स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९२ ☆

☆ –  पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१  ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

पद्मा का क्रंदन

दस्तकें दे रहा है,

हिमालय के कानों पर,

और बाँधकर वज्र

प्राणों पर

हिमालय विन्ध्याचलहो रहा है।

हम नहीं करेंगे

अगस्त्य की प्रतीक्षा,

नहीं फलने देंगे कोई छल,

हिमालय हिमालय ही रहेगा

नहीं होने देंगे उसे विन्ध्याचल

बात पर्वतों की कर रहा हूँ

मगर, पर्वत आदमी नहीं होता,

हाँ, आदमी चाहे तो

पर्वत बन सकता है,

मुसीबत के मानसूनों के आगे

उसका सीना तन सकता है।

तो आओ,

हम पहाड़ों का पहाड़ा पढ़ें,

इंसानियत की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ें,

और देखें कि कहाँ क्या हो रहा है।

हाय !

दिलों पर लकीरें खींचकर

सौंपा जा रहा है

प्रतिबंधित रिवेश,

कैसी विडम्बना है-

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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