(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – वह शिक्षा क्या है?” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६८ ☆
☆ आदर्श भाषण कला : वह शिक्षा क्या है?☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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वह शिक्षा क्या जो मानव को सामाजिक शुभ संस्कार न दे
जन जीवन में मिल जीने को हितकर आचार विचार न दे।।
कई नई समस्याएं हर दिन जीवन में प्रायः आती हैं
सरिता की चंचल लहरों सी उठ गिर प्रश्न उठाती है
उलझन सुलझा सकने को जो सद्बुद्धि न दे आधार न दे ।।।।।
ज्यों मृग मरीचिका आकर्षित करती है रेगिस्तानों में
जीवन में भी बिन समझ भटक जाते यात्री वीरानों में
जो सूझबूझ औ’ दूरदृष्टि का मानव को उपहार न दे ।।2।।
जग में जीवन का केन्द्र बिन्दु सुख पाने की अभिलाषा है
इससे ही जीवन में रस है इससे ही जीवित आशा है
मस्तिष्क हदय औ’ हाथों को जो सर्जन का अधिकार न दे ।।3।।
सिद्धान्त सदा आदर्शों के उज्ज्वल सम्मार्ग दिखाते हैं
पर भावुकता की भंवरों में सिद्धान्त डूब भी जाते हैं
जो चिन्तन को वैज्ञानिक मन को आध्यात्मिक आधार न दे ।।4।।
जिससे गुण गरिमा भय सुगंध सात्विक विनम्रता आती है
जो मुक्ति दायिनी सतत मित्र पथ का अंधकार मिटाती है
वह है शिक्षा सत्साधन जो अभिमान न दे कुविचार न दे ।।5।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख आइसोलेशन—प्रमुख ऊर्जा-स्त्रोत। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो हर पल तेरा नाम जपूँ / स्वर- रंजना मजूमदार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२३ ☆
☆ आइसोलेशन—प्रमुख ऊर्जा-स्त्रोत… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘ज़िंदगी कितनी ही बड़ी क्यों न हो, समय की बर्बादी से छोटी बनायी जा सकती है’ जॉनसन की यह उक्ति आलसी लोगों के लिए रामबाण है, जो अपना समय ऊल-ज़लूल बातों में नष्ट कर देते हैं; आज का काम कल पर टाल देते हैं; जबकि कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस यही एक पल है/ कर ले पूरी आरज़ू’ फिल्म वक्त की ये पंक्तियां भी आज अथवा इसी पल की सार्थकता पर प्रकाश डालते हुए अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने अथवा जीने का संदेश देती हैं। कबीरदास जी का यह दोहा ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब/ पल में प्रलय होएगी, मूरख करेगा कब ‘ आज अर्थात् वर्तमान की महिमा को दर्शाते हुए वे सचेत करते हैं कि ‘कल कभी आने वाला नहीं और कौन जानता है, कौन-सा पल आखिरी पल बन जाए और सृष्टि में प्रलय आ जाए। चारवॉक दर्शन का संदेश ‘खाओ, पीओ और मौज उड़ाओ’ आज की युवा-पीढ़ी के जीवन का लक्ष्य बन गया है। इसीलिए वे आज ही अपनी हर तमन्ना पूरी कर लेना चाहते हैं। कल अनिश्चित है और किसने देखा है? इसलिए वे भविष्य की चिंता नहीं करते; हर सुख को इसी पल भोग लेना चाहते हैं। वैसे तो कौन जानता है कि अगली सांस आए या नहीं। सो! कल के बारे में सोचना, कल की प्रतीक्षा करना और सपनों के महल बनाने का औचित्य नहीं है।
ऐसी विचारधारा के लोगों का आस्तिकता से कोसों दूर का नाता होता है। वे ईश्वर की सत्ता व अस्तित्व को नहीं स्वीकारते तथा अपनी ‘मैं’ अथवा अहं में मस्त रहते हैं। उनकी यही अहं अथवा सर्वश्रेष्ठता की भावना उन्हें सबसे दूर ले जाती है तथा आत्मकेंद्रित कर देती है। वास्तव में एकांतवास अथवा आइसोलेशन–कारण भले ही कोरोना हो, हमें आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करते हैं। कोरोना वायरस ने भले ही पूरे विश्व में तहलक़ा मचा रखा है, परंतु उसने हमें अपने घर की चारदीवारी में, अपने प्रियजनों के सानिध्य में रहने और बच्चों के साथ मान-मनुहार करने का अवसर प्रदान किया है। परंतु अक्सर लोगों को वह भी पसंद नहीं आया। मौन एकांत का जनक है; जो हमें स्वयं से रू-ब-रू करने का अवसर प्रदान करता है और सृष्टि के विभिन्न रहस्यों को उजागर करता है। सो! एकांतवास की अवधि में हम आत्मचिंतन कर ख़ुद से मुलाकात कर सकते हैं; जो जीवन में असफलता व तनाव से बचने के लिए ज़रूरी है। इतना ही नहीं, यह स्वर्णिम अवसर है; अपनों के साथ रहकर समय बिताने का; ग़िले-शिक़वे मिटाने का; ख़ुद में ख़ुद को तलाशने का; मन के भटकाव को मिटा कर अंतर्मन में प्रभु के दर्शन पाने का। सो! एकांत वह सकारात्मक भाव है, जो हमारे अवचेतन मन को जाग्रत कर, सर्वश्रेष्ठ को बाहर लाने अथवा अभिव्यक्ति प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है। आपाधापी भरे आधुनिक युग में रिश्तों में खटास व अविश्वास से उपजा अजनबीपन का एहसास मानव को अलगाव की स्थिति तक पहुंचाने का एकमात्र कारण है, कारक है और व्यक्ति उस मानसिक प्रदूषण अर्थात् चिंता, तनाव व अवसाद की ऊहापोह से बाहर आने का भरसक प्रयास करता है।
जब व्यक्ति एकांतवास में होता है, जीवन की विभिन्न घटनाएं मानस-पटल पर सिनेमा की रील की भांति आती-जाती रहती हैं और वह सुख-दु:ख की मन:स्थिति में डूबता-उतराता रहता है। इस मनोदशा से उबरने का साधन है एकांत, जिसका प्रमाण हैं– लेखक, गायक और प्रेरक वक्ता विली जोली, जो 1989 में न्यूज़ रूम कैफ़े में अपना कार्यक्रम पेश किया करते थे। उनकी लाजवाब प्रस्तुति के लिए उन्हें अनगिनत पुरस्कारों व सम्मानों से नवाज़ा गया था। परंतु मालिक के छंटनी के निर्णय ने उन्हें आकाश से धरा पर ला पटका और उन्होंने कुछ दिन तक एकांत अर्थात् आइसोलेशन में रहने का निर्णय कर लिया। एक सप्ताह तक आइसोलेशन की स्थिति में रहने के पश्चात् उनकी ऊर्जा, एकाग्रता व कार्य-क्षमता में विचित्र-सी वृद्धि हुई। सो! उन्होंने अपनी शक्तियों को संचित कर स्कूलों में प्रेरक भाषण देने प्रारंभ कर दिए और वे बहुत प्रसिद्ध हो गये। एक दिन लुइस ब्राउन ने उन्हें अपने साथ कार्यक्रम आयोजित करने को आमंत्रित किया; जिसने उनकी ज़िंदगी को ही बदल कर रख दिया। इससे उन्हें एक नई पहचान मिली, जिसका श्रेय वे क्लब-मालिक के साथ-साथ आइसोलेशन को भी देते हैं। इस स्थिति में वे गंभीरता से अपने अवगुणों व कमियों को जानने के पश्चात् तनाव से मुक्ति प्राप्त कर सके। सो! एकांतवास द्वारा हम अपने हृदय की पीड़ा व दर्द को, अपनी आत्मचेतना को जाग्रत करने के पश्चात् अदम्य साहस व शक्ति से सितारों में बदल सकते हैं अर्थात् अपने सपनों को साकार कर सकते हैं।
ब्रूसली के मतानुसार ‘ग़लतियां हमेशा क्षमा की जा सकती हैं; यदि आपके पास उन्हें स्वीकारने का साहस है।’ दूसरे शब्दों में यह ही प्रायश्चित है। परंतु अपनी भूल को स्वीकारना दुनिया में सबसे कठिन कार्य है, क्योंकि हमारा अहं इसकी अनुमति प्रदान नहीं करता; हमारी राह में पर्वत की भांति अड़कर खड़ा हो जाता है। अब्दुल कलाम जी के मतानुसार ‘इंसान को कठिनाइयों की भी आवश्यकता होती है। सफलता का आनंद उठाने के लिए यह ज़रूरी और अकाट्य सत्य भी है कि यदि जीवन में कठिनाइयां, बाधाएं व आपदाएं न आएं, तो आप अपनी क्षमता से अवगत नहीं हो सकते।’ कहां जान पाते हो आप कि ‘मैं यह कर सकता हूं?’ सो! कृष्ण की बुआ कुंती का कृष्ण से यह वरदान मांगना इस तथ्य की पुष्टि करता है कि ‘उसके जीवन में कष्ट आते रहें, ताकि प्रभु की स्मृति बनी रहे।’ मानव का स्वभाव है कि वह सुख में उसे कभी याद नहीं करता, बल्कि स्वयं को ख़ुदा अर्थात् विधाता समझ बैठता है। ‘सुख में सुमिरन सब करें, दु:ख में करे न कोई / जो सुख में सुमिरन करे, तो दु:ख काहे को होय’ अर्थात् सुख-दु:ख दोनों स्थितियों में प्रभु की सुधि बनी रहे… यही सफल जीवन का राज़ है। मुझे याद आ रहा है वह प्रसंग–जब एक राजा ने भाव-विभोर होकर संत से अनुरोध किया कि वे प्रसन्नता से उनकी मुराद पूरी करना चाहते हैं। संत ने उन्हें कृतज्ञता-पूर्वक मनचाहा देने को कहा। सो! राजा ने राज्य देने की पेशकश की, जिस पर उन्होंने कहा –राज्य तो जनता का है, तुम केवल उसके मात्र संरक्षक हो। महल व सवारी भेंट-स्वरूप देने के अनुरोध पर संत ने उन्हें भी राज-काज चलाने की सुविधाएं मात्र बताया। तीसरे विकल्प में राजा ने देह-दान की अनुमति मांगी। परंतु संत ने उसे भी पत्नी व बच्चों की अमानत कह कर ठुकरा दिया। अंत में संत ने राजा के अनुरोध पर उसे अहं त्यागने को कहा, क्योंकि वह सबसे सख्त बंधन होता है। अंततः राजा को अहं त्याग करने के पश्चात् असीम शांति व अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई।
‘कलयुग केवल नाम आधारा,’ अंतर्मन की शुद्धता के लिए कलयुग में नाम-स्मरण ही पाप-कर्मों से मुक्ति पाने का साधन है। जब अंतस शुद्ध होगा, तो केवल पुण्य कर्म होंगे और पापों से मुक्ति मिल जाएगी। विकृत मन से अधर्म व पाप होंगे। हृदय की शुद्धता, प्रेम, करुणा व ध्यान से प्राप्त होती है… उसे पूजा-पाठ, तीर्थ-यात्रा व धर्म-शास्त्र के अध्ययन से पाना संभव नहीं है। सो! जहां अहं नहीं; वहां स्नेह, प्रेम, सौहार्द, करुणा व एकाग्रता का निवास होता है। आशा, विश्वास व निष्ठा जीवन का संबल हैं। तुलसीदास जी का ‘एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास/ एक राम, घनश्याम हित चातक तुलसीदास।’ जीवन में डूबते को तिनके का सहारा अर्थात् घोर अंधकार व संकट में आशा की किरण भले ही जुगनू के रूप में हो; उसका पथ-प्रदर्शन करती है; धैर्य बंधाती है; हृदय में आस जगाती है। ‘नर हो ना निराश करो मन को/ कुछ काम करो, कुछ काम करो’ मानव को निरंतर कर्मशीलता के साथ आशा का दामन थामे रखने का संदेश देती है…यदि एक द्वार बंद हो जाता है, तो किस्मत उसके सम्मुख दस द्वार खोल देती है। सो! उम्मीद जिजीविषा की सबसे बड़ी ताकत है। राबर्ट ब्रॉउनिंग का यह कथन ‘आई ऑलवेज रिमेन ए फॉइटर/ सो वन, फॉइट नन/ बैस्ट एंड द लॉस्ट।’ सो! उम्मीद का दीपक सदैव जलाए रखें। विनाश ही सृजन का मूल है। भूख, प्यास, निद्रा –आशा व विश्वास के सम्मुख नहीं टिक सकतीं; वे मूल्यहीन हैं।
आइसोलेशन मन की वह सकारात्मक सोच है, जिसमें मानव समस्याओं को नकार कर स्वस्थ मन से चिंतन-मनन करता है। चिंता मन को आकुल-व्याकुल व हैरान-परेशान करती है और चिंतन सकारात्मकता प्रदान करता है। चिंतन से मानव सर्वश्रेष्ठ को पा लेता है। राबर्ट हिल्येर के शब्दों में ‘यदि आप अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं, तो आपके पास असफलता की चिंता करने का समय ही नहीं रहेगा।’ असफलता हमें चिंतन के अथाह सागर में अवगाहन करने को विवश कर देती है, तो सफलता चिंतन करने को, ताकि वह सफलता की अंतिम सीढ़ी पर पहुंच सके। सो! एकांतवास वरदान है, अभिशाप नहीं; इसे भरपूर जिएं, क्योंकि यह विद्वत्तजनों की बपौती है; जो केवल भाग्यशाली लोगों के हिस्से में ही आती है। इसलिए आइसोलेशन के अनमोल समय को अपना भाग्य कोसने व दूसरों की निंदा करने में नष्ट मत करें। जीवन में जब जो, जैसा मिले, उसमें संतोष पाना सीख लें; आप दुनिया के सबसे महान् सम्राट् बन जाएंगे। जीवन में चिंता नहीं, चिंतन करें…यही सर्वोत्तम मार्ग है; उस सृष्टि-नियंता को पाने का; आत्मावलोकन कर विषम परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना कर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का। सो! हर पल का आनंद लें, क्योंकि गुज़रा समय कभी लौट कर नहीं आता तथा उसके लिए अपेक्षित है; अहम् का त्याग; अथवा अपनी ‘मैं’ को मारना। जब ‘मैं’… ‘हम’ में परिवर्तित हो जाता है, तो ‘तुम’ का भाव अदृश्य हो जाता है। यही है अलौकिक आनंद की स्थिति; राग-द्वेष व स्व-पर से ऊपर उठने की मनोदशा, जहां केवल ‘तू ही तू’ अर्थात् सृष्टि के कण-कण में प्रभु ही नज़र आता है। सो! आइसोलेशन अथवा एकांत एक बहुमूल्य तोहफ़ा है… इसे अनमोल धरोहर-सम स्वीकारिए व सहेजिए तथा जीवन को उत्सव समझ, आत्मोन्नति हेतु हर लम्हे का भरपूर सदुपयोग कर अलौकिक आनंद प्राप्त कीजिए।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – नव चिंतन है नवल चेतना…।
रचना संसार # ९५ – गीत – नव चिंतन है नवल चेतना… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रेम।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले … । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०५ ☆
☆ कविता – सर चढ़कर अब गर्मी बोले … ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है ‘मंजिरी की कुण्डलियाँ ‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # ११ ☆
कविता – मंजिरी की कुण्डलियाँ – सन्देश ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘एक सफर बीज का…‘।)
☆ शशि साहित्य # २४ ☆
कविता – एक सफर बीज का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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हर बीज का नसीब नहीं होता वृक्ष हो जाना,
जाने कितनी अग्नि परीक्षा से गुजर कर अंकुरित हो पाना…
कहीं नर्म मुलायम मिट्टी की गोद नहीं मिलती,
कहीं जल भरे मेघों की बूंदे नहीं गिरती…
कभी जलाती तपन, बन जाती है कफन,
कभी बाढ़ में ठहरने को जमीं नहीं मिलती…
जीवन शुरू होने से पहले, सपने हो जाते हैं दफन,
बड़े वृक्षों से पनपने की इज़ाजत नहीं मिलती,
पैरों तले कुचल जाते हैं, कुछ नन्हे अंकुरण,
बेपरवाह परिस्थिति से, चंद सांसे नहीं मिलती…
फिर भी !!!! जो दम रखते हैं, हर मुश्किल का करने सामना…
वो खिल उठते हैं चीरकर, पत्थरों का भी सीना…
अथाह समर्पण और शक्ति का है यह मामला,
आसान नहीं है विपरीत परिस्थितियों को सहयोगी बना लेना…
ईश्वर की कृपा से ही पर्वत पर हरियाने की किस्मत है मिलती,
ना हो यह तो हरियाली में भी एक पत्ती नहीं खिलती…
तय करना पड़ती है तमाम मुश्किलें राहों की,
वरना हर बीज को, पुनः बीज बनाने की क्षमता नहीं मिलती…
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कितना शेष है चलना” ।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते …“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५२ ☆
सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆