डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘मंत्री जी का हाज़मा‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मंत्री जी का हाज़मा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

मंत्री जी लाव-लश्कर के साथ डॉक्टर के दवाखाने पहुंचे। लश्कर को बाहर छोड़कर मंत्री जी डॉक्टर के चेंबर में दाखिल हुए। डॉक्टर ने आने का कारण पूछा तो मंत्री जी ने बताया— ‘पेट में बहुत तकलीफ रहती है। कुछ भी पचता नहीं। कभी उल्टी होती है तो कभी डायरिया। बेचैनी बहुत रहती है। अचानक ही घबराहट होने लगती है। हलक सूखता रहता है।’

डॉक्टर ने पूछा, ‘खाना क्या खाते हैं? कुछ बदपरहेज़ी होती होगी।’

मंत्री जी ने जवाब दिया, ‘बहुत सादा खाना खाता हूं। कोई बदपरहेज़ी नहीं होती।’

डॉक्टर साहब चक्कर में पड़े, बोले, ‘पूरी जांच करनी पड़ेगी।’

मंत्री जी कुछ संकोच में बोले, ‘वैसे आप अपने तक ही रखें तो बताना चाहता हूं कि मेरी तकलीफ तभी बढ़ती है जब लोग पैसा वैसा दे जाते हैं। लोग ब्रीफकेस लेकर आते हैं और छोड़ कर चले जाते हैं। मना करता हूं तो कहते हैं रख लीजिए, नहीं तो हमारा दिल टूट जाएगा। तभी हमें घबराहट होती है और उल्टी डायरिया का सिलसिला शुरू हो जाता है। रात को नींद भी नहीं आती।’

डॉक्टर साहब हंस कर बोले, ‘समझ गया। आपकी दूसरी वाली यानी माल हज़म करने वाली पाचन-शक्ति कमज़ोर है। आपके पिताजी क्या करते थे?’ 

मंत्री जी ने जवाब दिया, ‘स्कूल मास्टर थे।’

डॉक्टर साहब फिर हंसे, बोले, ‘यही रोग की जड़ है। आपके खानदान में माल पचाने की परंपरा नहीं रही। इसीलिए आपको दिक्कत हो रही है।’

फिर कुछ सोच कर बोले, ‘इस मर्ज़ का इलाज आपको डॉक्टर के पास नहीं मिलेगा। आप किसी अनुभवी, तपे हुए राजनीतिज्ञ के पास जाइए। उन्हीं के पास माल पचाने का नुस्खा मिलेगा।’

मंत्री जी डॉक्टर साहब को धन्यवाद देकर रुख़सत हो गये। एक माह बाद डॉक्टर साहब के पास उनका फोन आया, बोले, ‘धन्यवाद, डॉक्टर साहब। आपने सही रास्ता दिखाया। मुझे एक सीनियर राजनीतिज्ञ से पाचन-शक्ति बढ़ाने का मशवरा मिल गया है। अब पेट की गड़बड़, घबराहट वगैरह  कुछ नहीं होती। आपको बहुत धन्यवाद।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments