डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ एक कप चाय का जादू ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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माँ ने रसोई से आवाज़ दी- “बेटा, चाय बना दूँ?”
रवि ने थके हुए स्वर में कहा- “हाँ माँ… आज बहुत थक गया हूँ।”
कुछ देर बाद माँ ने उसके हाथ में चाय का कप थमा दिया।
रवि ने एक घूंट लिया।
फिर मुस्कुराकर बोला-
“माँ, पता है… जब भी जिंदगी उलझती है, मुझे लगता है बस एक कप चाय मिल जाए, सब ठीक हो जाएगा।”
माँ हँस पड़ीं- “चाय में ऐसा क्या है?”
रवि ने कप को देखते हुए कहा- “चाय में सिर्फ दूध, पानी और पत्ती नहीं होती माँ…
उसमें आपका अपनापन, दोस्तों की बातें, बारिश की यादें और मन को सुकून देने वाला थोड़ा-सा प्यार भी घुला होता है।”
माँ चुप रहीं।
और रवि चाय के घूंट के साथ दिनभर की थकान पीता रहा।
तभी उसे लगा- हम सिर्फ चाय नहीं पीते,
उसके साथ रिश्तों की गर्माहट भी घूंट-घूंट पीते हैं।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





