हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६५ – ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ये अखाड़ा निराला है।)

☆ हेमंत साहित्य # ६५ ☆

✍ ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे  

ये अखाड़ा निराला है,

ये वही पहलवान हैं,

जिन्हें अखाड़े में उतारा था हमने।

अपने ही हाथों से

अपने ही कंधों पर बिठाया,

फिर ताज भी पहनाया हमने।

 

मैं अकेला नहीं था,

माशरे के सभी मकीं थे

धर्म की घुट्टी पीकर

सो गये मदहोश,

और उँगली की एक स्याही

वर्षों की खामोशी बन गई।

 

हम सुनते रहें,

वे हमें सुनाते रहे रामधुन,

कि कहीं जाग ना जायें

हम

सुनकर सिसकियाँ

हमवतनों की

अपनों की.

हम सपनों में भारत गढ़ते रहे,

वे सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे।

 

मैं ढूँढ़ता रहा

उनकी आँखों में संवेदना।

पर वहाँ तो

कुर्सी का धुआँ था,

जिसने इंसान को ही ओझल कर दिया।

 

अगर संवेदना होती,

तो कलियाँ न कुचली जातीं।

पुस्तकों से भरे हाथ

ढाल न बनते,

गलियारों में धुआँ न उतरता,

लाठियाँ भविष्य की पीठ पर

इतिहास न लिखतीं।

 

अस्पतालों की खिड़कियों से

झाँकता हुआ कल,

पट्टियों में लिपटा पूछता रहा—

क्या यही था

उजाले का वादा?

 

फिर भी सिंहासन मुस्कुराता रहा,

जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अहंकार का मुकुट पहनकर

वह आईनों से भी

नज़रें चुराता रहा।

 

कौन समझाए उन्हें—

सिंहासन शाश्वत नहीं होते।

सोने की लंका भी

एक दिन राख हुई थी।

 

समय की मुट्ठी में

हर ताज की धूल लिखी है।

जनता देर से बोलती है,

मगर जब बोलती है,

तो अखाड़े बदल जाते हैं।

 

ये अखाड़ा निराला है…

यहाँ जीत उसी की नहीं होती

जो सबसे ऊँचा बैठा हो,

जीत अंततः उसी की होती है

जिसे कहते हैं

वोटर।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆ कविता – क्रेता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “क्रेता“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆

✍ कविता ☆ क्रेता☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हम सब बिके हुए हैं

किसके हाथों, पता नहीं

शायद,

विचारवानों के, विद्वानों के

सभ्यताओं के, शासनों के

सत्ताओं या सत्ताधीशों के।

 

या कि

अपने अहम् के, मद मोह के

समाज के, संसार के

द्वेष के, आग्रहों के

दुराग्रहों के,

पता नहीं।

 

बस यही पता करना है

हम किसके हाथों बिके हैं

यह पता चल जाए

तो मुक्त हो सकते हैं।

क्रेता से, छुटकारा

पा सकते हैं।

लेकिन, बहुत सजग रहने की

ज़रुरत है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९५ – काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९४ ☆

☆ –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

 

और हम

योजनाओं की के पीछे

भाग रहे हैं.

उपकारित कामों से

नींद की गोलियाँ रखी हैं

वे सोने का अभिनय कर रहे हैं।

मगर जान रहे हैं।

कैसी विडम्बना है-

सर्वोदय का दावा करने वाले

समस्याओं की भाषा कह रहे हैं।

सत्ताधारियों का सत्तामोह

आकांक्षियों का द्रोह

और विरोधियों का व्यामोह

देखने वाली नई पीढी

यदि हो रही है सौरभहीन

तो उसका क्या दोष है ?

उसका जो आक्रोश है

वह चाहे ठीक न हो

लेकिन गलत नहीं है.

कौन ऐसा माई का लाल है

जो स्वार्थी से आहत नहीं है।

तो आओ

हम अहिंसा को नई परिभाषा दें.

देश के पथराये मन प्राणों को

समाजवाद की आशा दो

हमें जन्मेजयी यज्ञ में

विषधरों का

हवन करना ही पड़ेगा.

समाजवाद के विध्वंसकों का

सरेआम हमें

दहन करना ही पड़ेगा।

यदि ऐसा नहीं किया

तो फिर क्या उपाय है?

 

सिरफिरे नेताओं

और

पचहत्तर घरानों की खातिर

करोड़ों लोगों को अभावों की भट्टी में

झोंकना कहाँ का न्याय है?

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९२ – “अनंत खुशियों की राशी…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत अनंत खुशियों की राशी...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अनंत खुशियों की राशी...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

रिश्तों की अनुपम नक्काशी

जैसी रही बुआ ॥

जीते हुये किसी प्रत्याशी

जैसी रही बुआ ॥

 

बहुत रहीं खुद्दार कभी

उनने कुछ न चाहा ।

किसी घाव के लिये

रही वे, दवा लगा फाहा ।

 

जो भी सच होता उसको

मुँह पर ही कह देना ।

किन्तु दुआ की मथुरा काशी

जैसी रही बुआ ॥

 

घरकेसभी सदस्यों की

वह अधिक चहेती थीं ।

सदा किसी भी काम काज

को हाँ कह देती थीं।

 

अगर दिखें नाराज तनिक में

खुश हो जाती थीं।

आशुतोष थीं जो अविनाशी

जैसी रहीं बुआ ॥

 

जब भी चाहो उन्हें बुलालो

झट से आ जाती।

आते ही घर के कामों में

झट पट जुट जाती ।

 

हर शंका का समाधान थी

इस घर की जो भी ।

व अनंत खुशियों की राशी

जैसी रही बुआ ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-07-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जीवन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जीवन ? ?

जुग-जुग जीते सपने,

थोड़े से पल अपने,

सूक्ष्म और स्थूल का

दुर्लभ संतुलन है,

नश्वर और ईश्वर का

चिरंतन मिलन है,

जीवन, आशंकाओं के पहरे में

संभावनाओं का सम्मेलन है… !

 ?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 8.11 बजे , 30.3.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जड़ों से उखड़ रहे हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – जड़ों से उखड़ रहे हैं…!

☆ ॥ कविता॥ जड़ों से उखड़ रहे हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

संवेदना के स्नेह- निर्झर सूख रहे हैं,

हरे-भरे बरगद बारिश में सूख रहे हैं।

 *

सोने के थाल में छप्पन भोग सजे हैं,

लेकिन शरीर ह्रष्ट-पुष्ट सूख रहे हैं।

 *

सदियों से जो उपेक्षा के शिकार रहे,

अब जाकर उनके नसीब जग रहे हैं।

 *

आजतक  जिन्होने ख़ुशी देखी नहीं,

उनके  द्वारे ढोल- नगाड़े बज रहे हैं।

 *

अभिमान में जो सर रस्सी-से तने हैं,

जनता जनार्दन के आगे झुक रहे हैं।

 *

सियासत खिलाफत की बायस हुई,

सियासी  अपनी  मर्यादा भूल रहे हैं।

 *

भौतिकता की ऐसी बयार बही कि,

दरख्त  अपनी जड़ों से उखड़ रहे हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७४ ☆ # “शायद तूफान आने वाला है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता शायद तूफान आने वाला है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७४ 

☆ # “शायद तूफान आने वाला है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

आसमान में बादल गरज रहे हैं

धुआंधार बरस रहे हैं

बिजलियाँ कड़क रहीं हैं 

हवाएं बेफाम बह रही हैं

बहते बहते कह रही हैं

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

गगन में यह कैसी जंग है

धरती पर हम सब दंग है

तबाही आ रही संग संग है

टूटती हर मन की उमंग है

टूटते टूटते कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

चारों दिशाओं में शोर है

नदी नालों में भी जोर है

बारिश भी घनघोर है

समंदर की नजरों में

यह तूफान कमजोर है

हर लहर कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

यह पानी का बहाव

 संकेत है बर्बादी का

यह बूंद बूंद का एक होना

संकेत है आजादी का

बादल का फटना

संकेत है जल समाधि का

सब कुछ डूब गया

तो क्या होगा अपराधी का

प्रकृति हम सबसे कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ – मुसाफ़िर – ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ कविता – मुसाफ़िर ☆

मैं मुसाफ़िर तू मुसाफ़िर, रास्ते अनजान हैं

आदमी हूँ आदमी की, बस यही पहचान है

आदमी बनकर रहा जो, जिंदगी में खुश रहा

सारे मज़हब के दिवाने, मिट्टी के मेहमान हैं

 *

क्यों बखेडा कर रहे हो, घर के अंदर में यहाँ

भारती है माँ हमारी, उस की हम संतान हैं

 *

माँ के टुकडे करने वाले, देश के गद्दार तुम

आरती का बन चुके हम, बस तेरे सामान है

 *

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सब सिपाही हैं यहाँ

देश पे कुर्बान हो तुम, तुम पे हम कुर्बान हैं

 *

उन शहिदों को पुछो, देश पर जो मिट गये

धर्म से बढकर तिरंगा, इस वतन की शान है

 *

आवो मेहनत को बनाएं, एक इज्जत का निशाँ

मुफ्त की रोटी पे पलते, कुछ यहाँ नादान हैं

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११८ – बाबुल के बुलावे पर… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘बाबुल के बुलावे पर।)

☆ अभिव्यक्ति # ११८ ☆

☆ बाबुल के बुलावे पर☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

तेरी इस दुनिया में, पल का ठिकाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

*

दिया जले बाती से, तेल का समाना है,

तेल खत्म होते ही, दिया बुझ जाना है।

*

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है,

अंगना में चिड़िया है, जब तक दाना है।

*

दाना खत्म होते ही, चिड़िया उड़ जाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

*

रंगमंच दुनिया है, कला का जमाना है,

रोल खत्म होते ही, पर्दा गिर जाना है।

*

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है,

राज की ये बात कह दूं, राज ये बताना है।

*

अच्छे काम करो जग में, नाम रह जाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ भारताच्या ‘विस्मृत’ वीरांना मान्यता! – लेखिका : मेजर मोहिनी गर्गे – कुलकर्णी (नि.) ☆ प्रस्तुती : गौरी गाडेकर ☆

गौरी गाडेकर

? इंद्रधनुष्य ?

भारताच्या ‘विस्मृत’ वीरांना मान्यता! – लेखिका : मेजर मोहिनी गर्गे – कुलकर्णी (नि.) ☆ प्रस्तुती : गौरी गाडेकर

भारताच्या ‘विस्मृत’ वीरांना मान्यता!  – – पहिले महायुद्ध

मागच्याच आठवड्यात बातमी आली की पहिल्या महायुद्धात लढणाऱ्या ब्रिटिश इंडियन आर्मीमधल्या ९,९०९ सैनिकांच्या बलिदानाला पुराव्यानिशी मान्यता देण्यात आली… भारतीय सैनिकांनी रक्ताने दिलेल्या बलिदानाला एका शतकानंतर शाईच्या काही थेंबांनी दिलेला हा न्याय समजायचा का? इतिहासाच्या पानांमधून या सैनिकांचं अस्तित्त्वच पुसून टाकणाऱ्या एका अन्यायकारक धोरणाबद्दल कबुली देत Commonwealth War Graves Commission(CWGC)ने या भारतीय हुतात्म्यांची नांवं त्यांच्या डेटाबेसमध्ये नुकतीच समाविष्ट केली. अथक संशोधनाच्या अंती घडवून आलेली ऐतिहासिक कागदपत्रांमधली ही सुधारणा दुसऱ्या महायुद्धानंतरची सर्वात मोठी दुरुस्ती मानली जात आहे. नेमकं कोणतं धोरण कारणीभूत होतं या विस्मृतीला?

‘The great War’- भारताचं योगदान – 

‘…the war to end all wars’ असं व्यापक (!) उद्दिष्ट ठेऊन जुलै १९१४ मध्ये सुरू झालेलं महायुद्ध चांगलंच पेटलं. ब्रिटिशांनी भारताचा सहभाग गृहीत धरून इंडियन आर्मी मधलं सैन्य तिथे पाचारण केलं. या महायुद्धात ब्रिटिशांसाठी अखंड भारतातून (आजचा भारत, पाकिस्तान आणि बांगलादेश) सुमारे १४ लाख सैनिक लढले होते. यापैकी एकट्या पंजाब प्रांतातून ५ लाख सैनिक भरती झाले होते. घोडदळ, पायदळ, तोफखाना अशा कितीतरी गोष्टींचा यात समावेश होता. या सैन्यात कोवळ्या वयातल्या म्हणजे अगदी १० वर्षे वयाच्या मुलाचाही समावेश असल्याचे पुरावे आहेत!

सुरुवातीला सैन्यभरती आणि प्रशिक्षण यात ब्रिटिश गुंतलेले असतांना, जर्मन सैन्याचं मोठं आक्रमण भारतीयांनी थोपवलं.

फ्रान्स, गॅलीपोली(तुर्कस्थान), बेल्जियम, इजिप्त, पॅलेस्टाईन, पूर्व आफ्रिका… किती ठिकाणी भारतीय सैन्य आत्यंतिक शौर्याने लढलं! युरोपमधल्या जीवघेण्या, भीषण खंदकांनी किती भारतीयांचे जीव घेतले! अपरिचित युद्धभूमी, त्रस्त करणारं थंड हवामान, चालून येणारा क्रूर शत्रू, अपुरी साधनं, प्राण कंठाशी आणणारी लांबच लांब पायपीट, उपासमार, साथीचे रोग… कशाकशाशी लढले भारतीय? आणि कशासाठी? तिथे जिवाची बाजी लावण्यासाठी भाग पाडणारी, स्वतःला ‘सैनिक’ म्हणवून घेत लढण्यासाठी उद्युक्त करणारी कोणती प्रेरणा होती? स्वातंत्र्याची? मुळीच नाही!

ब्रिटिश इंडियन आर्मीमधल्या ७४,१८७ एवढ्या सैनिकांनी युद्धभूमीवर आपला जीव गमावला असा औपचारिक आकडा आहे, तेवढेच गंभीर जखमीही झाले. १. ७ लाख प्राणी (उंट आणि खेचर यांच्यासह मुख्यतः उमदे घोडे), ३. ७ लाख टन एवढा अन्नधान्याचा पुरवठा, १३० करोंड जुट सॅंडबॅग्स (खंदकांमद्धे वापरतात तशा), सुती कपडा, शस्त्रास्त्रं, रणगाडे… आणि मुख्य म्हणजे भारतीय संस्थानांचा तसंच लादलेल्या करांच्या द्वारे लुटलेला प्रचंड पैसा… ही वाढत जाणारी यादी डोळे विस्फरणारी आहे! भारताच्या सहभागाशिवाय स्वतःच्या जिवावर जर्मनीला आव्हान देण्याची, वाढत गेलेलं हे युद्ध लढण्याची ब्रिटनची तयारी होती का? याचं उत्तर मिळतं. त्यामुळे काहीही संबंध नसतांना, स्व-बांधवांवर अनन्वित अत्याचार करणाऱ्या ब्रिटिशांसाठी इंडियन आर्मीमधलं हे सैन्य प्राणपणाने लढत होतं.. गुलाम म्हणून!

अन्यायकारक वागणूक

वर्षानुवर्षे ब्रिटिश सैनिक आणि भारतीय सैनिक यांच्यात पगार,रहाण्याच्या सोयी, नोकरीचे नियम,इतर सवलती अशा बहुतांश बाबतीत उघड उघड भेदभाव होताच. मानवतेला काळिमा फासणाऱ्या अनेक घटना या युद्धादरम्यान देखील घडल्या. जखमी झालेल्या तसंच winter kit न पोहोचल्यामुळे आजारी पडलेल्या,साथीच्या रोगाने पिडलेल्या भारतीय जवानांना ब्रिटिश परिचरिकांकडे उपचार करवून घेण्यास बंदी होती. उपचारांविना त्यात कित्येकजण गेले. घोंघावणाऱ्या मृत्यूला समोर बघत अनेकांनी घरी (शेवटची) पत्रं लिहिली पण ती तपासली (सेन्सॉर) केली जात असत. कारण युद्धाविषयी कोणतीही माहिती पत्रात लिहिण्याची सक्त मनाई होती. दिशाहीन युद्धनीती आणि अपुऱ्या साधनांमुळेही हजारो सैनिक बळी गेले.

बलिदान नाकारण्यासाठी नवा निकष 

पहिलं महायुद्ध संपल्यानंतर ब्रिटिश सरकारने भारतीय सैनिकांसाठी एक अन्यायकारक निकष लावला: “जे सैनिक थेट युद्धभूमीवर लढतांना मृत्युमुखी न पडता, तिथल्या जखमांमुळे किंवा आजारपणामुळे (operational zones च्या) बाहेर मृत्यू पावले, त्यांना ‘युद्ध शहीद’ (war dead) मानलं जाणार नाही. ” या निकषामुळे हजारो सैनिकांची नांवं हुतात्म्यांच्या यादीत लिहून पुढे मुख्यालयात पाठवण्यात आलीच नाहीत. ब्रिटिश साम्राज्यासाठी प्राणांची आहुती देणाऱ्या सैनिकांप्रती कृतज्ञता मानायची सोडा पण दोन ओळींची तार करून त्यांच्या मृत्यूची बातमी घरी कळवण्याची तसदीही ब्रिटिशांनी घेतली नाही ही केवढी टोकाची कृतघ्नता! या एका तांत्रिक नियमामुळे कित्येक वीर सैनिकांचा त्याग इतिहासातून बेदखल झाला. केवळ ‘बेपत्ता’ सैनिक एवढीच त्यांची ओळख मागे राहिली!  

 कुणाचा मुलगा,कुणाचा भाऊ,पती… अनेकजण घरी कधीच परतरले नाहीत! आज काही बातमी कळेल, उद्या कळेल… ते जिवंत आहेत की धारातीर्थी पडले? की शत्रूने डांबून ठेवले? एक पिढी… दुसरी पिढी… वाट बघता बघता कितीतरी डोळे कायमचे मिटले! अनाथ मुलं गरिबीत पिचत राहिली. स्वातंत्र्य मिळाल्यानंतरही या सैनिकांविषयी काहाही कळलं नाही… गावांगावांमधलं ते औदासिन्य कधीच सरलं नाही आ णि दुर्दैव म्हणजे भारतीय वीरांची हजारो नावं इतिहासाच्या पानातून पुसली गेली!

युद्धानंतर… वचनभंग!

युद्ध संपल्यावर आम्ही ‘अर्ध स्वातंत्र्य’ (dominion status) देऊ असं भारतीय नेत्यांना कबूल करून ते सपशेल नाकारत इंग्रजांनी महायुद्धानंतर भारताला कृतज्ञतेपोटी काय दिलं? तर अत्यंत जाचक असा Rowlatt Act, १९१९ साली पारित करण्यात आला. याअंतर्गत बंडखोरीचं कारण दाखवत कोणालाही वॉरंटशिवाय अटक करता येत होती, नेत्यांना ट्रायल न घेताच तुरुंगात डांबता येत होतं… बरंच काही भयंकर घडत होतं! .. आणि जे सैनिक प्राणपणाने लढले त्याच पंजाबच्या पवित्र भूमीवर अत्यंत निर्घृण पद्धतीने एप्रिल १९१९ मध्ये जनरल डायरने घडवून आणलेलं रक्तरंजित जलियनवाला हत्याकांड! होय.. हेच फलित होतं महायुद्धात ब्रिटिशांच्या बाजूने लढणाऱ्या हजारो जिवांच्या समर्पणाचं…!  

‘पंजाब रजिस्टर्स’ प्रकल्प आणि पुढील संशोधन प्रक्रिया 

Commonwealth War Graves Commission (CWGC), Uk Punjab Heritage Association (UKPHA) आणि ग्रीनविच विद्यापीठ यांच्या संयुक्त प्रयत्नांनी २०२१ साली ‘पंजाब रजिस्टर्स’ हा प्रकल्प आकाराला आला. पुढे पाच वर्षे अथक मेहनत मोठं संशोधन केलं गेलं. लाहोरमधल्या संग्रहालयात जतन केलेल्या युद्धविषयक हस्तलिखितांचा अभ्यास आणि त्याची संगणकात नोंदणी केली गेली. या कागदपत्रांमध्ये पंजाबमधील सुमारे ३,२०,००० सैनिकांची नावं आणि त्यांच्या सेवेचा सविस्तर तपशील नोंदवलेला आहे. तिथे मिळालेली मुख्य यादी पडताळून ९,९०९ सैनिकांची नावं इतर पुराव्यानिशी हुतात्मा यादीत समाविष्ट करण्यात आली. ब्रिटीश साम्राज्यासाठी लढलेल्या हजारो भारतीय सैनिकांच्या बलिदानाची काही थेंबांच्या शाईने का होईना पण अखेरीस नोंद झाली आणि अंशतः त्यांची गौरवगाथा, समर्पण जगासमोर आलं.  

कौटुंबिक वारसा आणि अस्तित्त्वासाठी संघर्ष 

लेस्टरमधील (Uk) दंतवैद्य डॉ. सनी पलाही यांच्यासारख्या हजारो लोकांसाठी त्यांचे पूर्वज शोधण्याचा हा भावनिक प्रवास आहे. त्यांचे पणजोबा केसर सिंग युद्धात शहीद झाले, पण त्यांची कुठेही नोंद नव्हती. केवळ बेपत्ता एवढीच माहिती. आता अधिकृत नोंद झाल्यामुळे, “माझा पूर्वज अत्यंतिक शौर्याने लढला” हा अभिमान पुराव्यासह त्यांच्या पुढच्या पिढीला मिळेल. असे अनेक जण या प्रकल्पाशी भावनिक धाग्याने जोडले गेले आहेत.  

भारतीय शौर्याचा अविभाज्य भाग आणि अखंड भारताचा वारसा

अनेक दशके पहिल्या महायुद्धाचा इतिहास केवळ युरोपीय दृष्टिकोनातून पाहिला गेला. भारतीय सैनिकांना केवळ ‘भाडोत्री’ मानले जात होते. पण हे संशोधन सिद्ध करतं की, हे युद्ध केवळ फ्रान्स किंवा बेल्जियमच्या रणक्षेत्रात नव्हे, तर पंजाबच्या खेड्यापाड्यातही लढलं गेलं. या सैनिकांचा त्याग हा भारतीय शौर्याचा एक अविभाज्य भाग आहे.

लाहोर संग्रहालयात जपून ठेवलेली जुनी कागदपत्रं म्हणजे भारत-पाकिस्तानच्या फाळणीपूर्वीचा, दोन्ही देशांना जोडणाऱ्या एका सामायिक इतिहासाचा पुरावा आहे. याचा पुन्हा एकदा प्रत्यय आला.

सीडब्ल्यूजीसी (CWGC) च्या महासंचालिका क्लेअर हॉ्र्टन (Claire Horton) यांनी सांगितलं की “पहिले महायुद्ध संपून एक शतकाहून अधिक काळ लोटला असला तरी आमचं शोध अभियान अजून सुरूच आहे. राष्ट्रकुल (Commonwealth) देशांच्या सेवेत बलिदान देणाऱ्या प्रत्येक व्यक्तीला योग्य तो सन्मान आणि आदर मिळावा यासाठी हे प्रयत्न आहेत. ‘पंजाब रजिस्टर्स’ प्रकल्प हा या मोहिमेतील एक महत्त्वाचा टप्पा आहे. या ९,९०९ नावांच्या शोधामुळे जगाच्या इतिहासातील गहाळ झालेली पाने पुन्हा भरून येण्यास मदत होत आहे. हे एक अजरामर स्मरणपत्रं आहे, ही केवळ त्यांना श्रद्धांजली नसून तो एक प्रकारे त्यांचा कौटुंबिक वारसाही आहे. युद्धासाठी दिली गेलेली ही मोठी किंमत आहे. ” 

हा दृष्टिकोन ठेऊन इतिहासातली मोठी त्रुटी भरून काढण्याचा हा प्रयत्न स्वागतार्ह आहे. संशोधनासाठी घेतली गेलेली अथक मेहनत स्तुत्य आहे. मात्र याला न्याय म्हणता येईल का याविषयी शंका आहे. हा रक्तरंजित इतिहास पुसून टाकता येणार नाही.  

स्वातंत्र्यानंतर प्रचंड मोठं अंतर कापत आज विश्वबंधुत्त्वाच्या तत्त्वावर सर्वांशी भारत मैत्रीपूर्ण व्यवहार करत असला तरी हा शोषणाचा इतिहास दोन्ही देशांच्या पुढच्या पिढ्यांना तसंच जगभरात पुढे सांगितला जाणार! ते ऐकून त्यांच्या मनांत काय भावना असतील, माहित नाही. मात्र दुसऱ्यांना गुलाम करून वर्षानुवर्षे त्यांचं शोषण करणाऱ्या देशांच्या यादीत ‘माझ्या राष्ट्राचं – भारताचं’ नांव नाही याचा आपल्याला आणि येणाऱ्या पिढ्यांनाही सदैव अभिमान वाटेल, याची खात्री आहे!

मा. अटलजींच्या ओळी किती समर्पक आहेत – 

“होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है कर लूं मैं सबको गुलाम

 मैंने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम |

मैं तेज:पुंज तमलीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश |

जगती का रच कर विनाश, कब चाहा है निज का विकास?

शरणागत की रक्षा की है, मैंने अपना जीवन दे कर|

विश्वास नहीं यदि नहीं आता तो साक्षी है इतिहास अमर |”

जय हिंद!

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लेखिका : मेजर मोहिनी गर्गे-कुलकर्णी (नि.)

प्रस्तुती : गौरी गाडेकर

संपर्क – 1/602, कैरव, जी. ई. लिंक्स, राम मंदिर रोड, गोरेगाव (पश्चिम), मुंबई 400104.

फोन नं. 9820206306

≈संस्थापक  संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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