हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९९ – प्रायमरी का मास्टर…४ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९९ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…४ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

आप जानते हैं

समाज के रजिस्टर में

प्राथमिक शिक्षक

सबसे निचली श्रेणी में दर्ज है?

 

किसी ने कहा था-

इसमें क्या हर्ज है,

वो तो छोटे बच्चों को पढ़ाता है

इसलिये छोटी रकम पाता है,

बेवकूफ है,

क्यों चिल्लाता है।

 

मैं नहीं जानता कि

ऐसी बेतुकी बात कौन कहता

या कि लिखता होगा,

ये बात तय है कि

ऐसा कहने वाला

स्कूल के दिनों में

खूब पिटता होगा।

खैर !

 

उस कमबख्त से क्या लेना है

मुझको या आपको

चलने दें वार्तालाप को।

 

ये सही है कि

वो गधे का पढ़ाता है।

पर ये गलत नहीं है कि

वो गधे को आदमी बनाता है,

उसे दिल्ली, भोपाल या विदेशों में,

पहुँचाता है

कभी गौर किया है कि

वो बदले में क्या पाता है।

जी,

वो लहू के घूँट पीता है।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९६ – “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

चला डूबने हो पश्चिम में

ज्यों दिनमान, पिता ।

गया उतारा बड़े मंच से

वह विद्वान, पिता ॥

 

बने रहे गम्भीर थमे जल से

तो थे लेकिन ।

लहर गरीबी की न थका

पायी थी उनका मन ।

 

हर कठिनाई में वे ढूँड

लिया करते अवसर ।

थे हरेक विपदा को सहने

का अभिमान, पिता ॥

 

यह उनका अदम्य साहस

सबको आदर्श रहा।

लोगों में उन के चरित्र

का बड़ा विमर्श रहा ।

 

उनके पदचिन्हों पर

चलने होड़ लगी रहती ।

घर के सारे सभी जनों के

थे सम्मानपिता ॥

 

परिचित, रिश्तेदार कभी

जब आपस में मिलते ।

अपने सम्वादों में चर्चा

उनकी ही करते ।

 

उनके सद्कर्मों की छाया

बनी हुई हम पर ।

इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के

थे प्रतिमान, पिता ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

05-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जलप्रलय… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जलप्रलय? ?

चम्मच, कटोरी,

प्याली, कड़छी,

हरेक, आदिग्रंथों में

वर्णित जलप्रलय

की धमकी देता रहा,

उधर अथाह समंदर,

पेट में पानी लिए,

चुपचाप मुस्कराता,

मंद-मंद बहता रहा..!

?

© संजय भारद्वाज   

3:15 बजे दोपहर, 17.10.2018

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥 

आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७८ ☆ # “पवित्र बंधन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “पवित्र बंधन…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७८

☆ # “पवित्र बंधन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

रक्षाबंधन

सिर्फ धागों का नहीं

दिलों का बंधन है

इस पवित्र बंधन को

शत-शत वंदन  है

इसमें छुपा है

भाई बहन का प्यार

सदियों से गवाह है

यह सारा संसार

कितने स्नेहमय लगें

यह रेशम के धागें

जिनकी कोई बहन नहीं

वे हैं कितने अभागे

इसमें छुपी है

बचपन से

यौवन तक की

साथ बिताई बातें

भूखे प्यासे रहकर

साथ काटी रातें

अभाव में भी खुश रहकर

कैसे पड़ता है जीना

एक दूजे का सहारा बनकर

हर दुख पड़ता है जीना

बहन के सुख दुख में

शामिल होता है भाई

राखी बंधवाकर

रक्षा करने की

उसने कसम है खाई

काल का चक्र भी

यह खुशियां ना लूटें

भाई बहन का रिश्ता

जन्म जन्म तक ना टूटें

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२२ – भारत मां का ये प्रहरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता भारत मां का ये प्रहरी।)

☆ अभिव्यक्ति # १२२ ☆

☆ भारत मां का ये प्रहरी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

याद नहीं करते हम,

सीमा पर त्योहारों को.

अपने खून से होली खेलें,

बचा रहे परिवारों को.

*

स्त्रोत नहीं पूछा करते,

शूरों का और तारों का.

हथियार उठाते हैं जब,

ख्याल नहीं है वारों का.

*

खुद के अरमाँ, खुद के सपने,

दूर हो गए, सारे अपने.

बच्चों की किलकारी भी,

लगती जैसे हों सपने.

*

देश की पावन मिट्टी का,

माथे पर तिलक लगाता हूं.

भारत माता की पुकार पर,

हाथों पर शीश, सजाता हूं.

*

देश की सीमा को अपने,

खून से अपने सजाया है.

दुश्मन कैसे भी आया हो,

हमने उसे दूर भगाया है.

*

सर्दी हो या गर्मी की लू,

दिन हो या, रातें गहरी.

सजग सतर्क हमेशा है,

भारत मां का ये प्रहरी..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५० – चमत्कार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३५० चमत्कार… ?

कभी किसी को कहते सुनते हैं कि आज तो चमत्कार हो गया! क्या है चमत्कार होना? स्थूल रूप से विचार करें तो मनुष्य के लिए जो अकल्पनीय है, ‘लार्जर देन लाइफ’ है, वही चमत्कार है। चमत्कार की विशेषता है कि वे सुनने में आते हैं पर दिखते नहीं। यद्यपि प्रकृति इसका अपवाद है। वहाँ हर क्षण चमत्कार उद्घाटित हो रहे होते हैं, बशर्ते हम उन्हें देखना चाहें।

लौटते हैं मूल विषय पर। चमत्कार एक अलग ही प्रकार की विडंबना का शिकार है। यदि वह आँखों से प्रत्यक्ष दिख गया तो फिर उसे चाहे जो नाम दें पर चमत्कार नहीं रह पाता। चमत्कार का दर्शन ही चमत्कार का विसर्जन है। इस संदर्भ में चमत्कार अभागा है, इस संदर्भ में चमत्कार एकमेवाद्वितीय है।

वस्तुत: चमत्कार कोई वाह्य बल या एक्सटर्नल फोर्स नहीं है। अपनी विसंगतियों से जूझते मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा कर गुज़रने की इच्छा होती है जो उसे सारी कठिनाइयों से पार कर ऊँचे, बहुत ऊँचे स्थापित कर दे। कभी विवशता के क्षणों में मनुष्य कल्पना करता है कि कुछ ऐसा हो जाए कि सारी समस्याएँ क्षण भर में अदृश्य हो जाएँ। कभी चाहता है कि परेशानियों का सामना किए बिना वे छू-मंतर हो जाएँ। प्राय: कामना करता है कि परिश्रम किए बिना ही रातों-रात उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो जाए। अपनी सारी वांछनाओं को पलक झपकते ही पाने का मानसिक माध्यम होता है चमत्कार।

ब्रह्मांड में चमत्कार होते हैं या नहीं, यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है। तथापि मनन करें तो मनुष्य का अस्तित्व अपने आप में चमत्कार उत्पन्न करने का बहुत बड़ा साधन है। दर्शन की एक धारा देह में ब्रह्मांड का दर्शन करती है। ब्रह्मांड समस्त अस्तित्व  का समुच्चय है। इसमें पदार्थ एवं ऊर्जा के सभी रूप तथा उनके द्वारा निर्मित लघुत्तम से महत्तम सभी संरचनाएँ सम्मिलित हैं।

ब्रह्मांड का लघु रूप पिंड या देह है। देह का विस्तार ब्रह्मांड है। एक तरह से देह, ब्रह्मांड का मॉडल है, छोटे आकार की रेपलिका है। मन, प्राण और देह मिलकर संभावनाओं का समुच्चय बनता है।

प्राण को परिभाषित करते हुए शाखायान आरण्यक कहता है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः।

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्रज्ञा मनुष्य में अस्तित्व फूँक देती है। व्यष्टि को समष्टि की व्यापकता प्रदान करने की प्रकृति है प्रज्ञा‌। प्रकृति ब्रह्मांड का एक अंग है। जैसाकि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, प्रकृति में  निरंतर चमत्कार देखने को मिलते हैं। स्वाभाविक है कि प्रकृति के अंश मनुष्य में भी चमत्कार उद्घाटित करने की क्षमता अंतर्निहित है।

चमत्कार फलीभूत करने के लिए कार्य करना होगा।  कार्य को परिभाषित करते हुए विज्ञान कहता है कि  जब किसी वस्तु पर कोई बल लगाया जाता है और वस्तु उस बल की दिशा में विस्थापित होती है तो इसे बल द्वारा किया गया कार्य कहा जाता है। कार्य के लिए संकल्प, कर्मनिष्ठा और कठोर परिश्रम आवश्यक हैं।

अतः चमत्कार की प्रतीक्षा मत करो। चमत्कार के घटने  का माध्यम बनो। मनुज की देह मिली है, प्रज्ञा मिली है। अपार संभावनाएँ तुम्हारे पास हैं।

जैसे रीछपति जामवंत ने हनुमान जी उनकी क्षमताओं का स्मरण कराया था, वैसे ही आवश्यकता है अपनी क्षमताओं को स्मरण करने की, उनके अनुसार अपना समुद्र पार करने की।

‘चमत्कार’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-

चमत्कार,

चमत्कार,

चमत्कार..!

 

चमत्कार के किस्से

 

सुने सदा,

चमत्कार घटित होते

देखा नहीं कभी,

अपनी क्षमताओं का

चमत्कार

 

उद्घाटित करो,

फिर  चमत्कार को

अपनी आँख के आगे

घटित होते देखा करो..!।

‘स्मरण करने’ इसलिए कहा कि कोई दूसरा स्मरण नहीं कराएगा। अतः स्मरण रहे कि

जांबवंत तुम्हारे भीतर हैं, और हनुमान जी भी।

अब भी किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है क्या?

© संजय भारद्वाज 

रात्रि 12:37 बजे, 18.08.2026 (इसी विचार के साथ नींद खुली।)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दावे हवा हुए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – दावे हवा हुए…!

☆ ॥ कविता॥ दावे हवा हुए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

हर  तरफ  हाहाकार है,

लहरों की फुँफकार है।

*

प्रकृति तबाही पर तुली,

त्राहिमाम औ’ गुहार है।

*

मुखर जीवन मौन हुआ,

हर  जगह बिछी गार है।

*

प्रगति के दावे हवा हुए,

सरिता  हुई पारावार है।

*

ठौर  सैलाब में बह गए,

हुकूमत  हुई लाचार है।

*

बड़ी  बेरहम है कुदरत,

मदाँधता देती उतार है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “एक अहम फ़िलासफ़ी है यह” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – एक अहम फ़िलासफ़ी है यह … ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

ज़िंदगी में बहुत कुछ सोचा..

ख्वाहिशें की, हसरतें भी पाली,

कुछ पूरी हुईं, कुछ अधूरी रहीं,

कुछ मयस्सर ही न हुईं।

लेकिन कोई गिला- शिक़वा नहीं,

इस बात का।

हम भी अपने जीवन में ..

किसको क्या कुछ दे पाते हैं,

बस लेते ही तो रहते हैं।

और इसी मानसिकता में कुंठित भी रहते हैं।

ये नहीं हुआ, वो नहीं मिला ???

सोचिये ज़रा, क्या यही ज़िंदगी का हासिल है,

मेरे ख़याल से कतई नहीं।

देने वाला बनने में जो खुशी और सुकून है,

वह लेने वाला बनने में नहीं है।

मैंने आजमा कर महसूस किया..

आपने भी शायद किया हो —

न किया हो तो करियेगा,

इसका आनंद ही कुछ और है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २९१ – सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण…)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९१ ☆

☆ सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

कहती हैं उज्ज्वल भविष्य पर, शिक्षक ही उपलब्ध नहीं।

जो हैं द्रोणाचार्य, एकलव्यों सा है प्रारब्ध यहीं।।

विश्वमित्र-संदीपनी गायब, राम-कृष्ण होंगे कैसे?

शोषित-पीड़ित शिक्षक जीवन बिता रहा जैसे-तैसे।।

धृतराष्ट्रों के वंशज पैलेट साध निशाना दे मारें।

शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।।

.

गुरुकुल पूँजीपति के हाथों बेच, किया है बंटाढार।

सरकारी शालाएँ बंजर, छलें दिखा भोजन उपहार।।

हैं नियुक्ति में घपलेबाजी, ट्रांसफर में नीलामी है।

प्रश्न पत्र बिकते बजार में, जहाँ देखिए खामी है।।

बनें जगद्गुरु लेकिन देख न पाएँ पीढ़ी है लाचार।

शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।

.

अन उपयोगी बने पाठ्य क्रम, डिग्री मिलती काम नहीं।

अति खर्चीली शिक्षा जिसका दो कौड़ी भी दाम नहीं।।

पढ़ा विदेशों में निज बच्चे नेता अफसर लूटें देश।

माँगे नवजवान पीढ़ी दो काम, न नोचे जनता केश।।

मत डालो मंदिर में डाका, भेज रहे प्रभु दुत्कारें।

शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(ए२/५ सोमनाथ-जबलपुर एक्सप्रैस)/२७.७.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – झुर्रियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – झुर्रियाँ? ?

देखता, समझता, पढ़ता हूँ

दहलीज़ तक आ पहुँची झुर्रियाँ,

घर के किसी रैक पर

कभी सलीके से धरी,

कभी तितर-बितर पड़ी

तो कभी फटे टुकड़ों में सिमटी,

बासी अख़बार की तरह उपेक्षित झुर्रियाँ..,

गुमान में जीते

नये अख़बारों को पता ही नहीं

कि ख़बरें अमूमन वही रहती हैं,

बस संदर्भ ताज़ा होते हैं और

तारीख़ें बदलती रहती हैं,

और हाँ, दिन, हर दिन ढलता है,

हर दिन नया अख़बार भी निकलता है!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 8:33 बजे, 24.8.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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