हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९५ ☆ शिक्षा और संस्कार… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शिक्षा और संस्कार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९५ ☆

☆ शिक्षा और संस्कार… ☆

गूगल पूरी दुनिया को रास्ता दिखा सकता है, परंतु मनुष्य बनने का रास्ता धर्म शिक्षा व  संस्कार ही दिखा सकते हैं– शाश्वत सत्य है। आज की पूरी दुनिया बहुत छोटी हो गई है। हम तत्क्षण किसी से बात कर सकते हैं; अपने भाव में विचार पूरे विश्व में प्रेषित कर सकते हैं; वर्क फ्रॉम होम कर सकते हैं तथा पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं। विभिन्न संसाधनों की बचत करके उनमें इजाफा कर अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर सकते हैं। हम दूर-दराज़ में हो गई संगोष्ठियों में प्रतिभागिता कर सकते हैं। है ना यह कमाल! यदि इसे कोरोना का उपहार या वरदान कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस रूप में हम इस वरदान कह सकते हैं। इतना ही नहीं एक लंबे अंतराल के पश्चात् बच्चों को पारिवारिक संस्था का महत्व समझ में आया और लोग अपनी संस्कृति की ओर लौटे। भले ही हमें इस समय बहुत सी आपदाओं ने चहुँओर से मानव पर निशाना साधा और बहुत से लोगों को अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ा।

सो! गूगल दुनिया को रास्ता तो दिखा सकता है, पथ-विचलित होने से बचा सकता है, सही दिशा में चलने को प्रेरित कर सकता है। परंतु वह मनुष्य बनने की राह नहीं दर्शा सकता, क्योंकि धर्म, शिक्षा और संस्कार ही मानव बनने की राह दिखाते हैं। संस्कृति हमें सुसंस्कारों से पल्लवित करती है। अतीत में प्रचलित मान्यताओं, परंपराओं, रीति-रिवाज़ों व जीने की राह की ओर इंगित करती हैं व शुभ-अशुभ का भान कराती हैं। सत्यम शिवम सुंदरम का महत्व समझा कर उसे जीवन में अपनाने का आग्रह करती हैं। हमारे अंतर्मन में निहित सुप्त भावनाओं व संस्कारों को जाग्रत करती हैं, जिस पर चलकर मानव उस असीम शक्ति से साक्षात्कार कर सकता है।

प्रार्थना करते समय व्यक्ति का मंदिर में होना आवश्यक नहीं, किंतु व्यक्ति के मन में ईश्वर का वास होना अत्यंत आवश्यक है–निर्गुण भक्ति की ओर अंकित करता है। उसे किसी पूजा-स्थल में ढूंढने की आवश्यकता नहीं, परंतु उसके अंतर्मन में ईश्वर का विद्यमान रहना आवश्यक है। मानव को कस्तूरी रूपी ईश्वर को तलाशने के निमित्त वन-वन अर्थात् संसार में भटकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह हमारे मन में रहता है तथा हम पल-भर में उसके दर्शन प्राप्त कर सकते हैं।

संत और वसंत में एक ही समानता है। जब वसंत आता है तो प्रकृति सुधर जाती है और  जब संत आते हैं तो संस्कृति सुधर जाती है। जैसे वसंत के आगमन पर प्रकृति के विभिन्न उपादान फल-फूल जाते हैं, लहलहा उठते हैं, मलय वायु के झोंके मानव मन को आलोड़ित व आंदोलित करते हैं। उसी प्रकार संतजनों के अवतरण व मानव मात्र से संपर्क होने पर हमारे भीतर सुसंस्कार सृजित हो जाते हैं। संतजन हमें अपनी संस्कृति के दर्शन करते हैं। हमें कुमार्ग से सत्मार्गव की ओर प्रवृत्त करते हैं। उचित- अनुचित, ग्राह्य-त्याज्य व उपयोगी-अनुपयोगी का भेद समझाते हैं।

शिक्षा हमारे आचार-व्यवहार व सोच जीवन के दृष्टिकोण को प्रभावित करती है और मानवीय मूल्य हमें सत्य की राह दर्शाते हैं। शिक्षा हमें सुसंस्कारित करती है, बुराइयों से बचने का संदेश देती है। अधिकार व कर्त्तव्यों के अन्योन्याश्रित संबंध को दर्शाती है। अंतर्मन के भीतर निहित गुणों को विकसित करती है जो उसे सर्वांगीण मानव का दर्जा प्रदन करते हैं। यह हमारे व्यक्तित्व का विकास करती है।

धर्म का मानव जीवन को विकसित करने में अहम् योगदान है। धर्म हमें प्रेम, स्नेह, करुणा, दया, सहानुभूति, समर्पण, सहनशीलता आदि का संदेश प्रेषित करता है, जिस का अनुसरण कर हमारा जीवन सुचारु रूप से आगे बढ़ता है। धर्म हमें सहिष्णुता का मार्ग अपनाने का संदेश प्रेषित करता है। सभी धर्म समान हैं। इसलिए पारस्परिक द्वेष, हिंसा आदि को जीवन में पदार्पण नहीं करने देना चाहिए। इससे शत्रुता का भाग उपजता है तथा मतभेद मनभेद का रूप  ग्रहण कर लेते हैं। दरारें मन-आंगन में दीवारों का आकार ग्रहण कर लेती हैं और दुनिया इस क़दर बढ़ जाती है, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। परिवार, समाज व देश में अराजकता व्याप जाती है और मानव कुछ निजी स्वार्थों से बंधा ग़लत काम करने पर उतारू हो जाता है। उसके हृदय में प्रज्ज्वलित प्रतिशोध की ज्वाला विशालकाय रूप धारण कर लेती है और निर्दोष बच्चे, महिलाएं व बुज़ुर्ग उस हिंसा का शिकार हो जाते हैं। वह खून के रिश्तों को नकार उन पर निशाना साधने में भी गुरेज़ नहीं करता। इससे पूरे समाज में खलबली मत जाती है और अजनबीपन का एहसास पाँव पसार लेता है। जिसके परिणाम-स्वरूप  समाज में विनाश ही विनाश दृष्टिगत होता है।

सो! संचार के साधनों ने भौगोलिक दुरियों को तो कम किया है और विश्व ग्लोबल विलेज बनकर रह गया है। परंतु मानव-मानव के बीच की दुरियाँ बहुत बढ़ गई हैं। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए हैं। मोबाइल, इंस्टाग्राम, गूगल ने मानव को आत्म-केंद्रित कर दिया है। अब तो एक छत के नीचे निवास करने वाले लोग भी मोबाइल के मध्यम से अपने सुख-दु:ख सांझे करने लगे हैं तथा संवाद करने में व्यस्त रहते हैं। लोग दिन भर फेसबुक, टि्वटर आदि में व्यस्त रहते हैं। समान भी ऑनलाइन आ जाता है। सो!  किसी से दुआ सलाम की कल्पना भी बेमानी हो गई है और इससे समाज में एकांगिता का भाव व्याप रहा है। इंसान अपने अहं में लीन रहता है।

 

इस तथ्य को समझना अत्यंत अवशयक है कि धर्म, शिक्षा जहाँ हमारा सर्वांगीण विकास करती है, वहीं संस्कृति हमें जीने की राह दर्शाती है। वास्तव में धर्म, शिक्षा वसंस्कार हमें पूर्ण मानव बनाते हैं और उन्हें जीवन में अपनाकर हम स्वस्थ व सहज जीवन जी सकते हैं और स्वस्थ समाज की संरचना कर सकते हैं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #६७ – गीत – मर्यादा पुरुषोतम… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मर्यादा पुरुषोतम…।

? रचना संसार # ६७ – गीत – मर्यादा पुरुषोतम…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

सत्कर्मों के हैं ज्ञान -पुंज ,

रघुकुल दीपक श्रीराम नमन।

शरणागत आते सुखसागर,

करते हैं आठों याम नमन।।

*

घट-घट वासी पालनकर्त्ता,

हनुमत साधक अंतर्यामी।

अवगुणहर्ता जीवनदाता,

मर्यादा पुरुषोत्तम स्वामी।।

हे ज्ञानवान हे शक्तिमान,

रघुकुल-भूषण सुखधाम नमन।

*

कौशल किशोर करुणा-निधान,

जगतारक मानस बलिहारी।

हो शोक नियंता जग रक्षक,

सीतापति राघव शुभकारी।।

अखिलेश्वर अभिनंदन करते,

हे भव्य -दिव्य हरि नाम नमन।

*

तारी ऋषि गौतम की नारी,

वैभवदायी महिमा न्यारी।

अभिमानी रावण संहारा,

हैं शौर्यवान प्रभु धनुधारी।।

त्रेता युग में हैं अवतारे,

जपता मन है अविराम नमन।

*

मानवता का पोषण करते,

हरते हैं जन -जन की पीरा।

जय धर्म परायण युग गौरव,

अतुलित बलशाली रघुवीरा।।

मुनिजन संतन के हितकारी,

उर बसती छवि अभिराम नमन।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #२९६ ☆ भावना के दोहे – रावण ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे  – रावण।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # २९६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – रावण ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

रावण के पुतले जले, नहीं बदलता भाव।

अंतर्मन के द्वेष से, जगता सदा तनाव।।

 *

जला रहे सारे हमीं, रावण को हर वर्ष।

नहीं बुराई छूटती, नित लालच में हर्ष।।

 *

अहंकार मद मोह ही, रावण के अवतार।

मन के भीतर झाँकिए, पा लोगे सब प्यार।।

 *

राम नहीं बाहर कहीं, ढूँढो अपने पास।

करो दहन रावण तभी, जब होगा विश्वास।।

 *

सदा परस्पर वैर का, फैल रहा है जाल।

असुर शक्तियाँ पनपती, घर-घर यही सवाल।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२७७ ☆ कविता – साल दर साल पुतले जलते गये… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक कविता – साल दर साल पुतले जलते गये… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

 ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २७७ ☆

☆ कविता – साल दर साल पुतले जलते गये… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

साल दर साल पुतले जलते गये ।

फिर भी रावण नये पलते गये ।।

साल दर साल पुतले जलते गये ।

*

कद पुतलों का भी बढ़ाया गया ।

बिस्फोटक भी खूब मिलाया गया ।।

तमासा देख लोग मचलते गए ।

साल दर साल पुतले जलते गये ।।

*

धन दौलत का यहां अब जोर है ।

यहां हर तरफ कलियुगी शोर है ।।

आदमी सच्चे हाथ मलते गये ।

साल दर साल पुतले जलते गये ।।

*

बुराई पर अच्छाई की विजय ।

हो असत्य पर सदा सत्य की जय ।।

सोच यह लेकर हम चलते गये ।

साल दर साल पुतले जलते गये ।।

*

क्रोध,कपट,कटुता का है प्रतीक ।

विकार सब रावण पर हैं सटीक ।।

ये अवगुण सारे अब बढ़ते गये ।

साल दर साल पुतले जलते गये ।।

*

तम अंदर का जब तक न मिटेगा ।

तब तलक अब न “संतोष”मिलेगा ।।

हम पुतले जला के बहलते गये ।

साल दर साल पुतले जलते गये ।।

*

जो इस दौर में  भी संभलते गए ।

बेधड़क राह सच की चलते गए ।।

ऐसे भी हमें लोग मिलते गये ।

साल दर साल पुतले जलते गये ।।

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ उजेडी राहिले उजेड होऊन… ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ “उजेडी राहिले उजेड होऊन…” ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

“दिवसभर काबाडकष्ट करत घाम गाळून चार पैसे घरी आणतो ते कुणासाठी? सगळ्या हौस मौजा पुरी कुणाच्या करतो? जे जे ज्या ज्या वेळी मागशील ते ते की रे तुला देत गेलो… अगदी आपली ऐपत नसताना सुद्धा… हाडाची काडं करताना, रक्ताचं पाणी करून राबराबताना न थकता, कंटाळा न करता एव्हढे कष्ट कोणासाठी मी उचलतो? … तू माझ्याकडून हजार अपेक्षांचं ओझं सारखं आपलं लादतच राहत असतोस… आणि यात माझी साधी माफक तुझ्याकडून एकच अपेक्षा असते की तू चांगला शिकावासं… चांगल्या गुणानीं दरवर्षी उतीर्ण होऊन डॉक्टर किंवा इंजिनिअर तुला जे आवडत असेल त्यातील पदविका.. घ्यावीस. सुदैवाने साथ चांगली दिलीच तर परदेशात जाऊन पुढचं ही मास्टर डिग्री मिळवावी.. हि अपेक्षा तुझ्याकडून करताना मला कितीही त्रास झेलण्याची मी सगळ्या प्रकारे तयारी ठेवली आहे हे तुला पूर्णपणे ठाऊक असताना, हा तुझा आजचा दहावीच्या निकालाची गुणपत्रिका पाहून माझ्या सगळ्या स्वप्नांवर पाणी पाडलसं! आजवर तुझ्यासाठी घेतलेल्या कष्टं मातीमोल केलेस! कश्यातही कधीही काही कमी न करता तुझे सारे चोचले की रे पुरवले… एकवेळ अर्धपोटी चा पोटाला चिमटा घेऊन आणि मनाला आशादायी सुवर्ण स्वप्नांची झळाळी दाखवत राहिलो.. तर त्याच झळाळीच्या चटक्याने चांगलेच भाजून काढलेस… का तू गांभिर्याने अभ्यास केला नाहीस… आणि आज हा निकाल मला दाखवताना तुला थोडी तरी लाज वाटायला हवी होती… अगदी इंडियन क्रिकेट फलंदाज धावा काढत असतात तितकेच मार्क्स तुला मिळावेत… एकूण टक्केवारी 38… सगळ्या विषयाला स्पेशल क्लास लावून सुद्धा… ” इति मी आमचे एकुलतेएक कुलदिपकांवर त्यांनी दहावीच्या बोर्डाच्या परिक्षेत जे दिवे लावले त्यावर घरात पसरलेल्या नैराश्याच्या अंधारात आगपाखड करत होतो.. आणि कुलदिपकांवर त्याचा काहीएक परिणाम झाला नव्हता. ते मख्खपणे आलिया भोगासी असावे सादर या पवित्र्यात खाली मान घालून उभे… दिवटा काहीच बोलत नाही हे पाहून त्यांच्या जन्मदात्री मातेने आमच्या लढाईत उडी घेऊन माझ्यावरच शाब्दिक आणि कायिक चढाई करू लागली… प्रतिपक्षाचा हा अनपेक्षित हल्ला मला सपशेल शरणागती घेण्यासाठी भाग पाडणार अशी स्थिती झाली होती.. हा सूर्य आणि हा जयद्रथच्या थाटात त्या जगनमाउलीने मला दमात सांगितले.. “अहो ती गुणपत्रिका कुणाच्या नावाची आहे ते बघा तरी आधी.. ती तुमचीच स्वताची दहावीची गुणपत्रिका आहे समजलं… आपणच लावलेले ते दिवे आहेत.. माझ्या लाडक्या सोनूने तर मेरीट मधे पास झाला आहे… अरे मग ती आधी का नाही दाखवयाची.. कारण नसताना मी उगाच चिडलो नसतो… मला वाटलं आपले कुलदिपक चौविस तास वह्या पुस्तकातून मोबाईल लपवून सारखं काहीतरी बघत बसत होते.. परिक्षेचं, बोर्डाचं आपल्या पुढच्या करियरचं कशा कशाचं त्यांना गांभिर्य उरलचं नाही तर मग हाती हाच निकाल अपेक्षित असणार.. यात माझं काही चूक नव्हतंच… म्हणून मी हा डांगोरा पिटत राहिलो.. “

“हो का कुठल्या बाबा आदमच्या काळातले बाबा तुम्ही… आमच्या वेळेला पुस्तकातून इतका प्रकाश निघत नव्हता… पण तेच आताच्या पिढीला सगळं ऑनलाईन शिकवलं जातं, शिकवण्या घेतल्या जातात.. टेस्ट होतात… मग त्यासाठी मोबाईल, टॅब शिवाय कसं बरं हे शक्य होणार… तुम्ही आपले पंतोजींच्या स्टाईलने जाणारी माणसं नव्या तंत्रज्ञानाचा वापर चांगल्यासाठी सुदधा होऊ शकतो हे कधीच पटवून घेणार नाहीत… तुम्हाला जुनं ते सोनं आणि नवं ते पितळ हेच ठाऊक पण आता नवं ते टाकाऊ तर नसतचं तर ते टिकाऊ देखिल असतं… सोन्या चांदीपेक्षा जास्त महाग नि दुर्मिळ असा प्लॅटिनम धातू आहे तो… “

“तुम्ही उगाच माझ्या लेकरावर डाफरलात… बिचारे ते एव्हढा आनंदात होता त्याचा तुम्ही हिरेमोड केलात… कधीतरी हे ही तुमच्या लक्षात यायला हवं होतं.. कि… आपला दहावीचा निकाल नाही तो नाही पण मुलाचा निकाल पाहून तरी म्हणावं.. मागेपुढे दाटे ज्ञानाचा उजेड…. उजेडी राहिले उजेड होउन.. “

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र २४ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र २४ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

।। श्री नारद उवाच ।। 

नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम् ॥ २४ ॥

अर्थ : त्यात (जार प्रेमामध्ये व महात्म्यज्ञानावाचून होणार्‍या प्रेमामध्ये) प्रियतमाच्या प्रेमाने-सुखाने सुखी होणे हे नसते.

विवरण:  काम व प्रेम यांतील भेद या सूत्राच्याद्वारे स्पष्ट केला जात आहे. कामामध्ये कामी स्त्री किंवा पुरुष स्वतःच्या सुखभोगाकडेच पाहत असतो. जारिणी जारापासून स्वतःला किंवा जार जारिणीपासून आपल्याला सुख व्हावे अशी इच्छा व प्रयत्न करीत असतो, व जोपावेतो ते सुख मिळत राहते तोपावेतोच अनुकूल संबंध राहतो. जर दुसर्‍याची सुख देण्याची शक्ती संपली किंवा प्रतिबंध आला तर परस्परांचा संबंधविच्छेद होतो, हे कामाचे स्वरूप आहे. पण प्रेमात स्वसुख-सुखित्वापेक्षा तत्सुख म्हणजे जो प्रेमविषय आहे त्याच्या सुखाने प्रेम करणारा सुखी होत असतो, किंवा स्वतःला सुखी समजत असतो. कामी पुरुष दुसर्‍याला भोग्य समजून स्वतःला भोक्ता समजतो. तसेच त्याचे प्रेम प्रेमविषयाच्या आत्म्यापेक्षा बाह्य स्वरूपावरच असते व त्या बाह्य विषयापासून ऐंद्रियिक सुखाचा भोग होत असतो. त्यासच तो श्रेष्ठत्व देतो. तो स्वतःला अंगी व ज्याच्यावर प्रेम करतो त्याला अंग समजतो. पण खरा प्रेमी स्वतःला अंग व प्रेमविषयाला अंगी समजत असतो; म्हणूनच त्याच्या ठिकाणी तत्सुखसुखित्व हे प्रेमाचे खरे लक्षण लागू पडते.

उद्धव गोकुळात श्रीकृष्णाचा निरोप घेऊन आला होता, त्याने तिथे काही दिवस वास्तव्य केले. परत जाताना त्यांना गोपींना विचारले की कृष्णाला काही निरोप आहे का?

त्यावर गोपी म्हणाल्या की कृष्णाला बोलावले आहे असे सांगा. कृष्ण इथे आला तर आम्हाला खूप आनंद होईल. पण इथे येण्यामुळे त्याला यत्किंचित ही त्रास होणार असेल तर तो जिथे आहे तिथेच सुखात राहू दे. आमच्यामुळे त्याला त्रास व्हावा असे आम्हाला स्वप्नात ही वाटणार नाही आणि आवडणारही नाही. आपल्या प्रियतम व्यक्तीला, आराध्य देवतेला जे आवडते ते करणे म्हणजे त्याच्यावर प्रेम करणे. अपेक्षा ठेवून जे केले जाते त्याला काम वासना (अर्थात इच्छा तृप्त करणे) असे म्हणता येईल.

राधा आणि कृष्णामधील एक काल्पनिक संवाद आहे. पण खरे प्रेम समजून घेण्यास तो पुरक आहे असे वाटते. कृष्ण राधेला भेटतो आणि जायला निघतो. राधा त्याला निघताना आडवत नाही. त्यावर कृष्ण म्हणतो तिला माझ्यावरील तुझे प्रेम अटल का? मी जातोय म्हणून तुला वाईट वाटत नाही. त्यावर राधा म्हणते तू चालला आहेस, अस तुला वाटतंय. कदाचित तू देहाने माझ्यापासून दूर जात असशील…..! पण तुला हे माहित नाही की मी तुला माझ्या मनात कायमच जपून ठेवलं आहे. प्रत्येक क्षणाला माझा तुझ्याशी संवाद चालू आहे, माझ्या प्रत्येक श्वासावर तुझ्या नामाची मुद्रा उमटत असते…..! मी जाणारा श्वास आणि आता येणारा श्वास एकच धून गात असतात….! त्यातून फक्त कृष्ण कृष्ण अशीच धून निर्माण होत असते……! अरे सावळ्या, तू कुठेही असलास, गेलास, तरी माझ्या मनातील तुझं स्थान कोणीही हिरावून घेऊ शकत नाही…! जन्मभरीचे श्वास देऊन मी तुला खरेदी केलं आहे……! अशी भक्ति केली की देव भक्ताचा देणेकरी होतो, दासापुढे मान खाली घालून उभा रहातो, त्याच्या घरी श्रीखंड्या बनून पाणक्या होतो, मिरेचे विष पितो, सखूचे दळण दळतो, आवडीच्या पायातील काटा काढतो…… , काहीच नाही तर तो सोबत असल्याची अनुभूती देतो……!

*
गोपींनी अशी भक्ति केली…!

खरे प्रेम हेच सांगते…

मी नाही तूच…!! 

*
।। जय जय रघुवीर समर्थ ।। 

नारद महाराज की जय!!!

 – भक्ती सूत्रे क्र. २४.

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)

थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६० ☆ अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६० ☆ अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार… ☆ 

वृक्ष को प्रत्यक्ष देव मानते हुए भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म, प्रकृति से जोड़कर अपने सभी पर्व मनाता है। चाहे, होली, नवरात्रि, दशहरा, सावन, कजरी आदि।

नदियों, पहाड़ों, पौधों सभी को जीवंत स्वरूप मानते हुए उन्हें पूजा जाता है। भाव -भक्ति, आस्था, विश्वास हमें पर्यावरण से जोड़ता है।

दशहरे में सोनपत्ता – (कचनार के पत्ते को)

दशहरे (विजयादशमी) पर सोन पत्ते का आदान-प्रदान, सोना बांटने का प्रतीक, यह सुख, वैभव, धन, सौभाग्य और मित्रता को दृढ़ करता है। मान्यता है कि ये पत्ते अक्षय धन और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

पर्यावरण की चेतना- इससे प्रकृति और पर्यावरण के मध्य समन्वय बनता है। इस दिन नीलकंठ के दर्शन, शिव पूजा जिसमें शमी के पत्ते को भगवान भोलेनाथ को चढ़ाते हैं। यह पेड़ रेगिस्तानी क्षेत्रों में भी हरा-भरा रहता है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है। इसे दशहरे पर पूजा कर संरक्षण की परंपरा है, जिससे लोग पेड़ों को बचाते हैं।

सोना के रूप में पत्तों का आदान-प्रदान प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता को दर्शाता है। असली धन प्रकृति ही है। प्रकृति संग उत्सव मनाने से जीवन में उमंग आती है। दशहरा बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। रावण दहन करके हर बार यही संदेश दिया जाता है कि बुराई को मिलकर इसी तरह दहन करना चाहिए। साथ ही हमें ये जनचेतना फैलाना चाहिए कि प्रदूषण, अंधाधुंध वृक्षों को काटना रोकना होगा।

आइए हम संकल्प लें कि दशहरे को पूरे धूमधाम के साथ प्रकृति संरक्षण की ओर अग्रसर होंगे।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७६ ☆ व्यंग्य – “रावण के पुतले की शर्त” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७६ ☆

?  व्यंग्य – रावण के पुतले की शर्त ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

  

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल

 

विजयादशमी की शाम थी, बस्ती बस्ती दशहरा मैदान, रामलीला ग्राउंड, स्टेडियम जैसे मैदानों में रावण, कुंभकरण, मेघनाथ के ऊंचे से ऊंचे पुतले खड़े थे। हर ऐसे तमाशे में बिना बुलाए भीड़ जुट ही जाती है। बच्चे गुब्बारों के लिए पिता से जिद कर रहे थे, चाट के ठेले के गिर्द महिलाओं की भीड़ थी। चाट वाला चुनावी बजट में वित्त मंत्री के प्रलोभन भरी घोषणाओं जैसी फुलकियां बांट रहा था। आसमान में बादल छाए थे और रामलीला मैदान में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले हेकड़ी और अकड़ के साथ खड़े थे। ज्यों ही मुख्य अतिथि ने रावण दहन की कोशिश की कहीं तेज बारिश ने उत्सव को भीगो दिया, तो कहीं हवा ने मंच उड़ा दिए लोग हैरान थे दियासलाई की तीलियां जल नहीं रही थी। किसी न किसी कारण से रावण जलने का नाम ही नहीं ले रहा था।

परेशान आयोजकों ने रावण को निहारा तो

 रावण के पुतले से आवाज आई “मैं तो जलने को तैयार हूँ, हर साल जला तो लेते ही हो मुझे, पर इस बार मेरी एक छोटी सी शर्त है।

वह क्या? आयोजक पूछ बैठा।

रावण ने कहा मुझे तो स्वयं श्रीराम विद्वान मान चुके हैं, पता है न।

हां तो, आयोजक बोले।

मेरी शर्त यह है कि मुझमें आग वही लगाए जिसमें राम की सी मर्यादा का अंश तो हो!”

मेघनाथ का पुतला झनझनाया “हाँ, हमें जलाना है तो लक्ष्मण-सा कोई लक्षण तो दिखे जलाने वाले में!”

यह सुनकर मैदान में हलचल मच गई। एक नेता जी आगे बढ़े, जो हमेशा धर्म की बात करते थे। उन्होंने माचिस उठाई, रावण हँसा “अरे नेता जी, आपके भाषणों भर में राम हैं पर स्वयं तय कर लें यदि आपके काम में भी राम हो तो ही तीली जलाना।

वरना आग लगते ही मैं तुम पर गिर पड़ूंगा और मेरे पुतले की सारी आतिश बाजी तुम्हें समेट लेगी, नेताजी बगलें झांकते खिसक लिए। एक बड़ा कारोबारी सामने आया, उसने पुतले पर नोट उड़ाते हुए, आग लगाने की कोशिश की तो भी पुतला नहीं जला, नोटो के बंडल जरूर जल गए। रावण बोला अपने हर काम रुपए की ताकत से करवाने वाले अभिमानी सेठ, मैं तो कुबेर से उसका पुष्पक विमान छीन चुका हूं, तुम क्या मुझे काले रुपयों से आग लगाने की कोशिश कर रहे हो।

 सारा दिन सोशल मीडिया पर धार्मिक पोस्ट करने वाला एक जेन जी पीढ़ी का नौजवान आगे बढ़कर रावण दहन को उद्यत हुआ पर उसकी माचिस भी काम नहीं आई, कुंभकरण उबासी लेते हुए बोला “तुम तो मुझसे भी बडे सोने वाले निकले, नौजवान तुम सोशल मीडिया के सपनों की गहरी नींद सो रहे हो।

तुम कुंभकरण सरकारों को आग लगाकर जगाना चाहते हो, असंभव है।

आयोजक गिड़गिड़ाए हे रावण आप तो असाधारण विद्वान हैं, स्वयं भगवान राम आपकी विद्वता का लोहा मानते हैं, हम निरीह आयोजक हैं जो साल दर साल राम लीला दोहराते हैं, हमारी लाज अब आपके हाथ है, आप साल दर साल जलते आए हैं, आप ही बताइए आप कैसे जलेंगे ?

 रावण की आवाज गूँजी “आह, दिन पर दिन बुराइयों के लंबे, रंगीन रावण के पुतले तो बना लेते ही, पर अपने अंदर के अहंकार के रावण को पनपने देते हो। बिजली की चकाचौंध और आतिशबाजी में तो लाखों रुपए उड़ा देते हैं, पर पड़ोसी की मदद के लिए समय नहीं निकाल पाते। विजयादशमी का असली अर्थ है बुराइयों पर विजय! अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को नहीं जलाओ, पुतले वाले बाहरी रावण का दहन तो सहज रस्म मात्र है। वास्तविक विजय तो तब होगी जब राम हमारे व्यवहार में दिखेंगे, सिर्फ मुखौटों में नहीं। नीलकंठ के दर्शन की दार्शनिकता समझो। जब लक्ष्मण का संयम और समर्पण हमारे व्यवहार में झलकेगा, मर्यादा हमारे चरित्र का हिस्सा बनेगी, तभी रावण दहन सार्थक होगा। विजयादशमी का पर्व ऐसा तमाशा बनकर न रह जाए जहाँ रावण जलने से पहले हमारी नैतिकता जलती नजर आती है। आखिर आयोजकों ने प्रतिकूल मौसम के बावजूद किसी तरह कपूर आदि तेज ज्वलनशील पदार्थों से किसी तरह रावण दहन कर ही डाला, एक और साल सार्वजनिक रामलीला पूरी हुई।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६६ – वीज़ा का चक्कर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना वीज़ा का चक्कर।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६६  – वीज़ा का चक्कर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

वह सुबह कुछ अलग थी। सूरज ने जैसे तय कर लिया था कि आज वह अमेरिका के कॉर्पोरेट टावरों पर नहीं, भारत के वीज़ा एप्लिकेशन फॉर्म पर चमकेगा। श्रीमान चिराग वर्मा, जो पिछले तीन साल से न्यू जर्सी की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में “टेक्निकल एसेट” की तरह काम कर रहे थे, आज अपने बॉस के केबिन में बुलाए गए थे। बॉस का नाम था मिस्टर ग्रेग थॉर्न—चेहरा ऐसा जैसे नैतिकता को पेंशन पर भेज चुका हो।

“चिराग, हमें तुमसे एक बात करनी है,” ग्रेग ने कहा, जैसे कोई डॉक्टर ऑपरेशन से पहले मरीज को बताता है कि एनेस्थीसिया महंगा है।

चिराग ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान वीज़ा की शर्तों में अटक गई।

“तुमने उस ट्वीट को देखा?” ग्रेग ने पूछा।

“जी सर, देखा,” चिराग ने कहा, जैसे कोई छात्र परीक्षा में वही सवाल देखता है जो उसने नहीं पढ़ा।

“तो तुम्हें क्या लगता है?” ग्रेग बोले।

“सर, मुझे लगता है कि पीड़िता की बात सुननी चाहिए,” चिराग ने कहा।

ग्रेग ने खिड़की की ओर देखा, जैसे नैतिकता बाहर खड़ी हो और अंदर आने की इजाज़त मांग रही हो।

“देखो चिराग, हम एक कंपनी हैं। हमें टैलेंट चाहिए, ट्रायल नहीं,” ग्रेग बोले।

“लेकिन सर, कोर्ट ने उसे दोषी माना है,” चिराग ने कहा।

“कोर्ट? कोर्ट तो कानून देखता है, हम तो प्रॉफिट,” ग्रेग ने कहा, और पानी का गिलास उठाया।

चिराग चुप रहा। उसकी चुप्पी में वीज़ा की वैधता, नैतिकता की असहमति और नौकरी की मजबूरी एक साथ बैठी थीं।

“तुम्हें समझना चाहिए, चिराग, कि हम सबको साथ लेकर चलते हैं। चाहे वह आरोपी हो या एच-1बी वीज़ा धारक,” ग्रेग ने कहा।

“सर, अगर पीड़िता मेरी बहन होती?” चिराग ने पूछा।

ग्रेग ने गिलास को होंठों से लगाया, जैसे कोई नेता सवाल सुनकर पानी पीने लगता है।

खांसी उठी। नाक से पानी निकला। मगर जवाब नहीं निकला।

“देखो चिराग, तुम इमोशनल हो रहे हो। ये कॉर्पोरेट है, यहाँ इमोशन नहीं, एक्सेल शीट चलती है,” ग्रेग बोले।

“सर, मुझे लगता है कि हम नैतिक रूप से गलत कर रहे हैं,” चिराग ने कहा।

“नैतिकता? वो तो छुट्टी पर है। और तुम भी चले जाओगे अगर ज्यादा बोले,” ग्रेग ने कहा, और मुस्कुराया।

चिराग ने सोचा, क्या यही वह देश है जहाँ सपनों को बुलाया जाता है, और फिर उन्हें कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों में बाँध दिया जाता है?

बाहर बारिश शुरू हो गई थी। जैसे नैतिकता रो रही हो।

चिराग ने अपना लैपटॉप बंद किया, जैसे कोई उम्मीद का दरवाज़ा बंद करता है।

“सर, मैं इस्तीफा देना चाहता हूँ,” चिराग ने कहा।

ग्रेग ने चौंक कर देखा, जैसे कोई बैंक मैनेजर देखे कि ग्राहक ने लोन चुकता कर दिया।

“तुम्हें पता है, तुम्हारा वीज़ा इसी कंपनी से जुड़ा है?” ग्रेग ने कहा।

“जी सर, पता है। लेकिन अब आत्मा को भी तो कहीं जुड़ना चाहिए,” चिराग ने कहा।

ग्रेग चुप रहा। पहली बार उसकी चुप्पी में हार थी।

चिराग बाहर निकला। बारिश तेज़ हो गई थी। मगर अब वह भीगने से नहीं डर रहा था।

उसने सोचा, शायद अब कोई नया सूरज उगेगा—जो वीज़ा नहीं, विवेक देगा।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २६८ ☆ त्योहार दशहरा… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २६८ ☆ 

☆ त्योहार दशहरा… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’☆

☆

राम चरित की शक्ति है

 त्योहार दशहरा

धर्म विजय की अमरबेल

 त्योहार दशहरा।।

 *

दुष्टों के संहार हेतु ही

 शस्त्र उठाने पड़ते हैं

हर युग में ही राम

 शत्रु से लड़ते हैं।।

 *

पुण्य पावनी धरती पर

 सत्य सदा ही जीतेगा

युगों-युगों से काल चक्र

 इस तरह सदा ही बीतेगा।।

 *

सन्देश सदा ये देता आया

 शत्रु स्वयं के पहचानो

अहम, क्रोध, लोभ, घृणा को

 जितना हो जल्दी जानो।।

 *

सबको ही सत प्रेम बाँटकर

 हर अच्छाई को ठानो

मन पापों से मुक्त रहेगा

 राम-कृष्ण को ही मानो।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares