डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ दिल की तस्वीरें ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“मम्मी, आपके बचपन की फ़ोटो इतनी कम क्यों हैं?” रिया ने पुराना एल्बम पलटते हुए पूछा।
माँ मुस्कुराईं, “क्योंकि बेटा, तब हर पल को कैमरे में नहीं, दिल में कैद किया जाता था।”
“मतलब?”
“मतलब, जब गर्मियों में हम सब खुले आँगन में चारपाइयाँ बिछाकर सोते थे, तब किसी ने फ़ोटो नहीं ली। जब नानी अपने हाथों से आम काटकर खिलाती थीं, जब मोहल्ले के बच्चे गिल्ली-डंडा, कंचे और पिट्ठू खेलते थे, तब भी कोई रिकॉर्डिंग नहीं होती थी।”
“फिर याद कैसे है सब?”
“क्योंकि उन पलों में मोबाइल नहीं, अपने लोग साथ होते थे। ट्रेन के सफ़र में सुराही का पानी, घर से बने पराठे, छत पर पतंगबाज़ी, बरसात में कागज़ की नाव, दादी की कहानियाँ, त्योहारों की रौनक—इन सबकी तस्वीरें नहीं हैं, लेकिन यादें आज भी ताज़ा हैं।”
रिया ने अपना मोबाइल मेज़ पर रख दिया।
“मम्मी, आज शाम दादी से उनकी पुरानी कहानियाँ सुनेंगे?”
माँ की आँखें चमक उठीं।
“हाँ बेटा, कुछ यादें कैमरे से नहीं, अपनों के साथ बिताए समय से बनती हैं।” ❤️
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






अति सुंदर और मार्मिक!
🙏 🪷 🙏