हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #106 – लघुकथा- राम जाने ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर एवं प्रेरणास्पद लघुकथा  “राम जाने।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 106 ☆

☆ लघुकथा- राम जाने☆ 

बाबूजी का स्वभाव बहुत बदल गया था। इस कारण बच्चे चिंतित थे। उसी को जानने के लिए उनका मित्र घनश्याम पास में बैठा था, “यार! एक बात बता, आजकल तुझे अपनी छोटी बेटी की कोई फिक्र नहीं है?”

बाबू जी कुछ देर चुप रहे।

“क्या होगा फिक्र व चिंता करने से?” उन्होंने अपने मित्र घनश्याम से कहा, “मेरे बड़े पुत्र को मैं इंजीनियर बनाना चाहता था। उसके लिए मैंने बहुत कोशिश की। मगर क्या हुआ?”

“तू ही बता?” घनश्याम ने कहा तो बाबूजी बोले, “इंजीनियर बनने के बाद उसने व्यवसाय किया, आज एक सफल व्यवसायी है।”

“हां, यह बात तो सही है।”

“दूसरे बेटे को मैं डॉक्टर बनाना चाहता था,” बाबू जी बोले, “मगर उसे लिखने-पढ़ने का शौक था। वह डॉक्टर बन कर भी बहुत बड़ा साहित्यकार बन चुका है।”

“तो क्या हुआ?” घनश्याम ने कहा, “चिंता इस बात की नहीं है। तेरा स्वभाव बदल गया है, इस बात की है। ना अब तू किसी को रोकता-टोकता है न किसी की चिंता करता है। तेरे बेटा-बेटी सोच रहे हैं कहीं तू बीमार तो नहीं हो गया है?”

“नहीं यार!”

“फिर क्या बात है? आजकल बिल्कुल शांत रहता है।”

“हां यार घनश्याम,” बाबूजी ने एक लंबी सांस लेकर अपने दोस्त को कहा, “देख- मेरी बेटी वही करेगी जो उसे करना है। आखिर वह अपने भाइयों के नक्शे-कदम पर चलेगी। फिर मेरा अनुभव भी यही कहता है। वही होगा जो होना है। वह अच्छा ही होगा। तब उसे चुपचाप देखने और स्वीकार करने में हर्ज ही क्या है,” कहते हुए बाबूजी ने प्रश्नवाचक मुद्रा में आंखों से इशारा करके घनश्याम से पूछा- मैं सही कह रहा हूं ना?

और घनश्याम केवल स्वीकृति में गर्दन हिला कर चुप हो गया।

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

07-02-2022

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा- यात्रा और यात्रा   ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? संजय दृष्टि – लघुकथा- यात्रा और यात्रा  ??

जीवन में लोगों से आहत होते-होते थक गया था वह। लोग बाहर से कहते कुछ, भीतर से सोचते कुछ। वह विचार करता कि ऐसा क्यों घटता है? लोग दोहरा जीवन क्यों जीते हैं? फिर इस तरह तो जीवन में कोई अपना होगा ही नहीं! कैसे चलेगी जीवनयात्रा? 

बार-बार सोचता कि क्या साधन किया जाय जिससे लोगों का मन पढ़ा जा सके? उसकी सोच रंग लाई। अंततः मिल गई उसे मन के उद्गार पढ़ने वाली मशीन।    

विधाता भी अजब संजोग रचता है। वह मशीन लेकर प्रसन्न मन से लौट रहा था कि रास्ते में एक शवयात्रा मिली। कुछ हड़बड़ा-सा गया। पढ़ने चला था जीवन और पहला सामना मृत्यु से हो गया। हड़बड़ाहट में गलती से मशीन का बटन दब गया।

मशीन पर उभरने लगा शव के साथ चल रहे हरेक का मन। दिवंगत को कोई पुण्यात्मा मान रहा था तो कोई स्वार्थसाधु। कुछ के मन में उसकी प्रसिद्धि को लेकर द्वेष था तो कुछ को उसकी संपत्ति से मोह विशेष था। एक वर्ग के मन में उसके प्रति आदर अपार था तो एक वर्ग निर्विकार था। हरेक का अपना विचार था, हरेक का अपना उद्गार था। अलबत्ता दिवंगत पर इन सारे उद्गारों या टीका-टिप्पणी  का कोई प्रभाव नहीं था।

आज लंबे समय आहत मन को राहत अनुभव हुई। लोग क्या कहते हैं, क्या सोचते हैं, किस तरह की टिप्पणी करते हैं, उनके भीतर किस तरह के उद्गार उठते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है अपनी यात्रा को उसी तरह बनाए रखना जिस तरह सारे टीका, सारी टिप्पणियों, सारी आलोचनाओं, सारी प्रशंसाओं के बीच  चल रही होती है अंतिमयात्रा।

अंतिमयात्रा से उसने पढ़ा जीवनयात्रा का पाठ।

 ©  संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # 95 ☆ बुंदेलखंड की कहानियाँ # 6 – पानी कौ धन पानी में … ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

श्री अरुण डनायक जी ने बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर कई कहानियों की रचना की हैं। इन कहानियों में आप बुंदेलखंड की कहावतें और लोकोक्तियों की झलक ही नहीं अपितु, वहां के रहन-सहन से भी रूबरू हो सकेंगे। आप प्रत्येक सप्ताह बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ बुंदेलखंड की कहानियाँ आत्मसात कर सकेंगे।)

बुंदेलखंड कृषि प्रधान क्षेत्र रहा है। यहां के निवासियों का प्रमुख व्यवसाय कृषि कार्य ही रहा है। यह कृषि वर्षा आधारित रही है। पथरीली जमीन, सिंचाई के न्यूनतम साधन, फसल की बुवाई से लेकर उसके पकनें तक प्रकृति की मेहरबानी का आश्रय ऊबड़ खाबड़ वन प्रांतर, जंगली जानवरों व पशु-पक्षियों से फसल को बचाना बहुत मेहनत के काम रहे हैं। और इन्ही कठिनाइयों से उपजी बुन्देली कहावतें और लोकोक्तियाँ। भले चाहे कृषि के मशीनीकरण और रासायनिक खाद के प्रचुर प्रयोग ने कृषि के सदियों पुराने स्वरूप में कुछ बदलाव किए हैं पर आज भी अनुभव-जन्य बुन्देली कृषि कहावतें उपयोगी हैं और कृषकों को खेती किसानी करते रहने की प्रेरणा देती रहती हैं। तो ऐसी ही कुछ कृषि आधारित कहावतों और लोकोक्तियों का एक सुंदर गुलदस्ता है यह कहानी, आप भी आनंद लीजिए।

☆ कथा-कहानी #95 – बुंदेलखंड की कहानियाँ – 6- दोई दीन से गए … ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

॥ पानी कौ धन पानी में, नाक कटी बेईमानी में

शाब्दिक अर्थ :  गलत तरीके से कमाया हुआ धन पानी में बह जाता है और बेईमानी करने के कारण समाज में बेईज्ज्ती होती है सो अलग।

गलत तरीके से धन कमाने की बुंदेलखंड में कभी भी प्रसंशा नहीं की जाती रही है। धंधे व्यापार में जो लोग बेईमानी करते हैं वे समाज में कभी भी श्रद्धा के पात्र नहीं रहे। बुंदेलखंड में ऐसा माना जाता रहा है कि हत्या-हराम से धन कमाने वाले की बड़ी दुर्गति होती है और बदले में उन्हे कष्ट भोगना पड़ता है। यह कहावत भी इसी नैतिक शिक्षा को लेकर है व इसकी पीछे की कहानी ऐसी है कि एक दूध बेचने वाली ग्वालिन थी उसे पैसा जल्दी से जल्दी कमाने की बड़ी ललक थी। इसलिए उसने दूध में पानी मिला मिला कर बेचना चालू कर दिया। कुछ ही महीनों में उसने बहुत धन कमा लिया और इस रकम से एक बढ़िया सोने की नथ बनवाई। नई नई नथ पहन कर और खुशी में मिठाई खाते हुये वह  ग्वालिन अपने गाँव की ओर चल पड़ी। रास्ते भर वह नथ  को अपनी मिठाई लगी उंगलियों से छूती जाती और कल्पना करती कि उसकी नाक में  नथ कितनी सुन्दर  लग रही होगी। वह अपना चेहरा देखने हेतु ललचा ही रही थी कि रास्ते में एक कुआं पडा। उसने कुएं में झाक कर अपना चेहरा देखा और नाक में पहनी हुयी नथ देख देख कर बहुत खुश हो रही थी और अपने प्रियतम से मिलने वाली प्रसंशा की कल्पना कर रही थी। इतने में एक पक्षी ने उसकी नाक में लगी मिठाई को देखकर झपट्टा मारा, जिससे नथ उसकी नाक को फाड़ती हुयी कुएं के पानी में जा गिरी और उसकी नाक मुफ्त में ही कट गई। तभी से यह कहावत चल पड़ी। इसी कहावत से मिलती हुयी एक और नीति आधारित कहावत है –

“जो धन जुरें अधर्म सें, बरस दसक ठहराय।

बरस ग्यारवीं लगत ही जरा मूंढ सें जाय॥“

शाब्दिक अर्थ :  अधर्म से अर्जित किया हुआ धन, केवल दस वर्ष तक ही रुक पाता है। ग्यारवें वर्ष के लगते ही वह समूल नष्ट हो जाता है। अत: अधर्म की कमाई से बचने का प्रयत्न करना चाहिए।     

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य#113 – लघुकथा – *अभिलाषा * ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है अपने कर्मफलों से जीवन में पश्चात् पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा “ *अभिलाषा *”। इस विचारणीय रचनाके लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 112 ☆

? लघु कथा ? *अभिलाषा *? ?

कामता प्रसाद अस्पताल के चक्कर लगा लगा कर थक चुके थे। नौकरी भी जाती रही। भाई भतीजे ने अपना मुंह मोड़ लिया था। पत्नी बेचारी दिनभर उनके साथ लगी रहती।

कामता प्रसाद को जीने की बहुत इच्छा थी। मन में कई सवाल थे, जिनका उनके पास कोई उत्तर नहीं था। जीवन की घटनाओं को लेकर बेटी को बोझ समझ उसे अनाथालय में डाल बेटे की चाहत से सदा सदा के लिए कुछ कारणवश संतान विहीन हो चुके थे। मां ने बड़े प्यार से उस समय उसे अभिलाषा नाम रख छोड़ा था।

कभी-कभी वह अनजान बन उसे अन्य बच्चों की तरह मिल-देखकर, कुछ देकर चली आती। जिसकी कामता प्रसाद को खबर नहीं थी।

दिल पर पत्थर रखकर जीवन को जी रही थी। समय पंख लगा कर चला। मेडिकल स्टाफ नर्स बन चुकी थी अभिलाषा। और बार-बार इस औरत को अपने पास आकर देखने से उसके मन में भी चाहत और एक अपनेपन की भावना बढ़ चुकी थी। पर समझ नहीं पाई कि वह उसकी अपनी मां हैं।

कई वर्षों बाद आज अचानक उसके हॉस्टल के सामने रोते रोते बेसुध हो आवाज लगा रही थी…. अभिलाषा, अभिलाषा। वार्डन कहा जो इच्छा दीदी है मुझे भुला दो।

मां ने  बेटी को कसकर गले लगा लिया और बोली… आज पिता तुल्य इंसान का जीवन तुम्हारे हाथों है बचाओ बेटी। इच्छा हैरानी से बोली… बताइए तो सही क्या बात है। मां ने सारी कहानी एक ही सांस में रोते हुए कह सुनाई और बोली दोनों किडनी खराब हो चुकी है और जीने की बहुत ही इच्छा है।

कोई भी किडनी देने को तैयार नहीं है और ना हमारी सामर्थ है। तुम ही कर सकती हो। सांत्वना देकर उसे जाने को कह वह सोचने लगी।

डॉक्टर से कार्यवाही शुरु कर अपनी ही एक किडनी देने को तैयार हो गई। ये जीवन तो पिता जी ने पहले ही खतम कर चुके हैं। आपरेशन के बाद एक बेड पर  पिताजी और दूसरे बेड पर बेटी। ठीक होने पर कामता प्रसाद ने इच्छा से कहा…. मेरे जीवन की अभिलाषा बनकर क्या मुझे माफ नहीं कर सकोगी बेटी??

अभिलाषा अनजान बन अपना रास्ता चलते बनी जैसे कभी कुछ हुआ और देखा सुना ही नहीं।

कामता प्रसाद के आंखों से खून के आंसू बहने लगे क्या?? ये जीना भी कोई जीना होगा?

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – फ़ोन कॉल ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका)

श्री विजय कुमार

(आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादक श्री विजय कुमार जी  की एक विचारणीय लघुकथा  फ़ोन कॉल)

☆ लघुकथा – फ़ोन कॉल

सीमा सुबह पति को ऑफिस भेजकर फटाफट अपने सभी काम निपटा रही थी, क्योंकि आज बिजली का बिल जमा करवाने की अंतिम तिथि थी, अत: उसे बिजली का बिल भरने जाना था। तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी, काम छोड़कर सीमा ने मोबाइल उठाया, “हेल्लो, कौन बोल रहे हैं?”

“जी, मैं बैंक से रामकुमार बोल रहा हूँ। आपका एटीएम कार्ड ब्लाक हो गया है। आप अपने एटीएम कार्ड का सोलह डिजिट का नंबर बताएं। इसे नया बना कर दो घंटे में आपका एटीएम कार्ड चालू कर दिया जायेगा। आपको बैंक आने की भी जरूरत नहीं है। कार्ड आपके घर पर ही पहुंचा दिया जाएगा। अपना पिन नंबर भी बताएं, और हाँ, बैलेंस भी बताएं।”

एक साथ इतने सारे सवाल सुन कर सीमा चकरा गयी। वह पहले ही जल्दी में थी, इस नयी मुसीबत से और घबरा गयी। उसने आव देखा न ताव, तुरंत एटीएम कार्ड निकाला, कार्ड का नंबर और पिन कार्ड बतला दिया।

दस मिनट के अन्दर ही सीमा के मोबाइल पर दो मेसेज आ गए। उसके बैंक खाते से तीस हज़ार रुपए निकाले जा चुके थे।

सीमा और भी घबरा गयी। वह तुरंत बैंक गयी और बैंक मैनेजर से बैंक से फ़ोन आने की बात कही। तब बैंक मैनेजर ने बताया, “मैडम हमारे बैंक से आपको कोई फ़ोन नहीं किया गया है। ऐसे ही फ़ोन हमारे और भी कई ग्राहकों को किये गए हैं और उनके साथ भी ऐसा ही हुआ है, जो आपके साथ हुआ है। हमने तो अखबार में भी कई बार यह खबर छपवाई है कि हमारे बैंक से किसी को ऐसे फोन नहीं किये जाते, अत: कृपया अपना एटीएम कार्ड नंबर और पिन नम्बर किसी को भी न बताएं।”

सीमा को समझते देर नहीं लगी कि उस एक फ़ोन कॉल से वह ठगी जा चुकी थी।

 

©  श्री विजय कुमार

सह-संपादक ‘शुभ तारिका’ (मासिक पत्रिका)

संपर्क – # 103-सी, अशोक नगर, नज़दीक शिव मंदिर, अम्बाला छावनी- 133001 (हरियाणा)
ई मेल- urmi.klm@gmail.com मोबाइल : 9813130512

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #78 – महानता के लक्षण ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। 

अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)

☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #78 – महानता के लक्षण ☆ श्री आशीष कुमार

एक संत थे। वह नदी तट पर आश्रम बनाकर रहते और अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे। कुंभी नामक उनका एक शिष्य दिन-रात उनके पास ही रहता था। संत उसके प्रति काफी स्नेह रखते थे। एक दिन उसने संत से सवाल किया, ‘गुरुजी, मनुष्य महान किस तरह बन सकता है?’ संत बोले, ‘कोई भी मनुष्य महान बन सकता है लेकिन उसके लिए कुछ बातों को अपने दिलो-दिमाग में उतारना होगा।’

इस पर कुंभी बोला, ‘कौन सी बातों को?’ संत ने कुंभी की बात सुनकर एक पुतला मंगवाया। संत के आदेश पर पुतला लाया गया। संत ने कुंभी से कहा कि वह उस पुतले की खूब प्रशंसा करे। कुंभी ने पुतले की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए। वह बड़ी देर तक ऐसा करता रहा। इसके बाद संत बोले, ‘अब तुम पुतले का अपमान करो।’

संत के कहने पर कुंभी ने पुतले का अपमान करना शुरू कर दिया। पुतला क्या करता! वह अब भी शांत रहा। संत बोले, ‘तुमने इस पुतले की प्रशंसा व अपमान करने पर क्या देखा?’ कुंभी बोला, ‘गुरुजी, मैंने देखा कि पुतले पर प्रशंसा व अपमान का कुछ भी फर्क नहीं पड़ा।’

कुंभी की बात सुनकर संत बोले, ‘बस महान बनने का यही एक सरल उपाय है। जो व्यक्ति मान-अपमान को समान रूप से सह लेता है, वही महान कहलाता है। महान बनने का इससे बढ़िया उपाय कोई और नहीं हो सकता।’

संत की इस व्याख्या से उनके सभी शिष्य सहमत हो गए और सबने प्रण किया कि वे अपने जीवन में प्रशंसा व अपमान को समान रूप से लेने का प्रयास करेंगे।

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – ख़ून के रिश्ते ☆ श्री हरभगवान चावला

श्री हरभगवान चावला

ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी का हार्दिक स्वागत।sअब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा ‘ख़ून के रिश्ते’।)

☆ लघुकथा – ख़ून के रिश्ते ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

आज पुश्तैनी मकान में अपना हिस्सा बँटाने शहर से तीनों भाई जुगल के घर आए थे। चाय पीते हुए तीनों भाई कह रहे थे कि मकान की क़ीमत लगवा ली जाए और उनके हिस्से के पैसे जुगल उन्हें दे दे। जुगल के पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उसे वह दिन याद आ रहा था जब पिता लकवाग्रस्त होकर खाट से आ लगे थे। बड़ा भाई तब तक बैंक में अफ़सर हो चुका था, बाक़ी दोनों उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। जुगल तब दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था। तीनों ने जुगल की मिन्नत की थी कि वह पिता की सेवा करे, माँ का ख़याल रखे। तीनों में से किसी का वहाँ रुक पाना संभव नहीं है। बदले में वे पुश्तैनी ज़मीन और मकान में कोई हिस्सा नहीं लेंगे। पिता ने कपास के व्यापार में जो पैसा कमाया था, वह सारा पैसा उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे भाइयों को दे दिया गया। जुगल की पढ़ाई छूट गई। पिता चार साल के लगभग बिस्तर पर रहे। अपने आख़िरी  दिनों में तो वे मल मूत्र में लिथड़े रहते और जुगल चुपचाप उनकी सेवा में लगा रहता। उनकी मौत के दो साल बाद माँ भी चली गई। तब तक दूसरा भाई बिजली विभाग में इंजीनियर हो गया था, तीसरे का कारोबार शहर में बहुत अच्छा चल रहा था। माँ की तेरहवीं पर ही भाइयों ने ज़मीन बाँट ली। जुगल के पास एक एकड़ ज़मीन बची थी।

अब जुगल लोगों के घरों में गोबर उठाने तथा भैंसों का दूध निकालने का काम करके किसी तरह गुज़ारा कर रहा था… और आज भाई मकान में अपना हिस्सा बँटाने आए थे। चाय पी जा चुकी थी।

बड़े ने खँखारते हुए कहा, “तो भाई, बुला पंचायत को, मकान की क़ीमत लगवा लें।”

जुगल ने जवाब नहीं दिया। वह तेज़ी से एक तरफ़ मुड़ा और एक चारपाई उठाकर घर के बाहर रख दी, फिर बड़ा ट्रंक खींचने की कोशिश में लग गया। कामयाब नहीं हुआ तो बीवी से कहा, “ज़रा उधर से धक्का मार।” भाई हैरान खड़े समझने की कोशिश कर रहे थे कि हो क्या रहा है? ट्रंक दरवाज़े तक पहुँचने को था कि एक भाई ने पूछा, “ये क्या हो रहा है जुगल?”

“भाइयों का घर ख़ाली कर रहा हूँ। देने को मेरे पास पैसे नहीं हैं। आप लोग क़ीमत लगवा लो। बेचकर पैसा बाँट लेना। मुझे कोई हिस्सा नहीं चाहिए।”

“पर तुम लोग रहोगे कहाँ?” दूसरे भाई ने पूछा।

“तुम्हें चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। लाखों लोग आसमान की छत के नीचे रहते हैं, हम भी रह लेंगे।”

 

© हरभगवान चावला

सम्पर्क –  406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 85 ☆ गोली लगी, पर तिरंगे को झुकने न दिया ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है युवा स्वतंत्रता सेनानी कनकलता बरुआ की शौर्यगाथा  ‘गोली लगी, पर तिरंगे को झुकने न दिया’. डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस ऐतिहासिक लघुकथा रचने  के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 85 ☆

☆ लघुकथा – गोली लगी, पर तिरंगे को झुकने न दिया ☆

अठ्ठारह साल की दुबली – पतली लडकी कनकलता बरुआ हाथ में अपने देश की शान तिरंगा झंडा लिए जुलूस के आगे – आगे चल रही थी। उसकी उम्र तो कम थी लेकिन जोश में कमी न थी। उसके चेहरे पर प्रसन्न्ता थी साथ ही देश के लिए कुर्बानी का जज्बा भी साफ दिखाई दे रहा था। भारत माता की जय से वातावरण गूँज रहा था। भारत छोडो आंदोलन तेजी पर था। कनकलता बरुआ के नेतृत्व में स्वतंत्रता सेनानियों ने आसाम के तेजपुर से थोडी दूर गहपुर थाने पर तिरंगा फहराने का निश्चय किया। थाना प्रमुख जुलूस को रोकने के लिए सामने आ खड़ा हुआ। कनकलता जुलूस में सबसे आगे थी, उसने निडरता से कहा- “आप हमारे रास्ते से हट जाइए। हम आपसे कोई विवाद नहीं करना चाहते हैं। हम थाने पर तिरंगा फहराने आए हैं और अपना काम करके लौट जाएंगे।“ थाने के प्रमुख ने उसकी एक ना सुनी और तेजी से कहा – ‘अगर कोई थोडा भी आगे बढा तो मैं सबको गोली से भून दूंगा। वापस लौट जाओ।‘

कनकलता इस धमकी से ना तो डरी और ना रुकी, वह आगे बढती रही। उसके पीछे था बडा हुजूम जिसमें स्वाधीनता के दीवाने ‘ भारत देश हमारा है ‘ के नारे लगा रहे थे। नारों से आकाश को गुंजाती हुई भीड थाने की ओर बढती ही जा रही थी। जब इन स्वतंत्रता सेनानियों ने पुलिस की बात ना सुनी तो उन्होंने जुलूस पर गोलियों बरसानी शुरू कर दीं। गोलियों की बौछार भी स्वातंत्रता के इन दीवानों को ना रोक सकी। पहली गोली कनकलता को लगी। कनकलता गोली लगने पर गिर पड़ी, किंतु उसने अपने हाथ में पकडे तिरंगे को झुकने नहीं दिया। उसकी शहादत ने स्वतंत्रता सेनानियों में जोश और आक्रोश भर दिया। हर कोई सबसे पहले झंडा फहराना चाहता था। कनकलता के हाथ से तिरंगा लेकर युवक आगे बढ़ते गए, एक के बाद एक शहीद होते गए, लेकिन झंडे को न तो झुकने दिया न ही गिरने दिया।

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #105 – लघुकथा- दूसरी शादी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर एवं प्रेरणास्पद लघुकथा  “दूसरी शादी।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 105 ☆

☆ लघुकथा- दूसरी शादी ☆ 

“मैं दूसरी शादी करके रहूंगी,” यह सुनते हैं घर में सन्नाटा पसर गया। ससुर समान पिता ने कहा, “बेटी! अभी तेरे शहीद पति की चिता भी ठंडी नहीं हुई और तूने यह फैसला कर लिया।”

“हां पिताजी, मैं नहीं चाहती हूं कि मैं अपने इरादे से डिग जाऊं।”

“इस बारे में एक बार और सोच लेती बेटी,” पिता बोले, “माना कि अभी शादी को एक बसंत भी नहीं बीता है मगर इस बच्चे के बारे में कुछ तो सोच लेती।”

“हां बेटी,” कब से चुप बैठी सासु ने कहा, “शादी के फैसले थोड़े दिनों के लिए टाल दो बेटी?”

“नहीं सासु मां, अब मैं इसे नहीं टाल सकती हूं। मैं तो शादी करने जा रही हूं,” कहते हुए शहीद की विधवा ने एक पत्र आगे बढ़ा दिया, “यह रहा मेरा विवाह का अनुबंध पत्र।”

उस अनुबंध पत्र को पढ़कर ससुर का हाथ आशीर्वाद के लिए उठ गया। वह अनुबंध पत्र नहीं फौज में विधवा की नियुक्ति का पत्र था।

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

31-01-2022

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा- बुतयुग ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा- बुतयुग  ??

सारे बदहवास थे। इस तरह की बीमारी इससे पहले न देखी, न सुनी। उस लेटे हुए आदमी के अंग एक-एक कर धीरे-धीरे पत्थर होते जा रहे थे।

अचानक एक औरत की चीख सन्नाटे को चीरने लगी। एक आदमी बालों से पकड़कर औरत को लात, मुक्कों से बेदम मार रहा था। वह चीख रही थी, मदद की गुहार लगा रही थी। भीड़ चुप थी। आदमी ने हैवान की मानिंद चाकू से कई वार औरत पर किए।

औरत अब लोथड़ा थी। आदमी जा चुका था। भीड़ मर चुकी थी।

उधर शोर उठा, ‘ अरे आदमी बुत में बदल गया, आदमी बुत में बदल गया।’ लेटा हुआ आदमी ऊपर से नीचे तक पूरा पत्थर हो चुका था।

बुत युग की यह शुरुआत थी।

©  संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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