श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे
☆ कविता – कभी गाँव था ☆
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कभी गाँव था अब नगर हो गया
नदी बह रही थी ज़हर हो गया
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यहाँ बांग देने न मुर्गे रहे
घडी बोल बैठी गजर हो गया
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नहीं भोर होती नशा रात भर
नशे का यहाँ तो कहर हो गया
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नहीं मानता वो खुदा की दुवा
बुरा मैकदे का असर हो गया
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नई नस्ल काफी परेशान हैं
खुशी में हमारा सफ़र हो गया
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नशे में युवा तो यहाँ मर रहे
वहाँ नौजवाँ तो अमर हो गया
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पढाया लिखाया पिताने मगर
जवाँ दिल किसी की नज़र हो गया
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© अशोक श्रीपाद भांबुरे
धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.
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