आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८८ ☆
☆ ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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इसने ताका, उसने ताका
कौन न जिसने जी भर ताका
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मौका देख न चूका कोई
दोस्त यार फूफा या काका
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चीख न अबला की सुनता जग
सबला की झट सुनता आका
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जिन पर जिम्मा संरक्षण का
वे ही डाल रहे हैं डाका
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मन की बातें हैं मनमानी
कमीशनों का निश्चित खाका
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हुए पड़ोसी सभी विरोधी
आँख दिखा गुर्राए ढाका
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फेंक रहे हैं लाखों हँसकर
पोस्टिंग हो पा जाएँ नाका
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खाते जाते जो डकार ले
उनके कारण होता फाका
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लोकतंत्र ने जिनको पोसा
उनके कारण करता साका
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
१६.७.२०२६
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