हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १७ – हास्य-व्यंग्य – “नेता याने अगुआ” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “नेता याने अगुआ”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १७ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “नेता याने अगुआ” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

☆

प्रायमरी शाला में पढ़ाया गया था “नेता याने अगुआ”। पहले अगुआ कम ही हुआ करते थे, पिछलग्गू अधिक होते थे। अगुआ ने जो कहा पिछलग्गुओं ने उसे मान कर उसका अनुसरण करना शुरू कर दिया, किंतु अब नई पीढ़ी में देखा जा रहा है कि पिछलग्गू बनने कोई तैयार नहीं। सब अगुआ याने नेता बनना चाहते हैं।

पुराने अगुआ नए अगुओं से परेशान हैं। वे चाहते हैं, अच्छे ठोस किस्म के पिछलग्गू, लेकिन आज का पिछलग्गू केवल पिछलग्गू ही नहीं बना रहना चाहता, बड़े अगुओं के साथ चलना तो चाहता है, किंतु छोटा अगुआ बनकर। इसी तरह की चेन ऊपर से नीचे तक बन गई है।

इसे यों भी कहा जा सकता है कि हमारे देश में – “सारे एक समान” के मूल संदेश को कितने अच्छे ढंग से आत्मसात किया गया है कि अब यहां न तो कोई अकेला अगुआ है और न तो कोई मात्र पिछलग्गू। जो अगुआ है वह किसी न किसी का पिछलग्गू अवश्य है और जो पिछलग्गू है वह कहीं न कहीं किसी न किसी का अगुआ भी है।

हमारे शहर के लिए यह गौरव की बात है कि हमने इस क्षेत्र में भी देश के किसी अन्य शहर, कस्बे अथवा गांव से हेटी नहीं खाई। जबलपुर की साहित्यिक चेतना पर कुछ लोग व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि यदि कोई यहां पत्थर उठा कर फेंके तो वह कवि के घर गिरता है। यह सच है – भले ही लोग इस बात पर हमारा मजाक उड़ाएं, लेकिन इस सच पर हमें नाज है। उसी तरह अब हम सीना ठोक कर कह सकते हैं कि हमारे शहर में नेताओं की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है बल्कि इससे कहीं ज्यादा सुदृढ़। आने वाले समय में हमें कम से कम यह नहीं कहना पड़ेगा कि नेतृत्व के अभाव में हमारे शहर का विकास नहीं हुआ है। हां, नेतृत्व की अधिकता में विकास अवरुद्ध हुआ यह कहना पड़ जाए तो बात अलग है।

अभी तक लोग कहा करते थे कि नेताओं के मामले में उत्तर प्रदेश धनी है। अब हम मध्यप्रदेश की वर्तमान स्थिति को देख कर कह सकते हैं कि आने वाले समय में नेताओं के मामले में हमारा प्रदेश और विशेष रूप से हमारा नगर जबलपुर किसी से कम नहीं रहेगा, बल्कि कई प्रदेशों के रिकॉर्ड तोड़ेगा। यहां के अधिकांश नवयुवकों में नेतागिरी के प्रति असीम उत्साह और लगन को देखते हुए कहा जा सकता है कि शीघ्र ही यहां से देश को नए नेताओं की बड़ी खेप मिलेगी।

अनेक युवक और छात्र इन दिनों पूर्णकालिक नेतागिरी के कार्य में रत हैं। सुबह से शाम तक एक ही कोशिश में लगे रहते हैं, कैसे अगुआ बनें, कहां नेतागिरी पकाएं। कौन सी समस्या पर चका जाम, धरना, प्रदर्शन किया जाए, किसे काले झंडे दिखाए जाएं ? कौनसा आंदोलन शुरू किया जाए अथवा किसे खत्म कराया जाए। अखबारों में विज्ञप्तियां भेजने के लिए विषयों की खोज करना भी कोई इन नए नेताओं से सीखे।

कोई बड़े नेता आ रहे हैं, फटाफट सैकड़ों की संख्या में स्वागत अथवा विरोध संबंधी विज्ञप्तियां भेज देंगे। कोई दुर्घटना हुई नहीं कि विज्ञप्तियां जारी। सहयोगी की उपलब्धि पर विज्ञप्ति, सड़क, पानी, बिजली पर विज्ञप्ति। रेलों, बसों, हवाई जहाजों पर विज्ञप्ति। स्कूलों – कॉलेजों, विश्वविद्यालयों पर विज्ञप्तियां। कचरे के ढेरों, आवारा जानवरों पर विज्ञप्ति, पेशाब घरों पर विज्ञप्ति। पुलिस की ज्यादती पर विज्ञप्ति, पुलिस की कमजोरी पर विज्ञप्ति।

कहने का अर्थ आप समझ ही गए होंगे। नेता बनना है तो अखबार में नाम छपना जरूरी है, और नाम छपवाना है तो कोई न कोई बहाना तो होना ही चाहिए। अगुआ याने नेता, नेतृत्व करता है। ध्यान आकर्षित करता – कराता है। कार्य करना कर्मचारियों का अथवा उनका काम है जो नेता अथवा पिछलग्गू नहीं हैं। सब महसूस कर रहे हैं कि इन दिनों काम नहीं हो रहे अथवा मंद गति से हो रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण हैं आप समझ गए होंगे। सब अगुआ अथवा पिछलग्गू बनकर ध्यान आकर्षित करा रहे हैं, विज्ञप्तियां दे रहे हैं, काम कौन करे ? कुछ यही हाल सरकारी दफ्तरों के भी हैं यहां का अगुआ अधिकारी अथवा बॉस कहलाता है फिर उससे छोटे अधिकारी होते हैं जो बॉस के पिछलग्गू लेकिन बाबुओं के लिए तो बॉस ही होते हैं। बड़ा अधिकारी याने बॉस याने ऑफिस का अगुआ आदेश निकलता है। छोटे बॉस उसे पूर्ण करने कर्मचारियों को प्रसारित करते हैं और कितना काम होता है यह सभी जानते हैं।

नेताओं की नई खेप में ज्यादातर वर्तमान नेताओं के भाई, भतीजे, पुत्र हैं तो कुछ अन्य संपन्न परिवारों के महत्वाकांक्षी युवा भी हैं जो नेतागिरी को व्यवसाय के रूप में अपना कर यश कीर्ति और धन अर्जित करना चाहते हैं पर जिनसे न तो दो शब्द बोलते बनते हैं, न लिखते – विज्ञप्ति किस विषय पर बनाई जाए यह सोचते भी नहीं बनता, लेकिन अगुआ बनने की आकांक्षा है। नेतागिरी के गुर और बोलना बताना सिखाने के लिए भी अब कोचिंग स्कूलों की जरूरत महसूस की जा रही है। ठीक है व्यक्ति को महत्वाकांक्षी व असंतुष्ट होना चाहिए, तभी तरक्की संभव है। अरस्तू ने कहा है कि संतुष्ट मनुष्य से अच्छा असंतुष्ट सुअर होता है।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३९ ☆ # “ सैयाद…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “ सैयाद..”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३९ ☆

☆ # “सैयाद…” # ☆

☆

चारों तरफ छाई धुंध है

पवन भी बह रहा मंद मंद है

वाटिका में अजीब सी कशमकश है

पराग तो बहुत है लेकिन

भ्रमरों के रास्ते बंद है

 

खुशबू पर पहरा है

प्रतिबंध गहरा है

खिलने वाली कलियां है

वक्त मिलने के लिए ठहरा है

 

जालिम सैयाद मंद मंद मुस्काता है

अपने प्रतिबंधों पर गुर्राता है

शायद वह बन गया है खुदा

अपने अहंकार पर इतराता है

 

वह जो बोले वही सत्य है

वह जो करें वही दुरुस्त है

वह जो चाहे वही होना है

वह अपने अहंकार में मस्त हैं

 

वाटिका में कालिया मिलने को तरस रही है

भंवरों पर सख्ती बरस रही है

छोटे पशु पक्षी उसके उन्माद के शिकार है

शक्तिशाली जिवो पर उसकी कृपा बरस रही है

 

वाटिका में अब बेचैनी बढ़ गई है

उसकी हरकतें दिलों में कांटों सी गड़ गई है

धीरे-धीरे सब एक हो रहे हैं

विद्रोह की आग सबके आंखों में चढ़ गई है

 

यह हवाएं जब तूफान लाएगी

सूखे पेड़ों में चिंगारी जलाएगी

जल जाएगा सैयाद का महल

बस वाटिका में राख रह जाएगी /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ याद… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘याद…‘।)

☆ कविता – याद… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

कभी तन्हा जो होता हूं,

तुम्हारी याद आती है,

यादों की,वो यादें भी,

हमें कितना सताती हैं,

 ये मन बेचैन रहता है,

नहीं अब चैन रहता है,

तुम्हारी प्यार की बाते,

रह रह याद आती हैं,

कभी सावन के झूलों में,

कभी बागों के फूलों में,

सूनी सूनी राहों में,

तुम्हारी याद आती है,

जब ये मन भटकता है,

वक्त नहीं जब कटता है,

आंखों से आंसू गिरते हैं,

तुम्हारी याद आती है,

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१० ☆ व्यंग्य – समाज में बाहुबलियों की अहमियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘समाज में बाहुबलियों की अहमियत’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१० ☆

☆ व्यंग्य ☆ समाज में बाहुबलियों की अहमियत ☆

हाल ही में एक घटना ऐसी हुई जिसने बहुत भावुक कर दिया। बरेली में एक अभिनेत्री की बहन के घर पर एक बाहुबली के आदेश पर गोलियां चल गयीं। बाहुबली की नाराज़ी का कारण यह था कि अभिनेत्री की बहन ने एक कथावाचक के द्वारा स्त्रियों के विरुद्ध दिये गये बयान पर अपना रोष व्यक्त किया था। बाहुबली ने अभिनेत्री की बहन की टिप्पणी को सनातन का अपमान बताया था और उन्हें दंडित करने का निश्चय जताया था ।बाहुबली ने यह भी चेतावनी दी कि सनातन का अपमान करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

खबर सुनकर भावुकता से मेरा दिल भर आया। दो दिन तक कंठावरोध रहा। जहां सनातन के इतने बलशाली रक्षक हों वहां सनातन को हानि पहुंचाने की जुरअत भला कौन कर सकता है? अब सनातन पूर्णतया सुरक्षित है। हमारा संत समाज अब निश्चिन्त हो सकता है। अब सनातन को हल्के में लेने की मूर्खता भला कौन करेगा? ‘जब जब होय धरम की हानी, बाढ़ैं असुर अधम अभिमानी; तब तब धरि प्रभु विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।’ प्रभु कौन सा रूप धरकर धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हो जाएंगे, कौन कह सकता है? कथावाचकों का पक्ष लेते हुए बाहुबली ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘इनहिं कुदृष्टि बिलोकै जोई, ताहि  वधे कछु पाप न होई।’ अब कथावाचक निश्चिंत होकर बीस फीट दूर से प्रेतग्रस्त आदमी को थप्पड़ लगा सकते हैं या छात्रों को बिना पढ़े पास होने के नुस्खे बता सकते हैं।

बाहुबली की धमकी के बाद कथावाचकों पर जब तब फब्तियां कसने वालों को सांप सूंघ गया है। उन पर गुस्सा दिखाने वाले कलमधारी अब चुपचाप अपनी कलम चबा रहे हैं। उनके शब्द डर के मारे कागज पर उतरने से इनकार कर रहे हैं।

सनातन के रक्षक एक वकील साहब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी से ऐसे  नाराज़ हुए कि उन्होंने उसे सनातन का अपमान माना और मुख्य न्यायाधीश की तरफ जूता उछाल दिया। इस पराक्रम के साथ उन्होंने नारा दिया—‘सनातन का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान ।’ दुष्यंत कुमार ने लिखा था ‘एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ वकील साहब को कोर्ट के चेंबर में कोई पत्थर नज़र नहीं आया तो जूता उछाल दिया। बहादुरी के इस काम से वकील साहब ने बता दिया कि कि वे देश की न्याय व्यवस्था को जूते की नोक पर रखते हैं। वकील साहब ने यह नहीं बताया कि उन्हें पूरे हिंदुस्तान का वकील बनने के लिए किसने वकालतनामा सौंपा था।

बाहुबली की धमकी से जो सन्नाटा खिंचा उससे धर्म की रक्षा के मामले में एक नया आयाम उद्घाटित हुआ। हमारे देश में धर्मस्थलों की सुरक्षा पर सरकार का बहुत धन व्यय होता है। नये राम मंदिर की सुरक्षा के इंतज़ाम पर नज़र डालें तो दिमाग चक्कर खा जाता है। तीन प्रकार के बल वहां सुरक्षा में लगाये गये हैं, कैमरों और ड्रोन की तैनाती है, मंदिर को घेरती चार किलोमीटर की दीवार है। कई दूसरे धर्मस्थलों पर भी सुरक्षा बल तैनात हैं। गरज़ यह कि जो संसार  की रक्षा करते हैं उनकी रक्षा आदमी कर रहा है। कई धर्मगुरुओं को भी सरकार के खर्चे पर सुरक्षा दी गयी है, जो सवाल पैदा करती है कि अपने को भगवान का कृपापात्र मानने वालों और मृत्यु का दिन पूर्व निर्धारित मानने वालों को आदमी की दी हुई सुरक्षा की ज़रूरत क्यों पड़ती है?

तो दिमाग में यह विचार आता है कि अगर पीपीपी अर्थात पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के अंतर्गत सरकार धर्म की रक्षा हेतु बाहुबलियों का सहयोग लेने लगे तो मामला ‘कम कीमत बालानशीं’ वाला हो जाएगा। बाहुबली की एक चेतावनी आएगी और धर्म के कार्यों में गड़बड़ी करने वाले सभी उपद्रवियों के औसान ढीले हो जाएंगे। फिर धर्मगुरुओं को भी सुरक्षा की ज़रूरत नहीं रहेगी।

देश के कई क्षेत्रों में बाहुबलियों की तूती बोलती है, उनकी अदालतें लगती हैं, लेकिन अफसोस है कि सरकार ने उनकी ताकत और क्षमताओं का समुचित उपयोग नहीं किया। जो काम सरकार द्वारा लाखों रुपया खर्च करने पर भी नहीं होता वह बाहुबली के एक निर्देश पर हो सकता है।

राहत की बात है कि कुछ राज्यों ने अपने बाहुबलियों की संभावनाओं को पहचाना है और उनका सहयोग लेने में रुचि दिखायी है। बिहार के आसन्न चुनाव के लिए एक दल ने तीन बाहुबलियों को मैदान में उतारा है, जब कि दूसरे दल ने एक पूर्व बाहुबली के संभावना-संपन्न पुत्र और एक ऐसे बाहुबली की पुत्री को टिकट दिया है  जो फिलहाल संगीन अपराध में जेल में बन्द हैं और जनता की सेवा करने की स्थिति में नहीं हैं। पुत्री ने साफ घोषणा की है कि वे अपने यशस्वी पिता को जेल से बाहर लाने के लिए ही चुनाव लड़ना चाहती हैं। एक और बाहुबली की पत्नी को भी टिकट से नवाज़ा गया है। कुछ दिन पूर्व सुशासन बाबू ने कानून में परिवर्तन करके एक बाहुबली को उनकी उपयोगिता को देखते हुए जेल से मुक्त कराया था। अब उनके पुत्र को टिकट दिया गया है ताकि पिताजी पुत्र के पीछे बैठकर ‘बैक सीट ड्राइविंग’ कर सकें। इस तरह जब बाहुबली कानून के शिकंजे में आ जाते हैं तो उनकी पत्नी या पुत्र को टिकट दे दिया जाता है ताकि समाज की सेवा में अवरोध न हो।

यह संतोष की बात है कि अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की हमेशा धर्म में रुचि रही है। देश के दस्यु अक्सर मंदिरों में घंटे चढ़ाते रहे हैं। जो पिंडारी कहलाते थे वे  काली के उपासक होते थे। वाल्मीकि की डाकू से महर्षि बनने की कथा सर्वविदित है।

मेरे ख़याल से बाहुबलियों की उपयोगिता और उनकी क्षमता के मद्देनज़र सरकार को चाहिए कि संकोच त्याग कर समाज के कल्याण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करे। ‘साफ छिपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं’ वाली नीति की अब कोई ज़रूरत नहीं है।

ताज़ा समाचार यह है कि बिहार के चुनाव में करीब दो दर्ज़न बाहुबली मैदान में उतर रहे हैं। अब मेरी चिन्ता यह है कि कहीं ऐसा न हो कि धीरे-धीरे विधानसभा की सारी सीटों पर बाहुबली विराज जाएं और बिहार प्रगति के मार्ग पर ऐसा सरपट दौड़े कि पूरा देश देखता रह जाए।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८२ – संस्मरण… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– संस्मरण…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८२ — संस्मरण — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

साठ उपन्यासों का ख्यातिलब्ध लेखक आज शर्म और आत्मताप से इस कदर व्यथित था कि उसे लगता था अपने गले में फाँसी की रस्सी डाल कर मर जाए। बात यह थी संस्मरणों की उसकी नवीनतम कृति को विश्व पुरस्कार मिला था। पर उसका अपना तो एक भी संस्मरण नहीं था। अपने संस्मरण दमदार और खास न होने से उसने तीन चार अनपढ़ कर्मठ बूढ़ों से साठ तक संस्मरण सुन कर अपने संस्मरणों के नाम से अपनी कृति तैयार की थी।

© श्री रामदेव धुरंधर

08 – 11 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१० – पड़ाव के बाद का मौन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१० ☆ पड़ाव के बाद का मौन… ?

एक परिचित के घर बैठा हूँ। उनकी नन्ही पोती रो रही है। उसे भूख लगी है, पेटदर्द है, घर से बाहर जाना चाहती है या कुछ और कहना चाह रही है, इसे समझने के प्रयास चल रहे हैं।

अद्भुत है मनुष्य का जीवन। गर्भ से निकलते ही रोना सीख जाता है। बोलना, डेढ़ से दो वर्ष में आरंभ होता है। शब्द से परिचित होने और तुतलाने से आरंभ कर सही उच्चारण तक पहुँचने में कई बार जीवन ही कम पड़ जाता है।

महत्वपूर्ण है अवस्था का चक्र, महत्वपूर्ण है अवस्था का मौन..। मौन से संकेत, संकेतों से कुछ शब्द, शब्दों के माध्यम से भाषा से परिचित होते जाना और आगे की यात्रा।

मौन से आरंभ जीवन, मौन की पूर्णाहुति तक पहुँचता है। नवजात की भाँति ही बुज़ुर्ग भी मौन रहना अधिक पसंद करता है। दिखने में दोनों समान पर दर्शन में जमीन-आसमान।

शिशु अवस्था के मौन को समझने के लिए माता-पिता, दादी-दादा, नानी,-नाना, चाचा-चाची, मौसी, बुआ, मामा-मामी, तमाम रिश्तेदार, परिचित और अपरिचित भी प्रयास करते हैं। वृद्धावस्था के मौन को कोई समझना नहीं चाहता। कुछ थोड़ा-बहुत समझते भी हैं तो सुनी-अनसुनी कर देते हैं।

एक तार्किक पक्ष यह भी है कि जो मौन, एक निश्चित पड़ाव के बाद जीवन के अनुभव से उपजा है, उसे सुनने के लिए लगभग उतने ही पड़ाव तय करने पड़ते हैं। क्या अच्छा हो कि अपने-अपने सामर्थ्य में उस मौन को सुनने का प्रयास समाज का हर घटक करने लगे। यदि ऐसा हो सका तो ख़ासतौर पर बुज़ुर्गों के जीवन में आनंद का उजियारा फैल सकेगा।

इस संभावित उजियारे की एक किरण आपके हाथ में है। इस रश्मि के आलोक में चलिए आज सुनें और पढ़ें किसी बुज़ुर्ग का मौन।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Short Story ☆ ~ Setting Sun and the Earthen Lamp… ~ / अस्ताचल का सूर्य और मिट्टी का दीपक (भावानुवाद) ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing Short Story “~ Setting Sun and the Earthen Lamp… ~”.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? Short Story ~ Setting Sun and the Earthen Lamp… ~ ??

☆

As the setting sun, draped in fiery splendour, whispered to the world,

‘Who shall now inherit my radiant duty?’

A reverent hush fell upon the universe— mountains bowed in respect, oceans stilled their tides, and even the winds held their breath…

Then, from a solitary threshold, a tremulous voice arose— the gentle flame of a humble diya, an earthen lamp, its glow quivering yet resolute:

‘I shall, my Lord… as much as this small heart can bear!’

And in that moment, the setting sun bestowed a warm smile upon the earth, knowing that light is eternal, merely passing from one beacon to another!

☆

~Pravin Raghuvanshi

? ~ अस्ताचल का सूर्य और मिट्टी का दीपक… ~ ??

☆

जब अस्ताचल का सूर्य अरुणिमा ओढ़े गगन से बोला — “अब मेरे प्रकाश का उत्तराधिकारी कौन होगा?”

क्षण भर को थम गई सारी सृष्टि — पहाड़ झुक गए, सागर शांत हो गए, यहाँ तक कि पवन भी थम गई श्रद्धा में।

तभी किसी दहलीज़ से एक कोमल स्वर उठा — मिट्टी के छोटे से दीपक ने, थरथराती लौ में विनम्रता भरकर कहा — “मैं करूँगा, प्रभु… जितना मुझसे संभव होगा।”

और उस क्षण, डूबते सूर्य ने मुस्कराकर भूमि पर निहारा — जानता था, प्रकाश शाश्वत है, वह तो बस हस्तांतरित होता है…!

☆

 ~प्रवीन रघुवंशी ‘आफ़ताब’

☆

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५५ – हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी  – हिंदी आरती।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५५ ☆

☆ हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

भारती भाषा प्यारी की।

आरती हिन्दी न्यारी की… 

०

‘लोक‘ की भाषा है हिंदी,

‘तंत्र‘ की आशा है हिंदी।

करोड़ों जिव्हाओं-आसीन

न कोई सकता इसको छीन।

ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की

आरती हिन्दी न्यारी की।।

०

वाक् हिंदी का ध्वनि आधार,

पाँच वर्गों बाँटे उच्चार।

बोलते जो वह लिखते आप-

वर्तनी स्वर-व्यंजन अनुसार।

नागरी लिपि सुविचारी की…  

० 

एकता पर हिंदी बलिहार, 

लिंग दो वचन क्रिया व्यापार।

संधियाँ काल शक्ति हैं तीन-

विशेषण हैं हिंदी में चार।

पाँच अव्यय व्यवहारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

०

वर्ण हिंदी के अति सोहें,

शब्द मानव मन को मोहें।

काव्य रचना सुडौल सुन्दर

वाक्य लेते सबका मन हर।

छंद-सुमनों की क्यारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

०

समेटे ज्ञान-नीति-विज्ञान,

सीख-पढ़-लिख हों हम विद्वान।

विषय जो कठिन जटिल नीरस-

बना देती हिंदी रसवान। 

विश्ववाणी गुणकारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

कंडक्टर टिकट काट कर सुख की सांस लेता अपनी सीट तक लौटा तो हैरान रह गया। वहां एक आदमी पूरी शान से जमा हुआ था। कोई विनती का भाव नहीं। कोई कृतज्ञता नहीं। आंखों में उसकी खिल्ली उड़ाने जैसा भाव था।

कंडक्टर ने शुरू से आखिर तक मुआयना किया। कोई सीट खाली नहीं थी। बस ठसाठस भरी थी। वह टिकट काटते अब तक दम लेने के मूड में आ चुका था।

– जरा सरकिए,,,

उसने शान से जमे आदमी से कहा।

– क्यों?

– मुझे बैठना है।

– किसी और के साथ बैठो। मैं क्यों सिकुड़ सिमट कर तंग होता फिरुं?

– कृपया आप सरकने की बजाय खड़े हो जाइए सीट से। कंडक्टर ने सख्ती से कहा।

जमा हुआ आदमी थोड़ा सकपकाया , फिर संभलते हुए क्यों उछाल दिया।

– क्योंकि यह सीट मेरी है।

– कहां लिखा है?

जमे हुए आदमी ने गुस्से में भर कर कहा।

– हुजूर , आपकी पीठ पीछे लिखा है। पढ़ लें।

सचमुच जमे हुए आदमी ने देखा, वहां साफ साफ लिखा था। अब उसने जमे रहने का दूसरा तरीका अपनाया। बजाय उठ कर खड़े होने के डांटते हुए बोला- मुझे पहचानते हो मैं कौन हूं? लाओ कम्पलेंट बुक। तुम्हारे अभद्र व्यवहार की शिकायत करुं।

– वाह। तू होगा कोई सडा अफसर और क्या? तभी न रौब गालिब कर रहा है कि मुझे पहचानो कौन हूं मैं। बता आज तक कोई मजदूर किसान भी इस मुल्क में इतने रौब से अपनी पहचान पूछता बताता है? चल, उठ खड़ा हो जा और कंडक्टर की सीट खाली कर। बड़ा आया पहचान बताने वाला। कम्पलेंट बुक मांगने वाला। कम्पलेंट बुक का पता है, कंडक्टर सीट का पता नहीं तेरे को?

उसने बांह पकड़ कर उसे खड़ा कर दिया। अफसर अपनी पहचान बताये बगैर खिड़की से लटक कर रह गया!

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३० – आलेख ☆ ~ सतुआ पिसान के लबरी, चलो लइकवो ददरी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३० ☆

☆ आलेख ☆ ~ सतुआ पिसान के लबरी, चलो लइकवो ददरी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(बलिया का ददरी मेला हमारी सांस्कृतिक विरासत)

☆

विशाल गंगा का पाट, एक तरफ उत्तर प्रदेश, दूसरी तरफ बिहार। इस बीच रेत पर बसा हुआ एक नगर सिर्फ आज ही नहीं बल्कि सैकड़ो वर्ष पुराने अतीत को अपने दामन में सजोये, अपनी पुरानी पहचान के साथ जस का तस खड़ा है।

महर्षि भृगु के शिष्य दर-दर मुनि के नाम से लगने वाले प्रख्यात कार्तिक पूर्णिमा से प्रारम्भ होने वाला ददरी मेला भारत में ही नहीं बल्कि विश्व मैं भी अपनी पहचान कायब रखा है। हमारे धर्म संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा को पवित्र में नदी और सरोवर में स्नान करने का विधान है। इसी क्रम में एक ऐतिहासिक स्नान महर्षि भृगु की नगरी बलिया में गंगा स्नान करने का बड़ा महत्व है।

यदि हम आज से तीन दशक पीछे जाए तो हमारे गांव संवरा की सड़कों पर मेले के लिए पैदल जाती हुई भीड़, जिसके भीतर श्रद्धा और आस्था कूट-कूट कर भरी होती थी, लगातार पूरी रात चलती थी। लोग सड़क के किनारे खड़े होकर पूरी रात, टैक्सी, बस का इंतजार करते थे। सब की इच्छा या होती थी कि कब गंगा जी के तीर पहुचें और गंगा जी में पवित्र डुबकी गं लगावें।

मुझे याद है, एक बार भईया ( सबसे बड़े भाई साहब -स्व. डॉ शमशेर सिंह, ) मुझे कार्तिक पूर्णिमा ददरी स्नान के लिए गाँव सायकिल से ले गये। वे साइकिल चला रहे थे। पीछे की सीट पर एक बढ़िया सा कपड़ा बांध दिए और उस पर मुझे बैठा दिया। मैं दोनों हाथ पकड़ कर उनके पीछे बैठकर बलिया पहुंचा था। मेरे गांव से बलिया करीब 26 किलोमीटर दूर और बलिया से कम से कम 3-4 किलोमीटर गंगा की थी। हम रात के 10:00 बजे घर से चले थे और लगभग 1:30 के आसपास सामने स्नान कर लिये था। गंगा स्नान करने का क्रेज इतना जबरदस्त था कि लोग कहां-कहां से दूर-दूर से पैदल, गाड़ी से बैलगाड़ियों से ट्रेन से, बस से स्नान करने बलिया आते थे।

मैंने अपने शुरू के पंक्ति में लिखा है ‘सतुवा पिसान के लबरी’ इसका मतलब भी आता है कि लोग इस यात्रा पर निकलते थे तो अपने साथ बलिया का खास रेडीमेड व्यंजन सतुआ अवश्य ही ले आते थे। यानी यदि कोई 15 -20 -25 किलोमीटर पैदल यात्रा करके गंगा स्नान करने जा रहा है, तो वह रास्ते में रुककर सतुवा घोल कर या सुतुआ को सानकर कर खा लेता था।

इस प्रकार अपनी इस आस्था यात्रा को पूरा करते हुए गंगा जी में डुबकी लगाकर वापस लौटता था। वापस लौटने के पहले प्रत्येक दर्शनार्थी या स्नानार्थी की इच्छा यह होती थी कि वह भारतीय भृगु के जरूर दर्शन करें। तत् पश्चात् बालेश्वर बाबा के दर्शन करें।

ये वही महर्षि बाबा है जिनके शिष्य दर-दर ऋषि के नाम पर ददरी मेला लगता है। ददरी मेला भारत के बड़े मेलों में से एक है। ऐसे बड़े मेलों में एक मेला बिहार के सोनपुर में लगता है। जिसे लोग हरिहरनाथ का मेला कहते हैं। लोगों मानता है कि बलिया मेला जब समाप्त होता है तो हरिहर क्षेत्र का सोनपुर का मेला शुरू हो जाता है। ये ही सारी दुकान वहां जाकर शिफ्ट हो जाती थी। इस मेले की विशेषता यह थी कि इस मेले में बड़ी-बड़ी दुकानों के अलावा पशुओं का बाजार विशेष रूप से हाथी घोड़ा भी बिकते हैं। न जाने अब हाथी दिखाते हैं या नहीं नहीं मैं बता सकता। पहले लोग हाथी पालने के शौकीन होते थे जो रइस जाते या समृद्ध परिवार के लोग होते थे उन्हें हाथी पालने का शौक था। वे अपने दरवाजे पर हाथी रखते थे। हाथी को शुभ मानते थे। लक्ष्मी का स्वरूप मानते थे। हाथी को खरीदने से ज्यादा हाथी को पालने का महत्व होता था। हर किसी कूबत नहीं होती थी कि वह हाथी पाल सके क्योंकि हाथी ऐसा जानवर है जिसको भरपूर चारा चाहिए। उसका पूरा-पूरा देख-रेख होना चाहिए। उसके ड्राइवर यानी महावत का पूरा खर्च देना होता है। यानी एक ऐसा वाहन जिसका आउटपुट जीरो हो लेकिन उसमें लागत बड़ी तगड़ी हो।

शायद अबके जमाने में कोई ऐसा वाहन को नहीं खरीदना चाहेगा। मेरे बड़ी बुआ के घर हाथी हुआ करता था उसे हाथी के लिए अलग से दो चार बीघा गन्ने बोए जाते थे। वह हाथी कभी-कभार मेरे गांव भी आता था और एक दिन नहीं हफ्तों रुक जाता था अब तो उसे तक उसके चेहरे की सारी व्यवस्था हम सबको करनी पड़ती थी। लेकिन एक शोहरत तो थी ही कि हमारे बुआ के पास हाथी है।

इस समय ददरी मेले हाथी बिक रहा है या नहीं बिक रहा है लेकिन नहीं कह सकता।

मेले में का ऐतिहासिक सांस्कृतिक स्वरूप जिसे लोग बहुत याद करते हैं वह स्वयं में विशिष्ट हुआ करता था। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम साहित्यिक गोष्ठीयाँ एवं कवि सम्मेलन आदि भी होते थे, आज भी होते हैं। अपने ईंटर के हिंदी पुस्तक में “भारतवर्षोन्नति कैसे हो “शीर्षक से एक लेख हुआ करता था। यह लेख भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा 1884 में बलिया के ददरी मेले में दिए गये भाषण पर आधारित था। अब आप स्वयं समझ सकते हैं कि यह मेला कितना प्राचीन मेला रहा है। यदि आप बलिया के निवासी हैं तो आपको बलिया भृगुजी, ददरी मेला, रसड़ा की रामलीला, बलिया का महावीरी झंडा, बलिया बलिदान दिवस, आदि ऐतिहासिक तिथि एवं अवसरों का ज्ञान या जानकारी अवश्य होगी।

 फिर मैं ददरी मेंले की ओर लौटता हूं। इस ददरी मेले में जब महिलाएं गीत गाते हुए सड़कों पर निकलती थी तो हमारे पिताजी, उन महिलाओं का गया हुआ एक गीत गुनगुनाया करते थे, मैं उस गीत की कुछ पंक्तियों को आपके सामने प्रस्तुत करता हूं।

” योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

जैसे रे सोनरा सोनवा के जोगवे ला,

घटे न पावे एको रत्ती,

योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

जइसे रे पन्हेंरिया पनावा के जोगवेला,

सड़े न पावे एको पती,

योगव हूँ निशि वासर जोगजती,

वैसे हो रामजी सीता जी के जोगवे ले,

घटे न पावे मान मती

योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

ऐसे अनेक भक्ति गीतों गाते हुए महिलाएं सिर पर गठरी रखे हुए मेले की तरफ निकलती थी और अपनी यात्रा को बड़े ही आनंद के भाव से पूरा करतीं थीं।

वैसे जो प्रसिद्ध गंगा स्नान के मेले लगते थे उनमें बलिया का ददरी मेला, बटेश्वर का मेला, गढ़मुक्तेश्वर का स्नान पर्व, रायबरेली में लगने वाला गंगा स्नान मेला, लखनऊ में गोमती के किनारे कतकी मेला। न जाने यह मेल अब कितने प्रभावी हैं और किस स्तर पर लग रहे हैं, नहीं कह सकता। लेकिन बलिया का ददरी मेला आज भी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को, सजोते हुए, अपनी पहचान बनाए हुए है

कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले इस ददरी मेले की आपको हृदय से बधाई देता हूं।

भृगु बाबा की जय।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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