हिन्दी साहित्य – कविता ☆ रूपांतरण… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी अप्रतिम रचना “रूपांतरण…”।

? रूपांतरण… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

☆

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि

नैनं दहति पावकः

फिर भी

मैं जला, पर

ना दम्भ जला

ना ही अहंकार

जो स्वयं को

अग्नि समझ बैठा था

ना कोयला बन सका

ना ही राख हुआ

त्रिशंकु स्वरूप मध्य

में ही ठहर गया

वहाँ

जहाँ असह्य पीड़ा को ही

परिवर्तन मान लिया जाता है…

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि

पर जिसने

वस्त्र बदले

वह जला नहीं

उसने, बस छोड़ दिया

– देह

– नाम

– विजय

– पराजय

कोई धुआँ नहीं उठा

कोई चिंगारी नहीं बची

नाश नहीं हुआ

केवल

रूपांतरण हुआ

जो जला

वह अभी भी बँधा था

जो छोड़ सका

वही

मुक्त हुआ…!!

☆

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लेंस ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लेंस ? ?

उसकी आँख में

विशिष्ट सेंसर वाला

एक लेंस लगा होता है,

यह लेंस देखे हुए को

दृष्टि में बदलता है,

सत्य-असत्य,

सहज-पाखंड का

विश्लेषण करता है,

सुनो!

जगत अद्वैत दर्शन

पर चलता है,

दाता सबको

समान रूप से देता है,

केवल उसकी या इसकी नहीं,

हर आँख में

यही लेंस लगा होता है,

तो निवेदन है बस इतना-

अपने लेंस में

अपने आचरण,

सत्य-असत्य,

सहज-पाखंड को

हरेक समझ ले तो

जगत का समीकरण

बदल सकता है,

दोपाया,

बेहतर मनुष्य होने की दिशा में

आगे बढ़ सकता है..!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रात: 8:41 बजे, 25.12.2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७५ – नवगीत – दहकता मन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – दहकता मन…।

? रचना संसार # ७५ – गीत – दहकता मन…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

दुनिया है टकसाल विरह की

पीर-वेदना भारी है।

दहक रहा है मन भी मेरा,

किस्मत की बलिहारी है।

छाई है हर तरफ उदासी,

अपने हुए पराए हैं।

किसको हम दोषी ठहराएँ,

दुश्मन अपने जाए हैं।।

आँधी-तूफानों का डेरा,

रात बड़ी अँधियारी है।

दुनिया है टकसाल विरह की,

पीर-वेदना भारी है।।

जीवन की बगिया सूनी है,

विरह गीत कोयल गाती।

छलनी करती नागफनी सी,

मन को आहत कर जाती।।

देख दृगों की बहती धारा,

बरखा भी तो हारी है।

दुनिया है टकसाल विरह की,

पीर -वेदना भारी है।।

रूखे-सूखे नैना प्यासे

पलकें भीनी-भीनी हैं।

पीड़ा का गहरा सागर है

खुशियाँ किसने छीनी हैं।।

उठती-गिरती लहर-लहर में,

सिमटी दुनिया सारी है।

दुनिया है टकसाल विरह की

पीर-वेदना भारी है।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८५ ☆ एक बुन्देली गजल – लुके कहाँ लौ घर में बैठें… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी – एक बुन्देली गजल – लुके कहाँ लौ घर में बैठें… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८५ ☆

☆ एक बुन्देली गजल – लुके कहाँ लौ घर में बैठें… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

टुरवा-टुरिया सुनतै नइयां

सीख बड़न की गुनतै नइयां

*

बे-मतलब खों घर सें निकरें

पाँव घर में थमतई नइयां

*

नॉकरियन के लाने बैठे

काम कछु भी करतई नइयां

*

इतै बुलाओ उतै भगत हैं

अपनों की कछु सुरतै नइयां

*

कोरोना ने चौपट कर दओ

काम-धाम अब मिलतै नइयां

*

लुके कहाँ लौ घर में बैठें

चैन हमें अब परतै नइयां

*

कैसे अब “संतोष”मिलेगो

खाली पद अब भरतै नइयां

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ५ – कविता – मेरा एहसास… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरा एहसास…‘।)

☆ शशि साहित्य # ५ ☆

? कविता – मेरा एहसास…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

उसने कुछ लिखने से पहले,

कलम अपने होठों में दबाई..

और हमने उसका अनलिखा,

आखरी पन्ना भी पढ़ लिया..

 

यह वह जज़्बात है जिनका,

सफर आसान नहीं है यारा..

रब की होगी मेहरबानी,

तो ही उतरेगा दरिया के पारा..

 

पहली सांस की तरह,

ज़रूरी यह हिस्सा है ..

आखिरी सांस को थामने,

तक का यह किस्सा है..

 

जज़्बात, वहां से यहां तक कैसे पहुंचे,

जो तल तक डूबा, सिर्फ उसने यह नेमत पाई है..

जिसने प्रीति में ही भक्ति की लौ जलाई है,

समर्पण की दिल से, हर रीत निभाई है..

 

उसी का दिल तो करेगा शोर….

यारा मैं क्या करूं.. तुझ में….      ‍

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “अटल बिहारी वाजपेयी ” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “अटल बिहारी वाजपेयी” पर चर्चा।

☆ कविता  ☆ अटल बिहारी वाजपेयी ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

 

कलम की बूंद, शब्दों का समन्दर

आप राजनीतिक और कविज्ञआपके अन्दर ,

सबके दिलों में अमृत-सागर, वो नाम अटल है

 

खानदानी सोच, खुशी का सागर,

भारत माँ की गौरव-गाथा गाने वाला

हमेशा खुश चेहरा वाला

वो शब्द, भारत के प्रति सच्ची भक्ति करने वाले

वो नाम अटल है ‌।

 

हृदय-सुंदर, हृदय-शुद्ध, हृदय-सरल,

कविता-का-संग्राम, चलाने वाले

अटल जी के रंग, राजनीतिक-स्थानिक,

हमेशा, वो चांद की चांदनी

वो नाम अटल है

 

अटल जी चले गए,

सर ज़मीन को जीवंत कर गए

हर साल  लाल किले पर नाम पुकारा जाएगा।

 

जब अटल जी कहा, तो लगा,

शब्दशाला में हर शब्द रंगीन  होने लगा

कश्मीर घाटी से कन्याकुमारी तक

वो विचार, हमेशा सराहे  जायेंगे।

वो नाम अटल है

 

वंदे मातरम के साये में,

उनकी साज़ -ए- सुखन, थोड़ी-थोड़ी,

प्यार माँ, भाई है जिसमें शान से

अटल बिहारी बाजपेई पहचान है

आगे बढ़ो, कलम से जुड़े रहो,

ये शायर- ओ- सुखन, तुम्ही के बारे में

वो नाम अटल बिहारी है

 

अटल जी की शख़्सियत, शब्दों में बंधे,

सपनों का भारत, दिल में सजे।

नरम हँसी, तेज़ विचार,

वो शेर‑ए‑हिंदुस्तान, सदा यादगार।

 

वो बोले तो धारा, सदा बहती रहे,

सच्चाई की राह में, कदम बढ़ते रहे।

कवियों के दिल में, उनका स्वर,

अटल बिहारी, अनंत, अनवर।

 

श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संकल्प ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – संकल्प ? ?

कैद कर लिए मैंने

विकास की यात्रा के

बहुत से दृश्य

अपनी आँख में,

अब इनसे टपकेगा पानी

केवल उन्हीं बीजों पर

जो उगा सकें

हरे पौधे और हरी घास,

अपनी आँख को

फिर किसी विनाश का

साक्षी नहीं बना सकता मैं!

?

© संजय भारद्वाज  

13 जून 2016

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७८ ☆ कविता – भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७८ ☆ 

☆ गीत – भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए।।

होली और ईद सभी मिल के मनाइए।।

*

आप नहीं जागे तो देश टूट जाएगा।

भारत का प्यारा परिवेश छूट जाएगा।

कोई आ के फिर मेरा देश लूट जाएगा।

ज्ञान की किताब से भी प्रेम सिखलाइए।।

भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए।।

 *

हर धरम के भाई का खून एक होता है।

प्रेम शक्ति भाव का जुनून एक होता है।

भेदभाव रीति से समाज सून होता है।

वेद ने कहा जो , उसे दिल से लगाइए।।

भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए।।

 *

आप हैं भगत सिंह, आप ही अब्दुल हमीद।

आप ही सुभाष हैं, आप ही प्यारे फरीद।

आप में हैं बिस्मिल, आप में सारे शहीद।

शेखर, अशफाक की कुर्बानी न भुलाइए।।

भाईचारा आप हिंदुस्तान में बढ़ाइए।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०७ – कविता – ☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय दोहे “धन जीवन की दौड़…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०७ ☆

☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

(दोहा संग्रह ‘शब्दों की चौपाल’ से उदधृत धन विषय के दोहे)

☆

धन की भाषा विश्व में, जन-जन को  है ज्ञात।

वैश्विक भाषा सिर्फ धन, बस धन की ही बात।।

*

ज्ञानी ध्यानी संत सब, पढ़े-लिखे विद्वान।

धन के पीछे हैं पड़े, देव दनुज, शैतान।।

*

धन के रूप विचित्र है, भ्रमित सभी इंसान।

नजरबन्द धन ने किया, भूले निज पहचान।।

*

धन ही सादर दंडवत,  धन ही आशीर्वाद।

हर्षोत्सव त्योहार धन, धन ही शोक विषाद।।

*

धन सूरज धन चंद्रमाँ, धन धरती आकाश।

अंधकार धन में मिले, धन में छिपा विनाश।।

*

वर्तमान धन में बसा, धन ही भूत भविष्य।

धन सर्वोत्तम है गुरु, धन ही तो है शिष्य।।

*

धन चिंतन धन सृजन है, धन छपास की खान।

धन ही शब्द विलास है, धन ही विज्ञ सुजान।।

*

रंक बने राजा कभी,  राजा बनते रंक।

खुशियाँ दे मन को कभी, कभी मार दे डंक।।

*

धन-लछमी है चंचला, धूप कभी तो छाँव।

एक जगह टिकते नहीं, मायाविनि के पाँव।।

*

धन दुश्मन धन मित्र है, धन रिश्ते संबंध।

धन में ही दुर्गंध है, धन में बसी सुगंध।।

*

उलझन और निदान भी, धन के अद्भुत फेर।

धन विषधर धन नेवला, धन सियार धन शेर।।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२८ ☆ नदी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नदी” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२८ ☆ नदी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

नदी सागर से नहीं मिलती

राह में दम तोड़ देती है ।

क्या यही इतिवृत्त मेरा

है पूछती सबसे

लिखा है बस भोगना

पैदा हुई जबसे

भोग कर भी कुछ नहीं कहती

धार अपनी मोड़ देती है।

ढो रहे ख़ामोशियाँ तट

चप्पुओं के गाँव

कहाँ जाकर के रुकेगी

छेदों वाली नाव

दर्द रेता होने का सहती

घाव सूखे छोड़ देती है।

समय कितना निर्दयी है

छीलता है खाल

बस गए हैं किनारों पर

बाढ़ के भूचाल

विकृति का रूप धर बहती

पत्थरों को फोड़ देती है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

२६.१०.२५

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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