श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मुश्किल है…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४१ ☆
☆ # “कविता – मुश्किल है…” # ☆
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इस रोज बदलती दुनिया में
रिश्तो को बचाना मुश्किल है
किस-किस को समझाएं हम
सबको समझाना मुश्किल है
कुछ तो जिद में अड़े हैं
जब से वह आपस में लड़े हैं
चुपचाप से दूर खड़े हैं
इनको आपस में मिलाना मुश्किल है
क्या दिखावे का यह संबंध है?
क्या दिखावे का यह प्रबंध है?
क्या दिखावे का यह प्रतिबंध है ?
यह गुत्थी सुलझाना मुश्किल है?
उनकी बातों में प्यार नहीं
उनकी आंखों में खुमार नहीं
उनकी सांसों में इसरार नहीं
उनको कुछ भी कह पाना मुश्किल है
रिश्तों पर टिका संसार है
रिश्ते जीवन का सार है
रिश्ते संबंधों का आधार है
टूटे रिश्तों को जोड़ पाना मुश्किल है
टूटे हुए रिश्ते इस युग की पहचान है
कितने कशमकश में आज इंसान है
झूठी यह आन और शान है
जीते जी भावनाओं का मर जाना कितना मुश्किल है /
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© श्याम खापर्डे
फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो 9425592588
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