डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘समाधान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३७ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ समाधान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

रोज़ शाम को शुभा का इंतज़ार होता है। पांच बजे के बाद दरवाज़े पर आहट होने पर सबकी  निगाहें इसी उम्मीद के साथ उठती हैं कि दरवाज़े पर शुभा होगी।

दो महीने पहले शुभा की नियुक्ति एक सरकारी महाविद्यालय में  व्याख्याता के पद पर हुई थी। नियुक्ति में कोई दिक्कत नहीं हुई। परेशानी तब हुई जब पोस्टिंग ऐसे  महाविद्यालय में हुई जो शहर से करीब साठ मील दूर था। अब रोज़ सुबह आठ बजे तीन चार मील दूर स्टेशन जाना पड़ता है। उसके बाद दो घंटे की ट्रेन यात्रा के बाद महाविद्यालय पहुंचना पड़ता है। फिर भी अपने पैरों पर खड़े होने और समाज में अपनी जगह बनाने के ख़याल से अच्छा लगता है। शुभा का संसार अब बड़ा हो गया है। समाज में अब उसकी हैसियत बन गयी है। अभी ट्रेन में अकेले यात्रा करने की आदत नहीं थी। शुरू शुरू में काफी मुश्किल महसूस होती थी। सिमट सिकुड़ कर यात्रा पूरी करनी पड़ती थी। कभी किसी के  उड़ते हुए फ़िकरे को सुनकर अनसुना करना पड़ता था। फिर धीरे-धीरे आदत होने लगी। शुभा को भी लगने लगा कि सब कुछ इतना ख़तरनाक नहीं होता जितना  दूर से महसूस होता है।

संबंधियों, पड़ोस और नगर में अब शुभा का अपना वजूद है। कहीं आयोजनों, कार्यक्रमों में जाती है तो लोगों की निगाहें उसकी तरफ उठतीं और टिकतीं हैं। उसकी बात कान देकर सुनी जाती है। परिवार में भी उसकी बात लगभग निर्णयात्मक होती है।

लेकिन ज़िन्दगी का रास्ता हमवार नहीं होता। एक शाम शुभा लौटी, लेकिन रोज़ की तरह नहीं। जब लौटी तो ख़ामोश, चेहरे पर परेशानी। घर में आकर बिना किसी से बात किये पलंग पर लेट गयी। सब हतप्रभ। मां के प्राण हलक में आये। कौन सी मुसीबत आयी?

पूरा घर से शुभा के आसपास इकट्ठा हो गया। सब तरफ से चिन्तित सवाल। पूछताछ से पता चला कि कुछ लड़के थे जिन्होंने लौटते में पूरे रास्ते शुभा को तंग किया। पूरे रास्ते फ़िकरेबाज़ी। अपने स्टेशन तक पहुंचना पहाड़ हो गया। डिब्बे के सारे यात्री तटस्थ बने रहे। कुछ ऐसे भी थे जो ख़ुद शरीफ़ बने स्थिति का आनंद लेते रहे। अब शुभा भयभीत थी। पता नहीं वे लड़के कहां के थे। उन्होंने अगर उसे ही लक्ष्य बनाकर रोज़ परेशान करना शुरू कर दिया तो आना जाना संकट का काम हो जाएगा।

उसकी रिपोर्ट सुनकर घर के सभी बड़े लोग अपराध-बोध से ग्रस्त हो गये। सभी को लगा लड़की से नौकरी करा के गलती की। सदियों से लड़कियां घर में बैठती रही हैं। सिर्फ शादी करके दूसरे के घर की शोभा बनती रही हैं। अगर शुभा भी नौकरी न करती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता। जिन  जिन सदस्यों ने पहले शुभा की पीठ ठोंकी थी उन्हें लगने लगा कि उनसे गलती हो गयी।

सबसे पहले टिप्पणी शुभा के बूढ़े दादाजी की तरफ से आयी। वे शुरू से ही लड़कियों की नौकरी के खिलाफ थे। उन्होंने अपना गुस्सा बेटे-बहू पर उतारा। तमतमाकर बोले, ‘हमने पहले ही कहा था कि लड़कियों को घर में ही रखो, लेकिन तुम्हें तो लड़कियों की कमाई से घर भरने की पड़ी है।’

बेटा-बहू चुप, जैसे चोरी करते पकड़े गये हों। शुभा फिलहाल अकेले यात्रा करने को तैयार नहीं है। मन में भय बैठ गया है, उससे मुक्ति पाने में समय लगेगा।

मां पति से पूछती हैं, ‘शुभा का ट्रांसफर अपने शहर में नहीं हो सकता?’

शुभा के पिता पहले ही अपने पिता की डांट खाकर झल्लाये हैं। खीझ कर कहते हैं, ‘ट्रांसफर रातोंरात नहीं होते। रातोंरात ट्रांसफर उनके होते हैं जिनकी लंबी पहुंच होती है। अपनी बेटी की तो नौकरी लग गयी, यही बहुत समझो।’

शुभा छुट्टी लेकर घर बैठ गयी है। फिलहाल कुछ सोचना नहीं है। पिता कई बार कह चुके हैं, ‘बेटा, नहीं चलती तो छोड़ो नौकरी वौकरी। तुम्हारे नौकरी न करने के बावजूद गृहस्थी  तो चलेगी ही। अभी हमारे हाथ  पांव चलते हैं।’ लेकिन उनकी आवाज़ में दम नहीं है। शुभा की तनख्वाह से घर में रौनक आयी है। घर के अविवाहित बच्चों की कमाई ज़्यादातर चमक-दमक और शौक पूरे करने में जाती है, इसलिए उसका असर तत्काल दिखायी पड़ता है। अब बेटी घर में बैठी है इसलिए वीर-भाव के प्रदर्शन के बावजूद पांव के नीचे से खिसकती ज़मीन का एहसास होता है।

शुभा के दादाजी एकदम तुले हैं कि नौकरी से तत्काल इस्तीफा दे दिया जाए और शुभा के पिता उनसे कन्नी काटते घूमते हैं। घर में चूहा- बिल्ली का खेल चलता है। दादाजी पुराने ज़माने के, आज की ज़मीन से कटे हैं। उनके पुत्र सारी मान्यताओं और परंपराओं के बावजूद आज के दबावों को समझते हैं।

इस बीच शुभा के पिता कॉलेज के प्रिंसिपल से मिल आये हैं। वहां से कोई उत्साहवर्धक जवाब नहीं मिला। प्रिंसिपल ने कहा, ‘नौकरी करना है तो कुछ दिक्कतें उठानी पड़ेंगीं, कुछ रिस्क लेना पड़ेगा। आप उन लड़कों के बारे में जानकारी दे सकें तो मैं पुलिस में रिपोर्ट करा दूंगा।’ शुभा के पिता को लड़कों की कुछ जानकारी मिली थी, लेकिन वे बड़े झमेले में नहीं फंसना चाहते थे। पूरे रास्ते पुलिस उनकी बेटी की चौकीदारी करने से रही।

चार-छ: दिन गुज़रने पर विचार बदलने लगे। शुभा को भी कुछ अटपटा लगने लगा और घर के लोगों के स्वर बदलकर कुछ ऐसे हो गये कि लंबी छुट्टी लेना ठीक नहीं है। नयी नौकरी है, कोई अड़चन आ सकती है। मोटी तनख्वाह वाली  नौकरी पर इस तरह लात मार देना अक्लमंदी की बात नहीं।

तय हुआ कि शुभा का छोटा भाई मुन्नू उसके साथ रोज़ सफर करेगा। पुरुष का होना ज़रूरी है, भले ही छोटा भाई हो। घर के वातावरण को देखते हुए मुन्नू ने मना नहीं किया। अब फिर शुभा की कॉलेज यात्रा शुरू हो गयी। तीन-चार दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा, फिर मुन्नू ने असहयोग शुरू कर दिया। कहा, ‘सब कुछ तो ठीक चल रहा है। फालतू मुझको इतनी दूर दौड़ना पड़ता है।’ उसने जानबूझ कर हीला-हवाला करना शुरू कर दिया। कभी सो कर उठने में घंटों लगाता, कभी बाथरूम में घुसकर समाधि लगा लेता।

तीन-चार दिन बाद उसने विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया। अब यह व्यर्थ का काम उसके वश का नहीं। उसका पूरा दिन नाश हो जाता है। पढ़ाई लिखाई का नुकसान अलग होता है। शुभा के माता-पिता के सामने फिर समस्या खड़ी हुई। आज के ज़माने में बेटी के साथ रोज़ जाने वाला कौन है, और फिर हर किसी पर भरोसा कैसे किया जाए? किसी पराये व्यक्ति के साथ रोज़ जाने पर लोगों को टिप्पणी करने का मौका मिलता है।

मुन्नू के मना करने के बाद शुभा के पिता ने दो-तीन दिन की छुट्टी ली। लेकिन अब शुभा को इस इंतज़ाम से कष्ट होने लगा। पहले  मुन्नू कॉलेज के आसपास वक्त गुज़ारने के लिए निरर्थक घूमता था, अब पिता कॉलेज के किसी कोने में बैठकर ऊंघते थे। कॉलेज के लोगों के सामने कैफियत देते शुभा को शर्म आती थी। और भी शिक्षिकाएं थीं जो निर्द्वंद्व आती जाती थीं और वे कभी रास्ते में हुई दिक्कतों का रोना नहीं रोती थीं। ऐसी भी शिक्षिकाएं थीं जो अकेले शहर में कमरा लेकर रह रही थीं और फिर भी कभी कोई शिकायत नहीं करती थीं।

पिता तीसरे दिन शुभा के साथ जाने की तैयारी कर रहे थे कि शुभा ने उन्हें रोक दिया, कहा, ‘मैं चली जाऊंगी। आप अपनी नौकरी पर जाइए।’

पिता अचकचाये, बोले, ‘बेटा रास्ते में फिर कुछ गड़बड़ हुआ तो?’

शुभा ने संयत स्वर में जवाब दिया, ‘चिन्ता छोड़ दीजिए। वहां प्रिंसिपल हैं, पुलिस है, इतने सारे साथी हैं। फिर ये छेड़छाड़ करने वाले किस सीमा तक जाएंगे यह मेरी समझ में आ गया है। मैं आराम से वापस लौट आऊंगी।’

बहुत दिनों बाद पिता के मन से एक भारी बोझ हटा। धूप का एक टुकड़ा जो इतने दिनों तक ग़ायब था, फिर घर में कौंध कर उसे रौशन कर गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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