हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८० – सुमित्र के दोहे ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है,  सुमित्र के दोहे।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८०

☆ सुमित्र के दोहे ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

जीवन के वनवास को, हमने काटा खूब।

अंगारों की सेज पर, रही दमकती दूब।।

 *

एक तुम्हारा रूप है, एक तुम्हारा नाम ।

धूप चांदनी से अंटी, आंखों की गोदाम।।

 *

केसर, शहद, गुलाब ने, धारण किया शरीर ।

लेकिन मुझको तुम दिखीं, पहिन चांदनी चीर।।

गंध कहां से आ रही, कहां वही रसधार ।

शायद गुन गुन हो रही, केश संवार संवार।।

 *

सन्यासी – सा मन बना, घना नहीं है मोह।

ले जाएगा क्या भला, लूटे अगर गिरोह ।।

 *

कुंतल काले देखकर, मन ने किया विचार ।

दमकेगा सूरज अभी जरा छंटे अंधियार।।

इधर-उधर भटका किए, चलती रही तलाश।

एक दिन उसको पा लिया, थीं सपनों की लाश।।

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७९ “अनगिन सुख की बरसातें…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत अनगिन सुख की बरसातें...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७९ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अनगिन सुख की बरसातें...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

माँ के पास बैठ कर सोन –

चिरैया की बातें ।

सुनता रामभरोसे कैसी

सन्तावन सातें –

 

होती है बच्चों की

खातिर,हर छठ की पूजा ।

अपामार्ग की दातुन कर

रखती माँ व्रत दूजा ।

 

महुये के पत्ते  में रख कर

चना और लइया –

बाँट  दिया करती प्रसाद

में अनगिन सौगातें ॥

 

सात पुये रख हाथ और

चाँदी का एक सिक्का ।

खुश होकर ले गये साथ

जिसको पंडित कक्का ।

 

सबके हाथ बाँधकर रक्षा –

सूत्र यहाँ जैसे –

करते हैं इस माह देवता

कई कई बारातें ॥

 

मन-विज्ञान तीज त्योहारों

का महिलाओं को ।

देता आत्मतोष संबल सब

समिति, सभाओं को ।

 

धरती यह बुन्देल खंड की

धर्मवती शुभदा –

धर्म ध्वजा ले होती

अनगिन सुख की बरसातें ।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

09-04-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जननी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जननी  ? ?

वह माँ, वह बेटी,

वह प्रेयसी, वह पत्नी,

वह दादी, नानी,

वह बुआ, मौसी,

चाची, मामी वह..,

शिक्षिका, श्रमिक,

अधिकारी, राजनेता,

पायलट, ड्राइवर,

डॉक्टर, इंजीनियर,

सैनिक, शांतिदूत,

क्या नहीं है वह..,

योगेश्वर के

विराट दर्शन में

हर रूप की

जननी है वह..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक  संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७६ – सॉनेट – आशा ताई ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सॉनेट – आशा ताई)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७६ ☆

☆ सॉनेट – आशा ताई ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

(शेक्सपिअरी शैली)

आशा ताई अभिनव आशा

गूँज वाक् में थी अनहद की।

स्वर-सरगम की नव अभिलाषा

सीमा थी असीम सरहद की।।

आत्मिक तेज व्याप्त गायन में

क्षण-क्षण सुने सिहर जाता था।

ब्रह्म नाद था उच्चारण में

कण-कण बँधा बिखर जाता था।।

धरा सुता हे भारत तनया!

सुर प्रेमी उर अगणित ध्याएँ।

गीत-ग़ज़ल सुन भाग्य सराहें

शब्द-शब्द में अमरित पाएँ।।

गईं धरा को तुम सूना कर।

दर्द लता दी का दूना कर।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ स्मृतिशेष आशा भोसले विशेष – संगीत कभी मरता नहीं – कवि: अज्ञात ☆ संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆ स्मृतिशेष आशा भोसले विशेष – संगीत कभी मरता नहीं – कवि: अज्ञात ☆ संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे☆

सिर्फ़ खून का रिश्ता नहीं था उनका,

सुरों का, साँसों का, और समय का रिश्ता था।

चार साल का फ़ासला,

एक 1929 में जन्मी, दूसरी 1933 में…

 

लेकिन जब गाती थीं, तो लगता था

जैसे एक ही आत्मा दो आवाज़ों में उतर आई हो।

 

फिर समय ने भी जैसे उनकी कहानी को

एक अजीब-सी समरूपता में ढाल दिया—

 

चार साल का ही अंतर…

 

एक ने 2022 में विदा ली,

दूसरी 2026 में…

 

दोनों ने 92 साल की उम्र देखी,

दोनों ने रविवार को आख़िरी साँस ली,

और दोनों ने उसी जगह से अलविदा कहा,

ब्रीच कैंडी अस्पताल…

 

क्या यह महज़ संयोग था?

या नियति ने भी उनकी जुदाई को

एक लय, एक ताल में बाँध दिया था?

 

लता मंगेशकर और आशा…

ये सिर्फ़ नाम नहीं थे,

ये भारतीय संगीत की दो धड़कनें थीं।

 

एक ने भक्ति, दर्द और पवित्रता को स्वर दिया,

दूसरी ने जीवन, शरारत और जुनून को।

 

लेकिन अंत में…

दोनों की कहानी एक ही सच्चाई पर आकर ठहरती है,

संगीत कभी मरता नहीं।

 

आज अगर आशा ताई (मराठी में बड़ी बहन) होतीं,

तो शायद मुस्कुराकर अपनी लता ताई से यही कहतीं,

 

“दीदी, अब मैं भी आ रही हूँ…

वहीं, जहाँ सुर कभी ख़ामोश नहीं होते…”

 

और शायद कहीं…

आसमान के उस पार,

फिर से शुरू हो गया होगा एक अनंत रियाज़।

 

दो बहनों का,

दो दिग्गजों का…

जो अब इतिहास नहीं,

अमर गूंज बन चुकी हैं।

🙏🏻

साभार – सोशल मीडिया

#AshaBhosle 

कवि – अज्ञात 

संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

संपादिका ई-अभिव्यक्ति (मराठी)

९८२२८४६७६२

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६० ☆ # “प्रकाश पुंज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “प्रकाश पुंज…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६० ☆

☆ # “प्रकाश पुंज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

(14 अप्रैल डा आंबेडकर जयंती पर विशेष)

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

ताप से जिसके बेड़ियों का लोहा

धीरे-धीरे पिघला था

 

बह रहा था लहू

जख्मी हाथ और पांव से

बहिष्कृत थे हम

समाज और गांव से

दूषित हो जाते थें लोग

अशुचि हमारी छांव से

प्रभाकर की प्रभा से

जल उठा गरल

जो हमने निगला था

चीरकर सदियों  का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

कुआं हमने खोदा

पर जल पर हमारा हक नहीं था

फसल बोई, काटी

पर अन्न पर हमारा हक नहीं था

पौधा लगाया वृक्ष बनाया

पर फल पर हमारा हक नहीं था

लिखकर नया अध्याय

उसने पुराना अध्याय बदला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

शिक्षित बनो यह मंत्र देकर

उसने अभियान चलाया

संगठित रहो यह मन्त्र देकर

उसने अभिमान जगाया

संघर्ष करो यह तंत्र देकर

उसने स्वाभिमान बढ़ाया

जीने की राह दिखाने

वह प्रकाश पुंज अकेला निकला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

तूफानों से लड़कर

पर्वतों में राह बनाई

बुझीं बुझीं आंखों में

जीने की चाह जगाई

कमजोरों को गले लगा कर

सबको अपनी बांह थमाई

शक्तिमान बनाया समाज को

जो कभी दुबला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

उसने आसमान को झुकाया

विद्वत्ता के दम पर

उसने जर्रे जर्रे को चमकाया

उपकार किया हम पर

उसने रोशनी का दिया जलाया

वार किया तम पर

आलोकित हुए पथ पर

जन सैलाब उबला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

 

दया करुणा प्रेम हो जिसमें

वही सच्चा इंसान है

वंचितो शोषितो पीड़ितों के

हर सांस का वह प्राण है

रोम रोम में बसा

वह मानव नहीं भगवान है

रूढ़ियों को तोड़कर

जिसने व्यवस्था को बदला था

चीरकर सदियों का अंधेरा

सूर्य हमारा निकला था

ताप से जिसके बेड़ियों का लोहा

धीरे-धीरे पिघला था /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०३ – मुझे, उपग्रह ही रहने दो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता मुझे, उपग्रह ही रहने दो।)

☆ अभिव्यक्ति # १०३ ☆ मुझे, उपग्रह ही रहने दो☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

चांद कुछ कहता रहा,

कहा कुछ,

हम, समझे कुछ,

उसने कहा था,

किसने कहा, कि मुझे,

सौंदर्य की, उपमा दो,

किसने कहा कि,

मुझे पृथ्वी का भाई,

बना दो,

कुछ भी, करते हो,

कुछ भी, कहते हो,

मुझे, उपग्रह ही रहने दो,

पृथ्वी का, छोटा सा,

मुझे निश्छल भाव से,

परिक्रमा करने दो, पृथ्वी की,

सागर से लगाव, रहने दो,

मुझे पृथक न, करो,

अपनो से,

बस चांद ही रहने दो.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ठोस आधार नहीं है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – ठोस आधार नहीं है…!

☆ ॥ कविता॥ ठोस आधार नहीं है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

कोई रुकने को, कोई झुकने को तैयार नहीं है,

इस  जग में कोई किसी का सच्चा यार नहीं है।

*

जिसे  देखो झूठा, आडंबर का जीवन जी रहा है,

ऐसा कौन है  जिसके नामे-लिखा उधार नहीं है।

*

वैसे, तो लोग आदर्शों, उसूलों की बातें करते हैं,

पर  बातों में भरोसे की पहले वाली धार नहीं है।

*

हर कोई तारीफ़ का भूखा है, बर्ताव से रूखा है,

स्वार्थ के रिश्ते-नाते, माँगे मिलता प्यार नहीं है।

*

पागलों के से जो सपनों के पीछे भागे जा रहे हैं,

पर  उनके कदमों  के नीचे ठोस आधार नहीं है।

 

एक-दूसरे को सभी शक की नज़रों से देख रहे,

विडंबना  देखिए अपनों में बचा एतबार नहीं है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ वजूद… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ वजूद… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

वह तो निखर गयी, मै तो बिखर गया

लगता वजूद मेरा, वो आज मर गया

कैसा जुनून मेरा, नादान प्यार था

खाई दिखाइ ना दी, उस में उतर गया

 *

हर बार मात खाई, इख़लास ना मिला

ना ही बदल गया मै, ना ही सुधर गया

 *

देखा शहर शहर में, बाजार प्यार का

फिर गाँव छोडकर मै, ना तो शहर गया

 *

कांटे भरे पडें थे, अंजान राह पर

उस राह पर अकेला, मै तो गुजर गया

 *

अनबन हुई जरा क्या, दोनो अलग हुये

फिर वो इधर न आई, ना मै उधर गया

 *

उलझन भरा सफर है, आँसू भरा समाँ

हर एक एक लम्हा, ऐसे गुज़र गया

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७५ – ग़ज़ल – हरिऔध  ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़ल – हरिऔध )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७५ ☆

☆ ग़ज़ल – हरिऔध ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

(अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध'(15 अप्रैल, 1865-16 मार्च, 1947) हिन्दी के कवि, निबन्धकार तथा सम्पादक थे।)

हिंदी माँ के पुत्र यशस्वी हैं हरिऔध।

देह मिट गई सृजन सनातन हैं हरिऔध।।

.

प्रिय प्रवासकर रहे जहाँ है लोक जगत।

राधा-विरह लोक हित से जोड़ें हरिऔध।।

.

कृष्ण न केवल व्यक्ति, समष्टि समाए हैं।

निज सुख का परित्याग निरंतर है हरिऔध।।

.

वैदेही वनवासत्याग-तप की गाथा।

सहन शक्ति नारी की, गायक हैं हरिऔध।।

.

मंत्र-तंत्र है प्रकृति-चित्रण अलबेला।

मातृभूमि की चरण वंदना हैं हरिऔध।।

.

गौरव गान विरासत का संबल बनता।

शीश उठाकर जीने का परचम हरिऔध।।

.

सत्य-अहिंसा-जनसेवा को लक्ष्य बना।

स्वतंत्रता सत्याग्रह विजय ध्वजा हरिऔध।।

.

दृष्टि कलात्मक फूल अधखिलालोक जुड़ी।

निज भाषा सम्मान प्रवर्तक हैं हरिऔध।।

.

ऐक्य भाव, समरसता, सत्याग्रह, जनहित

जन कल्याण, लोक सेवा राही हरिऔध।।

.

सुरवाणी-जनवाणी का छांदस संगम।

ठाठ ठेठ हिन्दी काहै चोखा हरिऔध।।

.

वर्ण वृत्त से सजे चौपदे चोखेहैं।

राष्ट्रवाद के सच्चे गायक हैं हरिऔध।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१०.४.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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