श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ।)
☆ शेष कुशल # ६३ ☆
☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” – शांतिलाल जैन ☆
आईपीएल खत्म हो गया है सो ठिया आबाद करके शाम का खालीपन भरने की कोशिश में यार-दोस्त यहाँ जुटने लगते हैं. ठिए का ओटला अपन की तशरीफ़ का रोज़ाना इंतज़ार करता है. मैं जाता हूँ. मगर इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान फील करता हूँ. कल तक अपन की मेधा रनों के चेज़, विकेटों के पतन, ओरेंज, पर्पल केपों, टूटते-बनते रिकार्डों जैसी जानकारियों पर सक्रिय नज़र आती थी. घर की बैठक से लेकर यार-दोस्तों के ठियों तक क्रिकेट ही टाकिंग पॉइंट हुआ करे था. आज नीट एग्जाम के पेपर लीक का मुद्दा सोच को बार-बार अपनी ओर खींच रहा है. दो महीने से चौकों-छक्कों की आतिशबाजी और विकेटों के गिरने के रोमांच में डूबी शाम का मजा सीबीएसई स्टूडेंट्स के साथ घट रही त्रासदियों के कड़वे घूँट ने किरकिरा कर रखा है. दोस्त चाहते हैं मैं इन गैर जरूरी मुद्दों को झटककर फिर से क्रिकेट के कार्निवाल में रम जाऊँ मगर नहीं हो पा रहा. बार-बार अपने नातियों का मासूम उदास चेहरा अपन के जेहन में घूम जाता है.
मैं यारों के बीच इन पर बहस उकेरना चाहता था मगर उस रोज़ ठिए पर दादू के अलावा कोई आया ही नहीं. बोले – “तुम्हारी सोच नकारात्मक हो गई है, सांतिभिया. दुश्वारियाँ आईपीएल से पहले कम थीं क्या?”
“नहीं दादू, दुश्वारियाँ तो आईपीएल के दरम्यान भी रहीं मगर निज़ाम ने हर शाम मस्ती में बिताने का फुल बंदोबस्त कर रखा था. उसने सस्ता डाटा भी मुहैया करा रखा था. नहीं करा पाया निज़ाम तो बस! आटा सस्ता नहीं करा पाया.”
दादू बोला – “हर समय महंगे आटे का रोना लेकर बैठ जाते हो तुम, सांतिभिया. आईपीएल ख़त्म हुआ तो क्या! रील एन्जॉय कीजिए. हर समय रोते मत रहिए. सीबीएसई की परीक्षा के आगे जहाँ और भी हैं. क्या हो जाएगा एक पीढी पूरी अनपढ़ भी रह ली तो!! जो पढ़े लिखे हैं वे कौनसे नैतिक काम कर रहे हैं? पढ़ा-लिखा बिका हुआ जज, बिका हुआ अफसर, बिका हुआ चुनाव अधिकारी, बिके हुए हाकिम, मुलाज़िम, उतने ही बिके बिके से सम्पादक और पत्रकार पढ़े लिखे नहीं हैं क्या? बिके हुए पढ़े लिखे समाज से बेहतर है एक पूरी पीढ़ी का अनपढ़ अनबिका रह जाना. करियर और रोज़गार के गम मत पालिए सांतिभिया क्रिकेट का अफगानिस्तान दौरा एन्जॉय कीजिए. महंगे पेट्रोल के गम को वैभव सूर्यवंशी के छक्कों, जोफ्रा आर्चर की यॉर्करों में भूल जाईए.”
मैंने कहा – “ऐसे कैसे हो सकता है दादू ? नाती ट्वेल्थ में नाईंटी एट परसेंट पर कॉंफिडेंट था. उसके रोल नंबर पर किसी और की कॉपी स्कैन हो गई है. दूसरावाला दो साल से नीट की तैयारी कर रहा था. कोचिंग क्लास की फीस ने पहले ही बजट घाटे में ला दिया है. आईपीएल में रन रेट के ऊपर-नीचे होने से जिंदगी हलाकान नहीं होती, घर के बजट का रन रेट गिरने से होती है. अपन के बजट का विकेट तो महीने के पहले ओवर में ही गिर जा रहा है. न पॉवर बचा है न प्ले. दो महीने तक टीवी का रिमोट जिस तरह का ‘स्ट्राइक रेट’ दिखाता था, अब वह थम गया है. उसकी जगह डॉलर के रेट ने ले ली है. सिक्स के काउंटर पर इन्क्रिजिंग नंबर देखने की लत लग गई थी, अब पेट्रोल डिस्पेंसर के घटते काउंटर ने टेंशन बढ़ा दी है. एक बात बताओ दादू मुद्दों के ये ‘बक’ कभी तो कहीं तो ‘स्टॉप’ करते होंगे?”
“ये नया निज़ाम है सांतिभिया, वज़ीर-ए-तालीम से लेकर वज़ीर-ए-आज़म तक, स्टॉप करने तो दूर बक अब किसी की टेबुल के आस पास फटकने भी नहीं पाते. झेड-प्लस सिक्युरिटी लगी होती है कि परिंदा भी पर नहीं मार पाता, जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? वैसे निज़ाम के कंसिडरेशन में है कि आईपीएल के टाईम स्लॉट में क्या नया लाए जाए कि जेन-जी जंतर मंतर पहुँचने की बनिस्बत स्टेडियम की दीर्घाओं में नज़र आए. वो चियर-लीडर्स के ठुमकों में गिरते सेंसेक्स को भूल जाए. अवाम को जीवन की आपाधापी से निजात दिलापाना शायद उसके वश में नहीं रहा तो क्यों न उसे रील के समंदर में स्कूबा डाइविंग का मज़ा लेने के लिए छोड़ दिया जाए. कोशिश में है निज़ाम कि साल में दो-चार आईपीएल आयोजित करवाए. जब तक स्क्रीन पर गेंद घूमती रहेगी, तब तक आप जैसे सिरफिरों का भेजा घूमेगा नहीं. वरना ये पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई, स्कैम के बाउंसर आप को ज्यादा दिन सकारात्मक रहने नहीं देगे. जस्ट चिल माई डियर सांति, उबलने की जिम्मेदारी चाय पर छोड़ दीजिए. कड़क मीठी का कट एन्जॉय कीजिए और निकलिए.”
उस रोज़ ठिए पर बहस लम्बी नहीं चली.
-x-x-x-
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
© शांतिलाल जैन
बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010
9425019837 (M)
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





