ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (4 मई से 10 मई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (4 मई से 10 मई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। श्री हनुमान चालीसा की चौपाइयों के लाभ से आप सभी पूर्णतया अवगत हो गए होंगे। आज की चौपाई है:-

दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से श्री हनुमान जी की कृपा से बड़े से बड़े कष्ट और संकट से मुक्ति मिलती है। हर प्रकार की समस्याओं का अंत होता है।

आईये अब इस सप्ताह ग्रहों के विचरण के संबंध में बात करते हैं।

इस सप्ताह सूर्य और बुध मेष राशि में, मंगल और शनि मीन राशि में, गुरु मिथुन राशि में, शुक्र वृष राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके लग्न में बुधादित्य योग बन रहा है। इस योग के कारण आपके व्यापार में उन्नति होगी। धन में वृद्धि होगी तथा कई जगहों पर सफलता प्राप्त होगी। कचहरी के कार्यों में आपको सावधानी पूर्वक कार्य कर सफलता प्राप्त करने का योग है। धन प्राप्त होने का योग है। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। भाग्य से मदद मिल सकती है। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। माता और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 9 तारीख कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए उत्तम है। 4 मई को आपको दुर्घटनाओं से सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें।

वृष राशि

कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है। इसमें धन भी व्यय होगा। इस सप्ताह धन प्राप्ति का भी योग है। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए और अच्छे प्रस्ताव प्राप्त होंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि हो सकती है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कम सहयोग प्राप्त होगा। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए सलाह है कि वे व्यर्थ का का वार्तालाप या बहस ना करें। आपको अपने पिताजी के स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहना चाहिए। भाग्य से आपको पहले जैसी मदद मिलती रहेगी। इस सप्ताह आपके लिए 10 मई सफलता दायक है। आपको चार पांच छह और सात मई को आपको सावधान रहकर कामों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह धन प्राप्ति का अच्छा योग है। आपके लाभ भाव में बुधादित्य योग बन रहा है। इसके कारण आपके पास इस सप्ताह धन लाभ में वृद्धि होगी। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। भाग्य से आपको पिछले सप्ताह की तरह से ही विशेष मदद नहीं मिलेगी। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना पड़ेगा। कचहरी के कार्यों में परिश्रम एवं सावधानी के उपरांत आप सफलता पा सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 5, 6 और 7 तारीख लाभदायक है। 4 मई को आपको अपने शत्रुओं से सावधान रहकर उनको पराजित करने का प्रयास करना चाहिए। 8 और 9 तारीख को आपको सचेत रहकर कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव की का पूजन करें। सप्ताह को शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

अधिकारियों कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अधिकारियों के तरफ से उनको काफी सपोर्ट मिलेगा। धन प्राप्ति का भी योग है। भाग्य से भी आपको मदद मिलेगी। इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं से भी सावधान रहना चाहिए। कचहरी के कार्यों में रिस्क नहीं लेना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपनी प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 9 तारीख कार्यों को पूर्ण करने के लिए उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से बहुत मदद मिलेगी। आपके जो भी काम रूके हुए हैं और भाग्य के कारण नहीं हो पा रहे हैं उनको इस सप्ताह करने का प्रयास करें। कार्यालय में आपको सफलता प्राप्त होगी। दुर्घटनाओं से आप बचेंगे। आपको अपने साथियों का अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। आपका या आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य इस सप्ताह थोड़ा खराब हो सकता है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 10 मई उत्तम है। 4, 8 और 9 तारीख को आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपको भाग्य से मदद मिल सकती है। भाग्य के कारण आपका कोई भी कार्य इस सप्ताह नहीं रुकेगा। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह अपने कार्यालय में सतर्क रहना चाहिए। शेयर आदि में धन लगाने के पहले पूरी जांच कर लेना चाहिए। आपके प्रतिष्ठा में इस सप्ताह वृद्धि हो सकती है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 5, 6 और 7 तारीख कार्यों को पूर्ण करने के लिए परिणाम दायक हैं। 10 मई को आपको सतर्कता पूर्वक कोई भी कार्य करना चाहिए। अपने भाई बहनों के प्रति आपको 4 तारीख को सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

यह सप्ताह आपके जीवन साथी के लिए उत्तम रहेगा। अगर वह किसी व्यवसाय में है तो उसमें उनको बहुत उन्नति मिलेगी। आपका भी व्यवसाय अच्छा चलेगा। व्यापार के भाव में बुधादित्य योग बन रहा है। इससे इस सप्ताह आपके व्यापार में उन्नति होगी। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। आपके संतान को कष्ट हो सकता है। भाग्य से आपको बहुत ज्यादा मदद नहीं मिलेगी। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। आपके लिए 8 और 9 तारीख कार्यों को संपन्न करने के लिए फलदायक हैं। 4 मई को आपको धन के मामले में होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। संतान की उन्नति होगी। छात्रों को परीक्षा में अच्छी सफलता प्राप्त होगी। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह बहुत अच्छा है। विवाह के अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में भी प्रगति होगी। अगर आप ढंग से प्रयास करेंगे तो आपके शत्रु पराजित होंगे। कचहरी के कार्यों में किसी भी प्रकार का रिस्क इस सप्ताह ना लें। कार्यों को सफलतापूर्वक पूर्ण करने के लिए आपको चार और 10 मई का सहारा लेना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति 4 तारीख को सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में पर्याप्त वृद्धि हो सकती है, मगर इसके लिए आपको थोड़ा बहुत प्रयास भी करना पड़ेगा। आपके संतान की उन्नति हो सकती है। संतान का आपको अच्छा समर्थन भी मिलेगा। छात्रों को परीक्षाओं में सफलताएं प्राप्त होगी। आपके शत्रु इस सप्ताह शांत रहेंगे। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 5, 6 और 7 तारीख कार्यों को पूर्ण करने के लिए उपयुक्त हैं। 4 मई को आपको कचहरी के कार्यों को सावधानी पूर्वक करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आपके थोड़े से प्रयासों से जनता के बीच में आपको सम्मान प्राप्त हो सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। इस सप्ताह अगर आप प्रयास करेंगे तो आप अपने शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं। आपके संतान को सफलताएं प्राप्त हो सकती हैं। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। गलत रास्ते से धन आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 9 तारीख कार्यों को पूर्ण करने हेतु प्रभावशाली हैं। 5, 6 और 7 तारीख को आपको सजग रह करके कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। धन की मात्रा थोड़ी कम हो सकती है। गलत रास्ते से भी धन आ सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध उत्तम रहेगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके पिताजी को थोड़ी परेशानी हो सकती है। अधिकारी और कर्मचारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। दुर्घटनाओं से बचने का आपको इस सप्ताह प्रयास करना चाहिए। भाग्य का आपको इस सप्ताह बिल्कुल भी सहारा नहीं लेना चाहिए। इसके स्थान पर आपको अपने परिश्रम पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 10 मई लाभप्रद है। 8 और 9 मई को आपको सावधान रहकर के कार्यों को निपटाना चाहिए। 4 मई को आपको कार्यालय में सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने वृद्ध पिताजी का विशेष रूप से ख्याल रखना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके क्रोध की मात्रा में वृद्धि हो सकती है। इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं के प्रति सावधान रहना चाहिए। भाग्य पर इस सप्ताह आपको भरोसा नहीं करना चाहिए। दुर्घटनाओं के प्रति आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 5, 6 और 7 तारीख कार्यों को करने के लिए अनुकूल हैं। 10 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। 4 मई को आपको भाग्य से कुछ मदद मिल सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३३ आणि ३४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३३ आणि ३४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ३३ – – – – 

वसे मेरूमांदार हे सृष्टिलीळा|

शशी सूर्य तारांगणे मेघमाला|

चिरंजीव केले जनी दास दोन्ही |

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी|३३|अर्थ : ही सृष्टी म्हणजे भगवंताची लीला आहे. त्यासृष्टीत मेरूमांदार आदी पर्वत आहेत. चंद्र, सूर्य आणि तारांगणे आहेत. मेघमाला आहेत. ही सृष्टी आहे तोपर्यंत हनुमान आणि बिभीषण दोन्ही चिरंजीव आहेत. प्रभू रामचंद्रांनी आपल्या या दोन्ही दासांना चिरंजीव केले आहे. दासाभिमानी असलेला भगवंत आपल्या भक्तांची कधीही उपेक्षा करीत नाही.

(मेरू – स्वर्ग, मत्यू, पाताळ यांना आधारभूत असलेला सोन्याचा पर्वत. मांदार – समुद्रमंथनाचे वेळी या पर्वताचा रवी म्हणून वापर केला गेला)

विवेचन : समर्थांनी आपल्याला मागील श्लोकात भगवंताच्या पराक्रमाचे आणि गुणांचे वर्णन करून सांगितले आहे या श्लोकात ते आपल्याला सांगतात की आपल्याला ही जी सृष्टी दिसते आहे ती म्हणजे केवळ भगवंताची लीला मात्र आहे. मेरू आणि मांदार हे दोन्ही पर्वत, चंद्र, सूर्य, अगणित तारे आणि तारका, असंख्य अशा आकाशमाला, बरसणारे ढग या सगळ्या गोष्टी परमेश्वराने निर्माण केल्या आहेत.

मेरू पर्वत, ज्याला सुमेरू असेही म्हटले जाते, एक पौराणिक पर्वत असून हिमालयात स्थित आहे असे मानले जाते. हा पर्वत म्हणजे हिंदू, जैन आणि बौद्ध धर्मांचे एक पवित्र स्थान समजले जाते. त्याचप्रमाणे हा पृथ्वीच्या उत्तर ध्रुवावर स्थित असून पृथ्वीची नाभी समजला जातो. हा पर्वत सुवर्णप्रमाणे चमकतो.

मांदार पर्वताचा उल्लेख देखील पौराणिक कथांमध्ये येतो. हा पर्वत बिहारच्या बांका जिल्ह्यात असून त्याची उंची सुमारे ७०० फूट आहे. पौराणिक कथेनुसार, समुद्रमंथनादरम्यान देव-दानवांनी अमृत मिळवण्यासाठी वासुकी नागासह या पर्वताला रवीसारखे वापरले होते। हे हिंदू आणि जैन धर्मातील एक महत्त्वाचे तीर्थक्षेत्र मानले जाते. या अद्भुत पर्वतांसारख्या अनेक अद्भुत आणि आश्चर्यकारक गोष्टी परमेश्वराने निर्माण केल्या आहेत.

थोडक्यात सांगायचे तर आपल्याला दिसणाऱ्या या अवघ्या विश्वाचा निर्माता भगवंत आहे. या सृष्टीमध्ये सजीवांसाठी आवश्यक असलेल्या हवा, पाणी, अन्न यासारख्या गोष्टी त्यानेच निर्माण केल्या आहेत. त्याची निर्मिती असलेले चंद्र आणि सूर्य आपल्याला प्रकाश देतात. नद्या आपली तहान भागवतात. मेघातून बरसणारा पाऊस आपल्यासाठी अन्न निर्माण करतो. या सगळ्या गोष्टी म्हणजे त्या परमेश्वराचीच निर्मिती आहेत.

जोपर्यंत ही सृष्टी अस्तित्वात आहे तोपर्यंत तारे, चंद्र, सूर्य आपल्याला प्रकाश देत राहतील. मेघ जलाचा वर्षाव करत राहतील ही भूमाता आपल्यासाठी अन्न निर्मिती करील. शतकानुशतके युगानुयुगे या गोष्टी होत आल्या आहेत आणि होत राहतील. परंतु या सृष्टीवर मानवासहित जे सर्व सजीव प्राणी, वनस्पती जन्माला आले आहेत ते सर्व मर्त्य आहेत. त्यांना मृत्यू अटळ आहे.

जिवासवें जन्मे मृत्यू, जोड जन्मजात

दिसे भासतें तें सारें विश्व नाशवंत

या गीतरामायणातील ओळी मानवी जन्म आणि मृत्यू हे कसे एकमेकांशी निगडित आहेत हे सांगतात.

या जगात जो जन्माला आला त्याला एक दिवस मृत्यू आहेच हे निश्चित पण असे असले तरी भगवंताने आपल्या दोन दासांना चिरंजीवित्व प्राप्त करून दिले. या जगामध्ये सात व्यक्ती चिरंजीव आहेत असे मानले जाते.

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमानश्च विभीषणः।

कृपाः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजिविनः॥

अश्वत्थामा, बळीराजा, वेद व्यास, हनुमान, बिभीषण, कृपाचार्य आणि परशुराम हे ते सप्त चिरंजीव. यातील हनुमान आणि बिभीषण हे दोघे निस्सीम श्रीरामांचे भक्त आहेत. हनुमंताचा जन्म वानर कुळातील तर बिभीषण राक्षस कुळात जन्मलेला. हनुमंत श्रीरामांचा निष्ठावान सेवक आहे हे आपण जाणतो. बिभीषणाची गोष्ट मात्र जरा वेगळी आहे. त्याचा जन्म राक्षस कुळात झालेला आणि महापराक्रमी रावणाचा तो सख्खा भाऊ. अन्यायी अशा रावणाची साथ सोडून श्रीरामांच्या पक्षात येणे ही गोष्ट त्याच्यासाठी एवढी सोपी नव्हती. परंतु तरी देखील त्याची रामावर असणारी श्रद्धा एवढी प्रचंड होती की तो हा सगळा विरोध सहन करून श्रीरामांना शरण आला. रामाने रावणाचा वध केल्यानंतर श्रीरामांनी लंकेचा राजा व्हावे अशीही इच्छा बिभीषणाने व्यक्त केली होती. एवढा तो रामभक्त होता.

हनुमंत आणि बिभीषण या दोघांचेही स्वभाव आणि कर्म वेगवेगळे होते. परंतु या दोघांमध्ये एक गोष्ट मात्र समान होती. ती म्हणजे ते दोघेही श्रीरामांचे परमभक्त होते. त्यांच्या अपार भक्तीमुळे श्रीरामांनी त्यांना चिरंजीव केले. जन्म मृत्यूच्या फेऱ्यातून त्यांची सुटका केली. या मृत्यू लोकात जन्म घेऊनही ते अमर झाले ही फक्त श्रीरामंचीच कृपा!

खरी निष्ठा आणि भक्ती कशी असते आणि अशा भक्तांवर प्रभू श्रीराम कशी कृपा करतात हे या उदाहरणातून समर्थांनी आपल्या निदर्शनास आणून दिली आहे. आणि म्हणून ते पुन्हा आपल्याला सांगत आहेत की श्रीराम हे दासाभिमानी आहेत. आपल्या भक्ताची ते कधीही उपेक्षा करीत नाहीत.

स्वसंवाद : 

१) हनुमान आणि बिभीषण यांच्या इतकी भगवंताची भक्ती कदाचित मला जमणार नाही. परंतु किमान त्या मार्गावर चालावे असे तरी मला वाटते का?

२) ही सृष्टी भगवंताची लीला आहे असे मी मानतो का?

३) निसर्गाच्या विशालतेकडे पाहताना माझ्या मनात परमेश्वराप्रती कृतज्ञता येते का की मी ते गृहीत धरतो?

४) चिरंजीव होणे म्हणजे जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यातून मुक्ती. माझ्या भक्तीचे ध्येय केवळ सांसारिक सुखापुरते आहे की मोक्षापर्यंत पोहोचण्याची माझी खरी इच्छा आहे?

– – – –

श्लोक क्र. ३४ – – – 

उपेक्षा कदा रामरुपी असेना|

जिवा मानवां निश्चयो तो वसेना|

शिरी भार वाहेन बोले पुराणी |

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी|३४|

अर्थ : आतापर्यंतच्या उदाहरणांवरून समर्थांनी आपल्याला हे पटवून देण्याचा प्रयत्न केला आहे की) भगवंत आपल्या भक्ताची कधीही उपेक्षा करीत नाही. परंतु (आपण असे दुर्दैवी जीव आहोत की) त्याची भक्ती करण्याचा आपला निश्चयच होत नाही. भक्तांची सारी काळजी मी वाहतो असे पुराणात त्याने वचन दिले आहे. दासाभिमानी असलेला श्रीराम आपल्या दासांची म्हणजेच भक्तांची कधीही उपेक्षा करीत नाही.

(रामरुपी – भगवंताजवळ, जिवां मानवां – जीवरूपी म्हणजेच सामान्य माणसाला)

विवेचन : आपल्या भक्ताची भगवंत कधीच उपेक्षा करीत नाही. त्याचा संपूर्ण भार तो वाहतो. हिरण्यकश्यपूचा मुलगा प्रल्हाद हा विष्णूचा भक्त होता. परंतु त्याच्या पित्याला त्याची विष्णूभक्ती मान्य नव्हती. तो देवांना आपले शत्रू मानत असे. विष्णू भक्ती करू नये म्हणून सुरुवातीला त्याने प्रल्हादाला समजावून पाहिले. परंतु तो जेव्हा ऐकत नाही असे दिसले तेव्हा त्याने विविध प्रकारे प्रल्हादाला ठार मारण्याचे प्रयत्न केले. परंतु सर्व प्रसंगांमध्ये भगवान विष्णूंनी त्याचे रक्षण केले. शेवटी नरसिंह रूपात प्रकट होऊन श्रीविष्णूंनी अत्याचारी अशा हिरण्यकश्यपूचा वध केला आणि अशा रीतीने आपल्या भक्ताचे संरक्षण केले.

आपल्या प्रजेला परमेश्वराचे नाव घेण्यास आणि ऋषीमुनींना यज्ञ करण्यास कंसाने बंदी घातली होती. त्याने ईश्वर भक्तांचा अनन्वित छळ केला. परंतु भगवंताने श्रीकृष्ण अवतारात या अन्यायी आणि दुराचारी कंसाचा वध करून प्रजेला त्याच्या छळातून मुक्त केले.

अशा विविध प्रकारे भगवंत आपल्या भक्तांचे रक्षण करण्यासाठी तत्पर असतो. त्यांचा भार किंवा काळजी तो आपल्या शिरावर घेतो अशी अनेक उदाहरणे पुराणांमध्ये आहेत.

परित्राणाय साधूनां विनाशायच दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥

असे वचन त्याने गीतेत आपल्याला दिले आहेच. असे असले तरी आपल्यासारख्या सामान्य माणसाला भगवंत आपल्याला सहाय्य करीलच याची खात्री वाटत नाही. याची दोन कारणे असू शकतात. पहिले म्हणजे परमेश्वर अस्तित्वात आहे आणि तो सदैव आपल्याजवळ आहे याची खात्री आपल्याला असत नाही. आपल्या हाकेला तो धावून येईलच याबद्दलही आपण साशंक असतो. त्याच्यावर भार टाकून निर्धास्त राहण्याइतकी निष्ठा किंवा समर्पण आपले नसते.

आपली अशी अपेक्षा असते की भगवंताने आपल्याला प्रपंचात येणाऱ्या अडचणींमध्ये आणि दुःखामध्ये मदत करावी. अशा गोष्टींसाठी आपण भगवंताला गृहीत धरतो. तो प्रसन्न व्हावा म्हणून निरनिराळ्या प्रकारचे नवस करतो, प्रार्थना करतो. भगवंताला निरनिराळ्या प्रकारे लाच देण्याचा प्रयत्न करतो. कधी त्याला कोणी भक्त मोठी देणगी देतो तर कधी कोणी सोन्याचा मुकुट अर्पण करतो. परंतु या गोष्टींची भगवंताला अपेक्षा नसते. त्याला अपेक्षा असते ती शुद्ध आणि निरपेक्ष भक्तीची!

आपण परमेश्वराची भक्ती करायला सुरुवात केली की आपली अशी अपेक्षा असते की त्याने आपल्यावर कृपा करावी. आपल्या संकटात धावून यावे. परंतु जेव्हा आपल्याला तसे होताना दिसत नाही तेव्हा आपला त्याच्यावरील विश्वास डळमळीत होताना दिसू लागतो. परंतु ही परमेश्वराने पाहिलेली आपली परीक्षा असते असे म्हणावे लागेल.

जो भगवंत आनंदनिधान आहे, कल्पतरू आहे अशा भगवंताकडे भक्ती, मुक्ती आणि मोक्ष मागण्या ऐवजी त्याच्याकडून आपण पैसा, व्यवहारातील यश, सुखाचा प्रपंच यासारख्या क्षुल्लक गोष्टींची अपेक्षा करत असतो. व्यवहारातील यश, पैसा, सुखसमृद्धी या गोष्टींनाच सामान्य माणसे परमेश्वराची आपल्यावर कृपा आहे असे समजतात. परंतु सदाचार आणि सद्बुद्धी ज्याच्याकडे आहे त्याच्यावर परमेश्वराची कृपा आहे असे समजावे.

भगवंताने गीतेमध्ये म्हटले आहे की “योगक्षेमं वहम्याहं. ” भगवंत आपला भार घेतो. त्याला आपली काळजी आहे. या त्याच्या वचनाचा अर्थ आपण असा घेता कामा नये की आपण आपले जे कर्तव्य आहे ते सोडून केवळ त्याच्यावर भार टाकून निवांत बसावे. अर्जुनाला आपल्या कर्तव्याची जाणीव करून देण्यासाठीच तर त्याने गीता सांगितली. आपल्या पूर्ण क्षमतेने आपले कर्तव्य करावे, स्वधर्म पार पाडावा. परंतु असे करताना त्याचे विस्मरण होऊ देऊ नये. संत जनाबाई म्हणतात 

दळीता कांडीता तुज गाईन अनंता |

न विसंबे क्षणभरी | तुझे नाम गा मुरारी

– असेच आपणही आपले कर्तव्य करत असताना त्याच्या नामात मग्न राहावे.

स्वसंवाद : 

१) मी भगवंताची भक्ती करतो तेव्हा माझ्या मनात काय असते – निरपेक्ष प्रेम की एखादी अपेक्षा?

२) परमेश्वराप्रती असलेली माझी भक्ती खरोखर निरपेक्ष असून ती “लाच” तर नाही ना?

३) संकटात भगवंताची कृपा दिसली नाही तेव्हा माझी श्रद्धा डळमळीत होते का?

४) “योगक्षेमं वहाम्यहं” हे वचन मला माहीत आहे – परंतु माझे कर्तव्य करताना मी खरोखर त्याच्यावर भार सोपवतो का की प्रपंचाची काळजी मीच वाहत राहतो?

– क्रमशः श्लोक ३३ आणि ३४.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५० – कविता – हे राजाराम मै ओरछा में आ गया ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५० ☆

☆ कविता ☆ ~ हे राजाराम मै ओरछा में आ गया ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

हे राजाराम मै ओरछा मै आ गया ।

तेरे रंग में रंगा, और तुझमे समा गया ।।

अवध  जन्मभूमि , छवि  ओरछा में।

दुःख वन में सहे, सुख मिला ओरछा में।।

रानी कुंवरी की भक्ति पर लुभा गया।

हे राजाराम  मै ओरछा में आ गया।।

*

तुम सरकार सबके, यहां सरकार तेरी।

बुंदेलो की धरती पर   जयकार तेरी।।

राजा बुन्देला बुलाये और मै आ गया।

हे राजाराम  मै ओरछा में आ गया।।

*

राजेश राम रसिया – मिलेंगे, यहां पर।

महेंद्र भीष्म जी हैं पहुंचे  है जहाँ पर।।

सभी से मिलने मै ओरछा आ गया।

हे राजाराम  मै ओरछा में आ गया।।

*

रामरस वाला अमृत यहाँ पर ।

भक्तों का रेला जुटा है यहाँ पर।।

चाहा था वह सब कुछ पा गया।

हे राजाराम  मै ओरछा में आ गया।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग – ३१ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग- ३१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

6.सतपुड़ा वन भ्रमण

पाँच जनवरी को सुबह उठे तो मादीखो गेस्ट हाउस से ही तवा मालिनी केसला संगम एक बड़े तालाब सा दिख रहा था। उसका आनंद ले रहे थे तभी चौकीदार ने बताया कि एक आदमी इसी जगह रहेगा और दो आदमी नाव से उस तरफ़ जाकर वहाँ की गणना में शामिल होंगे। एक साथी श्रीकृष्ण मादीखो ट्रेल पर सुबह छः बजे निकल गए। बाक़ी दो लोगों को एक नाव में बैठकर संगम पार जाना पड़ा। वे जब तक मोटर बोट से दूसरी तरफ़ पहुँचते तब तक वहाँ के चौकीदार और वन सेवक गणना पर निकल चुके थे। जंगल में अकेले जाने की मनाही है। वहाँ एक बहुत अच्छा साकोट रेस्ट हाउस है। साकोट नामक गाँव विस्थापित होकर पहचान खो चुका है। उसके कोई भी चिन्ह नहीं दिखते। विद्वान कहते हैं नाम में क्या रखा है, यहाँ तो सिर्फ़ नाम ही बचा है, अस्तित्व लोप हो गया। जो भी कुछ है नाम में ही बचा है। इसलिए अच्छे कर्म करो, हो सकता है तुम्हारे लोप होने के बाद कुछ दिन नाम रह जाये। हमने उसी साकोट रेस्ट हाउस में डेरा जमाया। संगम आर-पार जाने हेतु एक मोटर बोट उपलब्ध है। मदन यादव उसके परिचालक हैं। उन्होंने बिना दूध की लेमन चाय पिलाई। उनसे आज का भोजन बनाने की बात करके साथ लाया सामान की एक बोरी उनके सुपुर्द कर दी।

गेस्ट हाउस बहुत ही मनमोहक लुभावनी पहाड़ी पर बना है। सामने खुला मैदान है। मैदान समाप्त होते ही तवा नदी का भराव लहरें मार कर तटों को छेड़ता रहता है। चारों तरफ़ से खुला है। सामने की तरफ़ ऊँची बालकनी जैसी जगह है जहाँ से एक सौ अस्सी डिग्री गर्दन घुमाकर नज़रों से झिलमिल जलराशि पर खेलती सूर्य किरणों को देख कर मन प्रसन्न हो जाता है।  

पहाड़ अभी कुछ-कुछ उदास से दिख रहे हैं। जीव जंतुओं की स्थिति भी उनके जैसी ही लग रही है। रात भर ठंड में ठिठुरे जीव-जंतु सूरज निकलने का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि धूप में तपकर बदन में रात की ठंड से निपटने के लिए गर्मी संजो कर रख सकें। पहाड़, पेड़-पौधे, जीव-जंतु और पक्षी-पखेरू बारिश के मौसम में खिले रहते हैं। उनका उत्साह वसंत से आरम्भ होता है जो कि शरद ऋतु तक शबाब पर रहता है। सूर्य की किरणें अब समुंदर से भरे तवा जलभराव पर पसरने लगी हैं। हिंसक पशु भी रात के शिकार के बाद गहराइयाँ तलाश रहे हैं। तभी शाकाहारी जीव-जंतु खुली हवा और धूप का आनंद उठाने निकल आए हैं। लंगूरों का एक दल बेचैनी से उछलकूद कर रहा है। उसे कुछ अजीब सी गंध या चीज़ नज़र आ रही है। उनकी हरकत पर पक्षी भी सचेत होकर आवाज़ें निकाल रहे हैं।

वन सेवक ने एक शेर के पैरों के निशान देखे हैं जो अभी-अभी वहाँ से गुजरा है। एप खोलकर उनके फ़ोटो लिए और दर्ज कर लिए। सभी जानकारियों को एप में दर्ज करना है। गणना ऑनलाइन हो रही है। पहले एप में राज्य चुने, फिर अभयारण्य, फिर क्षेत्र के साथ बीट का चयन करें। उसके बाद वन सेवक और वालेंटियर्स के फ़ोटो उतार कर दर्ज करें। उसके बाद गणना के सबूत दर्ज करते जाएँ। 

जीव पैदाइशी रूप से मांसाहारी या शाकाहारी हैं। हाँ कुछ आदमियों की तरह दोनों तरह के होते हैं। जंगल में सबके लिए सब कुछ है। भूख के अलावा किसी अन्य चीज़ के लिए लड़ाई नहीं होती। इसलिए थाने-पुलिस, अदालत-वकालत, जिरह-निर्णय वग़ैरह कुछ नहीं होता। जब भूख लगी तब जंगल से निकाल कर खा लिया। समेटने या सहेजने की ज़रूरत नहीं होती है। सब कुछ साझा है। स्वामित्व का बोध ही नहीं है। इसलिए संग्रह नहीं तो बैंक नहीं, विनियोग नहीं, प्रॉपर्टी नहीं और उनके लिए गुणा-भाग नहीं। जंगली जीवों का दिमाग़ भूख, सृजन और सुरक्षा तक ही चलता है इसलिए अध्यात्म और ईश्वर भी उनके लिए उपयोगी विचार नहीं होता। वे साथियों को मरते देख कर अन्दाज़ लगाते हैं कि उन्हें भी मरना होगा। वे मोक्ष के बारे में भी नहीं सोचते। पाप-पुण्य निर्वाण-मोक्ष उनके दिमाग़ में ही नहीं आते। उनमें धर्म नहीं है तो धार्मिक भेद भी नहीं है, इसलिए जानवरों के सोचने में नहीं आता कि किसकी कितनी जनसंख्या बढ़ या घट रही है। वे एक दूसरे को धर्म  बदलने को मजबूर भी नहीं करते। शेर कभी हिरण से नहीं कहता कि वह शेर बन जाये। सब अपने चोले में मस्त रहते हैं। शेर कभी नहीं कहता कि बंदर उसे आरक्षण की दारू के बदले वोट दे। हिरणों के लिए चारा भी राशन से नहीं मिलता। जंगल धूप छाँव पानी सभी पर साम्यवादी साझा हक़ है। कहते हैं आदमी भी पहले ऐसे ही पशु थे। उन्होंने सामाजिक पशु के रूप में विकास करके बहुत सी झंझटें मोल ले लीं हैं।

साकोट रेस्ट हाउस तीन तरफ़ तवा बाँध से थमे डूब क्षेत्र से घिरा है। नहा धो कर ध्यान में बैठे तो ऊँचाई पर निर्मित रेस्ट हाउस से ऐसा लगा जैसे बीच समुद्र में धुनी रमाए बैठे हैं। ग्यारह बजे के क़रीब दो टिक्क याने मोटी रोटी, कनकी और तुअर दाल का भोजन करके आराम किया। पता चला कि साकोट से चूरना गेस्ट हाउस की दूरी मात्र 14 किलोमीटर है जबकि भौंरा से अस्सी किलोमीटर दूरी पर चूरना स्थित है। लेकिन वन विभाग की अनुमति के बग़ैर कोई भी इस रास्ते से तवा डूब क्षेत्र को पार करके चूरना नहीं जा सकता। उस हिसाब से यदि बाघ गणना प्रोजेक्ट में शामिल न होते तो कभी भी इस अविस्मरणीय  अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के दर्शन नहीं कर सकते थे। शाम को रेस्ट हाउस की छत पर सुहावने मौसम का मज़ा लेने गए तो लहरों से पता चला कि हवा का रुख़ उत्तर से दक्षिण की तरफ़ है। जबकि गर्मियों और बारिश में हवा दक्षिण से बादलों को लेकर उत्तर की तरफ़ चलती है।

छः जनवरी सुबह पाँच बजे नियमत: जाग गये। आज जंगल के उस इलाक़े में जाना था जहाँ शेरों की सर्वाधिक आबादी है। एक अनुमान के अनुसार चालीस शेर इस जंगल में होंगे। सेवक चौकीदार मदन यादव ने बताया कि एक महीना पहले एक शेर रेंजर साहिब की जिप्सी पर लपका और उनका पीछा किया था। सब घबरा गए थे। हमको थोड़ी घबराहट हुई और जिम कार्बेट की “जंगल की कहानी” (Jungle Lore) पुस्तक की सावधानियाँ याद आने लगीं।

  • पहली-बात तो घबराना नहीं है। उसके लिए साँस पर ध्यान केंद्रित करके गिनती गिनना शुरू कर दो।
  • दूसरा- एक तो शेर आपके सामने नहीं आता। उसकी स्मृति में भी शिकारी नुमा आदमियों का डर रहता है।
  • तीसरा-यदि शेर दिख जाए तो आप पेड़ की आड़ में हो जायें। उसे निकल जाने दें।
  • चौथा-यदि शेर से अचानक सामना हो जाए तो एक बाजु हटकर उसे निकल जाने दें।
  • पाँचवाँ- भागें नहीं, हल्ला न मचाएँ, लेट जायें।

आज सबसे ख़तरनाक इलाक़े में शेरों की गिनती का कार्यक्रम था। इसलिए तीन वन कर्मी ईश्वर दास यादव वल्द रामनाथ यादव, साकिन नया खखरापुरा इटारसी स्थायी कर्मी (9399004517), संग्राम सिंह ठाकुर (कोरकु) वल्द मुंशी लाल साकिन टेकापार मढ़ई, सुरक्षा श्रमिक (6265940126) और कमल सिंह ककोड़िया (गोंड) वल्द बालचंद साकिन नया साकोट सेमरी हरचंद, मोटरबोट चालक (9165085944) सुबह छः बजे मुस्तैद मिले। हम भी बख्तर बंद होकर मुहिम पर उनके साथ निकल पड़े।

कमल सिंह ने हमें एक अपने क़द से ऊँची लाठी पकड़ा दी। उन्होंने बताया कि कोई भी जंगली जानवर अपनी ऊँचाई से ऊँची चीज़ से डरता है। इसीलिए लाठी ऊँची हो तो वह पास नहीं आता। दूसरा लाठी थोड़ी बन्दूक़ सी दिखती है। जानवर बन्दूक़ से डरता है। उसके दिमाग़ में पीढ़ी दर पीढ़ी बन्दूक़ की छवि है। जानवरों में भी सुरक्षात्मक श्रुति-स्मृति शास्त्र संग्रहित हैं।

ईश्वर यादव हमारे साथ चल रहे थे। अचानक एक शेर के पंजे का निशान मिला। उन्होंने बारिकियाँ बताईं कि यह बूढ़े शेर के पंजे का निशान है। इसे कैमरे में क़ैद कर लो। संग्राम सिंह के पास एप मोबाईल था। उन्होंने फ़ोटो खींच कर संरक्षित कर लिया। हमने पूछा अब अगला निशान भी उसी शेर का हो सकता है। आप कैसे पहचानोगे कि वह अलग शेर है। उन्होंने पहले नर और मादा के पंजों के निशान में भेद बताया। नर शेर के पंजे की उँगलियाँ गद्दी से जुड़ी रहती हैं जबकि मादा शेरनी की उँगलियाँ औरतों की लम्बी बातों की तरह लम्बी होती हैं। उम्र के अनुसार जानवर का पंजा छोटा-बड़ा या पसरता जाता है। बूढ़े शेर का पंजा फैल जाता है। बच्चे का पंजा छोटा और उँगलियाँ सटी होती हैं। आगे चीता और भालू के पंजों के निशान मिले। तीन किलोमीटर चलने के बाद दाहिनी तरफ़ मुड़े तो सामने तवा नदी दिखी। अब उसी के किनारे-किनारे वापस गेस्ट हाउस पहुँचना था। बहुत ही ऊबड़-खाबड़ पथरीली ज़मीन पर ट्रैकिंग करना पड़ा।

हमारे साथ जो तीन लोग चल रहे थे। वे सभी सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व को स्थापित करने में विस्थापित परिवारों से हैं।  विस्थापन दो तरह का वरदान लेकर आया है। एक तो कोर क्षेत्र से गाँवों का विस्थापन इटारसी और होशंगाबाद शहरों के आसपास हुआ है इसलिए उनके बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य की उत्तम सुविधाएँ मिली हैं। उनको टाइगर रिज़र्व में रोज़गार मिले हैं। दूसरी ओर सतपुड़ा में जंगली जानवरों की संख्याओं में बढ़ोतरी होने से वन स्वयं शासित हुए। अब वहाँ शिकार और लकड़ी चोरी की वारदातें नहीं के बराबर होती हैं। लेकिन रेत और मत्स्य आखेट की मिलीभगत या अन्यथा चोरी में कोई कमी न होकर बढ़ोतरी ही हुई है।

जंगल में प्रत्येक जीव-जंतु आपको आदिम जीवन के मूलभूत सिद्धांत “भूख-भोजन, थकान-आराम, निद्रा और सृजन धर्म” का पालन करते दिखेगा। जंगल के वातावरण को भूख नियोजित करती है। एक ही नियम दृष्टिगोचर होता है कि ताकतवर कमजोर को खा जाता है। वहाँ इस सिद्धांत के अलावा न कोई नियम है, न विधान,  न साहित्य, न संस्कृति, न रसिक के मन को मथते रस-छंद-अलंकार, न मिलते पुरस्कार और न अन्य किसी प्रकार की चिंता, न कोई तनाव। आप सतपुड़ा के मनमोहक जंगल में एक खूबसूरत सफारी शुरू कर रहे हैं। वन्यजीव उत्साही लोगों के साथ एक दुर्लभ यात्रा आपके पास रहस्यों से भरे एक सम्पूर्ण वन्य जीव पार्क में दिन बिताने का शानदार अवसर है।

यह इलाक़ा पहले बाघों के लिए नहीं जाना जाता था, हालांकि अब जंगल के इस विस्तृत विस्तार में एक पूरा बाघ निवास है। टाईगर रिजर्व के अन्य हिस्सों में आप सामान्य रूप से जो देखते हैं, यह उससे बिल्कुल अलग प्रकार का जंगल है। यहां जो कुछ भी रेंगता, उड़ता, घूमता या लुढ़कता है वह सब यहीं फलता-फूलता है और यही ख़त्म होकर भी कभी ख़त्म नहीं होता। यही प्रथम कृति याने प्रकृति है। यह स्थान जीवन से भरपूर है। पूरे जंगल में सैकड़ों जलधाराएँ बहती हैं। जो जंगल के पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों को पोषित करती हैं। यह जंगल हमेशा अलौकिक सौंदर्य का ख़ज़ाना है, वन्य पशुओं के विचरण के मनोहारी दृश्य, झरनों का कल-कल निनाद, पक्षियों का कलरव और बहुत सारी कभी न भूलने वाली स्मृतियों के अलावा यहाँ से आप कुछ निकाल कर ले जा नहीं सकते। ये संरक्षित जंगल हैं। शेर से लेकर ख़रगोश तक सब सुरक्षित हैं, बस भूख भर न लगी हो या उनके जीवन पर संकट न हो, नहीं तो आप सुरक्षित नहीं हैं। जंगली कुत्ते बहुत ख़तरनाक हैं, वे झुंड में रहते हैं और जंगल का राजा शेर भी उनकी एकता से ख़ौफ़ खाता है। इनकी नज़रों का बहाशियाना अन्दाज़ आपकी रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी पैदा कर सकता है। फन फैलाए कोबरा और डंक पर डेरा उठाए बिच्छू कभी भी कहीं से रेंगते दिख सकते हैं।

यह अनुभव अपने आप में विस्मयकारी है। हरे-भरे जंगल में घास के मैदानों का विशाल विस्तार बाघों के देश में इस यात्रा को एक रोमांचक अनुभव बनाता है। सतपुड़ा के घने जंगल में शानदार बाघ, चालाक तेंदुआ, सुस्त भालू, भारी भरकम गौर और विशालकाय गिलहरी इस रमणीय दुनिया में सभी खुलेआम घूमते हैं। यह जंगल हमेशा शानदार जीवों की बपौती नहीं है। सतपुड़ा सैकड़ों तितलियों का भी घर है और एक सुंदर रेतीले पानी की धारा पर तितली को देखा जा सकता है। वही जल धारा पक्षियों और विशाल गिलहरियों की एक अद्भुत आबादी को जीवन देती है, इसलिए पेड़ की छतरियों को भी देखते चलें। लंगूर आपको कौतूहल से निहार रहे हैं कि ये हमारे बिगड़े स्वरुप कहाँ से आ गये। 

जंगल का आनंद लेने के लिए आपको जंगली होने की कोई ज़रूरत नहीं है, उल्टा आपको रहमदिल होना चाहिए। घने जंगल में वन विभाग के स्थायी और अस्थायी कर्मचारी बिना परिवार के मोटी टिक्क रोटियों और पतली दाल के साथ एक उदास ज़िंदगी बिताते हैं। स्थायी वन पाल कर्मचारियों की तनख़्वाह तो फिर भी 25,000-30,000 रुपयों के बीच होती है परंतु कच्चे कर्मचारियों को कमीशन कटपिटकर महीने के 8,000 के आसपास मिलते हैं। हाँ पक्के होने के इंतज़ार में बेगारी और बेचारी उनके जीवन से जुड़ी नज़र आती हैं।

पहले तो वे बिचारे कुछ और भी कामधाम करके अलग से कमाई का जुगाड़ कर लेते थे परंतु आजकल जीपीएस से ट्रैकिंग के कारण उन्हें तैनाती स्थल पर ही रहना होता है। आज से 160 साल पहले इन जंगलों पर देवगढ़ (छिन्दवाड़ा) गोंड रियासत में एक कोरकु मालगुज़ार भभूत सिंह का एकक्षत्र राज्य था। वह राजा नहीं था परंतु किवदंतियाँ में वह आज भी राजा माना जाता है। किसी की अहमियत इस बात से नहीं आंकी जाती कि वह किस पद पर है। बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि लोगों के दिल में उसका क्या जज़्बा है। जैसे अकबर इतिहास का महान बादशाह माना जाता है जबकि भारतियों के दिलों में जो सम्मान राणा प्रताप को प्राप्त  है, आज अकबर उसका पासंग भी नहीं ठहरता। जन भावना पद को नहीं सिरजती, स्वाभिमानी को दिल में सजाती-बसाती है। हम तीन दिवसीय वन भ्रमण उपरांत थके शरीर परंतु प्रफुल्लित मन से भोपाल लौट आए।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २९ – शेखी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “शेखी“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २९ ?

? कविता – शेखी☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

ना जान-बूझकर ज़ुबान हारिये हुज़ूर

शेखी न शेखचिल्ली सी बघारिये हुजूर

=2=

वादाखिलाफी शौक़ पसंदीदा आपका

मुद्दे जन-हितों के न नकारिये हुज़ूर

=3=

मुकरना बदल जाना फ़ितरत है आपकी

अब मुखौटा नकली ये उतारिये हुज़ूर

=4=

जितनी बड़ी हो आपकी औकात की चादर

पाँव अपने उतने ही पसारिये हुजूर

=5=

ग़र देखना है आँगन अमराई सुहानी

सुदूर किसी गाँव में पधारिये हुजूर

=6=

गंगा में डुबकियों से,यूँ न पाप धुलेंगे

मन को भी संस्कार में पखारिये हुजूर

=7=

मानकर रहनुमा चुना हमने आपको

उम्मीदें आम जन की न डकारिये हुज़ूर

=8=

तुनक़मिज़ाज़ होना बात-बात पे गुस्सा

वक़्त रहते आदतें सुधारिये हुजूर

=9=

लहज़ा नरममिज़ाज़ हो दरियादिली दिखे

शख़्सियत को अपनी यूँ निखारिये हुजूर

=10=

कुछ तो काम कीजिये आवाम के लिए

मुसीबतों से देश को उबारिये हुज़ूर

=11=

जीने न देगी आपको ख़ामोशमिज़ाज़ी

नये दौर में ‘राजेश’ सच उघारिये हुजूर

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०२ ☆ मुक्तक – ।। शत शत नमन हर श्रमिक कामगार को ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०२ ☆

☆ मुक्तक ।। शत शत नमन हर श्रमिक कामगार को ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

//1//

मेहनत से ही तो आज खड़े ये

सब बंगलें कोठी मकान हैं।

किसान ही तो उपजाते ये सब

खेत और खलिहान हैं।।

कठोर परिश्रम से ही उत्पत्ति

होती प्रगति और विकास की।

लाखों प्रणाम उन श्रमिकों को

जो बना रहे नया हिंदुस्तान हैं।।

//2//

जैसे भवन की नींव वैसे ही तो

श्रम विकास का नींव होता है।

श्रमिक ही अपने खून पसीने

से प्रगति का बीज बोता है।।

उद्योग व्यापार कार्यालय जहाँ

देखें श्रमिक को हम पाएंगे।

यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी

कि मजदूर भूखा नहीं सोता है।।

//3//

शत शत नमन राष्ट्र निर्माण के

इन परिश्रमी कर्णधारों को।

थल जल नभ मे रत इन सभी

पुरुषार्थ के आधारों को।।

पसीना सूखने से पहले ही मिले

उचित पारिश्रमिक इन सब को।

बनाया जिसने है इन सड़क

बाँध और हमारे घर दीवारों को।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६५ ☆ कविता – आजाद देश की पहचान… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – आजाद देश की पहचान। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६५ 

☆ आजाद देश की पहचान…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

आजाद देश की कई होती अलग पहचान

जैसे कि राष्ट्र चिह्न राष्ट्र ध्वज व राष्ट्रगान ॥

*

हर एक को हो इनका ज्ञान और सदा ध्यान

हर नागरिक को चाहिये दे इनको वे सन्मान ॥

*

इनका स्वरूप कैसे बना, क्या है इनका अर्थ

यह समझना जरूरी है जिससे न हो अनर्थ ॥

*

भारत के ये प्रतीक क्या हैं इनको जानिये

तीनों का अर्थ समझिये मन से ये मानिये ॥

*

सम्पन्नता, बलिदान, त्याग, गति, विकास की ।

देती है इनसे निकलती किरणें प्रकाश की ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३१ आणि ३२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३१ आणि ३२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ३१ – – – 

महा संकटी सोडिले देव जेणे|

प्रतापे बळें आगळा सर्वगूणें|

जयाते स्मरे शैलजा शूलपाणी|

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी|३१|

अर्थ : सर्व देवांवर जेव्हा अत्यंत कठीण संकट आले तेव्हा प्रभू रामचंद्राने त्यांना त्यातून सोडवले. असा तो श्रीराम पराक्रमाने, बळाने आणि सर्व गुणांनी संपन्न आहे. प्रत्यक्ष भगवान शंकर आणि पार्वती त्याचे स्मरण करतात. असा हा दासाभिमानी असलेला भगवंत आपल्या दासाची म्हणजेच भक्ताची कधीही उपेक्षा करीत नाही.

विवेचन मागील श्लोकात भगवंताचे सेवक असलेल्या व्यक्तीकडे वक्रदृष्टीने पाहण्याची कोणाची हिंमत नाही असे समर्थांनी सांगितले आहे. या श्लोकात तो भगवंत कसा श्रेष्ठ आहे ते सांगताना त्याच्या गुणांचे किंवा चरित्राचे गुणवर्णन समर्थ करतात.

रावण हा महापराक्रमी होता परंतु आपल्या सामर्थ्याचा त्याने दुरुपयोग केला आपल्या सामर्थ्याच्या बळावर त्याने देवांनाही बंदिवान केले. हे म्हणजे देवांवर आलेले मोठे संकट होते. श्रीरामांनी रावणाशी युद्ध करून सीतेची सुटका केली, अनितीने वागणाऱ्या रावणाचा वध केला आणि त्याच्या बंदीवासात असलेल्या देवांना मुक्त केले. असा हा राम महाप्रतापी आणि महाबलशाली आहे.

समर्थ रामाचे वर्णन करताना म्हणतात, ” आगळा सर्वगुणें… “म्हणजे भगवंत सर्व गुणसंपन्न तर आहेच परंतु अनेक परस्परविरोधी गुण त्याच्या व्यक्तिमत्वात एकवटले आहेत. तो जसा महापराक्रमी आणि शूरवीर आहे, त्याचवेळी तो भक्तवत्सल आहे. शबरीची उष्टी बोरे प्रेमाने खाणारा आहे, आपला भक्त असलेल्या पुंडलिकासाठी युगानुयुगे वीटेवर उभा राहणारा आहे, जनाबाईला दळण दळू लागणारा आहे, नाथांघरचे पाणी भरणारा आहे. अशी त्याची किती रूपे वर्णावी!

त्याचप्रमाणे देवांवर जेव्हा संकट आले त्या त्यावेळी विष्णूने अवतार धारण करून देवांचे रक्षण केले आहे. पुराणातून अशा प्रकारच्या कथा आपण नेहमीच वाचतो. जेव्हा जेव्हा देवांवर संकट येत असे तेव्हा तेव्हा सर्व देव इंद्राच्या नेतृत्वाखाली श्रीविष्णूकडे आश्रय मागण्यासाठी जात असत आणि मग तो वेगवेगळे अवतार धारण करून त्यांचे रक्षण करीत असे.

विष्णू हा जगाचा पालन कर्ता आहे. ब्रह्मदेव हा जन्म देणारा आहे आणि भगवान शिव संहार करणारा आहे. पालन करणारा हा नेहमी जन्म देणाऱ्या आणि संहार करणाऱ्या पेक्षाही श्रेष्ठ असतो. यशोदेने श्रीकृष्णाचे पालनपोषण केले, त्याच्यावर संस्कार केले म्हणून जन्म देणाऱ्या देवकीपेक्षा श्रीकृष्णाची माता म्हणून यशोदेला आधी मान मिळतो. मुलांना जन्म देणे सोपे असते परंतु पालक होणे मात्र कठीण! काही लोक मुलांना जन्म देऊन सोडून देतात परंतु जे लोक अशा अनाथ मुलांना आई-वडिलांची माया देतात, त्यांचे पालनपोषण करतात ते माता पिता श्रेष्ठ होत. कुंतीने कर्णाला जन्म देऊन सोडून दिले परंतु धृतराष्ट्राचा सारथी असलेल्या अधिरथ आणि त्याची पत्नी राधा यांनी कर्णाचा सांभाळ मोठ्या प्रेमाने केला. म्हणूनच तो राधेय म्हणून ओळखला जातो.

अशाप्रकारे संपूर्ण जगाचे पालनपषण करणारे श्रीविष्णू किंवा श्रीराम श्रेष्ठ आहेत. प्रत्यक्ष पार्वती म्हणजे शैलजा आणि शूलपाणी म्हणजे भगवान शंकर हे देखील त्याचे स्मरण करतात एवढा तो श्रेष्ठ आहे. रामनामाचा महिमा प्रत्यक्ष शंकर पार्वतीला वर्णन करून सांगतात. तेव्हा महापराक्रमी, महाबलशाली आणि सर्व गुणांनी संपन्न असलेला हा भगवंत आपल्या दासाची कधीही उपेक्षा करीत नाही. हे लक्षात घेऊन आपणही त्याचेच स्मरण नित्य केले पाहिजे.

स्वसंवाद : 

१) देवांनाही संकटे येतात आणि ते परमेश्वराचा आश्रय घेतात मग मी माझ्या संकटात त्याचा आश्रय घेण्यास का संकोचतो?

२) पालनकर्ता हा जन्म देणाऱ्यापेक्षा श्रेष्ठ असतो मग माझे खरे पालन करणारा कोण आहे हे मी ओळखले आहे का?

३) प्रत्यक्ष शंकर-पार्वती रामाचे स्मरण करतात. माझ्या दिनक्रमात त्याचे स्मरण कितीपत होते?

४) भगवंत “आगळा सर्वगुणें” आहे. माझ्या जीवनात मी कोणत्या गुणांचा आदर्श त्याच्याकडून घेतो आहे?

– – – – 

श्लोक करा. ३२ – – – 

अहिल्या शिळा राघवे मुक्त केली

पदी लागता दिव्य होऊन गेली |

जया वर्णिता शीणली वेदवाणी |

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी |३२|

अर्थ : श्रीरामांच्या पदाचा स्पर्श होताच शिळा झालेली शापित अहिल्या मुक्त झाली. त्यांच्या पदस्पर्शाने तिचा उद्धार झाला. अशा या भगवंताचे वर्णन करताना वेद सुद्धा शीणले आहेत म्हणजे थकले आहेत किंवा त्याचे वर्णन ते करू शकत नाहीत. असा हा अहिल्येचा उद्धार करणारा भगवंत आपला देखील उद्धार केल्याशिवाय राहणार नाही.

विवेचन : या श्लोकांमध्ये समर्थ भगवंताच्या पराक्रमाचे आणि गुणांचे वर्णन करत आहेत आणि आपल्या भक्तांना तो कशाप्रकारे तारतो हेच यातून आपल्या मनावर ठसवत आहेत. आधीच्या श्लोकामध्ये भगवान रामाने रावणाच्या बंदिवासात असलेल्या देवांना मुक्त केले असे समर्थांनी सांगितले. या श्लोकात श्रीरामांच्या पदस्पर्शाने अहिल्येचा कसा उद्धार झाला ही गोष्ट ते आपल्याला सांगत आहेत.

अहिल्या ही गौतम ऋषींची पत्नी अत्यंत रुपवती आणि शीलवती होती तसेच ती महान साधवी आणि पतिव्रता होती इंद्र तिच्या सौंदर्यावर मोहित झाला आणि गौतम ऋषींचे रूप घेऊन त्यांच्या आश्रमात आला. परंतु काही कथांनुसार इंद्राने तिचे शीलभ्रष्ट करण्याआधीच अहिल्येने त्याला ओळखले आणि तो परत फिरला. तर काही कथांनुसार इंद्राच्या कृत्याला ती बळी पडली आणि तिचे पातिव्रत्य भंग झाले असे म्हटले जाते. याच सुमारास गौतम ऋषी आपल्या आश्रमात परत आले आणि त्यांना अहिल्येच्या पातिव्रत्यावर संशय आला आणि त्यांनी तिला तू शिळा होऊन पडशील असा शाप दिला. वास्तविक हे सगळे जे काही घडले यात अहिल्येचा काहीही दोष नव्हता.

खरंतर मूळ वाल्मिकी रामायणात गौतम ऋषींनी अहिल्येला शाप दिल्याची आणि ती शिळा होऊन पडल्याची नोंद नाही. तुलसी रामायणात आणि इतरही अनेक ठिकाणी मात्र ही कथा सांगितली गेली आहे.

समर्थांनी मूळ वाल्मिकी रामायणाचा बारकाईने अभ्यास केला होता. अशा प्रकारची घटना त्यात नाही हे माहीत असताना देखील ते या ठिकाणी त्या घटनेचा उल्लेख करतात. त्याचे कारण म्हणजे ही घटना सर्वांनी स्वीकारली आहे. दुसरी म्हणजे ती रामाची महती सांगणारी आहे. समर्थांचे आराध्य दैवत श्रीराम असल्यामुळे श्रीरामांची महती सांगणारी कोणतीही गोष्ट असेल तरी त्यांना ती मान्य होते.

श्रीराम हे पतितांना पावन करणारे होते. अहिल्येला इतरांनी जरी शीलभ्रष्ट मानले तरी श्रीरामांनी तिचा तिरस्कार कधी केला नाही. आणि तिला आपल्या पदस्पर्शाने पावन करून तिचा उद्धार केला. या साध्वीचे नाव अत्यंत आदराने पाच पतिव्रतांमध्ये घेतले जाते.

अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी तथा 

पंचकन्यां स्मरे नित्यं महापातकनाशनं 

तेव्हा जो भगवंत शिळा झालेल्या अहिल्येचा उद्धार करतो, तो आपला सुद्धा उद्धार करेल हा विश्वास समर्थ आपल्याला या ठिकाणी देतात. पतितांना पावन करणारा असा हा भगवंत आहे त्याच्या पराक्रमाचे आणि गुणांचे वर्णन करण्यासाठी वेद सुद्धा कमी पडतात. त्याचे गुण वर्णन करताना ते थकतात. अशा या परमेश्वराची भक्ती जर आपण मनापासून केली तर तो आपलाही उद्धार केल्याशिवाय राहणार नाही अशी ग्वाही या ठिकाणी समर्थ आपल्याला देतात. म्हणून प्रत्येकाने एकाग्रतेने आणि मनापासून श्रीरामांची भक्ती करावी. मग तो आपल्याबरोबर प्रत्येक प्रसंगी सोबत राहील. संत तुकारामांना असा अनुभव आला होता म्हणूनच ते ” जेथे जातो तेथे तू माझा सांगाती असं म्हणतात. “

स्वसंवाद ::

१) अहिल्येचा दोष नसताना तिला शाप मिळाला. माझा दोष नसताना माझ्या आयुष्यातही असे अन्यायकारक प्रसंग आले तर माझी परमेश्वरावरील श्रद्धा टिकून राहते का?

२) श्रीरामांनी इतरांनी तिरस्कारलेल्या अहिल्येचा स्वीकार केला. मी माझ्या जीवनात अशा उपेक्षित व्यक्तींशी कसा वागतो?

३) “जेथे जातो तेथे तू माझा सांगाती” अशी माझ्या दैनंदिन व्यवहारात मला भगवंताची सोबत जाणवते का 

– क्रमशः श्लोक ३१ आणि ३२.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२० ☆ मोहे चिन्ता न होय… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मोहे चिन्ता न होय। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – अब तो आन बचाओ कन्हाई / स्वर- आरिफ & रूख़्सार)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२० ☆

☆ मोहे चिन्ता न होय… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘उम्र भर ग़ालिब, यही भूल करता रहा/ धूल चेहरे पर थी, आईना साफ करता रहा’– ‘इंसान घर बदलता है, लिबास बदलता है, रिश्ते बदलता है, दोस्त बदलता है– फिर भी परेशान रहता है, क्योंकि वह खुद को नहीं बदलता।’ यही है ज़िंदगी का सत्य व हमारे दु:खों का मूल कारण, जहां तक पहुंचने का इंसान प्रयास ही नहीं करता। वह सदैव इसी भ्रम में रहता है कि वह जो भी सोचता व करता है, केवल वही ठीक है और उसके अतिरिक्त सब ग़लत है और वे लोग  दोषी हैं, अपराधी हैं, जो आत्मकेंद्रितता के कारण अपने से इतर कुछ देख ही नहीं पाते। वह चेहरे पर लगी धूल को तो साफ करना चाहता है, परंतु आईने पर दिखाई पड़ती धूल को साफ करने में व्यस्त रहता है… ग़ालिब का यह शेयर हमें हक़ीक़त से रूबरू कराता है। जब तक हम आत्मावलोकन कर, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते; हमारी भटकन पर विराम नहीं लगता। वास्तव में हम ऐसा करना ही नहीं चाहते। हमारा अहम् हम पर अंकुश लगाता है, जिसके कारण हमारी सोच पर ज़ंग लग जाता है और हम कूपमंडूक बनकर रह जाते हैं। हम  जीवन में अपनी इच्छाओं की पूर्ति तो करना चाहते हैं, परंतु उचित राह का ज्ञान न होने के कारण अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाते। हम चेहरे की धूल को आईना साफ करके मिटाना चाहते हैं। सो! हम आजीवन आशंकाओं से घिरे रहते हैं और उसी चक्रव्यूह में फंसे, सदैव चीखते -चिल्लाते रहते हैं, क्योंकि हममें आत्मविश्वास का अभाव होता है। यह सत्य ही है कि जिन्हें खुद पर भरोसा होता है, वे शांत रहते हैं तथा उनके हृदय में संदेह, संशय, शक़ व दुविधा का स्थान नहीं होता। वे अंतर्मन की शक्तियों को संचित कर निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं; कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते। वास्तव में उनका व्यवहार युद्धक्षेत्र में तैनात सैनिक के समान होता है, जो सीने पर गोली खाकर शहीद होने में विश्वास रखता है और आधे रास्ते से लौट आने में भी उसकी आस्था नहीं होती।

परंतु संदेहग्रस्त इंसान सदैव उधेड़बुन में खोया रहता है; सपनों के महल तोड़ता व बनाता रहता है। वह अंधेरे में गलत दिशा में तीर चलाता रहता है। इसके निमित्त वह घर को वास्तु की दृष्टि से शुभ न मानकर उस घर को बदलता है; नये-नये लोगों से संपर्क साधता है; रिश्तों व परिवारजनों तक को नकार देता है; मित्रों से दूरी बना लेता है… परंतु उसकी समस्याओं का अंत नहीं होता। वास्तव में हमारी समस्याओं का समाधान दूसरों के पास नहीं; हमारे ही पास होता है। दूसरा व्यक्ति आपकी परेशानियों को समझ तो सकता है; आपकी मन:स्थिति को अनुभव कर सकता है, परंतु उस द्वारा उचित व सही मार्गदर्शन करना कैसे करना व समस्याओं का समाधान करना कैसे संभव होगा?

रिश्ते, दोस्त, घर आदि बदलने से आपके व्यवहार व दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आता; न ही लिबास बदलने से आपकी चाल-ढाल व व्यक्तित्व में परिवर्तन होता है। सो! आवश्यकता है,– सोच बदलने की; नकारात्मकता को त्याग सकारात्मकता अपनाने की;  हक़ीक़त से रू-ब-रू होने की; सत्य को स्वीकारने की। जब तक हम इन्हें दिल से स्वीकार नहीं करते; हमारे कार्य-व्यवहार व जीवन-शैली में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आता।

‘कुछ हंसकर बोल दो/ कुछ हंस कर टाल दो/ परेशानियां बहुत हैं/  कुछ वक्त पर डाल दो’ में सुंदर व उपयोगी संदेश निहित है। जीवन में सुख-दु:ख, खशी-ग़म आते-जाते रहते हैं। सो! निराशा का दामन थाम कर बैठने से उनका समाधान नहीं हो सकता। इस प्रकार वे समय के अनुसार विलुप्त तो हो सकते हैं, परंतु समाप्त नहीं हो सकते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध के विचार बहुत सार्थक प्रतीत होते हैं। जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि हम सबसे हंस कर बात करें और अपनी परेशानियों को हंस कर टाल दें, क्योंकि समय परिवर्तनशील है और  यथासमय दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन अवश्यंभावी है। कबीरदास जी के अनुसार ‘ऋतु आय फल होय’ अर्थात् समय आने पर ही फल की प्राप्ति होती है। लगातार भूमि में सौ घड़े जल उंडेलने का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि समय से पहले व भाग्य से अधिक किसी को संसार में कुछ भी प्राप्त नहीं होता। इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं स्वरचित मुक्तक संग्रह ‘अहसास चंद लम्हों का’ की पंक्तियां ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के साथ-साथ/ फूल और पात बदलते हैं।’ इसी के साथ मैं कहना चाहूंगी, ‘ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय व स्थान परिवर्तन से मन:स्थिति व मनोभाव भी बदल जाते हैं; जीवन में नई उमंग-तरंग का पदार्पण हो जाता है और ज़िंदगी उसी रफ़्तार से पुन: दौड़ने लगती है।

चेहरा मन का आईना है, दर्पण है। जब हमारा मन प्रसन्न होता है, तो ओस की बूंदे भी हमें मोतियों सम भासती हैं और मन रूपी अश्व तीव्र गति से भागने लगते हैं। वैसे भी चंचल मन तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। परंतु इससे विपरीत स्थिति में हमें प्रकृति आंसू बहाती प्रतीत होती है; समुद्र की लहरें चीत्कार करने भासती हैं और मंदिर की घंटियों के अनहद स्वर के स्थान पर चिंघाड़ें सुनाई पड़ती हैं। इतना ही नहीं, गुलाब की महक के स्थान पर कांटो का ख्याल मन में आता है और अंतर्मन में सदैव यही प्रश्न उठता है, ‘यह सब कुछ मेरे हिस्से में क्यों? क्या है मेरा कसूर और मैंने तो कभी बुरे कर्म किए ही नहीं।’ परंतु बावरा मन भूल जाता है  कि इंसान को पूर्व-जन्मों के कर्मों का फल भी भुगतना पड़ता है। आखिर कौन बच पाया है…कालचक्र की गति से? भगवान राम व कृष्ण को आजीवन आपदाओं का सामना करना पड़ा। कृष्ण का जन्म जेल में हुआ, पालन ब्रज में हुआ और वे बचपन से ही जीवन-भर मुसीबतों का सामना करते रहे। राम को देखिए, विवाह के पश्चात् चौदह वर्ष का वनवास; सीता-हरण; रावण को मारने के पश्चात् अयोध्या में राम का राजतिलक; धोबी के आक्षेप करने पर सीता का त्याग; विश्वामित्र के आश्रम में आश्रय ग्रहण; सीता का अपने बेटों को अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ने पर सत्य से अवगत कराना; राम की सीता से मुलाकात; अग्नि-परीक्षा और अयोध्या की ओर गमन। पुनः अग्नि परीक्षा हेतु अनुरोध करने पर सीता का धरती में समा जाना’ क्या उन्होंने कभी अपने भाग्य को कोसा? क्या वे आजीवन आंसू बहाते रहे? नहीं, वे तो आपदाओं को खुशी से गले से लगाते रहे। यदि आप भी खुशी से कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो ज़िंदगी कैसे गुज़र जाती है– पता ही नहीं चलता, अन्यथा हर पल जानलेवा हो जाता है।

इन विषम परिस्थितियों में दूसरों के दु:ख को सदैव महसूसना चाहिए, क्योंकि यह इंसान होने का प्रमाण है। अपने दर्द का अनुभव तो हर इंसान करता है और वह जीवित कहलाता है। आइए! समस्त ऊर्जा को दु:ख निवारण में लगाएं। खुद भी हंसें और संसार के प्राणी-मात्र के प्रति संवेदनशील बनें; आत्मावलोकन कर अपने दोषों को स्वीकारें। समस्याओं में उलझें नहीं, समाधान निकालें। अहम् का त्याग कर अपनी दुष्प्रवृत्तियों को सद्प्रवृत्तियों में परिवर्तित करने की चेष्टा करें। गलत लोगों की संगति से बचें। केवल दु:ख में ही सिमरन न करें, सुख में भी उस सृष्टि-नियंता को भूलें नहीं… यही है दु:खों से मुक्ति पाने का मार्ग, जहां मानव अनहद-नाद में अपनी सुधबुध खोकर, अलौकिक आनंद में अवगाहन कर राग-द्वेष से ऊपर उठ जाता है। इस स्थिति में वह प्राणी-मात्र में परमात्मा-सत्ता की झलक पाता है और बड़ी से बड़ी मुसीबत में परेशानियां उसका बाल भी बांका नहीं कर पातीं। अंत में कबीरदास जी की पंक्तियों को उद्धृत कर अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगी, ‘कबिरा चिंता क्या करे, चिंता से क्या होय/ मेरी चिंता हरि करे, मोहे चिंता ना होय।’ चिंता किसी रोग का निदान नहीं है। इसलिए चिंता करना व्यर्थ है। परमात्मा हमारे हित के बारे में हम से बेहतर जानते हैं, तो हम चिंता क्यों करें? सो! हमें उस पर अटूट विश्वास करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित में हमसे बेहतर निर्णय लेगा।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९२ – नवगीत – जीवन में उद्धार है… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतजीवन में उद्धार है

? रचना संसार # ९२ – गीत – जीवन में उद्धार है…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

मानव आप अहं को तजिए,

वह तो एक विकार है।

क्रोध मोह को तज दोगे तब,

जीवन में उद्धार है।।

*

रावण अत्य अंहकारी था ,

करता वो अभिमान था।

माँ सीता का हरण किया था,

बहुत बड़ा नादान था।।

तोड़ा दर्प राम ने उसका,

रख लो मानव ध्यान भी।

मारा प्रभु ने रण में उसको,

सकल जगत को ज्ञान भी।।

धूल अहंकारी हैं मिलते,

करिए आप विचार है।

*

मिट्टी की तो काया है यह,

दूर रहो तुम पाप से।

मानवता के सेवक बन जा,

नित्य डरो संताप से।।

अहंकार है दंश साँप का,

परम शत्रु है प्राण का।

जीवन में वह जहर घोलता ,

काल बने हैं त्राण का।।

करे खोखला दीमक जैसा,

अहंकार अंगार है।

*

मात-पिता का आदर कर लो,

उनका नित सम्मान हो।

प्रेम पंथ पर नित्य चलो तुम,

धर्म कर्म संज्ञान हो।।

अहम् भाव में मत खोओ तुम,

उन्नति में व्यवधान है।

गरल पियो मत इसका सुन लो,

खो जाता सब मान है।।

अहंकार का नाम बुरा है ,

जीवन होता भार है।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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