श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ कविता – कभी गाँव  था

कभी गाँव था अब नगर हो गया

नदी बह रही थी ज़हर हो गया

*

यहाँ बांग देने न मुर्गे रहे

घडी बोल बैठी गजर हो गया

*

नहीं भोर होती नशा रात भर

नशे का यहाँ तो कहर हो गया

*

नहीं मानता वो खुदा की दुवा

बुरा मैकदे का असर हो गया

*

नई नस्ल काफी परेशान हैं

खुशी में हमारा सफ़र हो गया

*

नशे में युवा तो यहाँ मर रहे

वहाँ नौजवाँ तो अमर हो गया

*

पढाया लिखाया पिताने मगर

जवाँ दिल किसी की नज़र हो गया

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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