हिन्दी साहित्य – कविता ☆ होगा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘होगा…‘।)

☆ कविता –  होगा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

 

होगा

क्या होगा?

जाने क्या होगा?

कैसे होगा?

क्यों होगा?

जब होगा,

तब होगा,

कब होगा?

कहां होगा?

अच्छा होगा,

बुरा होगा,

कुछ तो होगा,

वो जाने,

क्या होगा?

कैसे होगा?

होने दो,

जो होगा,

सो होगा,

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “जयपाल की पांच प्रेम कविताएं” ☆ श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक । प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है “जयपाल की पांच प्रेम कविताएं”।

☆ “जयपाल की पांच प्रेम कविताएं” ☆  श्री जयपाल ☆

☆ शिकायत ☆

वह लिखती रही प्रेम-पत्र

करती रही शिकायत

जवाब भी मिलता रहा

साथ में मिलती रही शिकायत भी

पर होता रहा इंतजार

इस सबके बावजूद

या यूं कहिए

बची रही शिकायत

बचा रहा इंतजार

 

बचा रहा प्रेम भी !

☆ प्रेम ☆

प्रेम पर लिखा गया बहुत 

कहा भी गया  बहुत

पर हर बार रह गया

कुछ अनकहा

कुछ अनलिखा

कुछ रहस्यमयी सा

 

क्या था वह 

जो रह गया हर बार ही

 

क्या करोगे जानकर !

☆ औरत और पतंग ☆

औरत पतंग बनकर

उड़ लेती है हवा में

हंस लेती है बादलों के साथ

नाच लेती है

अंग-संग उड़ते पक्षियों के

 

आदमी की नजर बचाकर !

☆ प्रेम से मुठभेड़ ☆

उन्होंने प्रेम-विवाह किया था 

वे हर किसी को प्यार करते थे 

उनका प्यार कुछ था ही ऐसा

दुःख दर्द में शामिल होते थे 

इंसानियत के लिए प्रतिबद्ध

अन्याय के खिलाफ मर मिटने को तैयार

कहते थे इस दुनिया को बदल कर रहेंगे 

हर कोई करेगा एक दूसरे से प्यार 

ऐसी दुनिया बनाएंगे 

कि सब रहेंगे प्रेम से 

 

एक दिन वे निकल पड़े 

दुनिया में प्रेम भरने 

 

फिर एक दिन पता चला 

 

पुलिस मुठभेड़ में मारे गए !

☆ तुम ☆

प्रिये !

एक दिन धूप को देखा

हंसते-हँसाते,

खिलते-खिलखिलाते

खेलते हुए बच्चों संग लुका-छिपी

कूदते-फांदते-उछलते हुए

गुनगुनाते हुए पहाड़ी गीत

 

 ☆ प्रिये ! ☆

फिर एक दिन धूप को देखा

गुमसुम बेजान सी

बर्फ सी जमी हुई

बंद मकान सी

पत्र-विहीन शाखा सी

 

प्रिये !

यह धूप थी या तुम थी …!

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ इन दिनों ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कविता ☆ 🌋 इन दिनों🌋  ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

☆

कानों में  रस घोलती है  इन दिनों ।

धूप जैसे  चाँदनी  है   इन   दिनों ।।

*

भूरी भूरी बर्फ सी दिखती है साँझ

आँच की अनुरागिनी है  इन दिनों ।।

*

है  हरसूं  नशीली  खुशबू धुएं  की

इत्र की बरखा   है यानी इन दिनों ।।

*

तितली सी पल्लू उड़ाती है किरण

मखमली है, रंग धानी  इन दिनों ।।

*

एक और कोणार्क गढ़ने में जुटी

सुनो ऋत की जुबानी इन दिनों ।।

*

संदूक से यादें निकल ताजा हुईं

वक्त की है मेहरबानी इन दिनों ।।

*

गीत कविता दोहा साखी गांव हैं

ग़ज़ल बनी है राजधानी इन दिनों ।।

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – क़दमताल ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – क़दमताल ? ?

तब मिली तो

भविष्य के सपने दिखाती रही,

अब मिली तो

अतीत की स्मृतियाँ सुनाती रही,

सुनो ज़िंदगी!

कभी साथ क़दमताल करो,

कभी वर्तमान की बात करो!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रात: 7:55 बजे, 29.11.२०२३

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४९ ☆ कविता – आध्यात्मिक संस्कृति की प्राण दायिनी माँ गंगे… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – आध्यात्मिक संस्कृति की प्राण दायिनी माँ गंगे…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४९ ☆

☆ आध्यात्मिक संस्कृति की प्राण दायिनी माँ गंगे…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

हे भारत की जीवन धारा कलकल निनादिनी माँ गंगे

हिमगिरी से चलकर सागर तक निर्बाध वाहिनी माँ गंगे

 *

देती अमृत सम जल अपना वन उपवन जन जन कण कण को

मिलती है अनुपम शांति तुम्हारे तीर दुखी आहत मन को

भारत जन मन की परम पूज्य प्रिय पतित पावनी माँ गंगे

 *

उत्तर दक्षिण प्रांतो पंथो का भेद मिटाने वाली तुम

भावुक भक्तों पर माँ सी ममता प्यार लुटाने वाली तुम

भारत वसुन्धरा को वैभव कल्याण दायिनी माँ गंगे

 *

तव निर्मल उज्जवल धारा ने कवि कण्ठों को कलगान दिये

कृषि को नित वरदान दिये सन्तो को गरिमा ज्ञान दिये

भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की प्राण दायिनी माँ गंगे

 *

तुम भारत की पहचान तुम्हारे दर्शन को हर मन प्यासा

जीते हैं लाखों लोग लिये तुममे डुबकी की एक आशा

भारत के जनजीवन के मन में नित निवासिनी माँ गंगे

 *

जग से विक्षुब्ध असांत हृदय को शान्ति प्राप्ति की अभिलाषा

निर्मल जल की चंचल धारा देती है नवजीवन आशा

हे पाप नाशिनी , मोक्ष दायिनी जगत तारिणी माँ गंगे .

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८५ ☆ गीत – ।। थोड़ी सी ही उम्र प्रेम के लिए भी कम है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८५ ☆

☆ गीत ।। थोड़ी सी ही उम्र प्रेम के लिए भी कम है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

थोड़ी सी ही   उम्र प्रेम के लिए भी कम है।

न जाने आदमी क्यों ओढ़े नफरत का गम है।।

**

पेड़ की खूबसूरती फूलों से, व्यक्ति की वाणी से है।

व्यक्ति का सम्मान धन से नहीं अपितु दानी से है।।

क्यों झूठ को प्रणाम, सच से फेरता मुंह एक दम है।

थोड़ी सी ही   उम्र प्रेम के लिए भी कम है।।

**

व्यवहार से हम सब का व्यक्तित्व महक जाता है।

जरा प्यार से देखो तन रोम-रोम चहक जाता है।।

वही सच्चा जीवन जब किसी के लिए नेत्र नम हैं।

थोड़ी सी ही   उम्र प्रेम के लिए भी कम  हैं।।

**

सदा नया करने की कोशिश जीवन की सार्थकता है।

सदा स्वार्थ में जीना दिखाता जीवन की अनर्थता है।।

वह जीवन जाता बिलकुल व्यर्थ जब केवल  दंभ है।।

थोड़ी सी ही   उम्र प्रेम के लिए भी कम है।।

**

जितनी भी मिली जिंदगी काम कुछ नायाब करो।

हर दिल में यादें रह जाएं यों कामयाब तुम बनो।।

चार दिन की रौनक कि बस राख बन जाता तन है।

थोड़ी सी ही    उम्र प्रेम के   लिए भी कम है।।

☆

 

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – परंपरा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – परंपरा ? ?

एक ही पिता की

संतानों के स्वभाव

और संकल्प में

ध्रुवीय अंतर

नई बात नहीं है,

मेरी पीड़ा और

मेरी जिजीविषा भी

अपवाद नहीं हैं!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ बड़ी ठंड है ! ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप ‘कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)

☆ कविता 🤦‍♀️बड़ी ठंड है ! ❤ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

☆

किसकी हिम्मत कहे कि मुझको

लगता भीषण जाड़ा।

*

सुन सुन कर सरदी में मेरी

चढ़ता जाता पारा।

*

सुबह हुई है, और हाथ में

गरम चाय की प्याली।

*

बक बक करते थमा गई वो

बुढ़िया ‘मेरी वाली’।

*

पी रहा हूँ ओढ़ के कम्बल

लिहाफ ही मिल जाता।

*

कौन हाथ से किसे सँभालूँ

इसे कौन समझाता ?

*

मफलर एक बँधा कानो पर

पवन नहीं घुस पाये,

*

जब खेत को चुग गई चिड़िया

मनवा क्यों पछताये ?

*

छीं छीं कहीं शुरू हो जाए

छींक, नाक से पानी,

*

कहीं उठा पटके बुड्ढे को

करे क्यों पहलवानी ?

*

परसों रात हवा थी सन सन

मैं तो कोट पहन कर

*

काँप काँप कर पहुँच गया था

जब लिहाफ के अन्दर,

*

आग बबूला होकर बुढ़िया

लगी सुनाने ताने,

*

‘ऐसे कौन बेड पर आता?

लगे बहुत सठियाने ?

*

गरम रजाई के अन्दर भी

कोट पहन कर सोना ?’

*

करके गुस्सा हाय मुझे फिर 

आता है जी रोना।’

♦♦♦

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी

पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029

मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७४ ☆ बाल गीत – पक्षी अपनी तान में… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७४ ☆ 

☆ बाल गीत – पक्षी अपनी तान में… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’☆

☆

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।

पैराओलंपिक है प्रेरक

हर बाधा को पार करो।

 *

शीतल ने बिन हाथों के ही

देश के लिए जीता मैडल ।

गौरव, सौरभ हुआ है उज्ज्वल

पैरों में अद्भुत है बल।

 *

जिनके हाथ साथ हैं साथी

प्रेरित हो उपकार करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।।

 *

हार नहीं मानी उनने भी

तन से अंग-भंग हैं चेते।

लक्ष्य बना मंजिल तक पहुँचे

नाव स्वयं ही रहे वे खेते।

 *

जिनका तन है सही सलामत

खुद में सदा सुधार करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।

 *

सदा देश हित जीना अच्छा

सार्थक जीवन करो मगर।

मुश्किल में भी मत घबराओ

तब होगी आसान डगर।

 *

मोबाइल में व्यर्थ न उलझो

कुछ तो अच्छे कार्य करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०३ – ☆ कविता – केवल बुद्धि विलास न हो… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “केवल बुद्धि विलास न हो…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०३ ☆

☆ केवल बुद्धि विलास न हो… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

साथ कलम के कदम चले

तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो

अन्तर भी सच्चा हो ।

*

पन्नों पर पन्नें भरते हैं

बड़ी-बड़ी बातें करते हैं

लिखा, कहा जो भी है, उस पर

खुद ही कहाँ अमल करते हैं,

तोलें खुद को, फिर बोलें तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो…।

*

जीवन में कुछ ऐसा कर दें

सबके मन में खुशियां भर दें

अंधियारा हो जहाँ, वहाँ पर

दीपक आशाओं का धर दें,

रोते शिशु को अगर हँसा दें, कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो…।

*

जन-मन में अमृत रस घोलें

मीठे बोल सभी से बोलें

ऊंच-नीच वर्गों के बंधन

समता की चाबी से खोलें,

निश्छल मन सब गले मिले तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो, अंतर भी सच्चा हो।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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