डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘विष्णु भगवान को रिमाइंडर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विष्णु भगवान को रिमाइंडर डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

 

प्रभु,

कई साल पहले मैंने आपको एक पत्र के द्वारा निवेदन किया था कि चूंकि अब मेरी उम्र आपके प्रत्यक्ष दर्शन के लायक हो गयी है, अतः मेरे सपने में किसी प्रतिनिधि को भेज कर जानकारी मुहैया करायें कि स्वर्ग और नरक में इंतज़ामात कैसे हैं। अभी कथावाचकों से जो जानकारी मिलती है उससे बहुत समाधान नहीं होता। अफसोस है कि मेरे निवेदन का आज तक कोई उत्तर नहीं मिला। लगता है आपके दफ़्तरों में कामकाज ठीक नहीं है।

मुझे यह निवेदन इसलिए करना पड़ा क्योंकि यहां मृत्युलोक में हमारी लाइफ़-स्टाइल में बहुत तरक्की हो गयी है। हम बहुत आराम-पसन्द हो गये हैं। हमारे बाप-दादा ने टेबिल-फ़ैन भी नहीं देखा था, लेकिन हम ए.सी. की हवा ले रहे हैं, भले ही बार-बार ज़ुकाम से पीड़ित हो रहे हों। हमारे बहुत से काम अब ‘रोबो’ और ‘रिमोट’ कर रहे हैं। आदमी को हिलने-डुलने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन सीधा बिस्तर से ट्रांसफर होकर अर्थी पर चढ़ जाएगा।

प्रभु, यह ध्यान रहे कि अब हम रथ की सवारी के लायक नहीं रहे। हम में से ज़्यादातर ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ और ‘आर्थ्राइटिस’ के मरीज़ हैं। ‘जंक फ़ूड’ खाते-खाते हमारी हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं। रथ पर बैठेंगे तो निश्चय ही दो-चार हड्डियां टूटेंगीं। यहां तो साधु-सन्यासी भी करोड़ों की कार में घूम रहे हैं और करोड़ों का सोना पहन रहे हैं। इसलिए निवेदन है कि हमारी हालत के मद्देनज़र आरामदेह ट्रांसपोर्ट का इंतज़ाम हो। डायबिटीज़ और ब्लड-प्रेशर के मरीज़ों के लिए वहां क्या इंतज़ाम है, यह भी शंका बनी हुई है।

एक विशेष बात जिसके लिए मैं यह पत्र लिख रहा हूं यह है कि आपके चित्रों में आप अपनी ससुराल यानी समुद्र में शेषशैया पर लेटे हैं और आपकी पत्नी लक्ष्मी आपके चरण चांप रही हैं। देख कर कुछ अजीब लगता है। एक तो आपका इतने दिन तक ससुराल में रहना ठीक नहीं है। हमारे यहां कहावत है ‘ससुरार सुख की सार, रहै दिना दो चार।’ यानी ससुराल में सुख मिलता है, बशर्ते कि दो-चार दिन ही रहा जाए। इसलिए समझना मुश्किल है कि आप वहां कैसे हज़ारों साल से डेरा जमाये हैं। ससुर साहब आपके लिहाज में कुछ न बोलते होंगे, लेकिन आपका वहां इतने लंबे समय तक घरजमाई की तरह टिकना उचित नहीं लगता।

लक्ष्मी जी का लगातार आपके चरण चांपना आपके बहुत से भक्तों को अटपटा लग रहा है। यह नारी-अस्मिता और स्त्री-स्वातंत्र्य का ज़माना है। करवा चौथ और तीजा को छोड़ दें तो आज की नारियां पति के चरण छूते हुए फोटो खिंचाने से हिचकती हैं। एक पुरानी फिल्म में पत्नी को पति-भक्ति में गाते हुए सुना था— ‘कौन जाए मथुरा, कौन जाए काशी, इन तीर्थों से मुझे क्या काम है; मेरे घर में ही हैं भगवान मेरे, उनके चरनों में मेरे चारों धाम हैं।’ ऐसे गीत अब सुनायी नहीं पड़ते। पतिदेव का मर्तबा भी पहले जैसा नहीं रहा। इस बीच नारी-अस्मिता के बड़े-बड़े आंदोलन हो गये, जिनके मार्फत स्त्री को समझा दिया गया कि पति नाम का प्राणी ‘परमेश्वर’ नहीं, महज़ हाड़-मांस का मामूली पुतला है। परिणामत: कई घरों में पति की इज़्ज़त दो कौड़ी की हो गयी है।

एक और बात यह कि आप अपने चार हाथों में से एक में पद्म यानी कमल धारण किये हैं और आपका एक हाथ अभय मुद्रा में उठा है। मुश्किल यह है कि कमल और हाथ हमारे यहां पार्टियों के चुनाव-चिन्ह हैं, इसलिए यहां दो पार्टियों के बीच सिरफुटव्वल हो रही है। दोनों आपके चित्रों की दुहाई देकर कहती हैं कि आपका आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो रहा है। इस संबंध में आपकी तरफ से कुछ स्पष्टीकरण मिल सके तो यह खींचतान बंद हो। गनीमत है कि आपके शंख और चक्र किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह नहीं हैं, अन्यथा और बवाल मचता।

अन्त में मेरा आपसे पुनः निवेदन है कि  ‘वहां’ के इंतज़ामात के बारे में मेरे द्वारा चाही गयी जानकारी मुहैया करायें ताकि मेरे जैसे लोग निश्चिंत होकर स्वर्ग या नरक में प्रवेश कर सकें। दूसरे, आप जल्दी लक्ष्मी जी के साथ ससुराल छोड़कर अपने घर लौटें ताकि भक्तों का असमंजस दूर हो सके।

मेरी बातों को अन्यथा न लें। कृपा बनाये रखें।

आपका परम भक्त

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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