डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘दलबदलुओं के लिए सहूलियत ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

संसद और विधानसभा में दल-बदल की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र सरकार ने दलबदलुओं की सहूलियत के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं। अभी अपनी पार्टी से तलाक लेने की इच्छा होने पर दलबदलू को नयी पार्टी के नेताओं के दरबार में जाकर चरण-वरण छूने पड़ते हैं, कुछ शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है। उन्हें इस जिल्लत से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि संसद और राज्यों की विधानसभाओं के बाहर ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ का निर्माण किया जाए।  जब भी किसी दलबदलू के पेट में मरोड़ होगी, पुराने दल को छोड़कर किसी मलाईयुक्त पार्टी में संतरण करने की इच्छा बलवती होगी, तब वह वह इस कक्ष के भीतर प्रवेश कर आसन पर बैठ जाएगा और यह खबर तत्काल जंगल की आग की तरह फैल जाएगी कि नेताजी की ‘अक्कल दाढ़’ निकल आयी है और वे दल बदलने की मंशा से पीड़ित हैं। फिर नेताजी उम्मीद करेंगे कि दूसरी पार्टी वाले उन पर डोरे डालेंं और उन्हें बाइज़्ज़त, गाजे-बाजे के साथ अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए ले जाएं।

पुराने ज़माने में यह काम राजाओं के ‘कोप भवन’ के द्वारा होता था। जब रानियां किसी बात पर रुष्ट हो जाती थीं तो वे कोप भवन में प्रवेश कर जाती थीं और सबको पता चल जाता था कि रानी रूठ गयी हैं। फिर राजा साहब सारा राज- काज छोड़कर रानी की रुसवाई को दूर करने में लग जाते थे। कुछ ऐसा ही असर नेताजी के ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ में प्रवेश करने से अपेक्षित है।

दलबदलुओं के साथ एक  गड़बड़ यह होती है कि दल बदलने के साथ उनके ‘सुर’ में ज़रूरी तब्दीली नहीं हो पाती। आदत न होने की वजह से कई बार असावधानी में वे पुराने दल और पुराने नेता का गुणगान और नई पार्टी को पूर्ववत गरियाना शुरू कर देते हैं। ऐसा एक दो दलबदलुओं के साथ हो चुका है। ज़्यादा दल बदलने वालों के सामने यह संकट अक्सर खड़ा हो जाता है। हमारे गायक मन्ना डे ने सही सुर साधने की इसी समस्या को एक गीत में व्यक्त किया है— ‘सुर ना सधे, क्या गाऊं मैं? सुर के बिना जीवन सूना।’ राजनीति ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ वाली चीज़ होती है। दलबदलू  की सही सुर पकड़ने की असावधानी उसके भविष्य के लिए घातक हो सकती है। इसलिए निर्णय लिया गया है कि संसद और विधानसभाओं के निकट ‘सुर’ सुधारने वाले क्लिनिक स्थापित किये जाएंगे जहां ऑपरेशन के द्वारा दलबदलुओं के स्वर-यंत्र में ज़रूरी सुधार किये जाएंगे ताकि वे अपने पुराने दल की भर्त्सना और नये दल की तारीफ बिना चूके कर सकें। इन क्लिनिक्स में चिकित्सा के लिए सरकार ‘सब्सिडी’ प्रदान करेगी।

इसके बाद भी जिन दलबदलुओं का सुर नहीं सुधरेगा, जो अपराध-बोध या आत्मग्लानि से पीड़ित रहेंगे, या जिनकी अंतरात्मा उन्हें फटकारती  रहेगी, उनके लिए बाकायदा ‘हार्ट ट्रांसप्लांट क्लिनिक’ स्थापित किए जाएंगे जहां दिल बदलने का काम किया जाएगा, ताकि दिल और आत्मा की खटखट ही ख़त्म हो जाए। यानी दल-बदल और दिल-बदल का कार्यक्रम साथ-साथ संपन्न होगा। इसके लिए भी सरकार ‘सब्सिडी’ का प्रावधान करेगी।

सरकार को भरोसा है कि इन सुविधाओं से प्रभावित होकर ज़्यादा से ज़्यादा सदस्य सरकारी दल में शामिल होकर उसकी ताकत में इज़ाफ़ा करेंगे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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