हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – नि:शब्द ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – नि:शब्द ? ?

एक तुम हो

जो अपने प्रति

नि:शब्द रही जीवन भर,

एक मैं हूँ

जो तुम्हारे प्रति

नि:शब्द रहा जीवन भर..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४८ – कविता – घृणित कृत्य ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ घृणित कृत्य ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

प्रकृति का खेल बिगाड़ोगे तो, प्रकृति भी खेल बिगड़ेगी ।

पशु पंक्षी को यदि मारोगे तो, प्रकृति भी तुमको मारेगी।।

*

धरती पर तेरा शासन है,    यह भ्रम क्यों तेरे अन्दर है।

जंगल तेरा पर्वत तेरा,            तेरा ही नदी -समुन्दर  है ।।

*

वह झील किनारे बैठी थी,   लखती थी राह विहंगों की।

वह उनसे बातें करती थी,       मैत्री परदेशी परिंदों की ।।

*

वे परदेशी परिंदे थे,          सुंदरता गजब निराली थी।

वे पक्के शिखर विजेता थे,   चालें उनकी मतवाली थीं।।

*

वे इक दूजे को तकते थे,       नर -पक्षी प्रेम निराला था।

आयी टोली शिकार वाली, मन में भीतर कुछ काला था।।

*

गोली बंदूक की निकल गई, एक पक्षी तड़पा लुढ़क गया।

बच्ची ने आह भरी कसकर, रुध गया कंठ और जकड गया।।

*

रे दुष्ट हृदय तूँ बैरी है,     क्यों भूला अपना आतिथ्य धर्म।

तूने जघन्य अपराध किया,      रे पापी कर डाला अधर्म।।

*

परिणाम भयंकर झेलेगा,            तूने कर डाला महा पाप।

अति निम्म कोटि का कर्म किया, देती हूं तुमको कठिन श्राप।।

*

एक वर्ष अभी बीता भी न था,   छाया घन क्रूर करोना का।

साथी संग स्वर्ग सिधारा वह,      हो गया वही जो होना था।।

*

दुनिया ने देखा कठिन क्रोध,     कैसे प्रकृति धारण करती ।

समय चक्र सबने देखा,      मानवता बिनु मारे कैसे मरती।।

*

काव्य कथा के पृष्ठ कथा,         सचमुच सहेज कर रखेंगे ।

ये घृणित पंथ के अनुगामी, इस कविता से कुछ तो सीखेंगे।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २७ – कविता – प्रबोधन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “प्रबोधन“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २७ ?

? कविता – प्रबोधन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

—-1—

कोई तो जन-नायक आए, जिसका यह उद्बोधन हो

शास्त्रों में भी संविधान-सा, अब समुचित संशोधन हो

—-2—-

अपने बँगले में जो कुत्ते-बिल्ली पाले बैठे हैं

वो हमसे कहते हैं ‘बिरझू’ तेरे घर में गोधन हो

—-3—–

अर्जुन-भीम-युधिष्ठिर पर भी, वैसा ही अभियोग लगे

चीर-हरण प्रकरण में दोषी, केवल क्यों दुर्योधन हो

—-4—–

बने तथागत मेरा अपना कोई यदि तुम सोच रहे

ख़ुद का तो अवलोकन कर लो, तुम कितने शुद्धोधन हो

        —5—

अग्नि परीक्षा दंश दहेज़ी, शोषण हर युग में सहती

तोड़ो अंध-मूक परिपाटी, नारी हित अनुशोधन हो

—6—–

अनपढ़-अपराधी न पहुँचें, संसद के गलियारों में

चयन के मानक मापदण्ड का, बहुमत से अनुमोदन हो

—-7—-

वादे उनके सच बनकर यदि, उतरें नहीं धरातल पर

फिर मुखिया का लाल किले से, क्यों झूठा सम्बोधन हो

—8—-

बेक़ारी महँगाई ग़रीबी, जात-पाँत के मुद्दों को

सुलझाने यह चले कारवाँ, ना कोई अवरोधन हो

—9—

चलो उड़ा दें ज्ञान के बल पे, पाखण्डों के परखच्चे

जन-जन में ‘राजेश’ मनन हो, चिंतन-तर्क प्रबोधन हो

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०० ☆ गीत – ।। मैं एक कलम का सिपाही हूँ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०० ☆

☆ गीत ।। मैं एक कलम का सिपाही हूँ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।।विधा।।पद्य(छंद मुक्त)तुकांत।।

=1=

मैं राजनीति का मंच हूँ।

मैं लिये व्यंग का तंज हूँ।

मैं विरोधी  पर  पंच हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=2=

मैं भूख का निवाला  हूँ।

मैं मंदिर और शिवाला हूँ।

मैं देश का  रखवाला हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=3=

मैं सबकी सुनता कहता हूँ।

नहीं अपने में ही  रहता हूँ।

शीतल जल  सा बहता हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=4=

मैं  एक शिकारी  भी हूँ।

मैं खुद   शिकार भी हूँ।

पर रहता खबरदार भी हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=5=

मैं रखता  हर  खबर हूँ।

मैं करता खबरदार भी हूँ।

मानो तो मैं अखबार ही हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=6=

मुझ से तेज़  धीमा नहीं है।

मेरे सा कोई नगीना नही है।

मेरी तो कोई सीमा नहीं है।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=7=

मैं बच्चों  का  उत्पात हूँ।

मैं बड़ों का वादविवाद हूँ।

मैं बुजर्गों का आशीर्वाद हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=8=

मैं ऊपर ऊंचा   नभ  सा हूँ।

मैं कठोर  जैसे  थल सा हूँ।

मैं कलकल बहता जल सा हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=9=

में जीवन का मर्म हूँ।

मैं सख्त और नर्म हूँ।

मैं धर्म और  कर्म हूँ ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=10=

मैं गरीब की हाय हूँ।

नहीं मैं  असहाय हूँ।

मैं सर्वपंथ सुखाय हूँ।।

=11=

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

मैं समाज का    दर्पण हूँ।

मैं ईश चरणों में  अर्पण हूँ।

मैं सूचनाओं को समर्पण हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=12=

मैं मन का   स्पंदन हूँ।

मैं राष्ट्र का    वंदन हूँ।

मैं सच का अभिनंदन हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=13=

मैं लिए हर शब्द भी हूँ।

मैं  निःशब्द   भी हूँ।

मैं सदैव उपलब्ध भी हूँ।।

=14=

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

भूत,भविष्य,वर्तमान बात बतलाता हूँ।

लोगो को सचेत कर के भी जागता हूँ।

कलमआईने से हकीकत दिखलाता हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=15=

मेरी दुर्गम  सी  डगर है।

मुझमे भी अगर  मगर है।

मेरी वाणी अजर अमर है।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६३ ☆ कविता – श्रमिक… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – श्रमिक। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६३

☆ श्रमिक…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दुनियाँ वही धनी निर्धन की लेकिन बँटी बंटी

आपस के व्यवहारो में पर कभी न बात पटी

फिर भी धनिकों की सेवा में रहे गरीब डटे

*

धन ने श्रम को दिया प्रताड़ित कभी न स्नेह दिया

तब भी श्रमिकों ने धनियों का सेवा कार्य किया

कटीनाई आने पर भी कभी पीछे नहीं हटे

*

मन में साधे कल की आशा , सब दुख-दर्द सहे

करते मदद सदा धनिको की आगे रहे खड़े

मुँह को  बाँधे हाथ बढ़ाये पहने वस्त्र फटे

*

दोनों की आशा अभिलाषा में अन्तर भारी

मन को मारे मजदूरी में उम्र कटी सारी ॥

बीमारी में न बोले, वेतन भले कटे ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८९ – गीत – नवनिर्माण… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतनवनिर्माण

? रचना संसार # ८९ – गीत – नवनिर्माण…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

बीती बातें भूले हम सब,

आओ नवनिर्माण करें।

नवल रचें इतिहास पुनः अब ,

जन-जन का कल्याण करें।।

*

रहे मीत सच्चाई के हम ,

झूठों से मुख मोड़ चलें।

निश्छलता हो प्रेम सुधा रस ,

भेद-भाव को छोड़ चलें।।

सबक सिखा कर जयचंदो को,

हर दुख का परित्राण करें।

*

बने तिरंगे के हम रक्षक,

शत्रु  भाव का अंत रहे।

शीश झुका दे हर रिपु का हम,

हर ऋतु देख वसंत रहे।।

देश भक्ति की रहे भावना,

न्योछावर हम प्राण करें।

*

नैतिकता की राह चलें हम,

भौतिकता का त्याग रहे।

मानवता की कर लें सेवा,

दुखियों से अनुराग रहे।।

अंतस बीज प्रेम के बोएँ,

पाठन वेद -पुराण करें।

*

राम -राज्य धरती पर लाएँ,

अपनों का विश्वास बनें।

तोड़ बेड़ियाँ अब सारी हम,

भारत माँ की आस बनें ।।

रूढिवाद को दूर भगाकर,

हम कुरीति  निर्वाण करें।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विस्मृति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विस्मृति ? ?

उसके अक्षम्य अपराधों की

सूची बनाता हूँ मैं

फिर एक-एक कर

क्षमा करता जाता हूँ मैं,

वह भी शायद

ऐसा ही कुछ करती है

विस्मृति की कोख में

स्मृति पलती है।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम,

कण-कण में बसने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

सूरज चाँद सितारे तेरी महिमा गाएँ,

नदियाँ पर्वत वन उपवन तेरा यश लहराएँ।

जीवन की हर श्वास कहे तेरा ही नाम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

माटी से मानव गढ़ डाला, उसमें प्राण भरे,

दुख-सुख, हँसी-आँसू सब तेरे ही रंग धरे।

अहंकार हर ले प्रभु, दे दे सच्चा ज्ञान,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

जब भटके मन अँधियारे में, दीपक बन जल जाए,

टूटे विश्वास की डोर को तू ही जोड़ लाए।

तेरे चरणों में ही मिले जीवन को विराम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

ना मैं कुछ हूँ, ना मेरा कुछ, सब कुछ तेरा दान,

तेरी कृपा से ही चलता ये सारा जहान।

निश्छल भाव अर्पण करता, लेकर तेरा नाम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१७ ☆ भावना के मुक्तक – मन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – मन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१७ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के मुक्तक – मन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

तुम आए हो यहाँ  पर तो बड़ा मौसम सुहाना है।

मुझे तो आज लगता है पुरवाई तो बहाना है।

तेरी बातों को मैं तो तेरे नयनों से पढ़ती हूँ।

मुझे तो लगता है अब तो तुझे बस बातें घुमाना हैं।

 *

तेरी बातों से समझा है तेरा आना बहाना है।

मुझे तुम प्यार से देखो यही तेरा बहलाना है।

तू आया है मनाने मुझको चाहत में मेरी तो

नहीं समझी तेरी बातें ये तो मन को लुभाना है।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९९ ☆ कविता – बाबाओं से बचकर रहिए… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक विषय पर एक कविता –  बाबाओं से बचकर रहिए आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९९ ☆

बाबाओं से बचकर रहिए☆ श्री संतोष नेमा ☆

बाबाओं   से    बचकर    रहिए |

मन  की  बात न  सबसे  कहिए ||

ओढ़  धर्म  का   चोला   निकलें |

इनकी   नीयत  खुद  ही  पढ़िए ||

*

बन    जाते    हैं    ये    अवतारी |

रहे    ढोंगपन     इनका     भारी ||

करें   कभी    मत   अंधी   श्रद्धा  |

बहुधा   तन   के   हुए   शिकारी ||

बहिन   बेटियों    सावधान    हो |

स्वयं   ज्ञान   से   निर्णय  करिए ||

बाबाओं    से    बचकर    रहिए |

*

रोज    मीडिया    हमें    दिखाता |

नाम    नवीन    रोज     बतलाता ||

पाखंडों   की    कमी   नहीं    है |

इनका  नहीं   धर्म     से    नाता ||

आज      चेतना     हुई     जरूरी |

बहुरुपियों   से  खुद   ही  बचिए ||

बाबाओं    से     बचकर    रहिए |

*

वाणी    में    है    ज्ञान   धर्म   का |

मन   रखते   पर   बुरे   कर्म   का ||

इनके     अन्तस    को    पहचानो |

हो   न   सामना  कभी   शर्म  का ||

खूब   चढ़ा   कर   इन्हें    चढ़ावा |

नहीं   मुफ्त    में   झोली   भरिए ||

बाबाओं    से     बचकर     रहिए |

*

ईश्वर    पर    हम   रखें    आस्था |

एक    लक्ष्य    बस   एक   रास्ता ||

हर मुश्किल  का  हल  करता  वह |

रखें    न    कोई    अन्य    वास्ता ||

डग – डग   पर  मिलता  है  धोखा |

अब  “संतोष”   धर्म  पथ   गहिए |

बाबाओं    से     बचकर     रहिए ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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