हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३३ – लघुकथा – निक्षय मित्र एवं क्षय मुक्त ग्राम पंचायत (क्षय मुक्त भारत की संकल्पना) ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३३ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ निक्षय मित्र एवं क्षय मुक्त ग्राम पंचायत (क्षय मुक्त भारत की संकल्पना) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज सुबह-सुबह सेतु पटमंगरा के ग्राम प्रधान श्री दिनेश लाल के घर पहुंच गया था।

कहो सेतु कैसे आना हुआ ?

अरे प्रधान जी.. आपसे एक बात करनी थी। … सेतु ने कहा।

क्या है, ? बताओ क्या कहना चाहते हैं ? प्रधान जी ने पूछा।

प्रधान जी… आप तो जानत हैं कि टीबी एक संक्रामक बीमारी है। इससे मुक्ति का बड़ा अभियान चला है।

अरे सेतु..हमने तो सुना है कि यह दवाई से बिल्कुल ठीक हो जाती है… इसके अलावा भी कोई दुसरा उपाय है क्या, ? दिनेश लाल प्रधान ने पूछा।

प्रधान जी… यह बीमारी ठीक तो होगी इलाज से ही लेकिन एक बात आप पहले बताइये कि ये बीमारी किसको पहले होती है? सेतु ने पूछा।

प्रधान जी ने अपना दिमाग दिमाग दूर तक दौडाया। उन्हें अपने गांव के टीबी रोगी मंगरु, बसंती, ननकू की याद आई।

सेतु अभी भी प्रधान जी के घर पर ही बैठा था।

किस सोच में डूब गये प्रधान जी ?

सेतु..बाबू तू ऐसा सवाल हमारे सामने रख दिए हो कि हमारे दिमाग़ में बहुत बड़ा टेंशन पैदा हो गया है।

हम सोचत है किये टीबी की बीमारी, कुलेश्वर भैया, रघुनंदन काका, और दूधनाथ मास्टर के घर के लोगो को क्यों नहीं होता है। आखिर ये बीमारी मंगरु, बसंती, ननकू जैसे लोगो के घर में क्यों आता है?

सेतु ने प्रधान जी के मन की बात समझ ली थी। अब सही वक्त आ गया था जब सेतु को हथौड़े की चोट गरम लोहे पर करना था।

क्षय मुक्त भारत अभियान से भी वह जुड़ चुका था। टीबी के विषय में एक-एक जानकारी उसके दिमाग में रटी पड़ी थी।

क्षय उन्मूलक अभियान के हर -एक हिस्से का वह साथी बन चुका था।

अब सेतु ने जो बात दिनेश लाल प्रधान से कहीं वह बात प्रधान के दिमाग में जम गई।

प्रधान जी.. पहली बात की है बीमारी किसी को भी हो सकती है। चाहे वह किसी भी तरह का व्यक्ति हो अमीर हो या गरीब हो। बीमारी ऐसी है कि जहां भी खान-पान में कमी होती है, जहां पौष्टिक आहार नहीं मिलता है, ऐसे लोगों में रोग से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और उसे टीबी की बीमारी पकड़ने का भय पहले होता है।

अरे सेतु.. सही बताएं हो, यही कारण है कि पश्चिम टोला के मंगरु बसंती ननकू को टीबी की बीमारी पकड़ी है।

इन तीनों जने की आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक नही है।

काम धाम की कमी, ऊपर से बीमारी। और बीमारी में कोई काम धाम कैसे कर सकता है। इन सारी समस्यायों के जड़ में खान पान की कमी भी एक है। ऐसे बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनको कई अन्य जटिल बीमारियां है, जैसे शुगर, बीपी, कैंसर, एच आई वी आदि उनके भीतर भी रोग लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। उनके भी भीतर भी रोग से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है, और टीबी की बीमारी हो जाती है।

सेतु यह बताते बताते रुक गया। और दुबारा कुछ बात ऐसा बोला कि वहां बैठे कई लोग उसे घूर के देखने लगे।

सेतु ने कहा प्रधान जी, जो लोग नसे का सेवन करते है, बीड़ी, गांजा, शराब आदि नसे की चीज खाते पीते हैं ऐसे लोगों में भी टीबी की बीमारी होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

अरे प्रधान जी… आप गांव के मुखिया हौ। आपका एक नई बात बताना चाहता हूँ.. सुनिए .सेतु ने कहा।

अब सेतु ने दिनेश लाल प्रधान से विस्तार में बताना शुरू किया।

सरकार ने एक अभियान छेड़ रखा है। जिसको क्षय मुक्त भारत अभियान कहते हैं। इसमें जांच इलाज के अलावा हर एक क्षय रोगी को इलाज के दौरान ₹1000 की सहायता राशि मिलती है।

अरे सेतु यह तो ₹500 मिलता था कब से यह ₹1000 हो गया। … दिनेश लाल प्रधान ने पूछा।

आप का जान पाएंगे …प्रधान जी ! नन्हकऊ से पूछिएगा न। सेतु ने बड़े ही दम के साथ कहा।

अच्छा तो सरकार ने 500 से ₹1000 कर दिया। बहुत बड़ी बात है भाई..यह तो बहुत बड़ी बात है। दिनेश लाल प्रधान के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि और सरकार के प्रति कृतज्ञता का भाव झलक रहा था।

सेतु अपनी बात को यहीं समाप्त करने वाला नहीं था। उसे तो अभी बहुत कुछ और बताना था।

प्रधान जी.. इतनी ही बात नहीं है। जिसके घर में टीबी के मरीज है उनके संपर्क में रहने वालों को एक्स रे जांच के बाद टीपीटी भी दवाई दी जा रही है, ताकि टीबी की बीमारी उनके घर वालों में न जाए।

अब आपको, आपके काम की बात बताना चाहता हूँ..प्रधान जी ! सेतु ने कहा। ।

जो लोग टीबी के रोगियों को गोद लेंगे और उनको इलाज तक खाने के लिए पौष्टिक आहार की टोकरी देंगे। उनको सरकार सम्मानित करेंगी।

प्रधान भैया !! जिसके पास पैसा रूपया है। धन दौलत भरा पड़ा है। साथ ही साथ गरीब मजबूर लोगों को कुछ करने की इच्छा रखते है। ऐसे लोगों को आगे बढ़कर हमारे गरीब टीबी रोगियों को गोद लेना चाहिए

गोद लेने का का मतलब हुआ.. सेतु?… प्रधान जी ने पूछा

अरे प्रधान जी ! दुनिया भर को आप बताते हैं और आप ये बात पूछ रहे हैं?

गोद लेने का मतलब हुआ कि उस मरीज को प्रति माह पौष्टिक आहार की किट ( टोकरी ) देना और तब तक देना जब तक की उसका इलाज पूरा न हो जाए।

जानते हैं प्रधान जी जब टीबी रोगी को पौष्टिक आहर की किट मिलेगी तो, रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ जायेगी और उसका रोग जल्दी से भागेगा।

सेतु ने एक नई बात बात प्रधान जी को बता दी।

अरे सेतु..तो हमारे गांव के जो तीन रोगी मगरु, नन्हकउ और बसंती रहे, उनको भी किसी ने पौष्टिक किट दिया था क्या, ?

सेतु जोर से हंस पड़ा…

अरे प्रधान जी.. आप को पता नहीं है क्या . इन लोगों को भी किट दिया गया है।

देवनाथ सिंह मास्टर साहब, .. जो मिडिल स्कूल के हेडमास्टर जी है, उन्होंने इन तीनों को गोद लिया था। पूरे इलाज तक वे बसंती और मंगरु को पौष्टिक पोषण किट देते रहे हैं अब तक भी ननकू को देरहे थे।

दिनेश लाल प्रधान, कुछ देर के लिए मन ही मन सोचते रहे …

भाई.. ई सेतु भी गजब का इंसान है ..

खुद का खुद टीबी से बीमार रहा। इसकी बहुरिया सुघरी टीबी के मरीज थी, फिर भी उससे शादी किया।

ठीक होने के बाद लगा पड़ा है, टीबी रोगी की सेवा में। यह हमरे गांव के मणि है। किसी देवदूत से कम नही है। जो काम हम लोगो को करना चाहिए, यह वह सब कर रहा है।

हम इसके लिए जरूर कुछ ना कुछ जरूर करेंगे … दिनेश लाल प्रधान ने मन ही मन ठान लिया।

उन्होंने अपने गांव के ही नहीं, बल्कि अपने आस पास के गांव के भी गरीब मरीज को गोद लेने का मन बना लिया। सेतु के कहने पर उन्होंने दूसरे गांव के करीब 35 क्षय रोगियों को गोद ले लिया था।

समय बीतते देर नहीं लगी। गांव के तीनों रोगी ठीक हो चुके थे। मंगरु और बसंती तो पहले ही ठीक हो गए।

नन्हकू की रिपोर्ट लेकर आज सेतु आया था। रिपोर्ट के साथ ही प्रधान जी के घर पहुंचा था। प्रधान जी के दरवाजे पहुंचते ही बोला… प्रधान जी ! आज आपको मिठाई खिलाना पड़ेगा।

किस बात की मिठाई.. सेतु ? प्रधान जी ने पूछा।

अरेे आपका नन्हकू की भी रिपोर्ट आ गई है। वह भी ठीक हो गया है।

अब क्या..एक जश्न जैसा माहौल प्रधान जी के दरवाजे पर बन गया।

प्रधान जी के दरवाजे पर बैठे लोगों के बीच खुशी की लहर दौड़ गयी।

घर के आगे दुवारे तीन चार खटिया, दो लकड़ी का बेंच, दो चौकी – तखत पड़ी थी

प्रधान जी कोई अलग नही बैठे थे। वे भी एक चारपाई के गोड़ तारी की ओर बैठे थे।

कवलेसर ने कहा .. अरे प्रधान जी, गांव के मुखिया है, सिरहाने बैठिये, ..सिरहाने।

दिनेश बोले.. अरे कौलेसर भईया, .. प्रधान होने से क्या हुआ। हम अपनी मर्यादा भूल के बड़कउ के सिरहाने बैठेंगे क्या। हमारा यह संस्कार नही है।

सामने चारपाई पर बैठे जितने भी लोग थे, वे सभी प्रधान जी की मानहि मन भूरी भूरी प्रशंसा कर रहे थे।

अचानक दूर से एक सरकारी गाडी आती हुई दिखाई दी

गाड़ी रुकी तो उसमें ड्राइवर के अलावा दो लोग उतरे।

अरे प्रधान जी… भावेश भैया आ गये.. सेतु ने कहा

देखो आज कौन नई खबर लेकर आए हैं? भावेश क्षय उन्मूलन कार्यकर्ता था। उससे दिनेश लाल प्रधान और सेतु दोनों परिचित थे। लेकिन दूसरे व्यक्ति को दिनेश लाल प्रधान नही पहचाते थे

सेतु ने उनका परिचय कराते हुए कहा ..

प्रधान जी ये श्री आनन्द कृष्ण जी है, स्टेट से हमारे जनपद में विजिट पर आये थे। ये आपके लिए कोई खास खबर लेकर आए हैं।

श्री आनन्द कृष्ण जी के बैठने के लिए प्रधान जी खुद कुर्सी लेकर आए।

आईये बैठिये..साहब। हमारा सौभाग्य है आप हमारे दरवाजे पर आए है।

प्रधान जी ने बबलू से चाय पानी बनाने के लिए बोला, तो बबलू चाय पानी लाने घर में चला गया।

और बताइए सर, क्या नई बात है… दिनेश लाल जी ने श्री आनन्द कृष्ण जी से पूछा

जी प्रधान जी….आपको भावेश ही पूरी बात बताएंगे।

अरे प्रधान जी आपको क्या बताना है आप तो इस इलाके के प्रतिष्ठित लोगों में है।

हमें आपको दो नई खबरें देनी है शायद आप इन दोनों खबरों के विषय में आप नहीं जान रहे होंगे।

दिनेश लाल प्रधान, हक्का-बक्का थे, आखिर कौन सी दो खास खबरें है जो उन्हें पता नहीं था।

लेकिन भावेश ने सिर्फ एक एक बात बतायी, वह यह कि जो हमारे जो तीन क्षय रोगी थे, वे अब सभी तीनों ठीक हो गये है। दो की तो रिपोर्ट पहले ही आ गई थी। आज सेतु नन्हकू की भी रिपोर्ट लेकर आए हैं। वह भी ठीक हो गए हैं।

अब अपने गांव में कोई भी टीबी का रोगी नहीं है

अब इस खुशी में आप सबका मुंह मीठा कराइये।

इसी बीच स्टेट से आए हुए श्री आनन्द कृष्ण जी बोल पड़े। इतने से काम नहीं चलेगा..प्रधान जी सब लोग आपसे बड़ी पार्टी लेंगे। अब आप दूसरी खुशी की बात तो सुनिए।

सब लोग श्री आनन्द कृष्ण जी की बात को ध्यान से सुन रहे थे

प्रधान जी आपने दूसरे गांव के 35 मरीजों को गोद लिया है.. याद है ना.., इनमे से भी 10-12 मरीज ठीक हो गये हैं। आपने इतने सारे मरीजों को गोद लिया है, इस संदर्भ में आपको इसी महीने 24 मार्च को लखनऊ आना है। विश्व क्षय रोग दिवस के अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री जी आप सहित कुल पच्चास निक्षय मित्रों को सम्मान्नित करेंगे।

इस खबर को सुनकर प्रधान जी की आंखें भर आयीं। आठ बरस के अपने प्रधानी के कार्यकाल में प्रधान जी को ऐसी खुशखबरी इसके पहले सुनने को नही मिलीं थी। दिनेश लाल प्रधान स्वयं को भाग्यशाली महसूस कर रहे थे कि उन्हें माननीय मुख्यमंत्री जी के हाथो से सम्मान मिलना है।

खुशी से उनकी आंखें गीली हुई तो सेतु ने गमछे से उनकी आँखे पोछ दी। दिनेश लाल… स्वयं को आदर्श गांव पटमंगरा के प्रधान के रूप में गौरवान्वित पा रहे थे।

झउआ भर तुरई की सब्जी, और नारी के भाजी लेकर नन्हकू घर सुबह-सुबह प्रधान जी के घर पहुंचे थे। जबसे उन्होंने अपनी रिपोर्ट निगेटिव आने की खबर सुनी तो उनका मन खुशी से भर गया। ये खबर उनको सेतु से मिली थी। उनको उनकी मेंहरिया ने कहा था कि इस खुशी के मौक़े पर प्रधान जी के घर कुछ साग भाजी पहुंचा आओ।

ननकू भी प्रधान जी के दरवाजे पर मौजूद थे सभी लोग नन्हकू की तरफ ध्यान से देखने लगे।

नन्हकू ने कहा कि भावेस भईया, टीबी अस्पताल वाले डॉक्टर साहब और अपने प्रधान जी इन तीनों का एहसान हम नहीं चुकता सकते। इस खुशी में हम प्रधान जी के लिए थोड़ी बहुत साग भाजी लाए हैं।

इस अद्भुत उपहार को परिभाषित करने के लिए अब कोई शब्द नहीं बचा था।

इधर कई महीनों से स्वास्थ्य विभाग की टीम पटमंगरा गाँव में लगातार आ रही थी। संभावित लक्षण वाले लोगों के सैंपल लिए जा रहे थे। लेकिन आगे क्या होने वाला है यह कोई नहीं जान नही पा रहा था।

भावेश, सेतु और श्री आनन्द कृष्ण जी सभी लोग दरवाजे पर पड़ी बेंत से बुनी लकड़ी की कुर्सियों पर बैठे हुए थे।

श्री आनन्द कृष्ण जी ने जब एक और बात की घोषणा की कि –

भाई लोग एक खुशखबरी और सुनिए –

माननीय प्रधानमंत्री जी ने भारत को क्षय मुक्त करने का संकल्प लिया है।

भीड़ में ही बैठे एक नौजवान ने बीच में टोकते हुए कहा कि –

हमें पता है, जब हमारे गांव क्षय मुक्त होंगे तो जिले क्षय मुक्त होंगे और जब जिले क्षय मुक्त होंगे तो प्रदेश क्षय मुक्त होगा और प्रदेश क्षय मुक्त होगा तो हमारा देश क्षय मुक्त हो जाएगा।

अपने गाँव के नौजवानो के भीतर का यह ज्ञान प्रधान जी सहित पूरी भीड़ को उत्साहित कर रहा था।

आखिरकार श्री आनन्द कृष्ण जी ने दूसरे राज को भी खोलते हुए कहा –

भाई लोग..आप लोगों को जानकर ख़ुशी होंगी कि आप का गांव पटमंगरा क्षय मुक्त गांव घोषित हो चुका है।

 प्रधान जी के द्वार पर बैठे लोंगो में खुशी की लहर दौड़ गई सब ने तालियां बजायीं।

सबकी बधाई ग्राम पंचायत पटमंगरा के प्रधान श्री दिनेश लाल जी के लिए थी।

आगे श्री आनन्द कृष्ण जी जी ने बताया कि अगले 2 अक्टूबर को आपके गांव के प्रधान जी को माननीय जिलाधिकारी महोदय के हाथों गांधी जी की कास्य प्रतिमा देखकर सम्मानित किया जाएगा तालिया के गड़गड़ाहट से पूरा माहौल दुबारा खुशियों से भर उठा।

पटमंगरा क्षय मुक्त गांव घोषित हो चुका था। प्रधान जी अपने स्थान पर खड़े हुए। घर के भीतर से उन्होंने एक उनी शॉल मंगवायी। सब मिलकर सेतु का सम्मान कर रहे थे। सेतु को प्रधान जी ने जब गले लगाया तो इस दृश्य को देखकर सुघरी की आंखें खुली की खुली रह गयी। जिस सेतु को वह भला बुरा कह रही थी, आज उसे अपने सेतु पर गर्व हो रहा था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # १२ – लघुकथा – नवजात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “नवजात“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # १२ ?

? लघुकथा – नवजात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

कन्या नवजात को कूड़े के ढेर पर या सड़क किनारे की झाड़ियों में फेक देने या छोड़ देने की बढ़ती घटना से द्रवित हो, एक अनाथालय-प्रबंधन ने एक नव प्रयोग कियाl

अनाथ आश्रम के मुख्य द्वार पर एक झूला बाँध दिया गया, वहाँ एक सूचना लगा दी गई कि, “यदि किसी ने बच्चा त्यागने का अमानवीय निर्णय लिया ले ही लिया है, तो उस त्याज्य नवजात को इस झूले पर डाल जाए l”

 ****

एक अत्यंत ग़रीब व्यक्ति, जिसकी पहले से ही दो बेटियाँ थीं, अब उसके घर तीसरी बच्ची ने जन्म लियाl इस तृतीय बच्ची के जन्मते ही घर में मातम-सा छा गयाl सास-श्वसुर के तानों और कड़वी बोली से बहू तंग आ चुकी थी —

“कलमुँही! वंश डुबाने आई यहाँ! जब से तुझे ब्याहकर लाये हैं, तब से किस्मत में अपशगुन ही देखना-सुनना बदा है! “

अब तो मानो कोई आसमानी आफ़त टूट पड़ी..l इस कोहराम ने तमिया को अंदर से झिझोड़ कर रख दियाl

वह अपने पति फग्गू से बोली –“ज़िंदगी की मार ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा…! भगवान हमें दौड़ा-दौड़ाकर मार रहा! “

फग्गू फूट पड़ा –“अब तीन-तीन बच्ची को पालना मेरे वश में नहीं, तम्मी! “

बहुत सोच-विचार के बाद दम्पति ने नवजात को तज देने का कठोर निर्णय लियाl पत्नी की सहमति से फग्गू ने नवजात को गोद में लिया और बड़ी तथा मँझली बेटी को बे-मन से साथ ले, आँसू बहाता हुआ अनाथालय की ओर चल पड़ा।

साथ चलती बड़ी बेटी, रास्ते में बार-बार पूछ रही थी — “बाबजी, हम कहाँ जा रहे हैं?”

पिता का हाथ थामे साथ-साथ चल रही मँझली बिटिया की बाल जिज्ञासा चिहुँक उठी — ” बाबजी! अपन नई गुड़िया के लिये खिलौने लेने जा रहे हैं?”

पिता ने नज़रें चुरा लीं। जवाब देना मुश्किल था।

अनाथालय के फाटक तक पहुँचकर उसने धीरे से नवजात बच्ची को गोद से उतारकर वहाँ के झूले में डालना चाहाl इस हेतु उसने अपनी मँझली बेटी का हाथ छोड़ दियाl

मँझली बेटी सहमकर बोली —

“बाबजी! … मैंने ऐसा क्या किया, जो मेरा हाथ छोड़ दिया?”

उस प्रश्न ने उसके भीतर की दीवारें तोड़ दीं।

उसे लगा, जैसे वह आवाज़ मँझली बेटी की नहीं, अपितु उस नवजात के होंठों से निकली हो —

“बाबजी! मैंने ऐसा क्या किया…?” ….. उसका अन्तः करण दहल गयाl मानो पलभर को समय ठहर गया। उसकी आँखें डबडबा आईं, हाथ काँपने लगे।

उसने बच्ची को फिर से गोद में उठाया, दोनों बेटियों को बाँहों में समेटा रूँधे गले से कहा, “चलो-चलोl घर चलो मम्मी के पासl ”

मन-ही-मन वह फ़िर बुदबुदाया —“बेटा-बेटी में फर्क करने वाला मैं होता कौन हूँ?…मेरा घर तो इनसे ही घर है।”

वह वापस लौट पड़ा।

अनाथालय के फाटक के बाहर ज़िंदगी पहली बार उसके साथ चल रही थी, तीन छोटी हथेलियों का हाथ थामे हुए…. l

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२९ – लघुकथा- नियति – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा  – “नियति।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२९

☆ लघुकथा- नियति ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

“सुन बेटा! आम मत लाना। मगर, मेरे घुटने दर्द कर रहे हैं, उसकी दवा तो लेते आना,”  बुजुर्ग ने घुटने पकड़ते हुए कहा।

“हुँ! ” बेटे ने बेरुखी से जवाब दिया, “दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते हो। घुटने दर्द नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?  यूं नहीं कि थोड़ा घूम लिया करें। हाथपैर सही हो जाए।”

बुजुर्ग चुप हो गए मगर पास बैठे हुए दीनदयाल ने कहा, ” सुनो बेटा। यह आपके पिताजी हैं। बचपन में…. . “

“हां हां, जानता हूं अंकल,”  कहते हुए बेटे ने अपने पुत्र का हाथ पकड़ा और बोला, “चल बेटा! तुझे बाजार घुमा लाता हूं।”

यह देखसुन कर दीनदयाल से रहा नहीं गया और अपने बुजुर्ग दोस्त से बोला, “क्या यार! क्या जमाना आ गया? ऐसे नालायक बेटों से उनका पुत्र क्या सीखेगा?”

“वही जो मैंने अपने बाप के साथ किया था और आज मेरा बेटा मेरे साथ कर रहा है। कल उसका बेटा वही करेगा,”  कह कर बिस्तर पर लेटे हुए बुजुर्ग दोस्त अपने हाथों से अपनी आंखों को पौंछ कर अपने घुटने की मालिश करने लगा।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९२ – स्वर्ण चंपा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – स्वर्ण चंपा।)

☆ लघुकथा # ९२ – स्वर्ण चंपा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“यह कैसी पूजा बताया है आपने? यह पुष्प मुझे कहाँ मिलेगा?”

“ऐसा करिए आप फोन करके गौरी को ही बता दीजिए, गौरी जरूर ला देगी। ठीक है मैं बता देता हूं और पूजा की विधि शुरू करते हैं।”

“यह पुष्प देवी को चढ़ाने से सारी व्यथाएं दूर हो जाती हैं”, पंडित जी ने कहा।

गौरी की माता कमला जी ने कहा- “अरे! पंडित जी आप दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के लिए आए हैं?”

“आपने तो हमारी मुश्किल बढ़ा दी। अब मैं यह कहाँ से लाऊंगी? साधारण चंपा के पुष्प तो लाकर रख हैं, गुड़हल का पुष्प हम देवी को चढाते हैं।”

“आप हमेशा नई-नई विधियां बता कर मुझे हैरान करते हो।”

गौरी को पंडित जी ने फोन लगाकर पुष्प के बारे में बताया और लाने के लिए कहा।

गौरी ने कहा- “ठीक है पंडित जी चिंता मत करिए। ऑनलाइन बहुत सारे ऐप है ऑर्डर कर दिया है आप पूजा करते रहिए। मैं समय से पुष्प लेकर घर पहुंच जाऊंगी।”

सफेद गोरा रंग गौरी का था और उसने पीली साड़ी पहन रखी थी एकदम साक्षात वह स्वयं स्वर्ण चंपा लग रही थी।पुष्प की सुगंध और गौरी को देखकर संपूर्ण मंदिर ऊर्जा मान हो रहा था।

जय माँ अंबे गौरी की आरती गूंज रही थी मंदिर में।

माताजी भी प्रसन्न थी उनकी बिटिया रानी हर मुश्किल में मां का साथ देती है। स्वर्ण चंपा पुष्प आज देखकर वह प्रसन्न थी और मंदिर में सभी श्रद्धालु ने भी पहली बार इस पुष्प के दर्शन किए थे।

पंडित जी ने ढेर सारा आशीर्वाद दिया और कहा तुम्हारे घर में ही साक्षात लक्ष्मी के रूप में गौरी बिटिया है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८४ – आत्म कथ्य… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– आत्म कथ्य…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८४ — आत्म कथ्य — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मैं अपनी इस उम्र तक विद्वानों की अपेक्षा ग्रामीण अशिक्षितों के बीच अधिक रहा हूँ। उनसे मिली हुई भाषा मेरे लेखन की आत्मा है। मैं जानता हूँ उनके मुहावरे मैं आधे ही समेट पाया हूँ। उनका रोदन हो, हँसी हो मैंने तो उनसे पूछ पूछ कर लिया है। मेरा एक अनपढ़ मित्र कहता था सब ले कर अचार बनाओगे क्या? वह न जानता अपने इस प्रश्न से उसने मुझे तो एक मुहावरा दे दिया। मैंने यह बड़े चाव से लिखा है।

 © श्री रामदेव धुरंधर
21 / 11 / 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३२ – लघुकथा – जय हिंद की सेना ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३२ ☆

☆ लघुकथा ☆ 🇮🇳 जय हिंद की सेना 🇮🇳 ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

 ( लघुकथा )

 

बिटिया बिलख बिलख कर रोये जा रही थी। जबसे शहीद पिता के शव के गांव पहुंचने की खबर मिली, उसके आंसू थमने के नाम ही नही ले रहे थे।

 मां का तो और भी बुरा हाल था। वह दहाड़े मारकर जमीन पर लोटलोट कर रो रही थी। उसके जीवन की गाड़ी थम गई थी। चूड़ियों के खनक गुम हो गयी थी।

पिछले महीने हवलदार जगदेव जब छुट्टी में गाँव आये थे तो अपनी घरइतीन सुखमणि से अपनी एकलौती बिटिया के हाथ पीले करने की चिंता, और उसके लिए एक सुयोग्य वर ढूंढने की बात करते-करते उनकी पूरी रात गुजर गई थी। अपने माई और बाबूजी के बीच हुई चर्चा को, सुमन ने जब से सुना न जाने क्यों उसके दिल में उसके सपनो के राजकुमार के आने की धमक सुनाई देने लगी थी।

लेकिन आज सब कुछ शांत था। न किसी पति-पत्नी के मध्य कोई चर्चा थी न किसी बेटी के दिल में किसी के आने की धमक थी। बस था तो सिर्फ सिर्फ एक कारूणिक मंजर, जहां एक शहीद का शव एक तख़्त पर लिटाया गया था। गांव के हर एक व्यक्ति की आंखों में उस शहीद का चेहरा चमक रहा था लेकिन खुली आंखों से देखने के शव के साथ उसका चेहरा मौजूद नहीं था।

 सेना की टुकड़ी के द्वारा मातमी धुन बजायी जा रही थी। बंदूको से सलामी दिए जाने की रस्म पूरी हुई तो सुमन ने रोते रोते अंजुली भर फूल पिता के चरणों में रख दिए।

 शव को अपने साथ ले आने वाले कैप्टन राघवेंद्र यह सब कुछ देख रहे थे। भीड़ में खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने जब रोते -रोते यह कहा कि अब जगदेव की बिटिया के लिए वर कौन ढूढ़ेगा। उसके हाथ पीले कब होंगे, बगल में खड़े कैप्टन राघवेंद्र के मन में करुणा और मानवता के बादल उमड़ने लगे। सुमन अपने पिता के शव को देखकर दहाड़े मारकर रो रही थी और बेहोश हुए जा रही थी। एक बार तो ऐसा लगा कि सुमन पूरी तरह से बेहोश होकर जमीन पर गिर जाएगी लेकिन बगल में खड़े कैप्टन राघवेंद्र ने उसका हाथ थाम लिया। बेहोश सुमन को कैप्टन के मजबूत बाहों ने जमीन पर गिरने से रोक लिया।

 कैप्टन राघवेंद्र के दिल में उमड रहे मानवता और करुणा के बादल शांत नदी के नीर के रूप में बदल गए थे। यहां से उनके मन में चिंतन प्रारंभ हो गया था।

 इस दर्दनाक घटना के बीते कई महीने गुजर गए। आज बहुत दिनों बाद शहीद हवलदार जगदेव के घर पर मातमी धुन की जगह शुभ मंगल शहनाई की धुन बज रही थी। बरात शहीद के घर की तरफ पहुंची, तो भीड़ में खड़ा हर कोई व्यक्ति दूल्हे के चेहरे को देखना चाहता था।

पर यह क्या !! आज गाँव का हर कोई यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित और खुशी से झूम रहा था जब कैप्टन राघवेंद्र फौजी वर्दी में नहीं बल्कि दूल्हे के वेश में सुमन का हाथ था में जयमाल मंडप की तरफ बढ़ रहे थे।

लोगो ने जब अपनी स्मृतियों को खंघाला तो उन्हें बीते दिनों का वह दृश्य दिखाई दे रहा था, जब दूल्हे के वेश में खड़े इस नौजवान ने फौजी के वेश में बेहोश होकर जमीन पर गिर रही सुमन का हाथ थामा था।

 बटालियन की वही टुकड़ी आज एक बार फिर शहीद हवलदार जगदेव के दरवाजे पर बाराती के भेषभूषा में खड़ी थी। लाल जोड़े में सजी सुमन ने कैप्टन राघवेंद्र के गले में वरमाला डाला तो कैप्टन राघवेंद्र ने एक जयमाला सुमन को भी पहना दिया। हवलदार जगदेव के दरवाजे पर खड़ी भीड़ ने भारत माता की जय के उद्घोष के साथ फूलों की वर्षा की तो कैप्टन राघवेंद्र और सुमन ने भी शहीद हवलदार जगदेव के चित्र पर पुष्पांजलि की। शहनाई की धुन बज रही थी। प्रत्येक दिशाओं में मंगल मंगल हो रहा था और एक अनोखा दृश्य उभर कर आ रहा था।

 भारतीय सेना के एक जवान ने आज सीमा पर नहीं बल्कि समाज के बीच एक अलग मिसाल पेश करते हुए, सबका दिल जीत लिया था। सबकी नज़रें नम थी और सभी कैप्टन राघवेंद्र को हृदय से बधाई दे रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १५६ ☆ लघुकथा – आ अब लौट चलें ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा आ अब लौट चलें। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १५६ ☆

☆ लघुकथा – आ अब लौट चलें ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

वही धरती, वही आसमान, वही सूरज, चाँद वही। इधर- उधर उड़ते पक्षी भी वही, फिर क्यों लग रहा है कि कुछ तो अलग है? आसमान कुछ ज़्यादा ही साफ दिख रहा है, सूरज देखो कैसे धीरे- धीरे आसमान में उग रहा है, नन्हें अंकुर सा। पक्षियों की आवाज कितनी मीठी है? अरे! ये कहाँ थे अब तक? अहा! कहाँ से आ गईं इतनी रंग – बिरंगी प्यारी-प्यारी चिड़ियाँ?

 वह मन ही मन हँस पड़ा। सब यहीं था, मैं ही शायद आज देख रहा हूँ ये सब! प्रकृति हमसे दूर होती है भला कभी? पेड़ – पौधों पर रंग- बिरंगे सुंदर फूल रोज खिलते हैं, हम ही इनसे दूर रहते हैं? जीवन की भाग – दौड़ में हम जीवन का आनंद उठाते कहाँ हैं? बस भागम -भाग में लगे रहते हैं, कभी पैसे कमाने और कभी किसी पद को पाने की दौड़, जिसका कोई अंत नहीं? रुककर क्यों नहीं देखते धरती पर बिखरी अनोखी सुंदरता को? वह सोच रहा था —–

 – -अरे, खुद को ही तो समझाना है, हँसते हुए एक चपत खुद को लगाई और फिर मानों मन के सारे धागे सुलझ गये। कोरोना के कारण इक्कीस दिन घर में रहना अब उसे समस्या नहीं समाधान लग रहा था। बहुत कुछ पा लिया जीवन में, अब मौका मिला है प्रकृति की सुंदरता देखने का, उसे जीने का —–

 अगली अलसुबह वह चाय की चुस्कियों के साथ छत पर पक्षियों से घिरा उन्हें दाना खिला रहा था। सूरज लुकाछिपी कर आकाश में लालिमा बिखेरने लगा था। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान पहले कभी न आई थी।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७२ – कथा कहानी – विज्ञापन व्यथा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कथा कहानी – विज्ञापन व्यथा )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७२ – कथा कहानी – विज्ञापन व्यथा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

…यह घर अब घर नहीं रहा, यह तो उनकी ज़िंदगी की सड़ांध थी, जिसे बाज़ार के बिल्डर ने दो पन्नों के विज्ञापन से उनके मुँह पर फेंक दिया था। वे घबराकर फिर पन्ना पलट दिए। अब देश के मुख्य समाचार थे। लेकिन क्या ख़बरें? मन पर ज्वेलरी और घर के विज्ञापनों का नशा ऐसा तारी हो चुका था कि देश की लूट, नेता की बकवास, या कहीं हुए बड़े घोटाले की ख़बरें भी फीकी पड़ गईं। अब उन्हें लगा कि असली लूट तो उनके भीतर मची है, जो उन्हें पल-पल ख़ुद से दूर कर रही है। ऊपर लाल स्याही में लिखा था—आज धनतेरस पर ग्रहों का ऐसा योग बना है जो चार सौ साल बाद आया है। “ऐसे शुभ मुहूर्त को व्यर्थ न जाने दें, कुछ न कुछ ज़रूर खरीदें!” इस वाक्य ने श्रीधर बाबू के जले पर नमक नहीं, सीधे तेज़ाब डाल दिया। वे सोचने लगे, ‘क्या ख़रीदूँ?’ महीने के अंत में दीवाली आई है। जो थोड़ा-सा पैसा बचा था, वह घर की अनिवार्य पूजा सामग्री और तेल-बत्ती में चला गया। अब क्या ख़रीदें? शायद ‘चार सौ साल बाद’ वाले इस योग का मतलब यही है कि चार सौ साल तक श्रीधर बाबू जैसा आदमी कुछ नहीं ख़रीद पाएगा। यह शुभ मुहूर्त उनके लिए नहीं, उन विज्ञापन देने वालों के लिए आया था, जिनके ग्रह एकदम ‘उच्च’ चल रहे थे।

तभी अगले पन्ने पर नज़र गई। यह इलैक्ट्रॉनिक सामानों की पूरी बारात थी। मोबाइल, टीवी, फ्रिज… और टीवी? मत पूछिए। एक तो कमरे की दीवार के साइज़ का, दूसरा ऐसा जो सिर्फ़ बोलने से चलता है—जैसे मालिक से भी ज़्यादा होशियार हो। और दाम? श्रीधर बाबू, जो एक प्राइमरी स्कूल के मामूली टीचर थे, के लिए वह दाम मतलब उनकी साल भर की पगार थी। पगार नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का मूल्य। लेकिन नीचे लिखा था, “आसान फ़ाइनेंस उपलब्ध, प्रोसेसिंग फ़ीस ज़ीरो, ब्याज ज़ीरो परसेंट!” बस! यहीं से श्रीधर बाबू के मन में शैतान जाग उठा। ज़ीरो परसेंट ब्याज! अगर वे एक शानदार टीवी फ़ाइनेंस पर ले लें तो! किश्तें भरते रहेंगे, कम से कम घर आने वाले पड़ोसियों को तो लगेगा कि आदमी का रुतबा है। वे मन ही मन हिसाब लगाने लगे—कितनी किश्तें होंगी, कितनी चाय बचानी पड़ेगी, बच्चों की कॉपी-किताब में कितनी कटौती करनी पड़ेगी। तभी उन्हें याद आया—बच्चों की पढ़ाई के नाम पर तो केबल कनेक्शन कब का कटवा दिया था! जब केबल ही नहीं है तो दीवार साइज़ के टीवी का क्या करेंगे? बस, वहीं खुली आँखों का सपना धड़ाम से टूट गया। उन्हें लगा, यह ज़ीरो परसेंट ब्याज नहीं है, यह तो उनकी बची-खुची ज़मीर को गिरवी रखने का ऑफर था। मन भारी हो गया, हाथ भी अखबार के अस्सी पन्नों के वज़न से दब गए।

उन्होंने दो-तीन पन्ने जल्दी-जल्दी पलटे। स्थानीय समाचार! पढ़कर क्या करेंगे? वही रोज़ की ख़बरें—लूट हुई, मर्डर हुआ, किसी नेता ने जनता को ‘महान’ बताया और किसी ने ख़ुद को ‘जनता का सेवक’। ये ख़बरें तो अब केवल विज्ञापनों के बीच का ‘फ़िलर’ बनकर रह गई हैं। फिर आया वह पन्ना, जहाँ शहर भर के बड़े और छुटभैये नेता अपनी फोटो चिपकाकर, हाथ जोड़कर खड़े थे। “धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ!” भले ही उनमें से कई तो खुलेआम गुंडे हों, जिन पर कई मुकदमे चल रहे हों। श्रीधर बाबू को हँसी आई, जो तुरंत ही कड़वाहट में बदल गई। उन्होंने सोचा, कोई इन नेताओं को समझाए कि ये जो शुभकामनाएँ छपवाते हैं, इनका पैसा भी देते हैं क्या? और कौन प्रभावित होता है इन शुभकामनाओं से? वे जो हीरे ख़रीद रहे हैं, या वे जो सीलन भरे मकान में सड़ रहे हैं? इन नेताओं के चेहरों पर जो नकली मुस्कान थी, वह भी एक विज्ञापन थी—ईमानदारी का विज्ञापन, जिसका स्टॉक बाज़ार में ख़त्म हो चुका है। कुल पचास से ऊपर पन्नों के इस अखबार में आधे से ज़्यादा में विज्ञापन थे। ख़बरें तो कहीं गायब थीं, और गायब थी अखबार की वह पुरानी स्याही की खुशबू, जो ज्ञान की गंध हुआ करती थी। अब इसमें से आती है सिर्फ़ विज्ञापन की भीनी महक, जिसका सरोकार ख़बरों से नहीं, सिर्फ़ पैसे से है, श्रीधर बाबू की जेब से है।

श्रीधर बाबू का मन बुरी तरह उचट गया। त्यौहार की सुबह-सुबह मन इतना भारी हो गया कि लगा जैसे उन्होंने धनतेरस पर सोना नहीं, अपनी सारी ख़ुशियाँ बेच डाली हैं। उन्हें लगा, हम सब इन विज्ञापनों के गुलाम हो गए हैं। हमारा वजूद बचा कितना है? इंसान की पहचान अब इंसानियत से नहीं, ब्रांड से होती है। बिना ब्रांडेड कपड़े के आदमी की औकात कौड़ी की है, भले ही उसमें इंसानियत कूट-कूट कर भरी हो। अखबार बंद करके श्रीधर बाबू ने उसे अलग रखा। पहले पन्ने के किनारे पर ऊपर में कीमत लिखी थी: कुल पृष्ठ ५२ + ८, मूल्य ५ रु। पाँच रुपए का यह कागज़, यह अखबार, आज आपको कितना ‘चूना’ लगा सकता है, सोचिए? यह सिर्फ पाँच रुपए का कागज़ नहीं था, यह उनकी पूरी आर्थिक और मानसिक हैसियत का आईना था। एक विज्ञापन! सिर्फ़ एक विज्ञापन आपके भीतर घुस कर बैठ गया तो? वह धीरे-धीरे आपके छोटे से सुखी संसार को चाटकर ख़त्म कर देगा। श्रीधर बाबू की आँखों में नमी थी। वे उस बिल्डर को, जौहरी को, और उस ज़ीरो परसेंट ब्याज को कोस रहे थे। लेकिन सबसे ज़्यादा वे उस पांच रुपए के अखबार को कोस रहे थे, जिसने एक ही सुबह में उन्हें उनकी गरीबी का इतना मार्मिक और पीड़ादायक अहसास करा दिया था।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आत्मकथा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आत्मकथा ? ?

सुनो…

-हूँऽऽ…

-तुम आत्मकथा क्यों नहीं लिखते?

-क्यों लिखूँ? कोई नहीं पढ़ेगा मेरी आत्मकथा।

-बेवकूफ हो तुम। हॉट सेलर हैं आजकल आत्मकथाएँ। हॉं कंटेंट थोड़ा कंट्रोवर्सी वाला होना चाहिए। जो लोग विवाद लिख रहे हैं, खूब बिक रहे हैं।

-लिखने दो उन्हें विवाद, मैं संवाद लिखता रहूँगा।

-सुनो…

-हूँऽऽ…

-तुम मत लिखना आत्मकथा।

-क्यों?

-कोई नहीं पढ़ेगा तुम्हारी आत्मकथा…..!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ कथा-कहानी – समवेदना – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

डॉ. मीना श्रीवास्तव

☆  कथा-कहानी ☆

☆ समवेदना – मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सई और सचिन, दोनों की ही पिछले चार-पाँच महीनों से भागदौड़ जारी थी। पूरा एक महीना तो बस योजना बनाने में ही निकल गया। दूल्हा-दुल्हन को लाभान्वित करने वाले विवाह का शुभ मुहूर्त तय होने के पश्चात् जब उन्हें ज्ञात हुआ कि, उस दिन उनका पसंदीदा सभागृह उपलब्ध है, तो उन्होंने उसका तत्काल आरक्षण कर लिया। अब उनकी असली भागमभाग की शुरुआत हुई।   

बहुत पहले से ही उन दोनों ने अपनी लाड़ली इकलौती बिटिया का विवाह बड़ी धूमधाम से मनाने का फैसला कर लिया था – लेन -देन, बारातियों का आदर सम्मान जैसे अहम प्रश्नों के उत्तर समधी जी ने बड़े सलीक़े से दे दिए थे, सो उन दोनों के तनावग्रस्त मन को काफी राहत मिली थी। परन्तु अन्य साज सामान की खरीदारी, गहने, घरेलू सामान, पूजा की तैयारी, घर की सजावट एवं कई अन्य चीजें बाकी थी। उस पर निमंत्रण सूची पर काफी विचार-विमर्श चल रहा था, तब कहीं जाकर अंतिम फेहरिस्त तैयार होने वाली थी। ऐसे में निमंत्रण पत्रिका का चयन भी एक समय लेने वाली प्रक्रिया होती है। आने वाले समय में तो बस काम का अटल पहाड़ सामने उनके इंतजार में था। उन दोनों की अक्सर कई मुद्दों पर गहन चर्चा होती, कभी कभी थोड़ी गर्मजोशी से बहस होती, परन्तु इस जुगाली के अंत में जैसे उनमें मतैक्य हो जाता, वैसे इस बार भी वे कई मुद्दों पर सहमति बना चुके थे। विचारों के धागे उलट पलट कर उलझे तो थे लेकिन धीरे धीरे उनको सुलझाने के निरंतर प्रयास के कारण यह उलझन अंततः समाप्त हो गई, और प्रत्येक कार्य योजना के अनुसार मुकाम हासिल करता रहा।

जल्द ही निमंत्रण देने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया। चाय- नाश्ते का पूरा ऑर्डर ही दिया गया था। अपने सगे सम्बन्धियों को भेंट करने के लिए उपहार पैक करके तैयार कर लिए गए। खाना बनाने एवं ऐन वक्त पर उभरने वाले तमाम आकस्मिक काम काज करने के लिए दो अतिरिक्त कामकाजी महिलाऐं भी गत आठ दिन से जुट गईं थीं। घर की सजावट शुरू हो चुकी थी। जहाँ विवाह संपन्न होने वाला था उस हॉल में ले जाने वाले सामान से भरे बैग पैक होकर तैयार थे—यानी सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं—दोनों में उत्साह की लहरें उमड़ रहीं थीं। उनकी उमंगों का ज्वार मानों उफान पर था। देखते देखते कल आने वाला गणेश और मातृका पूजन का दिन देहलीज पर खड़ा दस्तक दे रहा था।   

तेजी से भागने वाले इतने दिनों तक अपनी बेटी के बिछोह के विचार से विचलित होने तक का समय भी नहीं मिल पाया था – परन्तु आज – आज इस घड़ी में, सिर्फ एक ही अनुभूति उसके मन को कचोट रही थी। – एक नन्हीसी कली जैसी उसकी मासूम बिटिया की हर बात, बढती उम्र के साथ बदलती हुई उसकी खिलखिलाती बाललीलाएँ, उम्र की एक एक दहलीज को पार करता उसका कली से फूल में रूपांतरण! फूल में परिवर्तित होते होते उसके बदलते हठ और मांगें! दूसरी तरफ जाने-अनजाने में वृद्धिंगत होती समझदारी, सब कुछ उसकी स्मृति में शीशे की तरह साफ़ दिखाई देने लगा सई को। नन्ही मासूम सलोनी याद आयी, पर याद करना हो तो भूलना पड़ता है। हालत यह थी कि, सलोनी के नन्हे-नन्हे प्यारे बचपन का एक भी पल वह बिसरी ही कहाँ थी, जो उसे याद करना पड़ता? उन यादगार लम्हों को भूलना वैसे भी असंभव ही था। नन्ही सलोनी की वजह से दोनों की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी—जो ज़िंदगी अब तक निरर्थक और उदास लगती थी, उसे एक नया अर्थ प्राप्त हुआ था। उनके जीवन को मानों एक नई दिशा मिल गई थी।

‘सलोनी’… कितना प्यारा और सुन्दर नाम सोचा था उन्होंने उसके लिए। वह नन्हीसी बच्ची थी ही वैसी! मनमोहक गुड़िया जैसी लुभावनी, मुस्कुराती- गेहुँआ रंग, बाएं गुलाबी गाल पर खिली एक छोटीसी डिंपल। बेहद खूबसूरत, पानीदार, भावभीनी मतवाली आँखें – पहली ही नज़र में उसने इन दोनों का मन मोह लिया था। उसे देखते बराबर ही दोनों ने तुरंत फैसला किया, कि वे अब अन्य बालकों का मुआयना नहीं करेंगे। उन्होंने आश्रम प्रबंधक को अपने फैसले की सूचना दी। कानूनी औपचारिकताएँ पूरी की गईं और वे दोनों उसे लाने के लिए कोजागिरी पूर्णिमा के दिन चले गए। मन पर सम्मिश्र भावनाओं का घना कोहरा छा गया था। भय – दबाव- उत्सुकता- बेचैनी – विषाद और मन ही मन उस मासूम बच्ची की असली माँ के लिए एक गहरी सहानुभूति- वह अभागी माँ कभी भी यह नहीं जान पाएगी कि उसके ही पेट से जन्मी उसकी लाड़ली बिटिया हमेशा के लिए कौनसे पराये लोगों के हाथों में पहुँच जाएगी। सई को इस वास्तविकता पर बहुत रंज हो रहा था- परन्तु इसका कोई इलाज नहीं था। आश्रम की यहीं शर्त थी।

 —– आश्रम में पहुँचते बराबर सई ने उस नन्ही कली को गोद में उठा लिया और अनायास ही अपनी ह्रदय से लगा लिया, और बस उसी अंतरंग पल में, मानों उसे विचलित करने वाले विचारों का मन पर हावी हुआ बोझ सदा के लिए उतर गया। वह बच्ची भी सई से लिपट गई। सई का हृदय भर आया। वह बच्ची को बारम्बार चूमती रही। जैसे ही उसने उसके लिए लाए नए झबला-टोपी अपने हाथों से उसे पहनाए, उसका मन एक अनामिक आनंद और अनकही संतुष्टि से प्रफुल्लित हो उठा। यहाँ आते समय वे दोनों आये थे, अब विधि के विधान के अनुसार वे हमेशा हमेशा के लिए ‘तीन’ हो गए थे। वे एक अलग ही उल्लास और उमंग के साथ बाहर आए। मुख्य द्वार पर पहुँचते ही सई सलोनी को लेकर वहीं रुक गई, जबकि सचिन कार लेने चला गया।

उस अबोध बालिका के साथ सई लगातार बातें करती जा रही थी। —– “देखो ये पमपम– पसंद आई? और वहां देखो- उसे पेड़ कहते हैं– कितना बड़ा है न? और पूरा हरा हरा –‘ — जिसे दुनिया की कोई जानकारी तक नहीं थी, उस नवजात बालिका को पेड़ दिखाते दिखते उसकी नजर अनायास ही उस पेड़ के पीछे से झांकती दो व्याकुल आँखों की और आकर्षित हुई–.. ..

वे आँखें उस नन्ही बच्ची को हसरत भरी निगाहों से ताक रही थीं। उन सजल नेत्रों से निरन्तर बहती आंसुओं की धार सई दूर से ही महसूस कर पा रही थी। जैसे ही वह पेड़ की ओर बढ़ीं, एक औरत पेड़ की ओट से धीरे से झाँकी…मटमैली फटी साड़ी पर लगे कई पैबंद के बावजूद वह मुश्किल से ही अपने शरीर को ढक पा रही थी। उसके रूखे बाल बिखरे हुए थे और उसका कमजोर शरीर एकदम निस्तेज लग रहा था।  उसने अपने हाथ से सई को इशारा किया — “आगे मत आओ।” —- वहीं से उसने अपनी उंगलियों को अपने कानों पर मोड़ बड़े प्रेमभाव से उस नन्ही बालिका की बलैया ली, अपना हाथ उठाकर उठाकर, ‘अच्छा है-अच्छा है’ का संकेत कर बच्ची को खूब आशीर्वाद दिए। सई की ओर अप्रत्याशित कृतज्ञता भरी नज़र से देखते हुए, उसने अपने हाथ जोड़ लिए – और पीछे मुड़कर देखते हुए  बड़ी ही तेज़ी इस कदर भाग गई कि देखते देखते सई की आँखों से ओझल हो गई…

.. ..  .. .. सई का मन भावनाओं की उथलपुथल से मचलने तो लगा था, परन्तु इसी बीच कई और अपरिचित भावनाओं का कोहरा उसके मन पर छाने लगा —— “क्या वह इस नन्ही की माँ हो सकती है? इतनी दूर से भी, मैं निश्चित रूप से उन कई एक भावनाओं के अम्बार को महसूस कर सकती थी, जो एक के बाद तेजी से उसके पारदर्शी चेहरे पर महीन बदलियों की भांति छाते और छंट जाते। उसे अपने पेट से जने गोले को ऐसे को इस तरह दुनिया जहाँ के थपेड़े झेलने के लिए छोड़ देने के अपराधबोध से वह शर्म के मारे मानों धरती में धंसे जा रही थी। परन्तु उसकी आँखों ने कई अनकही बातें व्यक्त कर दीं थीं —- भले ही काफी दूर से ही क्यों न हो, अपनी बेटी को देखने की खुशी— अब फिर से उसे कभी न देख पाने का अपार अकथनीय दुःख – और एक अनामिक संतुष्टि। और – और अपने ही हाथों से अपने “मातृत्व” की छाप हमेशा के लिए मिटा देने की असीम मानसिक वेदना –जो किसीको भी लब्जों में बयान नहीं की जा सकती। हृदय को अंदर से बाहर तक तोड़ मरोड़ कर रख देने वाली भयानक पीड़ा के ज्वलंत सत्य का एहसास अनायास सई के चेहरे पर भी उभरकर व्यक्त हो गया था। — “उस पल सई को लगा कि परकोटि की विवशता का मूर्तिमंत रूप उसके सामने खड़ा है। परन्तु सचमुच ही वह अबला स्त्री एवं सई, दोनों ही उस क्षण बेबस थे। आश्रम का एक सख्त नियम था कि एक बार आप अपने बच्चे को आश्रम के दरवाज़े पर छोड़ आए, तो ज़िंदगी में फिर कभी भी उसके समक्ष नहीं आ सकते। और यह जानते हुए भी, जैसे ही उसे भनक लगी कि कोई उसकी बेटी को गोद ले रहा है, तो आज उस असहाय माता ने इतना साहसी निर्णय इसलिए लिया था ताकि, वह अपनी बिटिया को अंतिम बार देख सके, भले ही दूर से ही क्यों न हो! 

—–सई का दिल और आँखें दोनों ही आँसुओं से भर आईं। उससे दूर भागती हुई उस स्त्री को उसने मन ही मन सच्चे दिल से वादा किया कि वह उसकी बेटी की माँ बनेगी, और उसी क्षण वह उस नन्ही बिटिया की असली माँ बन गई——-

—— हॉर्न बजते ही सई की चेतना जागी। धीरे से आँखें पोंछते हुए वह सलोनी को धीरे से अपनी बाँहों में भरकर कार में बैठ गई। शांति से सो रही उनकी नन्हीसी परी को वे दोनों कुछ समय तक अपलक देखते रहे, और फिर वे सलोनी के नए घर की ओर निकल पड़े—- यह जानकर कि वे खुद कभी किसी के भी असली माता-पिता नहीं बन पाएंगे, इस सदमे से थोड़ा उबरने के बाद, उन्होंने बहुत सोच-विचार के बाद यह निर्णय लिया। ससुराल और मायके के सभी सदस्यों ने उसे तहे दिल से स्वीकार कर लिया था। इसलिए, सलोनी का घर पर बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया गया —-

—- और फिर, जैसे कोई कोमल कली हौले हौले खिलती है, वैसे ही वक्त के साथ सलोनी भी धीरे-धीरे सजीला स्त्रीत्व प्राप्त करती गई — और वे दोनों तुष्टि से उसे देखते रहते। बढ़ती उम्र के साथ, उसकी पसंद, विचार, रहन-सहन-बातचीत, व्यवहार, राय, अभिव्यक्ति—सब कुछ बदल रहा था,— सलोनी में हो रहे इतने सारे  बदलावों को वे दोनों अभिभावक के रूप में सचेतन रूप से महसूस कर रहे थे। वह बुद्धिमान तो थी ही, और उसके व्यक्तित्व में वृद्धिंगत होती प्रगल्भता अक्सर उन दोनों को कृतार्थ होने का एहसास दिलाती थी। उन्हें बार बार अनुभूति होते रहती कि, सलोनी के उनके घर-आंगन में प्रवेश करने मात्र से ही उनका  जीवन परिपूर्ण और सार्थक हो गया है। “गोद लेने की अवधारणा” तो उनके भाव विश्व से कब की लुप्त हो चुकी थी। घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। वह पूरी तरह से लाड़प्यार से पल रही थी। उसे अपनी पसंद की शिक्षा लेने की स्वतंत्रता थी। और अब उसने अपनी इंजीनियरिंग की शिक्षा भी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर ली थी — देखते देखते वह ब्याह करने योग्य हो गई थी। सब कुछ सुचारु रूप से मन के माफिक चल रहा था — सलोनी के और उन दोनों के भी। परन्तु फिर भी, उससे पहले कई सालों से, उनके मन पर लगातार एक दबाव बना हुआ था— सलोनी को एक दिन खुद के बारे में सत्य पता चल ही जाएगा —- तब क्या होगा? उसका और हम दोनों का भी ——-

जब वह अठारह वर्ष की हुई, तब मनोचिकित्सकों की सलाह और सहायता से सलोनी को सई और सचिन ने बतलाया था कि, वे उसके असली माता-पिता नहीं हैं। अधिकांश बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से टूट जाते हैं जब उन्हें अप्रत्याशित रूप से यह कड़वी सच्चाई पता चलती है कि जिन्हें वे अपने माता-पिता कहते हैं, वे उनके वास्तविक जैविक माता-पिता नहीं हैं, तथा कोई भी नहीं जानता कि उनके वास्तविक माता-पिता कौन हैं। यह सत्य निगलना उनके लिए बहुत कष्टप्रद होता है, इसलिए अधिकतर बच्चे मानसिक रूप से अत्यंत विचलित होकर विचित्र और असंगत व्यवहार करने लगते हैं। डॉक्टर ने उन्हें अच्छी तरह आगाह किया था —-   “यह अनुमान लगाने का कोई तरीका नहीं है कि, ऐसे बच्चे इस आकस्मिक आघात को ठीक से झेल पाएंगे या नहीं” —- और दोनों ही इस बात को लेकर बेहद तनाव में थे। दोनों के मन में डर था कि सलोनी उनसे दूर हो जाएगी। लेकिन उसे किसी न किसी मोड़ पर यह बात मालूम होना जरुरी था। इस पर सुकून इस बात का था कि, आजतक किसी और ने बेबाकी से उसे यह बात नहीं बताई थी। 

सलोनी को सच्चाई पता चलते ही उसने भी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार करना शुरू कर दिया। उसने सात-आठ दिनों से उन दोनों से बात तक नहीं की थी – न ही ढंग से खाना खाया था – वह घंटों खुद को कमरे में बंद किए रहती थी… इधर-उधर धक्का मुक्की करते हुए छटपटाती रहती थी — बिना किसी वजह के उसका चीखना चिल्लाना जारी था, मानों हवा से लड़ाई झगड़ा कर रही हो — दोनों ही बहुत हतप्रभ और भयाकुल थे। परन्तु मनोचिकित्सक के उपबोधन (काउंसेलिंग) का प्रभाव धीरे धीरे असरदार हो रहा था। 

…… और एक दिन, जैसे ही वह उठी, सई के गले में अपनी बाँहें डाल जोर जोर से निरंतर रोती रही। उसकी सिसकियाँ धीरे धीरे शांत हुईं। उसे लगा जैसे उसके मन पर छाए चिंता के घने बादल छंट गए हो। —- “माँ, मैं समझ गई —चाहे मुझे किसी ने भी जन्म दिया हो, आप ही मेरे सच्चे माता-पिता हैं और हमेशा रहेंगे। मैं जानती हूँ कि आप मन की गहराई से मुझे बहुत प्यार करते हैं। और मैं भी आप दोनों से उतना ही प्यार करती हूँ। आपको छोड़ कोई और मेरे माता-पिता नहीं हो सकते।” — और सलोनी के इन प्रेमभरे बोलों के साथ ही सभी के मन का बाँध टूट गया। उसी अनमोल क्षण को साक्षी मान उन तीनों के बीच एक नया, समृद्ध और दृढ़ रिश्ता अंकुरित हुआ। दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था। आश्रम से उस गुड़िया को घर लाते वक्त उन्हें जो प्रसन्नता हुई थी, वह अधिक थी, या इस क्षण में अनुभव की हुई प्रसन्नता की भावना, यह प्रश्न निरर्थक ही साबित होता था। —–

और देखते ही देखते सलोनी विवाह के उम्र तक बड़ी हो गई। उसने अपना जीवनसाथी खुद ही चुना था — बड़ी समझ बूझ के साथ. रिश्ता बहुत ही अच्छा था। लड़का अमेरिका में नौकरी कर रहा था। उसका संपूर्ण परिवार सर्वार्थ रूप से समृद्ध था। रिश्ते को नकारने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। सबसे अहम बात यह थी कि उस लड़के और उसके परिवार वालों ने यह सत्य भी सहजता से स्वीकार लिया था कि सलोनी उनकी गोद ली हुई लड़की है। उन्होंने दिल की गहराई से इस विवाह के लिए हामी भरी थी —      और विवाह की घडी बस चार दिन दूर थी। यह तो मानी हुई बात थी कि शादी के बाद सलोनी अमेरिका जाने वाली थी — यह सोचकर कि अब सलोनी इसके बाद किसी और की होगी, उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे ——- 

— और आज, इतने सालों बाद, उसे अचानक उस स्त्री की याद आ गई — जो पेड़ की ओट से ही सही, अपनी बेटी को अंतिम बार देखने की आस लिए हुए थी—उसे उतनी दूर से आशीर्वाद दे रही थी वह — अपने दिल पर हमेशा के लिए पत्थर रख कर अपनी बेटी से जीवन भर के दूर जा चुकी थी वह —–

.. .. .. सई को गहरा एहसास हुआ —- “उस औरत को समाज ने निष्कासित कर दिया था, और मैं यहाँ बहुत ही सम्मानजनक रूप से जी रही हूँ, सलोनी को नौ महीने अपनी कोख में पाले बिना ही उसकी माँ होने का सुख अनुभव कर रही हूँ — अपने आँचल में कन्यादान का पुण्य बटोर रही हूँ, हम इतिकर्तव्यता का श्रेय लेते हुए आनंदोत्सव मना रहे हैं। लेकिन वह असली जनिता? हम कैसे कह सकते हैं कि सामाजिक रूप से दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है? भले ही किसी को यह ज्ञात न हो कि वह इस लड़की, सलोनी, की जननी है, पर मैं तो यह सत्य कैसे नकार सकती हूँ? बेचारी वह अनामिका माता! उसे तो अपनी बेटी का नाम तक मालूम नहीं है! परन्तु उसकी बेटी कैसी दिखती है – क्या करती है – कहाँ रहती है, सुरक्षित और खुश है या नहीं – ऐसे सब विचार उसके मन में ज़रूर मंडराते होंगे, है ना? — यानि हम दोनों के अंतर्मन की ‘माँ’ बिल्कुल एक जैसी ही तो है —- दोनों की भावनाएं एक जैसी – प्यार की कसक वैसी ही – और बेटी से बिछड़ने की व्यथा का एहसास भी एक जैसा है। क्या इसी को ‘समवेदना’ कहते हैं?   

परन्तु … परन्तु शायद — शायद नहीं– बिल्कुल निश्चित ही — तब की उसकी ये सारी भावनाएँ – जब वह हतोत्साहित होकर मज़बूरी में अपनी बेटी को अपने ही हाथों से खुद से दूर धकेल रही थी – मेरी अब की भावनाओं से कहीं अधिक तीव्र और दर्दनाक थीं, भले ही उसने उन्हें न दर्शाया न ही बतलाया! बावजूद इसके मैंने तब भी उन्हें महसूस किया था – और अब तो मैं उसे लगातार और भी अधिक प्रकर्ष के साथ अनुभव कर रही हूँ – क्योंकि न केवल उसे इस स्पष्ट सत्य की जानकारी थी कि, वह अपनी बेटी को भविष्य में जीवन में फिर कभी भी, यहाँ तक कि, दूर से भी देख तक नहीं पाएगी, बल्कि उसके पास इस हलाहल को पचाने के अलावा कोई विकल्प तक नहीं था। यह सब झेलते हुए उसने कितनी प्रचंड मात्रा में क्लेश सहे होंगे—

— परन्तु मेरे साथ ऐसा नहीं है। — ऐसा तो तो होगा नहीं कि, सलोनी का विवाह होने के बाद मैं कभी उसे

देख नहीं पाऊँगी। आज मैं ‘बिछोह’ इस शब्द का दर्दनाक अर्थ सही मायने में समझ पा रही हूँ।”

— सई ने अत्यंत दृढ़ता से यह महसूस किया, और मन ही मन उस माँ के सामने हाथ जोड़े – एक बार फिर उस अनजान जनिता माता को उसकी अपनी बच्ची के बारे में आश्वस्त किया, जो उसके लिए हमेशा के लिए अजनबी हो गई थी। उस स्त्री ने सई के आँचल में न केवल अपनी बेटी सौंपी थी, बल्कि एक सम्पूर्ण “मातृत्व” भी प्रदान किया था – आज पहली बार, सई के हृदय में उसके प्रति इतनी गहराई से समाई हुई वास्तविक और असीम कृतज्ञता उसकी आँखों से ऑंसुओं की बरसात का रूप लेकर बह रही थी। और इतने सालों से मन की गहराई में छाया घना कोहरा अप्रत्याशित तेजी से छंट चुका था।

♦ ♦ ♦ ♦

मूल मराठी कहानीकार – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सांगली, महाराष्ट्र मो ९८२२८४६७६२

हिंदी भावानुवाद  – डॉ. मीना श्रीवास्तव

संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares