हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ – कविता – कहाँ हो माँ? ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है मातृ दिवस पर विशेष “कहाँ हो माँ? ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६४ ☆

🌻कविता 🌻 कहाँ हो माँ? 🌻

(विधाता छंद)

*

कहाँ हो माँ जरा सुन लो, तुम्हारी याद आती है।

घड़ी भर नींद का झोका, लगा आँचल सुलाती है।।

बजे धड़कन जरा सुन लो, अभी आँखे भरी मेरी।

यहीं है माँ तुझे देखूँ, लगे आवाज है तेरी।।

*

बनी दुनिया यहाँ मेरी, नया अनुभव सभी पाया।

बिताया फूल सा जीवन, सदा आँचल बनी छाया।।

समय की मार भी देखा, खड़ी हर जुल्म से सीखा।

कहीं बातें सदा मीठी, सही बातें बड़ी तीखा।।

*

ह्दय में प्रेम की गंगा, सदा ममता भरी बोली।

सजाया है यही घर को, कहे दुनिया बड़ी भोली।।

भरी है मांग लाली से, सजी कंचन सदा गहना।

पिता के साथ देखी है, सदा ही संग में बहना।।

*

सुनाती लोरियाँ मीठी, लगा बचपन अभी आया।

पुरानी बात है सारी, तुझे ढूँढा नही पाया।।

बनी जो हाथ की रोटी, सदा मुँह स्वाद है मेरा।

बनाई माँ मुझे बिटिया, करूँ आभार मै तेरा।।

*

विधाता खेल है रचता, लिखी हूँ आज मै गाना।

कहाँ ढूँढूँ तुम्हें मै तो, जरा मुझको बता जाना।।

मिली है प्रेम की पाती, यही तेरी निशानी है।

बता तुझको लिखूँ कैसे, सभी बातें कहानी है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८३ – मत समझ हमको पराया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – मत समझ हमको पराया।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८३ – मत समझ हमको पराया…१ ✍

कह कि तुझ पर

क्या विपत आई

कि तेरी आँख भर आई?

मत समझ हमको पराया

बोल दे भाई

गाँठ मन की खोल दे भाई ।

कह कि कुछ तू आपनी बीती

कुछ तू और की बीती

प्रमिल

सुन कि

कि

साथ में आजा, उड़ा मौजें

बाद में तस्वीर हम खोजें

कि तुझ पर कष्ट कैसा आ पड़ा है

अरे भाई, बैठ भी तो जा

एक

कि तू कब से खड़ा है

बोझ मन भर का रखे मन पर

भला क्या सोच पायेगा ?

अँधेरा आँख में आँखें

भला किस ओर जायेगा ?

बात अब तेरी समझ में आ गई होगी

मैं यही समझा

कि तेरे इरादों पर

कोई मुसीबत छा गई होगी।

 

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८२ “निरंतर हुये प्रतीत पिता…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत निरंतर हुये प्रतीत पिता...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “निरंतर हुये प्रतीत पिता...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

आँखों में विश्वास खोजते

हुये व्यतीत पिता ।

इस घर की इन दीवारों में

बने अतीत पिता ॥

 

ऊपर के उस आले में

धुँघली चिन्तित छाया ।

जो विपन्न हो बैठी आखिर

छूट गई माया।

 

उस पलंग पर बैठे

लगता देख रहे सबको ।

गहन प्यास को लिये

निरंतर हुये प्रतीत पिता ॥

 

उसी एक कमरे में जिसमें

बिता चुके जीवन ।

वही एक इच्छा,आकांक्षा का

अधियारा मन ।

 

उसी तिमिर से लडते लडते

साहस की मूरत,

ढोते रहे जीर्ण कंधों पर

बने सुजीत पिता ॥

 

और सभी हम लोग कुटुंबी

जन करते चर्चा ।

मरते मरते तकिया नीचे

छोड़ गये खर्चा ।

 

इसी तरह सब अपनी अपनी

लिये समस्यायें,

हो बैठे हम कैसे आखिर

अनुग्रहीत पिता ?

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

13-04-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ मातृ दिवस विशेष – नासमझ… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कविता ☆ मातृ दिवस विशेष – नासमझ… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

बिल्कुल भी नहीं

रोई मैं

माँ के शव के निकट बैठी हुई

बस देखती रही

वही सुन्दर सौम्य

करुणामय मुद्रा

लगा कुछ भी तो नहीं हुआ

वे सोई हैं, जाग जायेंगी

आँखों को कैसे विश्वास दिलाती

लोग कहते रहे

ज्योति ,ज्योति में समा गई !

विदेह प्राण विलीन हो गये

जा मिले अपने उत्स से!

मातृ दिवस पर

यादों का तूफान उठा है

चिता पर लेटी हुई माँ

अग्निशिखाएं आकाश

छू रही हैं।

चलचित्र चल रहा है।

छलक रही हैं आँखें

धारासार

कैसे रोकूं

झर रहा है दर्द

आँखों ने बगावत कर दी है।

 

माँ के लिए

हालात की दुहाई देकर

कुछ न कर पाने का

अपराध बोध

तकलीफ को

जानलेवा बना रहा है।

 

मैं जितना कहना चाहती हूं कहां कह पाती हूं

ईश्वर को समझने की

चेष्टा में

खाली हाथ रह जाती हूं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभी अभी # ९८७ ⇒ मदर्स डे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी कविता – “मदर्स डे।)

?अभी अभी # ९८७ ⇒ कविता – मदर्स डे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या हम मदर्स डे को

 मां का दिन नहीं कह सकते !

एक बच्चे के लिए हर दिन मां का होता है।

बड़ों के लिए मातृ दिवस होता है।

जिनकी मां आज नहीं है,

उनको मां की बहुत याद आती है।

यूं तो रोज ही आती होगी,

लेकिन आज उन्हें याद दिलाया जाता है।

दुनिया में ऐसा कौन है, कि

जिसकी कोई मां नहीं !

जन्म से ही नहीं,

जो पाले वह भी मां कहलाती है।

मां का दर्जा मासी को भी

मिल सकता है, और

भाभी मां को भी।

अगर सबसे अच्छी मां की स्पर्धा हो तो,

निर्णायक महोदय सबकी मां को छोड़कर

अपनी मां को ही यह खिताब दे दे।

अपनी मां से अच्छी किसी

की मां नहीं होती।

यह

मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं।

ज़रा मेरी मां को देखो,

आपको अपनी मां

याद आ जाएगी।

भगवान खुद धरती पर नहीं उतर पाता,

इसलिए

मां को भेज देता है।

लेकिन

बड़ा निष्ठुर है वह,

मां को वापस ले लेता है,

बदले में

सिर्फ मां की यादों से ही

काम चलाना पड़ता है।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०६ – माँ… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता माँ।)

☆ अभिव्यक्ति # १०६ ☆ माँ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो,

सभी देवता गोद में खेले,

तुम तो बस चरणों में रहो.

**

जन्म दिया हो या पाला हो,

भेद न कोई ममता माने,

अपना पराया कोई नहीं है,

मां तो सबको अपना माने.

*

मां की ममता का मोल नहीं,

ममता है अनमोल कहो,

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो.

**

मां की महिमा का बखान,

सुर नर मुनि भी गाते हैं,

वेद पुराण के पन्ने भी,

लिख कर नहीं अघाते हैं.

*

सब रिश्तों से ऊपर है मां,

इससे ऊपर कोई न हो

मां तो केवल मां होती है,

मां को न कुछ और कहो.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६३ ☆ # “एक अधूरा ख्वाब…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता एक अधूरा ख्वाब…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६३ ☆

☆ # “एक अधूरा ख्वाब…” # ☆

पूर्णिमा की रात थी

चांदनी की बरसात थी

चांद आसमान में खिला हुआ था

सितारों से जाकर मिला हुआ था

चंद्र किरण के लिए जो प्यासा था चकोर

जन्मों की प्यास बुझाकर हो रहा था विभोर

रातरानी की सुगंध महक रही थी

सुप्त भावनाएं धीरे-धीरे बहक रही थी

चांदनी रात में हम दोनों थे साथ में

बरसती चांदनी में हाथ थे हाथ में

पारिजात की गंध में बेसुध वो छुई-मुई

केवड़े के तने से जैसे लिपटी नागिन हो कोई

मादक पवन में मदहोश चमन में

अंगारे दहक रहे थे दोनों के बदन में

आगोश में एक दूसरे के खोए हुए थे

नाग नागिन से लिपटकर सोए हुए थे

मध्य रात्रि में कोई प्रेम राग गा रहा था

सारी कायनात पर नशा छा रहा था

ना संसार की चिंता ना खुद की खबर थी

पहलू में सोए चांद के चेहरे पर नजर थी

रात की खामोशी दे रही थी सदाऐं

प्रीत के गीत गा रही थी सारी दिशाएं

पता ही नहीं चला कब रात ढल गई

भोर की लालिमा प्रीत को छल गई

बिछड़ने की पास जब आई घड़ी

उसके नैनों से अश्रु की लग गई झड़ी

वो बेख़बर बेहोशी में गई मुझे छोड़कर

अरमानों से भरा मेरा मासूम सा दिल तोड़ कर

एक मधुर सा सपना नींद में ही टूट गया

एक अधूरा ख्वाब नींद और चैन दोनों लुट गया /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४६ – बुन्देली कविता – ”सज्जन, गुनी, रहीस लगत है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सज्जन, गुनी, रहीस लगत है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४६ ☆

☆  बुन्देली कविता – सज्जन, गुनी, रहीस लगत है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सज्जन, गुनी, रहीस लगत है

कड़ बच्चों की फीस भरत है

कोट कचहरी के बाहर बो

अजी लिखत, नबीस लगत है

 *

दोनऊँ पहलमान एकई से

कौनउ नई ऊरीस लगत है

 *

बो काये गुमसुम बैठो है

चुभ रउ कौनउ टीस लगत है

 *

अंड-गंड बातों में नइयाँ

सदा निपोत खबीस लगत है

 *

बार और नाखून बड़े हैं

भिनकत रति खबीस लगत है

 *

भगवत’ सबहें देखन भर के

इन सब में बो बीस लगत है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गाल बजाने से…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – गाल बजाने से…!

☆ ॥ कविता॥ गाल बजाने से…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

गाल  बजाने  से  हाल  नहीं  बदलते हैं,

खोटे सिक्के ज्यादा दिन नहीं चलते हैं।

*

कोई  कितना भी होशियार, सयाना हो,

समय  आने  पर  ही  सितारे बदलते हैं।

*

रोज-रोज बार-बार द्वारे दस्तक देने पर,

एक दिन ह्रदय के बंद कपाट खुलते हैं।

*

जवान  बेटों  की आवारगी को देखकर,

प्राणों  से  प्यारे लाड़ले अपने खलते हैं।

*

अपनों  को  आगे  बढ़ता  हुआ देखकर,

ख़ैर, गैर तो गैर अपने जन भी जलते हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पुजारी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पुजारी ? ?

मैं और वह,

दोनों काग़ज़ के पुजारी,

मैं फटे-पुराने,

मैले-कुचैले,

जैसे भी मिलते,

काग़ज बीनता, संवारता,

क़रीने से रखता,

वह इंद्रधनुषों के पीछे भागता,

रंग-बिरंगे काग़ज़ों के ढेर सजाता,

दोनों ने अपनी-अपनी थाती

विधाता के आगे धर दी,

विधाता ने

उसके माथे पर

अतृप्त अमीरी

और मेरे भाल पर

समृद्ध संतुष्टि लिख दी..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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