माला की धूम। हर पान वाले की दुकान पर बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं, जैसे गानों पर झूमते श्रोतागण। अभिनय सम्राट, संगीत सम्राट और हास्य सम्राट का त्रिवेणी संगम।।

समय का पंछी उड़ता जाए !

संचार क्रांति ने हरित क्रांति को पीछे छोड़ दिया। आज सिनेमाघर गिनती के हैं। जितने पहले शहर में सिनेमाघर थे, उससे अधिक आज मॉल हैं। दो आने की मूँगफली से पूरी ढाई घंटे की फ़िल्म देख ली जाती थी। आज 200 ₹ का पॉप कॉर्न कॉम्बो वह स्वाद नहीं देता।

आज मेरे हाथ में कोई बुक नहीं, फेसबुक है। बस इसे खोलने की देर है। एक झाड़ पर बैठे बंदरों से अधिक app मेरी उंगलियों तले दबे बैठे हैं। टीवी की पिक्चर ट्यूब की अब मुझे चिंता नहीं, एक टीवी दीवार से चिपका है तो एक मेरी आँखों से। यू ट्यूब में मैं जब चाहे सङ्गीत की महफ़िल सजा सकता हूँ। 24 x 7 मेरे सामने एक बोन्साई रजतपट है, सभी अभिनेताअभिनेत्रियों की फिल्में खुल जा सिम सिम की तरह केवल एक क्लिक की मोहताज है।।

फिल्मी पर्दे से फेसबुक के पर्दे तक का मेरा यह सफर बड़ा रोचक है। जो काम सन् 70 के दशक में संगीत, फिल्में और किताबें करती थी, वे सब आजकल केवल फेसबुक अकेली कर रही हैं। पहले किताबें बोलती नहीं थीं, आजकल लेखक से आपका जीवंत परिचय और संवाद होता है। रचना प्रक्रिया पर घर बैठे बहस होती है। सभी पुरानी फिल्में और क्लासिकल संगीत यू ट्यूब में उपलब्ध हो चुका है।

बस केवल एक पर्दे की जरूरत है, और वह है आँखों का पर्दा।

फेसबुक ओपन हुई और पर्दा खुला। किसी ने शायद इसी स्थिति को भाँपकर आज से कई वर्ष पहले इस गीत की रचना की होगी ;

पर्दा उठे सलाम हो जाए

बात बन जाये, काम हो जाए

फेसबुक का पर्दा उठ चुका है, आपसे सुबह का सलाम हो ही जाए ! सुप्रभात …

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #282 ☆ ग़लत सोच : दु:खों का कारण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ग़लत सोच : दु:खों का कारण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 282 ☆

☆ ग़लत सोच : दु:खों का कारण… ☆

ग़लत सोच के लोगों से अच्छे व शुभ की अपेक्षा-आशा करना हमारे आधे दु:खों का कारण है, यह सार्वभौमिक सत्य है। ख़ुद को ग़लत स्वीकारना सही आदमी के लक्षण हैं, अन्यथा सृष्टि का हर प्राणी स्वयं को सबसे अधिक बुद्धिमान समझता है। उसकी दृष्टि में सब मूर्ख हैं; विद्वत्ता में निकृष्ट हैं; हीन हैं और सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम हैं। ऐसा व्यक्ति अहंनिष्ठ व निपट स्वार्थी होता है। उसकी सोच नकारात्मक होती है और वह अपने परिवार से इतर कुछ नहीं सोचता, क्योंकि उसकी मनोवृत्ति संकुचित व सोच का दायरा छोटा होता है। उसकी दशा सावन के अंधे की भांति होती है, जिसे हर स्थान पर हरा ही हरा दिखाई देता है।

वास्तव में अपनी ग़लती को स्वीकारना दुनिया सबसे कठिन कार्य है तथा अहंवादी लोगों के लिए असंभव, क्योंकि दोषारोपण करना मानव का स्वभाव है। वह हर अपराध के लिए दूसरों को दोषी ठहराता है, क्योंकि वह स्वयं को ख़ुदा से कम नहीं समझता। सो! वह ग़लती कर ही कैसे सकता है? ग़लती तो नासमझ लोग करते हैं। परंतु मेरे विचार से तो यह आत्म-विकास की सीढ़ी है और ऐसा व्यक्ति अपने मनचाहे लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। उसके रास्ते की बाधाएं स्वयं अपनी राह बदल लेती हैं और अवरोधक का कार्य नहीं करती, क्योंकि वह बनी-बनाई लीक पर चलने में विश्वास नहीं करता, बल्कि नवीन राहों का निर्माण करता है। अपनी ग़लती स्वीकारने के कारण सब उसके मुरीद बन जाते हैं और उसका अनुसरण करना प्रारंभ कर देते हैं।

ग़लत सोच के लोग किसी का हित कर सकते हैं तथा किसी के बारे में अच्छा सोच सकते हैं; सर्वथा ग़लत है। सो! ऐसे लोगों से शुभ की आशा करना स्वयं को दु:खों के सागर के अथाह जल में डुबोने के समान है, क्योंकि जब उसकी राह ही ठीक नहीं होगी; वे मंज़िल को कैसे प्राप्त कर सकेंगे? हमें मंज़िल तक पहुंचने के लिए सीधे-सपाट रास्ते को अपनाना होगा; कांटों भरी राह पर चलने से हमें बीच राह से लौटना पड़ेगा। उस स्थिति में हम हैरान-परेशान होकर निराशा का दामन थाम लेंगे और अपने भाग्य को कोसने लगेंगे। यह तो राह के कांटों को हटाने लिए पूरे क्षेत्र में रेड कारपेट बिछाने जैसा विकल्प होगा, जो असंभव है। यदि हम ग़लत लोगों की संगति करते हैं, तो उससे शुभ की प्राप्ति कैसे होगी ? वे तो हमें अपने साथ बुरी संगति में धकेल देंगे और हम लाख चाहने पर भी वहां से लौट नहीं पाएंगे। इंसान अपनी संगति से पहचाना जाता है। सो! हमें अच्छे लोगों के साथ रहना चाहिए, क्योंकि बुरे लोगों के साथ रहने से लोग हमसे भी कन्नी काटने लगते हैं तथा हमारी निंदा करने का एक भी अवसर नहीं चूकते। ग़लती छोटी हो या बड़ी; हमें उपहास का पात्र बनाती है। यदि छोटी-छोटी ग़लतियां बड़ी समस्याओं के रूप में हमारे पथ में अवरोधक बन जाएं, तो उनका समाधान कर लेना चाहिए। जैसे एक कांटा चुभने पर मानव को बहुत कष्ट होता है और एक चींटी विशालकाय हाथी को अनियंत्रित कर देती है, उसी प्रकार हमें छोटी-छोटी ग़लतियों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इंसान छोटे-छोटे पत्थरों से फिसलता है; पर्वतों से नहीं।

‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ अक्सर यह संदेश हमें वाहनों पर लिखित दिखाई पड़ता है, जो हमें सतर्क व सावधान रहने की सीख देता है, क्योंकि हमारी एक छोटी-सी ग़लती प्राण-घातक सिद्ध हो सकती है। सो! हमें संबंधों की अहमियत समझनी चाहिए चाहिए, क्योंकि रिश्ते अनमोल होते हैं तथा प्राणदायिनी शक्ति से भरपूर  होते हैं। वास्तव में रिश्ते कांच की भांति नाज़ुक होते हैं और भुने हुए पापड़ की भांति पल भर में दरक़ जाते हैं। मानव के लिए अपेक्षा व उपेक्षा दोनों स्थितियां अत्यंत घातक हैं, जो संबंधों को लील जाती हैं। यदि आप किसी उम्मीद रखते हैं और वह आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो संबंधों में दरारें पड़ जाती हैं; हृदय में गांठ पड़ जाती है, जिसे रहीम जी का यह दोहा बख़ूबी प्रकट करता है। ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय/ टूटे से फिर ना जुरै, जुरै तो गांठ परि जाए।’ सो! रिश्तों को सावधानी-पूर्वक संजो कर व सहेज कर रखने में सबका हित है। दूसरी ओर किसी के प्रति उपेक्षा भाव उसके अहं को ललकारता है और वह प्राणी प्रतिशोध लेने व उसे नीचा दिखाने का हर संभव प्रयास करता है। यहीं से प्रारंभ होता है द्वंद्व युद्ध, जो संघर्ष का जन्मदाता है। अहं अर्थात् सर्वश्रेष्ठता का भाव मानव को विनाश के कग़ार पर पहुंचा देता है। इसलिए हमें सबको यथायोग्य सम्मान ध्यान देना चाहिए। यदि हम किसी बच्चे को प्यार से आप कह कर बात करते हैं, तो वह भी उसी भाषा में प्रत्युत्तर देगा, अन्यथा वह अपनी प्रतिक्रिया तुरंत ज़ाहिर कर देगा। यह सब प्राणी-जगत् में भी घटित होता है। वैसे तो संपूर्ण विश्व में प्रेम का पसारा है और आप संसार में जो भी किसी को देते हो; वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिए अच्छा बोलो; अच्छा सुनने को मिलेगा। सो! असामान्य परिस्थितियों में ग़लत बातों को देख कर आंख मूंदना हितकर है, क्योंकि मौन रहने व तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त न करने से सभी समस्याओं का समाधान स्वतः निकल आता है।

संसार मिथ्या है और माया के कारण हमें सत्य भासता है। जीवन में सफल होने का यही मापदंड है। यदि आप बापू के तीन बंदरों की भांति व्यवहार करते हैं, तो आप स्टेपनी की भांति हर स्थान व हर परिस्थिति में स्वयं को उचित व ठीक पाते हैं और उस वातावरण में स्वयं को ढाल सकते हैं। इसलिए कहा भी गया है कि ‘अपना व्यवहार पानी जैसा रखो, जो हर जगह, हर स्थिति में अपना स्थान बना लेता है। इसी प्रकार मानव भी अपना आपा खोकर घर -परिवार व समाज में सम्मान-पूर्वक अपना जीवन बसर कर सकता है। इसलिए हमें ग़लत लोगों का साथ कभी नहीं देना चाहिए, क्योंकि ग़लत व्यक्ति न तो अपनी ग़लती से स्वीकारता है; न ही अपनी अंतरात्मा में झांकता है और न ही उसके गुण-दोषों का मूल्यांकन करता है। इसलिए उससे सद्-व्यवहार की अपेक्षा मूर्खता है और समस्त दु:खों कारण है। सो! आत्मावलोकन कर अंतर्मन की वृत्तियों पर ध्यान दीजिए तथा अपने दोषों अथवा पंच-विकारों व नकारात्मक भावों पर अंकुश लगाइए तथा समूल नष्ट करने का प्रयास कीजिए। यही जीवन की सार्थकता व अमूल्य संदेश है, अन्यथा ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए’ वाली स्थिति हो जाएगी और हम सोचने पर विवश हो जाएंगे… ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ का सिद्धांत सर्वोपरि है, सर्वोत्तम है। संसार में जो अच्छा है, उसे सहेजने का प्रयास कीजिए और जो ग़लत है, उसे कोटि शत्रुओं-सम त्याग दीजिए…इसी में सबका मंगल है और यही सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 249 ☆ नियमितता की ताकत… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना नियमितता की ताकत। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 249 ☆ नियमितता की ताकत…

व्यक्ति अपने भविष्य का स्वयं निर्माता होता है। अक्सर देखने में आता है कि कोई बहुत मेहनती है, किंतु अपने जिद्दी स्वभाव के चलते सबके साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता और पास आयी हुयी सफलता को ठोकर मारकर चल देता है।

समाज में जहाँ भिन्न- भिन्न विचारधारा के लोग रहते हैं, वहाँ सबके अनुसार तो बदलाव नहीं किया जा सकता पर कहीं न कहीं सूझ -बूझ की अपेक्षा तो इंसान एक दूसरे से कर ही सकता है। बदलाव को स्वीकार करो, इससे भले ही कंफर्ट जोन छिन जाए पर तरक्की पास आने लगेगी। दिखावे के चलते बिना सोचे विचार पैसे खर्च करना, छोटी- छोटी बातों में मुँह फुलाना, स्वामित्व की भावना को बलवती करना, बात न मानने पर चीखना-चिल्लाना, बैल की तरह बिना विचारे तोड़- फोड़ करना, आलस्य के चलते कार्य में सुस्ती, मानसिक व शारीरिक शिथिलता ये सब उदासी को जन्म देते हैं।

अवसर क्रमिक गति से आते -जाते रहते हैं, बस धैर्य के साथ सत्य की राह पकड़ कर नियमित रूप से चलते रहें।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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