आचार्य भगवत दुबे
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे गुस्सा सें हेरत जा रय“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५५ ☆
☆ बुन्देली कविता – “तुम काऊ की खोट न देखौ“ ☆ आचार्य भगवत दुबे
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तुम काऊ की खोट न देखौ
तनक छिले हैं, चोट न देखौ
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कैसे कौन बटोर रओ है ये चुनाव में वोट न देखौ
रातों-रात बाँट दय ऊ ने दारू, उन्हा, नोट न देखौ
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दंगल में ललकार रओ है ऊ कौ लाल लँगोट न देखौ
साँठ-गाँठ कर लइ बैरी सें बिठा लई है गोट न देखौ
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श्रम के चना-चबैना नोंने अब काजू अखरोट न देखौ
‘भगवत‘ सुख सें खाव मलीदा कैसें बन रव रोट न देखौ
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© आचार्य भगवत दुबे
82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





