हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९० ☆ जीवन की सच्चाई समझो… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक – भावप्रवण कविता – जीवन  की  सच्चाई  समझो… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९० ☆

☆ जीवन  की  सच्चाई  समझो… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

जीवन  की  सच्चाई  समझो |

कहाँ कुँआ  है खाई  समझो ||

कोई   अपना   कौन   पराया |

किसने किसका साथ निभाया ||

हर मुश्किल में खुलतीं आँखें |

मुखड़ा साफ  नजर में आया ||

परिचय की  गहराई  समझो |

जीवन  की  सच्चाई  समझो ||

जो  लगते थे  सबसे  प्यारे |

रहे  सदा  आँखों  के   तारे ||

बुरे  वक्त  में   बदली  रंगत |

लगते हैं अब  मन के  कारे ||

इनकी  ये  चतुराई  समझो |

जीवन की  सच्चाई  समझो ||

मुँह  में राम  बगल  में  छूरी |

जिनके जीवन की यह  धूरी ||

बहुरुपिया है आज  आदमी |

जिनकी फितरत बस दस्तूरी ||

उनकी यह कुटिलाई समझो |

जीवन  की  सच्चाई  समझो ||

है गतिशील  समय यह भाई |

आगे की गति समझ न आई ||

सच्चा सहज सरल हो जीवन |

संतों  ने  यह   बात   सुझाई ||

कर्मों  की  अच्छाई  समझो |

जीवन  की सच्चाई  समझो ||

*

कभी किसी का हक मत छीनो |

समझो  मत  निर्धन  को  हीनो ||

सबका  जीवन  पतझड़  जैसा |

याद  रखो यह  सबक कुलीनो ||

कैसे   करें   भलाई   समझो |

जीवन  की  सच्चाई  समझो ||

*

बनो न कच्चे कभी कान के |

लेना निर्णय  स्वयं जान  के ||

तब ‘संतोष’ मिलेगा तुमको |

निकलोगे जब स्वयं ठान के ||

निंदा   सदा  बुराई   समझो |

जीवन  की  सच्चाई समझो ||

कहाँ कुँआ है खाई  समझो ||

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १० – कविता – मैं, तेरी सखी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मैं, तेरी सखी…‘।)

☆ शशि साहित्य # १० ☆

? कविता – मैं, तेरी सखी…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

मैं बैठी, निपट अकेली,

भारी मन और सजल नयन..

मीठी मधुर, एक आवाज आई,

कैसी हो तुम, प्रिय सखी..

 

पहले मुझसे सुन लो तुम,

मेरा परिचय प्रिय सखी,

 

दुनिया कहती, सिर्फ कान है मेरे,

प्यार भरा दिल भी रखती हूं.. प्रिय सखी,

 

तेरा मन बहलाने को,

दर्द टूटने का भी सह लूंगी..

एक झरोखा बना मुझ में,

और बाहर की दुनिया को देख,

चहकना चिड़ियों का देख,

फूलों का खिलना देख,

सूरज, चंदा का उगना, और फिर ढ़लना देख..

बना ले मुझको अपना चित्र पटल..

और सारी भावनाएं उकेर दे..

ना समझ, खुद को कैद में मेरी,

दुनिया की खुदगर्जी से,

बचा रखा है, अपने आगोश में..

मैं हूं तेरी हमदर्द सखी,

मुझको अपना मान सखी…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ प्रेम… ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ ☆

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

(डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु से साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, दो कविता संग्रह, पाँच कहानी संग्रह,  दो  उपन्यास “फिर एक नयी सुबह” और  “औरत तेरी यही कहानी” प्रकाशित। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। हाल ही में आशीर्वाद सम्मान से अलंकृत । आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता प्रेम… ।)  

☆ कविता ☆ प्रेम… ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ ☆

प्रेम बंधन नहीं

प्रेम सज़ा नहीं

यह तो नशा हैं

यह एक खूबसूरत एहसास

प्रेम को नहीं देख सकते

प्रेम को नहीं छू सकते

मात्र महसूस करो

जहां पनपता प्रेम

वहाँ सारा जहाँ हैं

प्रेम कोई गुड़ियों का नहीं खेल

यह तो आनंद की परिसीमा है

नहीं कर सकता प्रेम !!!

तो नफरत भी किसीसे मत कर

लोगों की नाकामयाब कोशिश

प्रेम की परिभाषा करने की

अन्य सभी चीजों की दे सकते परिभाषा

मात्र महसूस कर सकते हो प्रेम को

बहुत थोड़ा-सा प्यार करके देखो

दूसरों के लिए जीकर तो देखो

तो अनुभव होगा प्रेम का

अपने गम नहीं नज़र आते

बस प्रेम ही नज़र आता हर तरफ

अगर मन में समाया प्रेम तो

दुनिया अपने आंगन में सिमट जाती है

धमनियों में, रगों में बहता है प्रेम

एक बार मात्र एक बार करके देखो

थोड़े क्षण के लिए सही प्रेम करो

प्रेम नहीं कामवासना

प्रेम तो इबादत हैं

यह ढ़ाई शब्द मात्र नहीं

यह हमारी आत्मा में बसी हैं

यह अलौकिक प्रेम हैं

प्रेम तो ईश्वर से मिलन है

प्रेम से प्रभु को पुकार

वह भी है नतमस्तक

मत कर धोखाधड़ी

मत बहा आंसू मगरमच्छ के

मत डर किसी से भी

यह नहीं मात्र आकर्षण

यह नहीं अपराध

दैहिक प्रेम से परे

अलौकिक एहसास है प्रेम

प्रेम कोई गुनाह नहीं

इसे मत तौल तराजू में

प्रेम नहीं किसी की जागीर

प्रेम तो है ईश्वर

प्रेम तो है जीवन

प्रेम तो है सुधा

प्रेम मजबूरी नहीं

प्रेम से प्राप्ति होती

ब्रह्मा, विष्णु औ’ महेश की

एक अनोखी दिशा है प्रेम

जहाँ प्रेम है वहाँ हम औ’ आप है

☆

© डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

सम्प्रति : लेखिका व कवयित्री, सह प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, रामैय्या इन्स्टिट्यूट ओफ बिजनेस स्टडीस, गोकुला, बेंगलूरू

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८३ ☆ बाल गीत – खट्टी – मीठी स्वाद निराला… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८३ ☆ 

☆ बाल गीत – खट्टी – मीठी स्वाद निराला…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।

झटपट खाएँ मटकू लाला।।

* 

नाम अनेकों इसके भइया।

इमली, अम्बा जीभ चटइया।

चटनी से खुल जाता ताला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

दही – भल्ले का स्वाद बढ़ाती।

आलू टिक्की भी गुण गाती।

चाट में चटनी गरममसाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

कच्ची – पक्की खूब सुहाती।

सुमन, सुनीता चट कर जाती।

लटक डाल ललचाए माला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

बील, आमिला, कल्ली, खट्टा।

चटनी पीसे सिल का बट्टा।

दिल को करती है मतवाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

कई विटामिन की है थाती।

दर्द, शुगर, पाचन में साथी।

सबका पड़ता इससे पाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३४ – मुक्तक ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया“) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३४ – प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया  ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

दर्द, अड़ियल सा मुसाफिर आया

पूछ बस्ती से मेरा घर आया

*

उसकी आँखों में हादसे पढ़कर

याद फिर खौफ़ का सफर आया

*

इम्तिहां छोड़, पुस्तिका में वह

प्रश्न सारे ज्वलन्त धर आया

*

ले के शुभकामना गया था मैं

चोट खाकर मिरा जिग़र आया

*

दोस्त के जिस्म की महक लेकर

तीर तरकस में लौटकर अया

*

शांति का जो कपोत भेजा था

खून से हो के तर-बतर आया

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शब्द-ब्रह्म ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शब्द-ब्रह्म ? ?

जंजालों में उलझी

अपनी लघुता पर

जब कभी

लज्जित होता हूँ,

मेरे चारों ओर

उमगने लगते हैं

शब्द ही शब्द,

अपने विराट पर

चकित होता हूँ..!

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०७ – धर्म वही होता बड़ा ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “धर्म वही होता बड़ा”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०७ – धर्म वही होता बड़ा ☆

☆

धर्म वही होता बड़ा, जिसमें हो सद्भाव।

प्रेम दया ममता क्षमा, उपकारी हों भाव।।

 *

मानवता से कब बड़ा, जग ने समझा मर्म।

आदम युग के बाद ही, उपजे हैं सब धर्म।।

 *

बैर बुराई तामसी, नहीं धर्म के अंग।

मारकाट हिंसा सभी, हैं अधर्म के रंग।।

 *

कट्टरता जब धर्म में, घुस जाती है घोर।

मूल भाव खोते सभी, कभी न होती भोर।।

 *

शून्य भाव जबसे हुये, चुभे दिलों में शूल।

प्रेम और सद्भाव ही, सब धर्मों का मूल।।

 *

धर्म सभी हैं खो गये, अब कट्टरता साथ।

राम रहीम ईसा-मसि, पीट रहे हैं माथ।।

*

मानवता ही धर्म है, मुख्य धुरी है एक।

भारत की संस्कृति में, यही बात है नेक।।

 *

हम उदारवादी रहे, लेकर सबको साथ।

सदियों से हैं चल रहे, पकड़े सबका हाथ।।

 *

स्वागत करना जानते, और झुकाना माथ।

पर यह कभी न सोचिए, बंधे हुये हैं हाथ।।

* 

शिक्षा मिली सनातनी, वेदों से यह ज्ञान।

सारा जग है जानता, भारत देश महान।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६९ – अर्थहीन संख्याएँ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – अर्थहीन संख्याएँ…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६९ – अर्थहीन संख्याएँ ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

2 मरे 10 घायल

10 मरे 100 घायल

100 मरे 1000 घायल

बस यूँ ही बढ़ती जायेगी

शून्यों की संख्या बनते जायेंगे आँकड़े

और छपते रहेंगे अखबारों में।

पढ़ते रहें लोग

 बिना किसी उत्तेजना के।

होता है

 ऐसा होता है तब

जब आदमी संख्या में बदल जाता है,

भला, आदमी और संख्या का नाता है?

हम सब संख्यातीत

अब बन कर रह गये हैं

अर्थहीन संख्याएँ।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६८ – “जो विमर्श में जुटीं…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “जो विमर्श में जुटीं–...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “जो विमर्श में जुटीं–...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

कोहरे में ठिठुरन से

ऐसे, सूरज भी हारा।

दिनके चढ़ते चढ़ते

कैसे लुढ़क गया पारा ॥

 

जमे दिखे गांडीव,

सिकुड़ते सव्यसाचियों के ।

धुंध , लपेटे शाल, उलहने

सहें चाचियों के ।

 

चौराहे जलते अलाव भी

लगते बुझे बुझे –

और घरों की खपरैलें तक

लगीं सर्वहारा ॥

 

जो विमर्श में जुटीं

लिये गम्भीर समस्यायें ।

हाथ सेंकने जुटीं गाँव की

बंकिम प्रतिभायें ।

 

बृद्धायें , दरवाजे पर ले

बरोसियाँ बैठीं –

शांति पाठ के बाद पढ़

रहीं ज्यों अमृत धारा ॥

 

लोग रजाई – कम्बल

चेहरे तक लपेट निकले ।

लगे, फूस से ढके, फूल के

हो सुंदर गमले ।

 

आसमान से नीचे तक है

सुरमई अँधियारा –

धुँधला सूरज दिखता नभ

में लगे एक तारा ॥

 

कोहरे में ठिठुरन से ऐसे

सूरज भी हारा ।

दिनके चढ़ते चढ़ते कैसे

लुढक गया पारा ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-02-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४९ ☆ # “उदास बसंत…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “उदास बसंत…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४९  ☆

☆ # “उदास बसंत…” # ☆

☆

यह कैसी बसंती पवन चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

डाली से फूल झरने लगे हैं

भ्रमर भी आह भरने लगे हैं

वीरान हो गई है वाटिका

पतझड़ से सब डरने लगे हैं

मौसम ने यह कैसी चाल चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

आकाश में उड़ती हुई पतंग है

मांझे और धागे में मची हुई जंग है

मांझे पर चढ़ा कट्टरता का रंग है

मांझे से कट रहे वंचितों के अंग है

लहुलूहान अंगो से भरा हर चौराहा हर गली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

पीली पीली सरसों पीले पीले वस्त्र है

बसंती नैनों में कटार से अस्त्र है

पीले को रक्तिम करने पढ रहे वह मंत्र है

उनकी इच्छापूर्ति में लगे सारे तंत्र है

बसंत की मादकता धूमिल हो चली हैं

मुरझाए फूल उदास हर कली है

 

यह कैसी बसंती पवन चली है

मुरझाए फूल उदास हर कली है/

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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