स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९६ ☆
☆ – प्रायमरी का मास्टर…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(रचनाकाल : दीपावली 1970)
कहीं पढ़ा था
गुरू बहुत बड़े होते हैं,
कहीं सुना था कि
वे प्रभु की बराबरी से खड़े होते हैं।
कबीर की कड़ी के लोग
चाहे जितना गाएँ-
‘गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागू पाँय‘
लेकिन आज
गरियाये जाते हैं गुरूजी
बिलानागा।
कोई नहीं कहता
‘बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा‘।
कैसे प्रकट करूँ मैं
अपने मन के पाप को,
कि काम भी बन जाय
और
बुरा भी न लगे आपको।
जी, तबियत उचट रही है
अपने व्यवसाय से,
और भी संगाती है
पूछ लीजिये न समूचे समुदाय से-
कि पूरा पड़ जाता है
तुम्हारा तुम्हारी आय से ?
उत्तर में निकलती है
सिर्फ एक ‘हाय‘।
क्रमशः…२
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
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