हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०९ ☆ भावना के दोहे – हमराज ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे  – हमराज।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – हमराज ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

करके वादा थे गए, दिखे नहीं  सरताज।

बीत गया है दिन सकल, नैन थके  हैं आज।।

 *

दिल चुराया आपने, हे मेरे हमराज।

अब तो दिल दुखने लगा, अंतर्मन आवाज़।।

 *

लुटना तेरे प्यार में, जानम तेरे नाम।

अब क्यों आँखें चुरा रहे, होने को है शाम।।

 *

आपस में क्यों रूठना, बसती मुझमे जान।

उसको गले लगा लिया, छूटे मेरे प्राण।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९० ☆ अँखियाँ प्यासी  की प्यासी… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  भावप्रवण कविता – अँखियाँ प्यासी  की प्यासी… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९० ☆

☆ कविता – अँखियाँ प्यासी  की प्यासी… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

खूब  घूम   लो   मथुरा   काशी

पर अँखियाँ प्यासी  की प्यासी

*

दान   दिखावे  के   तुम   करते

जबरन  अपने  मन  को   भरते

खूब     लगाते    गंगा    डुबकी

घर    में   बैठी   मात    उदासी

पर अँखियाँ प्यासी  की प्यासी

*

दया   धर्म   का   ज्ञान  नहीं   है

अपनों   का   भी  मान  नहीं  है

हर   क्षण  रहते  घिरे  स्वार्थ  में

माँ   को  समझें  घर   में   दासी

पर  अँखियाँ प्यासी  की  प्यासी

*

झूठ –  कपट  के   संगी   साथी

कोरी   बातों    में    जो    हाथी

धनी न  बिल्कुल बात-साख के,

लेते   सच   के   नाम    उबासी

पर  अँखियाँ प्यासी  की  प्यासी

*

धन दौलत  की  चाह  बहुत  है

राग-द्वेष  की   दाह   बहुत   है

धर्म-कर्म     करनी-कथनी   के

सब   व्यवहार     विरोधाभासी

पर  अँखियाँ प्यासी  की  प्यासी

*

रिश्ते – नाते    रखे    ताक   पर

हर   पल  गुस्सा  रहे  नाक  पर

चैन    नहीं    ‘संतोष’   नहीं   है

सुख-सुविधा की  चाह  बिलासी

पर  अँखियाँ प्यासी  की  प्यासी

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ११ – कविता – प्रेरणा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘प्रेरणा…’।)

☆ शशि साहित्य # ११ ☆

? कविता – प्रेरणा… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

कोई हमको याद करे,

क्यों बने मोहताज..

यादों में बस जाएं,

ऐसे रखें जज्बात..

कदमों के निशां ढूंढ़ें,

बनें सहज सुजान..

कर्मों से रौशन करें,

बन जाएं वो मशाल..

मेहनत की जयकार हो,

रचना है यह इतिहास..

प्रयास ये, कि संग सबका हो विकास..

नहीं थमना, नहीं रुकना अब,

समय मिलता है अल्प..

बने सबकी मुस्कान का कारण,

लेना है यह संकल्प..

स्वार्थ त्याग से ही होता है,

वंदित, जग में नाम,

यादों में बस जाएं,

बस.. करना है ऐसे काम..

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ब्लैक होल ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ब्लैक होल ? ?

तुम फिर खींच दोगे

हमारे बीच के धागे को,

तुम फिर लौट जाओगे

पिछली या उससे पिछली

या उससे पिछली

या उससे भी पिछली,

अनगिनत पिछली बार की तरह..,

 

तुम्हारे लौट आने पर

मैं फिर मिलूँगा तुमसे वैसे ही,

जैसे कभी कुछ हुआ ही ना हो,

कभी सोचा तुमने,

हर बार का तुम्हारा पलायन

मेरे भीतर के ब्रह्मांड में

पैदा कर देता है एक शून्य,

 

अब, ये सारे शून्य मिलाकर

भयावह ब्लैक होल बन चुका है,

 

जानते हो ना,

ब्लैक होल गड़प जाता है

ब्रह्मांड सारा का सारा,

 

सुनो,

हाँफ रहा हूँ, थक गया हूँ,

बार-बार गड़पे जाने से कैसे उबरूँ मैं..?

तुम्हीं बताओ

और कितने ब्रह्मांड सिरजूँ मैं..?

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८४ ☆ बाल गीत – नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८४ ☆ 

☆ गीत – नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।

दुश्मन के छक्के छुड़वाऊँ

ध्वज का मान बढ़ाऊँगा।

* 

खूब पढ़ूँगा मैं मेहनत से

सबका कहना मानूँगा।

मात – पिता की सेवा करके

लक्ष्य सदा मैं ठानूँगा।

 *

काम समय से पूरा कर लूँ

नहीं कभी घबराऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

 *

तूफानों से नहीं डरूँगा

जीवन सफल बनाऊँ मैं।

हर मुश्किल आसान करूँगा

प्रेमिल पाठ पढ़ाऊँ मैं।

 *

सदा सत्य को मैं अपनाकर

शुचिता , शान बढ़ाऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

 *

मीठा – मीठा बोलूँगा मैं

सबसे मधु व्यवहार करूँ।

सीमाओं की रक्षा करके

दुश्मन से मैं नहीं डरूँ।

 *

प्राण देश के खातिर दे दूँ

कभी न पीठ दिखाऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३११ – कविता – ☆ ऋतु बसंत के हैं क्या कहने… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “ऋतु बसंत के हैं क्या कहने…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३११ ☆

☆ ऋतु बसंत के हैं क्या कहने… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

रंग-बिरंगे परिधानों सँग

पहन लिए सुंदरतम गहने

ऋतु बसंत के हैं क्या कहने।

*

पीली सरसों झूम झूम कर देने लगी बधाई

रात रानी ने हँसकर उषा को चूनर पहनाई

वातायन हो गया सरस गंधों से लगा महकने

ऋतु बसंत के हैं क्या कहने…

*

आम्र बौर बौराये से भृमरों से करे ठिठौली

महुए की मादकता ने, उपवन में मस्ती घोली

भोर प्रभाती संकीर्तन सँग, कोयल लगी कुहुकने

ऋतु बसंत के हैं क्या कहने….

*

चटक चमकीले पुष्पगुच्छ, टेसू के मौन इशारे

संत महंत ग्रही त्यागी, बसंत है सबके द्वारे

 पंछी भ्रमर तितलियाँ, विहगवृंद तरु लगे चहकने

ऋतु बसंत की हैं क्या कहने….

*

 मौसम की मनोहरों पर,अलसी ने ली अँगड़ाई

ऋतुराजा बसंत ने मनमोहक बारात सजाई

लहराते गाते पुलकित तन-मन अब लगे महकने

ऋतु बसंत के हैं क्या कहने…

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३२ ☆ नदी नहाने जाती है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नदी नहाने जाती है ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३२ ☆ नदी नहाने जाती है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

उल्टा चलन सिखाती है

नदी नहाने जाती है ।

 *

राह मील के पत्थर पर

बैठ ज़रा सुस्ताती है ।

 *

दुख का बोझ उठाने पर

ख़ुशी होंठ पर आती है ।

 *

सपने रखकर सिरहाने

रात नींद में गाती है ।

 *

जुर्म अदालत सुनती है

सज़ा नहीं दे पाती है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३७ ☆ समझ जाता छुपा है कोई मतलब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “क्यों करें हम…?“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३७ ☆

✍ क्यों करें हम…? ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

किसी के साथ धोका क्यों करें हम

किये वादे को खोटा क्यों करें हम

 *

जो दिखता है हमेशा सच न होता

यकीं आँखों पे पूरा क्यों करें हम

 *

अगर हो बात कड़वी मौन रहते

किसी का दिल दुखाया क्यों करें हम

 *

नहीं मालूम कुछ भी अगले पल का

मिलेंगे फिर ये वादा क्यों करें हम

 *

मुहब्बत दो दिलों का मामला है

जहां भर से ये साँझा क्यों करें हम

 *

सुधरने का उसे दो एक मौका

गिराकर घर सताया क्यों करें हम

 *

किराएदार हैं सब चार दिन के

जहां में तेरा मेरा क्यों करें हम

 *

रुलाती हैं हमेशा जब भी आतीं

तेरी यादों का पीछा क्यों करें हम

 *

सितम की इंतहा ख़ातून पर ये

कभी सोचें हलाला क्यों करें हम

 *

जो दे खैरात उसकी बढ़ती दौलत

है सच फिर भी खसारा क्यों करें हम

 *

ठिकाना है नहीं इसके अलावा

तो फिर दुनिया से तौबा क्यों करें हम

 *

पड़ोसी धर्म जो नादान भूला

सितम उसके गवारा क्यों करें हम

* 

न सीधा पूछ सा कुत्ते की हो वो

बता मेहनत को जाया क्यों करें हम

 *

जुदा हो लें नहीं जब ख्याल मिलते

मियां बीबी का ड्रामा क्यों करें हम

 *

चमन विरसे की अपनी मिल्कियत है

तबाह अपना ठिकाना क्यों करें हम

 *

यहाँ जब काम भोले पन से चलता

अरुण खुद को सियाना क्यों करें हम

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४३ – ग़मज़दा बशर देखे तो मैं… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ग़मज़दा बशर देखे तो मैं…।)

✍ ग़मज़दा बशर देखे तो मैं… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

जिसे चाहा उस फ़न का मैं माहिर बना

जुनूँ था कि,  क़ादिर बनू,  क़ादिर बना

चाहिता तो,  मुर्शिद भी बन सकता था 

ग़मज़दा बशर देखे तो मैं काफ़िर बना

 *

गाड़ी बंगला कोठी ये, सुकूं के सामां नही

सुकूं उसको मिला, जो कोई तारिक बना

 *

उस करिश्माई दरवेश के मैं सदके जाउं

जिस संग को छुआ उसने वो नादिर बना

 *

रब की ईबादत का सिला सबको मिला

कोई मुलाजिम बना तो कोई ताजिर बना

 *

वाइज़ की सोहबत, सबको कहां हांसिल

मुझ कमज़र्फ को मिली और मैं आरिफ़ बना

* 

मुश्किल घडी में सब बचकर निकल गये

‘हेमंत’ वो तेरा दोस्त था जो जाँनिसार बना

☆

क़ादिर = शक्तिमान, मुर्शिद = धर्मगुरु, ग़मज़दा बशर = दु:खी मनुष्य, काफ़िर = नास्तिक, तारिक = त्यागी, संग = पत्थर, नादिर = अमूल्य, ताजिर = सौदागर, वाइज़ = धर्मोपदेशक, आरिफ़ = ज्ञाता, जाँनिसार = प्राण रक्षक☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०० ☆ कविता… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०० ?

☆ कविता… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

☆

ही कोण सखी ,

सारखी माझ्या मागे मागे येते….

हलकेच करांगुली धरूनी,

मज त्या वाटेवर नेते,

*

त्या वाटेवरले काटे,

पावलांवर काढती नक्षी,

घोटाळती अवती भवती,

शब्दांचे मंजुळ पक्षी,

*

मी एकटीच असते तेव्हा,

ही असते माझ्या संगे,

मैफलीत वा एकांती

संवाद तिच्याशी रंगे

*

मी टाळाया बघते पण,

ती सोडत मजला नाही

ही अवखळ,हट्टी पोर

लावते जीवाला घोर,

*

प्रतिबिंब माझे तिच्यात,

डोळ्यातील बाहुली माझ्या,

सोडून दूर ना जाई

तिजवीण सुचेना काही…

*

अंधा-या  रातीलाही

करते जी माझी सोबत,

ती  सावलीच माझी

प्रतिभेच्या गावामधली !!!

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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