हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ग़लती ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ग़लती ? ?

तुम्हें लगता रहा,

मेरी ग़लती थी,

मुझे लगता रहा

तुम्हारी ग़लती थी,

समय ने सिखाया,

अनुभव ने बताया-

हमारी ग़लती थी..!

?

© संजय भारद्वाज  

रात 8: 29 बजे, 23 नवंबर 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४१ ☆ # “मुश्किल है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मुश्किल है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४१ ☆

☆ # “कविता –  मुश्किल है…” # ☆

☆

इस रोज बदलती दुनिया में

रिश्तो को बचाना मुश्किल है

किस-किस को समझाएं हम

सबको समझाना मुश्किल है

 

कुछ तो जिद में अड़े हैं

जब से वह आपस में लड़े हैं

चुपचाप से दूर खड़े हैं

इनको आपस में मिलाना मुश्किल है

 

क्या दिखावे का यह संबंध है?

क्या दिखावे का यह प्रबंध है?

क्या दिखावे का यह प्रतिबंध है ?

यह गुत्थी सुलझाना मुश्किल है?

 

उनकी बातों में प्यार नहीं

उनकी आंखों में खुमार नहीं

उनकी सांसों में इसरार नहीं

उनको कुछ भी कह पाना मुश्किल है

 

रिश्तों पर टिका संसार है

रिश्ते जीवन का सार है

रिश्ते संबंधों का आधार है

टूटे रिश्तों को  जोड़ पाना मुश्किल है

 

टूटे हुए रिश्ते इस युग की पहचान है

कितने कशमकश में आज इंसान है

झूठी यह आन और शान है

जीते जी भावनाओं का मर जाना कितना मुश्किल है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मेरे सर पे सदा अपना हाथ रखना… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मेरे सर पे सदा अपना हाथ रखना…‘।)

☆ कविता – मेरे सर पे सदा अपना हाथ रखना… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

मेरी राम जी से इतनी सी बात कहना,

मेरे सर पे सदा अपना हाथ रखना।

 

सोना चांदी धन और दौलत,

मैं तो कुछ न मांगू,

नहीं चाहिए, मुक्ति और मोक्ष कभी न मांगू,

अपने चरणों में सदा मेरा वास रखना,

मेरे सर पे सदा अपना हाथ रखना।

 

भूल जाऊं तुम्हें, मद में भगवन,

संसार के चक्र में खो जाऊं,

पर तुम तो सदा मेरी याद रखना,

मेरे सर पे सदा, अपना हाथ रखना।

 

न केवल दुख में, सुख में भी तुमको याद करूं,

सभी सुखी हों, इस जग में इतनी सी फरियाद करूं,

जो मैं तुमसे कहूं, मेरी सदा बात रखना,

मेरे सर पे सदा, अपना हाथ रखना।

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५७ – सामयिक गीत – पुरुष दिवस ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सामयिक गीत – पुरुष दिवस।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५७ ☆

☆ सामयिक गीत – पुरुष दिवस ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

सामयिक गीत – पुरुष दिवस

०

पुरुष दिवस है

खैर मना नर

नारी की जयकार कर।

माँ, बहिना,

बीबी-बेटी को

कर प्रणाम, खैरात वर।।

.

भाभी, साली, सरहज

सम्मुख पड़े दिखाई

झट झुक जा।

काया माया छाया

मग में मिले

कदम तुरतई रुक जा।

नमन भवानी

कह वंदन कर

खुद पर ही उपकार कर।

पुरुष दिवस है

खैर मना नर

नारी की जयकार कर।

.

शारद-रमा-उमा की

जगकर जय कह

तब ही खैर है।

सिर न उठाना

मिले न खाना

खुद से खुद क्या बैर है?

उनको दे दे

हृदयासन तू

खुद को बंदनवार कर।

पुरुष दिवस है

खैर मना नर

नारी की जयकार कर।

.

जब तक राजी

तब तक काजी

बाल न बाँका कर सकता।

गर नाराजी

हर दिन भाजी

खा बिन मारे ही मरता।

पग-रज लेकर

शीश लगा झट

खुद पर खुद उपहार कर।

पुरुष दिवस है

खैर मना नर

नारी की जयकार कर।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ नदी की व्यथा… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता नदी की व्यथा।

? नदी की व्यथा ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

व्यथित उदास नदी

अपना अतीत याद करती है

पहाड़ों की प्यारी गोद से

जन्म लेकर

कैसे लहराती, इतराती

इठलाती ,कल कल करती

कांच सा पारदर्शी जल लिए

सफर पर निकली थी .

रास्ते की जड़ी बूटियां को

चूमती ,स्पर्श करती

अपने जल को औषधीय

रूप देकर

अमृत बनाकर

पतित पावनी बनकर

अनवरत बढ़ती गई

बढ़ती गई

सबका कल्याण करती गई.

 

फिर मानव का

लालच बढ़ा ,स्वार्थी हुआ

जहरीले रसायनों से

गंदगी के ढेरों से

जली अधजली लाशों से

जब चाहा

मेरे सीने को भर दिया .

मेरे पवित्र जल को

विषैला कर दिया

मैं रोती रही

कराहती रही

पर उसे तरस नहीं आया.

 

संतों, ऋषि मुनियों ने

की हमारी पूजा अर्चना

हमें दिया देवी का दर्जा

पर आज का मानव

निकला कितना कृतघ्न

हमारे अस्तित्व को

कूड़े के ढेर में

तब्दील कर दिया.

 

वर्षों से

मानव का अत्याचार

मनमानी झेल

अब थक गई हूं

मेरी कितनी ही बहनों ने

तंग आकर

आत्महत्या कर ली

पानी की जगह

रेत की नदियां बन गईं.

 

 पता नहीं कब

उसे अपनी भूल का

ज्यादतियों का एहसास होगा

और मुझे फिर से

पहले सा सम्मान

प्राप्त होगा !

 

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अभिन्न.. ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अभिन्न.. ? ?

अलग करने की

कल्पनाभर से अस्तित्व

धुआँ-धुआँ हो चला,

लेखन मुझमें है

या मैं लेखन में हूँ,

अबतक पता नहीं चला…!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रात: 5:58 बजे, 18.11.2020

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ११ – कविता – रिसते हुए रिश्ते… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “रिसते हुए रिश्ते…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ११ ?

? कविता – रिसते हुए रिश्ते… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

भूल गए और कहते हो, ये अपनापन है

रिश्तों में ना गर्माहट ना कोई तपन है

 *

बचपन में जो सिखलाया था, वह सब भूले

अब रिश्ता बस सुविधाओं का अनुबंधन है

 *

थोथे वादे, भाषण सारे और प्रलोभन

मुफ़्त बाँटने की बातें बस आयोजन है

 *

लक्ष्य तुम्हारा क्या है, हमने जान लिया है

साध्य नहीं इंसा, आसन का बस साधन है

 *

सिक्कों में बिकते देखे  हैं हमने सपने

महज़ नफ़े ही नफे़ के सौदों में चिंतन है

 *

भीड़ में भी चेहरा तन्हा-सा, बुझा-बुझा है

मन के भीतर उम्मीदों का मरा हिरन है

 *

भरता हुआ कुलाँचे बचपन कहाँ खो गया

जीवन में ‘राजेश’, जहाँ देखो उलझन है

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८४ ☆ गीत – ।। आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८४ ☆

☆ गीत ।। आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है।

आपका कृतित्व ही आपका    सम्मान बन    जाता है।।

**

अच्छी संगत जरूर जीवन में अच्छा ही रंग  पाता है।

आपकी अच्छी सोच को आपका साथ-संग ही लाता है।।

आपका दृष्टिकोण आपका जीवनअभियान बन जाता है।

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है।।

**

आपकी जीवन की हर समस्या निदान जीवन के पास है।

मत आत्म विश्वास को खोना यही जीवन की आस है।।

आपकी कार्यशीलता ही आपका सुपरिणाम बन जाता है।

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है।।

**

सफल व्यक्ति कभी भी समय   अनादर नहीं करते हैं।

असफलता हाथआती जब वक्त काआदर नहीं करते हैं।।

जब उलझने बढ़ाते नहीं तो जीवन आसान बन जाता है।

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४८ ☆ कविता – इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४८ ☆

☆ इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

चेहरा है शरीर का ऐसा अंग प्रधान

जिससे होती आई है हर जन ही पहचान।

 *

द्वेष भाव संसार में है एक सहज स्वभाव

जाता है बड़ी मुश्किल से कर ढेरों उपाय।

 *

स्वार्थ, द्वेष हैं शत्रु दो सबके प्रबल महान

जो उपजाते हृदय में लोभ और अभियान।

 *

होती प्रीति की भावना गुण-दोषों अनुसार

पक्षपात होता जहाँ दुखी वही परिवार।

 *

जिनका मन वश में सदा औ खुद पर अधिकार

उन्हें डरा सकता नहीं कभी भी यह संसार।

 *

इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार

वैसा करता काम जन जैसा सोच विचार

 *

बहुतों को होता नहीं खुद का पूरा ज्ञान

क्योंकि उनकी बुद्धि को हर लेता अभिमान।

 *

हर एक जैसा सोचता वैसे करता काम

सहना पड़ता भी किये करमो का परिणाम।

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७२ – नवगीत – विश्वासों की होरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – विश्वासों की होरी…।

? रचना संसार # ७२ – गीत – विश्वासों की होरी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।

मिला प्रीति में देख छलावा,

रोती जीवन भर ये गोरी ।।

*

खंडित युगों-युगों से होती,

विश्वासों की नैया देखो।

खेवनहार डुबोते इसको,

बीच भँवर में भैया देखो।।

मिलता इसको कहाँ किनारा,

लिपटी घातों की है डोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

**

स्वार्थ भरा नाते-रिश्तों मे,

मानवता भी घायल होती।

बाजारों में छम-छम बजती

पायल की रुन-झुन भी रोती।।

डसने को अजगर बैठे हैं,

नित्य करे वे जोरा -जोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

**

दौलत में अंधा हर कोई,

छुरी पीठ पर नित चलती है।

धर्म-कर्म सब भूले बैठे,

मानवता हरपल छलती है।।

बुझी नेह की ज्योति जगत् में,

भूले बचपन की भी लोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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