हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 294 ☆ व्यंग्य – हमारे नगर में मनभावन सावन ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘हमारे नगर में मनभावन सावन‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 294 ☆

☆ व्यंग्य ☆ हमारे नगर में मनभावन सावन

मैं अपने दरवाजे पर कुर्सी डाले बैठा हूं और बाहर वर्षा हो रही है, कवियों के शब्दों में ‘टापुर टुपुर’। किसी कवि को यह नायिका की ‘रुनझुन’ की याद दिलाती है, किसी को ‘छनछन’ की। रोमांटिक मिजाज़ के कवियों को आकाश में फैले काले मेघों में किसी मुग्धा की केश राशि नज़र आती है।मेरे मन से भी कविता फूट रही है। गुनगुनाने को जी कर रहा है।

बारिश ज़ोर पकड़ रही है। आसपास पड़े खाली प्लॉट भर रहे हैं। ये प्लॉट वर्षों से ऐसे ही खाली पड़े हैं। कारण यह है कि उनके मालिकों को विश्वास है कि एक दिन ये सोना उगलेंगे। ये प्लॉट साल के ज़्यादातर दिन दुखिया की आंख से डबडबाये रहते हैं। बारिश ज़्यादा होती है तो ये अपना अतिरिक्त जल सड़क को सौंप देते हैं।

बारिश और ज़ोर पकड़ रही है। अब मेरे मन से नायिका और कविता लुप्त हो रही है। कारण  यह है कि स्थानीय प्रशासन ने जो नगर के क्षेत्रों का ‘उचले’, ‘बिचले’ और ‘निचले’ के बीच वर्गीकरण किया है उसके हिसाब से मेरी कॉलोनी ‘निचले’ क्षेत्र में आती है। जब ज़्यादा वर्षा होती है तब नगर के अनेक नालों का जल हमारी कॉलोनी से प्रवाहित होता है। नगर में किसी की कोई चीज़ पानी में बह जाए तो कृपया हमें सूचित करें। हम अपनी कॉलोनी में उसे ज़ब्त करके आपकी सेवा में प्रेषित कर देंगे।

पहले यह नगर तालों (तालाबों )के लिए प्रसिद्ध था। अब नालों के लिए मशहूर है। कभी  यहां 30-35 तालाब  थे। वे सब पुर गये। उन पर बसी बस्तियों को अब पुराने तालों के नाम से जाना जाता है।अब नगर की शोभा के लिए नाले ही बचे हैं। हमारा नगर- निगम साल भर उन्हीं की साज-संवार में लगा रहता है।

आदिकाल से कवि वर्षा के सौन्दर्य पर सिर धुनते रहे हैं। ये सब ‘उचले’ या कम से कम ‘बिचले’ क्षेत्र के वासी रहे होंगे,अन्यथा वर्षा के सौन्दर्य से अभिभूत होने के बजाय ‘नर्वस ब्रेकडाउन’ के शिकार होकर शोकगीत लिख रहे होते।

अब घंटों से घनघोर वर्षा हो रही है। जल्दी ही नगर के पानी की शोभायात्रा हमारी कॉलोनी से गुज़रेगी। थोड़ी और प्रतीक्षा कीजिए। नालों का यह  पावन जल हमारे घरों में प्रवेश कर हमारा पानी उतारेगा। जिन लोगों ने वर्ष भर के लिए बोरों में गल्ला जमा कर रखा है वे चिन्तित हैं।

इसीलिए संग्रह की प्रवृत्ति बुरी मानी जाती है। जो सिर्फ महीने-पंद्रह दिन के लिए ही गल्ला खरीद पाते हैं वे हल्के हैं।

‘रामायण’ में राम ने कहा था ‘घन घमंड गर्जत घनघोरा, प्रिया हीन डरपत मन  मोरा।’ हमारी कॉलोनी में जिन घरों से पत्नी अनुपस्थित होती है वहां पतियों की हालत डर के मारे खराब हो जाती है। कारण यह है कि बारिश के वक्त पत्नी ही सामान को सुरक्षित रखने की सारी दौड़भाग करती है। पतिदेव काम कम करते हैं, हल्ला ज़्यादा मचाते हैं। अन्त में  परेशान होकर पत्नी उनसे कहती है, ‘प्राणनाथ, प्राण मत खाइए। एक तरफ चुपचाप बैठ जाइए और मुझे काम करने दीजिए।’

अब तक पानी कई घरों में प्रवेश कर चुका है। जिनके मकान हाल में बने, ऊंचे हैं वे कमर पर हाथ धरे अपनी सीढ़ियों पर खड़े चिल्ला चिल्ला कर दूसरों का हाल पूछ रहे हैं— ‘शर्मा जी! कहां तक पहुंचा?’, ‘शुक्ला जी! भीतर तक पहुंच गया क्या? अरे राम राम।’ दरअसल वे दूसरों का हाल-चाल पूछ पूछ कर खुद को शाबाशी देते हैं कि उन्होंने कितनी अक्लमन्दी दिखायी जो ऊंचा घर बनवाया। वे भीतर ही भीतर अपनी पीठ ठोक रहे होते हैं।

यह बाढ़ का पानी भी पूंजीवादी होता है। निचले स्तर वालों को परेशान करता है और ऊंचे स्तर वालों को छोड़ देता है।

अब पानी घर के अन्दर है। पानी के साथ अनेक जीव भी बारातियों जैसे अन्दर आ गये हैं। कहीं मेंढक कूद रहा है, कहीं कनखजूरा आकर चिपक गया है, कहीं सर्प-शिशु बल खा रहा है। वैसे मैं सब जीवों से प्रेम करता हूं, लेकिन इस वक्त मेरा मन स्वागत-गीत गाने का नहीं है।

हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि पोस्टमैन भी बरसात में हमारे क्षेत्र में घुसने से घबराते हैं। एक दिन पोस्टमैन ने मोहल्ले की सारी चिट्ठियां रास्ते में मुझे पकड़ा दीं। कहा, ‘बाबूजी, जरा पहुंचा देना। आपका ही मोहल्ला है।’

अब विवाह-योग्य कन्याओं के पिता हमारे नगर के उचला बिचला क्षेत्र देखकर ही कन्या देते हैं। निचले क्षेत्र वालों को बता दिया जाता है कि सगाई भले ही हो जाए, शादी तभी होगी जब वे उचले या बिचले क्षेत्र में मकान ले लें।

अन्त में सूचनार्थ बता दूं कि हमारी कॉलोनी ने योजना बनायी है कि अगली बार जब हमारे नगर के पवित्र नाले हमारी कॉलोनी से गुज़रेंगे तो कॉलोनी की महिलाएं उनमें दीप प्रवाहित करके वर्षा रानी का अभिनन्दन करेंगीं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 56 – दूध वाले का लोकतंत्र ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना दूध वाले का लोकतंत्र)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 56 – दूध वाले का लोकतंत्र ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

 गांव में एक दूधवाला था — नाम था लोकतंत्र यादव। जी हाँ, नाम सुनकर भ्रमित मत होइए। न वह संसद जाता था, न किसी गठबंधन में शामिल होता था, पर पूरे गांव की राजनीति उसी के घर से शुरू होकर वहीं समाप्त होती थी। उसके दरवाजे पर हर सुबह दूध लेने की कतार ऐसी लगती थी जैसे मंत्रिमंडल बनने से पहले समर्थन की लाइन। “भैया, मलाई वाला देना!” कोई चिल्लाता, “भैया, आज तो पानी थोड़ा कम मिलाना!” कोई हाथ जोड़ता। लोकतंत्र यादव मुस्कुरा कर कहता, “सबको बराबर मलाई मिलेगी, पर मलाई मेरी नीयत में नहीं, नीतियों में है।” और ये बात सुनकर लोग इतने अभिभूत हो जाते थे जैसे उन्होंने गाँधीजी का अंतिम भाषण सुन लिया हो।

लोकतंत्र यादव का एक सपना था — गांव में ‘दूध सिद्धांत दल’ बनाना। उनका मानना था कि राजनीति को अगर कुछ बचा सकता है तो वह है भैंस की सच्चाई। उन्होंने एक पार्टी बनाई — ‘सफेद क्रांति मोर्चा’।  एजेंडा बड़ा सीधा था — हर आदमी को एक गिलास दूध, एक किलो गोबर, और दो झूठे वादे मुफ्त। गांव के सारे बुद्धिजीवी इस विचार से प्रभावित हुए। मास्टर हरिदेव बोले, “अरे, ये तो दूध के नेहरू निकले!” और पंडित गदाधर ने तो अपनी पुरानी धोती तक पार्टी को दान कर दी — बोले, “अब समय है, जब गोबर को सरकार में स्थान मिले।”

पर लोकतंत्र यादव को जल्द ही समझ आ गया कि सिद्धांत से राजनीति चलाना वैसा ही है जैसे बिन चाय के बिस्कुट बेचना। गांव के नेता पहले सिद्धांतों की शपथ लेते, फिर हर बार दही में पानी मिलाते। एक दिन एक नौजवान कार्यकर्ता बोला, “नेता जी, सिद्धांत तो ठीक हैं पर मलाई कैसे मिलेगी?” लोकतंत्र यादव ने गंभीर होकर उत्तर दिया, “बेटा, मलाई मांगोगे तो दही जमाना पड़ेगा, और दही के लिए दूध चाहिए, और दूध के लिए भैंस — और भैंस तो अब संसद में है!”

एक दिन गांव में नई सरकार बनी — ‘स्वच्छ दुहाई दल’। नारा था — “दूध में मिलावट नहीं, पर सपनों में छूट रहेगी।” मुख्यमंत्री बन बैठे — टकले ताऊ। उनकी पहली घोषणा थी — “अब से कोई भी दूधवाला सुबह 4 बजे से पहले दूध नहीं दुहेगा। जनता को ताजगी चाहिए!” इस पर लोकतंत्र यादव बोले — “सर, ताजगी हम लाते हैं, सरकार सिर्फ बिल देती है।” पर टकले ताऊ ने फरमान जारी कर दिया। दूध देर से आने लगा, बच्चों के टिफिन में चाय की जगह पानी और शक्कर घुलने लगे।

गांव के लोगों ने विद्रोह किया। वे ‘भैंस बचाओ मोर्चा’ लेकर पंचायत पहुंच गए। नारों की गूंज थी — “मलाई हमारी, नीतियाँ तुम्हारी क्यों?” और “भैंस तेरी, दूध हमारा!” लोकतंत्र यादव को जनता ने फिर से नेता घोषित कर दिया। लेकिन इस बार वे बोले — “अब राजनीति नहीं, अब मैं सिर्फ भैंस चराऊँगा।” लोगों ने पैर पकड़ लिए — “नेता जी, एक बार फिर मलाई दिलवा दो।” लोकतंत्र यादव ने एक लंबी साँस ली — “जिस देश में सिद्धांत मलाई से भारी हो जाए, वहां दूध भी आँसू बन जाता है।”

कुछ दिनों बाद गांव में ‘त्यागी दल’ बना। घोषणा हुई — “हम पद नहीं लेंगे। हम सेवक बनेंगे।” गांव के अखबार ‘गोधन टाइम्स’ ने ब्रेकिंग न्यूज़ चलाई — “त्यागियों की क्रांति: अब नेता नहीं, दुहैया सेवक बनेंगे।” सब जनता खुश। पर शाम होते-होते त्यागियों में झगड़ा शुरू हो गया — “सेवक कौन बनेगा?” रामधनी बोले — “मैं दूध उबालूँगा।” हरिनाथ गरजे — “मैं मलाई निकालूँगा!” चंद्रकांत भड़क उठे — “सब मलाई तू ही लेगा?” और फिर पतीले हवा में उड़ने लगे। दूध, सिद्धांत और सपने सब बह गए — भैंस गुमसुम खड़ी रही।

अब गांव में एक स्मारक है — ‘दूध सिद्धांत शहीद स्थल’। वहां लिखा है — “यहाँ लोकतंत्र यादव ने आखिरी बार सिद्धांत दुहे थे।” लोग आते हैं, फूल चढ़ाते हैं, बच्चे पूछते हैं — “पापा, ये सिद्धांत किस जानवर का नाम है?” और पापा आह भरते हैं — “बेटा, ये एक ऐसी भैंस थी जो कभी लोकतंत्र में दूध देती थी। अब तो वह सरकारी गोशाला में भर्ती है, और उसकी नज़रें हमेशा रास्ता ताकती रहती हैं — शायद कोई फिर से आदर्शवाद की घास लेकर आए।”

अंत में, लोकतंत्र यादव बूढ़े हो चुके थे। उन्होंने अपने आखिरी भाषण में कहा — “सिद्धांतों का बोझ इतना भारी होता है कि अगर दूध में डाल दो तो मलाई डूब जाती है।” और ये कह कर उन्होंने अपने पुराने दूध के डिब्बे को माला पहनाकर बंद कर दिया। आंखों से आँसू छलक पड़े। कोई पूछ बैठा — “क्या अब दूध भी राजनीति करेगा?” जवाब आया — “नहीं बेटा, अब राजनीति ही दूध को पी जाएगी।” गांव वालों ने एक स्वर में कहा — “अब तो भैंस ही संविधान लिखेगी।” और भैंस… वो चुपचाप खड़ी रही, उसकी आंखों में एक बूंद आंसू चमक रहा था — शायद किसी पुराने नेता का बचा हुआ वादा।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ उलट कर देखे दो बड़े  ☆ श्री तीरथ सिंह खरबंदा ☆

श्री तीरथ सिंह खरबंदा

(ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री तीरथ सिंह खरबंदाजी का हार्दिक स्वागत। आपने विधि विषय में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की है। व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में सतत सक्रिय, विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन-प्रकाशन तथा हलफनामा, इक्कीसवीं सदी के अंतरराष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यंग्यकार एवं हमारे समय के धनुर्धारी व्यंग्यकार, साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। वर्ष 2023 में पहला व्यंग्य संग्रह “सुना है आप बहुत उल्लू हैं” प्रकाशित हुआ। वर्ष 2024 में दूसरा व्यंग्य संग्रह “झूठ टोपियाँ बदलता रहा” प्रकाशित हुआ। वर्ष 2022 में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा स्पंदन साहित्य सम्मानसंप्रति : इंदौर में विधि एवं साहित्य के क्षेत्र में सतत सक्रिय। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – उलट कर देखे दो बड़े )

☆ व्यंग्य ☆ उलट कर देखे दो बड़े ☆ श्री तीरथ सिंह खरबंदा ☆

एक बड़े लेखक की किताब का विमोचन था। किसी बड़े नेता (जी) को बुलाया गया। नेता (जी) शायद बहुत दिनों से भरे पड़े थे। जब बोलना शुरू किया तो फूट पड़े। रुके ही नहीं, बोलते चले गए। जितनी बड़ी किताब न थी उससे कहीं ज्यादा लंबा भाषण हो गया। किताब के बारे में भला कुछ जानते तो बोलते। किन्तु कुछ बोलना भी जरूरी था। बोले – किताब का आवरण पृष्ठ बहुत सुंदर है। कागज की क्वालिटी एक नंबर की है। इसकी छपाई बहुत उम्दा है। अच्छी खासी मोटी किताब है। लगता है बहुत मेहनत की है। और फिर लगे हाथ उसकी पृष्ठ संख्या भी गिनवा डाली। साथ ही किताब पलटकर उसकी कीमत देखने लगे। होले से फुसफुसाकर बोले बहुत ज्यादा है, सस्ती होनी चाहिए थी। नेता चाहता कि किताब सस्ती हो। किन्तु बढ़ती महंगाई के बारे में उससे पूछो तो बंगले झांकने लगता है।

लेखक ने नेता के स्वागत में पलक पावड़े बिछा दिए। स्वागत भाषण में अपनी पूरी प्रतिभा खोल कर रख दी। नेता की तारीफ में खुलकर ऐसे-ऐसे अलंकारों का प्रयोग किया कि जिसे सुन श्रोता तो क्या स्वयं नेता भी अचंभित थे।

उपस्थित लोग नेता को नमस्कार करने का अवसर खोज रहे थे। बड़े नेता को सभी नमस्कार करते हैं। बड़े लेखक का लिखा सभी पढ़ते हैं किन्तु वह दूसरों का लिखा कभी नहीं पढ़ता। बड़े नेता और बड़े लेखक दोनों की रीति नीति एक जैसी होती है, दोनों ही ईर्ष्यालु होते हैं। यदि वे ईर्ष्यालु नहीं हैं तो समझो उनमें बड़ा बनने की काबिलियत नहीं है। वे दूसरों की बुराइयाँ ढूंढते-ढूंढते ही एक दिन बड़े बन जाते हैं।

बड़ा नेता मन ही मन पूरा हिसाब रखता है, किसने नमस्कार किया और किसने नहीं और फिर मौका आने पर सबका हिसाब बराबर करता है। बड़ा लेखक भी हिसाब रखता है, किसने उसके लिखे की तारीफ की, और किसने उसे इग्नोर किया। मौका आने पर वह भी हिसाब बराबर करता है। ये दोनों प्राणी हिसाब के बहुत पक्के होते हैं। मौका मिला नहीं कि सूद सहित हिसाब निपटाते हैं।

आजकल बड़ा लेखक भी बड़े नेता से ही अपनी किताब का विमोचन करवा कर ज्यादा खुश होता है। यह भी हो सकता है कि वह आज मौका पाकर उसे चिढ़ाना चाहता हो। देख मैंने किताब लिख डाली। क्या तुम कभी लिख सकते हो। यह भी हो सकता है कि यह मेरी कोरी आशंका हो। इस बार लेखक का इरादा कुछ और ही हो। हो सकता है कि वह किसी सरकारी पुरस्कार की जुगाड़ में लगा हो और यह सब उसी रणनीति का एक हिस्सा हो।

जिसे एक बार इनाम का चस्का लग जाए तो वह ताउम्र जाता नहीं है। वह चाहता है कि सारे इनाम उसी के नाम हो जाएँ। सरकारी इनाम का नंबर आता है तो कहता है चाहो तो मेरे सारे इनाम ले लो पर बदले में मुझे एक अदद सरकारी इनाम दे दो। सरकारी इनाम को वह छाती से चिपकाकर रखना चाहता है।

एक बार जिसे सरकारी इनाम मिल जाए उस पर बड़ा लेखक होने की मोहर चस्पा हो जाती है। ठीक ऐसा ही किसी नेता के साथ तब होता है जब उसे सत्ता में कोई पद मिल जाए। वह रातों रात बड़ा नेता हो जाता है। एक बार ब्रांडेड हो जाने के बाद कचरा माल भी बिकने लगता है।

एक बार जो नेता बन गया तो समझो वह बहुत कुछ बन गया। बड़ा नेता बनते ही वह सबको नसीहतें देने लगता है। परम ज्ञानी की तरह ज्ञान बांटने लगता है। उसकी डिग्री के बारे में बात करो तो दाएं बाएं देखने लगता है। अब्बा-डब्बा-जब्बा करने लगता है। प्रश्न पूछने वाले को दुश्मन की मानिंद घूरने लगता है। जैसे उसने कोई गुनाह कर दिया हो।

बड़ा नेता जुगाड़ से कुर्सी और लेखक इनाम हासिल करता है। वैसे नेता लेखक को और लेखक नेता को कुछ नहीं समझता है। दोनों में छत्तीस का आंकड़ा होता है किंतु कब यह त्रैसठ के आंकड़े में बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। बस मौका मिलने पर दोनों आपस में समझ लेते हैं।

बड़े नेता और लेखक दोनों का पेट कभी नहीं भरता। नेता का पेट हमेशा खाली ही रहता है उसे चाहे जो पद मिल जाए। लेखक को चाहे जितना यश मिल जाए उसका पेट भी नहीं भरता। ये दोनों कथित बड़े जीव हमेशा दूसरों की लाइन छोटी कर अपनी लाइन बड़ी करने के चक्कर में रहते हैं। इसमें जो जितना सफल हो जाए वह उतना ही बड़ा कहलाता है। यदि आप भी इनके जैसा बड़ा बनने की दौड़ में लगे हैं तो यह सब आपके बहुत काम का है।

©  श्री तीरथ सिंह खरबंदा

ई-मेल : tirath.kharbanda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # 52 ☆ व्यंग्य – “झेड प्लस प्लस से झेड स्क्वेयर सिक्सटीन तक…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  झेड प्लस प्लस से झेड स्क्वेयर सिक्सटीन तक…” ।)

☆ शेष कुशल # 52 ☆

☆ व्यंग्य – “झेड प्लस प्लस से झेड स्क्वेयर सिक्सटीन तक… – शांतिलाल जैन 

‘सर, सारी गलती अंग्रेजों की है. अल्फाबेट में ‘झेड’ से आगे कोई अक्षर ही नहीं बनाया आलसियों ने. बनाया होता तो बनवारी हमेशा आपके लेवल की सिक्युरिटी से दो चार अक्षर पीछे ही रहा होता.’ – पीएस ने सर का मूड नार्मल करने की कोशिश की.

पार्टी में पिछले दिनों अपने घोर विरोधी बनवारी को झेड लेवल की सिक्युरिटी दो प्लस के साथ मिल गई है, बस तभी से वे खिन्न हैं. हालाँकि झेड प्लस प्लस सिक्युरिटी उनके पास पहले से ही है. मगर दूसरों को भी मिल जाने से दुखी हैं. अंदेशे में दुबले हो रहे हैं. अंदेशा वाजिब भी है श्रीमान. एक बार आदमी साधारण से चलकर ‘वीवीआई’ मकाम तक पहुँच जाए, ‘पी’ तो महज़ फ्लैश एंड ब्लड वाला परसन भर रह जाता है, आदमियत खो जाती है. सिस्टम में धंसा एक आदमी जब अपने को महत्वपूर्ण मनवाने के लिए अति करने पर उतर आए तो अतिमहत्वपूर्ण व्यक्ति का लेवल चस्पा करवा लेता है. पहले उन्होंने किया, आज बनवारी ने करा लिया है. वीवीआईपियों की भीड़ से बैकुंठ संकड़ा पड़ गया है.

जीवनशैली में वे आने वाले समय में आ सकने वाले बदलावों से आज ही डरने लगे हैं. वे आगे देख पा रहे हैं कि वीवीआईपी इतने अधिक हो गए हैं कि शाही स्नान के दिन गाड़ी सीधे गंगा के घाट तक नहीं ले जा पा रहे हैं. वीवीआईपिओं की भीड़ में भगदड़ मच गयी है और वे कुचले जा रहे हैं. उनसे कहा जा है कि सर वीवीआईपी-क्यू उस तरफ लगी है, कृपया उधर से. अभी तक तो उन्हें कभी किसी क्यू में लगना ही नहीं पड़ा मगर हर किसी ऐरे गैरे नत्थू खैरे को वीवीआईपी स्टेटस दिए जाने से अब उनको लाइन में लगना पड़ रहा है. मंदिरों में प्रोटोकॉल पाए भक्तों की लाइन आम भक्तों की लाइन से ज्यादा लंबी हो गई है. ये क्या, उनकी गाड़ी ट्राफिक सिग्नल पर रोक दी गई है. तीखी धूप में जाम में फंसी जनता को देख उनका वीवीआईपी सुख चरम को पा जाता था, बनवारी प्रकरण के बाद ऐसा नहीं हो पा रहा है. वीवीआईपी रोक दिए गए हैं, बताईए भला. एसपी साब सफाई दे रहें हैं – ‘सर ये जो ट्राफिक देख रहे हैं आप वीवीआईपियों का ही है. आम आदमी ने तो घर से निकलना ही बंद कर दिया है. सॉरी सर. ग्रीन हो गया है निकल जाईए.’

अभी तक स्टेट प्रोटोकॉल ऑफिसर उनकी अगवानी को आता रहा मगर पिछले दिनों प्रोटोकॉल ऑफिसर को ही वीवीआईपी का दर्ज़ा मिल गया है. कौन किसको रिसीव करे – अफरा तफरी मची है. उधर सर्किट हाऊस में पहले से इतने वीवीआईपी रुके हैं कि उनके लिए पोर्च में दरी बिछाकर सोने की नौबत आ गयी है. खानसामा वीवीआईपी बनने की जुगाड़ में कहीं बिजी है. ब्रेड पर बटर-जैम उनको खुद लगाना पड़ रहा है. वे तीन दिन से ट्राय कर रहे हैं वीआईपी कोटे में बर्थ कन्फर्म नहीं हो पा रही. अभी तक वे कानून से ऊपर थे मगर वीवीआईपियों की धक्कामुक्की में नीचे गिर गए हैं. अभिजात्य अभिजात्य नहीं रहा, आम हो गया है. इस कदर कि ये साला पीएस जो अभी तक यस सर यस सर करता हुआ झुकी झुकी कमर लिए खड़ा रहता था, तन कर खड़ा होने लगा है, डिक्टेशन लेने में इसकी नानी मरने लगी है. इतने बुरे दिन पहले कभी नहीं आए थे. वे भविष्य के ऐसे दृश्यों की कल्पना मात्र से पसीना पसीना हो गए हैं, और सजगता में लौट आए हैं. उन्होंने पूछा – ‘बनवारी से आगे कैसे रहा जा सकता है ?……. होम मिनिस्टर से बात करके देखा जा सकता है, हिंदी के अक्षर से चलें तो ‘ढ-प्लस’ या ‘ज्ञ-प्लस’ तक भी जाया जा सकता है.’

‘नहीं सर, ऐसी गलती मत कीजिएगा. बेईज्जती हो जाएगी. हिंदी तो अब पानवाले तक यूज नहीं करते आप सिक्युरिटी लेवल की बात कर रहे हैं.’

‘तब क्या किया जाए? अपन के झेड में आलरेडी दो प्लस लगे है, अब बनवारी के भी लग गए हैं, कुछ तो करना पड़ेगा.’

‘सर, स्क्वेयर लगवा लीजिए. झेड स्क्वेयर सिक्सटीन, झेड स्क्वेयर थर्टी टू ऑर सिक्सटी फोर. समथिंग लाईक दैट. बाकियों को वहाँ तक पहुँचने में टाईम लगेगा. फिर आप पुराने वीवीआईपी जो हैं. सिनिओरिटी काउंट होनी चाहिए.’

बात तो ठीक है. कुछ देर सोचकर उन्होंने अपने आप को संयत किया, उठ खड़े हुए, पीएस को गाड़ी पोर्च लगवाने का निर्देश दिया. होम मिनिस्टर से मिलने के लिए निकलने वाले हैं. बीच में मंशामन मंदिर में रुकेंगे, शीश नवाएँगे, मन्नत मांगेंगे – प्रभु, झेड स्क्वेयर सिक्सटीन लेवल की सुरक्षा का प्रोटोकॉल बने जो उन्हें और सिर्फ उन्हें ही नसीब हो.

शीघ्र ही हम उनकी मंशा फलीभूत होते देखेंगे. देखेंगे आर्यावर्त में अभिजात्य के टापू के बीच एक सुपर-अभिजात्य टापू निकल आया है.

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© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 9 – हास्य-व्यंग्य – “बाल की खाल” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक हास्य-व्यंग्य  बाल की खाल

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 9

☆ हास्य व्यंग्य ☆ “बाल की खाल” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

शरीर में बालों के महत्व से कौन परिचित नहीं है ? मनुष्यों सहित पशु -पक्षी भी रंग – बिरंगे बालों के कारण ही प्राणी जगत में सुंदरता और आकर्षण का केंद्र बनकर सम्मान पाते हैं। पशु – पक्षियों को इसका बोध नहीं जबकि मनुष्य को इसका बोध है। संसार के सभी प्रणियों के लिए शरीर के बाल सिर्फ बाल हैं, केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसने बालों को दो भागों में बांट दिया है, चाहे गए बाल और अनचाहे बाल याने प्रिय और अप्रिय बाल। हम सभी को शरीर के कुछ अंगों के बाल तो बहुत पसंद हैं जबकि कुछ अंगों के बिल्कुल नापसंद। विडंबना है कि जिन बालों को हम पसंद करते हैं या जिनसे प्रेम करते हैं वे बेवफा होते हैं, ये समय के साथ कम होते जाते हैं जो हमें नापसंद हैं वे बेशर्म होते हैं।

बालों के प्रति महिलाओं व पुरुषों का प्रेम देखकर ही आज दुनिया भर में चाहने वाले बालों को झड़ने से रोकने, मोटा और मजबूत बनाने, उन्हें तरह – तरह के रंगों में रंगने के लिए अनेक प्रकार के तेल, क्रीम, साबुन, शैम्पू, डाई, दवाएं आदि उपलब्ध हैं। इसी तरह अनचाहे बेशर्म बालों से छुटकारे के लिए भी बाजार में ढेरों उत्पाद हैं। पूरी दुनिया में आदमी के बालों के रखरखाव के लिए अरबों रुपयों का कारोबार चल रहा है। यदि आदमी बालों से प्यार करना छोड़ दे तो न सिर्फ उसका तनाव घट जाए, ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाए बल्कि पैसे भी बचें। बालों के बढ़ने, उगाने और बेशर्म बालों को खत्म करने के उत्पादों का कारोबार ठप्प हो जाए। प्रश्न यह है कि अगर ऐसा होता है तो फिर उन लड़कियों का क्या होगा जो पुरुषों की आकर्षक हेयर स्टाइल पर आहें भरते हुए दिल और जन न्यौछावर करते हुए कहती हैं –

“उड़ें जब – जब जुल्फें तेरी,

 कंवारियों का दिल मचले”

महिलाओं के बाल भी पुरुषों के आकर्षण का केंद्र हैं, वे कहते हैं –

“ये रेश्मी जुल्फें, ये शरबती आँखें,

 इन्हें देखकर जी रहे हैं सभी। “

शायरों – कवियों ने तो अच्छी जुल्फों के बिना हसीनाओं की कल्पना तक नहीं की है। हसीनाओं के जुल्फ – प्रेम पर तो एक शायर व्यंग्य करता हुआ यहां तक कहता है कि –

तेरी जुल्फें हैं या रात का साया हैं,

अगर तू सर को मुंडा ले तो सवेरा हो जाए।

खैर, सर के बालों के सौन्दर्य – प्रसंग से तो सभी भाषाओं का साहित्य भरा पड़ा है, आप भी बहुत कुछ जानते हैं। यहां मुझे याद आ रहे हैं “नाक के बाल”। चूंकि ये बाल नाक के अंदर होते हैं और वायु के कचरे को अंदर जाने से रोकते हैं अतः लोग इन्हें अनचाहे बालों की श्रेणी में नहीं रखते, बल्कि “नाक के बालों” का तो इतना सम्मान है कि चमचे किस्म के लोग महत्वपूर्ण लोगों की “नाक का बाल” बनने के लिए जी जान से लगे रहते हैं। जब किसी व्यक्ति द्वारा किसी विशिष्ट व्यक्ति की प्रशंसा, सेवा और विश्वसनीयता चरम पर पहुंच जाती है तो विशिष्ट व्यक्ति उसे बाल के रूप में अपनी नाक में स्थान प्रदान कर देता है। जब कोई व्यक्ति किसी विशिष्ट व्यक्ति की “नाक का बाल” बन जाता है तो समाज में उसकी पूंछ परख बढ़ जाती है। किसी क्षमतावान व्यक्ति की नाक का बाल होने के अनेक फायदे हैं, किंतु किसी की नाक का बाल बनना और फिर उसकी नाक में बाल के रूप में अपना स्थान बनाए रखना आसान नहीं है। मैं ऐसे अनेक लोगों को जानता हूं जो कल तक तो विशिष्ट व्यक्ति की नाक के बाल थे, किंतु जरा सी लापरवाही के कारण या तो उखाड़ दिए गए या ऐसे स्थान पर स्थानांतरित कर दिए गए जिनकी कोई कीमत नहीं है। यहां मैं अपने एक परिचित का उल्लेख अवश्य करना चाहूंगा। मैं जब भी उनके पास जाता हूं वे हमेशा मुझे अपनी नाक के बाल उखाड़ते ही मिलते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि रोज उन्हें अपनी नाक में बाल मिल कहां से जाते हैं। आप सोच रहे होंगे कि मैने मूंछ के बालों की चर्चा नहीं की। मूंछ के बाल भी बड़े कीमती, व्यक्ति की आन – बान – शान का प्रतीक होते हैं। लोग अपनी मूंछों के सम्मान के लिए जान की बाजी तक लगा देते हैं। बालों से हमारा और हमसे बालों का इतना गहरा सम्बन्ध है कि लिखूं तो लिखता ही जाऊं, लेकिन सोचता हूं “बाल की खाल” निकालना ठीक नहीं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 293 ☆ व्यंग्य – चापलूसी प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘चापलूसी प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 293 ☆

☆ व्यंग्य ☆ चापलूसी प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना

भाइयो, आज की दुनिया में आदमी पैसा कमाने के लिए तरह-तरह के धंधे कर रहा है। कई लोग विद्यार्थियों के हितार्थ प्राइवेट कोचिंग क्लासें चलाते हैं जहां इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के नाम पर खासे पैसे बटोरे जाते हैं। यह पाप का धंधा है क्योंकि सब जानते हैं कि जैसे जीवन का हश्र मृत्यु है वैसे ही पढ़ाई का हश्र  बेरोज़गारी है। इसलिए हमने दूसरों के इहलोक और अपने परलोक का ध्यान रखते हुए ऐसी ट्रेनिंग देने का धंधा चुना है जो तुरन्त फलदायी और सौ प्रतिशत सफलता देने वाली है। अगली पहली तारीख को हमारे ‘चापलूसी प्रशिक्षण संस्थान’ का उद्घाटन है। आप इष्ट-मित्रों सहित सादर आमंत्रित हैं। संस्थान के लिए भवन हमने चापलूसी के द्वारा बहुत कम किराये पर प्राप्त कर लिया है, इसलिए हमारे प्रशिक्षण की उपयोगिता पहले ही चरण में सिद्ध हो चुकी है। उद्घाटन के लिए हम एक चापलूसी-प्रेमी समर्थ व्यक्ति को बुला रहे हैं। उनकी छत्रछाया में हमारे स्नातक बरसों तक फलें-फूलेंगे।

आज के युग में चापलूसी की उपयोगिता पर प्रकाश डालने की ज़रूरत नहीं है। राजनीति से लेकर सरकारी और निजी दफ्तरों-संस्थानों तक सभी जगह उसके लिए असीम क्षेत्र फैला है। जो लोग अपने को चापलूसी से ऊपर समझते हैं वे यह सुनकर प्रसन्न हो जाते हैं कि ‘भाई जी, आपमें यही खूबी है कि आप चापलूसी पसन्द नहीं करते।’ इसलिए हम ट्रेनिंग के इच्छुक लोगों को विश्वास दिलाते हैं कि हमारे संस्थान के स्नातकों को कभी काम और दाम की कमी नहीं रहेगी। गुर हम देंगे, बाकी स्नातक की मेहनत, चतुराई, और बेशर्मी पर निर्भर होगा।

आपको और विश्वास दिलाने के लिए हमारे प्रशिक्षण के प्रमुख पहलू आपके अवलोकनार्थ और विचारार्थ प्रस्तुत हैं—

सूचना संग्रह:- चापलूसी  प्रशिक्षण के प्रथम चरण में समर्थ व्यक्ति से संबंधित ज़रूरी सूचना के संग्रह की विधि बतलायी जाएगी। ‘भाई जी’ के जन्म-स्थान (जो अब तीर्थस्थल हो जाएगा), उनकी शिक्षा (अगर पढ़े लिखे हों तो), उनके जनक जननी, भाई बहन, पुत्र पुत्रियों, नाती पोतों, दादा दादी, नाना नानी, चाचा चाची, मामा मामी, रिश्तेदारों मित्रों के बारे में पूरी सूचना प्राप्त करना अनिवार्य होगा। ‘भाई जी’ के शत्रुओं का पता लगाना भी उतना ही ज़रूरी होगा ताकि गाहे-बगाहे  कहा जा सके— ‘अरे भाई जी, कहां आप और कहां वह ससुरा दो  टके का आदमी।’

इसके साथ ‘भाई जी’ की रुचियों का पता लगाना भी ज़रूरी होगा। क्या खाना, क्या पीना, कैसे कपड़े, कैसे जूते, कौन सा फूल, कौन सा इत्र, कैसी भेंट पसन्द करते हैं। अगर पान खाने के शौकीन हों तो चापलूसी की गुंजाइश ज़्यादा है। और अगर चटोरे हों तो गुंजाइश और भी ज़्यादा है क्योंकि चापलूसी में सिर्फ बातों की खुशामद ही नहीं, सब प्रकार की सेवाएं सम्मिलित होती हैं।

पुराने, सड़े-गले संस्कारों की सफाई:- हमारे प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य प्रशिक्षणार्थी के सड़े-गले संस्कारों की पूरी सफाई करना होगा। कई लड़के दंभ से कहते हैं, ‘हमारे बाप ने हमें यह नहीं सिखाया।’ अरे भई, आपके बाप ने आपको काम की बातें नहीं सिखायीं तो हम सिखायेंगे। कई लोग ‘आत्मसम्मान’ में अकड़े रहते हैं। हम उन्हें सिखाएंगे कि ‘सम्मान’ और ‘आत्मसम्मान’ में कोई भेद नहीं। जिसका समाज में सम्मान नहीं, उसका आत्मसम्मान किस काम का? आज के ज़माने में सम्मान चापलूसी से ही प्राप्त होता है। आप चापलूसी के द्वारा बड़े साहब के दिल तक पहुंच कर लें तो छोटे साहब आपको देखकर कुर्सी से खड़े होने लगेंगे।

आत्मसम्मान की पूरी सफाई के चरण में हमारे प्रशिक्षक प्रशिक्षणार्थियों को रोज़ एक घंटा धाराप्रवाह गालियां देंगे और उनकी थुक्का- फजीहत करेंगे। प्रशिक्षणार्थियों को मुस्कराते हुए वह सब सुनने का अभ्यास दिलाया जाएगा।

सैद्धांतिक और व्यवहारिक प्रशिक्षण:- प्रशिक्षण में हम व्याख्यानों के द्वारा प्रशिक्षणार्थियों को चापलूसी की नवीनतम तकनीकों से परिचित कराएंगे। ये व्याख्यान ऐसे प्रतिभावान लोगों के द्वारा होंगे जिन्होंने इस क्षेत्र में कुछ हासिल किया है और नाम कमाया है। कोरे गाल बजाने वाले अनुभवहीन वक्ताओं को हम घास नहीं डालेंगे।

व्याख्यानों के अलावा हम सिद्ध चापलूसों को आमंत्रित कर व्यवहारिक प्रशिक्षण की भी व्यवस्था करेंगे। ये प्रशिक्षक चापलूसी के उत्तम नमूने पेश करेंगे और प्रशिक्षणार्थियों से तुरन्त उनका अभ्यास करायेंगे।

लोचवर्धक प्रशिक्षण:- प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण पहलू शरीर के विभिन्न अंगों में आवश्यक लोच पैदा करना है। कई लोगों की रीढ़ सख्त होती है। उनकी कमर समर्थ लोगों के चरण-स्पर्श के लिए नहीं झुकती। हम उसमें इतनी लचक पैदा करेंगे कि ‘भाई जी’ के सामने आते ही उनकी रीढ़ बारह बजाने के बजाय चार या पांच बजाने लगेगी। हाथ की उंगलियों में भी इतनी फुर्ती पैदा करेंगे कि कमर झुकते ही उंगलियां ‘भाई जी’ की चरन-रज बटोरने लगे।

एक ज़रूरी काम जबड़े में इतनी लचक पैदा करना है कि ‘भाई जी’ के आते ही तत्काल ओंठ बिगस जाएं और बत्तीसी चमकने लगे। हम प्रशिक्षणार्थियों को ऐसा प्रशिक्षण देंगे कि अगर ‘भाई जी’ एक घंटा सामने बैठे रहें तो उनकी बत्तीसी बराबर एक घंटे तक चमकेगी। हमारी बात गलत निकले तो फीस के पूरे पैसे वापस। इसके साथ हम ‘भाई जी’ की हर मनोरंजक बात पर स्वाभाविक  ठहाके लगाने का भी अभ्यास देंगे।

बेशर्मी का प्रशिक्षण:- एक और ज़रूरी लक्ष्य प्रशिक्षणार्थियों में पर्याप्त बेशर्मी विकसित करना है। बिना उच्च कोटि की बेशर्मी के चापलूसी ठीक से सधती नहीं। समर्थ लोगों के घर घंटों बेज़रूरत बैठे रहना, शादी-ब्याह, मुंडन- कनछेदन में बिना बुलाये पहुंच जाना (‘हमारा घर है। निमंत्रण की क्या ज़रूरत?’), दुत्कारे जाने पर भी लौट लौट कर ‘भाई जी’ के द्वारे पहुंच जाना, बार-बार झिड़के जाने पर भी ‘भाई जी’ से चिपके रहना श्रेष्ठ चापलूस के ज़रूरी गुण हैं।

बेशर्मी की ट्रेनिंग के दौरान हम किसी चर्म-विशेषज्ञ की सहायता से प्रशिक्षण की समाप्ति तक प्रशिक्षणार्थी की चमड़ी की मोटाई में हुई वृद्धि की जांच करेंगे। चमड़ी पर्याप्त मोटी होने पर ही प्रशिक्षण पूर्ण माना जाएगा।

‘भाभी जी’ का महत्व:- चापलूस की नज़र में ‘भाभी जी’ का स्थान बहुत ऊंचा होता है। भाभी जी की अहमियत ‘एकहि साधे सब सधे’ वाली होती है। इसीलिए सिद्ध चापलूस ‘भाई जी’ की खुशामद में ज़्यादा वक्त ज़ाया न करके सीधे भाभी जी के दरबार में सलाम बजाता है। भाभी जी कृपालु हो गयीं तो ‘भाई जी’ कहां जाएंगे? भाभी जी के ‘दाहिने’ होते ही चापलूस का आधा मोर्चा फतह हो जाता है।

भाभी जी को खुश करने के लिए चापलूस को खासे पापड़ बेलने पड़ते हैं, जैसे समय-समय पर उनकी पसन्द की भेंटें देते रहना, बाज़ार से साग-सब्ज़ी ले आना, भाभी जी कहीं जाएं तो सेवक के रूप में ड्राइवर के बगल में बैठे रहना, गाड़ी बच्चों को लेने स्कूल जाए तो ड्राइवर के साथ जाकर बच्चों को ले आना, आदि। इसके अलावा भाभी जी के रूप-गुणों की प्रशंसा करते हुए उन्हें लक्ष्मी-सरस्वती का ‘टू इन वन’ अवतार सिद्ध करना। बीच-बीच में भाभी जी को सुना कर आगंतुकों से कहना, ‘भैया, सवेरे से पच्चीस  तीस लोगों से मिल चुकी हैं। इतने ज्यादा लोगों से मिलेंगीं तो बेराम हो जाएंगीं। आपका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, देश का नुकसान होगा। आप लोग किसी और दिन आइएगा।’

भाइयो, ये हमारे प्रशिक्षण कार्यक्रम की मोटी मोटी बातें हैं। अब तक आपको महसूस हो गया होगा कि हमारे संस्थान की ट्रेनिंग कितने काम की है। हमारा निवेदन है की पढ़ाई लिखाई में बच्चों की ज़िन्दगी बर्बाद करने के बजाय उन्हें हमारे संस्थान में भेजें ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो। एक बार सेवा का मौका ज़रूर दें।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ अभी अभी # 709 ⇒ वर्क इज़ वर्शिप ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “वर्क इज़ वर्शिप।)

?अभी अभी # 709 ⇒ वर्क इज़ वर्शिप ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शीर्षक अंग्रेज़ी में और निबंध हिंदी में ! जी हाँ, कुछ ऐसा ही होता था हमारे ज़माने में। जिसे अंग्रेज़ी नहीं आती थी, वह भी इस मुहावरे का बड़े आत्म-विश्वास के साथ प्रयोग करता देखा जा सकता था। वर्क इज वर्शिप एंड लव इज ब्लाइंड, यू नो।

यह अंग्रेजों का मुहावरा है, जिसका आज़ादी के बाद भारतीयकरण कर दिया गया। वर्क को हिंदी में कर्म कहते हैं। प्रेम की तरह ये दोनों ही ढाई आखर के हैं। इन दोनों हिंदी अंग्रेज़ी शब्दों की केमिस्ट्री देखिये, कितनी मिलती जुलती है। वर्क मने कर्म ! यही हिंदी अंग्रेज़ी प्रेम है, जिसके हम आज भी कायल हैं।।

अंग्रेज़ चले गए, नेहरू छोड़ गए, जिन्होंने वर्क इज़ वर्शिप को आराम हराम है, कर दिया। वे पूजा में नहीं, काम में विश्वास रखते थे। कर्म को ही काम भी कहते हैं। काम ही पूजा है। अगर विश्वास न हो तो खजुराहो का एक ट्रिप मार आएँ, जहाँ रजनीश के अनुसार सभी मूर्तियाँ समाधि अवस्था में हैं।

अंग्रेज़ भारत में पहले कर्म अर्थात् व्यापार करने आए। धंधा अच्छा चल निकला तो कर्म को पूजा से जोड़ दिया। खुद साहब बन बैठे और देश को गुलाम बना दिया। प्रसाद स्वरूप कुछ सिविल सर्वेंट भी बँटवारे के समय भारत में छोड़ गए। जो काम पूजा था, वह सेवा हो गया। आज़ादी के बाद सेवा ही पूजा हो गई।।

हम बड़े धार्मिक लोग हैं। जो सेवा करता है, उसके बदले दान दक्षिणा तो बनती ही है। एक शब्द और, टिप के रूप में, अंग्रेज़ हमें दे गए, बख्शीश ! हमारे आदर्श संस्कारों ने इसे बहुत ज़ल्द मान्यता भी दे दी। करोगे सेवा तो पाओगे मेवा। कर्म ही पूजा है, कर्म ही सेवा है। गीता में श्रीकृष्ण कह गए हैं, हम बिना गीता पढ़े कह सकते हैं, अनासक्त कर्म कर, फल की चिंता तू मत कर। तू मत कर। अरे भोले, अर्जुन सदाशिवराव मतकर !

एक कर्म की दूकान भी होती है, जहाँ कर्म का प्रशिक्षण दिया जाता है, उसे वर्कशॉप भी कहते हैं। केवल पाठशाला ही नहीं होती, कार्यशाला भी होती है। महिलाओं की शॉपिंग से बढ़कर कोई कर्म नहीं ! ख़ाली दिमाग़ को शैतान का प्रशिक्षण केंद्र अर्थात devil’s workshop भी कहा जाता है। कर्म में कुशलता ही workmanship कहलाती है। अंग्रेजी में वैसे हमारा हाथ बहुत तंग है। कभी हमारे लिए workmanship, एक जहाज में काम करने वाला कर्मचारी होता था।।

सेवा ही पूजा है ! हम कितने भी उन्नत और प्रगतिशील क्यों न हो जाएं, लता जी का गीत तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, ही हमारा आदर्श रहेगा। हम पूजा और सेवा को अलग नहीं कर सकते। कर्म को पूजा समझें, या सेवा को पूजा, बात एक ही है।

सच तो यह है कि खाली पेट न तो सेवा होती है, और न ही पूजा। समय, काल और परिस्थिति अनुसार कभी रोटी और प्याज़ तो कभी बर्गर-पिज़्ज़ा ! पेट पूजा काम दूजा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 55 – सरदर्द कराते कवि सम्मेलन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना सरदर्द कराते कवि सम्मेलन)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 55 – सरदर्द कराते कवि सम्मेलन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बचपन में जब पहली बार पिताजी मुझे कवि-सम्मेलन में घसीट कर ले गए थे, तो मैं समझा कोई संत समागम है। मंच पर एक धोती-कुर्ता पहने सज्जन जैसे ही चिल्लाए—”प्रिये, तुम्हारे अधरों से टपकती मधु की धार…”—तो बगल में बैठी चाचीजी ने पिताजी को कोहनी मारी, “देखो जी, बच्चों के सामने ऐसे बोलने की क्या तुक है?” मुझे लगा, ये सब तो स्कूल की सायंस की किताब में नहीं था। पर असली विज्ञान तो यहाँ था—भावनाओं का गुरुत्वाकर्षण, तालियों की न्यूटन-गति और ठहाकों का बायोलॉजिकल बम। कवि सम्मेलन, जहां कविता कम, कॉमेडी ज्यादा, और कभी-कभी तो कॉमेडी भी कम, चाय-बिस्कुट ही मुख्य आकर्षण होता है।

“तू बुला ले मंच पे, मैं पढ़ के दिखाऊँगा”—ये वाक्य अब प्रेम-पत्र में नहीं, वाट्सएप पर कवियों की धमकी बन चुका है। पुराने समय में कवि श्रोता से प्रेम करते थे, अब तो वे आयोजकों से पेशगी में प्यार करते हैं। एक कवि ने तो मंच से ही कहा, “प्यार नहीं होता आयोजक से, जब तक अग्रिम भुगतान न हो जाए।” आयोजक हँसता है—”तू सुना दे कोई पुरानी, मस्त ताली वाली कहानी, हम देंगे चाय-समोसे, देखे तू कितनी तालियाँ लानी।”

अब मंच पर कविता नहीं, ‘कविता एक्टिंग’ होती है। एक कवि ने जब मंच पर कविता पढ़ी—”देश की माटी बुला रही है…” तो मंच हिल गया, कारण था कवि का वजन। पिछली कुर्सी टूटी, संयोजक भागे—”लाइट बंद करो, यह लाइव नहीं, रिकॉर्डेड दिखा देंगे!” इस दौर में कविता कम, कवित्व अधिक बिकता है। शब्द नहीं, चेहरे बिकते हैं। मंच पर कोई कवि आया नहीं कि पहले पाउडर, फिर ‘पोएटिक एक्सप्रेशन’, फिर कवि की पंक्तियाँ—”मैं टूट गया हूँ…”—तालियाँ! जबकि पीछे उसकी होटल बुकिंग भी नहीं हुई थी।

बुंदेलखंड के एक कवि महोदय ने मंच से घोषणा की—”मेरी अगली कविता का शीर्षक है—’रात भर तुम मेरी कविता में रही’।” तभी आयोजक की पत्नी उठ खड़ी हुई—”रात भर कहाँ रही? किस कविता में रही? कौन सी कविता में?” मंच पर भगदड़ मच गई। कवि बोले—”भाभीजी, वो तो प्रतीक है, उपमा है!” भाभी बोलीं—”हाँ हाँ, उपमा तो तुम जैसे मंचीय कवियों का नाश्ता है। कविता से ज़्यादा उपमा खाते हो!”

सच्चाई ये है कि मंच का माइक अब माइक नहीं, मुनाफे का मोहरा बन चुका है। एक कवि दोस्त ने बताया—”मैंने कल चार कवि सम्मेलनों में एक ही कविता सुनाई। ऑडियंस बदल गई थी, पर मंच पर वही लाइनें—‘मैं तेरे बिन सूना, जैसे बिना पंखा गर्म जूना’।” मैंने पूछा, “चार जगह, एक ही कविता?” वह बोला, “अबे तू क्या समझता है? मैं कवि हूँ या Spotify?” हम दोनों हँसने लगे, और फिर रो पड़े।

कवि-सम्मेलन में कवियों का हाल ऐसा होता है जैसे शादी में बारातियों का—खूब खाओ, खूब नचाओ, पर दूल्हा कोई और होता है। मंच पर वही चमकते हैं, जो चिल्ला सकते हैं, और जिनकी कविता में तुक हो या न हो, पर पंच जरूर हो। मंच पर एक कवि महोदय बोल उठे—“तेरे जाने के बाद… मेरी रोटी में स्वाद न रहा!”—तालियाँ ऐसी बजीं, जैसे किसी ने रसगुल्ले मुफ्त में बाँटे हों। पर पीछे बैठे वृद्ध कवि ‘गुरुजी’ चुप थे। उन्होंने धीरे से कहा—“अब कविता में भूख नहीं रही, बस मंच की भूख रह गई है।”

एक बार दिल्ली में कवि सम्मेलन हुआ, और आयोजकों ने होटल के बजाय सभी कवियों को ‘रैन बसेरा’ में ठहरा दिया। एक कवि ने नाराज़ होकर कहा—“ये सम्मेलन नहीं, कवि-काट रैली है!” दूसरे बोले—“जब मंच पर कविता कहें, तब भी ठिठुर रहे हों, तो कविता में सर्द हवा ही चलेगी ना!” कवियों ने ठंड में एक दूसरे को कविताओं से नहीं, ग़मछों से ढाँपा। एक ने कहा—“तेरे मफलर की गरमी में, मैंने ममता की छाँव देखी।”—तालियाँ नहीं बजीं, क्योंकि सबके हाथ कंबल में थे।

कवि-सम्मेलन अब ‘कला का उत्सव’ नहीं, ‘कविता का सर्कस’ बन चुका है। वहाँ हँसने की मजबूरी होती है, और सुनने की भी। श्रोता सोचता है—”कम से कम दो घंटे घर से बाहर तो रहा!” आयोजक सोचता है—”पब्लिक आ गई, मंच सज गया, अब फ़ोटो खिंचवा लेते हैं!” और कवि सोचता है—”एक कविता और सुनाकर सौ रुपए और ले लूँ?” ऐसे में कविता की आत्मा गंगा तट पर जाकर स्नान कर रही होती है, यह सोचकर कि—”मैं कभी तुलसी के मुख से निकली थी… आज मंच से मसखरी में गिर पड़ी।”

आख़िर में मंच खाली होता है, कवि थके हुए, श्रोता ऊंघते हुए, आयोजक पैसे बचाने की तरकीब सोचता हुआ। और एक वृद्ध कवि मंच के कोने में बैठे अपनी डायरी में लिखते हैं—”आज भी मेरी कविता ना मंच पर पढ़ी गई, ना पुस्तक में छपी। मैं बस कविता रहा, पढ़ा न गया।” यह सोचते-सोचते उनकी आँखें नम हो जाती हैं। और किसी को खबर नहीं होती कि आज कविता मर गई—तालियों के शोर में चुपचाप, मंच की भीड़ में गुमनाम।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 355 ☆ व्यंग्य – “हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा आए” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 355 ☆

?  व्यंग्य – हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा आए ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

समस्याएं हैं। सरकारें हैं। बजट नहीं है। पर नेता जी असली मसलों से निपटने की बजाय, “झुनझुना पकड़ाने” की कला में माहिर हैं। कोई अवसर विशेष? मांग रखने वालों से संबंधित किसी विषय पर फटाफट, डाक टिकट तो जारी किया ही जा सकता है। कोई बड़ा संदर्भ है तो सिक्का ढालो! छुट्टी का ऐलान करो! किसी सर्वमान्य के नाम पर सड़क का नामकरण कर दो। किसी बने बनाए भवन का नाम ही संबंधित समुदाय के प्रसंग में कर दो। लोग बहल ही जाते हैं। फुसलाने के ये फार्मूले हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा आए केटेगरी में सर्वोत्तम माने जाते हैं।

इतिहास से गड़े मुर्दे उखाड़ो, विरासत से जोड़ो, फेफड़ों में संस्कृति का गर्व भर कर शहर का नाम बदल दो! कोई जयंती शुरू कर दो! बस, जनता को लगे कि बहुत कुछ हो रहा है। असलियत में कुछ हो तो अच्छा ही है, जो वास्तव में कुछ न हो सके तो इस तरह के नुस्खे समस्याओं के “वर्चुअल सॉल्यूशन बैंक” हैं। जो हमेशा भरे रहते हैं, जबकि असली समस्याओं का खाता लगातार ओवरड्राफ्ट में जा रहा है! बेरोजगारी की मार झेल रहा नौजवान, जिसकी जेब में सुदामा की तरह चावल के दाने नहीं, उसके सामने सरकार एक ” सुदामा सशक्तिकारण योजना” का सपना लहरा देती है। योजना ब्यूरोक्रेसी के मकड़जाल में उलझी रह जाती है। नेता जी के समर्थन में जयकार के नारे लगते हैं। महंगाई की आग में तप रही गृहिणी को “किफायती जीवन शैली जागरूकता दिवस” देकर खुश करने की कोशिश भी सफल हो जाती है। दिवस मनाने से रसोई गैस का सिलेंडर सस्ता हो जाए तो बात ही क्या हो छुट्टियों का मामला तो अलग ही मसाला है! “अंतर्राष्ट्रीय … दिवस”? छुट्टी! “राष्ट्रीय … दिवस”? छुट्टी! कल को अमुक जाति को साधने के लिए “अमुक दिवस” घोषित कर छुट्टी दे दी जाए, तो अचरज नहीं!

हर चौथे दिन कोई न कोई छुट्टी देने का मतलब, कामकाज का नुकसान और उत्पादकता की गिरावट, पर सरकार को क्या ! उनका तो काम छुट्टी के बहाने जनता को साधना होता है।

शहर या सड़क का नाम बदल जाने से क्या शहर की सड़कें चौड़ी हो गईं? ड्रेनेज सिस्टम ठीक हो गया? बिजली पानी चौबीस घंटों आने लगे? पुराने साइनबोर्ड उतर गए, नए लग गए, सरकारी खजाने से कुछ करोड़ और उड़ गए। सरकार को लगता है नाम बदलने से इतिहास बदल जाता है! पर सच यह है कि इतिहास में इस बदलाव का एक पृष्ठ भर बढ़ जाता है। जयंतियों पर भाषणबाजी का ऐसा तांता लगता है कि लगता है सारी समस्याओं का समाधान भाषणों में ही छिपा है। सेमिनार, वर्कशॉप, सांस्कृतिक कार्यक्रम… इतनी ऊर्जा और धन यदि इन “जयंतियों” पर खर्च करने की अपेक्षा, उन क्षेत्रों में वास्तविक निवेश किया जाए तो? पर जयंती मनाना आसान है। फोटो खिंचवाने का मौका भी मिल जाता है। व्यापक जनसंपर्क हो जाता है। अखबार में बने रहने के मौके पैदा होते हैं। सरकार को एक नया विभाग बना देना चाहिए ” उत्सव विभाग” जिसका एकमात्र काम हो जब भी कोई गंभीर मुद्दा उभरे, तुरंत एक नया टिकट, सिक्का, छुट्टी या जयंती का तोप दाग दो! जनता का ध्यान बंट जाएगा। जो

भूखे को भजन सुना कर सुला दे वह इस विभाग का प्रमुख बनाया जा सकता है। जनता को रंगबिरंगी पतंग दिखा कर कह सके, “देखो कितना सुंदर आकाश है!” यह सारा नील गगन तुम्हारा है।

हो सकता है अगली बार वो “महंगाई रोकथाम दिवस” मनाएं, और उस के खर्च निकालने सब्जियों के दाम थोड़े और बढ़ा दिए जाएं। क्योंकि जब तक मुफ्त के चक्करों में पब्लिक उलझी रहेगी, तब तक असली ‘मुफ्त’ तो सिर्फ नेता को ही मिलेगा, जनता के थोक वोट। नेता जी के “वर्चुअल सॉल्यूशन्स का सफलता दिवस” मतलब हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा आए।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 292 ☆ व्यंग्य ☆ एक अक्लमन्द बाप ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक बेहतरीन व्यंग्य – ‘एक अक्लमन्द बाप‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 292 ☆

☆ व्यंग्य ☆ एक अक्लमन्द बाप

छन्नूलाल अपने युवा बेटे महेश को हमेशा ऐसे पुलक कर देखते थे जैसे कोई सूदखोर अपनी रकम को बढ़ते देखता है। वे लड़के को मुग्ध भाव से निहारते रहते थे। लड़का नौकरी पर लग गया है। कोई तगड़ा लड़की वाला मिल जाए तो दस बीस लाख पक्के। पुत्र को जन्म देने का पुरस्कार मिले।

मुश्किल यही थी कि लड़का उनकी बात नहीं सुनता था। वे अपनी तरफ से हमेशा उसे नसीहत देते रहते थे— ‘बेटा, चार पैसे ऊपर के कमाओ। सच्चाई, ईमानदारी से इस महंगाई के जमाने में काम नहीं चलता। लक्ष्मी अपने आप नहीं आती। उसे थोड़ा फुसलाना पड़ता है।’

कभी नसीहत देते, ‘बेटा, यार-दोस्तों पर ज्यादा खर्च मत किया करो। आज के जमाने में पैसे से बढ़कर कोई सच्चा यार नहीं है। बाकी सब यार मतलब के होते हैं।’

महेश उनकी बात सुनकर झल्ला पड़ता है। कहता है, ‘आप ये ऊटपटांग बातें अपने पास रखो। हमें जो ठीक लगेगा, करेंगे।’

छन्नूलाल खून का घूंट पीकर रह जाते हैं। आज के ज़माने की औलाद को समझाना बहुत मुश्किल है। अकल की बात भी कांटे जैसी लगती है।

लड़की वाले आने लगे हैं। उनके आते ही छन्नूलाल ऐसे अकड़ कर बैठ जाते हैं जैसे किसी मुल्क के सुल्तान हों। मुंह टेढ़ा करके खिड़की की तरफ देखते हुए बातें करते हैं, जैसे किसी प्रेत से वार्तालाप कर रहे हों। सीधे पूछते हैं, ‘कितना खर्चा करेंगे आप?’ वह दस पन्द्रह लाख बताता है तो छन्नूलाल खिड़की की तरफ देखते हुए व्यंग्य से हंसना शुरू कर देते हैं और आधे मिनट तक हिनहिनाते रहते हैं। सामने बैठा आदमी छोटा होता जाता है।

हंसी रूकती है तो छन्नूलाल खिड़की को संबोधित करके कहते हैं, ‘दस पंद्रह लाख में तो कोई चपरासी मिलेगा। यहां तो चालीस पचास लाख वाले रोज चक्कर लगा रहे हैं।’

कुछ मोटी पार्टियां सचमुच चक्कर लगा रही हैं। छन्नूलाल को विश्वास है कि अच्छे फायदे में सौदा पट जाएगा। डर यही है कि कहीं लड़का नखरे न दिखाने लगे।

बुरे लक्षण प्रकट होने लगे। एक दिन महेश आकर कह गया, ‘बाबूजी, सुना है आप मेरी शादी तय कर रहे हैं। मुझे अभी शादी नहीं करनी है। जब करना होगी, बता दूंगा।’

छन्नूलाल खौंखिया कर बोले, ‘तो क्या बुढ़ापे में करोगे?’

महेश बोला, ‘कभी भी करूं। जब करना होगी, आपको बता देंगे।’

छन्नूलाल ने अपने तरकश से पुराने पारंपरिक तीर निकाले। बोले, ‘मां-बाप होने के नाते हमारा धरम बनता है कि तुम्हारी शादी कर दें, इसलिए देख रहे हैं, नहीं तो हमें क्या। फिर बहू आ जाएगी तो तुम्हारी अम्मां को थोड़ा आराम मिल जाएगा। नाती पोते हों तो घर में अच्छा लगेगा।’

महेश ने उनके दांव को काट दिया। कहा, ‘घर में इतना काम नहीं है जिसके लिए अम्मां को परेशानी होती हो। इतनी जल्दी काहे की पड़ी है?’

छन्नूलाल का दिल बैठ गया। लगा, लक्ष्मी दरवाजे पर दस्तक देते देते ‘टाटा’ कहने लगी है। भुन कर बोले, ‘बड़े हो गये हो न, इसलिए बाप की बात बेवकूफ़ी लगती है। जो जी में आये, करो।’

फिर भी उन्होंने आस नहीं छोड़ी। पत्नी को ड्यूटी पर लगा दिया कि रोज़ बेटे को सीधे या संकेतों से बहू की ज़रूरत की याद दिलाती रहे।

लेकिन एक दिन छन्नूलाल पर वज्रपात हो गया। महेश एक दिन माला-वाला पहने एक लड़की को साथ लेकर आ गया। लड़की की मांग में दगदगाता सिन्दूर। मां-बाप के पांव छूकर बोला, ‘बाबूजी, हमें आशीर्वाद दीजिए। हमने शादी कर ली है।’

छन्नूलाल की ज़ुबान को लकवा लग गया। यह कौन से जन्मों के पापों की सज़ा मिली? बीस लाख हवा में तैरकर विलीन होते दिखे। तमतमाये चेहरे से चिल्लाये, ‘कपूत, तेरी हिम्मत कैसे हुई इस लड़की के साथ घर में घुसने की? निकल बाहर।’

उनकी पत्नी ने उन्हें रोका, लेकिन वे उन्माद की हालत में थे। बेटे ने भारी चोट दी थी। बर्दाश्त से बाहर। पत्नी से डपट कर बोले, ‘तुम्हें उनकी तरफदारी करनी है तो तुम भी घर से निकल जाओ।’

पत्नी चुप हो गयी। महेश अपनी पत्नी को साथ लेकर घर से बाहर निकल गया।

छन्नूलाल दिन रात घर में फनफनाते घूमते थे। भूख, नींद सब गायब। पत्नी की लायी थाली को उठाकर फेंक देते। कहते, ‘ऐसी औलाद से तो  बेऔलाद अच्छे होते।’

पत्नी भी दुखी बैठी रहती।

आठ दस दिन बाद पत्नी ने बगावत कर दी। बोली, ‘अब बुढ़ापे में ज्यादा नखरे मत करो। लड़के ने शादी ही की है, कोई हत्या नहीं की है। या तो उन्हें बुलाकर लाओ, नहीं तो मैं उनके पास चली जाती हूं। तुम यहां अकेले पड़े रहना।’

छन्नूलाल चिल्लाये, ‘हां निकलो बाहर। इसी वक्त निकलो।’

पत्नी भी अपनी ओटली- पोटली लेकर चली गयी। छन्नूलाल के लिए घर भूतों का डेरा हो गया। दिन भर खटिया पर मरे से पड़े रहते। रात को करवटें बदल बदल कर चिल्लाते, ‘हे राम, उठा लो।’

पड़ोसियों की नींद हराम होती। भुनभुनाते, ‘यह ससुरा जान खाये लेता है। रात भर सियार की तरह हुआता है।’

ऐसे ही तीन चार रात वे ‘उठा लो’ ‘उठा लो’ चिल्लाते रहे। एक रात कुछ आहट से नींद खुली जो देखा अंगरखा-धोती धारी, सफेद लंबे केश और दाढ़ी वाला एक आदमी उनकी खाट की बगल में खड़ा रस्सी खोल रहा है। छन्नूलाल उठ कर बैठ गये। बोले, ‘कौन हो भैया? चोर वोर हो क्या? हम गरीब आदमी हैं। हमारे घर में कुछ नहीं मिलेगा।’

 

 

वह आदमी अपना काम करते हुए कुछ गुस्से से बोला, ‘हम यमदूत हैं। तुम्हें लेने आये हैं।’

छन्नूलाल का पसीना माथे से बह कर ठुड्ढी तक आया। बोले, ‘क्या हमारी उमर पूरी हो गयी भैया?’

यमदूत बोला, ‘उमर तो पूरी नहीं हुई थी, लेकिन तुमने चिल्ला चिल्ला कर यमराज का चैन हराम कर दिया। तुम्हारे लिए स्पेशल आर्डर निकला है।’

छन्नूलाल बोले, ‘मैं क्या चिल्लाता था भाई?’

यमदूत गुस्से में बोला, ‘रोज ‘उठा लो’ ‘उठा लो’ नहीं चिल्लाते थे? हमारा काम बढ़ा कर रख दिया। वैसइ क्या काम कम था?’

छन्नूलाल घबराये। बोले, ‘अरे भाई, मैं ‘उठा लो’ अपने लिए थोड़इ कहता था। मैंने ‘हमें उठा लो’ कब कहा?’

यमदूत हाथ रोक कर बोला, ‘तो किसके लिए कहते थे?’

छन्नूलाल बोले, ‘वह तो मैं अपने दफ्तर के जुनेजा साहब के लिए कहता था। रोज एक मीमो पकड़ा देते हैं। नाक में दम कर रखा है।’

यमदूत बोला, ‘हमें इस सबसे कोई मतलब नहीं है। यह सब वहीं चलकर बताना।’

छन्नूलाल हाथ जोड़कर आर्त स्वर में बोले, ‘अरे भैया, एक बार चोला छूट गया तो दुबारा उसमें घुसने को नहीं मिलेगा। लोग फौरन फूंक फांक कर बराबर कर देंगे। हमें माफ कर दो। अभी तो हमने पोते का मुंह नहीं देखा। अभी तो लड़के की शादी हुई है। ऐसे कठोर मत बनो।’

यमदूत कुछ द्रवित हुआ। बोला, ‘ठीक है, तो हम वहां जाकर बता देते हैं। अगर आर्डर कैंसिल हुआ तो ठीक, नहीं तो हम कल आकर तुम्हें ले जाएंगे। कल नहीं आये तो समझना कि आर्डर कैंसिल हो गया।’

छन्नूलाल हाथ जोड़कर बोले, ‘भैया, आप तो अपने डिपार्टमेंट में काफी सीनियर होंगे। थोड़ा हमारी सिफारिश कर देना। अब ऐसी गलती नहीं होगी। बाद में जब अपना टाइम आने पर हम आएंगे तो आपकी सेवा करेंगे।’

यमदूत ने व्यंग्य से हंसकर जवाब दिया, ‘आप वहां क्या सेवा करोगे। वहां तो हमीं आपकी सेवा करेंगे।’

छन्नूलाल के लिए रात गुज़ारना मुश्किल हो गया। राम राम करते सवेरा हुआ। सवेरा होते ही भाग कर बेटे के घर पहुंचे। पत्नी उन्हें देखकर प्रसन्न हुई। बोली, ‘आखिर अकल आ ही गयी।’

छन्नूलाल असली बात को दबा  गये। बोले, ‘हां, सोचा बेटा-बहू पर गुस्सा करने से क्या फायदा। घर में मन नहीं लगता। आज यहीं रहूंगा। कल सबको घर ले चलूंगा।’

बहू-बेटे ने उनकी खूब आवभगत की, लेकिन उन्हें चैन नहीं था। आने वाली रात उनके दिमाग पर सवार थी। दिन भर  चुपचाप खाट पर पड़े जेब में रखी माला सटकाते  रहे। शाम होते ही खाट पर पड़े रहना मुश्किल हो गया। बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगे।

रात बढ़ने के साथ उनकी हालत खराब हो रही थी। पसीना पोंछते पोंछते गमछा गीला हो गया। पत्ता भी खड़कता तो चौंक उठते। लगता बुलावा आ गया।

ऐसे ही काफी रात गुज़र गयी। तीन चार बजे सिकुड़कर खाट पर लेट गये।

आंख लग गयी। सपने में देखा, यमदूत रस्सी खोलता हुआ उनके सामने खड़ा है। कह रहा है,  ‘चलो, तुम्हारी अर्जी नामंजूर हो गयी।’

छन्नूलाल ने देखा कि वे भागे और दरवाज़े से टकराकर गिर गये। घबराहट में उनकी आंख खुल गयी। शरीर पसीने से लथपथ था।

आंखें घुमा कर देखा, खिड़की से धूप घुसपैठ कर रही थी और सामने बहू चाय की ट्रे लिये खड़ी थी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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